सत्-चित्-आनंद (A Group of ancient tantra,yog and sadhna)
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आयें आज से ही अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू करें (Start your spiritual journey from today)
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۞ ∥ आयुर्वेदिक दोहे ∥ ۞
११Ⓜचिंतित होता क्यों भला, देख बुढ़ापा रोय,
चौलाई पालक भली, यौवन स्थिर होय..
१२Ⓜलाल टमाटर लीजिए, खीरा सहित सनेह,
जूस करेला साथ हो, दूर रहे मधुमेह..
१३Ⓜप्रातः संध्या पीजिए, खाली पेट सनेह,
जामुन-गुठली पीसिये, नहीं रहे मधुमेह..
१४Ⓜसात पत्र लें नीम के, खाली पेट चबाय, दूर करे मधुमेह को, सब कुछ मन को भाय..
१५Ⓜसात फूल ले लीजिए, सुन्दर सदाबहार,
दूर करे मधुमेह को, जीवन में हो प्यार..
१६Ⓜतुलसीदल दस लीजिए, उठकर प्रातःकाल,
सेहत सुधरे आपकी, तन-मन मालामाल..
१७Ⓜथोड़ा सा गुड़ लीजिए, दूर रहें सब रोग,
अधिक कभी मत खाइए, चाहे मोहनभोग..
१८Ⓜअजवाइन और हींग लें, लहसुन तेल पकाय,
मालिश जोड़ों की करें, दर्द दूर हो जाय..
१९Ⓜऐलोवेरा-आँवला, करे खून में वृद्धि,
उदर व्याधियाँ दूर हों,जीवन में हो सिद्धि..
२०Ⓜदस्त अगर आने लगें, चिंतित दीखे माथ,
दालचीनि का पाउडर, लें पानी के साथ..
जैसा कि हर माह हमारे द्वारा मासिक समूह का निर्माण किया जाता है अतः इसी क्रम में आज नवम्बर माह के मासिक समूह का निर्माण किया जा रहा है अतः आप सब इस समूह से आज से ही जुड़ सकते है -
नवंबर माह प्राचीन साधना एवं उसकी विधि -
इस माह में हम विभिन्न तांत्रिक साधनाओं एवं दिव्य यौगिक हीलिंग के अनेकों तथ्यों पे चर्चा करेंगे,अभ्यास करेंगे एवं इसे कल्याणार्थ भावना से उपयोग करेंगे।
* हम जानेंगे कि किस प्रकार से हम अपने ध्यान और यौगिक क्रियाओं के अभ्यास से किसी भी प्रकार के सूक्ष्म परिवर्तन से किसी के जीवन में बदलाव ला सकते है,किसी के लिए कल्याणार्थ कार्य कर सकते हैं।
* तांत्रिक साधनाओं के विभिन्न पक्ष है जिनमें कुछ साधनाएं व्यक्ति अपने भौतिक विकास के लिए एवं कुछ साधनाएं अपने आत्मिक विकास के लिए करता है।भौतिक सभी स्थितियों में परिवर्तन ला कर अपने आप को सामाजिक मजबूती देते हुए कैसे आध्यात्मिक स्थिति को भी मजबूती दें जिससे आत्मिक विकास हो इन सभी विषयों पर आप सभी को कुछ विशेष साधनाओं की जानकारी और उन्हें करने का निर्देश दूंगा।इन साधनाओं में उच्चतर दिव्य गुरुजन,भगवती के विशेष स्वरूपों एवं दिव्य स्तरीय कुछ विशेष भौतिक शक्तियों से जुड़ी शक्तियों की साधना प्रकाशित की जाएगी।
* सिद्धियां मुख्यतः कैसे आपके अपने अंदर जागृत होती है और विलुप्त होती है इस पर भी जानकारी आप सभी को दी जाएगी और सिद्धियों का उदय कैसे अपने अंदर होता है।साधनाएं करने से किन सिद्धि शक्तियों का विकास होता है और उसका उपयोग व्यक्ति को कैसे करना चाहिए यह सब जानकारी इस समूह में आप सभी को दी जाएगी।
* सिद्धियों से आगे बढ़ कर दिव्यता ग्रहण करना और भगवती की साक्षात दर्शन,अनुग्रह,सानिध्य कैसे प्राप्त हो इन सभी विषयों को आपके समक्ष गूढता से रखी जाएगी।
* नवम्बर माह में जुड़ने वाले सभी साधक जनों हेतु मेरे द्वारा एक विशेष पूजन एवं हवन का आयोजन किया जाएगा जो इस समूह की सबसे खास प्रक्रिया है यह पूजन एवं हवन महाविद्या भगवती कमला की होगी जिससे समूह में जुड़े सभी लोगों के नाम से संकल्पित होने के कारण सभी को इसका लाभ प्राप्त होगा।
अतः यह समूह विशेष हवन में आर्थिक रूप से सहयोगी साबित होगी।
आप सब आज से ही इस समूह का हिस्सा बन सकते है एवं नामांकन करा सकते है इसके लिए आप सब सीधा @prash123 पर मैसेज करके अन्य जानकारी प्राप्त कर सकते है समयानुसार सभी को जवाब दिया जाएगा।
यह समूह में नामांकन हेतु एक छोटा शुल्क रखा गया है जिससे कि हवन एवं अन्य विशेष कार्य आप सभी के लिए ही संपन्न किए जा सकें एवं अर्थ से धर्म की विशेष नींव खड़ी की जा सके।
आनंद शिव
त्रिगुणात्मक भगवान दत्तात्रेय ने अपने चौबीस गुरु कहे है,जिनसे उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया।
साधना में बैठे और ध्यान करें कि उनके चौबीस गुरुओं से आप ग्रहण कर रहे है -
1. पृथ्वी से छमा
2. वायु से अनासक्ति
3. आकाश से निर्लिप्तता
4. जल से पवित्रता
5. अग्नि से गुप्त रहना
6. चन्द्रमा से आत्मा का अविनाशी होना
7. सूर्य से दान
8. कबूतर से आरूढ़च्युत अर्थात मोह नाश
9. अजगर से सन्तुष्टता
10. समुन्द्र से गम्भीरता
11. पतंगे से इंद्रजीत बनना
12. मधुमक्खी से संग्रह करना
13. हाथी से कामिनी से दूर रहना
14. भ्रमर से लोभ न करना
15. हिरण से विषयी संगीत न सुनना
16. मछली से रसेन्द्रियों को वश में करना
17. वेश्या से आशा का त्याग करना
18. पक्षी से संग्रह न करना
19. बालक से आत्मरत रहना
20. कुवांरी कन्या से अकेले विचरण करना
21. बाण निर्माता से मन को वश में करना
22. सांप से अपना घर न बनाना
23. मकड़ी से मायाजाल से दूर रहना
24. कीट से चित्त को एकाग्र करना
महर्षि वशिष्ठ ने साधक की स्थिति में अंतर के आधार पर सात प्रकार की योगभूमियों का वर्णन किया है अर्थात् भिन्न-भिन्न साधना भूमियों में प्रष्फुटित होनेवाले ज्ञान के परिमाण के बारे में बताया है। जो योगशस्त्र के मतानुसार अष्टांग योग साधना, वेदान्त के अनुसार साधन चतुष्टय, दर्शन शास्त्र के अनुसार श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन तथ तंत्र मतानुसार जो तत्व साधन है, वह सब इन्हीं सात प्रकार के ज्ञान को प्रष्फुटित करने के लिए किया जाता है। इस प्रकार ज्ञान का विकास होने पर शास्त्र का कुछ भी अज्ञात नहीं रह जाता, समस्त विषयों का सम्यक ज्ञान हो जाता है। सम्यक ज्ञान का ही दूसरा नाम ब्रह्मज्ञान है। ब्रह्मज्ञान के बाद कुछ भी अविदित नहीं रह जाता। इस का आधार है योगः
1. प्रथम-शुभेच्छाः साधना के द्वारा विवेक और वैराग्य उपस्थित होकर जब मन में मुक्ति पाने की इच्छा जन्म लेती है उसे शुभेच्छा कहते हैं। इस स्तर में यही जाना जाता है कि मुझे ज्ञान लाभ हो रहा है।
