☸️🌼पवित्र बुद्ध वाणी🌼☸️
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☸️🌼'' इस चैनल के माद्यम से आपको भगवान बुद्ध जी की पवित्र बुद्ध वाणी पढ़ने का मौका मिलेंगी !''🌼☸️ 🌹'' धम्म ही मनुष्यों में श्रेष्ठ है , इसलोक में भी और परलोक में भी ! ''🌹दीघ निकाय ३.४🌹 🌹हमारा मुख्य ग्रुप👇 https://t.me/Indianbuddhist🙏
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🌺उप्पज्जन्ति सुत्त🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना।
एक समय, भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन श्राराम में विहार कर थे।
तब, आयुष्मान् आनन्द, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गए और भगवान् का अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् को कहा,
"भन्ते ! जब तक संसार में बुद्ध नहीं प्रगट होते तभी तक दूसरे मत के साधु, लोगों से सत्कार = आदर = सम्मान पाते, और पूजित तथा प्रतिष्ठित हो, चीवर, पिण्डपात, शयनासन और ग्लान-प्रत्यय पाते हैं।
भन्ते ! जब संसार में बुद्ध उत्पन्न होते हैं, तो वे लोगों से न सत्कार - श्रादर = सम्मान पाते और न पूजित तथा प्रतिष्ठित हो चीवर पिण्डपात, शयनासन और ग्लान-प्रत्यय पाते हैं।
भन्ते ! इस समय, भगवान् ही लोगों से सत्कार = आदर = सम्मान पाते, और पूजित तथा प्रतिष्ठित हो, चीवर, पिण्डपात, शयनासन और ग्लान-प्रत्यय पाते हैं, और भिक्षु संघ भी ।
हाँ श्रानन्द ! जब तक संसार में बुद्ध नहीं जनमते तभी तक दूसरे मत के साधु ,लोगों से सत्कार = आदर = सम्मान पाते, और पूजित तथा प्रतिष्ठित हो, चीवर, पिण्डपात, शयनासन और ग्लान-प्रत्यय पाते हैं। ।
जब संसार में बुद्ध उत्पन्न होते हैं । तो वे लोगों से न सत्कार - श्रादर = सम्मान पाते और न पूजित तथा प्रतिष्ठित हो चीवर पिण्डपात, शयनासन और ग्लान-प्रत्यय पाते हैं।
इस समय बुद्ध ही लोगों से सत्कार = आदर = सम्मान पाते, और पूजित तथा प्रतिष्ठित हो, चीवर, पिण्डपात, शयनासन और ग्लान-प्रत्यय पाते हैं, और भिक्षु-संघ भी ।
इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“ओभासति ताव सो किमि,
याव न उन्नमते पभङ्करो।
(स) वेरोचनम्हि उग्गते,
हतप्पभो होति न चापि भासति॥
“तभी तक खद्योत ( = भगजोगनी) टिमटिमाते हैं, जब तक सूरज नहीं उगता ; सूरज के उगते ही उनका टिमटिमाना बन्द हो जाता है, पता भी नहीं लगता है कि वे कहाँ गए ।
“एवं ओभासितमेव तक्किकानं ,
याव सम्मासम्बुद्धा लोके नुप्पज्जन्ति।
न तक्किका सुज्झन्ति न चापि सावका,
दुद्दिट्ठी न दुक्खा पमुच्चरेति॥
''इसी तरह, दूसरे मत के साधुओं का टिमटिमाना है।
जब तक सम्यक सम्बुद्ध संसार में पैदा नहीं होते, तब तक दूसरे मत के साधुओं और उनके श्रावक नहीं सुलझते और न अज्ञ लोग दुःख से मुक्त होते हैं। ”
🌸 उदान ६.१०,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
🌺उपातिधावन्ति सुत्त🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना।
एक समय, भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन आराम में विहार करते थे ।
उस समय, भगवान् रात की काली अँधियारी में खुले मैदान में बैठे थे । तेल-प्रदीप भी जब रहा था । उस समय, बहुत पतंग उड़ उड़कर प्रदीप में आ गिरते थे। इससे जल जाते थे, मर जाते थे, जलमर जाते थे । भगवान् ने उन पतंगों को जल जाते, मर जाते, जलमर जाते देखा ।
इसे देख, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पढ़े -
“उपातिधावन्ति न सारमेन्ति,
नवं नवं बन्धनं ब्रूहयन्ति।
पतन्ति पज्जोतमिवाधिपातका ,
दिट्ठे सुते इतिहेके निविट्ठाति॥
"वे भटक जाते हैं, सार को नहीं पाते, और मी नये नये बन्धन में पड़* जाते हैं। जैसे पतंग उड़ उड़ कर प्रदीप में आ गिरते हैं, वैसे ही, अज्ञ जन दृष्ट और श्रुत वस्तु में आसक्त होते हैं। "
🌸 उदान ६.९ ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
*बृहयन्ति = वर्धयन्ति = बढ़ाते हैं ।
🌺गणिका सुत्त🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना ।
एक समय, भगवान् राजगृह के वेलुवन कलन्दक निवाप में विहार करते थे ।
उस समय, राजगृह में दो पक्ष के लोग एक गणिका के प्रेम में बँध, आपस में लड़ते थे, झगड़ते थे, कलह करते थे, विवाद करते थे - एक दूसरे से हाथाबाँही भी करते थे, एक दूसरे पर ढेला पत्थर भी चलाते थे, एक दूसरे पर लाठी या हथियार से भी चढ़ जाते थे । वे कितने मर भी जाते थे; कितने घायल* भी होते थे ।
तब, कुछ भिक्षु सुबह ही, पहन, और पात्र चीवर ले, राजगीर में भिक्षाटन के लिए पैठे। भिक्षाटन से लौट, भोजन कर लेने के बाद, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गए और भगवान् का अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए उन भिक्षुओं ने भगवान् को कहा,
"भन्ते ! राजगिर में दो पक्ष के लोग एक गणिका के प्रेम में बँध, आपस में लड़ते थे, झगड़ते थे, कलह करते थे, विवाद करते थे - एक दूसरे से हाथाबाँही भी करते थे, एक दूसरे पर ढेला पत्थर भी चलाते थे, एक दूसरे पर लाठी या हथियार से भी चढ़ जाते थे । वे कितने मर भी जाते थे;कितने घायल भी हो जाते हैं।
इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“यञ्च पत्तं यञ्च पत्तब्बं, उभयमेतं रजानुकिण्णं, आतुरस्सानुसिक्खतो। ये च सिक्खासारा सीलब्बतं जीवितं ब्रह्मचरियं उपट्ठानसारा, अयमेको अन्तो। ये च एवंवादिनो – ‘नत्थि कामेसु दोसो’ति, अयं दुतियो अन्तो। इच्चेते उभो अन्ता कटसिवड्ढना, कटसियो दिट्ठिं वड्ढेन्ति। एतेते उभो अन्ते अनभिञ्ञाय ओलीयन्ति एके, अतिधावन्ति एके। ये च खो ते अभिञ्ञाय तत्र च नाहेसुं, तेन च नामञ्ञिंसु, वट्टं तेसं नत्थि पञ्ञापनायाति। ''
"प्राप्त काम-भोगों के सेवन करने में कोई दोष नहीं; संसार के रहते ही पुण्य लाभ कर सकते हैं, पुण्य से ही संसार की वृद्धि होती है, इस लिए काम-भोगों को प्राप्त करना ही चाहिए- यह दोनों प्रकार की मिध्या धारणा चित्त-मन से युक्त है। तृष्णा से आतुर, उसी में अनुरक्त प्रजा इसी को सार समझती है। यह उन वर्जनीय अन्तों में से एक ।
''ब्रह्मचर्य-जोवन के साथ व्रतों का पालन करना हो सार है- यह एक अन्त है । काम-भोगों के सेवन में कोई दोष नहीं- यह दूसरा अन्त है।''
"इन दोनों प्रकार के अन्तों के सेवन से संस्कारों को वृद्धि होती है और उसने मिथ्या धारणा बढ़ती है । इन दो अन्तों को यथारूप नहीं देखने से, एक तो अन्त सहित हो, उसी में फँस जाता है, और दूसरा मार्ग से बहक जाता है ।
"जो इन दोनों बातों को ठीक ठीक जान लेते हैं, वे उनमें नहीं पड़ते । वे आवागमन में पड़ने वाले नहीं हैं। "
🌸 उदान ६.८ ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
*मरणमन्तम्पि दुक्खं निगच्छति - मरने के समान भी दुःख पाते थे ।
🌺सुभूति सुत्त🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना ।
