वृन्दावन रस अमृत
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जहाँ भक्ति रानी भी आकर हो जाती है फिर से जवां ऐसे श्री धाम वृन्दावन की रस महिमा सुनिए रसिक संतो के श्री मुख से,जिनके सत्संग और भजन सुनकर हमारे जीवन को प्रभु की और अग्रसित होने का मार्ग मिलेगा। स्वागत है आप सभी का प्रभु की प्रेरणा से बनाये हुए इस चेंनल मे।
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"सब कर्मों का फल है"
एक स्त्री थी जिसे 20साल तक संतान नहीं हुई।कर्म संजोग से 20वर्ष के बाद वो गर्भवती हुई और उसे पुत्र संतान की प्राप्ति हुई किन्तु दुर्भाग्यवश 20दिन में वो संतान मृत्यु को प्राप्त हो गयी।वो स्त्री हद से ज्यादा रोई और उस मृत बच्चे का शव लेकर एक सिद्ध महात्मा के पास गई ।महात्मा से रोकर कहने लगी मुझे मेरा बच्चा बस एक बार जीवित करके दीजिये, मात्र एक बार मैं उसके मुख से" माँ " शब्द सुनना चाहती हूँ ।स्त्री के बहुत जिद करने पर महात्मा ने 2मिनट के लिए उस बच्चे की आत्मा को बुलाया। तब उस स्त्री ने उस आत्मा से कहा तुम मुझे क्यों छोड़कर चले गए?मैं तुमसे सिर्फ एक बार ' माँ ' शब्द सुनना चाहती हूँ। तभी उस आत्मा ने कहा कौन माँ?कैसी माँ !!मैं तो तुमसे कर्मों का हिसाब किताब करने आया था।स्त्री ने पूछा कैसा हिसाब!!आत्मा ने बताया पिछले जन्म में तुम मेरी सौतन थी,मेरे आँखों के सामने मेरे पति को ले गई;मैं बहुत रोई तुमसे अपना पति मांगा पर तुमने एक न सुनी।तब मैं रो रही थी और आज तुम रो रही हो!!बस मेरा तुम्हारे साथ जो कर्मों का हिसाब था वो मैंने पूरा किया और मर गया। इतना कहकर आत्मा चली गयी।उस स्त्री को झटका लगा।उसे महात्मा ने समझाया देखो मैने कहा था न कि ये सब रिश्तेदार माँ,पिता,भाई बहन सब कर्मों के कारण जुड़े हुए हैं ।हम सब कर्मो का हिसाब करने आये हैं। इसिलए बस अच्छे कर्म करो ताकि हमे बाद में भुगतना ना पड़े।वो स्त्री समझ गयी और अपने घर लौट गयी ।
*हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए*
🙏
राम राम जी
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पराअम्बा भगवती की उपासना का बड़ा सुदृढ़ विधान नवतिथियों में निश्चित हुआ है जहाँ माताएँ अत्यंत उदारता से भगवती पराअम्बा की परम आकृति समझा गया है। बहुत सारे स्थानों पर उसी सभ्यता और उसी देश में उनके ऊपर अत्याचारों का भी उद्घाटन होता है। ये बड़े आश्चर्य की बात है।
मैं सच कहूँ
जन्म लेती हुई वो छोटी कन्या ही कौमार अवस्था में जब तक गोदी में हो वो छोटी सी लाली ही एक प्रकार से *शैलपुत्री* है।
जब वो कुछ बड़ी होकर घर के आँगन को अपनी किलकारियों से आच्छादित करती है तब वो कौमार अवस्था की कन्या ही *ब्रह्मचारिणी है।
ठीक विवाह से पूर्व अपने यौवन और सौन्दर्य का प्रकाश करती अपने ही घर को बड़ी सुदृढ़ता से सम्हालती और कहीं न कहीं जब उसकी दृष्टि किसी को समर्पित होने को तलाश करती है कहीं जाने की योजना में स्थित रहती है उस समय उसका निर्मल स्वरूप ही पराऽम्बा का तीसरा स्वरूप *चन्द्रघण्टा* है।
विवाह के पश्चात् अपने गर्भ में जीव को धारण करने वाली वो देवी ही *कुष्माण्डा* है।
अपने हृदय से लगाकर अपने बालक को कंचुकी का उन्मीलन कर निजस्तन उसके मुखाम्भोज में प्रदान करके उसका पोषण करने वाली वो जननी ही *स्कन्ध माता* है।
वृद्ध से लेकर बालक तक घर के सारे व्यवहार आहार और परिवार को अपनी अत्यंत प्रतिभा से चलाने वाली वो देवी ही *कात्यायनी* है।
विविध प्रकार की उपासनाएं विपरीत ताओं में बड़ी दृढ़ता से खड़ी होकर किसी की मुसीबत में लम्बे चौड़े नियम लेकर पति की कष्ट काल में बड़े बड़े व्रतों को रखकर उसके इस प्रतिकूल समय को अनुकूल बनाने वाली वो देवी ही *कालरात्रि* है।
श्वेत केशों में बढ़ती आयु में बैठी सारे घर को आशीर्वाद देने वाली वो वृद्धा ही *महागौरी* है।
और फिर एक दिन अपने शरीर का परित्याग करके अपने उसपूरे कुल कुटुम्ब के ऊपर सतत् आशीर्वाद बरसाने वाली वो पितर रूपा देवी ही *सिद्धिदात्री* है।
