en
Feedback
सनातन धर्म ग्रंथकोष

सनातन धर्म ग्रंथकोष

Open in Telegram

समस्त वैदिक ग्रंथ संग्रह

Show more
1 325
Subscribers
-124 hours
+197 days
+4130 days
Posts Archive
2015.464310.Dynamic-Astrology.pdf

+2
Pavan_Prasang_Karpatriji.pdf

बाबा विश्वनाथ जी 🙏❤️🚩
+3
बाबा विश्वनाथ जी 🙏❤️🚩

+1
भगवान द्वारकाधीश 🙏🩷🚩

+1
अतः सत्यं यतो धर्मो मतो हीरार्जवं यतः। ततो भवति गोविन्दो यतः कृष्णस्ततो जयः।।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की आप सभी को अनन्त शुभकामनाएं 💐 श्रीमन्नारायणम🙏❤️🚩

श्री_कृष्ण_जन्माष्टमी_व्रत_कथा_.pdf

Janmashtami_Puja_Vidhi.pdf

जन्माष्टमी पूजाविधि.pdf

भाद्रपद कृष्ण पक्ष षष्ठी (हल षष्ठी) कृषि के देवता भगवान बलराम (बलदाऊ भईया)की जयंती पर आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं 🙏❤️🚩 श्रीमन्नारायणम🙏❤️🚩

ललही छठ पर्व की आप सभी को अनन्त शुभकामनाएं 💐 🙏❤️🚩जय षष्ठी माई

ललही छठ पर्व की आप सभी को अनन्त शुभकामनाएं 💐 🙏❤️🚩जय षष्ठी माई

सभी अवश्य पढ़ें एवम मनन चिंतन एवम गहन विचार करें। पूजन के पूर्णता के उपरांत गीत वाद्य वादन इत्यादि अच्छी बात है परन्तु वेद मंत्रो को गायन के रूप मे विवाह इत्यादि कर्मो मे डाल देना ये उचित एवम प्रामाणिक नहीं है 👆 इन्ही महत्वपूर्ण विषय पर विद्यावारिधि आचार्य श्री दीनदयाल मणि त्रिपाठी (बड़े भईया )जी का लेख प्रस्तुत है।