एक समय, भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन आराम में विहार करते थे ।
उस समय, आयुष्मान् सूभूति भगवान् के पास ही आसन लगाए, शरीर को सीधा किए, अवितर्क समाधि लगाए बैठे थे ।
भगवान् ने पास ही, आयुष्मान् सुभूति को समाधि लगाए बैठे देखा । इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“यस्स वितक्का विधूपिता,
अज्झत्तं सुविकप्पिता असेसा।
तं सङ्गमतिच्च अरूपसञ्ञी,
चतुयोगातिगतो न जातु मेतीति
"जिसने अपने वितकों को भस्म कर दिया है* और अपने को पूरा पूरा पहचान लिया है, वह अरूप संज्ञी योगी सांसारिक आसक्ति ( = सङ्ग )* को छोड़, चार योगों* के परे हो जाता है। उसका फिर भी संसार में जन्म नहीं होता। "
🌸 उदान ६.७ ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
*"कामवितर्क आदि सभी मिथ्या वितकों को आर्यमार्ग के ज्ञान उच्छिन्न कर दिया है"
*“राग-संङ्ग (अट्ठकथा) या क्लेश-सङ्ग का अतिक्रमण कर"
*चार योग- "कामयोग, भवयोग, (आत्म) दृष्टि-योग, और अविद्यायोग" (अट्ठकथा)
🌺ततियनानातित्थिय सुत्त🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना ।
एक समय, भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन आराम में विहार करते थे ।
उस समय, अनेक दूसरे मत के साधु, श्रमण, ब्राह्मण और परिव्राजक श्रावस्ती में भिक्षाटन के लिए घूमा करते थे- नाना सिद्धान्त मानने वाले, नाना विश्वास वाले, नाना रूचि वाले, नाना मिथ्या मतों से जकड़े हुए।
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे- लोक और आत्मा अशाश्वत है ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।,
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-शाश्वत है ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।,
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-शाश्वत भी है और अशाश्वत भी ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।,
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-न तो शाश्वत है और न अशाश्वत, लोक और आत्मा अपने आप उत्पन्न हुए हैं ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।,
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-दूसरे ( ईश्वर) से उत्पन्न किए गए हैं ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।,
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-अपने आप भी उत्पन्न हुए हैं, और दूसरे से भी उत्पन्न किए गए हैं ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ । ,
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-न अपने आप उत्पन्न हुए हैं, और न किसी ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।,
दूसरे से उत्पन्न किए गए हैं किंतु यों ही हो गए हैंः सुख दुःख, आत्मा और लोक सभी शाश्वत हैं ...... : अशाश्वत हैं ...... , शाश्वत हैं और अशाश्वत भी ...... , न शाश्वत है और न अशाश्वत ...... , सुख दुःख, आत्मा और लोक सभी अपने आप उत्पन्न हुए हैं ...... , दूसरे से उत्पन्न किए गए हैं...... , अपने आप उत्पन्न हुए हैं और दूसरे से भी उत्पन्न किए गए हैं ...... , न तो अपने आप उत्पन्न हुए हैं और न दूसरे से उत्पन्न किए गए हैं ...... ।
इस तरह, वे आपस में लड़ते झगड़ते, विवाद करते, और एक दूसरे को मुख रूपी भाले से बेधते हुए बिहार करते थे-धर्म ऐसा है, ऐसा नहीं ।
तब, कुछ भिक्षु भगवान् से बोले, "भन्ते ! अनेक दूसरे मत के साधु .....श्रापस में लड़ते ..... ।”
भिक्षुओ ! ये साधु और परिव्राजक अन्धे, बिना आँख वाले अर्थानर्थ या धर्माधर्म को नहीं जानते । श्रर्थानर्थ या धर्माधर्म को न जानने के कारण ही आपस में लड़ते झगड़ते ..... हैं ।
इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“अहङ्कारपसुतायं पजा, परंकारूपसंहिता।
एतदेके नाब्भञ्ञंसु, न नं सल्लन्ति अद्दसुं॥
“एतञ्च सल्लं पटिकच्च पस्सतो।
अहं करोमीति न तस्स होति।
परो करोतीति न तस्स होति॥
"संसार के श्रज्ञ जीव अहंकार और परंकार के भ्रम में पड़े रहते हैं। इसे लोग नहीं समझ पाते और न असल दुःख को जान सकते हैं। असल दुःख को समझ कर "मैं करता, और पराया करता" का भेद मिट जाता है।"
“मानुपेता अयं पजा, मानगन्था मानविनिबद्धा ।
दिट्ठीसु सारम्भकथा, संसारं नातिवत्तती”ति॥ छट्ठं।
"संसार के अज्ञ जीत्र 'अहं-भाव' में पड़े हैं, 'अहं-भाव' की गाँठ से बेतरह जकड़े हैं, झूठे सिद्धान्त लेकर झगड़नेवाला इस संसार से कभी नहीं छूटता। ''
🌸 उदान ६.६ ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
🌺दुतियनानातित्थिय सुत्त🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना ।
एक समय, भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन आराम में विहार करते थे ।
उस समय, अनेक दूसरे मत के साधु, श्रमण, ब्राह्मण और परिव्राजक श्रावस्ती में भिक्षाटन के लिए घूमा करते थे- नाना सिद्धान्त मानने वाले, नाना विश्वास वाले, नाना रूचि वाले, नाना मिथ्या मतों से जकड़े हुए।
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे- लोक और आत्मा अशाश्वत है ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।,
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-शाश्वत है ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।,
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-शाश्वत भी है और अशाश्वत भी ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।,
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-न तो शाश्वत है और न अशाश्वत, लोक और आत्मा अपने आप उत्पन्न हुए हैं ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।,
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-दूसरे ( ईश्वर) से उत्पन्न किए गए हैं ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।,
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-अपने आप भी उत्पन्न हुए हैं, और दूसरे से भी उत्पन्न किए गए हैं ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ । ,
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-न अपने आप उत्पन्न हुए हैं, और न किसी ;यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।,
दूसरे से उत्पन्न किए गए हैं किंतु यों ही हो गए हैंः सुख दुःख, आत्मा और लोक सभी शाश्वत हैं ...... : अशाश्वत हैं ...... , शाश्वत हैं और अशाश्वत भी ...... , न शाश्वत है और न अशाश्वत ...... , सुख दुःख, आत्मा और लोक सभी अपने आप उत्पन्न हुए हैं ...... , दूसरे से उत्पन्न किए गए हैं...... , अपने आप उत्पन्न हुए हैं और दूसरे से भी उत्पन्न किए गए हैं ...... , न तो अपने आप उत्पन्न हुए हैं और न दूसरे से उत्पन्न किए गए हैं ...... ।
इस तरह, वे आपस में लड़ते झगड़ते, विवाद करते, और एक दूसरे को मुख रूपी भाले से बेधते हुए बिहार करते थे-धर्म ऐसा है, ऐसा नहीं ।
