Deeni Rahnumayi
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📿 इस चैनल में अ़का़इद, मसाइल, ह़दीसें, दीनी व अखलाक़ी मजा़मीन को हिंदी ज़बान में पेश किया जाता है!
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*आप अपनी औलाद को तालीम दिला रहे हैं या गुमराही......?*
आप जिन स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं क्या आपने मालूम किया वहां आपके बच्चों को क्या तालीम दी जा रही है....?
क्या आपको खबर है कि कहीं आपके बच्चों को कुफ्र सिखाया जा रहा है कहीं शिर्क,
अगर मेरे शहर बहराइच की बात की जाए तो मैं उन स्कूलों का नाम लेकर बता सकता हूं कि वहां क्या क्या गुमराही सिखाई जा रही आपके बच्चों को,
कहीं गैरुल्लाह की पूजा कराई जा रही है कहीं हज़रत ईसा को खुदा का बेटा बताया जा रहा है और कहीं ये सिखाया जा रहा है कि मुसलमान दहशतगर्द होते हैं, और न जाने क्या क्या,
हैरत तो इस बात पर है दीन से गाफिल लोगों का तो कहना क्या दीनदार लोग भी सब कुछ जानने के बावजूद अपने बच्चों को वहां तालीम दिलवा रहे हैं,
हालांकि तकरीबन हर शहर में ऐसे स्कूल बनाए जा चुके हैं जहां दुनियावी आला तालीम के साथ दीन की बेसिक जानकारी भी बच्चों को दी जा रही हैं लेकिन हम ठहरे जदीद सोच के लोग हमें तो उस वक्त फख्र महसूस होता है जब हम किसी से कहते हैं हमारा फलां स्कूल में पढ़ रहा है शहर का सबसे बड़ा स्कूल है, अगरचे वहां कुफ्र ही सिखाया जा रहा हों,
बच्चों के जहन में जो बाते बचपन में डाली जाती हैं पूरी जिंदगी उसका असर बाकी रहता है इसलिए इस जानिब तवज्जो दीजिए, आपके बच्चे आपका मुस्तकबिल हैं लिहाज़ा अपने बच्चों को ऐसा बनाकर दुनिया से जाएं कि कभी आपके लिए वो अल्लाह के सामने हाथ उठाने वाले हों,
मैं ये नहीं कहता अपने बच्चों को जाहिल रखें आप बिल्कुल तालीम दिलवाएं लेकिन एडमिशन से पहले कम से कम स्कूल के स्टाफ और वहां के सिलेबस के बारे में तो मुकम्मल तहकीक कर लें,
स्कूल अच्छा मुंतखब करें जहां कम से कम आपके बच्चों का ईमान और अकीदा तो दुरुस्त रहे, वर्ना बाद का रोना कोई काम नहीं आता सिवाए पछतावे के!
Mufti MerajAhmadMirza
tinyurl.com/DeeniRahnumayi
*रमजान की तैयारी शुरू कर दें!*
📔 *क़ुरआन मजीद का पैगा़म*
*हर पारे का खुलासा*
कोशिश करें कि कुरआन मजीद के पैग़ामे अ़मल को पेश करने वाली यह किताब हर घर और हर मस्जिद तक पहुंच जाए,
इस किताब में कुरआन मजीद के पैग़ामे अ़मल को सामने रखते हुए एक एक सूरत और एक एक पारे का खुलासा पेश किया गया है
*यह किताब उर्दू अंग्रेज़ी और हिंदी में मौजूद है।*
*पेज: 160*
*क़ीमत सिर्फ़ 60/*
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*Fazail e Aamal*
Volume 1
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मोबाइल ने लड़के लड़कियों की आपस तक रसाई इतनी आसान कर दी है जितनी हज़ारो साल में कभी न थी. इसका सबसे बड़ा नुकसान ये हुआ कि हर कोई बॉलीवुडिया मुहब्बत करना ऐन फ़र्ज़ समझकर सामने वाले/ वाली पर ट्राई ज़रूर मारता है और तीन- चार मुहब्बत करके देवदास बने बगैर मरना भी नही चाहता.