हर घर में पूरे जीवन के सारे क्रियाकलाप में ये नौ देवियाँ उपस्थित है। हम उसके स्वरूप को इतना सीमित न करें।
_आश्चर्य ये होता है जिस पाण्डाल में भगवती केविग्रह को बनाकर उसकी उपासना की जाती है उन्हीं पाण्डालों में अनेक कन्या और माताओं के ऊपर कुदृष्टि की जाती है? ये तारतम्यता अनुभव में नहीं आती।_
।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।
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एक वैराग्य तो नीरसतावादी वैराग्य है और एक वैराग्य है जो स्वतः कृष्णप्रेम के प्रसाद के रूप में प्राप्त होता है। जिसमें निरसता नहीं होती, जिसमें मस्ती होती है। जगत की शर्तों पर बाबा नहीं बना जा सकता। आप हमें चिट्ठी दोगे कि ऐसे रहो तो हम बाबा हैं? जगत की शर्तों पर थोड़ी न बना जाता है।
जगत के दुःख में रोना राग है और श्रीकृष्ण प्रेम में अश्रु निपातन करना ही वैराग्य है। सबसे बड़ा वैरागी है जो श्रीराधारमण जी के सामने नृत्य कर सके। सबसे बड़ा वैरागी है जो जीवन में श्रीराधारमण जी की प्रसादी ग्रहण कर सके। श्रीवृन्दावन में निवास कर सके।
अन्यथा गौड़ियाओं के परिवेश में वैराग्य भी गोपनशील होता है। हम जिस परिकर से हैं,जिस परिवेश से हैं जिस मंजरी भाव की उपासना करते हैं जिस गोपी के आनुगत्य को स्वीकार करते हैं वहाँ सब गोपनशील है।
हमारा वैभव भी हमारे वैराग्य का घूँघट है। दिख न जाय। पता न चल जाय कि ये भी है।
ज्ञान को प्रतिष्ठा पाना बड़ा आसान होता है, वैराग्य को भी प्रतिष्ठा पाना बड़ा आसान होता है पर जो विशुद्ध भक्ति है केवल उसको समझना बड़ा कठिन है। मीरा को भी ज़हर पीने पड़ते हैं।
।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।
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बहुत सोच-समझकर श्रीवृन्दावन की तरफ प्रवेश होता है। ये बहुत आसान नहीं है।
वृन्दावन में व्यवस्था से नहीं, ये तो भजन की अवस्था से प्रवेश हो सकता है। जो व्यवस्था में वृन्दावन आए कितने लोग हैं वो यहाँ भी व्यवस्था में ही फँस जाते हैं। इससे बढ़िया दिल्ली में ही, बम्बई में ही, अमेरिका में ही रह लेता। वहाँ भी व्यवस्था में ही था यहाँ भी व्यवस्था? और फिर उस व्यवस्था के चक्कर में वृन्दावन का स्वरूप भी कैसा कर दिया गया? भजनानन्दी भक्त उस पीड़ा को समझते हैं।
श्रीराधामुरली धरौ भज सखे वृन्दावनम् मा त्यज्य।।
श्रीवृन्दावन तो विशुद्ध भजन का स्थान है।
कई-कई बालक लोग जोश में आकर विचार करते हैं महाराज हम वृन्दावन में रहना चाहते हैं कहीं कमरा मिल जाय फिर कहीं नौकरी मिल जाय जिससे हमारा वृन्दावन वास हो जाय। ठीक है एक स्थिति तक ऊपर-ऊपर ये भी समझ आता है पर माया बड़ी विचित्र है फिर उसमें उलझाती रहती है।
ये पेनकिलर जैसा काम तो कर सकता है पर एंटीबायोटिक नहीं है। ऊपर से हम वृन्दावन ही हैं राधारमण दर्शन कर ही रहे हैं पर अभी भी कहीं न कहीं मजबूर भी है क्या करें दाल-रोटी लानी है तो सुबह जाॅब पर जानी ही है। घर भी सम्हालना ही है और वृन्दावन वास करना भी है तो
ऐसे में पेनकिलर वाला काम तो हो जाता है कि चलो ऊपर-ऊपर वृन्दावन में हैं और काम धंधा भी चल गया। अब उसके लिए वृन्दावन में काम धंधा बढ़ता भी बड़ा तेज है और काम धंधा किसी का बढ़ गया तब तो
मन के मारे बन गए, बन तजि बस्ती माह।।
वहाँ उसी झंझट में फँस गए।
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🧏🏻♀️सत्संग में सतत बने रहोगे तो,🪔 संत की कोई बात और विचार आपको गलत मार्ग पर जानें से रोक लेगी🧏🏻
🙇♀️सत्संग के प्रति सबसे बड़ा आदर क्या हैं🙇♂️
🧏🏻♀️सत्संग केवल सुने नहीं🧐उसकी बात का चिंतन मनन कर जीवन में उतारना ही वस्तुत सत्संग की सार्थकता हैं😍
😇विचार करना जीवन में हर सही निरने के पिछे कोई संत का सतविचार ही होगा 😇
📿समय मत ग्वायिए भजिए मेरे नंदकुमार को आपके अपने नंदकुमार को📿
