श्रीमद आद्य शंकराचार्य परम्परा के दिव्य संदेश 🚩
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ८१*
_बिना ज्ञान के न भक्ति हो हो सकती है और न मोक्ष ही_
जितने कर्म मनुष्य एक जन्म में करता है उसका फल इतना अधिक होता है कि कई जन्मों में भी भोग कर समाप्त नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि संचित कर्मों की अनन्त राशि प्रत्येक जीव के लिए भोगने को पड़ी है। उसको भोगने के लिए अनन्तानन्त जन्म-धारण करना पड़ेगा। यदि उसे भोग कर समाप्त करना है तो जब तक संचित कर्म नष्ट नहीं होंगे तब तक जन्म-मरण के चक्कर से छूटोगे नहीं।कर्मराशि को समाप्त करने के लिए ही ज्ञानाग्नि उत्पन्न की जाती है । जो अपनी संचित कर्म राशि को ज्ञानाग्नि से भस्म कर देता है उसी को बुधजन 'पंडित' कहते हैं-
_"ज्ञानाग्नि दग्धकर्माणं तमाह: पंडितं बुधाः !”_
कोई मनुष्य एक मिनट में किसी को कत्ल कर दे तो उसे यदि फांसी न हुई तो आजन्म काला-पानी या बीस वर्ष की सजा अवश्य ही होगी। इसी प्रकार और भी कार्यों के उदाहरण से यही मालूम होता है कि २-२, ४-४ मिनट में किये कर्मों का फल वर्षों भोगना पड़ता है तो जीवन भर में किये कर्मों का फल कितने जन्मों तक भोगना पड़ेगा, इस का कुछ ठिकाना नहीं । इसीलिये ज्ञान का महत्व है कि ज्ञान हो जाने पर समस्त संचित कर्म नष्ट हो जाते हैं।
_“यथैधांसि समिद्धोग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।_
_ज्ञानाग्नि सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥"_
अर्थात्, जैसे प्रज्वलित अग्नि इंधन को भस्म कर देती है, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि समस्त (संचित) कर्मों को भस्म कर देती है। इसलिये ज्ञानाग्नि से वंचित को नष्ट करो और प्रारब्ध को शान्तिपूर्वक भोग डालो।
अपने संचित कर्मों को नष्ट करने के लिए ज्ञान की प्राप्ति करना ही सबसे बड़ा कार्य है। ज्ञान प्राप्ति के बाद फिर कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। यथा-
_"ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः।_
_नैवास्ति किंचित्कर्तव्यं अस्ति चेन्नस तत्त्ववित्॥”_
ज्ञानी के लिए लिखा है कि यदि उसका मनोराज्य किसी कार्य के लिए हो तो उसे ऊँकार का जप करना चाहिये-
_"बुद्ध तत्वेन धी दोष शून्येनेकान्तवासिनः।_
_दीर्घं प्रणवमुच्चार्य मनोराज्यं विलीयते॥"_
ज्ञान हो जाने के बाद बिदेह मोक्ष तो होता है, पर जीवन्मुक्ति के लिए उसे भी अहंग्रहोपासना का सहारा लेना पड़ता है। पहले अपरोक्ष ज्ञान होता है अर्थात् शास्त्र और गुरुओंके द्वारा यह निश्चय होता है कि एक अद्वितीय परमात्मा सर्वत्र चराचर में परिपूर्ण है, वह सच्चिदानन्द अखण्ड ज्ञानस्वरूप है। ऐसा निश्चयात्मक, संशय विपर्यय रहित बोध ही अपरोक्ष ज्ञान है।
प्रहलाद को पहले से ही यह ज्ञान था कि हमारा राम सर्वत्र परिपूर्ण है। ऐसा उन्हें निश्चय था, इसलिये वे अहर्निश भगवान का चिन्तन करते रहते थे। जब तक भगवान् को कोई जानेगा नहीं, तब तक उनकी भक्ति ही क्या करेगा। भगवान् को सर्वत्र चराचर में जान लेना ही ज्ञान है और उनकी सेवा-पूजा करने लगना भक्ति है। भक्ति के द्वारा उन्हें एक देश में प्रकट करके उनका साक्षात्कार करना ही विज्ञान है और विज्ञान के बाद उसी भाव में तल्लीन हो जाना परा भक्ति है।
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हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ८०*
_घरमें रहते हुए ही महात्मा बनो_
जो जहाँ है, वह वहाँ रहते हुए ही महात्मा बन सकता है। गेरुआ वस्त्र या तिलक छाप से कोई महात्मा नहीं होता।वेश कल्याणकारी नहीं, निष्ठा से कल्याण होता है। मन की वृत्ति में महात्मापन होता है। इसलिए जहाँ हो, वहीं रहते हुए मन की धारा को बदलो – संसार का चिन्तन भीतर से कम करो और परमात्मा का चिन्तन बढ़ाओ।
आजकल अचिन्त्य को चिन्त्य मान लिया गया है । मुख्य चिन्त्य परमात्मा ही है। उसका चिन्तन न करके अचिन्त्य संसारी पदार्थों का चिन्तन किया जाता है। इसलिए सुख शान्ति का अनुभव नहीं होने पाता। यदि प्राणों का रक्षण केवल सांसारिक कार्यों और विषय-भोगों के लिए है तो वह लुहार की धौंकनी ही है। अतः प्राण का पोषण करो और उसे परमात्मा में लगाओ।
पहले श्रद्धा उत्पन्न करो। धन में श्रद्धा है, तभी तो धन का चिन्तन करते हो। जब परमात्मा में श्रद्धा हो जायगी तो उसी का चिन्तन होने लगेगा। विचार करो कि धन आदि समस्त सांसारिक पदार्थ यहीं पड़े रह जायगें और आगे की यात्रा अकेले ही करनी पड़ेगी। उस आगे की यात्रा के लिए अभी से कुछ तैयारी कर लो - परमार्थ में श्रद्धा बढ़ाओ, नित्यानन्द स्वरूप परमात्मा से प्रेम बढ़ाओ। जो चीज यहीं पड़ी रह जाने वाली है उसमें, अर्थात् जगत् की व्यावहारिक चीजों में केवल शिष्टाचार बनाओ और मुख्य श्रद्धा परमार्थ में करो, जो साथ जायगा ।
एक बार भी निश्चय हो जाय कि वह रुपये का ढेर मदारी का बनाया हुआ है, तो फिर चाहे कोई कितना भी लालच देगा पर उसमें प्रेम नहीं हो सकता । मदारी के क्षणिक रुपये के समान ही संसार के समस्त पदार्थ और सम्बन्ध क्षणिक ही हैं। इसलिए इनसे व्यवहार तो करो और ऊपर से शिष्टाचार पूरा रखो । मन के भीतर इनका स्थान मत बनाओ। मन में नित्य अविनाशी आनन्द स्वरूप परमात्मा को स्थान दो। मन में हमेशा भगवान् का स्मरण बना रहे और मर्यादा का उल्लंघन न हो - यही महात्मापन है।
*उपदेश ८१*
_धन-संग्रह से अधिक प्रयत्य_
_बुद्धि शुद्ध करने के लिए करो_
सन्तान के लिए धन-संग्रह करने में आप लोग जितना प्रयत्न करते हैं उसका आधा प्रयत्न भी यदि बुद्धि-शुद्ध करने के लिए करें तो बहुत लाभ हो।
बुद्धि शुद्ध रही तो धन कम रहते हुए सन्तान सुख शान्ति का अनुभव कर सकती है । पर यदि बुद्धि दूषित रही तो अनन्त धन-धान्य रहते हुए भी दुर्वासनाओं में पड़कर सन्तान दुःख और अशान्ति ही भोगेगी। इसलिए प्रथम बुद्धि शोधन के लिए प्रयत्न करो, पश्चात् वन-संग्रह करो।
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हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ७९*
सत्संग की बातों का मनन करना आवश्यक
शुकदेव जी ने भागवत सुनाया, हजारों लोगों ने सुना, परन्तु उसके प्रभाव से मोक्ष केवल परीक्षित को ही हुआ । गोकर्ण से भी बहुतों ने सुना, परन्तु मोक्ष केवल धुंधकारी को हुआ। इस पर यह प्रश्न उठता है कि वृष्टि व्यापक हो और तृप्ति एक मनुष्य को हो—यह कैसी बात है ! बात यह है कि मोक्ष का सम्बन्ध मन से है। जिसका मनन किया जाता है उसी संस्कार दृढ़ होता है और संस्कारों की दृढ़ता पर ही जीव का बन्धन या मोक्ष निर्भर करता है। श्रुति और स्मृति ( अर्थात् वेद और शास्त्र) दोनों का यही सिद्धान्त है-
"मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः” ।
—श्रुति ।