जबकि gf/ bf बनाना या नामहरम से मुहब्बत में मज़े तलाशना ज़हनी सुकून बर्बाद कर देता है.मुहब्बत के नाम पर लस्ट को तस्कीन पहुंचाई जाती है,जिसका अज़ाब बड़ा है..अगर कोई पसन्द हो तो लम्बा-लम्बा फिल्मी इश्क़ फरमाने के बजाए सीधे रिश्ता भेजें।
क़ुबूल हो तो ठीक नही तो सब्र कीजिये,दुनिया बेहतर खूबसूरत, ख़ूबसीरत लड़के लड़कियों से भरी पड़ी है।
वालिदैन को भी चाहिए कि बच्चो की शादी में देरी बिल्कुल न करे,बच्चे आज कल 15-16 साल में जवान हो जातें है,उन्हें छुट्टा न छोड़ें।
Abdul Qayyum Hakim
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⚠️ Sawdhani
Dawaiyan kha kar full form me dulhan ke sath khela.
Ladki ko zakhm hue, infection hue. 1 hafte baad mout.
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शेख शअरावी से पूछा गया : हज़रत! *आपने अपने बेटे की शादी पर उसे क्या नसीहत फरमाई ?*
शैख़ ने फरमाया : मैंने उसे वसीयत की के बेटे! यह औरत अपने मां बाप, भाई और बहनों को छोड़कर अकेली तेरे साथ रहने के लिए आई है... तो तू उसे वह सब बनाकर दिखा देना।
مفتی سراج سیدات
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2⃣ ह़ज़रत आ़इशा रज़ियल्लाहु अ़न्हा फ़रमाती हैं कि ह़ज़ूर अक़दस ﷺ माहे शअ़बान में कसरत से रोज़े रखा करते थे।
☀ सह़ी बुखा़री में है :
1969- عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهَا قَالَتْ: كَانَ رَسُولُ اللهِ ﷺ يَصُومُ حَتَّى نَقُولَ: لَا يُفْطِرُ، وَيُفْطِرُ حَتَّى نَقُولَ: لَا يَصُومُ، فَمَا رَأَيْتُ رَسُولَ اللهِ ﷺ اسْتَكْمَلَ صِيَامَ شَهْرٍ إِلَّا رَمَضَانَ، وَمَا رَأَيْتُهُ أَكْثَرَ صِيَامًا مِنْهُ فِي شَعْبَانَ. (بَابُ صَوْمِ شَعْبَانَ)
मज़कूरह दो अह़ादीस से ये बात बख़ूबी वाजे़ह़ हो जाती है कि ह़ज़ूर अक़दस ﷺ माहे शअ़बान में कसरत से रोज़े रखा करते थे जिससे माहे शअ़बान के रोज़े की फ़जी़लत साबित हो जाती है, इसलिए शअ़बान का पूरा महीना रोज़ों के लिए बहुत ही मोज़ूं और फ़जी़लत वाला है, इससे मालूम हुआ कि इस महीने में किसी भी दिन रोज़ा रखा जा सकता है, हर दिन का नफ़ली रोज़ा अपनी जा़त में अहमियत और फ़जी़लत रखता है; चुनांचे हर शख़्स अपनी वुसअ़त और ताक़त के मुताबिक़ पूरे महीने में जितने भी रोज़े रखना चाहे तो ये सआ़दत (और नेकी) की बात है।
साथ में यह बात भी याद रहे कि माहे शअ़बान में रोज़े रखना ज़्यादा से ज़्यादा मुस्तह़ब अ़मल है जिसकी बड़ी फ़जी़लत है; लेकिन इसको ज़रूरी समझना और इस मामले में ह़ुदूद से तजावुज़ करना (ह़द से बढ़ना) ना- जाइज़ है।
📿 *माहे शअ़बान के आख़िरी अय्याम (दिनों) में रोज़े रखने का ह़ुक्म:*