वैदिक अनुष्ठान और आधुनिक गान,संगीत का मिश्रण_ भयंकर देवापराध (1).pdf

मयमतम् _Mayamatm Shailja Pandey 2.pdf

मयमतम् Mayamatam Shailja pandey 1.pdf

ओर ले चलो।

वैदिको का रक्षासूत्र-बन्धन गुरु द्वारा वटुक को अपने आदेशों एवं निर्देशों की परिसीमा में बने रहने के सांकेतिक आदेश का प्रतीक हुआ करता था। बाद में लोभी जनों ने इसे द्वार-द्वार घूम कर कलायी में कलावा बाँध कर आने- दो आने दक्षिणा प्राप्ति में परिवर्तित कर दिया और बाद में तो इसे बहन-भाई का त्यौहार बना कर इस पर्व की मूल भावना ही नष्ट कर दी गयी जिसके पीछे एक मिथ्या इतिहास है जिसमें चित्तौड़ की महारानी कर्मवती द्वारा शेरशाह से हो रहे युद्ध में हुमायूं से सैनिक सहायता प्राप्ति हेतु राखी भेजने की कभी न हुई घटना है। मैं यह नहीं कहता कि ऐसा हुआ हो ही नहीं सकता, किन्तु इसकी सत्यता अथवा असत्यता का निर्धारण इतिहास के विद्वानों को करना है, मुझे नहीं। हो सकता है कि ऐसी घटना हुई हो, किन्तु वह घटना शाशन-सत्ता सम्बंधित राजनीति के ऊर्णनाभ जाल में उलझी एक नारी द्वारा राजनीति के चौसर पर फेंका हुआ एक पाशा भले हो, आर्ष परम्परा का उस घटना से कोई सम्बन्ध नहीं है और उस पाशे को परम्परा मान कर जो लोकाचार प्रचलित हुआ वह भोले मन की एक आश्वस्ति मात्र है। अब शास्त्राचार के साथ ही समाज में लोकाचार भी समान्तर रूप से प्रवहमान हुआ करता है जिसका आधार एवं भित्तियाँ किसी शास्त्र के अनुशासन की सीमा में प्रवेश ही नहीं करतीं। रक्षा-सूत्र किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी को भी बाँधा जा सकता है जिसके लिये किसी पर्व या मुहूर्त के विचार की कोई आवश्यकता ही नहीं। इस हेतु आवश्यकता है तो मात्र एक शुभ भावना की! और यह भावना न हो तो रक्षिका - सूत्र - बन्धन एक आडम्बर मात्र है, एक ऐसी परम्परा जिसका मूल स्रोत किसी को ज्ञात नहीं! किन्तु यदि श्रावणी को वैदिक परम्परा के परिप्रेक्ष्य में मनाना है तो पहले इस पर्व के मूलभूत उद्देश्य को समझना होगा क्योंकि श्रावणी पर्व वैदिक काल से ही शरीर, मन और इन्द्रियों की पवित्रता का पुण्य पर्व माना जाता है। इस पर्व पर की जाने वाली सभी क्रियाओं का मूल भाव यह है कि हम बीते समय में स्वयं से हुए ज्ञात-अज्ञात बुरे कर्म का प्रायश्चित करें और इस पर्व से भविष्य में अच्छे कार्य करने की प्रेरणा लें। स्वयंकृत भूलों को समझे एवं स्वीकार किए बिना उनका शोधन संभव नहीं। समीक्षा के बाद ही शोधन, निर्माण एवं विकास के पग आगे बढ़ाये जा सकते हैं तथा व्यक्तिगत मंथन द्वारा ही इस शोधन की प्रक्रिया का प्रारम्भ हो सकता