तब, कुछ भिक्षु भगवान् से बोले, "भन्ते ! अनेक दूसरे मत के साधु .....श्रापस में लड़ते ..... ।”
भिक्षुओ ! ये साधु और परिव्राजक अन्धे, बिना आँख वाले अर्थानर्थ या धर्माधर्म को नहीं जानते । श्रर्थानर्थ या धर्माधर्म को न जानने के कारण ही आपस में लड़ते झगड़ते ..... हैं ।
इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पढ़े-
“इमेसु किर सज्जन्ति, एके समणब्राह्मणा।
अन्तराव विसीदन्ति, अप्पत्वाव तमोगधन्ति॥
"कितने श्रमण और ब्राह्मण इसी में जूझे रहते हैं; बीच ही में नष्ट हो जाते हैं, बिना अज्ञान का नाश किए। ”
🌸 उदान ६.५ ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
भिक्षुश्रो ! जिन जात्यन्धों ने हाथी के शरीर को पकड़ा था उन्होंने कहा, देव ! हाथी ऐसा है- जैसे कोटु' (कोठी/कुसूलो)।"
भिक्षुश्रो ! जिन जात्यन्धों ने हाथी के पैर पकड़े थे उन्होंने कहा,
"देव ! हाथी ऐसा है -जैसे कोई ठूँठ ।"
भिक्षुश्रो ! जिन जात्यन्धों ने हाथी के पीठ पकड़े थे उन्होंने कहा,
"देव ! हाथी ऐसा है - "जैसे कोई औखल ।"
भिक्षुओ ! जिन जात्यन्धों ने हाथी के पूँछ पकड़े थे उन्होंने कहा,
"देव ! हाथी ऐसा है - "जैसे कोई सोंटो ।"
भिक्षुओ ! जिन जात्यन्धों ने हाथी के बालधि पकड़े थे उन्होंने कहा, "देव ! हाथी ऐसा है - "जैसे कोई बढ़नी ।"
इसपर, वे आपस में लड़ने भिड़ने लगे और मुक्का घुस्सा करने लगे - हाथी ऐसा है, वैसा नहीं; वैसा, ऐसा नहीं ।
भिक्षुओ ! इसे देख, राजा खूब हँसा ।
भिक्षुओ ! इसी तरह, ये साधु और परिव्राजक अंधे और बिना आँख वाले हो..... आपस में लड़ते, झगड़ते और एक दूसरे को मुख रूपी भाले से बेधते हैं-धर्म ऐसा है, वैसा नहीं । इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल
पढ़े-
“इमेसु किर सज्जन्ति, एके समणब्राह्मणा।
विग्गय्ह नं विवदन्ति, जना एकङ्गदस्सिनोति॥
"कितने श्रमण और ब्राह्मण इसी में जूझे रहते हैं। (धर्म के केवल) एक अङ्ग को देख आपस में विवाद करते हैं”
🌸 उदान ६.४ ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
*मुखसत्तीहि वितुदन्ता - एक दूसरे को कठोर वचन कहते ।
* इन भिन्न भिन्न मतों का विस्तार पूर्वक वर्णन और उनके दोष दीघनिकाय के ब्रह्मजाल सूत्र में आते हैं ।
🌺 पठमनानातित्थिय सुत्त🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना ।
एक समय, भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन आराम में विहार करते थे ।
उस समय, अनेक दूसरे मत के साधु, श्रमण, ब्राह्मण, और परिव्राजक, श्रावस्ती में भिक्षाटन के लिए घूमा करते थे- नाना सिद्धान्त मानने वाले, नाना विश्वास वाले, नाना रुचि वाले, नाना मिथ्या मतों से जकड़े हुए।
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे- लोक शाश्वत है : यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-- लोक अशाश्वत है : यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-- लोक अन्त सहित है : यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे- - लोक अनन्त है : यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-- जो जीव है, वही शरीर है : यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-जीव दूसरा है और शरीर दूसरा है : यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे- - मरने के बाद तथागत बना रहता है : यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे- - मरने के बाद तथागत बना नहीं रहता : यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-- मरने के बाद तथागत रहता भी है और नहीं भी :यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।
कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे-- मरने के बाढ़ तथागत न रहता है और न नहीं रहता है :यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।
इस तरह, वे आपस में लड़ते झगड़ते, विवाद करते, और एक दूसरे को मुख रूपी भाले से बेधते हुए* बिहार करते थे-धर्म ऐसा है, ऐसा नहीं ।*
तब, कुछ भिक्षु सुबह ही, पहन, और पात्र चीवर ले भिक्षाटन के लिए श्रावस्ती में पैठे। भिक्षाटन से लौट, भोजन कर चुकने के बाद, वे भिक्षु, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये और भगवान् का अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुये उन भिक्षुओं ने भगवान् को कहा,
"भन्ते ! श्रावस्ती में अनेक दूसरे मत के साधु, श्रमण, ब्राह्मण, परिब्राजक भिक्षाटन के लिए घूमा करते हैं- नाना सिद्धान्त मानने वाले, नाना विश्वास वाले, नाना मिथ्या मतों से जकड़े हुए।
"कुछ श्रमण और ब्राह्मण ऐसा मत मानते थे और यह कहते थे- लोक शाश्वत है : यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।............ मरने के बाढ़ तथागत न रहता है और न नहीं रहता है :यही सत्य है, दूसरा बिलकुल झूठ ।
"इस तरह, वे आपस में लड़ते झगड़ते, विवाद करते, और एक दूसरे को मुख रूपी भाले से वेधते हुए विहार करते हैं-धर्म ऐसा है, ऐसा नहीं ।"
भिक्षुओ ! ये साधु और परिव्राजक अन्धे, बिना आँख वाले अर्थानर्थ या धर्माधर्म को कुछ भी नहीं जानते हैं। अर्थानर्थ या धर्माधर्म को न जानने के कारण ही आपस में लड़ते, झगड़ते हैं।
भिक्षुश्रो ! बहुत पहले, इसी श्रावस्ती में एक राजा रहता था। उस राजा ने किसी पुरुष को आमन्त्रित किया, "हे पुरुष ! सुनो, श्रावस्ती में जितने जात्यन्ध (= जन्म से अन्धे) हैं सभी को एक जगह इकट्ठा करो ।"
"देव ! बहुत अच्छा" कह, वह पुरुश राजा को उत्तर दे श्रावस्ती में, जितने जात्यन्ध थे, सभी को बटोरकर राजा के पास ले आया और बोला, "देव ! श्रावस्ती में जितने जात्यन्ध हैं सभी को मैंने इकट्ठा कर दिया ।"
तो भणे ! इन जात्यन्ध पुरुषों को हाथी दिखाओ ।
"देव ! बहुत अच्छा" कह, उस पुरुष ने राजा को उत्तर दे, उन जात्यन्ध पुरुषों को हाथी दिखाया - देखो, यह हाथी है। कुछ जात्यन्धों ने हाथी के शिर को पकड़ा - हाथी ऐसा होता है।
कुछ जात्यन्धों ने हाथी के कान... , दाँत ..., सूंड़ ... , शरीर ..., पैर ... , पीठ ..., पूंछ ..., बालधि (पूंछ का बाल) को पकड़ा - हाथी ऐसा होता है।
भिक्षुओ ! तब, वह पुरुष उन जात्यन्धों को इस तरह हाथी दिखा कर, जहाँ राजा था, वहाँ गया और बोला, "देव जात्यन्धों ने हाथी देख लिया। अब, आप की जैसी आज्ञा ।"
भिक्षुओ ! तब, वह राजा, जहाँ वे जात्यन्ध थे, वहाँ गया और बोला, “सूरदास ! क्या हाथी देख लिया ?"
देव ! हाँ, हम लोगों ने हाथी देख लिया ।
तो कहो, हाथी कैसा है ?
भिक्षुओ ! जिन जात्यन्धों ने हाथी के शिर को पकड़ा था उनने कहा "देव ! हाथी ऐसा है - जैसे कोई बड़ा बड़ा ।"
भिक्षुओ ! जिन जात्यन्धों ने हाथी के कान को पकड़ा था उन्होंने कहा, "देव ! हाथो ऐसा है-जैसे कोई सूपैं।"
भिक्षुओं ! जिन जात्यन्धों ने हाथी के दाँत को पकड़ा था, उन्होंने