"ध्यान एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः” ॥
- याज्ञवल्क्य स्मृति ।,
जो सिद्धान्त या जो भगवत् सम्बन्धी वार्ता सत्संग में सुनी जाय, उस पर भली प्रकार विचार करके उसको मनन करते रहना चाहिये ।
सत्संग की बातें सुनने से कर्ण तो पवित्र होंगे। परन्तु यदि उन पर कुछ विचार नहीं किया गया, कुछ मनन नहीं किया गया, तो वह सब कर्ण तक ही रह जायगा और एक कर्ण से होकर दूसरे से बाहर निकल जायगा। सत्संग की सारी बातों का प्रयोजन मन ( अन्तःकरण ) को पवित्र करना है । मन ही प्रधान वस्तु है । मन यदि अपवित्र रहा तो इसी के कारण जन्म-मरण का चक्र चलता रहेगा और यदि मन पवित्र हो गया तो उसी से मोक्ष हो जायगा। महर्षि याज्ञवल्क्य जी ने ध्यान को ही बंधन या मोक्ष का कारण बताया है । ध्यान मन ही करता है। मन पवित्र हुआ तो भगवान् का ध्यान करता हुआ मनुष्य मोक्ष प्राप्त करेगा और यदि मन अपवित्र रहा तो नाना प्रकार की वासनाओं में फंसा रह कर अनर्थ चिन्तन करता हुआ, अनावश्यक वस्तुओं का ध्यान करता हुआ, संसार-चक्र में मन उसे घुमाता रहेगा।
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हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
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ब्रह्मलीन जगतगुरु शंकराचार्य का यह वक्तव्य खरे अर्थ में वर्तमान में बहुत ही लग रहा है, क्योंकि आजकल कोई भी बुद्धि का लठ्ठ अपने आपको *जगतगुरु* या *सद्गुरु* घोषित कर रहा है, यह कथित *नवसंप्रदायवाद* ने वैदिक धर्मियों को इकठ्ठा नही सम्प्रदाय के नाम पर बांटा है यह नग्न वास्तविकता है। इसलिए श्रीवैदिकब्राह्मणः। गुजरात समूह आप सब से अनुरोध करता है इन धार्मिक संस्थाओं जैसे कोई पीछे समाज लगाता है,कोई पीछे परिवार लगाता है, कोई पीछे मिशन लगाता है तो कोई पीछे सम्प्रदाय सब धर्म के नाम पर धंधा चलाते है, आपके जेब से करोड़ो रूपीए के मंदिर बनाकर शान से ऐसी में आराम करते है महंगी गाड़ियों में घूमते है। इनके के चक्कर में न पड़े। संस्थाकीय भक्त न बनें सनातन मूल परम्पराओं से जुड़े।
- एडमीन क्षेत्रज्ञ
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ७८*
*जगद्गुरु किसे कहते हैं ?*
संसार में आस्तिक व नास्तिक दो श्रेणी के लोग हैं :
नास्तिक जगत् के तो कोई गुरु होते नहीं। आस्तिक जगत् का गुरु हो उसे ही जगद्गुरु कहना चाहिये । आस्तिकों में दो प्रकार की निष्ठा पाई जाती है — कुछ लोग साकार ब्रह्म में निष्ठा रखते हैं और कुछ की निष्ठा निराकार में होती है। जो साकार-वादियों और निराकार-वादियों दोनों का गुरु होने की क्षमता रखता हो, वही जगद्गुरु कहा जा सकता है । तात्पर्य यह है कि साकार देवताओं में जो पंचदेवता वैदिक हैं, अर्थात भगवान विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य और गणेश, इन सब की उपासना का प्रकार समझाने वाला जो हो और जो इन पंचसाकार देवताओं में निष्ठा न करके निर्गुण निराकारवादी है उसको भी जो उपदेश कर सके वही जगद्गुरु है । एक-एक देवता की उपासना का प्रकार समझाने वाले लोग उसी प्रकार हैं, जैसे एक-एक रोग की दवा की एक-एक शीशी रखने वाले टुटपु जिया वैद्य लोग जो कम्पाउन्डर की भी हैसियत नहीं रखते और कहते हैं अपने को सिविल सर्जन। कोई अपने पुत्र का नाम 'राम' रखले तो कौन रोक सकता है। परन्तु नाम मात्र से तो वह राम नहीं हो जाता । कोई अपने नाम के आगे जगद्गुरु लिखने लगे तो उसे रोके कौन ? किन्तु जब जगद्गुरु के लक्षण पूछने लगते हो तो लक्षण- युक्त जगद्गुरु वही है जिसके दरवाजे से किसी भी देवता में निष्ठा रखने वाला निराश होकर न लौटे। आधुनिक सम्प्रदायों ने शिव, शक्ति, विष्णु आदि की उपासनाओं के सम्बन्ध में जो बटवारा किया गया है वह अनुचित है। पंचदेवताओं में कोई छोटा-बड़ा नहीं है। सभी देवता अपने भक्त का समान रूप से कल्याण करने में समर्थ हैं जितने उपासक हैं सभी वैष्णव हैं; क्योंकि सभी देवता भगवान के ही अंग हैं। भगवान का स्वयं कथन है कि -
"ज्ञानं गणेशो मम चक्षुरकः,शिवो ममात्मा ममशक्तिराद्या।
विभेद बुद्धया मयि ये भजन्ति,ममाङ्गहीनं कलयन्ति मन्दाः॥"
अर्थात् गणेश जी भगवान के मस्तिष्क हैं, सूर्य भगवान के नेत्र हैं, शिव भगवान की आत्मा, आद्या भगवती भगवान की शक्ति है । इसलिये इन पंचदेवों को एक ही भगवान के भिन्न-भिन्न अङ्ग न मान कर जो इनमें परस्पर भेद-भावना मान कर इनमें से किसी एक की उपासना करते हैं, वे भगवान की उपासना नहीं करते बल्कि उनका अङ्ग- छेदन करते हैं ।
स्पष्ट है कि जो गणेश का खण्डन करता है वह चाहे विष्णु-भक्त हो, किन्तु भगवान विष्णु के मस्तिष्क का छेदन करने वाला होता है । कोई विष्णु भक्त यदि शिव का खण्डन करता है तो वह भगवान विष्णु की आत्मा का छेदन करता है । इसी प्रकार देवी का खण्डन करने वाला भगवान को शक्तिहीन करता है । इसलिये आज-कल के साम्प्रदायिक लोग जो परस्पर एक दूसरे से ईर्ष्या द्वेष करते हैं और अपने को वैष्णव कहते हुए भगवान शिव का या अपने को शैव कहते हुए भगवान विष्णु का खण्डन करते हैं, वे न शैव ही हैं और न वैष्णव ही - वे केवल दम्भी हैं । वैष्णव वही है जो भगवान विष्णु का भक्त है |
'विष्णौरतः वैष्णवाः' 'ऊर्ध्वपुण्ड्रवत्वं वैष्णवत्वम्'
'ऊर्ध्वपुण्ड्र वाले को वैष्णव कहते हैं – यह कोई सिद्धांत
नहीं है ।
जो भगवान विष्णु की उपासना करता है वह तो वैष्णव है ही।परन्तु सभी देवता भगवान के भिन्न-भिन्न अंग होने के कारण किसी भी देवता की उपासना करने वाला भी वैष्णव कहा जा सकता है। जिस समय किसी देवता की उपासना कर।रहे हो, उसी समय वैष्णव हो। समस्त आस्तिक- जगत् वैष्णव है।
केवल ऊर्ध्व-पुंड्र लगा कर अपने को वैष्णव और दूसरे को अवैष्णव कहने वाले वास्तविकता से अपरिचित हैं । वे भगवान विष्णु का अपमान करते हैं । कोई शिव भक्त या शक्ति उपासक यदि अपने को वैष्णव नहीं मानता है तो यह भी उसकी भूल है। कोई भी संसार में ऐसा नहीं है जो वैष्णव नहीं। संप्रदाय-वादियों की फिरकेबाज़ी न उनके काम की चीज है और न दूसरे की ही।
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हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
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*अनंत श्री विभूषित शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी का संक्षिप्त परिचय और अतुलनीय योगदान*
*महाराज श्री के ९९ वर्धापन दिवस की बधाई हो समस्त सनातनी धर्मानुरागी हिन्दू जनता जनार्दन को*
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हर हर महादेव
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ७६*
भगवान् के आज्ञारूप वेद शास्त्र के अनुसार चलिये
