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उत्थान

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आध्यात्मिक उन्नति और व्यक्तिमत्व विकास के लिए प्रेरणादायक प्रसंग, सुविचार Motivational Incidents, Stories, Anecdotes for Personality Development and Spiritual Upliftment By Swami Aryananda Ramakrishna Mission Ponda Goa

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U-1276-01-04-25-Aryananda .mp33.99 MB

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मैं कार्य से कभी विरत नहीं होऊँगा... अमेरिका के स्वाधीनता दिवस ४ जुलाई को उनका महाप्रयाण हुआ; परन्तु क्या यह सचमुच का ही चले जाना - चिरनिर्वाण - पृथ्वी के लोगों के साथ चिरविच्छेद था? उनके जीवन तथा सन्देश से तो ऐसा नहीं लगता। एक समय उन्होंने कहा था, 'सम्भव है कि मैं इस शरीर को एक जीर्ण वस्त्र के समान छोड़कर बाहर आ जाना पसन्द करूँ, परन्तु मैं कार्य से कभी विरत नहीं होऊँगा। जब तक कि सम्पूर्ण जगत ईश्वर के साथ एकत्व की अनुभूति नहीं कर लेता, मैं सर्वत्र मानवमात्र के मन में प्रेरणा जगाता रहूँगा।' फिर मानो स्वयं को ही लक्ष्य कर वे चौथी जुलाई के प्रति लिख भी तो गए हैं! वक्त वह, हासिल निकाला काम का, प्यार का, पूजा का, जीवन-दान का, हाथ उठाया, सँवरकर पूरा किया। फिर तुम्हीं ने स्वस्ति की बाँधी कमर जनगणों पर मुक्ति की डाली किरण। देव चलते ही चलो बेरोकटोक, विश्व को दुपहर न जब तक घेर ले, कर तुम्हारा हर जमीं जब तक न दे स्त्री-पुरुष जब तक न देखें चाव से -बेड़ियाँ उनकी कटी, उल्लास की जाँ नई जब तक न समझें आ गयी। मैक्लाउड तथा निवेदिता ने स्वामीजी के स्वरूप के विषय में विचार किया था। मैक्लाउड कहती थीं कि वे 'मूर्तिमान शक्ति' थे और निवेदिता ने कहा था कि वे 'स्नेह की प्रतिमूर्ति' थे। भगवत्-पथ-संचारी सकारात्मक सक्रिय प्रीति एवं शक्ति के जीवन्त विग्रह युगनायक स्वामी विवेकानन्द विश्ववासियों के हृदय-द्वार पर अभिनव सन्देश लेकर उपस्थित हैं - कौन उन्हें वरण कर नवयुग के रूपायन को वेग प्रदान करेगा? ॐ श्री विवेकानंदार्पणमस्तु

U-1275-31-03-25-Aryananda .mp33.81 MB

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Sw Premananda to Sw Abhedananda .... स्वामीजी का मुखमण्डल क्या ही ज्योतिर्मय था ! उनके विस्फारित नेत्र क्या ही स्वर्गीय तेज से परिपूर्ण थे! उन्होंने केवल कौपीनमात्र धारण कर रखा था और उनके सुन्दर शरीर में एक अपूर्व कान्ति दृष्टिगोचर हो रही थी। अगले दिन भी उस मुखमण्डल का दर्शन कर अनेक लोगों का दुःख-शोक दूर हो गया था। ठीक मानो शिव ही सोए हुए हों! उनके किसी भी अंग में कोई भी विकृति नहीं थी। मानो स्वेच्छापूर्वक उन्होंने शरीर त्याग दिया हो। उस रात डाक्टर मजुमदार को बुलाकर लाया गया था। शरत्, राखाल तथा सान्याल भी रात में आए। डाक्टर भी ठीक बता न सका कि किस रोग से ऐसा हुआ। ठाकुर जो कहा करते थे, 'तू जिस दिन स्व-स्वरूप को जान लेगा, उसी दिन शरीर त्याग देगा।' वही हुआ! जिस स्थान पर दाह हुआ, वहाँ पर एक शिव मन्दिर तथा उसके सम्मुख एक नाट्य मन्दिर बनवाने की इच्छा है, थोड़ा-बहुत प्रयास भी हो रहा है। कलकत्ते के लोग भी एक स्मृति सभा आयोजित करने का प्रयास कर रहे हैं। मद्रास में ऐसी ही एक सभा हो गयी है। अर्थसंग्रह भी चल रहा है। राखाल भाई तुम्हें पत्र लिखते, परन्तु कुछ दिनों से उन्हें सर्दी और बुखार है। शरत् कलकत्ते गया हुआ है। हरि भाई को यहाँ आते ही ज्वर हुआ था। आजकल वे ठीक हैं। सारदा शीघ्र ही हरि भाई के स्थान पर अमेरिका जा रहा है, स्वामीजी ने पहले ही इसका बन्दोबस्त कर दिया था। हम लोगों में से जिसमें जितनी भी क्षमता है, वह तदनुसार स्वामीजी के कार्य की रक्षा करने का प्रयास करेगा। यही हम लोगों का संकल्प है। तुम कैसे हो लिखना। हमारा प्रेम तथा नमस्कार आदि स्वीकार करना। ...