कहा, "देव ! हाथी ऐसा है-जैसे कोई खूँटा।"
मिक्षुओ ! जिन जात्यन्धों ने हाथी के सूँड़ को पकड़ा था उन्होंने कहा, "देव ! हाथी ऐसा है जैसे कोई नङ्गलीस ।"
🌺पच्चवेक्खण सुत्त🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना ।
एक समय, भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन आराम में विहार करते थे ।
उस समय, भगवान् अपने सभी पाप अकुशल धमों के बिलकुल क्षीण हो जाने और अनेक कुशल ( = पुण्य) धर्मों के पूरे हो जाने का अनुभव करते बैठे थे ।
इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“अहु पुब्बे तदा नाहु, नाहु पुब्बे तदा अहु।
न चाहु न च भविस्सति, न चेतरहि विज्जतीति॥
"जो पहले था, सो तब नहीं था, जो पहले नहीं था, सो तब था; न तो था और न अब होगा, न इस समय वर्तमान है। ”
🌸 उदान ६ .३,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
*''जो पहले था - अर्हत्-मार्ग के ज्ञान की उत्पत्ति के पहले मेरी (चित्त) सन्तान में रागादि सभी क्लेश थे । इन क्लेशों में ऐसा कोई भी नहीं है जो पहले नहीं था। तब नहीं था- आर्यमार्ग के ज्ञान होने के समय वह क्लेश-समुदाय नहीं था ।...... जो पहले नहीं था- जो इस समय मेरा अपरिमाण अनवद्य ( = निष्पाप) धर्म भावना से पूरा पूरा प्राप्त हो गया है, वह भी आर्यमार्ग के ज्ञान की उत्पत्ति के पहले नहीं था । सो तब था-जब आर्यमार्ग का ज्ञान उत्पन्न हो गया तब मेरा सारा अनवद्य धर्म था ।..... न तो था और न अब होगा, न इस समय वर्त- मान है जो वह अनवद्य-धर्म आर्यमार्ग मुझे बोधिवृक्ष के नीचे उत्पन्न हुआ था, जिससे मेरा सारा क्लेश-समुदाय पूरा पूरा प्रहीण हो गया था, वह मुझे मार्ग के ज्ञान की उत्पत्ति के पहले नहीं था, नहीं उत्पन्न होगा, और न इस वर्तमान समय में है, कुछ करना था, समाप्त हो गया ।" (अट्ठकथा)
🌺सत्तजटिल सुत्त🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना ।
एक समय, भगवान् श्रावस्ती में मृगारमाता के पूर्वाराम प्रासाद में विहार करते थे । उस समय, साँझ को समाधि से उठ, प्रासाद के सामने बाहर में भगवान् बैठे थे ।
तब, कोशलराज प्रसेनजित जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया और भगवान का अभिवादन कर एक ओर बैठ गया ।
उस समय सात जटाधारी साधु, सात निर्ग्रन्थ साधु, सात नंगे साधु, सात एकवस्त्र-धारी साधु, और सात नख और काँख के बाल बढ़ाये परिव्राजक, अपने अनेक प्रकार के सामान लिए भगवान् के पास ही से जा रहे थे ।
कोशलराज प्रसेनजित ने उन लोगों को पास हो से जाते देखा । देखकर आसन से उठ, उपरनी चादर को एक कंधे पर सम्हाल, दाहिने घुटने को पृथ्वी पर रख, उन साधुओं की ओर हाथ जोड़ कर तीन बार अपना नाम सुनाया, "भन्ते ! मैं कोशल-राज प्रसेनजित हूँ।"
तब, उन साधुओं के चले जाने के बाद कोशलराज प्रसेनजित, जहाँ भगवान् थे, वहाँ आया और भगवान् का अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुए कोशलराज प्रसेनजित ने भगवान् को कहा, "भन्ते ! संसार में जो अर्हत् या अर्हत्-मार्ग पर आरूढ़ हैं उनमें ये एक हैं।"
महाराज ! आप-गृहस्थ, कामभोगी, बाल बच्चों के साथ रहनेवाले, काशी के चन्दन लगानेवाले, माला गन्ध और उबटन लगानेवाले, रुपये पैसे के फेर में पड़े रहनेवाले -ने उलटा समझ लिया कि ये यर्हत् या अर्हत्-मार्ग पर आरूढ़ हैं।
महाराज ! किसी के साथ रहने से ही उसके शील का पता लगाया जा सकता है-सो भी, कुछ दिन नहीं, बहुत दिनों तक; बिना ध्यान से नहीं, किन्तु ध्यान लगाकर; बिना बुद्धिमानी से नहीं, किन्तु बढ़ी बुद्धिमानी से।
महाराज ! व्यवहार करने से ही किसी की शुद्धता का पता लगाया जा सकता है-सो भी, कुछ दिन नहीं ,बहुत दिनों तक; बिना ध्यान से नहीं, किन्तु ध्यान लगाकर; बिना बुद्धिमानी से नहीं, किन्तु बढ़ी बुद्धिमानी से।
महाराज ! आपत्ति पड़ने पर स्थिरता का पता लगाया जाता है-सो भी, कुछ दिन नहीं ,बहुत दिनों तक; बिना ध्यान से नहीं, किन्तु ध्यान लगाकर; बिना बुद्धिमानी से नहीं, किन्तु बढ़ी बुद्धिमानी से।
महाराज ! बातचीत करने पर ही किसी की प्रज्ञा का पता लगाया जा सकता है-सो भी, कुछ दिन नहीं, ,बहुत दिनों तक; बिना ध्यान से नहीं, किन्तु ध्यान लगाकर; बिना बुद्धिमानी से नहीं, किन्तु बढ़ी बुद्धिमानी से।
भन्ते ! आप धन्य हैं ! जो आपने इसे ऐसा अच्छा समझा दिया । मैं गृहस्थ, कामभोगी, बाल बच्चों के साथ रहनेवाले, काशी के चन्दन लगानेवाले, माला गन्ध और उबटन लगानेवाला , रुपये पैसे के फेर में पड़े रहनेवाला ने उलटा समझ लिया, कि ये अर्हत् या अर्हत्-मार्ग पर आरूढ़ हैं।
किसी के साथ रहने से ही उसके शील का पता लगाया जा सकता है, - व्यवहार करने से ही किसी की शुद्धता का पता लगाया जा सकता है, - सो भी कुछ दिन नहीं ,बहुत दिनों तक; बिना ध्यान से नहीं, किन्तु ध्यान लगाकर; बिना बुद्धिमानी से नहीं, किन्तु बढ़ी बुद्धिमानी से।
भन्ते ! ये लोग गुप्तचर हैं, ढोंग बना बना कर यहाँ आते हैं। उनके पहले जाने के बाद पीछे पीछे मैं जाऊँगा । वे इस समय, भस्म भूत को हटा, नहा धो, लेप लगा, नाई से बाल दाढ़ी बनवा, उजले कपड़े पहन, पाँच काम- गुणों का भोग करेंगे ।
इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“न वायमेय्य सब्बत्थ, नाञ्ञस्स पुरिसो सिया।
नाञ्ञं निस्साय जीवेय्य, धम्मेन न वणिं चरेति॥
“सभी तरह के काम करने को तैयार हो जाना नहीं चाहिए; दूसरे का गुलाम होकर नहीं रहना चाहिए; किसी दूसरे पर भरोसा कर के जीना उचित नहीं, धर्म के नाम पर व्यापार करने नहीं लगना चाहिए। "
🌸 उदान ६ .२ ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
भन्ते ! अब आपके श्रावक भिक्षु व्यक्त हो गए हैं। भन्ते ! भगवान् परिनिर्वाण पावें, सुगत परिनिर्वाण पावें । भन्ते ! भगवान् का परिनिर्वाण-काल प्राप्त हो गया है।
भन्ते ! भगवान् ने यह बात कही थी, "हे मार ! मैं तब तक परिनिर्वाण नहीं प्राप्त करूँगा, जब तक मेरी श्रावक भिक्षुणियाँ, उपासक, उपालिकायें सभी व्यक्त, विनीत लायक न हो लेंगी ।
भन्ते ! अब, आपको श्रावक भिनुणियाँ, उपासक, उपासिकायें सभी व्यक्त, विनीत ० लायक हो गई हैं। भन्ते ! भगवान् परिनिर्वाण पावें, सुगत परिनिर्वाण पावें । भन्ते ! भगवान् का परिनिर्वाण काल प्राप्त हो गया है।
भन्ते ! भगवान् ने यह बात कही थी, "हे मार ! मैं तब तक परिनिर्वाण नहीं प्राप्त करूंगा जब तक मेरा ब्रह्मचर्य समृद्ध, उन्नत, विस्तृत, बहुज्ञ, और प्रसिद्ध हो, देवताओं, मनुष्यों में प्रगट न हो जायगा ।
भन्ते ! अब, आप का ब्रह्मचर्य मनुष्यों में प्रगट हो गया है। भन्ते ! भगवान् परिनिर्वाण पावें, सुगत परिनिर्वाण पावें । भन्ते ! भगवान् का परिनिर्वाण-काल प्राप्त हो गया है।
उसके ऐसा कहने पर भगवान् ने पापी मार को यह कहा, "हे
पापी ! मत घबड़ा, भगवान् अब शीघ्र ही परिनिर्वाण प्राप्त करेंगे। आज से तीन महीने बीतने पर बुद्ध का परिनिर्वाण हो जायगा ।