यहां ये मसअलह भी वाज़ेह़ रहे कि माहे शअ़बान के आख़िरी दो-तीन दिनों में रोज़े नहीं रखने चाहिए; क्योंकि अह़ादीस में इसकी मुमानअ़त (मना होने की बात) आई है, इस मुमानअ़त की मुतअ़द्दिद वुजूहात (कई वजहें) हैं:
▪ एक तो इसलिए कि माहे रमज़ान और माहे शअ़बान के अय्याम (दिन) ख़ल्त- मल्त ना हों।
▪ दूसरा इसलिए कि माहे रमज़ान पर किसी दिन के इजा़फे़ का शुबह (किसी दिन की ज़्यादती का शक) पैदा ना हो।
▪ तीसरा इसलिए कि माहे रमज़ान से पहले दो-तीन दिन वक़फा (रुक) करके रमज़ान के रोज़े और इ़बादात के लिए ताज़ा दम हुआ जाए।
अलबत्ता अगर किसी शख़्स का पीर या जुमेरात या किसी और दिन रोज़ा रखने का मामूल हो और ये दिन माहे शअ़बान की आख़िरी तारीख़ों में आ जाए, तो ऐसी सूरत में मामूल के मुताबिक़ शअ़बान के आख़िरी दो-तीन दिनों में भी ये रोज़े रखना जाइज़ है।
(صحیح البخاری حدیث: 1969 ،1914، سنن الترمذی حدیث: 737 ،684، ہندیہ، رد المحتار، مرقاۃ، اصلاحی خطبات)
🌺 *(फ़तवा) दारुल इफ़ता जामिउ़तुल उ़लूमिल इस्लामिया बिन्नौरी टाउन:*
अह़ादीसे मुबारकह में रमज़ान उल मुबारक से एक या दो दिन पहले रोज़े रखने की मुमानअ़त वारिद हुई है (मना होने की बात आई है), लिहाज़ा 30 शअ़बान का रोजा़ ना रखना चाहिए; हां अगर कोई शख़्स ऐसा है जो हर पीर और जुमेरात को रोज़ा रखता हो और 30 शअ़बान पीर या जुमेरात में से किसी एक दिन आ गई, तो वो रोज़ा रख सकता है, इसी तरह़ अगर कोई शख़्स पूरे शअ़बान रोज़े रखता हो, तो वो भी 30 शअ़बान का रोज़ा रख सकता है।
☀ الدر المختار وحاشيۃ ابن عابدين (رد المحتار) (2/ 381):
(قوله: ولايصام يوم الشك) هو استواء طرفي الإدراك من النفي والإثبات، بحر (قوله: هو يوم الثلاثين من شعبان) الأولى قول نور الإيضاح: هو ما يلي التاسع والعشرين من شعبان أي؛ لأنه لايعلم كونه يوم الثلاثين؛ لاحتمال كونه أول شهر رمضان، ويمكن أن يكون المراد أنه يوم الثلاثين من ابتداء شعبان فمن ابتدائية لا تبعيضية، تأمل. فقط واللہ اعلم‘‘
(فتویٰ نمبر: 144008200757، تاریخِ اجرا: 06-05-2019)
🌹 *फ़ाइदह:* 15 शअ़बान के फ़ज़ाइल और अह़काम से मुतअ़ल्लिक तफ़सील आइंदा की किसी क़िस्त में ज़िक्र की जाएगी इंशा अल्लाह।
✍🏻___ मुफ्ती मुबीनुर रह़मान साह़ब दामत बरकातुहुम
फाज़िल जामिआ़ दारुल उ़लूम कराची
हिंदी तर्जुमा, तल्ख़ीस व तस्हील:
अल्तमश आ़लम क़ासमी
🪀9084199927
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2⃣ ह़ज़रत आ़इशा रज़ियल्लाहु अ़न्हा फ़रमाती हैं कि ह़ज़ूर अक़दस ﷺ माहे शअ़बान में कसरत से रोज़े रखा करते थे।
☀ सह़ी बुखा़री में है :
1969- عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهَا قَالَتْ: كَانَ رَسُولُ اللهِ ﷺ يَصُومُ حَتَّى نَقُولَ: لَا يُفْطِرُ، وَيُفْطِرُ حَتَّى نَقُولَ: لَا يَصُومُ، فَمَا رَأَيْتُ رَسُولَ اللهِ ﷺ اسْتَكْمَلَ صِيَامَ شَهْرٍ إِلَّا رَمَضَانَ، وَمَا رَأَيْتُهُ أَكْثَرَ صِيَامًا مِنْهُ فِي شَعْبَانَ. (بَابُ صَوْمِ شَعْبَانَ)
