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(पुष्ट.२ )
भूचर मोरी का महायुद्ध
आगे:-
जिसकी खबर जूनागढ़ के नवाब दोलतखान तथा काठी लोमां खुमाण को होते ही उन दोनो ने सोचा कि, यह लड़ाई में जामश्री सताजी को फतेह मिलेगी तो भविष्य में उनके ही स्टेट पर खतरा आ सके ऐसा है। ऐसा सोच के दोनो ने मीरझा अझीझ कोका को खानगी शंदेशा दिया और सूबा को दिल्ली जाते हुए रोका, इन दोनो का साथ मिलते सूबा ने भी समाधान की बात को बीच में ही छोड युद्ध केलिए ललकार किया..!
युद्ध का ललकार होते ही जामश्री सताजी खुद सूबा के सामने लड़ने युद्ध के मैदान में उतरे, भयंकर युद्ध हुआ बादशाह की लश्कर हारकी कगार पर आगई। तब उसी समय जूनागढ़ के नवाब दोलतखान और काठी लोमा खुमाण ने जामश्री सताजी को धोका देके सूबा मीरझा अझिझ कोका के बादशाही लश्कर के साथ मिल गए। तीन प्रहर तक खूंखार लड़ाई चलती रही। जेशा वजीर ने जामश्री सताजी को कहा की धोका हुआ है। जब तक हो तब तक हम लड़ाई जारी रखेंगे, परिवार और तख्खकें बंदोबस्त केलिए आपका जामनगर जाना ही उचित रहेगा..!
जामश्री सताजी को सलाह ठीक लगते ही जामनगर आय। जब दुसरी तरफ जेशो वजीर तथा कु.श्री जशाजी ने बादशाही लश्कर सामने लड़ाई जारी रखी। पाटवी कुंवर अजाजी के लग्न होने से वो जामनगर में ही थे, पर युद्ध में उनकी जरूर हे उनकी यह खबर मिलते ही पांचसो जितने बारातीओ तथा नाग वजीर को लेके भूचर मोरी के मैदान में पंहुचे भूचर मोरी मैदान में भीषण युद्ध जमा..!
बादशाही लश्कर में बाइ तरफ सैयद कासिम और नवरझोखान, गुजरखान थे। दाई तरफ सरदार महम्मद रफी और बादशाह के अमीरों, जमीनदार थे। मध्य भाग में नवाब अझीझ हुमायू का पुत्र मीरझा मरहम था और उसके आगे मीरझा अनवर तथा नवाब खुद थे..!
जब सामने के तरफ जामश्री सताजी के लश्कर में अग्रभाग में जेशा वजीर और कुंवर अजाजी का अधिपत्य था। बाई तरफ कुंवर जशाजी तथा महेरामण जींडु गराणी थे। डाई तरफ नागडो वजीर, डाह्यो लोडक तथा भालजीदल वगेरे योद्धा थे....
भूचर मोरी के मैदान में दोनों तरफ से सामने सामने तोपगोले छुट रहे थें। नवाब अनवर तथा गुजरखान ने जेशा वजीर कुंवर अजाजी तथा अतीत बावा की जमात के उपर हमला किया। सोचने जैसा है कि अतीत बावा की जमात (घुमती हुई टोली) यात्रा को जा रही तब जामश्री सताजी के लश्कर के साथ जुड़ गई थी..!
भूचर मोरीके मैदानमें ऐतिहासिक धमासन मचा था। एक लाख से ज्यादा युवान लड़ रहे थे। कुंवरश्री अजाजी ने अपने अश्व को खड़ा कराके सूबा मीरझा अझीझ कोका के हाथी के दंतशूल के उपर अश्व के पैर रखा के सूबा के उपर बरछी के हमले करने लगे। परंतु सूबा अंबाड़ी मैसे कोठी में छुप जाने की वजह से बरछी हाथी के पीठ का भाग चिर के जमीन में धस गई।
एसे में ही पीछेसे एक मुगल सिपाई ने तलवार का घातक हमला कुंवरश्री अजाजी पे किया जिसे वो वीरगति को प्राप्त हुए, इसे जाड़ेजा भाया तो बादशाही लश्कर के उपर टूट पड़े बेशुमार कत्लेआम हुए जिसमे जेशा वजीर, महेरामणजी, डुंगराणी, भाणजीदल, डांह्यो लाडक, नागवजीर, तोगाजी सोढा वगेरे वीरगति को प्राप्त हुए सामने भी बादशाही लश्कर में महम्मद रफी, सैयद सैफुदीन, सैयद कबीर, सैयद अलीखान ने अपने प्राण गवाए। कुछ ही सैनिक बचे..!
