प्रेम, सेक्स और धोखा ( कामसूत्र )
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प्रेम और काम क्या जरूरी हैं जीवन में ? एक जाल सबसे कठिन और शक्त जाल ना कोई बचा है ना कोई बचेगा। आइए जानते है...साथ में शेरों शायरी का भी आनंद लीजिए।
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फागुन जाने में दो दिन और है, ऐसे में कामसूत्र और रति रहस्य के अध्ययन के पश्चात एक टिप्स स्तंभन के ऊपर लिख दे रहा हूँ।
सर्वप्रथम पुरुष स्त्री के साथ केलि क्रिया करके उसे प्रणय के लिए सज्जित करे। केलि क्रिया में मर्दन, दंत काटन, चुम्बन, नख क्षत, गुह्य अंगों का स्पर्श आदि करके स्त्री को प्रणय के लिए सज्जित करे। तत्पश्चात विपरीत रति क्रिया में स्वयं को थोड़ा निश्चेष्ट छोड़ दे और अपनी सांसों को धीमा करके उस पर ध्यान केंद्रित करे। इस क्रिया के कारण उसकी उत्तेजना में शिथिलता आयेगी और स्त्री का चरमोत्कर्ष उससे पहले होगा। स्त्री के चर्मोत्सर्ग के पश्चात आसन परिवर्तित करके पुरुष प्रबल पौरुष के साथ रति क्रिया करे।
फागुन पर अन्तिम पोस्ट है।
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कामसूत्र पढ़कर इतना समझ आया कि संतानोत्पत्ति के लिए ही अपने वर्ण की कन्या का विधान था। अभिसार के लिए बन्धन इतने कड़े नहीं थे। इसे मैंने ग्राम्य जीवन में देखा भी है।
जिनकी काम पिपासा प्रबल हो, वो किसी भी वर्ण के साथ सहवास कर लें किन्तु संतानोत्पत्ति के लिए अपने ही वर्ण के साथी का चुनाव करें।
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काम शास्त्र और कोक शास्त्र,,, एक परिचय!
प्रथम चैप्टर, सहवास के चार चरण,,
पुरुष वर्ग,, एक,, कामेच्छा,, दिमाग में होती है और पुरुष पहल करता है! दो,,, प्राइवेट पार्ट में तनाव,, अच्छा तनाव आना आवश्यक! तीन,, प्रवेश,, अच्छे तनाव से महिला के प्राइवेट पार्ट में आसानी से प्रवेश!चार,, क्लाइमेक्स, डिस्चार्ज,,चरम सुख में सीमेन डिस्चार्ज!
महिला वर्ग,, एक,, सेक्स की इच्छा,, पुरुष से दोगुनी पर पहल नहीं, सहयोग करती! दो,, प्राइवेट पार्ट में गीलापन,, महिला के प्राइवेट पार्ट में गीलापन आवश्यक! तीन,, प्रवेश,, आसानी से!चार,,चरम सुख की अनुभूति का अहसास यानी बस,, अब और नहीं,, स्त्राव का आना।,,,,,, सेक्सोलॉजिस्ट के सौजन्य से
द्वितीय चैप्टर,,,, काम क्रीड़ा तीन तरह से,,, एक,, फोरप्ले,, सहवास से पहले फोरप्ले यानी महिला पार्टनर को तैयार करना, बातें से चूसने, चूमने दवाने से जिससे उसके प्राइवेट पार्ट में गीलापन आए! दो,, प्ले,,एक्टिविली सहवास महिला और पुरुष द्वारा! पुरुष एक्टिविटी धीरे धीरे और रूक रूक कर करे जिससे महिला पहले क्लाइमेक्स पर पहुंचे। तीन,,, आफ्टर प्ले,, सहवास खत्म करने के बाद पांच दस मिनट तक आपसी प्रेम प्यार करें। खत्म करके किनारे पर ना हो। पुरुष अपने पार्टनर को कपड़े पहनने में सहयोग करे! बहुत आवश्यक!,,, सेक्सोलॉजिस्ट के सौजन्य से!