मज़कूरह दो अह़ादीस से ये बात बख़ूबी वाजे़ह़ हो जाती है कि ह़ज़ूर अक़दस ﷺ माहे शअ़बान में कसरत से रोज़े रखा करते थे जिससे माहे शअ़बान के रोज़े की फ़जी़लत साबित हो जाती है, इसलिए शअ़बान का पूरा महीना रोज़ों के लिए बहुत ही मोज़ूं और फ़जी़लत वाला है, इससे मालूम हुआ कि इस महीने में किसी भी दिन रोज़ा रखा जा सकता है, हर दिन का नफ़ली रोज़ा अपनी जा़त में अहमियत और फ़जी़लत रखता है; चुनांचे हर शख़्स अपनी वुसअ़त और ताक़त के मुताबिक़ पूरे महीने में जितने भी रोज़े रखना चाहे तो ये सआ़दत (और नेकी) की बात है।
साथ में यह बात भी याद रहे कि माहे शअ़बान में रोज़े रखना ज़्यादा से ज़्यादा मुस्तह़ब अ़मल है जिसकी बड़ी फ़जी़लत है; लेकिन इसको ज़रूरी समझना और इस मामले में ह़ुदूद से तजावुज़ करना (ह़द से बढ़ना) ना- जाइज़ है।
📿 *माहे शअ़बान के आख़िरी अय्याम (दिनों) में रोज़े रखने का ह़ुक्म:*
यहां ये मसअलह भी वाज़ेह़ रहे कि माहे शअ़बान के आख़िरी दो-तीन दिनों में रोज़े नहीं रखने चाहिए; क्योंकि अह़ादीस में इसकी मुमानअ़त (मना होने की बात) आई है, इस मुमानअ़त की मुतअ़द्दिद वुजूहात (कई वजहें) हैं:
▪ एक तो इसलिए कि माहे रमज़ान और माहे शअ़बान के अय्याम (दिन) ख़ल्त- मल्त ना हों।
▪ दूसरा इसलिए कि माहे रमज़ान पर किसी दिन के इजा़फे़ का शुबह (किसी दिन की ज़्यादती का शक) पैदा ना हो।
▪ तीसरा इसलिए कि माहे रमज़ान से पहले दो-तीन दिन वक़फा (रुक) करके रमज़ान के रोज़े और इ़बादात के लिए ताज़ा दम हुआ जाए।
अलबत्ता अगर किसी शख़्स का पीर या जुमेरात या किसी और दिन रोज़ा रखने का मामूल हो और ये दिन माहे शअ़बान की आख़िरी तारीख़ों में आ जाए, तो ऐसी सूरत में मामूल के मुताबिक़ शअ़बान के आख़िरी दो-तीन दिनों में भी ये रोज़े रखना जाइज़ है।
(صحیح البخاری حدیث: 1969 ،1914، سنن الترمذی حدیث: 737 ،684، ہندیہ، رد المحتار، مرقاۃ، اصلاحی خطبات)
🌺 *(फ़तवा) दारुल इफ़ता जामिउ़तुल उ़लूमिल इस्लामिया बिन्नौरी टाउन:*
अह़ादीसे मुबारकह में रमज़ान उल मुबारक से एक या दो दिन पहले रोज़े रखने की मुमानअ़त वारिद हुई है (मना होने की बात आई है), लिहाज़ा 30 शअ़बान का रोजा़ ना रखना चाहिए; हां अगर कोई शख़्स ऐसा है जो हर पीर और जुमेरात को रोज़ा रखता हो और 30 शअ़बान पीर या जुमेरात में से किसी एक दिन आ गई, तो वो रोज़ा रख सकता है, इसी तरह़ अगर कोई शख़्स पूरे शअ़बान रोज़े रखता हो, तो वो भी 30 शअ़बान का रोज़ा रख सकता है।
☀ الدر المختار وحاشيۃ ابن عابدين (رد المحتار) (2/ 381):