2. द्वितीय-विचारणा: श्रवण, मनन आदि के द्वारा विचार शक्ति उपस्थित होने का नाम है विचारणा। इस स्तर पर पहुँचकर यह पता चलता है कि जो जानने योग्य है वह जान लिया गया है, अब जानने को कुछ बाकी नहीं बचा अतएव मन में किसी प्रकार के असंतोष का भाव नहीं रह जाता।
3. तृतीय-तनुमानसा : विषय वासना का परित्याग कर निधियासन द्वारा
सत्स्वरूप में स्थित होने का नाम तनुमानसा है। इस स्तर में पहुँचने पर पता चलता है कि जो सत्य है वह हमारे अंदर ही स्थित है, बाहर कुछ भी नहीं है। इससे मन को क्षीणता प्राप्त होती है अर्थात् मन अन्दर ही डूबा रहता है। 4. चतुर्थ-सत्वापत्ति : किसी विषय-वासना के न रह जाने पर समस्त विषयों
के प्रति अनासक्ति का नाम है सत्वापत्ति। इस अवस्था में चित्त विमुक्त हो जाता है और हर ओर भागने की प्रवृत्ति नहीं रह जाती। यहाँ पहुँच कर साधक अवस्था समाप्त होती है एवं योगी अवस्था का प्रारंभ होता है।
5. पाँचवी – असंशक्ति : 'मैं ही ब्रह्म हैं' यह भाव जाग्रत होता है। इस अवस्था में योगी संसार को भूल जाता है, अपने को भूल जाता है। यही समाधि की शुरुआत है। इस अवस्था के स्थायी और स्थिर होने पर साधक कृतार्थ हो जाते हैं।
6. छठी अवस्था : पदार्था भावनी: इस अवस्था में योगी का व्युत्थान नहीं होता,उसके लिए सृष्ट और असृष्ट कुछ नहीं रहता। सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु का भ्रम या ज्ञान नहीं रहता है। इसी अवस्था को द्वन्द्वातीत अवस्था या परम प्रज्ञा की अवस्था कहते हैं।
7. सातवीं- तुर्यावस्थाः ही अंतिम अवस्था है। इसे समाधि की अंतिम अवस्था कहते हैं। इस अवस्था को किसी भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह साक्षात शिव रूप या ब्रह्म रूप है।
तैलंग स्वामीजी के जीवन पर दृष्टिपात करने पर पता चलता है कि वे योग की इस अंतिम अवस्था को प्राप्त कर ब्रह्म स्वरूप में विराजमान थे।
"काशी के सचल विश्वनाथ"
श्री तैलंग स्वामी जी
शारीरिक स्थिरता से मानसिक स्थिरता में प्रवेश एवं मानसिक शक्ति का विकास -
जैसा कि पिछले लेख में आप सभी ने जाना कि किस प्रकार ध्यान का अभ्यास शुरू किया जाए और कैसे इसमे आगे बढ़ा जाए।जब आपकी शारीरिक स्थिरता बनने लगे और मन विचारशून्य होना शुरू हो उस समय आप सभी को प्रातः सूर्योदय के समय कुछ समय सूर्य के समक्ष एक प्रक्रिया से गुजरना है।
आईय जानते है -
स्थिरता से सूर्योदय के समय ऐसे स्थान पर बैठें जहाँ सूर्य उगते हुए दिखें कुछ देर तक सूर्य को इस स्थिति में देखें उगते हुए एवं धीरे धीरे स्वांस ले और बाहर निकाले अनुभव करें कि आपके अंदर आपके नाक से दिव्य प्राण ऊर्जा आपके अंदर धीरे धीरे प्रवाहित हो रही है जो पूरे शरीर मे फैल रही है और धीरे धीरे स्वास बाहर निकालते समय महसूस करें कि अंदर के सभी नकारात्मक,सभी दुख/ईर्ष्या/द्वेष/अहंकार रूपी दूषित ऊर्जाएं बाहर निकल रही है।अपने आपको आनन्दित और हल्का महसूस करें जैसे कोई भार अंदर से निकल रहा हो। यह सब प्रक्रिया करते समय स्थिर और रीढ़ की हड्डी सीधी करके बैठें।
स्वांस लेना और बाहर छोड़ना इसे एक क्रिया मानी जायेगी ऐसा कम से कम 21 बार करें।
अब आंखें बंद कर लें आपने दाहिने तरफ के नाक को दबाएं एवं बाएं तरफ के नाक से धीरे धीरे स्वांस लें इस स्वांस के साथ प्रातः की सूर्य की किरणों का प्रवेश बाए तरफ के नाक से अंदर जाते हुए सजग रूप से महसूस करें।स्वास लेते समय 6 सेकेंड में पूरी तरह स्वांस भर लें और दोनो नाकों को बंद करके स्वांस को 24 सेकेंड के लिए रोक दें इस स्थिति में अनुभव करें कि आपके अंदर यह ऊर्जा का भंडार आपके सभी नाड़ी,सभी शरीर के अवयवों को ऊर्जा से भर रहा है आपके मस्तिष्क को ज्यादा सजग और तीव्र कर रहा है फिर 24 सेकेंड स्वांस रोकने के बाद दाहिने नाक से 12 सेकेंड में धीरे धीरे पूरी स्वांस बाहर निकाल दें इस निकलती हुई स्वास के साथ सम्पूर्ण नकारात्मक भाव वाली सभी ऊर्जाएं जिससे आपका आत्मविश्वास कमजोर होता है उसे बाहर निकलता हुआ महसूस करें।अब दाहिने नाक से स्वांस लें ,स्वास रोके,और स्वास को बाहर निकाले ठीक जैसे आपने ऊपर किया है उसी प्रकार।
बाए से स्वांस लेना ,रोकना,दाहिने नाक से बाहर निकलना पुनः दाहिने से स्वांस लेना,रोकना, और बाएं से बाहर निकालना यह एक क्रिया हुई ऐसी आपको 15 क्रियाएं करनी है।
इसके बाद शांत,आनन्दित,ऊर्जा से भरे हुए स्वयं को शांत मन से स्थिरता के साथ ध्यान में बैठे रहने दें और कम से कम 21 बार नीचे दिए गए सूर्य गायत्री मन का मन ही मन जप करें।
ॐ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्नो सूर्यः प्रचोदयत।।
जिन्हें किसी भी प्रकार की स्वांस की परेशानी हो अथवा हृदय के मरीज हो वे स्वांस रोकने की प्रक्रिया न करें।केवल स्वांस एक तरफ से लें और दूसरी तरफ से बाहर निकाले ऊपर बताये गयी प्रक्रिया अनुसार।
यह अद्भुत शक्ति का आपके अंदर संचार करता है ।इससे निम्न परिवर्तन आपके अंदर आते है -
★ आपके अंदर चेतना का विस्तार होता है।
★ पहले से ज्यादा सजग होते जाते हैं।
★ यादाश्त तेज होती जाती है और मंद बुद्धि स्वस्थ्य होने शुरू ही जाती है।
★ दिमाग ज्यादा विश्लेषण करने योग्य हो जाता है और जल्दी थकता नही।
★ आध्यात्मिक स्तर पर जो सजगता आपको चाहिये वो प्राप्त होती है।
★ भय का नाश और आत्मविश्वास की वृद्धि।
★ किसी भी प्रकार की डिप्रेशन, अनिद्रा,एंजायटी और अन्य बहुत से परेशानियों में आराम मिलता है।
★ इंट्यूशन शक्ति बढ़ती जाती है जिससे किसी भी परिस्तिथि, व्यक्ति एवं घटनाओं के प्रति ज्यादा सजग होने शुरू हो जाते है।
अन्य अनेको अनुभव है जो व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है।
आपको बता दु एक सन्यासी दुर्लभ योगी द्वारा यह क्रिया का अभ्यास किया जाता था जिनका नाम मैं यहां नही लूंगा और वे अपने योग बल के लिए काशी में काफी प्रसिद्ध थे।
ध्यान का अभ्यास एवं ध्यान को उपलब्ध हो जाना इन दोनों यात्राओं के बीच मे एक अद्भुत समय आता है जब आप अपने ध्यान शक्ति से कुछ भी करने में समर्थ हो सकते हैं ।क्या और कैसे जानेंगे आगे....
