शाङ्कर किंकर:🌹 SHANKAR KINKAR🌹
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यहां श्रुति स्मृति पुराण धर्मशास्त्र आदि के महापुरुषों द्वारा किए गए व्याख्यान एवं विचार तथा आगम-निगम से संलग्न प्रवचनादी प्रस्तुत किए जाएंगे Feedback/सुझाव:- @brijesh_vyaas PDF के लिए:- @SHANKAR_KINKAR_PDF चैनल संबंधित बातचीत के लिए:- @S_K_jigyasa
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Everyone ask how to do duty 100% perfect & that too without attachment as stated in Gita.-निष्काम कर्म .
Sri Mahasannidhanam gives Modern day example of a Cashier in bank , who doesn’t do mistake & is completely aware that the money he is counting doesn’t belong to him.
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् ।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम् ॥
(हितोपदेश: 1.77)
पीठ पीछे कार्य बिगाड़ने वाले और मुख पर मीठी-मीठी बातें करने वाले मित्रको, मुखपर दूध वाले विषके घड़े के समान(अर्थात घड़े के ऊपर ऊपर तो दूध लगा हुआ है, किंतु भीतर विष भर रखा है) ऐसे मित्र को सर्वथा त्याग देना चाहिये।
आईये कुछ बातों पर विचार करें।सबसे पहले तो नित्यानुष्ठान ना करने के लिये भगवन्नाम का ओट लेना बहुत बड़ा अपराध है। जिन भगवानका नाम हम रट रहें है क्या उनकी आज्ञा का पालन करना हमारा धर्म नहीं? भगवान स्वयं कह रहें हैं -
श्रुतिस्स्मृति: ममैवाज्ञा यस्तामुल्लङ्घ्य वर्तते |
आज्ञाच्छेदी ममद्रोही मद्भक्तोsपि न वैष्णव: || (विष्णुधर्म)
(श्रुति और स्मृति यह मेरे आदेश है जो इसका पालन नहीं करते हैं वे विश्वासघाती - मेरे द्रोही हैं। चाहे वें मेरी भक्ति करें तो भी उनको वैष्णव नहीं मानना चाहिये।)
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥ (रामचरितमानस)
और तो और प्रपन्न-शरणागत के लिये भगवदाज्ञा का पालन करना ही मुख्य हैं - अग्या सम न सुसाहिब सेवा (रामचरितमानस)। भगवदाज्ञा का पालन करना यानि उनके अनुकूल रहना और प्रपन्न के लिये तो सर्वप्रथम निर्दिष्ट यहीं है - आनुकूलस्य संकल्पः (अहिर्बुधन्य संहिता)।
दुसरी बात जो कि गोस्वामीपाद श्रीतुलसीदासजी स्वयं कह रहें हैं -
नाम राम को अंक है सब साधन हैं सून।
अंक गये कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून॥(दोहावली)
भगवान श्रीरामका नाम अंक है और सब साधन शून्य (०) हैं। अंक न रहने पर तो कुछ भी हाथ नहीं आता, परंतु शून्य के पहले अंक आने पर वे दस गुने हो जाते हैं, अर्थात राम-नाम के जप के साथ जो साधन होते हैं, वे दस गुना अधिक लाभदायक हो जाते हैं, परंतु राम-नाम के बिना जो साधन होता है वह किसी भी तरह का फल प्रदान नहीं करता।
इससे यह स्पष्ट हैं कि श्रीरामनाम के ही परमोपासक गोस्वामीजी अन्य साधन-कर्मों की उपेक्षा करने के पक्षमें बिल्कुल नहीं हैं। विशेष जानकारी के लिये रामचरितमानसके उत्तरकाण्ड का अध्ययन करें। हाँ गोस्वामीजी निरस कर्मकाण्ड को भगवन्नाम से जोड़कर हमारे सभी कृत्यों को उपासनात्मक बनाने के पक्ष में जो कि गीताचार्य भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कह रहें हैं -