धनवान व पुत्रवान होने के लिये तो सब लोग प्रयत्न करते हैं, परन्तु आचार्यवान होने के लिये वे अधिक प्रयत्न नहीं करते। आचार्यवान होना ही समस्त सुख शान्ति को प्राप्त करना है। किसी को गुरु मान लेने से वह आचार्य नहीं कहा जाnसकता, जिसमें आचार्य के लक्षण हों वही आचार्य कहा जा सकता है। आचार्य ही किसी को आचार्यवान बना सकता है ।
श्रुति-स्मृति ममैवाज्ञे,यस्तोंल्लंघ्य वर्तते ।
आज्ञोच्छेदी ममद्रोही,मद्रभक्तोपि न मे प्रियः ॥
अर्थात्, श्रुति-स्मृति मेरी आज्ञा है। उसका उल्लंघन जों कोई मरता है वह चाहे मेरा भक्त ही क्यों न हो, वह मुझे प्रिय नहीं लगता ।
इसलिये भगवान की आज्ञा - रूप श्रुति-स्मृति [वेद-शास्त्र] की ही प्रधानता मानी जाती है ।
हम वेद-शास्त्र की ही बात सुनाते हैं, अपनी कोई मनगढ़न्त बात नहीं कहते। हमने कभी नहीं कहा कि हमारी बात मानो। क्योंकि हमारी व्यक्तिगत बात मानोगे तो शङ्कराचार्य की बात मानने की आदत पड़ जायेगी। फिर यदि कोई नालायक भी इस गद्दी पर आ गया तो उसकी भी बात मानोगे । किसी के भी व्यक्तिगत विचारों से कल्याण नहीं होगा, कल्याण तो वेद-शास्त्र की बातें मानने से होगा।
इसलिये हम कहते हैं कि शङ्कराचार्य की व्यक्तिगत बात मानने की आदत मत डालो, वेद-शास्त्र के अनुसार जो कहें वही मानो।
शास्त्र कहता है कि वेद-शास्त्र भगवान् की आज्ञा है। भगवान् के भक्तों को तो अवश्य ही भगवान् की आज्ञारूप वेद-शास्त्र का पालन करना चाहिये । जब तक भगवान मिले नहीं हैं तभी तक उनकी आज्ञा का पालन करना आवश्यक है । जब भगवान से मिल जावोगे तब तो भगवद्रूप ही हो जाओगे ; उस समय आज्ञा पालन का कोई प्रश्न ही नहीं रह जायगा।
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हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ७५*
_स्त्री समाज को केवल पति परायण_
_ही रह कर कल्याण_
स्त्रियों में स्वभाव से ही रजोगुण अधिक रहता है । इसलिये अधिकांशतः ध्यान-समाधि की ओर वे सफलता पूर्वक अग्रसर नहीं हो सकतीं। इसीलिये उन्हें एक पति-परायण रहने का विधान है। निरन्तर पति-परायण रहकर स्त्री अन्त काल में पति का स्मरण करती हुई ही शरीर त्याग करेगी, जिससे उसका जन्म पुरुष योनि में होगा। क्योंकि यह सिद्धान्तहै कि जिस-जिस भाव से जीव शरीर छोड़ता है उसी-उसी भाव को प्राप्त होता है-
यं यं वापिस्मरन भावं,त्यज्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवेति कौन्तेय,सदा तद्भाव भावितः॥ -"गीता"
स्त्री यदि भगवान का चिन्तन करती हुई शरीर त्यागे तब तो भगवान में मिल ही जायगी, इसमें सन्देह नहीं । परन्तु स्त्री-प्रकृति रजोगुण प्रधान होने के कारण उनमें चाञ्चल्य अधिक होता है। इसलिये भगवान स्वरूप में उनकी वृत्ति टिकना कठिन रहती है। साथ ही यह भी बात है कि पुरुष- चिन्तन का स्वभाव स्त्री का स्वाभाविक हुआ करता है । इस लिये पति-परायण होकर सदा पतिभावापन्न रहना ही उनके लिये शास्त्र में श्रेयस्कर बताया गया है। पति-परायण रहेगी तो अन्त काल में भी पति का स्मरण करती हुई शरीर त्याग कर पुरुषयोनि को प्राप्त हो जायगी और अगले जन्म में भगवत् परायण होकर भगवान में मिल जायगी ।
स्त्री-योनि महा कष्टकारी योनि है - गर्भ धारण और प्रसव - काल में तो मरण के समान महा भयंकर दुःख होता है।उसके बाद भी सन्तान के पालन-रक्षण आदि में जों कष्ट होते हैं, वह स्त्रियाँ ही जान सकती हैं, दूसरा कोई इसकी भयंकरता का अनुमान भी नहीं लगा सकता । इस प्रकार अत्यन्त कष्टदायिनी स्त्री-योनि से जीव को मुक्त करके पुरुष-योनि में लाने के लिये ही पातिव्रत्य का इतना विधान शास्त्र में किया गया है। यह सब स्त्रियों के कल्याण के लिये ही है।
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हर हर शंकर 💐🚩
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ७४*
_क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्री जाति के लिये गुरुत्व नही_
शास्त्रों में स्त्री जाति के लिये गुरुत्व कहीं नहीं बताया। स्त्रियाँ गुरु नहीं हो सकतीं। गार्गी, चुड़ाला, सुलभा आदि स्त्रियाँ ज्ञानी और योगी भी हो गई हैं। परन्तु यह कहीं भी नहीं मिलता कि उन्होंने किसी को अपना शिष्य बनाया हो।
भगवान का भजन पूजन करते हुए साधन सम्पन्न होकर ज्ञान की प्राप्ति तो सब कर सकते हैं, भगवान की भक्ति में सब का अधिकार है, परन्तु गुरु सब नहीं बन सकते | गुरुत्व केवल ब्राह्मण ही को है। ब्राह्मण के अतिरिक्त क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, शिष्य तो हो सकते हैं, पर गुरु नहीं। स्त्रियों को भी गुरु बनने का अधिकार नहीं है।
जनक-राज विदेह इतने बड़े ज्ञानी थे, परन्तु क्षत्रिय होने के नाते उन्होंने गुरु बनने का प्रयत्न कभी नहीं किया। जिस समय शुकदेव जी को व्यास जी ने जनक जी के पास ज्ञान की शिक्षा लेने के लिये भेजा, उस समय जनक जी ने पूछा कि आप किस लिये पधारे हैं ? शुकदेव जी ने कहा कि आपसे ज्ञान को शिक्षा लेने के लिये पिता जी ने भेजा है। जनकजी ने कहा कि आप ब्राह्मण हैं, हम क्षत्रिय हैं, आपको उपदेश करने का अधिकार हमें नहीं है। इसलिये शास्त्र विरुद्ध हम आपको कैसे उपदेश करें ।
शुकदेवजी ने कहा कि आप क्षत्रिय हैं तो दान देना तो आप का धर्मं ही है । शास्त्र आपको दान देने की आज्ञा तो देता ही है; आप हमें ब्रह्मविद्या का दान दे दें । यह सुन कर जनकजी ने शुकदेव जी को उच्चासन पर बैठा कर उनका पूजन किया और दान रूप में उन्हें ब्रह्म-विद्या दी। पर शिष्य बनाकर जनक जी ने उपदेश नहीं किया। यह है समर्थ लोगों का शास्त्रीय मर्यादा - पालन का आदर्श । आजकल कायस्थ, वैश्य, तेली, कलवार भी कपड़ा रंग-रंग कर साधू का वेष बना लेते हैं और लोगों को अपना शिष्य बनाने के लिये लालायित रहते हैं । इस प्रकार के गुरु और शिष्य दोनों ही पतन को प्राप्त होते हैं। जो बातें हम कहते हैं वह शास्त्रानुकूल ही कहते हैं, अपनी मनगढ़न्त बात हम कुछ नहीं कहते।
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हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*_【अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश】_*
*उपदेश - ७३*
_ऊंकार का जप_
बहुत लोग शास्त्र - विधान देखकर और अधिकार- अनधिकार का विचार न करके केवल यहाँ-वहाँ से महात्म्य पढ़-सुनकर ही उपासना में प्रवृत्त हो जाते हैं। कुछ लोग ॐकार को बहुत महत्वशाली मानकर उसी का जप करने लगते हैं। गीता में भगवान् ने कहा अवश्य है कि प्रणव मैं हूं। किन्तु यदि इसी कारण भगवान् का स्वरूप मान कर भगवान को अपनाते हो तो उसी प्रकार सिंह को भी क्यों पकड़ नहीं रखते, क्योंकि वह भी तो ( ओंकार के समान) भगवान का स्वरूप ही है। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने कहा है कि-
'मृगानां मृगेन्द्रोऽहं ।'
ॐकार के महात्म्य से प्रेरित होकर जो लोग केवल ऊँकार का ही जप करते हैं उनकी क्या दशा होती है, यह हम अपने अभी तक के अनुभव से बताते हैं, सुनो-
