आयुर्वेद लेख संग्रह
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आर्युवेदिक आधारित विभिन्न औषधियों , प्रामाणिक, अद्भुत, ज्ञानवर्धक एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी लेख इस चैनल पर नियमित प्रसारित किए जाते । जुड़े रहें और अपनों को जोडते रहें.... Find us on 🙏🏻🌎 😊Insta 👉🏻 @ ayurvedic.bharat 😊 FB 👉🏻 @ ayurved18
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प्रश्न: क्या आयुर्वेद में टेप वॉर्म का कोई इलाज है। एल्बेंडाजोल मैबेंडजोल आदि अनेक प्रयास कर चुके हैं।
रोगी जानकारी: रोगी बुजुर्ग हैं आयु? निवास स्थान? रोग कब से है?
... मिरांश राज
रोगी की पूरी जानकारी नहीं है फिर भी प्रयास है, निम्न विधि द्वारा लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
👉 इस रोग में लक्षण होते हैं पेट में दर्द, वजन कम होना, भूख कम या अधिक लगना, मुंह का स्वाद बदलना, सोते समय लार गिरना और हर समय कमजोरी बनी रहना आदि
उपचार.... यदि अन्य कोई समस्या नहीं है तो....
👉विडंग चूर्ण 2 ग्राम भोजन के बाद, प्रातः सायं शहद के साथ
👉 रात्रि सोते समय 5 ग्राम त्रिफला चूर्ण गुनगुने पानी से
👉 अजवाइन जल 10 ग्राम अजवाइन 5 लीटर पानी में उबालकर ठंडा करके छानकर रखें। दिन में यही पीते रहना चाहिए। 3 दिन लगातार कर सकते हैं और 2 दिन बाद फिर से यही कर सकते हैं। 15 दिन से अधिक न करें।
पथ्य: लहसुन की चटनी, अजवाइन , दही खिचड़ी और दलिया जैसा हल्का सुपाच्य भोजन
अपथ्य: मांस, मछली, दूषित, बासी भोजन और मीठा
विशेष बातें:
1. अजवाइन के साथ थोड़ा गुड ले सकते हैं।
2. बच्चे और बुजुर्गों के लिए मात्रा बताई गई हैं, वयस्क 2 गुना तक ले सकते हैं।
3. बिना वैद्यकीय सलाह के प्रयोग न करें।
पूरा कोर्स 45 दिन होता है लेकिन 20 दिन में अच्छा लाभ हो जाता है।
... ॐ 🚩
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आज एक विशेष मानस रोग की बात करना आवश्यक हुआ है, यह विशेषतः वयस्क स्त्रियों में पाया जाता है @ayurved27 पर संक्षेप में जानते हैं।
रोगी लक्षण: अचानक क्रोध करना, अधिक बोलना , तेज आवाज में बोलना , भावनात्मक असंतुलन (तीव्र मूड स्विंग ) चिड़चिड़ापन, असुरक्षा की भावना रहना
ऐसे रोगी की पूर्ण चिकित्सा जटिल होती है और समय लगता है इसलिए धैर्य रखना चाहिए और अनुभवी वैद्य के पास जाना चाहिए लाभ अवश्य होता हैं। प्राथमिक चिकित्सा .....
प्रभाग: (असुर ग्रह) उन्माद चिकित्सा
कारण: वातदोष, आंशिक पित्तदोष के साथ https://t.me/ayurved27 मानस दोष विकृति बनती है।
उपचार क्रम:
👉 ब्राह्मी, शतावरी और कल्याणक घृत, साथ में शंखपुष्पी चूर्ण रोगी परीक्षण के बाद।
👉 अभ्यंग और शिरोधारा सप्ताह में 1 बार आवश्यक है।
👉 हल्का सुपाच्य भोजन ही प्रयोग करें
👉 योग प्राणायाम प्रतिदिन 1 घंटे
3 से 5 माह में अच्छा लाभ होता है... ॐ 🚩
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सोरायसिस (Psoriasis) जैसे जटिल त्वचा रोगों में भी 👆ऐसा लाभ पाने के लिए उपयुक्त औषधियां बनाएं और तैल स्वयं बनाकर बाह्य प्रयोग करना चाहिए ..