U-1274-30-03-25-Aryananda .mp33.61 MB

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Sw Premananda to Sw Abhedananda एक बजे मुझे जगाकर वे बोले, 'चलो पढ़े। संन्यासी के लिए दिन की नींद अच्छी नहीं। मुझे आज निद्रा नहीं हुई। ध्यान करने के बाद से सिर में थोड़ी पीड़ा हो रही है। लगता है मेरा मस्तिष्क दुर्बल हो गया है।' फिर ग्रन्थालय के कक्ष में बैठकर उन्होंने तीन घण्टे तक पाणिनीय व्याकरण पढ़ाया। चार बजे के बाद वे मुझे साथ लेकर उद्यान के बाहर लगभग एक मील तक गए। एक उद्यान देखकर वे तुम लोगों के लेगेट साहब के उद्यान का वर्णन करने लगे। उस देश में मशीनों की सहायता से अल्प लोग भी बड़े बड़े उद्यानों को अत्यन्त साफ-सुथरा रखते हैं। साढ़े पाँच बजे मठ में लौटकर उन्होंने मुझे यूरोपीय सभ्यता का इतिहास बात की बात में समझा दिया और उसके बाद उपनिवेशों के इतिहास के बारे में बताने लगे। संध्या के समय मेरे मन्दिर में चले जाने पर, स्वामीजी हमारे शशि के पिता के साथ काफी देर तक बातें करके ऊपर गए। व्रजेन्द्र नामक पूर्वी बंगाल का एक लड़का उस समय उनके पास था ... (उसको) उन्होंने कहा, 'आज मेरा शरीर बड़ा हल्का प्रतीत हो रहा है। आज अच्छा हूँ।' अपने कमरे में बैठकर उन्होंने, 'मेरी माला दे' कहा और उसको यह कहकर दूसरे कमरे में भेज दिया कि 'बुलाने पर आ जाना'। लगभग एक घण्टे बाद उन्होंने उसको बुलाकर हवा करने तथा पाँव दबाने को कहा। पाँव दबाते दबाते उन्हें नींद आ गयी। लगभग आधे घण्टे सोने के बाद उनके हाथ में थोड़ा सा दो-चार सेकेण्ड के लिए कम्पन हुआ। इसके पश्चात् उन्होंने मुख से एक लम्बी साँस छोड़ी। इसके दो-एक मिनट बाद एक और दीर्घ निःश्वास छोड़ने के बाद उन्हें समाधि लग गयी। तब व्रजेन्द्र ने भय पाकर गोपाल दादा को बुलाया और कहा 'देखिए तो क्या हुआ।' इसके दो-एक मिनट बाद मैंने जाकर उन्हें महासमाधिस्थ देखा और शशी के पिताजी को बुलाकर स्वामीजी के कानों में श्री गुरु महाराज का नाम सुनाने को कहा कि कहीं इससे उनकी समाधि भंग हो।

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नम्र सूचना इस चैनल के अंतर्गत हम स्वामी विवेकानंद जी की जीवनी का अध्ययन कर रहे थे। इसके साथ ही उनके सुविचारों से (Quotes) भी हम लाभान्वित हो रहे थे। स्वामी जी की जीवनी कुछ ही दिनों में समाप्त होने वाली है। इसके बाद हम उनकी पावन स्मृतियों (Reminiscences of Swami Vivekananda) का अध्ययन करेंगे। किन-किन भारतीयों और पाश्चात्य लोगों ने लेख लिखे हैं इसकी सूची हम साथ में दे रहे हैं। यह सब सामग्री आपको अब व्हाट्सएप चैनल पर उपलब्ध होगी जिसकी लिंक है- https://whatsapp.com/channel/0029Vb65ONl6BIEgMkYmF33V