(قوله: ولايصام يوم الشك) هو استواء طرفي الإدراك من النفي والإثبات، بحر (قوله: هو يوم الثلاثين من شعبان) الأولى قول نور الإيضاح: هو ما يلي التاسع والعشرين من شعبان أي؛ لأنه لايعلم كونه يوم الثلاثين؛ لاحتمال كونه أول شهر رمضان، ويمكن أن يكون المراد أنه يوم الثلاثين من ابتداء شعبان فمن ابتدائية لا تبعيضية، تأمل. فقط واللہ اعلم‘‘
(فتویٰ نمبر: 144008200757، تاریخِ اجرا: 06-05-2019)
🌹 *फ़ाइदह:* 15 शअ़बान के फ़ज़ाइल और अह़काम से मुतअ़ल्लिक तफ़सील आइंदा की किसी क़िस्त में ज़िक्र की जाएगी इंशा अल्लाह।
✍🏻___ मुफ्ती मुबीनुर रह़मान साह़ब दामत बरकातुहुम
फाज़िल जामिआ़ दारुल उ़लूम कराची
हिंदी तर्जुमा, तल्ख़ीस व तस्हील:
अल्तमश आ़लम क़ासमी
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✨❄ इस़लाहे़ अग़लात़: अ़वाम में राएज ग़लतियों की इसलाह़ ❄✨
सिलसिला नंबर 192:
🌻 *माहे शअ़बान की फ़जी़लत और आ़माल:*
🎙️️ सुनने के लिए यहां टच करें↓
t.me/Basheerululoom/1030
--------------------
🌻 *माहे शअ़बान की फ़जी़लत:*
शअ़बान क़मरी यानी इस्लामी साल का आठवां महीना है, अल्लाह तआ़ला ने इस महीने को बड़ी ही फ़जी़लत अ़ता फ़रमाई है, इसमें शबे बराअत जैसी अ़ज़ीम रात भी है, माहे शअ़बान की अहमियत का अंदाजा़ इससे भी बख़ूबी लगाया जा सकता है कि जब रजब का महीना शुरू होता तो ह़ुज़ूर अक़दस ﷺ ये दुआ़ मांगते:
*اَللّٰهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِيْ رَجَبٍ وَّشَعْبَانَ، وَبَلِّغْنَا رَمَضَانَ.*
*तर्जमा:* ऐ अल्लाह! हमारे लिए रजब और शअ़बान के महीने में बरकत अ़ता फ़रमा और हमें रमजा़न तक पहुॅंचा।
☀ کتاب الدعاء للطبرانی:
911- عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ: أَنّ النَّبِيَّ ﷺ كَانَ إِذَا دَخَلَ رَجَبٌ قَالَ: «اللَّهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِي رَجَبٍ وَّشَعْبَانَ وَبَلِّغْنَا رَمَضَانَ». (باب القول عند دخول رجب)
इस दुआ़ का मतलब ये है कि ऐ अल्लाह! माहे रजब और माहे शअ़बान में अपनी इ़बादात और इताअ़त की तौफ़ीक़ अ़ता करके इन में बरकत अ़ता फ़रमाइये और हमें माहे रमज़ान तक पहुंचा दीजिए, ताकि हम इस मुबारक महीने के आ़माल, फ़ज़ाइल और बरकात और अनवारात से मुस्तफ़ीद हो सकें (फ़ाएदा उठा सकें), इसलिए माहे शअ़बान के आग़ाज (शुरुआत) में भी ये दुआ़ मांग लेनी चाहिए।
☀ مرقاۃ المفاتیح شرح المشکاۃ میں ہے:
(وَعَنْ أَنَسٍ قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللهِ ﷺ إِذَا دَخَلَ رَجَبٌ) مُنَوَّنٌ وَقِيلَ: غَيْرُ مُنْصَرِفٍ (قَالَ: اللَّهُمَّ بَارِكْ لَنَا) أَيْ: فِي طَاعَتِنَا وَعِبَادَتِنَا (فِي رَجَبٍ وَّشَعْبَانَ، وَبَلِّغْنَا رَمَضَانَ) أَيْ: إِدْرَاكَهُ بِتَمَامِهِ، وَالتَّوْفِيقَ لِصِيَامِهِ وَقِيَامِهِ.