👉 https://t.me/ayurved27/164
👉 https://t.me/ayurved27/181
👉 https://youtu.be/MaovcZEdgFU?si=mXhPZpYvV9WlJ11j
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तृणाग्निं भ्रष्टार्थ पक्वशमी धान्य होलक: (शब्द कल्पद्रुम कोष) अर्धपक्वशमी धान्यैस्तृण भ्रष्टैश्च होलक: होलकोऽल्पानिलो मेद: कफ दोष श्रमापह। ... भाव प्रकाश
अर्थात्―तिनके की अग्नि में भुने हुए (अधपके) शमो-धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। यह होलक वात-पित्त-कफ तथा श्रम के दोषों का शमन करता है।
आर्युवेद लेख संग्रह (@ayurved27 ) और हमारे परिवार की ओर से वासन्ती नवसस्येष्ठि पर्व (होली ) की आप सभी भाईयों, बहनों,मित्रों को सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं .... ॐ
🌹🌺🌺🌼🌸💥🥀🌻☘🧘♂
https://www.instagram.com/reel/DVY6YV4kgF1/?igsh=NnhkdDJ5MnhwOWM1
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घुटनों के दर्द में बताए औषधियों और प्रयोग द्वारा बहुत अच्छा लाभ मिल रहा है
👉https://t.me/ayurved27/385
👉https://t.me/ayurved27/409
सधन्यवाद...🚩
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सभी सदस्यों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं! आइए हम एक मजबूत भारत के निर्माण में अपना सहयोग करें। 💐🙏
#India@ayurved27 🇮🇳 जय हिंद!
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.....क्रमशः....
श्लीपद रोग की अनुभूत चिकित्सा में हर्षुल श्लीपदारि लोह पर आगे:
शास्त्रानुसार कहें तो लंघन, उष्ण प्रलेप, स्वेदन, विरेचन, रक्तमो तथा कफहरण करने वाले गरम औषधियों आदि से श्लीपद रोग की चिकित्सा आरम्भ करने के पूर्व साध्य अवस्था का निर्णय करना आवश्यक है!
श्लीपद रोग की दो ही अवस्थाएं हैं :-
(१) कष्टसाध्यावस्था,
(२) असाध्यावस्था
तीन वर्ष के अन्दर का श्लीपद रोग कष्ट साध्य, तीन वर्ष से ऊपर का श्लीपद रोग प्रायः असाध्य। श्लीपद रोग से रोगी की मृत्यु प्रायः नहीं होती वर्षो से श्लीपद रोग को धारण किये हुए, 80, 90 वर्ष की आयु तक चलते-फिरते हुए, कई व्यक्ति आते हैं। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि कष्टसाध्य और असाध्य होते हुए भी प्राण घातक नहीं है।
हर्षुल श्लीपदारि लोह हेतु औषध एवं मात्राएं:
१.लोहभस्म हिगुलयोगेन जारित ६० पुटी २ तो.,
२.ताम्र-भस्म गंधक और पारद योग से मारित १ तो०,
३.कपर्दभस्म १ तो०,
४.शंखभस्म १ तो०,
५.सीपभस्म १ तो०,
६.प्रवालभस्म १ तो०,
७.कच्छपास्थिभस्म ४ तो०,
८.तबकिया-हरतालभस्म १ तो० एवं
९.एरण्डतैल में पक्व हरीतकी चूर्ण १२ तोला ।
निर्माण विधि-सभी दवाएं पत्थर के बड़े खरल में डालकर खूब मर्दन करे फिर बंगलापान के रस से घोटकर ४ रत्ती की गोलियां बना लें। मात्रा-१ गोली
सेवन विधि- १ गोली आतः सायं मुंह में रखकर ऊपर से मधुयुक्त त्रिफला का गरम काढ़ा पीना चाहिये ।
गुण-इस श्लीपदारि लौह के सेवन से पैर, अण्ड-कोष का श्लीपद, जो तीन वर्ष से अधिक पुराना नहीं हो ३ माह में अवश्य आराम हो जाता है। इस औषधि के सेवन करने के ७२ घंटे के बाद ही श्लीपद की शोब में उतार प्रतीत होने लगता है। उपर्युक्त दोनों औषधियों के सेवन के साथ श्लीपद गदांतक लेप अथवा श्लीपद गजां-कुश लेप का प्रयोग अवश्य करना चाहिये। यह किसी भी अंग में होने वाले श्लीपद में निःसंदेह लाभ करता है।
पथ्य-श्लीपद रोगी के लिये, औषधि सेवनकाल मे यव का दलिया, यव की रोटी, शाली चावल पुराना, सरसों पत्र का साक, सरसों का तेल, पुनर्नवा का शाक, असली मधु, अरहर दाल, गेहूं की रूखी रोटी सुपथ्य है।
अपथ्य- उड़द की दाल, इमनी, आम की खटाई, दही, बासी अन्न, मेद और कफ बढ़ाने वाले आहार कुपथ्य है।
इस श्रंखला मे श्लीपद रोग की अनुभूत चिकित्सा पर इतना ही ..... लेख संग्रह (@ayurved27 पर) आगामी विषय मे पुनः प्रस्तुत होंगे........🙏.