बादशाही लश्कर नगर तरफ़ आ रहा हे। एसे समाचार मिलते ही जामश्री सताजी ने रानियों को नौका में बिठा के सूचना दी की, बादशाही सैनिक आए तो नौका समुद्र में डूबा देना। नौका बदर से रवाना होता उसे पहले सचाणा के इसरदाजी के पुत्र गोपाले आके कुमार श्री अजाजीकी पगड़ी रानिको दी। पगड़ी देखते ही रानी को सत चढ़ा और अपने रथ में वापिस बैठ के रणक्षेत्र भूचर मोरी की तरफ चलने की आज्ञा की..!
कितने सैनिक भी साथ गए, बादशाही सैन्य ने रानी का रथ देखते ही उसके ऊपर आक्रमण किया परंतु ध्रोल के ठाकोर साहेब ने बीच में आके समजूती की रानी का रथ भूचर मोरी के मैदान तक सलामत तरीके से आए उसके लिए मदद की रानी की रगोमे सतीत्व दौड़ ने लगा आखिर में रानी सती हुए..!
बादमे सूबा मीरझा अझीझ कोका जामनगर आके, जामनगर के उपर बादशाही शासन के साथ अपने कब्जे कर लिया। दुसरी तरफ़ जामश्री सताजी शरणार्थी मुझफर शाह का जीव बचाने जूनागढ़ गिर के प्रदेश में गए। परंतु बादशाही लश्कर वहा भी घेरा डालते जामश्री सताजी ने मुझफर शाह को बराड़ा पहाड़ में रखने का प्रयास किया। जूनागढ़ में बादशाही लश्कर का दाना पानी खत्म होते ही घेरा हताके जूनागढ़ में नायब सूबा को रख लश्कर अहमदाबाद रवाना किया..!
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(पुष्ट.१)
भूचर मोरी का महायुद्ध
गुजरात का पानीपत्त कहलाता ध्रोल के पास के मैदान में शरण में आए शरणार्थी की रक्षा केलिए जाडेजा राजवंश का भुचर मोरी का युद्ध।
भूचर मोरी महासंग्राम: ध्रोल के पास
एक मुस्लिमकी रक्षा केलिए ३५००० मस्तक दिए थे ध्रोल के पास के भूचर मोरी के मैदानमें, खेला था भीषण जंग...!
विक्रम संवत १६४८ श्रावण वद सातम।
(ई.स. १५९१ जुलाई )
आशरा (शरणागत )धर्म के पालन केलिए क्षत्रिय तथा सभी समाज ने मुस्लिम बादशाह के साथ युद्ध किया...!
अजाजी लग्न मंडप से सीधा युद्ध के मैदान में गए, शहीद हुए नववधू सुरजबा भी सती हुए..!
ध्रोल के पास ऐतिहासिक मैदान भूचर मोरी पर महासंग्राम खेला था। काठियावाड़ की खमिरवंती धरती के उपर खेला बड़े युद्धों की सूची में एक भूचर मोरी का युद्ध था। विक्रम संवत १६४८ (ई.स. १५९१) में ये महायुद्ध हुआ था।
आज की नई पेढ़ी को कम ही पता होगा की यह महायुद्ध बिन सांप्रदायिकता का बहुत बड़ा उदाहरण हैं।शरण में आए हुए गुजरात के आखिरी बादशाह मुजफर शाह (तीसरा) को बचाने केलिए जामनगर के जाम श्री सताजी ने दिल्ली के बादशाह अकबर के सामने यह महासंग्राम किया था। जूनागढ़ के नवाब दोलतखान तथा कंडला के काठी लोमां खुमाण ने जामश्री सताजी के साथ गद्दारी करके यह महायुद्ध भयानक बना था और भूचर मोरी के मैदान में खून की नदिया बही थी।
इतिहास के पन्ने पलते तों भूचर मोरी का यह महासंग्राम शरीर में कंपन ला दे ऐसी दास्तान मिले। जामनगर की प्रजा ने श्रावण की सातम मनाना क्यू बंध किया और सालों बाद किसलिए वापिस मनाना शुरू किया उसकी हाकीकर मिले..!
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विक्रम संवत १६२९ (ई.स.१५७२) की बात है। दिल्ली के बादशाह अकबर ने गुजरात के आखरी बादशाह मुजफर शाह(तीसरा) के पास से गुजरात जीत लिया इसे, मुझफर शाह भाग के राजपीपळा के जंगलो में छुप गया और वहा कुछ समय रहने के बाद काठियावाड़ आया।
जामनगर के श्रीजाम सताजी, जूनागढ़ के नवाब दोलतखान घोरी, जागीरदार राजा खेंगार तथा कंडला के काठी लोमा खुमाण की मदद से ३० हजार घोड़ेश्वार और २० हजार पायदल सैन्य लेके मुझफर शाह ने अहमदाबाद, सुरत और भरूच ऐसे तीनो शहर अपने कब्जे कर लिए..!