आईय ध्यान शुरू करें -
ध्यान हेतु आप किसी भी ऊनि आसन का उपयोग करें।
ध्यान के अभ्यास में दक्षिण दिशा को छोड़ कर किसी भी दिशा का चयन कर सकते है अगर दिशा पूर्व रखें तो उत्तम है।
वैसे तो आप ध्यान का अभ्यास किसी भी समय कर सकते है लेकिन ब्रह्मुहूर्त अथवा रात्रि में किया गया ध्यान अच्छा माना जाता है एवं पेट खाली होने आवश्यक है।
ढीले वस्त्र पहनें जितना प्राकृतिक स्वयं को रखे उतना अच्छा अर्थात अगर बंद कमरे में ध्यान कर रहे हों तो जितने कम कपड़े हो सके धारण करें।
अपने आसन पर सुखासन के स्थिति में बैठें अर्थात सामान्य तरीके आए पालथी लगा कर बैठें।
बाए हाथ को गोद मे रखें उसपर दाहिने हाथ को रखें और रीढ़ की हड्डी सीधी रखें।
शरीर मे किसी भी प्रकार से कही कोई तनाव न हो, सुखपूर्व बिल्कुल तनावमुक्त हो कर बैठे रीढ़ की हड्डी सीधी रखें।
इसी स्थिति में आंखें बंद करके शांत स्थिर पाषाण के भांति बैठे।धीरे धीरे गहरी स्वांस लें और बाहर निकालें।मन मे विचार आये तो आने दें उसे दबाए नही आपका ध्यान का शुरुआती अभ्यास केवल स्थिरता से स्वयं को कम से कम 3 मिनट तक ध्यान की स्थिति में बैठाए रखने का है।मन मे जो उथल पुथल हो रही हो होने दें शरीरी की स्थिरता बनाये रखें।इस अभ्यास को जब भी समय मिले खाली पेट करें।न ही आपको स्वास पे ध्यान लगाना है न ही किसी भी वस्तु,प्रतीक इत्यादि पर बस शांत स्थिर हो कर सीधा बैठना है जो अंधेरा दिख रहा हो बस देखते रहे ,विचार आते जाते रहेंगे आने जाने दें।
शुरुवाती अभ्यास में यदि सम्भव हो तो एक देसी घी का दीपक अपने सामने जला कर रखें।इससे आपके अभ्यास को बल मिलेगा।
3 मिनट से बैठने का अभ्यास में हर हफ़्ते धीरे धीरे थोड़ा थोड़ा समय बढ़ाएं।ध्यान रहे कोई भी हड़बड़ी न करें ,अलग से कुछ भी न जोड़ें न ही किसी प्रकार से धैर्य खोएं।यहां सफलता पूरी आपके धैर्य से जुड़ी हुई है।लोग जल्दी सफलता पाने के लिए कुछ न कुछ आजमाना शुरू कर देते है जिससे फिर दिक्क्त होती है।
इसी प्रकार आपको अभ्यास 3 माह तक लगातार बिना किसी गैप के करते जाना है।3 माह में आपकी स्थिति 15 मिनट तक पाषाण के भांति स्थिरता से बैठने की हो जाएगी अगर आपने ईमानदारी से अभ्यास किया तो।यह शारीरिक स्थिरता ही ध्यान में प्रवेश करने की पहली कुंजी है।
शारीरिक स्थिरता प्राप्त करते ही आपके विचार भी धीरे धीरे शून्य होने शुरू हो जाएंगे और यही से शुरू होगी आपकी आगे की ध्यान यात्रा।
शारीरिक स्थिरता के बाद मानसिक स्थिरता बननी शुरू होती है और थोड़ा थोड़ा अंतर्ज्ञान भी प्राप्त होना शुरू होता है।
ध्यान टूटने के बाद एकदम से आसन छोड़ कर न उठें थोड़ी देर शरीर को ढीला छोड़ दें और बैठे रहें ।इसके बाद उठें एवं तुरन्त चप्पल इत्यादि पहन लें आधे घण्टे तक जमीन के सम्पर्क में नंगे पैर न आएं।
ध्यान से तुरन्त उठने के बाद भोजन न करें ,45 मिनट बाद ही भोजन इत्यादि करें।
यह ध्यान का प्रथम चरण है जहां आप अपने शरीर की स्थिरता को प्राप्त करते हैं।शारीरिक स्थिरता प्राप्त करते ही आप मानसिक स्थिरता की तरफ़ बढ़ने लगते है यह समय होता है अनेको प्रकार के अनुभव होने का लेकिन इन अनुभवों में न उलझें बस इन्हें अपनी उन्नति का प्रतीक मान कर आगे बढ़ते जाएं।जैसे जैसे आपकी मानसिक स्थिरता प्रखर होगी आप ध्यान के।दृतिय चरण में प्रवेश करते जाएंगे जहाँ शरीर का भान खत्म होने लगता है।यह ध्यान की अच्छी स्थिति मानी जाती है जहां आपके अंतर्ज्ञान का विकास होने के साथ साथ आप अतीन्द्रिय होने शुरू होते हैं।
आप सभी का यह कर्तव्य है कि इस समूह में लिंक को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाए एवं जोड़ें ताकि यह सभी दुर्लभ लेख विद्या सभी तक पहुंचता रहे एवं ज्यादा से ज्यादा लोग इसका लाभ के सकें।
आनंद
अगर स्वास बाए तरफ अच्छे से चल रही हो दाहिने नाक से ठीक से नही चल रही हो लेकिन आपको अपनी स्वास को ऊपर बताये गए क्रम के अनुसार दाहिने नाक से ठीक से चलाना है तो आप बाए करवट हो कर थोड़े देर लेट जाएं स्वांस स्वतः दाहिने नाक से अच्छी चलने लगेगी।
ऊपर बताये गए क्रम को दिमाग मे रखें अगर उस क्रम के हिसाब से स्वास चल रही हो तो बहुत अच्छा एयर अगर उस क्रम के हिसाब से स्वांस नही चल रही हो तो आप स्वांस बदल कर अपने उर्जात्मक स्थिति को बदल सकते है इससे आपके आध्यात्मिक यात्रा में जो भी आप योग-ध्यान का अभ्यास करने वाले है उसपर मूलभूत रूप से बहुत गहरा असर पड़ेगा और आपके अंदर स्वतः एक दिव्य घटना घटित होनी प्रारम्भ हो जाएगी।
आपको इसके अलावा और कही कोई दिमाग नही लगाना है बस जो बताया गया उतना समझ लें और अपने जीवन मे उतार लें इसके अलावा अन्य चीजो में न उलझें क्योंकि स्वांस का विज्ञान बहुत ज्यादा विस्तृत है।
स्वांस परिवर्तन से जीवन परिवर्तन यात्रा -
मैं यहां मान कर चल रहा हु की आप सभी को यह पुस्तक प्राप्त होते ही आप इसके अनुसार अपने दिनचर्या में कर्मानुसार यह अभ्यास जोड़ेंगे और दिए गए निर्देश अनुसार अपने अभ्यास क्रम को आगे बढ़ाएंगे।
प्रथम दिन आप सभी को बताये गए निर्देश अनुसार कार्य करना है।
एक माह में 15-15 दिन के दो पक्ष पड़ते हैं जिसे हम शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष के नाम से जानते है।
अब हमें ध्यान रखना है कि नीचे दिए हुए क्रम अनुसार प्रातः सूर्योदय के समय अपनी स्वांस की जांच करनी है।आगे लिखने से पूर्व आप सभी को बता दु की एक समय मे हमारी एक तरफ की नाक से ही स्वांस सहज रूप से आया जाया करती है अर्थात एक समय मे दाहिने अथवा बाए तरफ किसी एक तरफ स्वांस अच्छे से चलती है उसके दूसरी तरफ की नाक में स्वांस कुछ बाधित रहती है। बस आपको प्रातः सूर्योदय के समय इसी की जांच करनी है कि किस तरफ स्वांस अच्छे से चल रही है।नीचे क्रम आप सभी को बताया जा रहा है
शुक्ल पक्ष - पहले,दूसरे एवं तीसरे दिन बायीं तरफ की नाक से स्वांस अच्छे से चलनी चाहिए (सूर्योदय के समय जांच करें)।बायीं तरफ की नाक से जब स्वांस अच्छे से आ रही -जा रही हो तो इसे हम चन्द्र स्वर/इड़ा नाड़ी चलना कहते है।
अब तीन दिन के बाद चौथे,पांचवे एवं छठे दिन सूर्योदय के समय दाहिने तरफ की नाक से स्वास अच्छे से चलनी चाहिए।दाहिने तरफ़ के नाक से जब स्वांस अच्छे से आ रही हो - जा रही हो तो इसे हम सूर्य स्वर/पिंगला नाड़ी चलना कहते है।
अब इसी प्रकार क्रम चलना चाहिए सातवे,आठवें एवं नौंवे दिन पुनः चन्द्र स्वर चलना चाहिए।
दसवें,ग्यारहवें,बारहवें दिन सूर्य स्वर।
तेरहवें ,चौदहवें एवं पन्द्रहवें दिन चन्द्र स्वर।
आप सभी को यह क्रम पूरे शुक्ल पक्ष में जांच करनी है।
ऐसे ही जब कृष्ण पक्ष शुरू हो तो शुरू के तीन दिन सूर्य स्वर और ऊपर के क्रम के अनुसार हर 3 दिन पश्चात अलग स्वर चलना चाहिए।यह आप सभी को हर रोज जांच करना है।अगर आप सबने इस पर पकड़ बना ली तो समझिए आपकी आध्यात्मिक यात्रा को शुरुवाती बल मिल गया।
यह क्रम क्यों आवश्यक है ?