तृतीय चैप्टर,,,,, सहवास की काम कलाएं,,,, कोकशास्त्र के अनुसार चौरासी आसान या कामकलाएं!
सबसे ज्यादा प्रचलित,, पुरुष पार्टनर द्वारा,, एक,,डोगी स्टाईल! दो,, महिला बोटम में,उसकी टांगें चौड़ी करके सहवास पुरुष पार्टनर ऊपर!
तीन,, महिला बोटम में, उसकी टांगें पुरुष के कंधों पर रख सहवास पुरुष पार्टनर ऊपर!चार महिला बोटम में चित्त या पटृ, उसके नीचे तकिया लगा कर सहवास पुरुष पार्टनर ऊपर।इन चारों में पुरुष पार्टनर पूरी तरह से एक्टिव!
महिला पार्टनर द्वारा ,,, एक,,,पुरुष बोटम में चित्त लेट कर, महिला उसके ऊपर आगे या पीछे मुंह करके सहवास!सारी एक्टिविटी महिला पार्टनर द्वारा ! दो,, पुरुष नीचे बोटम कुर्सी पर बैठ, अपने ऊपर आगे मुंह करके महिला का बैठ कर सहवास सारी एक्टिविटी महिला द्वारा!
इन दोनों पोजीशन में पुरुष को डिस्चार्ज नहीं होना और ना ही कोई एक्टिविटी करनी।
कोकशास्त्र के सौजन्य से!
चतुर्थ चैप्टर,,,, सहवास के तरीके,,,, एक,, बिना कंडोम स्किन टू स्किन सहवास! दो,,विड्रावल प्रेक्टिस डिस्चार्ज के समय! तीन,, कंडोम लगाकर सहवास!चार,,, सिक्स नाइन पोजीशन! पांच,,,मुख मैथुन!छह,,, हस्तमैथुन मस्टरबेशन!सात,,,गुदा मैथुन,,, तीन गुना हार्ड, नारियल तेल इस्तेमाल कर सकते,,धीरे धीरे आगे बढ़ना!
सेक्सोलॉजिस्ट के सौजन्य से!
पंचम चैप्टर,,, मिसलेनियस या अन्य कोई, आदि इत्यादि,, कंडोम का इस्तेमाल गर्भ निरोधक और गुदा मैथुन के लिए,! उंगलियों का इस्तेमाल सबसे अच्छा महिलाओं के मस्टरबेशन के लिए। सिलिकॉन टायज का मस्टरबेशन के लिए अच्छा। गाजर खीरा ककड़ी आदि का इस्तेमाल भी प्रचलित मगर कीटाणु की वजह आदि से नुकसान दायक। अगर करना है अच्छे से साफ सुथरा करके करें और मुमकिन हो तो ऊपर कंडोम लगा लें! अगर पुरुष पार्टनर महिला के प्राइवेट पार्ट में फोरप्ले करके गीलापन नहीं लाता है तो महिलाएं नारियल तेल और तिल का तेल इस्तेमाल करें हर हालत में महिला के प्राइवेट पार्ट में सहवास से पहले गीलापन आना चाहिए वरना छिल जायेगी और इंन्फैक्शन होने की संभावना है। सरसों तेल भी इस्तेमाल में महिलाएं ला सकती है,यह प्राइवेट पार्ट को चिकना रखता और टाइट भी करता है और इंन्फैक्शन से दूर रखता है
एनबीटी गोल्ड जस्ट जिंदगी के एक्सपर्ट पैनल के सौजन्य से।
,, अशोभनीय टिप्पणी और तर्क वितर्क से बचें
,,यह सिर्फ जानकारी देने का प्रयास भर है
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वर्षों पहले मिला था जिनसे,
जिनका सब कुछ भाया था!
चहिये जो महबूब में खूबी,
वह सब उनमें पाया था!