दो, चार, दस, बीस बार नित्य ॐकार जप से तो कोई विशेष बात नहीं होती। परन्तु यदि दो-चार हजार जप नित्य होता रहे तो थोड़े ही समय में लौकिक परिस्थिति कमजोर हो जायगी। संखिया मारक है, परन्तु थोड़ा-थोड़ा खाया जाय तो उसका असर उतना शीघ्र नहीं होता। यदि थोड़ी भी मात्रा अधिक हो जाय तो मारक तो है ही । इसी प्रकार केवल ॐकार का जप विशेष रूप से करने वालों की लौकिक व्यवस्था अवश्य कमजोर हो जाती है; रोजी-रोजगार में कमी हो जाती है; स्त्री पुत्र आदि अस्वस्थ रहते हैं और मर भी जाते हैं ।
पाँच-छ: वर्ष पहिले हम लक्ष चण्डी यज्ञ के समय लखनऊ गये थे। उस समय एक वृद्धा हमारे पास आई और दो-चार लोग भी उसके साथ आये। उन लोगों ने कहा कि माता जी बड़ी भक्ता हैं, दिन भर भजन-पूजन में लगी रहती हैं, पर अभी थोड़े ही दिन हुए कि इनके दो पुत्र युवावस्था में मर गये। इसके उत्तर में हमने उनसे पूंछा कि 'ॐकार का जप करती हो क्या ?" उसने कहा कि महाराज ! वही तो हमारा आधार है, दिन भर जप किया करती । हमने कहा कि अच्छा हुआ आपने संसार को तो जप डाला, अब न छोड़ना । परन्तु उसके लगाव से वह चीज ही नष्ट हो जायगी, यही ॐकार के जप का फल है । या तो कहीं प्रेम न करो और यदि प्रेम करोगे तो वह प्रेमास्पद पदार्थ ही ॐकार के जप के प्रभाव से नष्ट हो जायगा । इसी लिये गृहस्थों को केवल ॐकार के जप का अधिकार नहीं है ।
शास्त्र जो अधिकार नहीं देता है वह कल्याण की दृष्टि से नहीं देता। यदि ॐकार जप से गृहस्थों को लाभ होता तो कोई कारण नहीं था कि शास्त्र उनके लिये निषेध करता मन्त्रों के आगे जो ऊँकार जोड़ देते हैं वह माङ्गलिक अर्थ में होता है। दूसरी बात यह है कि स्त्रियों को ऊँकार युक्त मन्त्र के जप का निषेध है। जहाँ पुरुषों के मन्त्र के प्रारम्भ में 'ऊँकार' लगाया जाता है वहाँ स्त्रियों के मन्त्र के आगे 'श्री' लगाया जाता है ।
भगवान् शङ्कर ने पार्वती को उपदेश करते हुए कहा है कि ऊँकार सहित मन्त्र का जप स्त्रियों के लिये विष के समान होता है और ऊँकार रहित मन्त्र के जप से ही स्त्रियों का कल्याण होता है।विचार करना चाहिये कि शङ्करजी अपनी पत्नी को ज्ञान का उपदेश कर रहे हैं, परन्तु ऊँकार को बचा रहे हैं । यदि स्त्री जाति के लिये ऊँकार लाभदायक होता तो अपनी अर्द्धाङ्गिनी को उपदेश करते हुये शङ्करजी ऊंकार का उपदेश क्यों न करते।
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हर हर शंकर 💐🚩
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*उपदेश - ७१*
_तुम तो सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा के अंश हो_
_अपने को भूल कर दुःख-सागर में डूब रहे हो_
एक बार विचार करके देख लो कि तुम कौन हो। संसार में जितना जो कुछ तुम अनुभव करते हो, वह सब तुम से अलग है। शरीर, मन, बुद्धि, प्राण आदि सब कुछ तुम अपना मानते हो – कहते हो कि हमारा शरीर, हमारा मन, हमारी बुद्धि, हमारा प्राण । स्पष्ट है, जो कुछ अपना मानते हो उसके तुम स्वामी तो हो, पर तुम्हारा अस्तित्व उससे ऐसे भिन्न है जैसे तुम्हारा घर, तुम्हारा मंदिर है। मंदिर तुम्हारा है; पर तुम मंदिर नहीं हो। इसी प्रकार शरीर, मन, बुद्धि, प्राण आदि तुम्हारे हैं, पर तुम वह नहीं हो— तुम उससे भिन्न वस्तु हो। तुम सच्चिदानन्द परमात्मा के अंश हो, परन्तु अविवेक के कारण, अज्ञान के कारण शरीर, मन, बुद्धि, आदि के साथ तुमने अपनी इतनी घनिष्टता बना ली है कि उसे ही तुम अपना स्वरूप समझने लगे हो।
हस्त पाद आदि कर्म- इन्द्रियां नष्ट हो जाँय तो भी तुम रहते हो, आँख - कान आदि ज्ञानेन्द्रियां नष्ट हो जाँय तो भी तुम बहरे अंधे होकर रहते हो तुम्हारा अस्तित्व ज्ञानेन्द्रियों के नष्ट होने से नष्ट नहीं होता। जब कभी तुम बहुत भयंकर रोग से पीड़ित होते हो तो यही कह उठते हो कि 'प्राण निकल जाता तो हम सुखी हो जाते' अर्थात् तुम समझते हो कि संसार की समस्त वेदनायें प्राण निकल जाने से समाप्त हो जायेंगी।इस प्रकार प्राण भी तुमसे भिन्न पदार्थ है, तुम प्राण भी नहीं हो। जितना जो कुछ दृश्य है और अनुभव हो सकता है, उस सबसे तुम भिन्न हो।
समझ लो, जहां तक जिन-जिन पदार्थों का तुम त्याग कर सकते हो वहां तक उन-उन पदार्थों से तुम भिन्न हो- तुम्हारा स्वरूप वही है जिसका तुम कभी भी त्याग नहीं कर सकते। सबका अनुभव करने वाले सबके साक्षी तुम शुद्ध बुद्ध मुक्त चेतन स्वरूप सच्चिदानन्द सनातन परमात्मा के अंश हो। अपने स्वरूप को समस्त जगत् और शरीर, इन्द्रियां, प्राण आदि सब से अलग अनुभव कर लो तो फिर संसार में रहते हुए भी दुःख - शोकादि से मुक्त हो जाओगे।
अपने स्वरूप का अनुभव करने के लिये वेद-शास्त्र पर विश्वास करके सद्गुरुओं के बताये अनुसार उपासना विधान का सहारा लेकर उपासना करते चलो।
*उपदेश ७२*
_विधि के साथ भगवान् का नाम जपो_
समय तो किसी न किसी रूप में लोग उपासना के लिये देते ही हैं परन्तु विधान के बिना जाने उसका फल विपरीत ही होता है, अनुकूल नहीं होता। पहले तो इसका ज्ञान होना चाहिये कि कहाँ से उपासना का प्रकार सीखा जाय । ऐसा नहीं कि जहाँ से जो मिलता देखो वहीं से लेलो, पर जहाँ से शास्त्र लेने को कहता है वहीं से लेना चाहिये ।
सन्तान चाहते हो तो ऐसा नहीं कि जहाँ भी पड़ी मिले वहीं से उठा लो । विधि पूर्वक विवाह करो, विधानानुसार गर्भाधानादि संस्कार कराओ, तब जो सन्तान होगी वह काम की होगी ।
इसी प्रकार कोई भी काम किया जाय, यदि विधान से किया गया तो उसका फल उत्तम होगा। यह पक्ष बिल्कुल अनर्थकारी है कि-
"उत्तम विद्या लीजिये, यदपि नीच पर होय ।"
यह कहावत तभी से चली है जब से कुम्हार, तेली आदि सब शिक्षक होने लगे हैं । पहिले तो उत्तम विद्या नीच में जा ही नहीं सकती और यदि आ भी गई तो वह नीच नहीं रह सकता। उत्तम विद्या और नीचता दोनों एक साथ कैसे रह सकती हैं— प्रकाश जहाँ जाता है वहाँ अंधकार नहीं रहता।
गंगाजल पीना है तो नाबदान से क्यों पियें, धारा का क्यों न पियें। सन्तान ही चाहना है तो वैध सन्तान क्यों न उत्पन्न करें। उत्तम विद्या ही लेनी है तो उत्तम स्थान से क्यों न ली जाय।
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हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ६८*
_सर्वत्र भगवान का भाव ही भक्तों का लक्षण_
भगवद्भक्ति विभोर सभी भक्त वैष्णव हैं । रात्रि-दिन चोरी, दगाबाजी, भृष्टाचार आदि करते हुये अपने को विष्णुभक्त वैष्णव मानने से कोई वैष्णव नहीं हो सकता ।
शिव, गणेश, सूर्य, शक्ति आदि सब भगवान के अङ्ग हैं। कोई शिव-भक्त कहे कि हमारे शङ्कर ही भगवान हैं, कोई सौर्य कहे कि सूर्य ही भगवान हैं तो यह उसी प्रकार है जैसे सम्पूर्ण हाथी के स्वरूप को न जाननेवाले कुछ अंधों ने हाथी की सूँड पकड़कर कहा कि यह हाथी मूसल के समान है। किसी ने चरण पकड़कर कहा कि हाथी खम्भे के समान है। किसी ने कान पकड़कर कहा कि हाथी ऐसा ही सूप के समान है। बात यही है 'अंधों ने हाथी देख झगड़ा मचाई है' जो हाथी के सम्पूर्ण स्वरूप को जानता है वह कभी नहीं कहेगा कि हाथी सूप के समान होता है या मूसल के समान होता है ।