प्रातः सूर्योदय के समय हमारे ऊर्जा शरीर मे बेहद मूलभूत परिवर्तन हो रहे होते है।नींद को एक छोटी मृत्यु की संज्ञा दी गई है गहरी नींद मृत्यु के सामान है और प्रातः उठना एक नया जीवन। नए जीवन मे नई ऊर्जा के साथ कई प्रकार के आवश्यक परिवर्तन सूर्योदय के साथ सूक्ष्म रूप से हो रहे होते है अगर यह परिवर्तन हमारे चेतना पर क्रमिक रूप से स्वाभाविक दिशा में हो तो जीवनी ऊर्जा बिना किसी विकार के आगे बढ़ती है।इसका सीधा प्रभाव हमारे प्राण से जुड़ा हुआ है जो सूक्ष्म रूप से स्वांस प्रस्वास की क्रिया से जुड़ा हुआ है।अगर सूर्योदय के समय हमारे ऊर्जा परिवर्तन में किसी प्रकार का विकार आता है एवं जीवनी ऊर्जा किसी प्रकार से बाधित होती है तो इसका भान हमे अपने स्वांस प्रस्वास से पता चलता है।
अब जानते है आगे की बात अगर ऊपर के बताए गए क्रम के अनुसार हमारे स्वांस का क्रम चल रहा हो तो समझना चाहिए कि सब ठीक है लेकिन अगर ऊपर बताये क्रम में किसी प्रकार की दिक्क्त आ रही हो अर्थात बताये गए क्रम के अनुसार अगर दाहिने एवं बाए नाक से आते जाते स्वास क्रम में परिवर्तन आ रहा हो तो समझना चाहिए कि सामान्य जीवन मे कई प्रकार के कठिनाई से गुजरना पड़ सकता है।यह विधि व्यक्ति को स्वयं का ज्योतिष बना देता है और इसका समाधान भी उसके पास रहता है।
अब जानते है अगर स्वास ऊपर बताये हुए क्रम में न चले तो क्या करें -
जैसा कि आप सभी को बताया गया है कि अगर स्वास ऊपर बताई गई क्रम अनुसार न चले तो समझना चाहिए कि आगे आने वाले 15 दिन में कुछ कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है वह कठिनाई कुछ भी हो सकती है।अब जानते है एक उदाहरण के द्वारा मैन लीजिए शुक्ल पक्ष की पहली तिथि है आप प्रातः उठे और आपने जांच की अपने स्वांस की और पाया कि दाहिने तरफ से ज्यादा अच्छे से स्वांस आ रही है।अब जब आप ऊपर के बताए गए क्रम देखेंगे तो पाएंगे कि शुक्ल पक्ष की पहली तिथि में सूर्योदय के समय बाएं तरफ की नाक से स्वास अच्छे से चलनी चाहिए लेकिन उसके विपरीत आपके दाहिने तरफ से चल रही है ,इस समय अगर हम अपनी स्वांस की बदल लें अर्थात जिसमे चलनी चाहिए उसमें चला लें तो सारी प्रकृति आपकी उर्जात्मक रूप से आपके अनुकूल हो जाएगी।
अब जानते है कि स्वांस को एक नाक से दूसरे नाक में कैसे बदला जा सकता है -
अगर आपको दाहिने तरफ के नाक से स्वास अच्छे से चल रही है और बाएं तरफ की नाक से स्वास थोड़ा अवरोध है लेकिन क्रम के अनुसार आपको बाए नाक से स्वास चलानी है तो आप अगर दाहिने करवट हो कर थोड़ी देर लेट जाएंगे तो स्वतः आपकी स्वांस बाए तरफ के नाक से अच्छे से चलने लगेगी और दाहिने तरफ में अवरोध आ जायेगा।
ध्यान की शक्ति एवं शक्तिशाली प्रयोग -
यह लेख लिखने के पीछे का उद्देश्य सामान्यतः ध्यान के लिए सभी को प्रेरित करना है जिससे ध्यान की विशेष स्थिति में सजगता के साथ अपने आस पास की उन ऊर्जाओं का उपयोग किया जा सके जो जाने अनजाने हर समय हमारे आस पास कार्यरत है लेकिन उनको अपनी मानसिक शक्ति से एक विशेष दिशा देकर हम अपने जीवन मे मूलभूत परिवर्तन कैसे ला सकते हैं।
आज हर जगह आध्यात्मिकता पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है अलग अलग जगहों पर इन विषयो पर शोध खोज भी किये जा रहे है।जब भी बात आध्यात्म की आती है तो ध्यान - योग हमेशा से इसका मूल केंद्र रहा है।ध्यान असल मे एक अवस्था है जो आपके अंदर सहज ही घटित हो जाता है और आपको एक ऐसी अवस्था मे ले जाता है जहां आप उस आनंद की अनुभवातीत अवस्था से जुड़ जाते है जिसके लिए आध्यात्मिक यात्रा शुरू की गई थी।लेकिन यह सब बातें ध्यान की उच्च अवस्था की है जहां पर आप किसी भी प्रकार की भौतिक भावनाओ से उठ जाते है।
अब इस स्थिति में पहुचने के पहले वह सभी लोग जो भौतिक जंजाल में फंसे हुए है जगह जगह अपने भविष्य को लेके चिंता व्यक्त करते है और वर्तमान में भी कई प्रकार की परेशानियों से गुजर रहे है उन्हें अपने वर्तमान भौतिक स्थितियों को ठीक करने की आवश्यकता रहती है ताकि वो निश्चिन्त हो कर आध्यात्मिक यात्रा को कर सकें।
समाज के सभी मूल कर्तव्यों को निभाते हुए ध्यान योग में आगे बढ़ने हेतु यह आवश्यक हो जाता है कि जीवन मे वर्तमान संघर्ष कम हो जिससे मन प्रसन्नता और एकाग्रता से अपने ध्यान यात्रा को आगे बढ़ा सकें।
ध्यान की शुरुआती अभ्यास में और ध्यान को उपलब्ध हो जाने की यात्रा के बीच मे जब अभ्यास और अनुशासन के बल पर एक साधक आगे बढ़ रहा होता है तो उस समय मानसिक एकाग्रता बढ़ती जाती है और इसके साथ ही उसकी सूक्ष्म मानसिक शक्ति भी बढ़ती है,यही वो समय होता है ध्यान में विभिन्न प्रयोगों के द्वारा ब्रह्मांड के उन भौतिक शक्तियों का प्रयोग किया जा सकता है।अपने मानसिक तरंगों के माध्यम से मंथन करके सृष्टि से अपने अनुरूप अवस्थाओं को अपने जीवन मे प्रकट कर सके इसके लिए आगे आप सभी के जीवन को बदल देने वाले कुछ मूल जानकारी दी जा रही है।आशा है यह लेख और इसमें दिए गए प्रयोग आप सभी के जीवन को बदलने में सहायक होंगे और अपनी भौतिक परिस्तिथियों को अनुकूल बनाते हुए ध्यान की उस अवस्था मे पहुचेंगे जहाँ कुछ शेष नही रह जाता।