📿 *माहे शअ़बान माहे रमज़ान की तम्हीद है!*
माहे शअ़बान की फ़जी़लत और अहमियत इसलिए भी है कि इसके मुत्तसिल (फौरन) बाद ही रमज़ान का निहायत ही मुबारक महीना है, जिसके लिए माहे शअ़बान में तय्यारी करने का बेहतरीन मौका़ मयस्सर आ जाता है और रमज़ान में ख़ूब से ख़ूब तर इ़बादात अदा करने की पहले ही से आ़दत हो जाती है, गोया कि ये महीना माहे रमज़ान की तम्हीद है, इसलिए माहे शअ़बान में इ़बादात का इसलिए भी एहतिमाम होना चाहिए, ताकि माहे रमज़ान में इ़बादत करने में सहूलत रहे और माहे रमज़ान के फ़ज़ाइल और बरकात से भरपूर फा़यदा उठाया जा सके।
📿 *माहे शअ़बान के आ़माल:*
शअ़बान के महीने की फ़जी़लत और अहमियत का तक़ाज़ा ये है कि इसमें इ़बादात का ख़ूब एहतिमाम किया जाए। ये इ़बादात दिन में भी अदा की जा सकती हैं और रात में भी, इसके लिए कोई वक़्त या तारीख़ ख़ास नहीं और ना ही इसके लिए कोई ख़ास इ़बादत मुक़र्रर है; बल्कि हर शख़्स अपनी वुसअ़त के मुताबिक़ पूरे महीने के शब व रोज़ (दिन रात) में मौका़ व मह़ल के ए़तिबार से जिस क़दर नवाफ़िल (नफ़्लें) ज़िक्र व तिलावत दुआ़ओं और रोजो़ं वगैरह का एहतिमाम कर सकता है तो ये बड़ी ही फ़जी़लत की बात है।
📿 *माहे शअ़बान के रोज़े:*
माहे शअ़बान में दीगर इ़बादात की तरह़ रोज़े रखने की भी बड़ी फ़जी़लत है, क्योंकि इस महीने में ह़ुज़ूर अक़दस ﷺ से कसरत से रोज़े रखना साबित है, अह़ादीस मुलाह़जा़ फ़रमाएं:
1⃣ ह़ज़रत उसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अ़न्हुमा फ़रमाते हैं कि मैंने ह़ुज़ूर अक़दस ﷺ से अ़र्ज़ किया कि: ऐ अल्लाह के रसूल! मैंने आपको माहे शअ़बान में जिस क़दर कसरत से रोज़े रखते हुए देखा इतना किसी और महीने में रोज़े रखते हुए नहीं देखा, तो ह़ज़ूर अक़दस ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि: ये महीना जो कि रजब और रमज़ान के दरमियान है इससे लोग ग़ाफ़िल होते हैं, ये वो महीना है कि जिसमें अल्लाह तआ़ला की बारगाह में आ़माल पेश किए जाते हैं, तो मेरी ख़्वाहिश है कि मेरे आ़माल इस हा़लत में पेश किए जाएं कि मेरा रोजा़ हो।
☀ ☀ سنن النسائی میں ہے:
2356- أَخْبَرَنَا عَمْرُو بْنُ عَلِيٍّ عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ قَالَ: حَدَّثَنَا ثَابِتُ بْنُ قَيْسٍ أَبُو الْغُصْنِ شَيْخٌ مِنْ أَهْلِ الْمَدِينَةِ قَالَ: حَدَّثَنِي أَبُو سَعِيدٍ الْمَقْبُرِيُّ قَالَ: حَدَّثَنِي أُسَامَةُ بْنُ زَيْدٍ قَالَ: قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللهِ، لَمْ أَرَكَ تَصُومُ شَهْرًا مِنَ الشُّهُورِ مَا تَصُومُ مِنْ شَعْبَانَ، قَالَ: «ذَلِكَ شَهْرٌ يَغْفُلُ النَّاسُ عَنْهُ بَيْنَ رَجَبٍ وَرَمَضَانَ، وَهُوَ شَهْرٌ تُرْفَعُ فِيهِ الْأَعْمَالُ إِلَى رَبِّ الْعَالَمِينَ فَأُحِبُّ أَنْ يُرْفَعَ عَمَلِي وَأَنَا صَائِمٌ».