इसी प्रकार जिसने भगवान को ठीक से समझ लिया है वह कभी नहीं कह सकता कि शिव ही भगवान का स्वरूप है या गणेश ही भगवान का स्वरूप है या विष्णु का चतुर्भुजी रूप ही भगवान का स्वरूप है । जो यथार्थ भगवत्-तत्व से परिचित है वह यही कहेगा कि इन समस्त भिन्न-भिन्न स्वरूपों में वही एक परमात्म तत्व व्यक्त हुआ है अथवा यह पंचदेव एक ही परमात्मा के भिन्न-भिन्न अङ्ग रूप हैं। वास्तव में किसी भी देवता की उपासना भगवान की ही उपासना है। यही शास्त्र का सिद्धान्त है ।
*उपदेश ६९*
_गुरु बदलने में कोई पाप नहीं होता_
कुछ लोग कहते हैं कि एक गुरु बना लिया तो दूसरा गुरु नहीं बनाना चाहिये । किन्तु यह कोई शास्त्र का सिद्धान्त नहीं है, मन - गढ़न्त बात है। गुरु किया जाता है कल्याण के लिये । जब तक भगवद् प्राप्ति न हो जाय तब तक गुरु बदले जा सकते हैं। ऐसा तो कोई गुरु-भक्त नहीं देखा गया कि गुरु के बदलने के डर से हमेशा उसी क्लास में उसी गुरु से पढ़ता रहे । 'क्लास' के परिवर्तन के साथ गुरु का परिवर्तन स्वाभाविक हो ही जाता है। पिछले गुरु की अवहेलना नहीं की जाती, उनका मान-सम्मान गुरु के रूप में ही किया जाता है किन्तु आगे की पढ़ाई के लिये नये-नये गुरुओं का शिष्यत्व स्वीकार किया जाता है। व्यास पुत्र शुकदेव जी ने अपने पिता से ज्ञान प्राप्त किया, फिर शंकर जी से ज्ञान प्राप्त किया और नारद जी से भी ज्ञान प्राप्त किया। अन्त में फिर जनक जी के पास भी शिक्षा लेने गये । इसलिये एक गुरु कर लिया है, दूसरा नहीं करेंगे -- यह बिल्कुल रद्दी बात है और कल्याण में बाधक है। इस प्रकार की थोथली बातों को लेकर जीवन को नष्ट नहीं करना चाहिये। अनेकानेक जन्म इसी प्रकार अनेक योनियों में भटकते हुए बीत गये हैं अब तो मनुष्य जन्म पाकर सम्भल जाओ। ऊँचे से ऊँचे गुरु से उपासना का प्रकार समझ कर वेद-शास्त्रानुसार ही कर्मों को करते हुए भगवान का भजन-पूजन करते रहो तो निश्चय ही संसार-सागर से पार हो जाओगे।
*उपदेश ७०*
_जगत् भर का ज्ञान प्राप्त कर लो_
_पर यदि अपने को न जान पाये_
_तो अज्ञानी ही रहोगे_
संसार तो कज्जल की कोठरी है। इसका जितना ज्यादा सम्पर्क बढ़ाओगे उतनी ही कालिमा लगेगी । जो वस्तु जैसी है उसको वैसी ही रहने दो। जितना प्रयोजन है उससे काम ले लो, व्यवहार चलाओ, पर संसार में प्रेम मत करो ।
संसार के पदार्थ बाधक नहीं, उनके प्रति अपना प्रेम अपने लिये बाधक है। संसारी-जन राग के पात्र नहीं, परमात्मा में राग बढ़ाओ।
पहले अपने को जानो फिर परमात्मा को जानने का प्रयत्न करो। अपने को न जान सके तो संसार को जान कर भी तो अज्ञानी ही रहोगे। अपने सम्बन्ध में जब अज्ञान बना है तो दुसरे का ज्ञान होकर ही क्या होगा। अपने घर में कूड़ा-करकट भरा रहे और दूसरे के मकानों में झाड़ देते फिरो, यह तो कोई बुद्धिमानी नहीं है। जिस दिन अपने को जान लोगे उसी दिन मन की सारी गरीबी निकल जायगी और सुख शान्ति का अनुभव होने लगेगा।
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चरितार्थिता है।
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश【महत्वपूर्ण】*
*उपदेश - ६७*
_गर्भवास में फिर न आना पड़े_
_तभी मनुष्य जन्म सार्थक_
एक बार मनुष्य शरीर मिला। फिर गर्भ में आने का अवसर न आये, यही मनुष्य होने की कीमत है । यदि बार-बार गर्भ में आना पड़ा तो मनुष्य होने का कोई लाभ नहीं हुआ।
जीव तो अनन्त है। परन्तु योनियों की संख्या चौरासी लक्ष है। इन्हीं चौरासी लाख योनियों में जीव भ्रमण किया करते हैं। ऐसा समझना चाहिये कि एक बहुत बड़ा घेरा है और उस घेरे की दीवाल के किनारे-किनारे चौरासी लक्ष छोटे-बड़े कमरे बने हैं। एक अन्धा उसी घेरे में छोड़ दिया गया है । वह बाहर आना चाहता है। विचार करता है कि कहीं न कहीं तो इस घेरे का फाटक अवश्य होगा । इसलिये दीवाल का सहारा लेकर दीवाल के सहारे वह एक कमरे से दूसरे कमरे में पहुंचता हुआ आगे बढ़ता है ।
विचार तो उसका ठीक है कि दीवाल को पकड़े-पकड़े आगे बढ़ेंगे और जहां फाटक मिलेगा वहीं से घेरे के बाहर हो जायेंगे। परन्तु जिस समय फाटक पर आता है उस समय उसके शरीर में खुजली होने लगती है; दीवाल छोड़ कर वह दोनों हाथ से खुजली मिटाने की चेष्टा करता है। इसी बीच में फाटक निकल जाता है ।
दृष्टान्त का रहस्य यह है कि अंधा तो है जीव और चौरासी लाख कमरे हैं चौरासी लाख योनियाँ । "मनुष्ययोनि इस घेरे से बाहर निकलने का फाटक है ।" जीव जब फाटक पर आता है अर्थात् जब उसे मनुष्य योनि मिलती है तब स्त्री, पुत्र, धन, इष्ट मित्र आदि में वह जो सुख मानने लगता है यही सुख-बुद्धि उसकी खुजली है। इसी खुजली में पड़कर वह मनुष्य जन्म का समय बिता देता है और भवसागर से पार होने का प्रयत्न नहीं करता। यही है अन्धे का खुजली में पड़कर फाटक को छोड़ देना।
मनुष्य का शरीर दुर्लभ है - यही शास्त्र कहता है । इसका अर्थ यह नहीं कि दुर्लभ शरीर मिला है तो अधिक से अधिक धन एकत्रित कर लिया जाय, अधिक से अधिक पुत्र, पौत्रादि उत्पन्न किये जायँ और अधिक से अधिक विषयभोग किया जाय – इसमें मनुष्य शरीर की दुर्लभता सार्थक नहीं होगी। मनुष्य शरीर दुर्लभ है इसलिये कि यह कर्म-योनि है और दूसरे पशु-पक्षी, कीट-पतंगादि की योनियाँ भोग-योनियाँ हैं। भोग-योनि में जीव जो कर्म करता है उसका कोई लेखा नहीं रहता । कर्म-योनि अर्थात् मनुष्य शरीर से जीव जो कर्म करता है उसका हिसाब रहता है और प्रत्येक कर्म का उसे फल भोगना पड़ता है । इसी लिये कर्म-योनि ( मनुष्य शरीर ) दुर्लभ है । चौरासी लक्ष भोग-योनियों के बाद यह प्राप्त होती है और इसको प्राप्त करके ऐसे कर्म किये जा सकते हैं जिसके फल स्वरूप जीव का भटकना बन्द हो जाय और फिर-फिर कर गर्भवास के अनन्य दुखों का सामना न करना पड़े ।
शास्त्र कहता है कि मनुष्य यदि देवताओं की उपासना करेगा तो देवलोक में और प्रेतों की उपासना करेगा तो प्रेत-लोक में जायगा ।
_'भूतानि यान्ति भूतेज्या'_
भूतेज्य भूत-योनि को प्राप्त होंगे और देवेज्य देवयोनि को प्राप्त होंगे ।
जप-तप करने से देवयोनि मिलती है। परन्तु देवयोनि की प्राप्ति भी मनुष्य का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। क्योंकि देवताओं में जो सबसे प्रतिष्ठित देवराज इन्द्र हैं उनमें भी इतनी अविवेक पूर्वक विषय - भोग-वासना पाई जाती है कि स्वर्ग-लोक के विषयों से तृप्ति नहीं हुई तो मर्त्य-लोक में आकर अहिल्या से छल किया। जब देवलोक के राजा की यह दशा है तो वहां की प्रजा तथा अन्य देवताओं की कैसी वृत्ति होगी। इसलिए ऐसे देवलोक को तो दूर से प्रणाम करना चाहिए।