क्रमशः
दक्षिणामूर्ति शिव -
दक्षिण भारत के कई मंदिरों में दक्षिण की ओर मुंह किए और बरगद के पेड़ के नीचे बैठे शिवजी की मूर्ति पाई जाती है। इस मूर्ति को दक्षिणामूर्ति कहा जाता है। यह मूर्ति शिव को गुरुओं के गुरु के रूप में प्रस्तुत करती है। इस रूप में शिव कैलाश पर्वत पर ध्रुवतारा के नीचे बैठते हैं। उत्तर में स्थित ध्रुवतारा स्थिर है और यह इस बात का प्रतीक है कि वे इस अस्थिर विश्व का केंद्र है। बरगद का पेड़ भारत की संन्यासी परंपराओं से जुड़ा है। वे संन्यासी मन से प्राप्त ज्ञान को गृहस्थों के भौतिकवादी विश्व तक पहुंचाते हैं।
दक्षिणामूर्ति का बायां हाथ वरद-मुद्रा अर्थात दान की मुद्रा में है। उनका दाहिना हाथ ज्ञान-मुद्रा में है, जहां उनकी तर्जनी उनके अंगूठे को छूती है। ये मुद्राएं उन्हें गुरु के रूप में स्थापित करती हैं : वे जो ज्ञानी हैं और अपना ज्ञान बांटते हैं।
उनके दो और हाथ हैं। इनमें पकड़े चिह्नों को लेकर सर्वसम्मति तो नहीं है, लेकिन सभी चिह्न ज्ञान को दर्शाते हैं। एक चिह्न तप है, शरीर में बिना ईंधन के, चिंतन से निर्मित की गई आग। यह आग उस ज्ञान का प्रतीक है जो मन के विकसित होने में बाधा डालने वाली सभी गांठों को जलाता है। दूसरा चिह्न है फण लहराता हुआ सांप, जो ज्ञान के फूलने को दर्शाता है। यह ज्ञान हमें तब मिलता है, जब हम जीवन में हिस्सा लिए बिना उसका केवल अवलोकन करने लगते हैं। तीसरा चिह्न है जपमाला, जिसका प्रयोग जपने और याद करने के लिए किया जाता है। अन्य चिह्न संगीत वाद्ययंत्रों और पुस्तकों के हैं।
दक्षिणामूर्ति शिव अपना बायां पैर अपनी दाहिनी जांघ पर रखते हैं। आम तौर पर शरीर का बायां भाग प्रकृति या शरीर का और दाहिना भाग पुरुष या मन का प्रतीक है। जैसा कि नटराज की मूर्ति में देखा जाता है, यहां भी शिव दाहिने पैर को प्राथमिकता देकर उसे पूर्णतः धरती पर रखते हैं और बायां पैर या तो हवा में या दाहिनी जांघ के ऊपर होता है।
इसके विपरीत कृष्ण की प्रतिमाओं में वे हमेशा बाएं पैर पर खड़े रहते हैं और अपना दाहिना पैर उसके आड़े रखते हैं। कृष्ण भौतिक सुखों का आनंद लेते हैं, लेकिन वैसा करते समय सचेत रहते हैं। कृष्ण के दोनों पैर धरती पर होते हैं, जिसका मतलब है कि वे शरीर और मन दोनों को महत्व देते हैं। शिव शरीर के बजाय मन को महत्व देते हैं और इसलिए उनका केवल एक पैर धरती पर रहता है। इसलिए उन्हें एकपद भी बुलाया जाता है।
कई ऋषियों ने शिव के पैरों तले बैठकर उनसे वेद और तंत्र का ज्ञान प्राप्त किया। कहते हैं कि सभी ऋषि शिव का प्रवचन सुनने उत्तर भारत गए जिस कारण धरती उस दिशा में झुक गई। धरती को फिर से संतुलित करने के लिए शिव ने अपने शिष्य अगस्त्य को दक्षिण भारत जाने को कहा। इस तरह अगस्त्य दक्षिण भारत के महान ऋषि बने।
आदि शंकर द्वारा रचे गए दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम में उन्होंने इस बात बात की व्याख्या की कि कैसे इस तरुण दिखने वाले शांतचित्त गुरु ने बूढ़े ऋषियों को अपना ज्ञान बांटा। शिव से प्रश्न ऋषियों ने नहीं, बल्कि स्वयं देवी ने पूछे। देवी ने शिव से विवाह करके सदियों के चिंतन से अर्जित किया ज्ञान बांटने को उन्हें प्रोत्साहित किया।
यदि शिव काल हैं, तो देवी काली हैं, वे जो काल को वश में करती हैं। देवी ने ही शव को शिव अर्थात ईश्वर में परिवर्तित किया। दक्षिण से आने वाली और बदलाव को मूर्त रूप देने वाली देवी ने ही उत्तर प्रेरित किए। उत्तर हर बार बोला नहीं गया; वह संगीत और नृत्य के माध्यम से भी प्रदर्शित किया गया। यही वजह है कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य इतना अर्थपूर्ण है।
यह जानकारी आप सभी के लिए गुगल से ली गई है लेकिन इनके वे तथ्य जो बहुत कम ही लोग जानते है उस विषय पर हमारे द्वारा हमेशा की तरह इस पर एक लेख लिखा जाएगा।क्योंकि हमारी परंपरा इस प्राचीन परम्परा से जुड़ी है जिसमें महागुरु दक्षिणामूर्ति शिव हैं।
बहुत पूर्व में मैने यह साधना प्रकाशित की थी जैसे अन्य साधनाएं प्रकाशित करता हु।
माता लक्ष्मी की साधना जैसा आप सब जानते है कि अदभुत आर्थिक परिवर्तन देखने को मिलता है लेकिन थोड़ा समय लगता है परिस्थितियों में बदलाव आने में।
लेकिन यह एक ऐसी साधना है जिसे जिन साधकों ने किया उन्हें बहुत कम समय में उत्तम परिणाम प्राप्त हुए एवं सहज रूप में उनके आर्थिक मामलों में सफलता प्राप्त हुई।अतः नीचे प्रकाशित करना उचित समझा।
माँ लक्ष्मी अदभुत साधना -
मन्त्र - हम हम सजल भगवती महालक्ष्मीये श्रीम नमः।
Ham Ham Sajal Bhagawati Mahalakshmiye shreem namah.