उस समय अहमदाबाद के सूबा के तौर पे अब्दुल रहिमखान (खानखानाना) था। परंतु वो मुझफर को रोकने में असफल रहा। उस वजह से, बादशाह अकबर ने अपने दूध भाई मीरझा अझीझ कोका को गुजरात के सूबा के तौर पे रख अहमदाबाद भेजा। उसने गुजरात आके मुझफर शाह को कैद किया। पर विक्रम संवत १६२९ में मुझफरशाह जेल तोड़ के काठियावाड़ भाग आया..!
काठियावाड़ में किसी ने उसको आश्रय नही दिया और आखिर में वो जामश्री सताजी के शरण में गया। शरणागत की रक्षा करना क्षत्रिय धर्म हे, ऐसा मान के जामश्री सताजी ने मुझफर शाह को शरण में रख के बरडा पहाड़ में रहेनी की व्यवस्था करदी..!
इस बारे में जानकारी अहमदाबाद के सूबा मीरझा अझीझ कोका को होते ही उसने मुजफर को पकड़ने केलिए बड़े लश्कर के साथ आगे बढ़ा और विरमगाम के नजदीक अपना पड़ाव डाला। वहां से नवरोझखान तथा सैयद काशिम को थोड़ा लश्कर देके मोरबी की तरफ़ मुझफर शाह को खोज केलिए भेजा। पर मुझफर जामनगर में हे ऐसी खबर मिलते ही जामश्री सताजी को पत्र लिखा की 'आप सुलतान को अपने राज्य मैसे निकाल दो...!'
परंतु शरणार्थी को निकाल देना येह क्षत्रिय धर्म नही हे ऐसे सोच के साथ जामश्री सताजी ने मीरझा अझीझ कोका के पत्र का अनादर किया। पत्र का अनादर होता देख बादशाही लश्कर जामनगर की तरफ़ बढ़ी। जामश्री सताजीको पता चलते ही उसका सामना करने केलिए अपना लश्कर भेजा। बादशाही लश्कर के अन्न सामग्री रोक दी गई। बादशाही लश्कर के सेना पे हमला कर कितनो सैनिकों का वध कर दिया। हाथी, घोड़ा, ऊंट छीन लिए गए..!
वीरमगाम के पास अपनी फोज डालके बैठे मीरझा अझिझ कोका को इस की ख़बर होते ही अपने खास लश्कर के साथ नवरोझखान तथा सैयद कासिम की लश्कर साथ जुड़ गया। बादशाही लश्कर पूरी ताकत के साथ जामनगर की तरफ आगे बढ़ा। सूबा मीरझा अझीझ कोका जब ध्रोल की सरहद पे आ पहचा तब जामश्री सताजी ने अपना लश्कर को अटका दिया। जामश्री सताजी के लश्कर के साथ जूनागढ़ के नवाब दोलतखान तथा कंडला के काठी खुमाण भी अपने सैन्य के साथ जुड़े हुए थे..!
ध्रोल के सरहद के पास भूचर मोरी के मैदान में दोनों लश्कर टकराए। कुछ समय लड़ाई चलती, अटक जाती। वापिस लड़ाई होती पर हर लड़ाई में जामश्री सताजी की जीत होने के वजह से बादशाहि सूबा मीरझा अझीझ कोका आखिर में तंग आके समाधान केलिए पहल शुरू की...!
Kal bhairava jayanti
ॐ तीखदन्त महाकाय कल्पान्तदोहनम्, भैरवाय नमस्तुभ्यं अनुज्ञां दातुर्माहिसि
It's high time for all young rajput leaders to come out from the propaganda of national parties either is hindutva or minority politics. You don't need them to survive or get a place for yourself. You're a born leader you just need to connect with the people.
This is a clear message to those people and the parties who have been malign the image of Rajputs and spreading fake caste and religious conflicts against Rajputs for so many years so that by keeping Rajputs away from politics, their political future can be destroyed.They have portrayed Rajputs as mere oppressors, during so many years of rule they kept on eating the Malai of politics by serving only lies, but now the time has changed as every caste community has accepted Ravindra as their leader.
The lies spread by political parties have been exposed; the future will be ours
And ofc No one I repeat No one can rule better than kshatriyas.
When strong man lost, week cowards try to pull you down by spreading false propaganda
These are the guys who run Indian and hindu hate channels like pajeet gulag yojna
