देववाणी संस्कृतम् ई-गुरुकुलम्
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पठन्तु संस्कृतं वदन्तु संस्कृतं रक्षन्तु संस्कृतं च। । जयतु संस्कृतम्। जयतु भारतम्। ।वसुधैव कुटुम्बकम् ।।
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https://youtu.be/W9bN-cYcfhk
*ये सीरीज आपके और आपके परिवार के तथा आस पास के सभी लोगों के जीवन में सुख शान्ति भर देगी।*
सुविचार ( स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक ): https://www.youtube.com/playlist?list=PLXYdCipgusUaTmgWPKEDgSOyAmq7J33G3
https://youtu.be/0sh49ZCd5ck
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मित्रो!
*जन-जागरण मिशन*
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महापुरुषों का जीवन-चरित्र: https://www.youtube.com/playlist?list=PLXYdCipgusUZWcqEpgV_5T1bn9b-Je3rX
मनुष्य का यह स्वभाव है, कि वह जो भी क्रिया देखता है, तो उस पर उस क्रिया का प्रभाव पड़ता है। "इसलिए वह उस पर मन ही मन, कुछ-न-कुछ टिप्पणी अवश्य करता है, कि सामने वाला व्यक्ति जो कार्य कर रहा है, वह ठीक है या ग़लत है।" अपने मित्रों या आस-पास के लोगों को वह अपनी टिप्पणी प्रायः सुनाता भी है। "परन्तु यदि कोई दूसरा व्यक्ति उसके कार्य पर टिप्पणी करे, तो वह उसको पसंद नहीं आता।" तब वह चाहता है, कि "मैं अपनी इच्छा और रुचि के अनुसार जीना चाहता हूं। मेरी मर्जी, मैं जो भी करूं। किसी दूसरे को मेरे कार्यों कर टिप्पणी करने का क्या अधिकार है?"
उस व्यक्ति को यह सोचना चाहिए, "जब वह दूसरों का अधिकार नहीं मानता, कि कोई व्यक्ति उस के कार्यों पर टिप्पणी करे। तो उसे भी तो दूसरों के कार्यों पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है। फिर वह क्यों दूसरे व्यक्ति के कार्य पर टिप्पणी करता है?" परंतु प्रायः लोग ऐसा नहीं सोचते। "स्वयं तो दूसरों पर टिप्पणी करते जाते हैं, और अपने कार्यों पर टिप्पणी सुनना नहीं चाहते। ऐसा करना सभ्यता नहीं है।"
हम यह नहीं कहते, कि दूसरे व्यक्ति के कार्य को देखकर आप कुछ विचार ही न करें, कि वह व्यक्ति ठीक काम कर रहा है या गलत? "यह तो स्वाभाविक है, कि किसी के कार्यों को देखकर व्यक्ति अपने मन में इतना विचार तो करता ही है, कि यह सामने वाला व्यक्ति ठीक काम कर रहा है ग़लत।" क्योंकि उसे देखने वाला व्यक्ति चेतन है। वह जड़ पदार्थ नहीं है। "वह जब भी किसी क्रिया को देखता है, तो उसका उस पर प्रभाव पड़ता है। यदि वह क्रिया संविधान के अनुकूल हो, जैसे यज्ञ करना, सत्य बोलना, सैर करना, खेलकूद करना आदि, तो वह उसे उचित मानता है, और कोई कोई व्यक्ति उसकी नकल भी करता है। यदि दूसरे व्यक्ति की क्रिया संविधान के विरुद्ध हो, जैसे शराब पीना जुआ खेलना चोरी करना व्यभिचार करना आदि, तो कोई कोई व्यक्ति उसका मन में विरोध भी करता है, कि यह व्यक्ति ठीक नहीं कर रहा। मैं तो ऐसा नहीं करूंगा।" मन में ऐसा विचार करना तो स्वभाविक है, और इसमें कोई दोष भी नहीं है।
परन्तु जब व्यक्ति, दूसरों की क्रियाओं को देखकर उन पर टिप्पणी करता है, तो वह विचारणीय है। "यदि वह व्यक्ति ईश्वरीय संविधान वेदों के आधार पर टिप्पणी करे, तो भी ठीक है।" परंतु दोष वहां से आरंभ होता है, कि "जब उसकी टिप्पणी, ईश्वरीय संविधान के आधार पर न होकर, उसकी अपनी रुचि के आधार पर होती है।" अर्थात "जहां दूसरे व्यक्ति का कोई कार्य, 'उसे' पसंद आया, तो वह उसका समर्थन कर देगा, चाहे वह कार्य ईश्वरीय संविधान के अनुकूल हो या विरुद्ध हो। और जहां दूसरे व्यक्ति का कोई कार्य 'उसे' पसंद नहीं आया, तो वह उसका विरोध कर देगा, चाहे वह कार्य ईश्वरीय संविधान के अनुकूल हो या विरुद्ध हो।" ऐसा करना अनुचित एवं असभ्यता है।
क्योंकि सही और गलत की अंतिम कसौटी मनुष्य नहीं है। वह अल्पज्ञ है। उसके बहुत से निर्णय गलत होते रहते हैं। "इसलिए अपनी पसंद के आधार पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए, बल्कि ईश्वरीय संविधान वेदों के आधार पर ही कोई टिप्पणी करनी चाहिए।"
दूसरी बात -- "जब आप दूसरे की मनमानी से अपने कार्यों पर टिप्पणी सुनना नहीं चाहते, तो आपको भी यह अधिकार नहीं है, कि आप भी दूसरे के कार्यों पर अपनी मनमानी से टिप्पणी करें।" करना तो यह चाहिए कि "दूसरे व्यक्ति के कार्य को देखें। मन ही मन उसका विचार करें। यदि वह ईश्वरीय संविधान के अनुकूल हो, तो उसका मन में समर्थन कर दें। जैसे यज्ञ करना, दान देना आदि। यदि वह कार्य ईश्वरीय संविधान के विरुद्ध हो, जैसे शराब पीना, चोरी करना आदि, तो अपने मन में उसका विरोध कर दें, कि यह काम ग़लत है, ताकि उसके दुष्प्रभाव से आप बच सकें।" ऐसा करना तो उचित है। "परंतु अपनी रुचि के आधार पर दूसरे के कार्यों पर टीका टिप्पणी करना तो असभ्यता ही है।"
"जैसे आपको ईश्वरीय संविधान की सीमा में रहकर अपने शौक पूरे करने का अधिकार है। ऐसे ही दूसरे व्यक्ति को भी अधिकार है। "जब आप नहीं चाहते, कि कोई व्यक्ति आपके शौक बैडमिंटन खेलना कैरम बोर्ड खेलना आदि पर टिप्पणी करे। तो ऐसे ही आपको भी दूसरों के शौक क्रिकेट खेलना, शतरंज खेलना आदि पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।" यदि आप ऐसा करते हों, तो कृपया ऐसा न करें, और सभ्य व्यक्ति बनने का प्रयत्न करें, जिससे आप और दूसरे लोग भी सुख शान्ति से जी सकें।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक,
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