है। श्रावणी का पर्व जिस मूल-वैदिक विधि से मनाया जाना चाहिये उसमें पुरातन वैदिक परम्पराओं का सम्मिलन आवश्यक है। इस पर्व पर होने वाले आयोजनों में प्रायश्चित्, संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय के साथ कुछ अन्य कर्म भी निष्पन्न किये जाते हैं। शिखा सिंचन उच्च विचारों एवं ज्ञान साधना को तेजस्वी बनने के लिए किया जाता है, यज्ञोपवीत परिवर्तन यज्ञीय कर्म अनुशासन को अधिक प्रखर-प्रामाणिक बनाने के लिए किया जाता है, ब्रह्मा का, वेद का और ऋषियों का आवाहन एवं पूजन उनकी साक्षी में सङ्कल्प करने तथा उनके सहयोग से आगे बढ़ते रहने के भाव से किया जाता है और रक्षाबंधन प्रगति के श्रेष्ठ संकल्पों को पूरा करने के भाव से नैतिक एवं नैष्ठिक बन्धन के रूप में किया-कराया जाता है। प्रकृति के अनुदानों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के साथ उसके ऋण से यथाशक्ति उऋण होने के भाव से वृक्षारोपण भी करने का नियम है। इस प्रकार श्रावणी पर्व ज्ञानार्जन हेतु संघर्ष एवं साधना का परिमार्जन करने के साथ उसको श्रेष्ठतर स्तरों पर ले जाने के संकल्प का पर्व है। लोक-भावना एवं लोकाचार की रूढ़ियाँ प्रेय हो सकती हैं और हैं भी, किन्तु यदि श्रेय के प्रति उन्मुख होना है तो पर्वों को अपने विगत इतिहास के आलोक में मनाने के हमारे सार्थक प्रयास ही हमें उच्च स्तरीय प्रगति का अधिकारी बना सकते हैं। हमारे पर्व हमारे महान इतिहास के पृष्ठ हैं। हमें उन पृष्ठों को ढंग से पढ़ना आना चाहिये! अन्यथा यदि रक्षा-बन्धन का पर्व लोकाचार के रूप में मनाना है तो न किसी शुभ तिथि की आवश्यकता है, न मुहूर्त की, किन्तु यदि इसे वैदिक परम्परा के रूप में मनाना है तो शुद्ध तिथि एवं शुद्ध मुहूर्त आवश्यक है। किन्तु, जब उपाकर्म की ही अवहेलना हो चुकी तो अब रक्षिका-सूत्र बन्धन मात्र एक रूढ़ि है, जिसे जैसे चाहें, और जब चाहें, मना लें! अन्त में आगामी श्रावणी की शुभकामना सहित स्तुता मया वरदा वेदमाता प्र चोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्। आयु: प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्। मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्।। ---- अथर्ववेद १९/७१/१ हे मनुष्यों ! द्विजों को पवित्र करने वाली वरदा वेदमाता मेरे द्वारा प्रस्तुत की गई अथवा स्तुत की गई है। तुम भी उसका प्रचार करो, तथा उससे अन्यों को प्रेरित करो। यह आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन, बल और ब्रह्मतेज-ब्रह्मबल रूप वरों को देने वाली है। हे वेदमाता! तुम यह सब-कुछ मुझे प्रदान कर ब्रह्मलोक की