दूसरी बात यह है कि जीव का देवलोक में निवास भी कुछ ही काल तक रहता है।
_'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति'_
पुण्य क्षीण होने पर पुनः मृत्यु - लोक को प्राप्त हो जाते हैं और देवलोक में रहते हुए भी सब समान रूप से सुखी नहीं रहते। अपने-अपने कर्मों के तारतम्य के अनुसार सुख-सामग्री उपलब्ध होती है। इसलिए देवता लोग अपने से अधिक सुख-सम्पन्न देवताओं को देख कर जलते रहते हैं। देवलोक में भी ईर्ष्या, द्वेष, मत्सर के कारण वहां भी दुःख ही दुःख है। ऐसे लोक में जाने की कभी इच्छा नहीं करनी चाहिये ।
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देवता भी मनुष्य शरीर को प्राप्त करने के इच्छुक रहते हैं, क्योंकि मनुष्य योनि सोने के पासे के समान है। शुद्ध सोना है, अभी आभूषण नहीं बना है। जितना अच्छा कारीगर मिल जाय उतना अधिक मूल्यवान् आभूषण बन सकता है। इसकी कीमत इतनी अधिक हो सकती है कि यह अनन्त मूल्यवान हो सकता है । देवता तो आभूषणरूप में हैं; सोना के विशुद्ध रूप में नहीं । जो आभूषण बन गया उसका तो मूल्य निश्चित हो गया, अब उसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता । मनुष्य-योनि शुद्ध सोने का स्वरूप है । यदि कुशल कारीगर ( सुयोग्य गुरु ) प्राप्त हो जाय तो मनुष्य अनन्तानन्द स्वरूप साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हो सकता है और ऐसा होने में ही मनुष्य योनि की
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*उपदेश - ६६*
भगवतचिन्तन और आहार-शुद्धि
जब तक चीज अनुभव में नहीं आती तब तक ठीक-ठीक विश्वास नहीं पड़ता; संसार का ही चिन्तन हमेशा होता रहता है। इसलिये परमात्मा का चिन्तन करने में कठिनाई पड़ती है। भगवान ने कहा है:
"माचर्चक्ता मदगत् प्राणः बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्य तुष्यन्ति च रमन्ति च"॥
अर्थात्, मुझसे ही अपने चित्त को लगाओ । संसार का चिन्तन न हो, परमात्मा का हो चिन्तन होता रहे । तात्पर्य यह है कि भगवान ने कोई भी समय, कोई भी अवस्था ऐसी नहीं छोड़ी है कि उनके चिन्तन से खाली जाय। अनेक चित्तता होने का प्रधान कारण यही है कि आहार की शुद्धि नहीं है। आहार-शुद्धि के विषय में धनार्जन का प्रकार यह है कि
"अकृत्वा परसन्तापं, अगत्वा खलमन्दिरम्।
अनुल्लंध्य सतां वर्त्म यदल्पमपि तद् बहु॥ "
अर्थात्, किसी को कष्ट न देकर दुष्टों से सम्पर्क न रखते हुए अपनी आत्मा को अधिक उलझन में न डालकर थोड़ा भी मिल जाय तो बहुत है। दूसरे को कष्ट देकर जो धन पैदा किया जायगा वह धन तो पड़ा रह जायगा, परन्तु दूसरे को दिये हुए कष्ट का पाप अपने सूक्ष्म शरीर के साथ जायगा ।इसलिये ऐसा न करो कि पाप की गठरी साथ में जाय ।
‘अगत्वा खलमन्दिरम्’ का तात्पर्य यह है कि यदि नीच लोगों के निकट जाओगे तो बुद्धि भ्रष्ट होगी और बुद्धि भ्रष्ट हुई तो पतन निश्चित है। 'बुद्धिनाशात् प्रणस्यति' नीच विषयियों का सम्पर्क साक्षात् विषय से कहीं अधिक पतनकारी होता है । इसी लिये धनोपार्जन की दृष्टि से भो खलों के घर में जाने का निषेध किया गया है।
'अनुल्लंध्य सतां वर्त्म' का तात्पर्य यह है कि सत्पुरुषों के द्वारा जो वेद-शास्त्रानुसार जिस मार्ग का अनुशरण किया गया है, उसका उल्लंघन नहीं करना चाहिये।
यदि व्यवहार में किसी समय खलों का सम्पर्क करना ही पड़े तो इस प्रकार उनके पास जाना चाहिये, जैसे पाखाने में जाते हो—काम किया और चलते हुये । पाखाने में कोई अधिक देर तक नहीं ठहरता । यदि ऐसी बुद्धि रक्खोगे तो नीचों के संपर्क से अधिक हानि की शंका नहीं रहेगी । शुद्ध मन परमात्मा के निकट जाता है और अशुद्ध मन नाना प्रकार की भावनाओं में भटकता रहता है। इसलिये आहार-शुद्धि के द्वारा मन को विशेष रूप से शुद्ध बनाने का प्रयत्न करते रहना चाहिये -- धान्य-शुद्धि पर बहुत अधिक ध्यान रखने की आवश्यकता है। खान-पान ठीक रक्खोगे, भगवान का चिन्तन करते रहोगे तो अवश्य ही मन शुद्ध हो जायगा। शुद्ध मन से लोक में भी सुख शान्ति का अनुभव करोगे और परलोक में भी उत्तम गति को प्राप्त करोगे।
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ६५*
_स्वधर्म पालन और भगवान् का स्मरण सदा करते रहो_
जीव को अपने ही कल्याण के लिये भगवान का स्मरण करना है, भगवान के लिये नहीं। भगवान तो न किसी पर प्रसन्न होते हैं और न किसी पर कुपित। पर जीव अपने कल्याण के लिये ही स्मरण करता है।
भगवान के स्मरण के अनेक प्रकार हैं। अपने-अपने अनुकूल प्रकार को गुरुओं से समझ कर करना चाहिये।
कबीर राम के बड़े भक्त थे। हर समय भगवान् राम का भजन करते रहते थे। अपना ताना-बाना बिनते रहते थे और "राम राम राम" कहते जाते थे । नाम लेते-लेते भगवान के नाम में अटल विश्वास हो गया और नाम सिद्ध हो गया । जब नाम सिद्ध हो जाता है तो क्या होता है, यह बताने के लिये एक बड़ी अच्छी घटना है—“कोई एक कोढ़ी अपनी व्याधि को असाध्य मान कर कबीर के घर पर पहुंचा। क्योंकि जब लोग वैद्य, डाक्टरों से थक जाते हैं तभी महात्माओं के पास जाते हैं । कबीर तो घर में थे नहीं, उनकी स्त्री से उसने अपनी व्यथा कही । स्त्री को दया आ गई तो उसने कहा कि तीन बार राम-राम कहो तो तुम्हारा कोढ़ अच्छा हो जायगा । उसने कहा कि हजारों बार राम-राम कहा है पर कुछ नहीं होता । स्त्री ने कहा कि हमारे कहलाने से तो कहो। उसके तीन बार राम का नाम लेते लेते उसका शरीर सर्वथा ठीक हो गया। बड़ा प्रसन्न होकर वह लौटा । मार्ग में जो मिले उसी से कबीर के गुण गाये । कबीर भी कहीं से उधर ही आ रहे थे। उन्होंने सुना कि वह यह कहता जा रहा है कि किसी को कोई कष्ट हो तो कबीर साहब के यहां चला जाये। कबीर ने यह सुनकर उसे बुलाकर कहा कि हम ही कबीर हैं। अब यदि तुमने किसी से अपने अच्छे होने की बात कही तो फिर तुम्हें कष्ट हो जायगा और फिर कभी अच्छा नहीं होगा। इतना उससे कह कर कबीर घर गये और अपनी मुद्रा उदास बना ली। पति-परायणा पतिव्रता स्त्री सब कुछ सहन कर सकती है, पर अपने पति की उदासी सहन नहीं कर सकती । यही पातिव्रत्य का लक्षण है । स्त्री ने कबीर से उदासी का कारण पूछा । कबीर ने कहा कि – बात यह है कि तुमने भगवान के नाम को बहुत सस्ता कर दिया । एक ही बार भगवान का नाम लेने से वह दिव्यकाय हो जाता, पर तुमने तीन बार उससे क्यों नाम लिवाया । तीन बार लिवाने का कारण यही हो सकता है कि तुम्हें एक बार में विश्वास नहीं था। "
तात्पर्य यह है कि भगवान के नाम में पाप नाश करने की इतनी शक्ति है कि उतना पाप कोई कर ही नहीं सकता । अग्नि में जलाने की जितनी शक्ति है उतना कूड़ा कोई इकट्ठा नहीं कर सकता।
'हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपिस्मृतः'