तब, भगवान् के चापाल चैत्य में, अपनी बची हुई अल्प आयु के विषय में कहने पर, अत्यन्त भयावह, रोमाञ्च कर देनेवाला भूकम्प होने लगा-देव दुन्दुभी गरजने लगी ।
इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“तुलमतुलञ्च सम्भवं,
भवसङ्खारमवस्सजि मुनि।
अज्झत्तरतो समाहितो,
अभिन्दि कवचमिवत्तसम्भवन्ति॥
“आवागमन बनाये रखनेवाले तुल्य और अतुल्य सभी संस्कारों को मुनि (=बुद्ध) ने छोड़ दिया । अध्यात्म में रत और समाहित हो, आत्म-संभव को कवच के ऐसा काट डाला। "
🌸 उदान ६ .१ ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
🌺आयुसङ्खारोस्सज्जन सुत्त🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना।
एक समय, भगवान् वैशाली में महावन वाली कूटागारशाला में विहार करते थे ।
तब, सुबह में भगवान्, पहन, और पात्र चीवर ले वैशाली मैं भिक्षाटन के लिए पैठे । भिक्षाटन से लौट, भोजन कर लेने के बाद, भगवान् ने आयुष्मान् आनन्द को आमन्त्रित किया,
“आनन्द ! बिछावन को ले चलो । जहाँ चापाल चैत्य है वहाँ दिन में विहार करने के लिए जाऊँगा।
"भन्ते ! बहुत अच्छा” कह, आयुष्मान् आनन्द भगवान् को उत्तर दे, बिछावन उठा, भगवान् के पोछे-पीछे हो लिए ।
तब, भगवान्, जहाँ चापाल चैत्य है, वहाँ गए और बिछे आसन पर बैठ गए । बैठकर भगवान् ने आयुष्मान् आनन्द को श्रामन्त्रित किया, |
"आनन्द ! वैशाली बड़ा रमणीय है, उदेन चैत्य रमणीय है, गोतमक चैत्य रमणीय है, सप्ताम्र चैत्य रमणीय है, बहुपुत्र चैत्य रमणीय है, सारन्दद चैत्य रमणीय है, चापाल चैत्य रमणीय है।
“आनन्द ! जिसे चारों ऋद्धि पाद भावित, अभ्यस्त, बश में, सिद्ध, अनुष्टित, परिचित, और सधे सधाये रहते हैं, यदि वह चाहे तो कल्पभर या कल्प के अन्त तक रह सकता है । आनन्द ! बुद्ध को चारो ऋद्धिपाद भावित अभ्यस्त, वश में, सिद्ध, अनुष्ठित, परिचित और सधे सधाये होते हैं; यदि बुद्ध चाहें, तो कल्प भर या बचे कल्प तक रह सकते हैं।"
आयुष्मान् आनन्द, भगवान् से इतने बड़े और साफ संकेत दिए जाने पर भी, नहीं समझ सके । भगवान् से ऐसी याचना नहीं की- भन्ते ! भगवान् कल्पभर ठहरें, सुगत कल्पभर ठहरें - संसार के हित के लिए, संसार के सुख के लिए, संसार पर अनुकम्पा करने के लिए, देवताओं और मनुष्यों के अर्थ, हित और सुखके लिए। मानों, उनके चित्त में मार पैठ गया था ।
दूसरी बार भी, भगवान् ने आयुष्मान् आनन्द को आमन्त्रित किया, "आनन्द ! वैशाली बड़ा रमणीय है, उदेन चैत्य रमणीय है, गोतमक चैत्य रमणीय है, सप्ताम्र चैत्य रमणीय है, बहुपुत्र चैत्य रमणीय है, सारन्दद चैत्य रमणीय है, चापाल चैत्य रमणीय है।
“आनन्द ! जिसे चारों ऋद्धि पाद भावित, अभ्यस्त, बश में, सिद्ध, अनुष्टित, परिचित, और सधे सधाये रहते हैं, यदि वह चाहे तो कल्पभर या कल्प के अन्त तक रह सकता है । आनन्द ! बुद्ध को चारो ऋद्धिपाद भावित अभ्यस्त, वश में, सिद्ध, अनुष्ठित, परिचित और सधे सधाये होते हैं; यदि बुद्ध चाहें, तो कल्प भर या बचे कल्प तक रह सकते हैं।"
इसपर भी, आयुष्मान् आनन्द, भगवान् से इतने बड़े और साफ संकेत दिए जाने पर भी, नहीं समझ सके । भगवान् से ऐसी याचना नहीं की- भन्ते ! भगवान् कल्पभर ठहरें, सुगत कल्पभर ठहरें - संसार के हित के लिए, संसार के सुख के लिए, संसार पर अनुकम्पा करने के लिए, देवताओं और मनुष्यों के अर्थ, हित और सुखके लिए। मानों, उनके चित्त में मार पैठ गया था ।
तीसरी बार भी, भगवान् ने आयुष्मान् श्रानन्द को आमन्त्रित किया, "आनन्द ! वैशाली बड़ा रमणीय है, उदेन चैत्य रमणीय है, गोतमक चैत्य रमणीय है, सप्ताम्र चैत्य रमणीय है, बहुपुत्र चैत्य रमणीय है, सारन्दद चैत्य रमणीय है, चापाल चैत्य रमणीय है।
“आनन्द ! जिसे चारों ऋद्धि पाद भावित, अभ्यस्त, बश में, सिद्ध, अनुष्टित, परिचित, और सधे सधाये रहते हैं, यदि वह चाहे तो कल्पभर या कल्प के अन्त तक रह सकता है । आनन्द ! बुद्ध को चारो ऋद्धिपाद भावित अभ्यस्त, वश में, सिद्ध, अनुष्ठित, परिचित और सधे सधाये होते हैं; यदि बुद्ध चाहें, तो कल्प भर या बचे कल्प तक रह सकते हैं।"
इसपर भी, आयुष्मान् आनन्द, भगवान् से इतने बड़े और साफ संकेत दिए जाने पर भी, नहीं समझ सके । भगवान् से ऐसी याचना नहीं की- भन्ते ! भगवान् कल्पभर ठहरें, सुगत कल्पभर ठहरें - संसार के हित के लिए, संसार के सुख के लिए, संसार पर अनुकम्पा करने के लिए, देवताओं और मनुष्यों के अर्थ, हित और सुखके लिए। मानों, उनके चित्त में मार पैठ गया था ।
तब, भगवान् ने आयुष्मान् आनन्द को आमन्त्रित किया, “आनन्द! जहाँ चाहो वहाँ जा सकते हो।"
"भन्ते ! बहुत अच्छा" कह, आयुष्मान् आनन्द, भगवान् को उत्तर दे, आसन से उठ खड़े हुए, और भगवान् को प्रणाम तथा प्रदक्षिणा कर निकट ही में किसी वृक्ष के नीचे बैठ गए ।
आयुष्मान् आनन्द के जाने के बाद ही, पापी मार, जहाँ भगवान् थे,वहाँ गया और एक ओर खड़ा हो गया। एक ओर खड़े होकर पापी मारे ने भगवान् को कहा,
"भन्ते ! भगवान् परिनिर्वाण पावें, सुगत परिनिर्वाण पावें । भन्ते ! भगवान् का परिनिर्वाण-काल प्राप्त हुआ है। मन्ते ! आप ने स्वयं यह बात कही थी, "हे मार ! मैं तब तक परिनिर्वाण नहीं प्राप्त करूँगा, जब तक मेरे श्रावक भिक्षु व्यक्त, विनीत, निःशङ्क, कुशल, विद्वान्, धर्मवान्, धर्म के ही अनुसार आचरण करने वाले, ठीक मार्ग पर चलने वाले न हो लेंगे - जब तक वे अपने उपाध्याय से धर्म सीखकर दूसरों को बताने, उपदेश करने, और समझाने बुझाने लायक नहीं हो लेंगे और जब तक दूसरे मतों के कुतकों का खण्डन करने तथा प्राति- हार्य का निग्रह कर, धर्मोपदेश करने लायक नहीं हो जायेंगे ।"
🌺चूळपन्थक सुत्त 🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना।
एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन आराम में विहार करते थे।
उस समय आयुष्मान् चुल्लपन्थक भगवान् के पास ही आसन लगाए, शरीर को सीधा किए स्मृतिमान् हो बैठे थे ।
भगवान् ने पास ही, आयुष्मान् चुल्लपन्थक को आसन लगाए, शरीर को सीधा किए स्मृतिमान् हो बैठे देखा ।
इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“ठितेन कायेन ठितेन चेतसा,
तिट्ठं निसिन्नो उद वा सयानो।
एतं सतिं भिक्खु अधिट्ठहानो,
लभेथ पुब्बापरियं विसेसं।
लद्धान पुब्बापरियं विसेसं,
अदस्सनं मच्चुराजस्स गच्छेति॥
"स्थिर शरीर और स्थिर चित्त से खड़े, बैठे या सोये रह, जो भिक्षु अपनी स्मृति को बनाए रखता है, वह ऊँची से ऊँची अवस्थाओं को प्राप्त कर लेता है। ऊँचा से ऊँची अवस्थाओं को प्राप्त कर, वह मृत्युराज की दृष्टि में नहीं आता। "
🌸 उदान ५.१० ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
🌺 सधायमान सुत्त 🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना।
एक समय, भगवान् बड़े भारी भिक्षु-संघ के साथ कोशल देश में रमत ( =चारिका) लगा रहे थे ।
उस समय, बहुत से लड़के दौड़ते और चिल्लाते भगवान् के पास भा रहे थे ।