सूक्ष्म तत्व उन्हीं के समक्ष खोलता है जिनकी सङ्गीत साधना उच्च स्तरीय हो चुकी हो। कोई भी खेल सभी खेल सकते हैं, किन्तु खेल प्रशिक्षक खेल के तकनीक की गुत्थियाँ उसी को समझाता है जिनके कौशल और सामर्थ्य की साधना उच्च स्तरीय हो चुकी हो। जिसकी साधना विकसित नहीं हुई है, उसे आगे की बात बताने से बताने वाले का प्रयास निरर्थक तो जाता ही है, कई बार उसका विपरीत परिणाम भी भोगना पड़ जाता है। श्रावणी पर्व द्विजत्व की साधना को जीवन्त एवं प्रखर बनाने का पर्व है। जो इस पर्व के प्राण-प्रवाह के साथ जुड़ते हैं, उनका द्विजत्व एवं ब्राह्मणत्व क्रमशः जाग्रत् होता जाता है तथा वे आदिशक्ति गुरुसत्ता के विशिष्ट अनुदानों के स्वाभाविक एवं सहज प्रामाणिक ग्रहीता-पात्र बन जाते हैं । द्विजत्व की साधना को इस पर्व के साथ एक विशेष कारण से जोड़ा गया है। श्रावणी पर्व वह पर्व है जिस दिन ब्रह्म का ‘एकोऽहं बहुस्यामि’ का संकल्प फलित हुआ करता है। श्रावणी उपाकर्म के चार पक्ष है – प्रायश्चित्, संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय। ️सर्वप्रथम होता है प्रायश्चित् रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प। गुरु के सान्निध्य में ब्रह्मचारी गोदुग्ध, दधि, घृत, गोमय, गोमूत्र तथा पवित्र कुशोदक से स्नान कर, वर्ष भर में जाने-अनजाने में हुए पापकर्मों का प्रायश्चित् कर के अपने जीवन को सकारात्मकता से भरते थे। पञ्च-गव्य वेदों की पञ्च-पर्वा विद्या का एक वह रहस्यमय विधान है जिसके सम्बन्ध में मैं नहीं, कभी एक गृध्र बोलेगा, जब उसका मन करेगा। पञ्च-गव्य एवं कुशोदक स्नान के पश्चात शुद्धोदक – स्नान कर, पश्चात् ऋषिपूजन, सूर्योपासन एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करने का विधान था। यज्ञोपवीत संस्कार आत्म-संयम का संस्कार है और उपाकर्म का प्रमुख कार्यक्रम वटुक का यज्ञोपवीत संस्कार ही होता था। इसके पश्चात् वटुक अध्ययन एवं अध्ययन के उपरान्त आत्मोन्नति के साथ-साथ समाज की उन्नति हेतु आजीवन प्रयासरत रहने का सङ्कल्प लेता था। संकल्प के उपरान्त यह उपाकर्म वेदों के साङ्गोपाङ्ग अध्ययन की ओर उन्मुख हो जाता था जिसमें वेदों के साथ षडंग का अध्ययन समाहित हुआ करता था तथा इसका प्रारम्भ भी वैदिक ऋषियों ने एक अनुष्ठान के साथ जोड़ा है जिसमें सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, स्मृति, सदसस्पति, अनुमति, छंद और ऋषि को घृत की आहुति दी जाती थी। जौ के आटे में दधि मिलाकर इससे भी ऋग्वेद के मंत्रों से आहुतियाँ दी जाती थीं तथा इस यज्ञ के पश्चात् वेद-वेदांग का अध्ययन-सत्र प्रारम्भ होता था जिसका समापन उत्सर्ग नामक अनुष्ठान से हुआ करता था। इस प्रकार वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा श्रावणी पूर्णिमा से प्रारम्भ हो कर साढ़े पाँच से साढ़े छह मास तक, पौष मास तक चलती थी। वर्तमान में कुछ वैदिक परम्परा का निर्वाह करते गुरुकुलों में श्रावणी पूर्णिमा के दिन ही नवीन वटुकों का उपाकर्म और पुराने वटुकों के उत्सर्ग दोनों कर दिये जाते हैं जो उचित तो नहीं है किन्तु आधुनिक भारत में जब वेद ही उपेक्षित हैं तब उनके अध्ययन से सम्बंधित अनुष्ठान अपना पूर्व-रूप कैसे अक्षुण्ण रख सकेंगे? अतः जो यह अशुद्ध परम्परा चल निकली है वह आधुनिक परिवेश में वैदिको की विवशता है, तथा इस विवशता के उपहास का कोई औचित्य नहीं क्योंकि जो थोड़ा कुछ निर्वाह हो पा रहा है उसे निंदा की सीमा-परिधि से बाहर रखे जाना ही श्रेयस्कर है। उस वैदिक काल में प्रतीक रूप में किया जाने वाला यह विधान हमें स्वाध्याय और सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता था क्योकि उपाकर्म जीवन-शोधन की एक अति महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसे पूरी गम्भीरता के साथ निष्पादित किया जाना चाहिये। वेदाध्ययन के उपरान्त उत्सर्ग के अवसर पर पुराना यज्ञोपवीत उतारकर नया धारण करने एवं नवीन यज्ञोपवीत के पूजन का विधान है और तत्पश्चात् ही एक ब्राह्मण का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति आत्मसंयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है और द्विज कहलाने का अधिकारी है। उपाकर्म का अगला पक्ष स्वाध्याय का है। कोई भी गुरु किसी शिष्य को बहुत कुछ बता सकता है, किन्तु सब कुछ नहीं बता सकता। और किसी के भी द्वारा सब कुछ जाना भी नहीं जा सकता। किन्तु बहुत कुछ से आगे तथा सबकुछ के बीच में बैठा जो 'और भी कुछ' है, उसको जानने हेतु जो मार्ग जाता है वह मार्ग स्वाध्याय का मार्ग है अतः श्रावणी पर्व पर स्वाध्याय का सङ्कल्प भी लिया जाता है क्योंकि रहस्यों के कुछ घेरे जो अध्ययन से नहीं टूट पाते, वे स्वाध्याय से टूट सकते हैं।