दुष्ट चित्त से भी स्मरण करने पर भगवान पापों का क्षय कर देते हैं। इसलिये सत्कर्म करते हुए स्वधर्म पालते चलो और भगवान का सदा स्मरण करते रहो तो पिछले पाप नष्ट हो जायेंगे। किन्तु ऐसा नहीं करना चाहिये कि पाप करते चलो और भगवद् नाम लेते रहो। क्योंकि जितना बैक में जमा किया जाय, यदि उतना सब निकाल लिया जाय तो क्या लाभ होगा।
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*उपदेश - ६४*
_दीन बनकर दीनदयालु की दयालुता का लाभ उठाओ_
भगवान् दीनदयालु हैं । जो दीन है उस पर भगवान दया करते हैं। मनुष्य दीन या तो उपासना के द्वारा भगवान को प्रसन्न करने की चेष्टा करे या स्वधर्मानुष्ठान करते हुए अपने कर्म रूपी फूलों से भगवान् की पूजा करे। कर्म और उपासना कुछ न बन पड़े तो कम से कम दीन ही बन जाय । दीन कौन है ? जिसके लिए संसार में कोई भी आधार नहीं है वही दीन है । सर्वथा निराधार के आधार भगवान् होते हैं। यही उनकी दयालुता है। जिसका संसार से राग सर्वथा हट गया है-स्त्री, पुत्र, धन, इष्ट मित्र आदि किसी का भी जिसको सहारा नहीं रह गया है— ऐसे सर्वथा निस्सहाय निराधार के आधार दीनबन्धु दीनदयालु जगदाधार परमात्मा है । द्रौपदी चीर-हरण के समय दीन हो गई थी, कोई भी उसका रक्षक नहीं रह गया था । ऐसी दीनावस्था में जब उसने भगवान् को पुकारा तो दीनबन्धु भगवान् ने उसकी रक्षा की। कर्म का फल तो सबको भोगना पड़ता है; परन्तु दीन को कुछ ऐसा विशेषाधिकार मिल जाता है कि उसको पाप का फल प्रायः नहीं भोगना पड़ता । इसलिये कुछ न कर सको तो कम से कम दीन तो बन जाओ ।
जब मनुष्य दीन हो जाता है तब उसे संसार ऐसा लगता है जैसा मदारी का रुपया । लाखों रुपये का ढेर लगा हो और कह दिया जाय कि यह मदारी का रुपया है तो यदि कोई कैसा भी लालची लोभी हो तो भो उसकी दृष्टि उसे रुपये के प्रति नहीं जाती। इसी प्रकार जो दीन हो जाता है वह संसार में किसी भी वस्तु के प्रति राग नहीं रखता। संसार से सर्वथा राग रहित होकर जब मनुष्य दीनावस्था में भगवान् को पुकारता है तब वह दीनबन्धु भगवान् की दयालुता का पात्र होता है । बस, दीन बनने की देर है, दीनदयाल तो तुम्हें उठाने के लिये तैय्यार ही हैं।
सत्संग न होने के कारण भगवान के दीनदयाल स्वभाव से भी लोग फायदा नहीं उठा पाते। लोगों को जो कुछ सत्संग, मिलता भी है उसकी बातें उनके अन्तःकरण में टिकती ही नहीं । कारण यह है कि आहार शुद्धि की कमी है ।
जिस प्रकार भोजन के देखने मात्र से क्षुधा की निवृत्ति नहीं होती, उसी प्रकार भगवान के केबल नाम माहात्म्य के पाठ से सुख शान्ति नहीं मिल सकती । आज-कल गीता का पाठ करने का बड़ा प्रचार है । इस पाठ मात्र से पुण्य तो अवश्य होगा किन्तु पूर्ण सुख-शान्ति की प्राप्ति केवल ऐसे पाठ मात्र से सम्भव नहीं । एक भी श्लोक गीता का मान लिया जाय या एक श्लोक का एक चरण भी मनुष्य मान ले तो उसका कल्याण हो सकता है।
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बात यह है कि जब तक हम अपने इष्ट को एकदेशीय डिबिया में बन्द करके रखे रहेंगे तब तक जो चाहे हमें दुःख देता रहेगा और अपाहिज की तरह हमें उसके सहन करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। सर्वत्र व्यापक अपने इष्ट को देखने लगो तो जा समीप आयेगा वह इष्ट बनकर, सहयोगी बन कर आयेगा। यही सिद्धान्त है कि जो जैसा होता है उसके समीप आने वाला भी वैसा ही हो जाता है, यदि निष्ठा पक्की है तो ।
योगशास्त्र - कतौ पतंजलि ने यही लिखा है कि-
_"अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः।”_
जिसकी अहिंसा की निष्ठा पुष्ट है उसके निकट सिंह, च्याघ्र आदि हिंसक पशु भी अपना हिंसक स्वभाव त्याग कर अहिंसक हो जाते हैं। पर हमारा आधार पुष्ट होना चाहिये, परमात्मा का भरोसा पक्का होना चाहिये । ऐसा नहीं कि जिसके हाथ में माटी का लोआ देखा उसी के पीछे हो लिये । धोबी का कुत्ता, न घर का होता है न घाट का | विचार से काम लेना चाहिये, उदर-परायणता से पीछे अपना सर्वस्व गँवा देना ठीक नहीं । उदर-परायणता तो पशु-पक्षी, कीट-पतंगादि योनियों में भी रहती है। मनुष्य होकर भी यदि उदर-परायण रहे तो मनुष्य योनि की विशेषता ही क्या ? भारतीयों ने पेट को कभी प्रधान नहीं माना । यहाँ आध्यात्म की ही प्रधानता सदा स्वीकार की गई है। महर्षि लोग कन्द-मूल फल खाकर, जल पीकर रहते थे, परन्तु चक्रवर्तियों को भी अपने इशारे पर चलाने का बल रखते थे । हलुवा-पूड़ी, रबड़ी- मलाई खिलाने वाले भक्त लोग उस समय भी रहे होंगे, परन्तु वे समझते थे कि इन लोगों का दिया हुआ यदि हलुवा-पूड़ी खायेंगे तो बुद्धि भ्रष्ट हो जायगी और पतन हो जायगा । जब भीष्म ऐसे व्यक्तियों की बुद्धि मलिन धान्य खाने से भ्रष्ट हो गई, तो आजकल के लोगों की बात ही क्या ! इसलिये बुद्धि की शुद्धि के लिये धान्य शुद्धि पर सदा विचार रखना चाहिये और भगवान् का सहारा लेकर सतोगुणी वृत्ति से जीवन-यापन करने का प्रयत्न करना चाहिये।
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*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ६३*
_महा असुर हिरण्यकश्यपु के पुत्र प्रहलाद क्यों भक्त उत्पन्न हुए?_
एक समय देवताओं के साथ युद्ध में पराजित होकर हिरण्यकश्यपु शक्ति संचय करने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिये बन में चला गया। उसकी पत्नी उस समय गर्भिणी थी । इन्द्र ने सोचा कि हिरण्यकश्यपु का पुत्र उससे भी अधिक बलवान् होगा और देवताओं को अधिक परेशान किया करेगा, इसलिये उत्पन्न होते ही उसका बध कर देना ठीक रहेगा । इसी लक्ष्य से हिरण्यकश्यपु की गर्भवती स्त्री को इन्द्र अपने यहां उठा ले चला । मार्ग में वह विलाप करती हुई जा रही थी, नारद जी मिल गये। उन्होंने पूछा कि इस अबला को कहां लिये जाते हो, वया उद्देश्य है ? इन्द्र ने बताया कि यह हिरण्यकश्यपु की स्त्री है, गर्भवती है, इसके गर्भ से उत्पन्न बालक को तुरन्त मार कर देवताओं का कण्टक दूर करने के लक्ष्य से इसे अपने लोक में ले जा रहा हूँ। नारद ने कहा कि इसके गर्भ से भगवदभक्त उत्पन्न होगा और अजेय होगा, तुम इसे छोड़ दो । नारद के ये वचन सुन कर इन्द्र उसे छोड़ कर चला गया। नारद उसे अपने आश्रम में ले आये और नित्य उसे भगवान की भक्ति-गायायें सुनाते रहे ।
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गर्भवती स्त्री जो बातें सुनती है या जो दृश्य आदि देखती है और जिस वातावरण में वह रहती है, उसका असर गर्भस्थ बालक पर पड़ता है। प्रहलाद जब पढ़ने जाते थे तो अपने सहपाठियों को ज्ञान-ध्यान की बातें और भगवान की बातें सुनाते थे। उनसे उन लोगों ने पूछा कि आप तो हमारे साथ ही पढ़ते हो, ये बातें तो यहाँ बताई नहीं जातीं और घर में भी दैत्यों के आस-पास ही आप रहते हो, वहाँ भी इस प्रकार की शिक्षा पाने का कोई अवसर नहीं मिलता होगा तो ये सब अच्छी-अच्छी बातें आप को मालूम कैसे हुई जो आप हम लोगों को सुनाते हो ?