लंबी जुल्फें घनी घटा सी,
बिखरी- बिखरी रहती थी!
मतवाली आंखें बिन बोले,
सच माने सब कहती थी!
चंद्रमुखी कहना अनुचित था,
दाग न था उनमें कोई!
नयन देख कर यूँ लगता था,
दुनियाँ है इनमें खोई!
हिरनी जैसी चाल निराली,
गालों पर लज्जा की लाली!
कोयल जैसा मीठा स्वर था,
किंतु लबों पर कड़वी गाली!
बस मुझसे अब यह मत पूछो,
उनसे क्या-क्या झड़ता था?
वह रहस्य तो उन्हें पता था,
जिन पर वो सब पड़ता था!
महारथी सब हुए पराजित,
रण के प्रणय निवेदन में!
ना जाने कितने गुलाब,
मुर्झाये थे कितने मन में!
मुझसे तो उनकी बनती थी,
अपना वो मुझको कहते थे!
स्नेह की सरिता पास थी मेरे,
फिर भी हम प्यासे रहते थे!
एक रोज एकांत मिले वो,
उन्हें देख दिल हर्षाया,
मंद- मंद मुस्कान लिये मैं
हिम्मत कर उन तक आया!
ले गुलाब हाथों में पहुँचा,
जहाँ थी बैठी छुईमुई!
उठ जा भाई तभी जोर से,
गूंज उठी आवाज कोई!
जो गुलाब उनको देना था,
वह हाथों से छूट गया!
मैं प्रपोज कर ही देता कि,
मित्रों सपना टूट गया!
इस कविता का संबंध जिन-जिन सज्जनों से हो कृपया स्वीकार करने में संकोच न करें 🙂
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14 फरवरी को आने वाले "#वेलेंटाइन_डे" की अभी से शुभ कामनाएँ
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ईसा की तीसरी शताब्दी के बाद की बात है यूरोप के लोग कुत्तों आदि जानवरों की तरह यौन सम्बन्ध रखते थे, कहीं कोई नैतिकता नहीं थी| ऐसे समय में रोम में वेलेंटाइन नाम के एक पादरी ने कहना आरम्भ किया कि यह अच्छी बात नहीं है| पादरी वेलेंटाइन ने लोगों को सिखाना शुरू किया कि एक प्रेमी या प्रेमिका चुन कर सिर्फ उसी से प्यार करो और उसी से शारीरिक संबंध बनाओ, विवाह करो आदि आदि| वे रोम में घूम घूम कर लोगों को प्रेमी/प्रेमिका चुनने और विवाह करने का उपदेश देते थे| उन्होंने प्रेमी प्रेमिकाओं का विवाह कराना शुरू कर दिया जिससे वहाँ के लोग नाराज़ हो गए, क्योंकि वहाँ के समाज में बिना विवाह के रखैलें रखना शान समझी जाती थीं और स्त्री का स्थान मात्र एक भोग की वस्तु था|
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रोम के राजा क्लोडियस ने उन सब जोड़ों को एकत्र किया जिनका विवाह वेलेंटाइन ने कराया था और १४ फरवरी ४९८ ई. को उसे सबके सामने खुले मैदान में फाँसी दे दी| उसका अपराध था कि वे स्त्री-पुरुषों का विवाह करवाते थे| उस वैलेंटाइन की दुखद याद में 14 फ़रवरी को वहाँ के प्रेमी प्रेमिकाओं ने वैलेंटाइन डे मनाना शुरू किया जो उस दिन से यूरोप में मनाया जाता है|
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भारत में लड़के-लड़िकयाँ बिना सोचे-समझे एक दुसरे को वैलेंटाइन डे का कार्ड दे रहे हैं| कार्ड में लिखा होता है " Would You Be My Valentine" जिसका मतलब होता है "क्या आप मुझसे शादी करेंगे"|
