ब्रह्मचर्य ही जीवन (हरीॐ)
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ब्रम्हचर्य पालन करने वालो के लिये विश्व का सर्वोत्तम टेलिग्राम चॅनल, यहा पर आपको ब्रम्हचर्य के बारे मैं सटीक और सही जानकारी मिलेगी लेख, pdf और पुस्तके | इस भारतवर्ष मैं फिर से ब्रम्हचर्य की महिमा का परिचय सबको कराये यही हमारा उद्देश है| #hastag
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We are very passionate about Reading and writing Quotes....
That's why we have Created a collection of Our bestest quotes in Some Quotes..
वीर्य को नष्ट करने वाला पुरुष कभी बच नहीं सकता और वीर्य को धारण करने वाला कभी अकाल में भी मर नहीं सकता।
न तपस्तप इत्याहु ब्रह्मचर्य तपोत्तमम्।
ऊर्ध्वरेता-भवेद्यम्तु से देवो न तु मानुषः॥
अर्थात् जननेन्द्रिय-संयम द्वारा मनुष्य देवताओं के गुण को प्राप्त हो जाता है, उसका दैहिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का पूर्ण विकास होता है।
“परिवर्तन के बिना प्रगति असंभव है। जो अपने
मन को नहीं बदल सकते, वे कुछ भी नहीं बदल
सकते।”
भीष्म अमित आत्मबल से सम्पन्न योद्धा थे उन्होने कृष्ण से कहा था आपको प्रतिज्ञा तोड़ने पर विवश कर दूंगा ओर गोविंद ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी क्योंकि भीष्म जैसे महान योद्धा के लिए स्वयं कृष्ण को
प्रतिज्ञा तोडनी पड़ी इससे पितामह युग युग मे अमर हो गए यह ब्रह्मचर्य का ही प्रताप था कि भीष्म पितामह १८० बर्ष की आयु में भी समस्त पांडवों पर भारी थे।, और अगर उन्हें कुशलतापूर्वक शरशय्या पर नहीं सुलाया जाता तो निश्चित ही पांडवों की हार होती,
ब्रह्मचर्य तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ तप हैं, इसलिए आप सब ब्रह्मचर्य पालन अवश्य करें।
कुछ मूर्ख लोग सोचते हैं की शादी (विवाह) न करना ब्रह्मचारी बनना है और भगवा वस्त्र पहन लेने और अपना नाम ब्रह्मचारी प्रचारित करवाने ले लेने से कोई ब्रह्मचारी नहीं हो जाता। कर्म ब्रह्मचर्य के नियम अनुसार हो तभी वो ब्रह्मचारी होता है। विवाह न करना और ब्रह्मचारी
कहलबाना मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं है।
पालो व्रत ब्रह्मचर्य विष्ण-वासनाएँ त्याग । ईश्वर के भक्त बनो जीवन जो प्यारा है ॥ उठिये प्रभातकाल रहिये प्रसन्नचित्त । तजो शोक चिन्ताएँ जो दुःख का पिटारा है । कीजिये व्यायाम नित्य भ्रात ! शक्ति अनुसार । नहीं इन नियमों पै किसीका इजारा' है ॥ देखिये सौ शरद औ' कीजिये सुकर्म प्रिय ! सदा स्वस्थ रहना ही कर्तव्य तुम्हारा है । लाँघ गया पवनसुत ब्रह्मचर्य से ही सिंधु । मेघनाद मार कीर्ति लखन कमायी है ।। लंका बीच अंगद ने जाँघ जब रोप दई । हटा नहीं सका जिसे कोई बलदायी है ॥ पाला व्रत ब्रह्मचर्य राममूर्ति, गामा ने भी । देश और विदेशों में नामवरी पायी है । भारत के वीरो ! तुम ऐसे वीर्यवान बनो । ब्रह्मचर्य महिमा तो वेदन में गायी है।