प्रहलाद ने अपने गर्भकाल की बातें बताईं कि इस प्रकार हमारी माता नारद के आश्रम में पहुँचीं और वहाँ महर्षि नारद उन्हें नित्य ही भगवान की गाथायें जब सुनाया करते थे तो हम माता के गर्भ में सुब सुना करते थे। वहाँ से आने के बाद दैत्यों के वातावरण में माता तो वह सब भूल गई, पर हमको सब याद हैं । वनी हम तुम लोगों को सुनाते हैं ।
दैत्यराज महा असुर हिरण्यकश्यपु का पुत्र गर्भावस्था में सत्संग की बातें सुन कर भक्तराज पैदा हुआ। आज भी गर्भवती माताओं को उत्तम धार्मिक भक्तिमान वातावरण में रखा जाय, भगवान् की अच्छी-अच्छी धार्मिक बातें उनको सुनाई जायें तो आज भी भारत में ध्रुव प्रहलाद उत्पन्न हो सकते हैं। परन्तु आजकल तो सिनेमाओं और गन्दी पुस्तकों के पढ़ने से फुरसत ही नहीं मिलतो । यही कारण है कि उत्पाती और चरित्रहीन सन्तानें पैदा होती हैं और उनके माता-पिता जन्मभर शेते हैं। गर्भवती स्त्री के संस्कार ही गर्भस्थ बालक के संस्कार बनते हैं और वैसी ही उसकी निष्ठा बनती है। पशु के समान सन्तान पैदा कर देना और बात है, किन्तु यदि उत्तम विचारशील चरित्रवान् सन्तान चाहते हो तो गर्भकाल में स्त्री को पवित्र वातावरण में रखो। विधिपूर्वक गर्भाधान संस्कार के बाद स्त्री को रजोगुणी-तमोगुणी पदार्थों से बचाओ । गर्भिणी स्त्री की उत्तम भावनायें ही गर्भस्थ बालक के उत्तम संस्कारवान होने का कारण है।
प्रहलाद को यह पुष्ट था कि भगवान् सर्वत्र हैं। उन्हें सर्वत्र परमात्मा का ज्ञान था । जहाँ वे देखते थे अपने इष्ट को ही देखते थे । प्रहलाद को निर्विवाद पुष्ट था कि सर्वन परमात्मा है। जल, थल, अग्नि में सर्वत्र वे अपने राम को देखते थे । यही कारण था कि जल, अग्नि आदि तत्त्व उन्हें कष्ट नहीं पहुँचा सके——यह थी भारत के एक पाँच वर्ष की निष्ठा । भारतीय यदि अपने सिद्धान्तों पर आ जायें तो फिर त्रैलोक्य में कोई भी ऐसी शक्ति नहीं है जो उन्हें कष्ट दे सके । परन्तु अपने घर की बात भूल कर सब दरिद्र हो रहे हैं । सर्वशक्तिमान परमात्मा जब अपने अनुकूल हो जाते हैं तो प्रकृति की समस्त शक्तियाँ अपने अनुकूल हो जाती हैं। प्रहलाद को जिस तत्त्व के द्वारा कष्ट देने का प्रयत्न किया जाता था, वही तत्त्व उनके अनुकूल हो जाता था । प्रहलाद को जब अग्नि में डाला गया तो वे हँसते हुए कहते हैं-
_“रामनामजपतां कुतो भयं_
_सर्वतापशमनैक भेषजम्,_
_पश्य तात ममगात्रसन्निधौ_
_पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना॥ "_
अर्थात् - राम नाम जपने वाले को कहाँ भय है ? यह ( राम-नाम ) तो समस्त तापों के (दुःखों के) निवारण की एक औषधि है । हे पिता ! देखो मेरे शरीर के पास इस समय अग्नि भी जल का काम कर रही है, अर्थात् ठंडी हो गई है।
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ६२*
_होली में गाली व रंग-गुलाल क्यों ?_
आज होली का समय है । यह जान लेना चाहिए कि यह क्या चीज है । प्रहलाद की फुआ अर्थात् हिरण्यकश्यपु की बहन का नाम ढूंढ़ा था ( उसे होलिका भी कहते हैं) । उसने तपस्या करके यह वर प्राप्त कर लिया था कि जिसे वह गोद में लेकर अग्नि में बैठ जायगी वह जल जायगा । जब हिरण्यकश्यपु प्रहलाद को कष्ट देते-देते थक गया और प्रहलाद को कुछ दुःख न दे सका — पहाड़ों से नीचे गिराया तो भी प्रहलाद हँसते रहे, जल में डुबाया तो भी प्रहलाद प्रफुल्लित निकले, अग्नि में डाल दिया तो भी जले नहीं। इस प्रकार जब हिरण्यकश्यपु सब-कुछ करके हार गया और प्रहलाद ने भगवद्वभजन नहीं छोड़ा तो ढूंढ़ा ने कहा कि लाओ हम उसे भस्म कर देते हैं । ढुंढ़ा प्रहलाद को गोद में लेकर बैठ गई। चारों ओर से अग्नि लगाई गई। प्रहलाद की भक्ति का प्रभाव हुआ कि ढुंढ़ा जल गई ओर प्रहलाद हँसते हुए अग्नि से बाहर आ गये।
होली के अवसर पर जो लोग गालियां बकते हैं, अश्लील शब्द कहते हैं, वह सब ढुंढ़ा (होलिका) के लिए गाली है । ये गंदे शब्द ही उस दैत्या के लिए स्रोत के सामने हैं; क्योंकि आसुरी शक्ति ऐसे ही शब्दों से प्रसन्न होती है । इनके द्वारा लोक में ढुंढ़ा की निष्ठा को जाग्रत रख कर यह स्मरण किया जाता है कि अग्नि आदि तत्वों को अपने वश में रखने बाली ढुंढ़ा के समान कोई भी कैसा भी शक्तिशाली क्यों न हो, किन्तु जब वह भगवद्भवत के विरुद्ध उठता है तब उसी की वह शक्ति उसके विरुद्ध होकर उसका संहार करके भक्त को रक्षा करती है। यही होली के अवसर पर (होलिका दहन के समय) गालियां बकने का रहस्य है।
होली के दिन जो रंग-गुलाल आदि के द्वारा व्यवहार होता है वह प्रसन्नता का द्योतक है । परस्पर मिल-भेंट कर इस बात की खुशी मनाई जाती है कि आज के ही दिन भगवदभक्त प्रहलाद को कष्ट देने वाली आसुरी शक्ति स्वयं ही भस्म हो गई थी ।
“भक्त प्रहलाद से द्रोह करने वाली राक्षसी के भस्म होने की खुशी मनाई जाती है" — यही होली का माहात्म्य है।
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हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
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