मतलब तो किसी को मालूम होता नहीं है, वे समझते हैं कि जिससे हम प्यार करते हैं उन्हें ये कार्ड दे देना चाहिए| इसी कार्ड को वे अपने माँ-बाप और दादा-दादी को भी दे देते हैं| एक दो नहीं दस-बीस लोगों को भी यह कार्ड वे दे देते हैं|
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इस धंधे में बड़ी-बड़ी कंपनियाँ लग गयी हैं जिनको कार्ड बेचना है, जिनको गिफ्ट बेचना है, जिनको चाकलेट बेचनी हैं और टेलीविजन चैनल वालों ने इसका धुआधार प्रचार कर दिया है| अरे प्यारे बच्चो कुछ नकल में भी अकल रखो| इससे अच्छा तो है कि इस दिन को मातृ-पितृ पूजा दिवस के रूप में ही मनाओ| प्रेम ही करना ही तो भगवान से करो| भारत में बड़े बड़े प्रभुप्रेमी हुए हैं, उन्हें याद करो|
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वेलेंटाइन सप्ताह ७ फरवरी से शुरू होता है| प्रेम-विवाह करने वाले आरम्भ के चार दिन दोस्ती करते हैं| पाँचवे दिन यानी ११ फरवरी को "प्रोमिज़ डे" मनाया जाता है| इस दिन जीवन भर साथ निभाने का वादा करते हैं| १२ फरवरी को "हग डे" यानि आलिंगन दिवस, और १३ फरवरी को "किस डे" यानि चुम्बन दिवस मनाते हैं| १४ फरवरी को वेलेंटाइन डे यानि वेलेंटाइन दिवस कहलाता है जिस दिन प्रेम विवाह करते हैं|
पुनश्चः: भगवान सभी वेलेंटाइनों को सद्बुद्धि दे| शुभ वेलेंटाइन दिवस !!!!!
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गुलाब!
एक ठेठ देहात का व्यक्ति जो सरसों के फूलों से भरे खेत देख कर झूमता हो, उसके लिए बड़ा कठिन है गुलाब को फूलों का राजा मान लेना। पर गुलाब राजा है तो है, इसके विरुद्ध आंदोलन करने से उसका राज संकट में थोड़े आएगा...
सरसो और गुलाब दोनों का रङ्ग प्रेम का रङ्ग है, बस सरसो के पीतवर्ण में प्रेम के साथ साथ एक पवित्र आभा होती है, जो गुलाब में नहीं होती। गुलाब देख कर आंखें चहक उठती हैं, सरसो के फूलों पर मन चहक उठता है।
प्रेम भी दो रङ्ग का होता हैं। प्रेम जब पूर्णता भर दे तो आंखे बंद हो जाती हैं, तब उसका रंग पवित्र पीत हो जाता है। हल्दी, सरसो, गेंदा की तरह... तब प्रेमी अपने प्रिय का नाम सुन कर ही आनन्द में डूब जाता है। और प्रेम जब उन्मत्त कर दे तो उसका रंग गुलाबी हो जाता है। तब प्रेमी मरीचिका में फंसे मृग की तरह दौड़ दौड़ कर प्रिय को ढूंढने लगता है। उसे पाने का हर जतन करने लगता है। आजकल गुलाब के रंग वाले प्रेम का फैशन है।
गुलाब अधिक लुभावना होता है। उसका आकर्षण अधिक तीव्र होता है, छुरी की तरह धारदार... वह अपनी ओर जबरन खींच लेता है। जिस चीज में आकर्षण बहुत अधिक हो, समझ जाना चाहिए कि वह भ्रम है। सत्य कभी बहुत आकर्षक नहीं होता।
सरसो के फूल उस हल्दी से नहाई हुई लड़की की तरह लगते हैं जिसका लग्न चढ़ गया हो। या समधियाने से मिली पियरी धोती पहन कर इठलाते उस बुजुर्ग की तरह, जो मुस्कुरा कर बताए कि धोती समधिन अपने हाथ से रंग कर भेजी हैं। या तीन दिन पहले ही विदा हो कर आई नई दुल्हन की तरह, जो पीली चुंदरी पहने अपने आंगन में पायल की रुनझुन से सौभाग्य विखेरती चलती है।