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
(हे कुन्तीपुत्र! तुम जो कुछ भी स्वतःप्राप्त कर्म करते हो, जो खातें हो, जो कुछ श्रौत या स्मार्त यज्ञरूप हवन करते हो, जो कुछ (स्वर्ण,अन्न, घृतादि वस्तु) सत्पात्रोंको दान देते हो और जो कुछ तपका आचरण करते हो वह सब मुझे समर्पित कर दो।)
अब एक और महत्पुर्ण बात पर ध्यान दीजिये। भगवन्नामजप-कीर्तन तब ही सफल है जबतक हमनें नामापराधसे बचकर भगवन्नाम का आश्रय किया। इन दश नामापराधमें इन तीन पर विचार कीजिये -
(१) अश्रद्धा श्रुतिशास्त्रदैशिकगिरां (वेद-शास्त्र-सन्त आज्ञा का पालन नहीं करना)।
(२) विहितत्यागौ (यह सोचना की नामजप करतें हैं अतः सन्ध्या-पूजन-तर्पण आदि कार्यों का त्याग कर देना)
(३) धर्मान्तरैः साम्यं (भगवन्नामाश्रय को अन्य पूण्यकर्मों के समान मानना तथा तूलना करना। क्योंकि भगवन्नामाश्रय से श्रेष्ठ कोई भी यज्ञ- तीर्थ आदि नहीं हो सकते। इसलिये भगवन्नाम को सर्वोपरी जानकर सन्ध्या-यज्ञादि नित्यानुष्ठान की तुलना करनी ही नहीं चाहिये।)
तो मित्रों सौ बात की एक बात भगवन्नाम का आश्रय लेकर अपने वर्णाश्रमोचित कर्मों से ना भागें, नियमपूर्वक श्रद्धासहित नित्य कर्मानुष्ठान (सन्ध्यावन्दन, अग्निहोत्र, देवपूजन, वेदादि शास्त्रों क अध्ययन, पितृ तर्पण आदि) करें। भगवन्नाम तो साक्षात भगवान हैं! भगवन्नामसें भगवानकी अनुभूति करें। भक्त-प्रपन्न को तो अपने सभी कार्य भगवत्प्रीत्यर्थ करने चाहिये।
धर्म सम्राट करपात्री स्वामी की जय हो
संभव हो तो श्रीकरपात्री स्वामीजी द्वारा लिखित "संकीर्तन मीमांसा" नामक ग्रन्थ को एकबार अवश्य पढ़ लेंवे।
हमारे अद्वैत वेदांत परंपरा के अनेक ऋषि मुनि पूर्व आचार्य वर्तमान आचार्य से आप बड़े प्रवक्ता हो गए
आप अद्वैत वेदांत के इतने बड़े आचार्य हो गए कि आप कह रहे हैं कि सनातन धर्म कर्मकांड का कोई महत्व नहीं है अब इतने बड़े हो गए
जो व्यक्ति स्वयं स्वयंभू स्वघोषित आचार्य बन बैठा है ना शास्त्रों का ज्ञान है ना धर्म के ज्ञान है और अपने आप को आचार्य बनके सुशोभित हो रही है
आपके इस वीडियो में आप मनुस्मृति और आप्रामाणिक साबित करने का प्रयास कर रहे हैं
जो व्यक्ति स्वयं स्वघोषित आचार्य बना बैठा है
अद्वैत वेदांत के नाम पर पाखंड बनाना बंद करिए ।।
बस कुछ समय के लिए प्रतीक्षा करें ,।।
धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो।।
भक्ति मार्ग ,कर्मकांड • में उचित मार्ग कौन है
एकबार काशीजी में एक ब्राह्मणदेवता ने पूज्य श्रीकरपात्री स्वामीजी को प्रणाम करके पुछा -
स्वामीजी! मैं सन्ध्या-यज्ञादि कर्म नहीं करता हूँ बस श्रीरामनाम का जप-कीर्तन एवं रामचरितमानस का मासपारायण पाठ कर लेता हूँ। तो क्या इससे मेरा कल्याण हो जायेगा?
इसपर पूज्य श्रीकरपात्री स्वामीजी ने कहा - यदी आप शुद्रकुल में उत्पन्न हुए होते तो निश्चित आपका कल्याण हो गया होता पर दुर्भाग्य से आपका जन्म ब्राह्मणकुल में हुआ है अतः आपके लिए सन्ध्या-यज्ञादि वैदिक कर्म करना अत्यंत आवश्यक है।
अब आप विचार करें, क्या करपात्री स्वामीजी भगवन्नाम विरोधी है ? क्या उनको नहीं ज्ञात था कि "राम नाम अवलम्बन एकु" का सिद्धांत कलिकाल में मुख्य है?
