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सनातन धर्म • Sanatan Dharma Ebooks & Quotes | Hinduism | Bhagavad Gita | Ramayan & Mahabharat | Ayurveda & Upanishads

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प्रश्न-दुःख का आना मानव के पतित अथवा पापी होने का परिचय है क्या? उत्तर-दुःख का आना पतित होने का फल नहीं है। दुःख तो सुख-भोग की आसक्ति को मिटाने के लिए आता है।
स्वामी शरणानंद

प्रश्न-महाराज जी! धर्मात्मा कौन होता है? उत्तर-जिसकी समाज को आवश्यकता हो जाए।
स्वामी शरणानंद

प्रश्न-जीवनमुक्ति का स्वरूप क्या है? उत्तर-इच्छाएँ रहते हुए प्राण चले जाएँ तो मृत्यु हो गई। फिर जन्म लेना पड़ेगा और प्राण रहते इच्छाएँ समाप्त हो जाएँ, तो मुक्ति हो गई। जैसे बाजार गए, पर पैसे समाप्त हो गए और जरूरत बनी रही, तो फिर बाजार जाना पड़ेगा। और यदि पैसे रहते जरूरत समाप्त हो जाए, तो बाजार काहे को जाना पड़ेगा?
स्वामी शरणानंद

प्रश्न-पढ़ाई-लिखाई बढ़ रही है, फिर भी दोष कम क्यों नहीं हो रहे? उत्तर-कोई दोष तब करता है, जब अपनी ही बात नहीं मानता। पढ़ाई-लिखाई तो एक प्रकार की योग्यता है। योग्यता जब निज विवेक के अधीन नहीं रहती है, तो बडे़-बड़े अनर्थ कर डालती है।
स्वामी शरणानंद

प्रश्न-स्वाधीनता का स्वरूप क्या है? उत्तर-स्वाधीनता का अर्थ है, अपने में सन्तुष्ट होना, न कि किसी वस्तु या परिस्थिति में आबद्ध होना।
स्वामी शरणानंद

प्रश्न-महाराज जी! सृष्टि की सेवा करने वाला प्रभु को कैसे प्यारा लगता है। उत्तर-जैसे तुम्हारे लड़के की सेवा करने वाला तुम्हें प्यारा लगता है।
स्वामी शरणानंद

(क) ”कोई गैर नहीं है“ यह धर्म का मंत्र है। (ख) ”कोई और नहीं है” -यह प्रेम का मंत्र है।
स्वामी शरणानंद

सेवा करो अथवा अपने लिये कुछ मत करो। अपने लिये कुछ मत करो; क्योंकि अपने लिए कुछ करने की बात है नहीं। क्यों नहीं है? कि अपनी जो माँग है– अमर जीवन की– वह माँग किसी कर्म के द्वारा पूरी नहीं होगी। हम जो अमर जीवन चाहते हैं, हम जो स्वाधीन जीवन चाहते हैं, हम जो चिन्मय जीवन चाहते हैं– तो वह जीवन किसी शरीर के आश्रित, परिश्रम द्वारा प्राप्त नहीं होता। इसलिये, अपने लिये करने की बात नहीं है; और वह जीवन संसार की सहायता से भी प्राप्त नहीं होता। अगर वह जीवन संसार की सहायता से प्राप्त होता, तब तो उस जीवन के लिये खोज करने की बात नहीं होती। देखिये, एक होता है खोज करना; एक होता है उत्पन्न करना। कर्म का सम्बन्ध होता है उन चीजों से जो उत्पन्न होती है। यह फर्क मालूम होता है कि नहीं? यह भाषा समझ में आयी या नहीं? खोज करना और उत्पन्न करना। जैसे, खेत में अनाज का उत्पन्न करना, तो इसमें कर्म अपेक्षित हुआ। लेकिन कोई चीज अगर मौजूद है और उसकी खोज करना है, तो यह कर्म है क्या? भाई देखो, न समझ में आए तो खून लगाकर शहीदों में शामिल मत होना। सुनते-सुनते जन्म बिता दो और समझ कुछ न पाओ, उससे कोई लाभ नहीं। इसलिए मैं बार-बार पूछता हूँ। तो किसी चीज को पैदा करना होता है और किसी चीज की खोज करना होता है। खोज याने तलाश। तलाश उस चीज की की जाती है जो ‘है’; और पैदा उसे किया जाता है जो ‘नहीं है’। कभी है और कभी नहीं है, उसको उत्पन्न किया जाता है और सदैव है, सर्वत्र है उसकी खोज की जाती है।
स्वामी शरणानंद

शरीर श्रमी, मन संयमी, बुद्धि विवेकवती, हृदय अनुरागी तथा अहं को अभिमान शून्य करके अपने को सुन्दर बनाना।
स्वामी शरणानंद

सुख की दासता देह की ममता से सिद्ध है। अतः वह जान लेने पर कि मैं देह नहीं हूँ देह की ममता का भी त्याग करना होगा, अर्थात् यह भली-भाँति जानना होगा कि देह मेरी नहीं है। पर इसका अर्थ देह के प्रति शत्रुता करना नहीं है, अपितु देह को उन्हीं की वस्तु मानकर, उनकी ही प्रसन्नतार्थ देह की सेवा करना है। सेवक के हृदय में दुःखी को देखकर करुणा उदय होती है, दुःख का भय उत्पन्न नहीं होता, और सुखी को देखकर प्रसन्नता उदय होती है, सुख का प्रलोभन उत्पन्न नहीं होता है।
स्वामी शरणानंद