गुलाब का सौंदर्य थोड़ा चटक है। आंखें चुंधिया जाती हैं उसके रङ्ग से... जैसे रेड कार्पेट पर लाल गाउन पहन कर चलती कोई हॉलिवुड की हिरोइन हो! या जैसे गुलाबी साड़ी पहन कर निकलती कोई राजकुमारी, जिसकी ओर आंख उठा कर देखने पर सर कलम कर देने की सजा निर्धारित हो। उसके सौंदर्य में विशिष्टता का दम्भ है। कुल मिला कर गुलाब फूलों का राजकुमार है।
गुलाब सामर्थ्यवान लोगों को बहुत पसंद आता है। नेहरू जी हमेशा अपने कोट में गुलाब खोंसते थे। शाहजहां की बेटी मेहरुन्निसा खुद को गुलाब कहती थी। सारी मुगल शाहजादियाँ गुलाब के इश्क में डूबी रहती थीं। राजा महाराजाओं के बाग पाटल पुष्पों से लदे रहते थे। हमारे राष्ट्रपति भवन का गार्डन भी भांति भांति के गुलाबों से भरा पड़ा है।
मैं सोचता हूँ कि आखिर सामान्य जन गुलाब पर इतना मोहित क्यों रहता है, जबकि गुलाब सामान्य जन की पहुँच से हमेशा बाहर ही रहा है। शायद पहुँच से दूर होना ही गुलाब के आकर्षण का मुख्य कारण है। जो चीज आसानी से नहीं मिलती वह बहुत सुन्दर लगती है। जैसे दूर के ढोल सुहावने होते हैं...
आजकल पचास रुपये में मिलता है एक गुलाब! उस समय जब गेहूं चौदह रुपये किलो बिकता है। मतलब एक गुलाब चार किलो गेंहू के बराबर है। बात केवल गुलाब की ही नहीं है, व्यक्ति अपना सौंदर्य बेचना सीख जाय तो उससे अधिक महंगा कुछ नहीं बिकता। गुलाब क्यों न बिके...
चर्चा है कि आज रोज डे है। प्रेयसी को गुलाब देने की अंग्रेजी प्रथा का दिन... किशोरावस्था के दिनों में मेरी कोई प्रेयसी रही होती तो उसका हाथ पकड़ कर खिली हुई सरसो के खेतों में घूमता। इससे अधिक सुंदर कुछ भी नहीं।
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यूँ तो हम भी कोई बहुत पुरानी चीज नहीं हुए, पर वे दिन जरूर पुराने थे जब किसी के मुस्कुराने का मतलब 'इश्क' हुआ करता था। वे ऐसे जल्दबाज दिन थे कि आम में मोजर भले दस दिनों बाद लगें, पर हृदय फागुन चढ़ने के पखवाड़े भर पहले से ही महकने लगता था।
जिन्दगी की फटफटिया किसी रेड-लाइट पर खड़ी हो तो पीछे मुड़ कर देखने पर दिखता है वह मासूस किशोर, जो कभी-कभी स्कूल से घर आने के क्रम में यह सोच कर चार किलोमीटर अधिक साइकिल रगड़ देता था कि कुछ भी हो आज जाएंगे उसके गाँव की राह से ही...
मनोविज्ञान के धुरंधर पता नहीं इस तर्क को स्वीकार करेंगे या नहीं, पर उन दिनों लगता था कि 'उसके' गाँव के खिलाफ मैच में जीरो पर आउट हो जाना ही प्रेम है। साला हमारे रहते उसका गाँव हार जाय तो काहे के हम, और काहे का प्रेम? इसी चक्कर में चार बार जीरो पर आउट हुए थे तब! नहीं तो आज भी आँख मूँद कर बैट भाँज दें साला छक्का जाएगा...