इस ह़दीस से ये मालूम हुआ कि माहे शअ़बान में अल्लाह तआ़ला की बारगाह में आ़माल पेश किए जाते हैं, इसलिए इससे रोजों समेत दीगर आ़माल और इ़बादात के एहतिमाम की फ़जी़लत और अहमियत भी मालूम हो जाती है।
*माहे शअ़बान की फ़जी़लत और आ़माल*
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ماہِ شعبان کی فضیلت اور اعمال
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आपस के तअल्लुक़ात सुधारने के लिए कितनी जबरदस्त है क़ुरआन ए करीम की ये 9 हिदायात,
हम ज़रूर इन पर अ़मल करें!!!
1. فَتَبَیَّنُوْٓا :
कोई भी बात सुनकर फैलाने से पहले तहकीक कर लिया करो. कहीं ऐसा न हो के बात सच न हो और किसी को अनजाने में नुकसान पहुंच जाए -
2.فَأَصْلِحُوْا :
दो भाईयों के दरमियान सुलह करवा दिया करो . तमाम ईमान वाले आपस मे भाई भाई हैं -
3. وَأَقْسِطُوْا :
हर झगड़े को हल करने की कोशिश करो और दो गिरोहों के दरमियान इंसाफ़ करो . अल्लाह करीम इंसाफ करने वालों को पसंद फरमाता है -
4. لَایَسْخَرْ :
किसी का मज़ाक मत उड़ाओ. हो सकता है के वो अल्लाह के नज़दीक तुम से बेहतर हो -
5. وَلَا تَلْمِزُوْآ :
किसी को बेइज्जत मत करो -
6. وَلَا تَنَابَزُوْا :
लोगो को बुरे अल्काबात (उल्टे नामों) से मत पुकारो -
7. اِجْتَنِبُوْا کَثِیْرًا مِّنَ الظَّنِّ :
बुरा गुमान करने से बचो के कुछ गुमान गुनाह के दायरे में आते हैं -
8. وَلَا تَجَسَّسُوْا:
एक दूसरे की टोह में न रहो -
9. وَلَایَغْتَبْ بَّعْضُکُمْ بَعْضًا :
तुम में से कोई एक किसी दुसरे की ग़ीबत न करे। यह गुनाह-ए-कबीरा है और अपने मुर्दा भाई का गोश्त खाने के बराबर है -
( #क़ुरआन ए करीम :सुरेह हुजुरात )
अल्लाह करीम इख्लास के साथ अमल करने की तौफिक दे.
आमीन या रब्बल आलामीन.
Translated by M Arif Sahab (Rjs)
tinyurl.com/DeeniRahnumayi
*हिंदी ज़बान जानने वाले अहले ईमान के लिए निहायत उम्दा तोहफ़ा*
*📔इस्लामी तालीमात और आज के मुसलमान*
ईमान और अ़क़ायद, सुन्नतों का बयान, साफ़ सफ़ाई और पाकी, कुरआन मजीद, निकाह़, तलाक़, औलाद के हुकूक, मां बाप के हुकूक, मियां बीवी के हुकूक, पड़ोसी के हुकूक, नमाज़, ज़कात, ह़ज, अखलाक, इस्लाम और मुसलमान, इस्लाम और सियासत, क़यामत की निशानियां
Page: 186
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दिल की सफ़ाई के कुछ तऱीके!