यह नियम है कि यदि साधक अपने शरीर की भांति दूसरों से प्यार करने लगे और दूसरों की भांति अपने शरीर के प्रति न्याय करने लगे, तो बड़ी ही सुगमतापूर्वक राग त्याग में और द्वेष प्रेम में बदल जाता है, जिसके बदलते ही योग, ज्ञान, प्रेम की अभिव्यक्ति स्वतः हो जाती है।
स्वामी शरणानंद

शरीर के सम्बन्ध में कुछ भी चिन्ता नहीं करना। चाहे जैसा रहे, केवल उसके प्रति सेवा का भाव रखना है। वह भी इस कारण कि वह प्यारे की वस्तु है। जो वस्तु उनकी हो जाती है, उसमें उनके काम आने की योग्यता आ जाती है। और जिस वस्तु के प्रति अपनी ममता रहती है, उसमें अनेक दोष आ जाते हैं। ममता करने के योग्य तो केवल वे ही हैं।
स्वामी शरणानंद

सेवक के जीवन में अपने दुःख के लिए कोई स्थान ही नहीं है, क्योंकि उसका हृदय तो सर्वदा पराये दुःख से करुणित रहता है, अथवा सुखियों को देखकर प्रसन्न रहता है। अपने दुःख से दुःखी होना तो पशुता है, मानवता नहीं। आशा है कि अब तुम दुःखी न होगी और सेवा करते हुए समय व्यतीत करोगी।
स्वामी शरणानंद

प्रत्येक प्रवृत्ति से प्यारे की पूजा करो। सभी में उन्हीं की सत्ता जानो और प्रीति होकर उन्हीं को रस प्रदान करो। तुम रसमय हो। तुम्हारे प्रीतम तुमसे कभी-भी दूर नहीं है।
स्वामी शरणानंद

अपने मन की बात अपने से मत छिपाओ। बस, यह मन को निर्मल बनाने का सुगम उपाय है। तुमने बुद्धि के बल से मन पर शासन किया है। इस कारण वह बेचारा निर्बल हो गया है, पर मलिन नहीं। मन जो कुछ चाहता है उसे विवेक के प्रकाश में देखो, पर उस बेचारे को भय तथा लालच का शिकार मत होने दो। बस, बेड़ा पार है। लालच-रहित होते ही भय स्वतः मिट जायेगा।
स्वामी शरणानंद

हमारे गुरु ने, जिस दिन हम कपड़ा रंग कर घर से चले, उसी दिन यह बात कही थी कि बेटा! अगर तुम स्वाधीन हो जाओगे तो प्रकृति तुम्हारी सेवा करने के लिए लालायित हो जायगी। और हमने देखा कि जितनी हमने पराधीनता छोड़ी उतनी ही हमको संसार ने सुविधा दी। जितनी हमने पराधीनता पसन्द की, हमने अपने आप असुविधा पैदा कर ली। यह हमारे जीवन का अनुभव सिद्ध सत्य है, गुरु की वाणी है।
स्वामी शरणानंद

अनुबन्धानपेक्षेत सानुबन्धेषु कर्मसु। सम्प्रधार्य च कुर्वीत न वेगेन समाचरेत्॥ किसी प्रयोजनसे किये गये कर्मोंमें पहले प्रयोजनको समझ लेना चाहिये। खूब सोच-विचारकर काम करना चाहिये, जल्दबाजीसे किसी कामका आरम्भ नहीं करना चाहिये॥ ८॥ अनुबन्धं च सम्प्रेक्ष्य विपाकं चैव कर्मणाम्। उत्थानमात्मनश्चैव धीर: कुर्वीत वा न वा॥ धीर मनुष्यको उचित है कि पहले कर्मोंके प्रयोजन, परिणाम तथा अपनी उन्नतिका विचार करके फिर काम आरम्भ करे या न करे॥ ९॥
विदुर नीति

सञ्चितस्यापि महता वत्स क्लेशेन मानवैः। यशसस्तपसश्चैव क्रोधो नाशकरः परः।। हे प्रियवर! यह क्रोध तो मनुष्य के अत्यन्त कष्ट से सञ्चित यश का और तप का भी प्रबल नाशक है।
विष्णुपुराण

विषयाणामानुकूल्ये सुखी दुःखी विपर्यये। सुखन्दुःखञ्च तद्धर्म्मस्सदानन्दस्य नात्मनः।।१०७।। विषयों की अनुकूलता से यह सुखी और प्रतिकूलता से दुःखी होता है।सुख और दुःख इस अहङ्कार के ही धर्म हैं,नित्यानन्दस्वरूप आत्मा के नहीं।
विवेकचूडामणिः

भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्नं मत्स्यो वडिशमायसम्। लोभाभिपाती ग्रसते नानुबन्धमवेक्षते॥ मछली बढ़िया चारेसे ढकी हुई लोहेकी काँटीको लोभमें पड़कर निगल जाती है, उससे होनेवाले परिणामपर विचार नहीं करती॥ १३॥ यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत्। हितं च परिणामे यत् तदाद्यं भूतिमिच्छता॥ अत: अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको वही वस्तु खानी (या ग्रहण करनी) चाहिये, जो खानेयोग्य हो तथा खायी जा सके, खाने (या ग्रहण करने)-पर पच सके और पच जानेपर हितकारी हो॥ १४॥
विदुर नीति