यह अत्यंत प्रभावी मन्त्र है।
नित्य 3,6 या 15 माला जपना है
माला - सनस्कारित लाल हकीक
जो गुरु दीक्षित है एवं हमारे द्वारा पारंपारिक गुरु मंत्र धारण किया है उन्हे इस मंत्र दीक्षा की आवश्यकता नहीं मार्गदर्शन लेके साधना प्रारंभ कर सकते है।जिन्होंने गुरु दीक्षा नहीं लीं है उन्हें इस मंत्र की दीक्षा लेना आवश्यक है।
1.5 लाख तक जप करना है चाहे जितने भी दिन लग जाये।
आसन - लाल
शुद्ध देसी घी का दीपक जलेगा।
किसी भी शुभ मुहूर्त से शुरू करें।
ध्यान आवश्यक।।
दशांश हवन। - आम की लकड़ी,खैर की लकड़ी,नव ग्रह की लकड़ी,कमलगट्टा, घी,शहद।
3 या 8 कोने का हवनकुंड।
दीपावली की रात्रि से प्रारंभ कर सकते है अथवा अन्य विशेष मुहूर्तों से।
मुहूर्तों हेतु मार्गदर्शन ले कर करें।
साधना में प्रयोग होने वाली सामग्री समय से मंगा कर साधना की तैयारी कर सकते हैं।
आनंद शिव
पुष्प किन्नरी साधना -
जैसा कि हम सब जानते है कि तंत्र जगत में अनेकों ऐसे सूक्ष्म जगत की जागृत। शक्तियां है जिन्हें समय समय पर साधकों द्वारा सिद्ध किया गया एवं अपनी भौतिक परिस्थितियों में चमत्कारी बदलाव के साथ साथ सूक्ष्म जगत की शक्तियों के संपर्क में होने के कारण अन्य अनुभूतियां प्राप्त की जिनसे चेतनात्मक स्तर पर भी काफी चमत्कारी परिवर्तन हुए।आप सबने यक्षिणी,योगिनी,रति इन सभी शक्तियों के बारे में अवश्य सुना होगा जो अपने स्वभाव गुड़,धर्म अनुसार अलग अलग स्तर पर होते है लेकिन एक अन्य स्वरूप है जिसे किन्नरी वर्ग की शक्तियों कहते है ये अत्यंत शक्तिशाली मायावी एवं आपके साधना की शुद्धता अनुसार विशेष शक्तियों को देने वाले होते हैं जो कहा नहीं जा सकता कि प्रसन्न होने पर क्या दे सकते है।
लेकिन साधारण स्तर पर यह देखा गया कि व्यक्ति के अंदर जबरदस्त आकर्षण का पैदा होना,भौतिक सभी आवश्यकताएं पूर्ण होना एवं अन्य अदभुत विषय जिस पर बात नहीं की जा सकती।तंत्र साधक हमेशा समय समय पर ऐसे साधनाओं को करने एवं अपने शोध को आगे बढ़ाने और पारलौकिक जगत को ज्यादा से ज्यादा समझते हुए आगे बढ़ने की चेष्टा करते है।
मैने इस साधना को अत्यंत विशेष रूप में देखा जो परीक्षित है एवं अच्छे से साधना की गई तो विशेष कृपा प्राप्त होती है।
इसमें सर्वप्रथम व्यक्ति को अर्धनारीश्वर ध्यान क्रिया का अभ्यास करना होता है जो अत्यंत विशेष और गुप्त है।अर्धनारीश्वर ध्यान से एक पुष्ट तैयारी करने के बाद ,अर्धनारीश्वर मंत्र,गुरु मंत्र,गणपति मंत्र के जप एवं इसके पश्चात पुष्प किन्नरी के मूल मंत्र का जप किया जाता है।
यह साधना विधान में
दो मालाओं की आवश्यकता होती है जो संस्कारित होने चाहिए।
लाल आसन की आवश्यकता होती है
दिशा पूर्व अथवा पश्चिम रखा जाता है।
साधना रात्रि में 9 बजे के बाद करने पर अच्छा परिणाम देती है।
23 दिवस की ये साधना है विशेष परिस्थितियों में जांच के बाद दिन में कुछ बदलाव किए जाते है।
15 माला प्रतिदिन जप किया जाता है यह संख्या भी विशेष परिस्थितियों में बदले जा सकते है।
इसके 3 विशेष मंत्र है जो साधक के अनुसार उन्हें दिए जाते हैं।
मंत्र लिखना यहां उचित नहीं है ताकि मंत्र का बेफालतू व्यक्ति मानसिक उच्चारण न करें अतः ऐसे मंत्रों को साधना के तैयारी के दौरान ही ग्रहण करना चाहिए।
आगे आने वाले विशेष दिनों में जैसे दीपावली एवं अन्य राशि अनुसार शुभ दिनो,शुभ नक्षत्रों की स्थिति में की जा सकती है।
व्यक्ति को यदि नक्षत्र अनुसार दिन दिए जाए तो स्पष्ट रूप से शक्ति को प्रत्यक्ष करने में बहुत सहयोग करता है।
हर शक्तियों की उत्पत्ति कुछ विशेष नक्षत्रों की दशा में होती है जिसके विषय में शायद वर्तमान के तंत्र पुस्तकों में कही जानकारी नहीं प्राप्त होती है लेकिन यदि उस नक्षत्र में साधना उसी शक्ति की हो जिसकी उत्पत्ति का कारण अमुक नक्षत्र हो तो उसे शक्ति जल्द ही प्रत्यक्ष होती है। हा लेकिन इसका अर्थ यह बिलकुल न लगाए कि स्वयं को बिना तैयार किए बिना साधे ऐसा कुछ होगा।
आपकी ध्यान में प्रतिमा की तरह बैठने की स्थिरता कम से कम 20 मिनट की होनी चाहिए और इसका अभ्यास मै अर्धनारीश्वर ध्यान के समय करवाता हु अतः तैयारी के बाद ही इस साधना को करके इसकी पूर्ण परिणाम प्राप्त किए जा सकते है।
किन्नरी वर्ग के शक्तियों पर भगवान शिव की विशेष कृपा होती है अतः शिवलिंग के समक्ष यह साधना की जाए तो अत्यंत शुभ होती है।
अतः ऐसे अनेकों साधनाओं के इक्षुक व्यक्तियों को अवश्य ऐसे साधनाओं को करके अपनी यात्रा को उच्च स्तरीय बनाना चाहिए।
शिव
देवीभागवतमें ब्रह्माजीने भगवतीसे विनयपूर्वक पूछा है कि "जिस ब्रह्मको वेद 'एकम्' 'अद्वितीयम्' कहकर प्रतिपादन करते हैं, क्या वह ब्रह्म आप ही हैं? यदि आप हैं तो आप पुरुष हैं या स्त्री?" महाशक्तिने कहा-
सदैकत्वं न भेदोऽस्ति सर्वदैव ममास्य च। योऽसौ साहमहं योऽसौ भेदोऽस्ति मतिविभ्रमात्॥
मेरा और ब्रह्मका सदा एकत्व है, किसी प्रकारका अ कभी भेद नहीं रहता। जो वे हैं वही मैं हूँ और जो वि मैं हूँ वही वे हैं। केवल बुद्धिविभ्रमसे भेद प्रतीत क होता है।
भेद उत्पत्तिकाले वै सर्गार्थ प्रभवत्यज । दृश्यादृश्यविभेदोऽयं द्वैविध्ये सति सर्वथा ॥ नाऽहं स्त्री न पुमांश्चाहं न क्लीबं सर्गसंक्षये । सर्गे सति विभेदः स्यात् कल्पितोऽयं धिया पुनः ॥ अहं बुद्धिरहं श्रीश्च धृतिः कीर्तिः स्मृतिस्तथा । श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा तृष्णा तथा क्षमा ॥
'उत्पत्तिके समयमें सृष्टिके अर्थ ही भेद प्रतीत होता अ है; यह दृश्य, अदृश्यका विभेद - द्वैतभाव सदैव रहता हो है। अर्थात् सृष्टि-दशा में ब्रह्म और ब्रह्मशक्ति-दोनों पड स्वतन्त्ररूप से प्रकट होते हैं। जैसे वक्तृता देते समय वक्ता और वक्तृत्वशक्ति अलग प्रतीत होती है और वक्तृताके पश्चात् वक्तृत्वशक्ति वक्तामें लीन हो जाती है। प्रलय हो जानेपर मैं न स्त्री हूँ, न पुरुष और न क्लीब हूँ; केवल सम सृष्टिकालही में बुद्धिद्वारा कल्पित भेद दृष्टिमें आता है। सृष्टि-विकासावस्थामें मैं बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, दोन श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा और क्षमा हूँ। आगे दूर चलकर कहा है-मैं कान्ति, शान्ति, पिपासा, निद्रा, तन्द्रा, जरा, अजरा, विद्या, अविद्या, स्पृहा, वाञ्छा, शक्ति और अशक्ति हूँ।'