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया
दिलों को भी ज़ंग लग जाता है जैसे लोहे में पानी पहुंचने के बाद जंग लग जाता है। अर्ज़ किया गया : या रसूलल्लाह ﷺ वह कौन सी चीज़ है, जिससे दिलों की सफाई हो जाए, आपने फरमाया मौत का ज़्यादा ध्यान रखना और क़ुरआन का पढ़ना।
(बैहक़ी.. 1958)
इब्ने क़य्यिम जौज़ी रह. तहरीर फरमाते हैं: बेशक चांदी और तांबे की तरह दिल भी जंगआलूद हो जाता है , और उसकी सफाई अल्लाह के ज़िक्र से मुम्किन है, ज़िक्रे इलाही दिल को साफ करके चमकते हुए आईने की तरह कर देता है, और जब ज़िक्र को छोड़ दिया जाता है तो दिल फिर जंग आलूद हो जाता है, जंग लगने के दो सबब हैं :
1 गफलत 2 गुनाह
और जंग लगे हुए दिल की सफाई के भी दो तरीके हैं :
1. इस्तिगफ़ार
2. अल्लाह रब्बुल इज्जत का ज़िक्र
दिल की सफाई ज़्यादा से ज़्यादा ज़िक्र, अल्लाह की याद और अल्लाह वालों की सोहबत से होगी।
हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रज़ि. फरमाते हैं कि हर चीज़ का एक खज़ाना हुआ करता है और तकवे का खज़ाना अल्लाह वालों के दिल हुआ करते हैं।
(کتاب الزہد،مجمع الزوائد حدیث:17944)
मेडिटेशन यानी मुराक़बा के दिल अल्लाह की मोहब्बत का घर है और उसमें गन्दगी जैसे नफरत, कीना , कपट, हसद, बुग्ज़ वगैरा रखना अल्लाह की मोहब्बत का अपमान है, दिल में बुराई कीना रखने वाला जन्नत में न जा पाएगा और दिल को इन चीज़ों से साफ रखने वाले के लिए जन्नत दुनिया में ही अता कर दी जाती है।
क़यामत के दिन सिर्फ प्योर हार्ट ही काम आएगा और कुच्छो नहीं।
रोज़ अपने दिल की चैकिंग कर सफाई की फिक्र करेंगे तो अल्लाह ज़रूर मदद करेगा।
और अल्लाह से दुआ करे कि ए अल्लाह मेरे दिल को हर बुराई : निफ़ाक़, शिकाक, कीना, बुग्ज़, अदावत, नफरत, हसद जलन, और हर किस्म के शर और बुराई से पाक कर दे।
اَللّٰهُمَّ طَهِّرْ قَلْبِيْ مِنَ النِّفَاقِ وَعَمَلِيْ مِنَ الرِّيَاءِ وَلِسَانِيْ مِنَ الْكِذْبِ وَعَيْنِيْ مِنَ الْخِيَانَةِ فَإِنَّكَ تَعْلَمُ خَائِنَةَ الْأَعْيُنِ وَمَا تُخْفِي الصُّدُوْرُ
بہ شکریہ مفتی سراج سیدات
tinyurl.com/DeeniRahnumayi
हाफ़िज़े क़ुरआन के लिए पांच स्पेशल रब्बानी नवाज़िश!
1. सिफारिश : क़ुरआन अपने पढ़ने वालों के लिए क़यामत के दिन सिफारिशी बन कर आएगा। [मुस्लिम]
2. रफ़अत : पढ़ता जा और (जन्नत के एक एक) दर्जे चढ़ता जा, तेरा आखिरी ठिकाना वहीं है जहां आखिरी आयत पर तु पहुंचे।
[رواه أبو داود والترمذي وأحمد]
3. सोहबत : क़ुरआन मजीद का माहिर , कुरान लिखने वाले इंतहाई मुअज़्ज़ज़ और अल्लाह तआला के फरमाबरदार फरिश्तों के साथ होगा।
(मुत्तफ़क़ अलैहि)
4. ख़ैरियत : तुम में सबसे बेहतरीन वह है जो क़ुरआन सीखे और सिखाए।
(بخاري)
5. अहलियत : क़ुरआन वाले , अल्लाह वाले और अल्लाह के खास लोग हैं।
(سنن ابن ماجہ)
بہ شکریہ مفتی سراج سیدات
t.me/Basheerululoom
अगर वफ़ादारी सरज़मीन से होती तो नबी-ए-बरह़क़ﷺ मक्का कभी ना छोड़ते , और अगर वफ़ादारी क़बीले के साथ होती तो आपﷺ क़ुरैश से कभी जंग नहीं करते , और अगर वफ़ादारी ख़ानदान से होती तो आपﷺ अपने सगे चचा अबू-लहब को कभी नहीं छोड़ते---
""ईमान"" हर रिश्ते संबंध और ख़ाक-ओ-ख़ून से ज़्यादा क़ीमती है।
ابو الفارس الانصاری
tinyurl.com/DeeniRahnumayi