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Sw Premananda to Sw Abhedananda कार्य के चलते शरत् और राखाल दो-चार दिनों के लिए कलकत्ते में थे। पुराने लोगों में गोपाल दादा तथा मैं ही उस दिन मठ में उपस्थित थे। कोई बीमारी ही न थी, समझे न ? उस दिन प्रातःकाल उठकर जैसा कि उनका स्वभाव था, उन्होंने मेरे साथ कितना आमोद-प्रमोद किया ! जैसे गरम दूध तथा फल आदि खाते थे वैसे ही खाया और मुझे खिलाने के लिए कितना आग्रह किया! ... इसके बाद टहलते हुए मुझसे बोले, 'मेरी नकल मत करना। ठाकुर नकल करने से मना करते थे। मेरे समान अपव्ययी मत होना।' उसी वेद-विद्यालय को लेकर और भी अनेक बातें होने के बाद सुषुम्ना के विषय में वेद में क्या लिखा है यह देखकर वे बोले, 'टीका ठीक नहीं है, तुम लोग मूल से अर्थ लगाने का प्रयास करना।' लगभग साढ़े आठ बजे वे ध्यान करने को मन्दिर में गए। लगभग साढ़े नौ बजे पूजा करने को मैं भी मन्दिर में गया। मुझे देखकर वे बोले- 'मेरा आसन ठाकुर के शयनकक्ष में लगाकर चारों ओर के दरवाजे बन्द कर दे।' अन्य दिन मेरे पूजा करने पर भी स्वामीजी पूजाघर के ही एक कोने में बैठकर ध्यान करते थे, परन्तु उस दिन उन्होंने अन्य प्रकार से किया। लगभग ११ बजे के बाद ध्यान से उठकर वे गुनगुनाते हुए - 'मा कि आमार कालो, कालरूपा एलोकेशी हृदिपद्म करे आलो' - यह भजन गाने लगे। भोजन का समय हो जाने पर उन्होंने बड़ी तृप्ति के साथ खाना खाया और बोले, 'एकादशी करके भूख बहुत बढ़ गयी है, लोटे तथा कटोरियों को बड़े कष्ट से छोड़ सका हूँ।' भोजन के बाद विविध प्रकार की बातें करके उन्होंने थोड़ा सा विश्राम किया।

U-1270-26-03-25-Aryananda .mp32.98 MB

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Sw Premananda to Sw Abhedananda बेलुड़ मठ २० अगस्त, १९०२ भाई काली, हम लोग इस समय जीते हुए भी मानो मृत के समान हो गए हैं। वह शक्ति, वह उत्साहपूर्ण आदेश और वह उदार भाव की चर्चा अब यहाँ नहीं है! वैद्यकी चिकित्सा से उनके स्वास्थ्य में काफी सुधार आ गया था। उन्हें विशेष कोई बीमारी न थी। अपनी इच्छा से ही उन्होंने शरीर को छोड़ दिया। लगभग दो महीने से वे लड़कों के द्वारा नियमित रूप से ध्यान-भजन कराते और स्वयं भी उसमें सम्मिलित होते। कुछ दिनों से उनमें वैराग्य का भाव खूब प्रबल दीख रहा था। 'किमर्थ कस्य कामाय शरीरं अनुसंजरेत्'- प्रायः वे इसी श्लोक को दुहराते और पूछते, 'क्यों जी, ठाकुर अन्तिम दिनों में कौन से दो भजन सुनना पसन्द करते थे?' यह कहकर वे 'भुवन भुलाइलि मा भवमोहिनी' तथा 'कबे समाधि हबो श्यामा चरणे' आदि भजन गाने लगते। तुम तो जानते ही हो कि कामकाज के भाव का उनमें कभी अभाव न था। १०-१५ दिनों पूर्व ही उन्होंने तारक दा को काशी में एक आश्रम खोलने भेजा था। कुछ दिनों से मठ में एक वेद-विद्यालय स्थापन करने की उनकी इच्छा भी खूब प्रबल हो उठी थी। अन्तिम दिन भी वेद से सम्बन्धित ग्रन्थ मँगवाने के लिए पूना और बम्बई को तीन पत्र लिखे गए। मेरे साथ उस दिन वेद-विद्यालय के विषय में कितनी ही बातें हुई थी। मैंने पूछा, 'वेद पढ़कर क्या होगा?' वे बोले, 'वेद पढ़ने से अन्धविश्वास दूर होंगे।'