प्रेम की सबसे सुन्दर कहानियां कभी लिखी नहीं गयीं। लिखी गयी होतीं तो वह लड़का महानायक होता जो नौंवी के रिजल्ट की रात को यह सोच कर तकिए में मुँह छिपा कर रोया था, कि काश! हम फर्स्ट नहीं आये होते तो वह क्लास टॉप कर जाती...
सच पूछिए तो पक्का प्रेम गाँवों में ही होता था! और वह भी तब, जब हाथों में मोबाइल नहीं हुआ करते थे। तब हथेली पर कलेजा ले कर चलते थे लड़के... माटी के लड़के, माटी की लड़कियाँ... सरसो के फूल जैसी लड़कियाँ, बाजरे के डंठल जैसे लड़के... गाँव के हर खेत को अपने बाप का खेत समझ कर उसमें से साग खोंट लेने वाली प्यारी लड़कियाँ, और दूसरे के खेत में भी चरती बकरी को देखते ही साइकिल रोक कर दु-चार गारी हउँक देने वाले लंठ लड़के...
पता नहीं वह कौन गीतकार था जिसने लिखा था, "खता तो तब है जब हाले-दिल किसी से कहें, किसी को चाहते रहना कोई खता तो नहीं..." गाँव के नब्बे प्रतिशत प्रेमियों ने इसे ही तेलहवा बाबा का मन्तर समझ लिया था तब! मैट्रिक की परीक्षा से तीन दिन पहले काली माई से फर्स्ट डिविजन मांगते समय मुँह से जिसका नाम अनायास ही बार-बार निकल जाता हो, मजाल कि उसे पता भी चल जाय! कब्बो ना... साला खजुअट जैसी दुर्दांत बीमारी तक तो किसी को पता नहीं चलने देते थे लड़के, प्रेम भला क्या पता चले...
अच्छा, कुछ इच्छाएँ बड़ी पवित्र होती हैं। जैसे उसके मुँह से यह सुन लेने की इच्छा, कि तुम बड़ा सुन्दर लिखते हो! तब क्लास में सबने कहा था, सिवाय उसके... ठीक भी है, बच्चन ने लिखा था, "पा जाता तो हाय न इतनी प्यारी लगती मधुशाला..." कुछ इच्छाओं का अपूर्ण रह जाना ही ठीक होता है।
हाँ तो बात तब की थी जब 'प्रेम' आँख के लोर की तरह पवित्र हुआ करता था। हाँ, तबकी बात जब प्रेम में प्रदूषण नहीं था। छोड़िये भी! अब कौन सुनता है...
सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार
(लेख में लेखक को न तलाशें, सब कल्पना है। इसका हकीकत से कुछ लेना देना नहीं😊)
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स्त्रियाँ कुछ गणित सी होती है,
जिनसे सिर्फ प्रेम के गुणा ,
करने का पहाड़ा सुना गया ,
उनकी इच्छाएं सदैव ही ,
नानुकुर से भाग दी गई ।
जिंदगी के गणित ने स्त्रियों को,
कुछ ऐसा उलझाये रखा,
कि वो कभी अपने लिऐ,
जोङ नहीं पायी कुछ,
फुर्सत के लम्हे,
सिर्फ घटाती चली गई,
अपनो के लिए अपनी ,
खूबसूरती और उम्र ।
सच में ,स्त्रियाँ परिवार के,
चारों ओर वृत्तीय परिक्रमण ,
करती रही है और फेल होती रही,
जिंदगी के गणित में बारबार ।❤
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पड़ोसन का नीला दुपट्टा
मोहल्ले में नई बहुत ही खूबसूरत और जवान पड़ोसन रहने आई😀
और उस ने धीरे धीरे मोहल्ले के घरों में आना जाना शुरू किया....