आज आप सभी अर्धरात्रि ध्यान अवश्य करें।ध्यान में बैठें कुछ समय यदि चंद्रमा के प्रकाश के नीचे बैठ सकें तो अति उत्तम।
बैठें और ध्यान के आनंद को प्राप्त करें।
दीपावली के शुभ अवसर पर करें महालक्ष्मी की साधना -
यह साधना बहुत महत्वपूर्ण साबित होगी।
सुख, संपत्ति और वैभव के लिए यह साधना अमोघ है और यह चमत्कारिक प्रभावों वाली सिद्ध होगी।
इच्छुक साधकगण दीक्षा ले कर यह एकदिवसीय साधना दीपावली की रात करें।
मूल-मंत्र है - shreeng kleeng sa ka la ha na maha lakshmiyai namah
श्रीँग क्लींग सा का ला हा ना महा लक्ष्मीयै नमः।
साधना विधि -
आवश्यक सामग्री-
आसन और वस्त्र -लाल
जप माला - संस्कारित स्फटिक, लाल हकीक , लाल चन्दन या श्वेतार्क की माला।
उच्छिष्ट गणपति तंत्र।
साधना दिशा- पश्चिम
साधना स्थल पर पांच घी के दीपक। दीपकों का मुख साधक की ओर हो।
उक्त जप माला से 15 माला जप करें।
जप के बाद एक धूपदानी पर अग्नि रखकर घी की 15 आहुति दें और प्रणाम कर उठ जाएं।
साधना जो आपके सारे सहजता (comfirt) को ध्वस्त कर दे -
साधना अर्थात स्वयं की समस्त इंद्रियों को साध कर स्वयं की चेतना को शुद्ध स्थिति में ले जाना।शुद्ध चेतना ही ब्रह्म के तेज को धारण करने योग्य होती है एवं शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त होता है।
किसी भी विद्या की प्राप्ति अथवा किसी भी अच्छी आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त करने हेतु सबसे पहले गुरु आपके सारे धारणाएं तोड़ देता है और साधक बनने से पूर्व व्यक्ति को इतना घिसता है कि वो साधक कहलाने योग्य बने।लेकिन आज का समय ऐसा है कि यदि कोई व्यक्ति सिद्धि साधना के आकर्षण में आध्यात्मिक अभ्यास करने की इक्षा रखता है तो उसकी स्वयं की पहली शर्त यही रहती है कि उसे जल्द से जल्द सफलता मिले और सहज तरीके से वो प्राप्त हो जाए जिसके लिए वर्षों ऋषि मुनि साधक जन तप करते हैं। मानव मस्तिष्क वर्तमान समय में ये समझने को तैयार ही नहीं है कि आध्यात्मिक मार्ग पर चलना स्वयं को साधना और आज तंत्र के बारे में जितनी आसानी से सब सुनने करने को मिल रहा है ये उतना आसान नहीं है।आप स्वयं सोचिए एक आध्यात्मिक स्थिति में व्यक्ति किस अवस्था में होता होगा क्या वह सामान्य रह सकेगा।सिद्धों ने सिद्ध होने के लिए सबसे पहले वो खोया जो उनके जीवन को सहज बनाता था जो आदतें आराम देती है उन्हें त्यागा तब उसके बाद यात्रा शुरू हुई आध्यात्म की जो अथाह सुख और आनंद देने वाला है।जिस प्रकार से एक मां को मां बनने का पूर्ण सुख 9 माह के अत्यंत असहजता को झेलने के बाद प्राप्त होता है।सिद्धों ने गुरु के कड़े निर्देश में जब नींद अपनी चरम पे रही उस समय उठ कर ध्यान किया,जब ठंड पड़ी तो ठंडे जल में ध्यान किया,जब गर्मी बढ़ी तो अग्नि के पास बैठ कर तप किया अर्थात वो सब किया जो आपके अपने शरीर के बनाए नियमों के विपरीत रहा और तभी वो प्राप्त हुआ जिसमे प्रकृति ने उन्हें वो स्वतंत्रता दी जो प्रकृति के नियमों के बाहर है।
अतः आप सब से यही आग्रह है साधनाओं के आकर्षण में रहना कोई गलत बात नहीं ये सभी मार्ग है आपको आध्यात्म के रास्ते पे प्रेरित करने हेतु लेकिन किसी भी प्रकार के लुभावने आकर्षण में न आते हुए पहले स्वयं को अनुभवी के गुरु के मार्गदर्शन में तैयार करे चाहे उसमें जितना भी समय लगे।आप यह समझ लें इस तैयारी के दौरान ही आपको बहुत कुछ प्राप्त होने लगेगा और आपको असल सत्य समझ में आएगा कि क्यों आवश्यक है स्वयं को तैयार करके आगे साधना में उतरने हेतु।
तैयारी रहेगी स्वयं को स्थिर,संयमित,अपनी इंद्रियों को अपने नियंत्रण में करने की क्षमता की वृद्धि,चित्त की शुद्धि जो कि निरंतर करना होता है,ध्यान की असीम गहराई में विचार शून्य प्रवेश एवं अनेकों छोटी छोटी चीजें।
और फिर इतनी तैयारियों के बाद आप जब मांत्रिक साधना अथवा किसी अलग आयाम की शक्ति को अनुभव करना चाहेंगे तो ये आपके लिए अत्यंत सहज हो जाएगा।।
लेकिन आपकी सोचने समझने की शक्ति चमत्कारी रूप से बदल चुकी होगी और शायद फिर आप किसी प्रलोभन में नहीं फसेंगे।
अतः योग,ध्यान का अच्छे से अभ्यास करें।गुरु कृपा हेतु गुरु मंत्र जप करे एवं स्वयं को धीरे धीरे समय देके उस योग्य बनाए ताकि आप भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनो मार्गो में सामंजस्य बना कर निष्काम आनंद अवस्था को प्राप्त कर सकें।
आनंद शिव
हठयोग की मान्यता के अनुसार मेरुदण्ड जहाँ सीधे जाकर पायु और उपस्थ (गुदा एवं जननेन्द्रिय) के मध्य भाग में लगता है वहाँ एक स्वयंभू लिंग है। यह लिंग एक त्रिकोण चक्र में अवस्थित है जिसे अग्निचक्र कहते हैं। इसी अग्निचक्र में स्थित लिंग को साढ़े तीन वलयों में लपेट कर (कभी-कभी आठ वलयों में कही गई) सर्पिणीरूपा कुण्डली विराजमान है। यह कुण्डली शक्ति ब्रह्माण्ड में व्याप्त महाकुण्डलिनी शक्ति का ही व्यष्टि में व्यक्त रूप है। आसन, प्राणायाम तथा मुद्रादि के अभ्यास से इडा और पिंगला में प्रवाहित होने वाला वायु रुकता है; इस प्रकार सुषुम्ना की मध्यवर्ती ब्रह्मनाड़ी का द्वार उन्मुक्त होता है और कुण्डलिनी शक्ति उद्बुध होकर ऊर्ध्वमुख होती है। इसके उद्बुध होने से प्राण स्थिर हो जाता है तथा साधक शून्य पथ से निरन्त अनाहत नाद सुनने लगता है। चित्त पूर्णरूपेण शान्त होने पर नाद रुकता है तथा उद्बुध कुण्डलिनी ऊपर उठती हुई क्रमशः षट्चक्रों का भेदन करती हुई मस्तिष्क में स्थित सहस्रार चक्र में विराजमान शिव से मिलने