शुक्लया: पूर्णिमायां ग्रहणं संक्रांति वा भवेत्तदा। यजुर्वेदिभि: श्रावण शुक्ल पंचम्यामुपाकर्म कर्तव्यं॥’ अर्थात् श्रावण पूर्णिमा में यदि ग्रहण या सङ्क्रांति हो तो श्रावणी उपाकर्म श्रावण शुक्ल पञ्चमी को करना चाहिये। एक अन्य श्लोक के अनुसार भद्रा में दो कार्य नहीं करना चाहिये - एक तो श्रावणी उपाकर्म, रक्षाबन्धन, वेदाध्ययन या वेद-श्रवण, और देवपूजन आदि और दूसरा कार्य है फाल्गुनी होलिका दहन। शास्त्र वचन है कि भद्रा में श्रावणी करने से राजा की मृत्यु होती है तथा फाल्गुनी करने से नगर ग्राम में भीषण अग्निकाण्ड तथा अन्य उपद्रव होते हैं। श्रावणी अर्थात उपाकर्म एवं रक्षासूत्र-बंधन, वेदाध्ययन एवं श्रवण तथा पूजन-कर्म भद्रा के उपरांत ही करणीय है तथा ग्रहण युक्त पूर्णिमा भी श्रावणी उपाकर्म में निषिद्ध है। यह वेदाध्ययन-सत्र माघ शुक्ल प्रतिपदा तक अथवा कभी-कभी पौष पूर्णिमा तक भी चलता था। इस अध्ययन सत्र का समापन उत्सर्ग कहलाता था। उत्सर्ग क्यों कहलाता था? उत्सर्ग का अर्थ तो त्यागना होता है! कुछ अशुद्धि है क्या? कुछ असमीचीन है क्या? नहीं! शब्दों ने काल के साथ अपने अर्थ अनेक बार परिवर्तित किये हैं। उत्सर्ग शब्द का अर्थ मात्र त्यागना नहीं होता! उत्सर्ग का अर्थ है समाज-हित हेतु त्यागना! अन्यों के लाभ एवं कल्याण हेतु निजता से आवेष्ठित एवं आविष्ट कुछ त्याग देना उत्सर्जन है, अन्यथा हम त्यागते तो प्रति-दिन अपना मल-मूत्र भी हैं! किन्तु इस कार्य हेतु उत्सर्जन शब्द का प्रयोग नितान्त असोढव्य है। जीवों में मल का उत्सर्जन भी एक जीव- लाक्षणिक क्रिया है किन्तु इस क्रिया हेतु इस शब्द का उपयोग प्रचलित करने वाले मूढ़ नहीं थे। वे तो वाग्-ब्रह्माणी की शक्ति से हीन, अनभिज्ञ, अतः जीवित होते हुए भी मृतक थे। जो लोग मानव मल-मूत्र का त्याग उत्सर्जन मानते हैं वे उसी मानव मल-मूत्र के समान घृणित एवं गर्हित हैं। किन्तु किया क्या जा सकता है? हिन्दी एवं संस्कृत का शब्दानुशासन एवं व्याकरण पढ़ना एवं तदनुसार वाक् का प्रयोग करने की परम्परा तो लुण्ठित हो चुकी है। कुछ साक्षरों एवं अर्द्ध-पठितों मात्र की दूषित रचनायें ही अब प्रमाण हैं और यह भारत की भारती का एक ऐसा दुर्भाग्य है जिससे कोई मुक्ति नहीं! उत्सर्ग! व्याकरण इस शब्द हेतु कहता है - पुं० [ सं० उद्√सृज् (त्याग)+घञ्! ] ️और इस परिभाषा के अनुरूप उत्सर्ग शब्द हेतु कुछ पारिभाषिक अर्थ इस प्रकार हैं। १. खुला छोड़ने अथवा किसी बन्धन से मुक्त करने की क्रिया या भाव। २. किसी उद्देश्य या कारण से कोई वस्तु अपने अधिकार या नियन्त्रण से अलग करना या निकालना या अर्पित करना। ३. किसी और के लिए किया जानेवाला त्याग। ४. दान। ५. अपवाद से भिन्न कोई साधारण या सामान्य नियम। ६. एक वैदिक कर्म और, ७. अन्त, समाप्ति। अब इन परिभाषाओं के आलोक में वेदाध्ययन के पश्चात् वेदों में निष्णात शिष्य को समाज को सौंपने का उत्सव उत्सर्ग शब्द से अभिहित करने का हमारे वैदिक ऋषियों का मन्तव्य कुछ-कुछ समझा जा सकता है। आज भी कुछ विद्यालयों के मुख्य-द्वार पर मैंने ‘शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये।‘ का सूत्रवाक्य अङ्कित देखा है। यद्यपि कि यह मात्र एक औपचारिकता है, किन्तु इस औपचारिकता में जो आर्ष भावना निहित है वह भावना अब भी कुछ लोगों के मन-मस्तिष्क में अथवा अवचेतन में ही विद्यमान है, यह जानना पर्याप्त तोष उत्पन्न करता है। गुरुकुलों द्वारा अपने गुरुकुलों में शिक्षित होते ब्राह्मण कुमार वटुकों को पुनः समाज हेतु उत्सर्ग करने का पर्व ही उत्सर्ग-पर्व हुआ करता था और इसका आयोजन पौष मास में जब चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र का भोग किया करता है उस क्षण में होता था। जनसमूह के आवास-क्षेत्र की सीमा से बाहर, किसी बड़े जल स्रोत, पोखर अथवा नदी के समीप, वटुक के गोत्राधारित गृह्य-सूत्र में निर्धारित विधि के अनुसार गुरु द्वारा अपने शिष्य का समाज के कल्याण हेतु उत्सर्ग किया जाता था और उसके बाद उस पूरे दिन, आने वाली रात्रि, तथा अगले पूरे दिन वेदों के अध्ययन से अवकाश रहता था। इस उत्सर्ग को शिष्य का गुरु के गर्भ से प्रसव माना जाता था। कहाँ हैं वे गुरु जो शिष्यों को निज-गर्भ में धारण करें, उनका पोषण करें तथा पुष्ट शिष्य-प्रसव करें? हमारी भारतीय संस्कृति में द्विजत्व तथा ब्राह्मणत्व का सम्बन्ध किसी जाति या वर्ग विशेष में जन्म लेने से नहीं है, बल्कि ये शब्द अध्ययन एवं अध्यवसाय की साधना की उच्च-स्तरीय कक्षा से जुड़े सम्बोधन हैं। इसीलिए कहा गया कि संस्कारात् द्विज उच्यते। संस्कारों के अर्जन द्वारा ही द्विजत्व की प्राप्ति सम्भव है, अन्यथा नहीं। संगीत के द्वार सभी के लिए खुले हैं, किन्तु एक सङ्गीताचार्य इस कला के