भगवान् ने उन लड़कों को दौड़ते और चिल्लाते अपने पास आते देखा ।
देखकर, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“परिमुट्ठा पण्डिताभासा, वाचागोचरभाणिनो।
याविच्छन्ति मुखायामं, येन नीता न तं विदूति॥
"अपने को पण्डित [ज्ञानी ] समझने वाले मूर्ख, मन भर सुह फाड़ फाड़ कर व्यर्थ की बातें बकते हैं; क्या करते हैं, स्वयं नहीं जानते ॥''
🌸 उदान ५.९ ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
🌺 सङ्घभेद सुत्त 🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना।
एक समय, भगवान् राजगृह के वेलुवन कलन्दक निवाप में विहार करते थे ।
उस समय, उपोसथ के दिन आयुष्मान् आनन्द सुबह ही में पहन और पात्र चीवर ले भिक्षाटन के लिए राजगृह में पैठे।
देवदत्त ने आयुष्मान् आनन्द को राजगृह में भिक्षाटन करते देखा। देखकर वह जहाँ श्रायुष्मान् आनन्द थे, वहाँ गया और बोला, "आबुस आनन्द ! अब से, मैं अपना उपोसथ-कर्म और संघ-कर्म भगवान् और भिक्षु-संघ के बिना ही स्वयं किया करूँगा।"
तब, श्रायुष्मान् आनन्द राजगृह में भिक्षाटन करके लौटे। भिक्षाटन से लौट, भोजन कर लेने के बाद, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गए और भगवान् का अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् को कहा-
"भन्ते ! आज मैं सुबह में, पहन, और पात्र चीवर ने राजगृह में भिक्षाटन के लिए पैठा। देवदत्त ने मुझे राजगृह में भिक्षाटन करते देखा। देखकर, देवदत्त, जहाँ मैं था, वहाँ श्राया और बोला,
"आाबुस आनन्द ! मैं अब से, अपना उपोसथ-कर्म और संघ-कर्म भगवान् और भिक्षु-संघ के बिना ही स्वयं किया करूँगा।"
भन्ते ! आज देवदत्त संघ फोड़ देगा, (अलग ही) उपोसथ -कर्म और संघ-कर्म करेगा ।
इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“सुकरं साधुना साधु, साधु पापेन दुक्करं ।
पापं पापेन सुकरं, पापमरियेहि दुक्करन्ति॥
"सुकर है साधु [गुणवान] पुरुषों को साधु [अच्छा ] काम करना, साधु काम पापियों को करना दुष्कर है।पाप-कर्म पापियों को करना सुकर है, पाप-कर्म आर्य जनों को करना दुष्कर है" ॥
🌸 उदान ५.८ ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
🌺कङ्खारेवत सुत्त 🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना।
एक समय, भगवान् श्रावस्ती में अनार्थापण्डिक के जेतवन आराम में विहार करते थे ।
उस समय, भगवान् के पास ही आयुष्मान् कांक्षारेवत आसन लगाए, अपने शरीर को सीधा किए, कांक्षाओं से शुद्ध हो गए अपने चित्त का अनुभव करते बैठे थे ।
भगवान् ने पास ही में श्रायुष्मान् कांक्षारेवत को आसन लगाए, अपने शरीर को सीधा किए, कांक्षाओं से शुद्ध हो गए अपने चित्त का अनुभव करते देखा ।
इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“या काचि कङ्खा इध वा हुरं वा,
सकवेदिया वा परवेदिया वा।
ये झायिनो ता पजहन्ति सब्बा,
आतापिनो ब्रह्मचरियं चरन्ताति॥
"लोक या परलोक में, अपनी या परायी (संसार सम्बन्धी) जितनी कांक्षायें हैं, ध्यानी उन सभी को छोड़ देते हैं, तपस्वी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं "।
🌸 उदान ५.७ ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
बहुत अच्छा सोण ! जाओ भगवान् का दर्शन कर आश्रो । सोण ! भगवान् को देखोगे - सुन्दर, दर्शनीय, शान्तेन्द्रिय, शान्तमन वाले, उत्तम, समथ दमथ से युक्त, पहुँचे हुए, दान्त, संयमशील, यतेन्द्रिय, निष्पाप । देख कर, मेरी ओर से उनके चरणों पर शिर टेक कर प्रणाम करना और कुशल क्षेम पूछना -
भन्ते ! मेरे उपाध्याय आयुष्मान् महाकात्यायन भगवान् के चरणों पर शिर से प्रणाम करते हैं.. ।
"भन्ते ! बहुत अच्छा" कह आयुष्मान् सोण आयुष्मान् महा- कात्यायन के कहने का अनुमोदन कर, आसन से उठ खड़े हुए। आयुष्मान् महाकात्यायन को प्रणाम और प्रदक्षिणा कर, अपना आसन उठा, पात्र चीवर ले, जिधर श्रावस्ती है, उधर रमत के लिए चल पड़े। रमत लगाते हुए क्रमशः, जहाँ श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन आराम में भगवान् विहार करते थे, वहाँ पहुँचे। पहुँच कर भगवान् का अभिवादन किया और एक ओर बैठ गए ।
एक ओर बैठे हुए, श्रायुष्मान् सोण ने भगवान् को कहा, भन्ते !
मेरे उपाध्याय .. भगवान् के चरणों पर शिर से प्रणाम करते हैं ..।"
भिक्षु ! कहो, कुशल तो है? रास्ते में बढ़ी हैरानी तो नहीं हुई? भिक्षा मिलने में दिक्कत तो नहीं हुई ?
भन्ते ! सब कुशल है। रास्ते में कोई हैरानी नहीं हुई। भिक्षा मिलने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई ।
तब, भगवान् ने आयुष्मान् आनन्द को आमन्त्रित किया, "श्रानन्द ! इस आगन्तुक भिक्षु को ठहरने का स्थान बता दो ।"
तब, आयुष्मान् आनन्द के मन में हुआ, "भगवान् ने जो मुझे इस श्रागन्तुक भिक्षु के ठहरने का स्थान बताने को कहा है सो मालूम होता है भगवान् इसे उसी विहार में ठहराना चाहते हैं जिसमें अपने स्वयं वास करते हैं।" अतः आयुष्मान् आनन्द ने आयुष्मान् सोण को उसी विहार में ठहरेने का स्थान बताया, जिसमें भगवान् स्वयं वास करते थे । तब, भगवान् बहुत रात तक खुले मैदान में बैठे रहने के बाद, पैर धोकर विहार में पैठे।
आयुष्मान् सोण भी बिहार में .. पैठे । तब, भगवान् ने रात के भिनसारे उठ, आयुष्मान् सोण को कहा, भिक्षु ! कहो, तुमने धर्म को कैसे समझा है।" "
"भन्ते ! बहुत अच्छा" कह, श्रायुष्मान् सोण भगवान् को उत्तर दे, सोलह अष्टकवगों को पूरा पूरा स्वर के साथ पढ़ गया ।
तब, भगवान् ने आयुष्मान् सोण के स्वर के साथ पढ़ जाने पर उसका अनुमोदन किया, "शावास ! भिक्षु, सोलह अष्टकवगों को तुमने अच्छा याद कर लिया है, उनका अच्छा धारण कर लिया है। तुम्हारे कहने का प्रकार बड़ा अच्छा है, खुला है, निर्दोष है, अर्थ को साफ साफ दिखा देने वाला है ।
भिक्षु, तुम्हारी क्या आयु' है ?
भन्ते ! मेरी आयु एक वर्ष * की है।
भिक्षु, तुमने इतनी देर क्यों की ?
भन्ते ! बहुत देर के बाद मैं सांसारिक काम गुणों का दोष समझ
सका । गृहस्थ-जीवन संकटो से भरा है, काम काज से छुट्टी नहीं मिलती, तरह तरह की रुकावटों से भरा है ।
इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“दिस्वा आदीनवं लोके, ञत्वा धम्मं निरूपधिं।
अरियो न रमती पापे, पापे न रमती सुचीति॥
“संसार के दोषों को देख, और परम पद निर्वाण को जान, आर्य जन पाप में नहीं रमते, शुद्ध जन पापे में नहीं रमते ॥
* भिक्षुओं की आयु उपसम्पदाकाल से जोड़ी जाती है, जन्म से नहीं ।
🌸 उदान ५.६,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
🌺सोण सुत्त 🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना।
एक समय, भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन आराम में विहार करते थे ।
उस समय, आयुष्मान् महाकात्यायन अवन्ती में कुररघर नामक पर्वत पर विहार कर रहे थे । उस समय 'सोण कोटिकर्ण' नामक उपासक वायुष्मान् महाकात्यायन की सेवा-टहल किया करता था ।
