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DR NARAYAN DUTT SHRIMALI

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!! संसार की प्राप्ति में तो भाई-भाई में लड़ाई हो जाती है, पर परमात्मा की प्राप्ति में दुनिया मात्र सहायक हो जाती है । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २६* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *मुक्ति स्वर्ग आदि लोकों की तरह एक स्थान विशेष में नहीं है । मुक्त आप हैं ही । मिटने वाले से अलग हो जाओ तो मुक्ति स्वत: सिद्ध है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २६* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!! असत् को सत्ता देना, महत्ता देना और अपना मानना - ये तीन बाधाएं हैं । इन तीन बाधाओं के रहते कितना ही साधन करो, वहीं - के - वहीं रहोगे, जैसे - रस्सी नौका से बंधी रहे तो रात भर नौका चलाते रहो, वहीं - के - वहीं रहोगे । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २५* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

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NMSV SEPT 2024.pdf11.23 MB

*।। श्रीहरि: हर शरणम् ।।* 🌷 ★ सब लौकिक विद्याओंसे *अनजान* होते हुए भी *जिसने परमात्माको जान लिया है, वही वास्तवमें ज्ञानवान् है।* (१५। २०) 🌷 *संजीवनी-सुधा* पृष्ठ संख्या ९८ स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज *।। श्री कृष्णार्पणमस्तु ।।* 🌹🙏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *संसार की सेवा करने से भी भगवान् में प्रेम होगा और भगवान् को (अपना मानकर) याद करने से भी भगवान् में प्रेम होगा ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २3* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! थोड़ा धन होने से आप विशेष पुण्य कर सकते हैं, ज्यादा धन होने से नहीं । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २3* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! शरीर प्रतिक्षण बदलता है, एक क्षण भी आपके साथ नहीं रहता । शरीर को अपना मानना बेइमानी है । बेईमानी को छोड़ दो तो मुक्ति है । बेईमानी से बंधन है, ईमानदारी से मुक्ति है। *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २२* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!! भगवान् सर्वज्ञ हैं, सर्वसमर्थ हैं और दयालु भी हैं, ऐसे भगवान् के रहते हम अपने को अनाथ क्यों मानें ? *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २२* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! आप "साधक संजीवनी" आदरपूर्वक समझ -समझकर पढ़ो तो अंतः करण में फर्क जरूर पड़ेगा । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २१* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *भगवान् के सिवाय कुछ नहीं है - यह ऊंची से ऊंची दार्शनिक दृष्टि है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित  स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या २०* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

।।श्रीहरि:।।🌺 *किसी तरह से भगवान के साथ संबंध जोड़ लो।* नाम - जप करो तो *जबान* से, पुस्तक पढ़ो तो *नेत्रों* से, चिंतन करो तो *मन* से भगवान के साथ संबंध जुड़ गया। 🌟सत्संग के फूल पुस्तक से पृष्ठ से 71 गीताप्रेस गोरखपुर *परम श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदास जी महाराज* नारायण !नारायण! नारायण! नारायण!

*।। श्रीहरि: हर शरणम् ।।* 🌷 ★ साधक भूलसे अपनेको तत्त्वज्ञ न मान ले, इसलिये यह पहचान बतायी है कि *अगर बुद्धिमें समता नहीं आयी है तो समझ लेना चाहिये कि अभी तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है, केवल वहम हुआ है!* बुद्धिकी समताका स्वरूप है- *राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि न होना।* (५। १९ परि.) *संजीवनी-सुधा* पृष्ठ संख्या ९२ स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज *।। श्री कृष्णार्पणमस्तु ।।* 🌹🙏

।।श्रीहरि:।।🌺 *जब साधक यह दृढ़ निश्चय कर लेता है* कि मेरेको कभी किसी परिस्थितिमें मन, वाणी अथवा क्रियासे चोरी, झूठ, व्यभिचार, हिंसा, छल, कपट, अभक्ष्य-भक्षण आदि *कोई शास्त्र-विरुद्ध कर्म नहीं करने हैं, तब उसके द्वारा स्वत: विहित कर्म होने लगते हैं।*  🌟 *श्रीमद्भगवद्गीता साधक - संजीवनी* ( अध्याय 12 /12) गीताप्रेस गोरखपुर *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज* नारायण! नारायण! नारायण !नारायण!