जिस प्रकार किसी पक्षी का कोई अण्डा माता की छाती के आन्तरिक ऊष्मा से पकता है, उसी प्रकार मनुष्यता भी गुरु-अनुशासन में वेदमाता की ऊष्मा से, विशुद्ध ज्ञान की ऊर्जा से क्रमशः शनैः – शनैः परिपक्व होती है। मनुष्यता अर्जित करने की इस साधना से परिपक्व हो कर साधक अपने सङ्कल्प से समाज में व्याप्त सङ्कीर्णता के घेरे को उसी प्रकार तोड़ डालता है जिस प्रकार एक खग-शिशु अपने अण्डे के खोल को तोड़ कर बाहर आ जाता है और जिस प्रकार अण्डे के खोल से बाहर आ कर एक खग शिशु को अपने स्वरूप का बोध होता है, उसी प्रकार सङ्कीर्णता का कवच तोड़ देने के उपरान्त एक ब्राह्मण को अपने पूर्वजों से आहरित कर्तव्यों एवं दायित्वों का बोध होता है। तब वह ब्राह्मण रूप में उत्पन्न जीव भी एक खग-शिशु सदृश अपने पूर्वजों की ही भाँति अनन्त आकाश में उड़ने की चेष्टा करता है। ‘पावमानी द्विजानाम्’ का यही मर्म है। इस चेष्टा के समय भी उस अपुष्ट पङ्खों वाले शिशु-खग को उसकी माता छोड़ नहीं देती, बल्कि सिखा-सिखा कर ऊँची उड़ान भरने के उसके प्रयासों को शुद्ध तथा सही बनाती है। पक्षियों में जो कार्य उस खग-शिशु की माता करती है, मनुष्य में वही कार्य उसका गुरु करता है। अतः यजुर्वेद के मन्त्र ‘आधत्त पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम्। यथेह पुरुषोऽसत्।।’ का अर्थ एक कुमार ब्राह्मण के पिता के निवेदन को स्पष्ट नहीं कर पा रहा किन्तु उस निवेदन की भावना यह है कि ‘हे आचार्य! अपने गुरुकुल में इस ब्राह्मण कुमार को इस प्रकार रखो जैसे किसी गर्भ को एक माता अपने उदर में रखती है, तथा इसे पौरुष शक्ति से सम्पन्न कर समाज हेतु योग्य बनाओ।’ जो पक्षी एक अण्डे की सङ्कीर्णता के कोष में आबद्ध था, उसे विकसित करने हेतु उसकी माँ अपनी ऊर्जा तो देती ही रही, किन्तु उसके द्विज होने से पूर्व, दुबारा जन्म लेने के पूर्व, वह माता अपने अजन्मे शिशु के विभिन्न कौशल-विकास हेतु अपने अनुभव एवं योग्यता का प्रयोग नहीं कर सकती थी। गुरु भी एक ब्राह्मण कुमार को अपने गुरुकुल में प्रवेश दे कर, उसे अपने गर्भ में धारण कर वेदाध्ययन द्वारा पहले तो सङ्कीर्णता के कवच तो तोड़ने में सहायक बनता है एवं तदुपरान्त उसे अपना अनुभवजन्य ज्ञान प्रदान कर समाज में उत्कृष्टता का शिखर स्पर्श करने के योग्य बनाता है। किसी ब्राह्मण कुमार वटुक का गुरुकुल-प्रवेश ही उसका अपने आचार्य-गर्भ में प्रवेश है। वैदिक काल में श्रावण मास वेदों के