एक दिन वह पड़ोसन सब्ज़ी वाले की दुकान पर वर्मा जी को मिली😀
उसने खुद आगे बढ़कर वर्मा जी को नमस्ते किया😀 वर्मा जी को अपनी क़िस्मत पर बड़ा गर्व हुआ😀पड़ोसन बोली:- वर्मा जी,बुरा ना मानें तो आपसे कुछ समझना था.... 🤔
वर्मा जी तो ख़ुशी से पगला ही गए😀वजह ये भी थी कि पड़ोसन ने आम अनजान औरतों की तरह भैय्या नहींं कहा था,बल्कि वर्मा साहब कहा था !
वर्मा जी ने बड़ी मुश्किल से अपनी ख़ुशी छुपाते हुए बड़े प्यारे अंदाज़ में जवाब दिया:- जी बताइए !
पड़ोसन ने कहा:- मेरे पति अक्सर काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं,मैं इतनी पढ़ी लिखी नहीं हूं🤔 इसलिए स्कूल में बच्चों के दाखिले के लिए आपके साथ की ज़रुरत थी !🤔
वो आगे बोली:- यूं सड़क पर खड़े होकर बातें करना ठीक नहीं है,इसलिए अगर आपके पास वक़्त हो तो मेरे घर चल कर कुछ मिनट मुझे समझा दें,ताकि मैं कल ही बच्चों का दाखिला करा दूँ !🤔
ख़ुशी से पगले हुए वर्मा जी कुछ मिनट तो क्या सदियां बिताने को तैयार थे😀
उन्होंने फ़ौरन कहा:- जी ज़रूर,चलिए !
वर्मा जी पड़ोसन के साथ घर में दाखिल हुए😀अभी सोफे पर बैठे ही थे कि बाहर किसी स्कूटर के रुकने की आवाज़ आई.... 😀
पड़ोसन ने घबराकर कहा:- हे भगवान......🤔
लगता है मेरे पतिदेव आ गए🤔
उन्होंने यहाँ आपको देख लिया तो वो मेरा और आपका दोनों का खून ही कर डालेंगे,कुछ भी नहीं सुनेंगे🤔
आप,आप एक काम कीजिये वो सामने कपड़ों का ढेर है, आप ये नीला दुपट्टा सर पर डाल लें और उन कपड़ों पर इस्त्री करना शुरू कर दें😀
मैं उनसे कह दूँगी कि प्रेस वाली मौसी काम कर रही है😀
वर्मा जी ने जल्दी से नीला दुपट्टा ओढ़कर शानदार घूंघट निकाला😀 और उस कपडे के ढेर से कपडे लेकर प्रेस करने लगे.....😀
तीन घंटे तक वर्मा जी ने ढेर लगे सभी कपड़ों पर इस्त्री कर डाली...😀
आखरी कपडे पर इस्त्री पूरी हुई तब तक पड़ोसन का खुर्रांट पति भी वापस चला गया था😀
पसीने से लथपथ और थकान से निढाल वर्मा जी दुपट्टा फेंक कर घर से बाहर भागे😀
अभी वो निकल कर चार क़दम चले ही थे कि सामने से उनके पडोसी दुबे जी आते दिखाई दिए....