के लिये गतिशील होती है। छह चक्रों में प्रथम मूलाधार चक्र चार दलों का; दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र छः दलों का, तीसरा मणिपूर चक्र दस दलों का, चौथा अनाहत चक्र 12 दलों का, पाँचवाँ विशुद्धाख्य सोलह दलों का तथा छठवाँ आज्ञा केवल दो दलों का माना गया है। मूलाधार रीढ़ के नीचे गुदा और मुष्कमूल के मध्य, स्वाधिष्ठान मेरुदण्ड में मेढू के ऊपर, मणिपूर मेरुदण्ड में नाभि के पास अनाहत हृदय के पास, विशुद्धाख्य कंठ के पास तथा आज्ञाचक्र दोनों भौहों के बीच माना गया है। डॉ० वी०जी० रेले' ने अफने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'मिस्टीरियस कुण्डलिनी' में आधुनिक शारीरशास्त्र के प्रकाश में पारिभाषिक शब्दावली में षटचक्रों तथा योग में वर्णित प्रसिद्ध इडा, पिंगला और सुषुम्ना आदि प्रसिद्ध नाड़ियों को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। उनके अनुसार हठयोग के इन ग्रन्थों का नाड़ीज्ञान एक वैज्ञानिक सत्य है।
13 क्रियाएं 130 दिवसीय जटिल हठ कुंडलिनी अभ्यास समूह के दृतिय समूह का निर्माण किया जा रहा है।
जैसा की प्रथम समूह का अभ्यास निरंतर जारी है एवं अभ्यासी जन नियमित अभ्यास कर रहे हैं।
सभी साधक समय से 130 दिवसीय अभ्यास समूह में जुड़ जाएं इस समूह में होने वाले क्रियाओं को अपने जीवन में उतारें और जीवन के नए आयाम की ओर बढ़ें ।
★ आपको यहां वही यौगिक क्रियाएं सिखाई जाएंगी जो प्राचीन गर्न्थो में वर्णित है एवं सशक्त अभ्यास हैं ।130 दिनों में सम्पूर्ण अभ्यास सिख कर इसे आप सभी को एक सम्पूर्ण क्रिया बना कर प्रतिदिन अपने जीवन से कुछ समय निकाल के अभ्यास करने हेतु दिया जाएगा।
★ इसमें सम्पूर्ण कुंडलिनी ऊर्जा एवं सुषुम्ना प्रवाह जागृति वाले ही सारे अभ्यास कराए जाएंगे जैसा कि आप सभी को पता है व्यक्ति जीवन भर सुषुम्ना में प्राण प्रवाह, कुंडलिनी शक्ति संचालन एवं चक्र सशक्तिकरण के लिए अनेको प्रयास करता है लेकिन सही यौगिक क्रियाओं के अभ्यास के अभाव में समय खराब करता है और वर्षों के अभ्यास के बाद भी उस स्थिति को अनुभव नही कर पाता जिसे उसे कर लेना चाहिए अतः यहां कुछ जटिल एवं कुछ साधारण यौगिक क्रियाओं को इस प्रकार सजाया गया है कि यह सीधा आपके कुंडलिनी केंद्र पर जबरदस्त प्रभाव डालती है।
★ एक सही क्रम में किया गया यौगिक अभ्यास आपके हजारों साधनाओ के बराबर होता है और हर व्यक्ति के अंदर उसकी अवस्था के अनुसार एक नई ऊर्जा और शक्तियों का उदय करता है इस मामले में सभी के अनुभव अलग अलग होते है किसी एक व्यक्ति के अनुभव जरूरी नही की दूसरे को भी हो सभी को विभिन्न प्रकार से इसका अनुभव प्राप्त होता है।
★ इस समूह के सभी अभ्यसीयो को यौगिक दीक्षा भी दी जाएगी जिससे उनका योग बल बढे और जीवन मे अपने यौगिक अभ्यासों को उतार कर विभिन्न आयामो को पा सकें।
★ इसी क्रम में लंबे समय के अभ्यास के बाद आप किस प्रकार से इन यौगिक ऊर्जाओं का उपयोग कर सकेंगे एवं कैसे सूक्ष्म गरुओ से सम्पर्क बना सकें इसका अभ्यास भी बताया जाएगा जिससे निश्चित ही महागुरुओ का आशीर्वाद प्राप्त होगा।
★ इस समूह में जुड़ कर सीखने के बाद लाइफ टाइम आप सभी को प्रश्नोत्तरी सप्पोर्ट दी जाएगी ताकि आगे के अनुभव एवं अभ्यास के साथ क्या कैसे करना है इस पर मार्गदर्शन की जा सके।
मेरे पास अनेकों ऐसे लोगो को मेसेज आए हैं जो कुंडलिनी योग एवं चक्र साधनाओं हेतु इतने उत्साहित रहते है की उन्होंने कई जगहों पर लाखो रुपए दे कर कोर्स ज्वाइन कर रखा है लेकिन निराश ही रहे अतः जिन लोगो ने भी हमारे द्वारा कराए गए 21 दिवसीय ध्यान,नक्षत्र ध्यान इत्यादि अभ्यास किए उन्हे पता है की जो भी यौगिक क्रियाएं हमारे द्वारा प्रदत्त सिखाया जाता है वे कितने प्रभाव डालने वाले रहते है और लगातार व्यक्ति लंबे समय तक अभ्यास करें तो वो कितना सक्षम हो सकता है अनेकों शक्तियों को अपने अंदर जागृत करके उनसे विभिन्न कल्याणकारी कार्यो को करने हेतु।
13 विभिन्न अभ्यास दिए जायेंगे प्रति अभ्यास 10 दिन तक करना है एवं एक एक क्रम जुड़ता जायेगा इस प्रकार 130 दिन का अभ्यास जो आपके पूरे व्यक्तित्व को बदल कर रख देगा।
इन अभ्यासों से आपके अंदर जागृत होती शक्तियों को और कैसे विस्तार कर सकें एवं योग बल से किस प्रकार अनेकों प्रकार की हीलिंग,टेलीपैथी,और अन्य गुप्त प्रक्रियाएं कर सकेंगे ये सब इस समूह के सेशन में समझाया जायेगा।
सर्वप्रथम यह समझना जरूरी है की अपने आंतरिक शक्तियों को जागृत करने के लिए कड़े एवं नियमित अभ्यास की आवश्यकता होती है।इसके बाद व्यक्ति तंत्र के किसी भी साधना में आता है तो उसे अन्य कोई तैयारी नही करनी पड़ती वह किसी भी शक्ति को प्रत्यक्ष करने में सक्षम होता है।
अतः यदि आप सब ऐसे किसी सेशन से जुड़ कर यह सब सीखना चाह रहे थे और अभी तक नही सिख पाए तो आप सब को जीवन के कुछ माह अवश्य ऐसे अभ्यासों को देना चाहिए फिर आप आगे स्वयं तय कर सकते है की क्या करना है।इस अभ्यास का पहला अब दूसरा बैच बनाया जा रहा है जिसमे सीमित लोगो को ही जोड़ा जायेगा।
जो भी जुड़ने के ईक्षुक होंगे वे जुड़ सकते है यह बिलकुल भी निःशुल्क नही रखा जायेगा क्योंकि निःशुल्क दिया गया अत्यंत दुर्लभ और महत्वपूर्ण ज्ञान भी किसी काम का नही रह जाता जब व्यक्ति उसे अपने जीवन में नही उतारता। जब व्यक्ति किसी चीज को सीखने हेतु उसका शुल्क जमा करता है तब वह पूर्ण लगन से उसका अभ्यास करता है एवं अभ्यास से अनुभव होते ही उसे फिर कुछ कहने की जरूरत नहीं होती वह स्वयं उत्साह से अभ्यास करने लगता है।
जो भी जुड़ने के इक्षुक होंगे वे आज से ही जुड़ने हेतु जानकारी ले सकते हैं डायरेक्ट मैसेज करके।
एक वीडियो सेशन उन्हे निःशुल्क रूप से दिया जाएगा जिससे वे अनुमान लगा सकें की उन्हें जुड़ना है अथवा नहीं।
'शिवो भूत्वा शिवं यजेत'
शिव बनकर ही शिव की पूजा करनी चाहिए.
आनंद शिव