तब, उपासक 'सोणकोटिकर्ण' को एकान्त में ध्यान करते समय मन में यह वितर्क उठा, जैसे आर्य महाकात्यायन धर्मोपदेश करते हैं- घर दुआर में पड़े रह बिलकुल पूरा, शुद्ध, शङ्खलिखित ( "धोए हुए शङ्ख के समान शुद्ध) ब्रह्मचर्य का पालन करना सहज नहीं । तो मैं शिर दाढ़ी मुड़वा, कषाय वस्त्र पहन, घर से बेघर प्रव्रजित हो जाऊँ।
तब, उपासक सोणकोटिकर्ण, जहाँ आयुष्मान् महाकात्यायन थे, वहाँ गया और आयुष्मान् महाकात्यायन को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया । एक ओर बैठे हुए उपासक 'सोणकोटिकर्ण' ने आयुष्मान् महाकात्यायन को कहा, "भन्ते ! एकान्त में ध्यान करते समय मेरे मन में यह वितर्क उठा- जैसे आर्य महाकात्यायन धर्मोपदेश करते हैं- घर दुआर में पड़े रह बिलकुल पूरा, शुद्ध, शङ्खलिखित ( "धोए हुए शङ्ख के समान शुद्ध) ब्रह्मचर्य का पालन करना सहज नहीं । तो शिर दाढ़ी मुड़वा, कषाय वस्त्र पहन, मैं प्रब्रजित हो जाऊँ । सो आार्य महा कात्यायन ! मुझे प्रव्रजित करें।"
ऐसा कहने पर आयुष्मान् महाकात्यायन ने उपासक सोणकोटि- कर्ण को कहा, "सोण ! एक शाम भोजन कर जीवन भर ब्रह्मचर्य निभाना बढ़ा दुष्कर है। सुनो, गृहस्थ रहते हुए ही तुम नियमपूर्वक धर्मानुकूल केवल एक शाम भोजन कर ब्रह्मचर्य निभाने का अभ्यास करो ।
तब, उपासक सोणकोटिकर्ण को प्रब्रजित होने का, जो उत्साह था वह बिलकुल ढीला पड़ गया ।
दूसरी बार भी उपासक सोणकोटिकर्ण को एकान्त में ध्यान करते समय मन में यह वितर्क उठा, " .... मैं प्रव्रजित हो जाऊँ।"
तब, उपासक सोणकोटिकर्ण, जहाँ आयुष्मान् महाकात्यायन थे, वहाँ गया और आयुष्मान् महाकात्यायन को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया । एक ओर बैठे हुए उपासक 'सोणकोटिकर्ण' ने आयुष्मान् महाकात्यायन को कहा, "भन्ते ! एकान्त में ध्यान करते समय मेरे मन में यह वितर्क उठा- जैसे आर्य महाकात्यायन धर्मोपदेश करते हैं- घर दुआर में पड़े रह बिलकुल पूरा, शुद्ध, शङ्खलिखित ( "धोए हुए शङ्ख के समान शुद्ध) ब्रह्मचर्य का पालन करना सहज नहीं । तो शिर दाढ़ी मुड़वा, कषाय वस्त्र पहन, मैं प्रब्रजित हो जाऊँ । सो आार्य महा कात्यायन ! मुझे प्रव्रजित करें।"
ऐसा कहने पर आयुष्मान् महाकात्यायन ने उपासक सोणकोटि- कर्ण को कहा, "सोण ! एक शाम भोजन कर जीवन भर ब्रह्मचर्य निभाना बढ़ा दुष्कर है। सुनो, गृहस्थ रहते हुए ही तुम नियमपूर्वक धर्मानुकूल केवल एक शाम भोजन कर ब्रह्मचर्य निभाने का अभ्यास करो ।
तब, दूसरी बार भी उपासक सोणकोटिकर्ण का प्रब्रजित होने का जो उत्साह था वह बिलकुल ढीला पड़ गया।
तीसरी बार भी उपासक सोणकोटिकर्ण को एकान्त में ध्यान करते समय मन में यह वितर्क उठा, ... " मैं प्रव्रजित हो जाऊँ।"
तब, उपासक सोणकोटिकर्ण, जहाँ आयुष्मान् महाकात्यायन थे, वहाँ गया और आयुष्मान् महाकात्यायन को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया । एक ओर बैठे हुए उपासक 'सोणकोटिकर्ण' ने आयुष्मान् महाकात्यायन को कहा, "भन्ते ! एकान्त में ध्यान करते समय मेरे मन में यह वितर्क उठा- जैसे आर्य महाकात्यायन धर्मोपदेश करते हैं- घर दुआर में पड़े रह बिलकुल पूरा, शुद्ध, शङ्खलिखित ( "धोए हुए शङ्ख के समान शुद्ध) ब्रह्मचर्य का पालन करना सहज नहीं । तो शिर दाढ़ी मुड़वा, कषाय वस्त्र पहन, मैं प्रब्रजित हो जाऊँ । सो आार्य महा कात्यायन ! मुझे प्रव्रजित करें।"
तब, आयुष्मान् महाकात्यायन ने उपासक सोणकोटिकर्ण को प्रव्रजित किया ।
उस समय अवन्ति दक्षिणापथ में बहुत कम भिक्षु रहते थे । तब, आयुष्मान् महाकात्यायन ने वर्षा के तीन मास बीत जाने पर बड़ी कठिनाई से जैसे जैसे दश भिक्षुओं को इकट्ठा कर, आयुष्मान् सोण का उपसम्पदा-संस्कार किया ।
तब, वर्षावास करने पर आयुष्मान् सोण को एकान्त में ध्यान करते समय मन में यह वितर्क उठा, "मैंने भगवान् का दर्शन नहीं किया है, केवल सुना है कि वे ऐसे ऐसे हैं। यदि मेरे उपाध्याय अनुमति दें तो मैं जाकर अपनी आँखों भगवान् का दर्शन करूँ।
तब, साँझ में ध्यान से उठ आयुष्मान् सोण, जहाँ श्रायुष्मान् महा- कात्यायन थे, वहाँ गए और श्रायुष्मान् महाकात्यायन को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठे हुए आयुष्मान् सोण ने आयुष्मान् महाकात्यायन को कहा, " ... यदि उपाध्याय अनुमति दें तो मैं उन अर्हत् सम्यक् सम्बुद्ध भगवान् का दर्शन करने जाऊँ।"
७. भिक्षुओ ! फिर, महासमुद्र में अनेक रत्न भरे पड़े हैं। उसमें ये रत्न हैं, जैसे - मोती, मणि, वैर्य, शङ्ख, शिला, मूँगा, रजत, जातरूप, लोहिताङ्क, मसारगल्ल । महासमुद्र का यह सातवाँ आश्चर्य और अद्भुत धर्म है, जिसे देख देखकर असुर महासमुद्र में रमण करते हैं।
८. भिक्षुश्रो ! फिर, महासमुद्र में बड़े बड़े जीव रहते हैं। उसमें ये जीव रहते हैं, जैसे- तिमि, तिमिङ्गिल, तिमिरपिङ्गल, असुर, नाग, गन्धवं । महासमुद्र में सौ योजन भर लम्बे भी जीव हैं, दो, तीन, चार, पाँच सौ योजन भर लम्बे भी जीव हैं। महासमुद्र का यह आठवाँ आश्चर्य और अद्भुत धर्म है, जिसे देख देखकर असुर महासमुद्र में रमण करते हैं।
भिक्षुओ ! इसी प्रकार, इस धर्म विनय में आाठ आश्चर्य और अद्भुत धर्म हैं जिन्हें देख देख कर भिक्षु इस धर्म विनय में रमण करते हैं। कौन से आठ ?
१. भिक्षुओ ! जैसे महासमुद्र क्रमशः नीचा और गहरा होता गया है, वैसे हो इस धर्म विनय में शिक्षा, क्रिया, प्रतिपदा, सभी क्रमशः होते हैं। इस धर्म विनय का यह पहला आश्चर्य और अद्भुत धर्म है जिन्हें देख देख कर भिक्षु इस धर्म विनय में रमण करते हैं।
२. भिक्षुश्रो ! जैसे महासमुद्र स्थिर स्वभाव वाला हो अपनी वेला का उल्लंगन नहीं करता, वैसे ही मैंने अपने श्रावकों को जिन शिक्षा पदों का उपदेश किया है उनका वे प्राणों के निकल जाने पर भी उल्लंघन नहीं करते । इस धर्मविनय का यह दूसरा आश्चर्य और अद्भुत धर्म है जिन्हें देख देख कर भिक्षु इस धर्म विनय में रमण करते हैं। ।
३. भिक्षुओं ! जैसे महासमुद्र अपने में कोई मृतक शरीर नहीं रहने देता, वैसे ही जो पुरुष दुःशील है उसके साथ संघ नहीं रहता । इस धर्म-विनय का यह तीसरा आश्चर्य और अद्भुत धर्म है जिन्हें देख देख कर भिक्षु इस धर्म विनय में रमण करते हैं।
४. भिक्षुओ ! जैसे जितनी बड़ी-बड़ी नदियाँ हैं गङ्गा, यमुना,अचिरवती, सरभू ,मही- सभी 'महासमुद्र' के ही नाम से जानी जाती हैं । वैसे ही क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र- चारों वर्ण के जो लोग इस धर्म विनय में घर से बेघर होकर प्रब्रजित होते हैं, अपने पहले नाम और गोत्र को छोड़ सभी " श्रमण शाक्यपुत्र(बौद्ध भिक्षु)" इस एक नाम से जाने जाते हैं। यह चौथा आश्चर्य और अद्भुत धर्म है जिन्हें देख देख कर भिक्षु इस धर्म विनय में रमण करते हैं।