....... प्रसन्न रहें , आनंदित रहें ! 🚩ॐ
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हर्षुल श्लीपदारि लोह सैकड़ो वर्षों से वैद्यों का अनुभूत और अदभुत योग है। इस योग के द्वारा श्लीपद रोग को उपचारित करके वैद्यों द्वारा अपार प्रसिद्ध और स्वस्थ्य रोगियों के हृदय से आशीर्वाद प्राप्त किए हैं। आयुर्वेद लेख संग्रह (@ayurved27) के 6000 से अधिक सदस्य गणों के सम्मिलित सहयोग को और उत्कृष्ट बनाने हेतु आज इस प्राचीन आयुर्वेदिक योग को बताया जा रहा है। आशा है आप भी आयुर्वेद की इस ज्ञान गंगा का सर्वत्र प्रचार प्रसार करके अपना सहयोग प्रदान कर पुण्य के भागी बनते रहेंगे 🌿🙏🏻...
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2026 की पूर्व संध्या पर एक बार पुनः प्रेषित है...
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कोरोना महामारी के समय भारत वर्ष में फैली दुखद स्थिति में यह चैनल प्रारंभ करने का उद्देश्य आयुर्वेद चिकित्सा संबंधी जानकारी और विस्तृत, सटीक विश्लेषण के साथ लोगों में जीवन आशा और विश्वास को जाग्रत रखने का एक गिलहरी प्रयास मात्र था जिसे महामारी के बाद बंद करने का विचार था। किन्तु 200 लोगों से प्रारंभ हुए इस चैनल को आपने जो सम्मान, हार्दिक सहयोग और समर्थन प्रदान किया है इसके लिए आप सभी का सपरिवार, सहृदय आभार। आपके द्वारा अन्य लोगों को जोड़ते रहने और उत्साह वर्धन करके हमें बार बार प्रेरित किया जिसके फलस्वरूप आज लेख संग्रह @ayurved27 में सामान्य
कब्ज गैस एसिडिटी https://t.me/ayurved27/92
से लेकर
स्त्रीरोग https://t.me/ayurved27/303
पुरुष रोग https://t.me/ayurved27/97
विष चिकित्सा https://t.me/ayurved27/360
आदि अनेक विषयों पर लेख उपलब्ध हैं जिसमें
मधुमेह पर तो पुनः पुनः 3 चरणों में मधुमेही की विशेष दिनचर्या भोजन आदि विषय पर भी विस्तृत वर्णन प्रेषित हुआ है।
आशा है भविष्य में भी आप इसी प्रकार इस चैनल के माध्यम से लाभान्वित होंगे और इसका प्रचार प्रसार समाज हित में स्वेच्छा से करते रहेंगे।
शुभ रात्रि एवं पाश्चात्य नव वर्ष की मंगलकामनाओं के साथ
...ॐ
https://t.me/ayurved27?boost
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लेख संग्रह (@ayurved27)पर बच्चों से लेकर बुजुर्गो तक अनेक समस्याओं जैसे मधुमेह , कब्ज , कमर, घुटनो के दर्द , उच्च/ निम्न रक्तचाप आदि पर विस्तृत जानकारी कारण लक्षण और उपचार के संबंध मे उपलब्ध कराई गई हैं जिसमे वैद्य समूह के अनुभव और प्रयोग विधियों पर सूक्ष्मता से अन्वेषण और चर्चा भी रही है। आज की चर्चा मे महिलाओं और विशेष रूप से किशोरावस्था मे मासिकधर्म के संबंध मे करेंगे ....
मासिकधर्म का प्रारम्भ -- एक सामान्य प्रक्रिया!!