हमारी किसी से कोई जबरदस्ती नहीं है, आप सब स्वतंत्र है, लेकिन श्रेष्ठ जीवन के लिए, स्वस्थ्य जीवन के लिए, और दीर्घायु के लिए ब्रह्मचर्य ही एकमात्र विकल्प है।❤️
मनुष्य वास्तव में शरीर नहीं है। वह अनादि, अनंत, चैतन्य एवं आनन्दस्वरूप आत्मा है। उसमें अज्ञान अथवा दुष्प्रवृत्तियों का कोई विकार नहीं है। वह निर्विकार, एकरस, चेतन तत्त्व है, जिसको न तो शस्त्र । काट सकता है, न पानी गीला कर सकता है, न हवा । सुखा सकती है और न अग्नि जला सकती है। वह अपनी ज्योति से स्वयं प्रकाशवान ऐसा शिव एवं शाश्वत दीपक है, जिसको न तो विपरीतताएँ प्रभावित कर सकती हैं और न काल बुझा सकता है।
वीर्य के बारे में सारा संदेह मिटाना हो। तो अपने अनुभव पे चिंता करो। आज तक वीर्य नाश से तुम्हारा शरीर खराब हुआ या अच्छा। जवाब तुम्हे
खुद अंदर से मिल जायेगा।। बाहर तुम्हे किसी से और कही से जानने की जरूरत नहीं है। हर तरफ से गुमराह ही होगे। भगवान कि रची इस दुनिया में अनुभव से बड़ा ना कोई शिक्षक है और ना ही कोई
तथ्य।।
नेत्रों से अंधा तो मात्र आंखों से देख नहीं पाता । परन्तु कामवासना में अंधा तो बुद्धि , मन और इंद्रियों से विकलांग होता है ।
जो लोग वीर्य निकालते हैं और ये भी सोचते हैं कि वे जीवन में सफ़ल भी होंगे ये बिलकुल झूठी बात है क्योंकि ज़र्ज़र काया से जीत हासिल नहीं होती।
काम विकारो को दबा
देना ही इंन्द्रिय दमन है जिनका मन शुद्ध और
संयमी है वह अपने वीर्य
को रोक सकता है ।
'काम' और 'प्रेम' में अन्तर
इस संसार में एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से मृदुल नाता जोड़ने वाला जो मनोभाव है, उसी का नाम 'प्रेम' है। जैसे पृथ्वी का गुरुत्व आकर्षण चीज़ों को अपनी ओर आकर्षित करता है, वैसे ही एक व्यक्ति में दूसरे के प्रति जो आकर्षण होता है, उसी को ‘प्रेम' कहा जाता है। प्रेम ऐसी मनोस्थिति है अथवा एक ऐसा अनुभव है जो 'आनन्द' के अति निकट है, नहीं, नहीं, प्रेम तो आनन्द का सहगामी ही है अथवा आनन्द का उत्पादक ही है। यदि संसार में प्रेम न हो तो मनुष्य का जीना ही मुश्किल हो जायेगा क्योंकि तब मनुष्य किस लिए जीए, किसके साथ जीए ? अतः प्रेम जीवन को स्थिर रखने वाला, जीवन का सार है अथवा मनुष्य के मन को भाने वाला एक रस है ।
प्रेम ही का विरोधी मनोभाव घृणा है। घृणा से अनेकानेक अशान्तिकारी तथा दुःखोत्पादक संकल्प-विकल्प और विचार उत्पन्न होते हैं परन्तु प्रेम से मनुष्य के मन में एक-दूसरे के कल्याण की भावना पैदा होती है। प्रेम मनुष्य को दूसरे के लिए अपने सुख को त्यागने में भी सुख की अनुभूति करता है जबकि घृणा से मनुष्य के मन को एक दाह का अनुभव होता है और वह दूसरे के सम्बन्ध अथवा सम्पर्क को ही त्याग देना चाहता है। अतः प्रेम एक स्वाभाविक, आवश्यक और सात्विक