अध्ययन हेतु विद्यार्थियों का गुरु के पास एकत्र होने का समय हुआ करता था तथा वेदाध्ययन आरम्भ करने का आयोजन, इस कार्य हेतु उत्सुक शिष्यों को गुरुकुल में प्रवेश की अनुज्ञा देने का आयोजन ही उपाकर्म कहा जाता था। और यह अवसर अत्यन्त महत्व का है जिसे पर्व एवं उत्सव के रूप में आयोजित किया जाता था और उसी आयोजन का नाम था उपाकर्म! ▪︎ आज ऐसा कौन गुरु करता है? ▪︎ आज उपाकर्म कहाँ हुआ करता है? ▪︎ और यदि नहीं हुआ करता तो रूढ़ियों के कवच से आबद्ध रह कर इस उपाकर्म शब्द के उल्लेख का क्या प्रयोजन? क्या लाभ? इस आयोजन के सम्बन्ध में धर्मगन्थों में लिखा गया है कि – जब वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं, श्रावण मास में श्रवण नक्षत्र के साथ चन्द्र के मिलन (पूर्णिमा) के समय अथवा हस्त नक्षत्र में श्रावण पञ्चमी को उपाकर्म होता है। श्रावण शुक्ल पञ्चमी जिसे आज कल नाग-पञ्चमी के पर्व के रूप में जाना जाता है, उपाकर्म प्रारम्भ करने की दूसरी तिथि हुआ करती थी यद्यपि श्रावण शुक्ल पञ्चमी श्रावणी पूर्णिमा से पूर्व आती है। उपाकर्म हेतु इस दूसरी उपाकर्म तिथि का ग्रहण मात्र तभी हुआ करता था जब श्रावणी पूर्णिमा को उपाकर्म प्रारम्भ हेतु शुभ मुहूर्त उपलब्ध होने की सम्भावना न हो। वेदाध्ययन एक महत्वपूर्ण तथा आवश्यक कार्य है तथा वैदिक काल में तो यह ब्राह्मणों हेतु एक अनिवार्य तथा अतिमहत्वपूर्ण कर्म था अतः यह व्यवस्था दी गयी कि यदि श्रावण पूर्णिमा में ग्रहण की परिस्थिति उत्पन्न होती हो या उसी दिन सङ्क्रांति हो, या भद्रा हो तो श्रावणी उपाकर्म श्रावण शुक्ल पञ्चमी को ही कर लेना चाहिये - ‘भद्रायां ग्रहणं वापि पूर्णिमास्या यदा भवेत। उपाकृतिस्तु पञ्चम्याम कार्या वाजसेनयिभि:।’ – यदि पूर्णिमा को भद्रा हो, सङ्क्रांति हो अथवा ग्रहण लग रहा हो तो वाजसेनी आदि सभी शाखा के ब्राह्मणों को उपाकर्म श्रावण शुक्ल पञ्चमी को ही कर लेनी चाहिये। इस प्रकार सिद्ध है कि शास्त्रसम्मत श्रावण उपाकर्म भद्रा दोष, ग्रहण युक्त पूर्णिमा अथवा सङ्क्राति युक्त पूर्णिमा में नहीं किया जाता अतः श्रावणी पूर्णिमा से पूर्व ही श्रावण शुक्ल पंचमी (नागपंचमी) में श्रावणी स्नान कर के उपाकर्म करने के शास्त्रोक्त निर्देश हैं। हेमाद्रिकल्प, स्कंद पुराण, स्मृति महार्णव, निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु आदि ज्योतिष व धर्म के निर्णय-ग्रंथों में इसके प्रमाण हैं। यथा - ‘श्रावण