स्त्रियों में मासिकधर्म एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है। मासिकधर्म का प्रारम्भ सामान्यतः 10-16 वर्ष के उम्र में होता है। यह उन प्रक्रियाओं में से एक है, जो लड़की के शरीर को भविष्य में गर्भधारण करने के लिए तैयार करती है। सामान्य मासिकधर्म स्त्री के प्रजननतंत्र एवं उसके क्रिया का स्वस्थ्य होना दर्शाता है। साधारणतया इसमें 4-5 दिन तक रक्त का स्त्राव योनिमार्ग से होता हैं। यह 21-35 दिन (औसतन 28 दिन) के अंतराल पर होता है एवं एक बार में लगभग 50-80 मि0ली0 रक्त का स्त्राव होता है। पहली बार मासिकधर्म आने के पश्चात् कुछ माह/वर्षो तक न होना या अनियमित होना एक सामान्य बात है। यह चिन्ता का विषय तब तक नहीं होना चाहिए जब तक कोई अन्य शारीरिक रोग इसका कारण न हो। मासिकधर्म सामान्य होना, हाइपोथैलेमस-पिट्यूटरी-ओवेरियन एक्सिस का सुचारू रूप से कार्य करना दर्शाता है।
किशोरावस्था में महावारी अधिक, कम या अनियमित हो सकता है। इनमें से अधिकतर किशोरियो में स्वतः सामान्य मासिकधर्म स्थापित हो जाता है। किशोरियो में मासिकधर्म शुरू होने पर उनको यह समझना चाहिए कि यह एक प्राकृतिक कार्य है, इससे उन्हे किसी प्रकार का नुकसान नही होगा। मासिकधर्म के पूर्व किशोरावस्था में शारीरिक ऊँचाई तथा स्तनों में वृद्धि होती है। माताओं द्वारा किशोरियो को सामान्य मासिकधर्म के बारे मे जानकारी देनी चाहिए। कलेंडर पर मासिकधर्म की तारीख, रक्तस्त्राव का दिन, प्रतिदिन प्रयोग किए गए सैनेटरी पैड की संख्या के साथ-साथ अंतराल को नोट करना चाहिए। जिससे मासिकधर्म नियमित या अनियमित होने पर चिकित्सीय परामर्श ली जा सके। प्रायः ऐसा देखा गया है कि प्रतिमाह किशोरियो में मासिकधर्म शुरू होने के पूर्व वे निम्न परेशानियों को महसूस करती है- जैसे:नाभि के नीचे के हिस्से में भारीपन या दर्द, स्तनों में दर्द, कब्ज, उल्टी जैसा महसूस होना, तनाव, शरीर में सूजन।
किशोरावस्था मे अनियमित मासिकधर्म का प्रमुख कारण:
हाइपोथैलेमस-पिट्यूटरी-ओवेरियन एक्सिस का पूर्ण रूप से विकसित न होना, हाइपर एन्ड्रोजेनिक एनोब्यूलेशन (पी0सी0ओ0एस0), रक्त के जमने संबधी रोग, हाइपोथैलेमस की अनियमितता, थायराइड् ग्रंथि के रोग, प्राइमरी पिट्यूटरी रोग, यौन संक्रमित रोग, ओवेरियन और यूटेराइन ट्यूमर, गर्भावस्था, तनाव।
मासिकधर्म के समय सावधानियाँ :
जननांगो की साफ-सफाई तथा सैनेटरी पैड का प्रयोग करने से संक्रमण से बचा जा सकता है। सेनटे री पैड को दिन मे 2-3 बार बदलना चाहिए। अतः वस्त्र एवं कपड़े को साबुन और पानी से अच्छी प्रकार से धोकर धूप मे सूखाना चाहिए। आयरन, प्रोटीन व विटामिन युक्त भोजन लेने से शरीर में कमजोरी एवं थकान महसूस नही होती। उपरोक्त निर्देशो को ध्यान देते हुए यदि ऐसा लगे कि मासिकधर्म सामान्य न हो (वयानुसार शुरूआत, मात्रा, समय एवं अंतराल) तो शीघ्र ही स्त्रीरोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। जिससे चिकित्सीय एवं नैदानिकी परीक्षण के द्वारा मुख्य रोग का पता चल सके एवं उसके अनुसार चिकित्सा की जा सके।
............. अनवरत, प्रामाणिक और अनुभूत लेखों की इस श्रंखला मे महिलाओं और विशेष रूप से किशोरावस्था मे मासिकधर्म के विषय पर इतना ही ..... लेख संग्रह (@ayurved27 पर) आगामी विषय मे पुनः .........
....... प्रसन्न रहें , आनंदित रहें ! 🚩ॐ
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आज धन त्रयोदशी है दीपावली पर्व शुरू हैं , पूरे वर्ष का एक तिहाई व्यय इन उत्सवों में होने वाला है। नम्र निवेदन है कि शोरूम और कॉरपोरेट को छोड़कर, जहाँ तक सम्भव हो अपनी जड़ों को खोजिए।
एक परिवार पर आश्रित सात शिल्प हुआ करते थे, ढूंढिए कि आज वे किस स्थिति में है? और वर्षपर्यन्त तक, किसी को कोई रियायत नहीं। इन लफंगों को तो बाद में भी नहीं।
विचार कीजिए! हमारा स्वयं का इकोसिस्टम विकसित करने में योगदान दीजिये।
बस इतना करने का प्रयास कीजिए, शेष का मार्ग स्वयं स्पष्ट हो जाएगा -
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥
अर्थ: तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो.
प्रसन्न रहें... ॐ 🚩