वर्मा जी की हालत देख कर दुबे जी ने पूछा:- कितनी देर से अंदर थे ? 😀
वर्मा जी ने कहा:- तीन घंटों से..😭
क्योंकि उसका पति आ गया था,इसलिए तीन घंटों से कपड़ों पर इस्त्री कर रहा था !😭
दुबे जी ने आह भर कर कहा:- जिन कपड़ों पर तुमने तीन घंटे घूंघट निकाल कर इस्त्री की है उस कपड़ों के ढेर को कल मैंने चार घंटे बैठ कर धोया था 😎
क्या तुमने भी नीला दुपट्टा ओढ़ा था ? 😀
😀😀😀
मौके पे चौका के चक्कर में करना पड़ झाड़ू चौका
🤣🤣🤣😂😂😂
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खूबसूरती और बदसूरती लोगों की दृष्टि और भावना में होती है अन्यथा जिसे लोग प्यार करते हैं उससे भी खूबसूरत कोई न कोई उसी के बगल में होता है पर लोग उसी को महत्व देते हैं जिसके लिए दिल "yes" का सिग्नल देता है......उसके लिए वही दुनिया का सबसे सुंदर लड़की /लड़का होता है,
पर कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो व्यक्ति की सोच और उसकी कुंठा तक को प्रदर्शित करते हैं बिना उस व्यक्ति के कुछ बोले,
कहते हैं हम जितना अधिक जिस तरफ सोचते हैं वैसे ही हमारा चेहरा भी होता जाता है ,कुछ शातिर इसे भी छिपा लेते हैं पर पता चल ही जाता है।
यकीन मानिए कुंठित व्यक्ति ही बदसूरत होता है और यही बदसूरती का सबसे बड़ा पैमाना होता है इसलिए कुछ भी बनिये पर कुंठित,ईर्ष्यालु मत बनिये।
यह आपको अंदर , बाहर दोनों तरफ से खोखला बना देता है और फिर बदसूरती आपके चेहरे से झलकने लगती है।
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तुम जा चुकी हो अपने नए आशिक़ के पास उस वफ़ादार लड़के को छोड़कर जो तुमसे बेइंतहा प्यार करता था..फिर दोहराओगी तुम वही वादे, वही बातें, वही कसमे और वही ख़्वाब...वो भी तुम्हारे माथे को चूमते चूमते किसी दिन आ जायेगा तुम्हारे होठो तक..तुम्हारी जुल्फें सँवारते हुए एक दिन सँवारने लगेगा तुम्हारा बदन...लेकिन इस माथे से लेकर बदन तक के सफर में वो लड़का बहुत याद आएगा तुम्हे...जब कभी वो आशिक़ तुम्हारी पीठ पर उंगलियों के निशान थोड़ा ज्यादा गहरे छोड़ देगा तुम्हें याद आएगा कि कैसे वो लड़का इसे किसी तितली के नाजुक पंख की तरह सहलाया करता था...जब कभी वो आशिक़ तुम्हारा हाथ पकड़ेगा तुम याद करोगी कि वो लड़का ये हाथ सिर्फ पकड़ता नही था बल्कि इन्हें थामता था...कैसे तुम्हारी चॉकलेट खिलाने की ज़िद पर वो लड़का अपनी अधजली सिगरेट तुम्हारी जूठी चॉकलेट के टुकड़े पर कुर्बान कर दिया करता था...जब अपने आशिक़ से बन्द कमरों के पीछे मिलोगी तो याद आएगा कि उसके कमरे से दरवाज़े तुम्हारे रहने तक हमेशा खुले रहते थे...किसी रोज़ बेचैनी में तुम तड़पोगी और तुम्हे रोने का कोई सहारा नही मिलेगा तो याद करोगी तुम कि कितनी दफा उस लड़के की कमीज़ पर तुम अपने आंसुओ के धब्बे छोड़ चुकी थी...और एक दिन तुम पछताओगी रोओगी लेकिन अब उसका कोई फायदा नही होगा...पत्थरो पर भी कभी बारिशों का असर हुआ है भला...तुम्हे कभी अपने किए का अहसास भी हो जाये तो कोशिश करना वो लड़का तुम्हे कभी माफ ना करे..क्योंकि माफी तो गलती की होती है ना और बेवफाई गुनाह है..गुनाह की माफी सिर्फ ऊपर वाला देता है..और अगर उसने तुम्हे माफ़ कर दिया तो वो खुदा हो जाएगा..फिर चाहे तुम्हे उसकी माफ़ी मिल भी जाये लेकिन खुदा से बेईमानी के लिए तुम खुद को ताउम्र माफ़ नही कर पाओगी...इसलिये उसे इंसान ही रहने दो..बनाना ही था तो मोहब्बत में खुदा बनाती उसे...!!🖤
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