गुण है। परमात्मा के प्रति मन में प्रेम का होना ही भक्ति तथा योग है। परमात्मा के प्रेम की एक बूँद प्राप्त करने के लिए भी प्रभु - प्रेमी व्यक्ति अपने जीवन की बाज़ी लगाने को तैयार हो जाता है। प्रेम एक बहुत ही उच्च, बहुत ही पवित्र गुण अथवा अनुभूति है । परन्तु मनुष्य ग़लती से इसके विकृत रूप को भी प्रेम मान बैठता है। वह मोह, काम और लोभ को भी 'प्रेम' समझ बैठता है। अतः वह इनकी दलदल में फँस कर जीवन को दुःखी - बना बैठता है।
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'काम' और 'प्रेम' में अन्तर
इस संसार में एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से मृदुल नाता जोड़ने वाला जो मनोभाव है, उसी का नाम 'प्रेम' है। जैसे पृथ्वी का गुरुत्व आकर्षण चीज़ों को अपनी ओर आकर्षित करता है, वैसे ही एक व्यक्ति में दूसरे के प्रति जो आकर्षण होता है, उसी को ‘प्रेम' कहा जाता है। प्रेम ऐसी मनोस्थिति है अथवा एक ऐसा अनुभव है जो 'आनन्द' के अति निकट है, नहीं, नहीं, प्रेम तो आनन्द का सहगामी ही है अथवा आनन्द का उत्पादक ही है। यदि संसार में प्रेम न हो तो मनुष्य का जीना ही मुश्किल हो जायेगा क्योंकि तब मनुष्य किस लिए जीए, किसके साथ जीए ? अतः प्रेम जीवन को स्थिर रखने वाला, जीवन का सार है अथवा मनुष्य के मन को भाने वाला एक रस है ।
प्रेम ही का विरोधी मनोभाव घृणा है। घृणा से अनेकानेक अशान्तिकारी तथा दुःखोत्पादक संकल्प-विकल्प और विचार उत्पन्न होते हैं परन्तु प्रेम से मनुष्य के मन में एक-दूसरे के कल्याण की भावना पैदा होती है। प्रेम मनुष्य को दूसरे के लिए अपने सुख को त्यागने में भी सुख की अनुभूति करता है जबकि घृणा से मनुष्य के मन को एक दाह का अनुभव होता है और वह दूसरे के सम्बन्ध अथवा सम्पर्क को ही त्याग देना चाहता है। अतः प्रेम एक स्वाभाविक, आवश्यक और सात्विक गुण है। परमात्मा के प्रति मन में प्रेम का होना ही भक्ति तथा योग है। परमात्मा के प्रेम की एक बूँद प्राप्त करने के लिए भी प्रभु - प्रेमी व्यक्ति अपने जीवन की बाज़ी लगाने को तैयार हो जाता है। प्रेम एक बहुत ही उच्च, बहुत ही पवित्र गुण अथवा अनुभूति है । परन्तु मनुष्य ग़लती से इसके विकृत रूप को भी प्रेम मान बैठता है। वह मोह, काम और लोभ को भी 'प्रेम' समझ बैठता है। अतः वह इनकी दलदल में फँस कर जीवन को दुःखी - बना बैठता है।
सांसारिक वस्तु से
मोह बस कुछ क्षण
भर का ही आनंद दे
सकता है, क्योंकि
सबकुछ नाशवान है. इस धरा पर।
वीर्यवान बड़े से बड़े कार्य
को करने के लिए आतुर
रहता है, ये आतुरता
वीर्यरक्षा से ही आती है ।
वीर्य तो खून से भी कही अधिक कीमती है और आप
लोग इसे नाले में पानी की
तरह बहाये जा रहे हो अपने आप को तबाह कर रहे हो।
वीर्य शरीर का तेल है । ये
शरीर रूपी गाड़ी चलने के लिए वीर्य रूपी तेल पीती । वीर्य की कमी होते ही । शरीर का इंजन बैठ जाता है।