Sw Saradananda to Sw Abhedananda संध्या के पश्चात् वे अपने कमरे में जाकर माला लिए जप करने बैठे और बोले, 'जब तक न बुलाऊँ, दूसरे कमरे में जाकर जप-ध्यान कर।' एक घण्टे बाद बुलाकर वे लेट गए और ध्यान करने लगे। एक ब्रह्मचारी निकट बैठकर हवा करने लगे। लगभग एक घण्टा इसी प्रकार स्थिर भाव से चित लेटे रहने के बाद उनके दाहिने हाथ में थोड़ा सा कम्पन हुआ और मस्तक पर बूँद बूँद कर पसीना आने लगा। दो मिनट इसी प्रकार होने के बाद उन्होंने मुख से एक लम्बी साँस छोड़ी। तदुपरान्त दो मिनट तक पुनः स्थिर रहकर उन्होंने और भी एक लम्बी साँस छोड़ी और इसके साथ ही उनका सिर हिल उठा, नेत्र भौंहों के बीच स्थिर हो गये तथा मुख पर अपूर्व ज्योति एवं हास्य दीख पड़ी। ऐसा होते देख मठ के सभी को बुला लिया गया और सबने देखा कि हाथ-पाँव ठण्डे हो चुके हैं तथा नाड़ी नहीं है। डाक्टर को बुला भेजा गया; डाक्टर मजुमदार ने आकर कहा- उन्होंने शरीर त्याग दिया है। अगले दिन अपराह्न में चार बजे शरीर को अग्निसात् किया गया। अन्त तक उनके मुख पर वह अपूर्व भाव था, जिसने भी देखा मुग्ध हो गया था! उनके समाधि-स्थल पर एक मन्दिर निर्माण कराने की बात है। यदि तुम्हारे मित्रगण इस विषय में सहायता कर सकें तो भेजना। अपना कार्य पूरा करके वे चले गए। वे जो कार्य आरम्भ कर गए हैं; अब उसे तुम, राखाल आदि सब मिलकर जारी रखने का उपाय करना। हरि भाई स्वामीजी के देहत्याग के १५ दिन बाद यहाँ पहुँच गए। उनके मन की जैसी अवस्था हो गई है, वह तो तुम समझ ही रहे हो। वे बिल्कुल ही हताश हो गए है।

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Sw Saradananda to Sw Abhedananda नदिया जिला में स्थित इस ग्राम में स्वामीजी ने अपनी शिष्या श्रीमती मृणालिनी वसु के मकान पर लगभग एक सप्ताह निवास किया था। ४ जुलाई को प्रातःकाल मन्दिर में जाकर उन्होंने तीन घण्टों तक ध्यान किया। दो-चार दिनों पूर्व उन्होंने राखाल से कहा था, "इस बार जो भी हो, एक कुछ कर डालूंगा; या तो जप-ध्यान के द्वारा शरीर को सुधार कर भलीभाँति कार्य में लग जाऊँगा, और नहीं तो इस जीर्ण शरीर को त्याग दूँगा।" अन्य दिन वे सबके साथ बैठकर जप-ध्यान करते थे, परन्तु उस दिन उन्होंने ठाकुर के शयनकक्ष में अकेले बैठकर ध्यान किया। तदुपरान्त उन्होंने ठाकुर का बिस्तर अपने हाथ से झाड़ दिया और नीचे उतर आए। फिर सबके साथ बैठकर उन्होंने बड़े रुचिपूर्वक भोजन किया। भोजन के बाद एक घण्टा विश्राम करके उन्होंने सबको बुलाकर व्याकरण तथा योग के विषय में दो घण्टे तक शिक्षा दी। यजुर्वेद के 'सुषुम्नः सूर्यवर्चसः' इन पद की टीका ठीक नहीं हुई है, कहकर उन्होंने स्वयं ही उस पद की व्याख्या करके सबको बताया। फिर ४ से ५ बजे तक वे बाबूराम के साथ मठ के बाहर जाकर दो मील घूम आए। टहलते समय उन्होंने पृथ्वी की समस्त जातियों में सभ्यता का कैसे विकास हुआ इससे सम्बन्धित इतिहास उन्हें कथा के रूप में बताया। लौटकर वे बोले, 'आज शरीर जैसा स्वस्थ लग रहा है, वैसा काफी दिनों से कभी नहीं लगा। ...'