अरे भाई! जितना रामनाम प्रेमी करपात्री स्वामीजी हुए उतना शायद ही कोई और हुआ होगा। स्वामीजी श्वास-प्रश्वास में सतत रामनाम का जप करते थे, इतना की एकबार जब वे अस्वस्थ होकर कुछ समय तक मूर्छित रहें तो जगने पर उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ कि उनका रामनाम का जप स्थगित हो गया था। तो विचार कीजिए की स्वामीजी ने उस ब्राह्मण को ऐसा क्यों कहा? +
९० के दशक में द्वैतवादी मध्वसम्प्रदाय के विद्वानों द्वारा अद्वैतवादियों को यह चुनौती दी गई कि "कोई हमारे साथ शास्त्रार्थ करे एवं विजयी होकर १ लाख पारितोषिक ले जाए"। काशी के अद्वैतवादी विद्वानों ने यह चुनौती स्वीकार की और कहा कि काशी में शास्त्रार्थ सभा का आयोजन हो, किन्तु काशी में सभा होने का यह विचार आगे न बढ़ सका। अन्त में द्वादशदर्शनाचार्य स्वामी श्रीकाशिकानन्दगिरी जी ने १९९० अप्रैल में मध्वों के गढ़ बंगलुरु में प्रवेश किया एवं स्वामी विद्यामान्य तीर्थ जी को विचारसभा में परास्त किया। इस प्रकार स्वामी करपात्री जी के पश्चात विद्यामान्य जी को परास्त करने वाले वे द्वितीय संंन्यासी बने।
बंगलुरु शास्त्रार्थ के पश्चात अनेक वर्षों तक स्वामी जी का श्री विद्यामान्य तीर्थ जी के साथ लिखित शास्त्रार्थ चला। पूर्व की ही भांति माध्वों द्वारा इस शास्त्रार्थ के परिणाम को मिथ्या सिद्ध करने के प्रयास में अनेकों पुस्तकें लिखी गई। जिनका सम्पूर्ण उत्तर स्वामीकाशिकानंदजी ने दिया।
लिखित शास्त्रार्थ का अन्तिम उत्तर स्वामी काशिकानंद गिरी जी की और से १९९३ में आया,, स्वामी जी ५ वर्षों तक प्रतीक्षा करते रहे कि विद्यामान्य जी कोई उत्तर दें ,किन्तु माध्वों की और से कोई उत्तर नहीं आया। अन्त में १९९८ में स्वामी जी द्वारा बंगलुरु में हुए शास्त्रार्थ एवं अन्य विषयों को जोड़कर यह "अद्वैत विजय वैजयन्ती" ग्रन्थ प्रकाशित किया गया।
जिस तरह देह व आत्मा एक दूसरे के पूरक हैं उसी तरह देवता व उनके यंत्र भी एक दूसरे के पूरक हैं। यंत्र को देवता की देह व मंत्र को आत्मा कहते हैं।
यंत्र और मंत्र दोनों की साधना उपासना मिलकर फलदेती है। मंत्र की शक्ति उसकी ध्वनि में निहित है यंत्र की शक्ति उसकी रेखाओं व बिंदुओं में है।
*प्रश्न*
*जयंती अथवा जन्मोत्सव* ❓❓❓
श्रीपरशुराम व श्रीहनुमान जयंती आ रही है भ्रम में पड़े हिन्दू "जयंती की जगह जन्मोत्सव का उपयोग करना चाहिए." ऐसा मैसेज प्रसारित करते मिल जाएंगे । जिनकी मृत्यु होती है उनके लिए जयंती शब्द उपयोग होता है ऐसा भी कई लोग कहते मिल जाएंगे । श्रीस्कंदपुराणनुसार "जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः " जो जय और पुण्य प्रदान करे उसे जयंती कहते हैं ।लोकाचार की शैली में जयंती को ही जन्मोत्सव कहते हैं । जयंती,जन्मोत्सव और भगवदकथा को मंगलाशाशन भी कहा जाता है। क्योंकि इन तीनों अवसरों में भगवान के जय व पुण्य प्रदान करने वाले लीलाओं का वर्णन किया जाता है ।
अतः जयंती व जन्मोत्सव भिन्न भिन्न हैं ऐसे भ्रम में न रहें व विधिपूर्वक श्रीहनुमान जी व श्रीपरशुराम जी की जयंती का आयोजन करें।
धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः ।
तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते ॥
मान लो हम चिंतन कर रहे हैं हम नींबू खा रहे हैं नमक से । खट्टा । मूंह मे पानी आ जायेगा । कैसे आया पानी नींबू तो खाया नहीं । ये चिंतन का फल है । किसी से हमारा झगड़ा हो गया है उसका चिंतन करते करते शरीर में क्रोध आ जायेगा ।
चिंतन से हमारे अणु परमाणु में आकर बाहरी प्रतिक्रियाशील होकर असर दिखने लगता है ।
ऐसे ही चिन्मय स्वरूप भगवान का नाम करो चाहे लीला चिंतन करो धीरे धीरे हमारे अणु परमाणु मे अंतर आना शुरु हो जाता है । जब हम तल्लीनता से लीला चिंतन करते हैं तो चिन्मय रस स्वरूप चिंतन करने के कारण हमारे भीतर भी परिवर्तन आना शुरु हो जाता है । धीरे धीरे जड़िय अवस्था से मुक्त हो कर हमको चिन्मय दिशा में ले जाते हैं । हमारे स्वरूप की तरफ ले जाते हैं । इसलिये नाम के साथ साथ चिंतन करना बहुत जरूरी है ।
- पूज्य श्री विनोद बाबा महाराज
"ह्रदय से बोल रहा हूँ गुरु,गोविंद और ग्रँथ ही मेरा जीवन है। भगवान को जो मुझसे कराना है,यंत्रवत मुझे आगे कर देते है। इतना मैं जानता हूँ।
मेरा अपना कोई संकल्प भी नही है ना मेरी कोई योजना है,साथ वाले महानुभाव जानते है।
ईश्वर, सिद्ध ऋषि मुनि,पितर ये सब जो करना चाहते है, उनके रुख को देखकर मैं स्वयं को निमित्त मात्र बना देता हूँ,बात सच्ची है ।
अभी बहुत कुछ होना है,आप सुन लेंगे तो भी चौक जाएंगे। तो मैंने सङ्केत किया अभी क्या हुआ है,अभी तो बहुत कुछ होना बाकी है,भारत जैसा दिख रहा है,वैसा नही रहेगा।
असंभावित ढंग से औरों के लिए तो असंभावित है,उस ढंग से घटना घटेगी। विश्व मे भी बहुत विचित्र परिवर्तन होगा !
- पूज्यपाद श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य महाभाग
पूर्वाम्नाय श्रीपुरी गोवर्द्धनपीठम्
(१४/०३/२०२३)
🌼धर्म की १३ पत्नियों से सन्तानें-
🔸१) धर्म और श्रद्धा से शुभ
🔸२) धर्म और मैत्री से प्रसाद
🔸३) धर्म और दया से अभय
🔸४) धर्म और शान्ति से सुख
🔸५) धर्म और तुष्टि से मोद
🔸६) धर्म और पुष्टि से अहंकार
🔸७) धर्म और क्रिया से योग
🔸८) धर्म और उन्नति से दर्प
🔸९) धर्म और बुद्धि से अर्थ
🔸१०) धर्म और मेधा से स्मृति
🔸११) धर्म और तितिक्षा से क्षेम
🔸१२) धर्म और ह्री (लज्जा) से प्रश्रय (विनय)
🔸१३) धर्म और मूर्ति से नर-नारायण ऋषि
प्रसिद्ध आचार्यो द्वारा कथन
स्वामी श्री करपात्री जी महाराज निर्णय -
करपात्री जी महाराज धर्म सभा मे बैठे थे तभी वहां उपस्थित विद्वतजन में से किसी ने पूछा कि -
"महाराज जी पर्व उत्सव अथवा त्यौहार में किसी की मृत्यु हो जाने पर लोग त्यौहार उत्सव मनाना बन्द कर देते है क्या यह सही है "
स्वामी श्री ने कहा कि - "यह पूर्णतया अशास्त्रीय संगत है ।तुम मान लो ट्रेन से जा रहे हो और संयोगवश दुर्घटना हो गई और उस दुर्घटना में मृत्यु हो गई तो क्या घर परिवार के लोग ट्रेन से जाना छोड़ देंगे कभी ट्रेन से यात्रा नही करेंगे इसलिए त्यौहार व्रत पर्व शास्त्रीय विधि से मनाया जाना ही चाहिए इसे छोड़ना नही चाहिए "।
अतः यह स्पष्ट होता है कि ऐसे अशास्त्रीय नियम को पकड़ कर व्रत त्यौहार को छोड़ देना पूर्णतया गलत है इससे सनातन धर्म का ही क्षय होगा ।