५. भिक्षुओ ! संसार में, जितनी नदियाँ हैं, सभी महासमुद्र में गिरती हैं - आकाश से धारायें भी गिरती हैं। जैसे उससे महा समुद्र की कुछ घटती बढ़ती नहीं होती, बैसे हो चाहे जितने भिक्षु निर्वाण पालें निर्वाण वही रहता है।यह पाँचवाँ आश्चर्य और अद्भुत धर्म है जिन्हें देख देख कर भिक्षु इस धर्म विनय में रमण करते हैं ।
६. भिक्षुओ ! जैसे महासमुद्र का खारापन एक ही रस, वैसे ही इस धर्म का केवल एक रस है - विमुक्ति-रस । यह छठा आश्चर्य और अद्भुत धर्म है जिन्हें देख देख कर भिक्षु इस धर्म विनय में रमण करते हैं। ।
७. भिक्षुओ ! जैसे महासमुद्र में अनेक रत्न भरे पड़े हैं, वैसे ही इस धर्म में अनेक रत्न भरे पड़े हैं, जैसे-चार स्मृतिप्रस्थान, सम्यक् प्रधान चार ऋद्धिपाद, पाँच इन्द्रियाँ, पाँच बल,सात बोध्यङ्घ, आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग ।यह सातवाँ आश्चर्य और अद्भुत धर्म है जिन्हें देख देख कर भिक्षु इस धर्म विनय में रमण करते हैं।
८. भिक्षुओ ! जैसे महासमुद्र में बड़े बड़े जीव रहते हैं वैसे ही इस धर्म विनय में बड़े बड़े जीव रहते हैं। वे बड़े बड़े जीव ये हैं. जैसे- स्रोतापन्न, स्रोतापित्त-फल की प्राप्ति के लिए मार्ग पर श्रारूढ़, सकृक्ष- गामी, सकृतागामी फल की प्राप्ति के लिए मार्ग पर श्रारूढ़, अनागामी, अनागामी-फल की प्राप्ति के लिए मार्ग पर आरूढ़, अर्हत्, अर्हत्-फल की प्राप्ति के लिए मार्ग पर आरूढ़ । यह आठवाँ धर्म आश्चर्य और अद्भुत धर्म है जिन्हें देख देख कर भिक्षु इस धर्म विनय में रमण करते हैं ।
भिक्षुओ ! इस धर्म विनय में यही आठ आश्चर्य और अद्भुत धर्म है, जिन्हें देख देख कर भिक्ष इस धर्म विनय में रमण करते हैं । इसे जान, उस समय भगवान् के मुँह से उदान के ये शब्द निकल पड़े-
“छन्नमतिवस्सति, विवटं नातिवस्सति।
तस्मा छन्नं विवरेथ, एवं तं नातिवस्सतीति॥
छिपा हुआ (पाप) लगा रहता है, खुला हुआ नहीं लगा रहता । इसलिए, छिपे को खोल दो, तब, वह नहीं लगा रहेगा। "
🌸 उदान ५.५ ,खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक 🌸
🌺उपोसथ सुत्त 🌺 #udana
ऐसा मैंने सुना।
एक समय भगवान् श्रावस्ती में मृगारमाता के पूर्वाराम प्रासाद में विहार करते थे। उस समय, उपोसथ के दिन भगवान् भिक्षु संघ के बीच बैठे थे ।
तब, रात का पहला याम निकल जाने पर, आयुष्मान् आनन्द आसन से उठ, चीवर को एक कंधे पर सँभाल, भगवान् की ओर हाथ जोड़कर बोले, "भन्ते ! रात का पहला याम निकल गया। बहुत देर से भिक्षु-संघ बैठा है। भगवान् भिक्षु-संघ को प्रातिमोक्ष का उपदेश करें।" ( आनन्द के) ऐसा कहने पर भगवान् चुप रहे।
दूसरी बार भी, रात का बिचला याम निकल जाने पर, आयुष्मान् आनन्द अपने आसन से उठ, चीवर को एक कंधे पर सम्हाल, भगवान् की ओर हाथ जोड़कर बोले, "भन्ते ! रात का बिचला याम निकल गया । बहुत देर से भिक्षु-संघ बैठा है। भगवान् भिक्षु-संघ को प्रातिमोक्ष का उपदेश करें ।"
दूसरी बार भी भगवान् चुप रहे ।
तीसरी बार भी, रात का पिछला याम निकल जाने और सूरज उठ जाने पर आयुष्मान् आनन्द अपने आसन से उठ, चीवर को एक कंधे पर सम्हाल, भगवान् की ओर हाथ जोड़कर बोले, "भन्ते ! रात का पिछला याम निकल गया, सूरज भी उठ गया। बहुत देर से भिक्षु संच बैठा ह । भगवान् भिक्षु संघ को प्रातिमोक्ष का उपदेश करें ।"
आनन्द ! यह भिक्षु-परिषद् अशुद्ध है ।
तब, आयुष्मान् महामौद्गल्यायन अपने चित्त से भिक्षु-परिषद् की चारों ओर से जाँच करने लगे। आयुष्मान् महामौद्गल्यायन ने उस
पुरुष को देख लिया जो दुःशील, पापी, घृणित और नीच आचारों वाला, छिपकर दुराचार करने वाला, नकली साधु, व्यभिचारी, सदाचार का ढोंग करने वाला, बुरे हृदय वाला, मूर्ख, और बेकार था। वह भिक्षु-संघ के बीच बैठा था ।
तब, आयुष्मान् महामौद्गल्यायन अपने आसन से उठ, जहाँ वह भिक्षु बैठा था, वहाँ गए और बोले, "श्रावुस ! उठो, भगवान् ने तुम्हें देख लिया है, तुम भिक्षुओं के साथ नहीं रह सकते।"
इसपर वह पुरुष चुप रहा ।
दूसरी बार भी, श्रायुष्मान् महामौद्गल्यायन बोले, “श्रावुस ! उठो, भगवान् ने तुम्हें देख लिया है, तुम भिक्षुओं के साथ नहीं रह सकते।" दूसरी बार भो, वह पुरुष चुप रहा ।
तीसरी बार भी, आयुष्मान् महामौद्गल्यायन बोल, "आवुस ! उठो, भगवान् ने तुम्हें देख लिया है, तुम भिक्षुओं के साथ नहीं रह सकते।" तीसरी बार भी, वह पुरुष चुप रहा ।
तव, आयुष्मान् महामौद्गल्यायन ने उस पुरुष की बाँह पकड़, उसे दरवाजे के बाहर निकाल दिया और किवाड़ बन्द कर बेड़ी लगा दी । तव, श्रायुष्मान् महामौद्गल्यायन, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गए और बोले, "भन्ते ! मैंने उस पुरुष को निकाल दिया। अब परिषद् शुद्ध हो गई । भन्ते ! भगवान् भिक्षु संघ को प्रातिमोक्ष का उपदेश करें।"
मौद्गल्यायन ! बड़ी विचित्र बात है ! बाँह पकड़े जाने तक वह मोध-पुरुष बैठा रहा। तब, भगवान् ने भिक्षुओं को आमन्त्रित किया, "भिक्षुश्रो ! अब, इसके बाद मैं उपोसथ नहीं करूँगा, प्रातिमोक्ष का उपदेश नहीं दूँगा। तुम लोग स्वयं उपोसथ कर लिया करना, स्वयं प्रातिमोक्ष का उपदेश दे लेना। भिक्षुश्रो ! यह बात सम्भव नहीं कि बुद्ध अशुद्ध परिषद् में उपोसथ करें और प्रातिमोक्ष का उपदेश दें ।
"भिक्षुओ ! महासमुद्र में आठ आश्चर्य और अद्भुत धर्म हैं, जिन्हें देख कर असुर महासमुद्र में रमण करते हैं-
१. भिक्षुओ ! महासमुद्र अत्यन्त क्रमशः नीचा और गहरा होता गया है। यह महासमुद्र का पहला आश्चर्य और अद्भुत धर्म है जिसे देख देखकर असुर महासमुद्र में रमण करते हैं।
२.भिक्षुओ ! फिर, महासमुद्र स्थिर स्वभाव वाला है; अपनी बेला का उल्लंघन नहीं करता। यह महासमुद्र का दूसरा आश्चर्य और अद्भुत धर्म है, जिसे देख देखकर असुर महासमुद्र में रमण करते हैं।
३. भिक्षुओ ! फिर, महासमुद्र अपने में कोई मृतक शरीर नहीं रहने देता। बीच में यदि कोई मृतक शरीर पड़ जाता है, तो समुद्र शीघ्र हो उसे किनारे लगाकर जमीन पर फेंक देता है। यह महासमुद्र का तीसरा श्राश्चर्य और अद्भुत धर्म है, जिसे देख देखकर असुर महासमुद्र में रमण करते हैं।
४. भिक्षुओ ! फिर, जितनी बड़ी बड़ी नदियाँ हैं- गङ्गा, यमुना,अचिरवती, सरभू ,मही- सभी महासमुद्र में गिरकर अपने पहले नाम और गोत्र को छोड़ देती हैं: सभी 'महासमुद्र' के ही नाम से जानी जाती हैं । महासमुद्र का यह चौथा आश्चर्य और अद्भुत धर्म है, जिसे देख देखकर असुर महासमुद्र में रमण करते हैं।
५. भिक्षुओ ! फिर, संसार में, जितनी नदियाँ हैं, सभी महासमुद्र में गिरती हैं - आकाश से धारायें भी गिरती हैं। इससे महासमुद्र की घटती बढ़ती कुछ नहीं होती। महासमुद्र का यह पाँचवाँ आश्चर्य और अद्भुत धर्म है, जिसे देख देखकर असुर महासमुद्र में रमण करते हैं।
६. भिक्षुओ ! फिर, महासमुद्र का एक ही रस है- खारापन ।
महासमुद्र का यह छठा श्राश्चर्य और अद्भुत धर्म है, जिसे देख देखकर असुर महासमुद्र में रमण करते हैं।
