मिर्ज़ा ग़ालिब
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‘ ग़ालिब ‘ कौन है पूछते हैं वो की ‘ग़ालिब ‘ कौन है ? कोई बतलाओ की हम बतलायें क्या 😏 Link for boost this channel- https://t.me/boost/mirza_galib
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*हमने ज़िंदगी से शिकायतें करना ही बंद कर दिया
*जब समझ आया कि हर चीज़ हमारे हिसाब से नहीं हो सकती!
7 019
रूह-ए-बेताब को तेरे क़ुर्ब की तलब रही,
जिस्म फ़ासलों में रहा, इश्क़ सफ़र करता रहा!
7 019
*तेरी निगाहों में डूबे तो ये राज़ खुला,
समंदर गहरा हो तो साहिल की ज़रूरत नहीं रहती!!
7 019
*तेरी निगाहों में जो कैफ़-ए-इश्क़ देखा था,
*उसके बाद किसी और की आँखें अच्छी न लगीं।
7 019
*ज़िंदगी में हर चीज़ हासिल करना ज़रूरी नहीं,
*कुछ चीज़ों को छोड़ देना भी फ़तह होती है।
7 019
*बेवफाओ के बाजार मे तुम वफ़ा ढूंढ़ते हो..
*बड़े नादान हो ग़ालिब..
*कातिल के घर मे ही जख्म की दवा ढूंढते हो.!!
7 019
*दिल चाहता था कि उसकी हर ख़ता माफ़ कर दें,
*मगर ज़मीर ने कहा—हर माफ़ी रिश्ते नहीं बचाती।
7 019
*हम चाहते तो आज भी उसे अपना कह देते,
*मगर कुछ रिश्ते चाहत से नहीं, क़दर से निभते हैं।
7 019
*मोहब्बत का तक़ाज़ा था कि तुझे पा लेते,
*ख़ुद्दारी ने कहा—जिसे क़दर न हो, उसे छोड़ दो!
7 019
*ज़िंदगी ने पूछा, सबसे अज़ीज़ क्या है?
*हमने कहा—वो सुकूँ जो किसी के होने का मोहताज न हो।
7 019
*हर जुदाई का मतलब बेवफ़ाई नहीं होता,
*कुछ फ़ासले मोहब्बत को उम्रभर महफ़ूज़ रखते हैं।
7 019
*तेरी क़ुर्बत का असर अब भी रूह मे बाक़ी है,
*फ़ुर्क़त में भी दिल को तेरा ही गुमाँ रहता है।
