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राजनीति विज्ञानं:: समग्र संग्रह 🌏

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यह चैनल राजनीति विज्ञानं के समग्र अध्ययन एवं पाठ्य सामग्री हेतु संकल्पित है

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जे जे रूसो_231010_234907.pdf

वाजपेयी के धड़े के एक पूर्व हिंदुत्व समर्थक और पत्रकार-राजनेता मुस्लिम चरमपंथियों और भारतीय मार्क्सवादियों, जिन्हें वे आतंकवादी घोषित करते थे, के बीच की मिलीभगत, से निबटने की सलाहें देते थे। (बीबीसी एक प्रोटोकॉल को फॉलो करता है जो यह बताता है कि क्यों मीडिया को हमास और अन्य उल्लंघनकर्ताओं को जिनमें यहूदी, मुस्लिम, ईसाई, हिन्दू या नक्सली शामिल हैं, आतंकवादी के तौर पर नहीं पेश करना चाहिए।) यही पत्रकार-नेता ईंट का जवाब पत्थर से देने की बात करते थे, जिसमें वे बाइबिल की उक्ति का ही पालन कर रहे थे, जो अन्यथा उनका दृष्टिकोण त्याग देता था। उनके आलोचकों के लिए यह राहत की बात है कि वे बाद में प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति के विरोधी के तौर पर उभरे। धार्मिक रूप से प्रेरित हमास के खिलाफ बदला लेने के लिए इजरायल की रक्तपिपासु कोशिश- अगर इससे 9/11 के बाद अफगानिस्तान में अमेरिका को कभी मदद मिली- पश्चिम की आंख के बदले आंख की उक्ति से अलग नहीं है। इसका उपयोग पश्चिम द्वारा सदियों से यहूदियों का उपहास करने और उनकी हत्या करने के अपने अपराध बोध को दूर करने के लिए बनाई गई इकाई की वेदी पर धर्मनिरपेक्ष राज्यों को नष्ट करने के लिए किया गया था। जैसा कि नोम चॉम्स्की और अन्य हमें लगातार याद दिलाते हैं, हिटलर की हार के बाद अमेरिका या यूरोप में किसी ने भी यहूदियों के पलायन का स्वागत नहीं किया। उन्हें यह काम करने के लिए कहीं और, किसी और की ज़रूरत थी। नॉर्मन फिंकेलस्टीन जैसे सम्मानित यहूदी विद्वान आपको बताएंगे कि होलोकॉस्ट 1967 तक ऐतिहासिक आकाश में अंकित नहीं हुआ था। पिछले हफ्ते तक मेरे ज़हन में 1982 की एक घटना का स्पष्ट दृश्य था, जो हमास के उदय और इजराइल के उसमें गुप्त निवेश को जोड़ती थी। तब सऊदी क्राउन प्रिंस फहद, मोरक्को के फ़ेज़ में अरब लीग के लिए अपनी शांति योजना का प्रचार कर रहे थे, जिसके तहत फ़लिस्तीनियों को एक राज्य मिलता। जिसकी कीमत थी इजराइल की स्वीकृति और उसकी सुरक्षा की गारंटी, जिसे इराक़, सीरिया, लीबिया, दक्षिण यमन ने ठुकरा दिया। और यही वे धर्मनिरपेक्ष और सोवियत यूनियन समर्थक राज्य थे जिनसे शीत युद्ध के बाद एक-एक कर निबटा गया। इज़राइल की वेदी पर और ब्रिटेन द्वारा स्थापित सामंती-जनजातीय क्षत्रप शासकों को उपहार के तौर पर इन्हें व्यवस्थित रूप से नष्ट कर दिया गया। वे कहते हैं कि हमास के हमले ने एक संभावित इज़राइली-सऊदी संधि में बाधा डाल दी। लेकिन सवाल ये है कि ये संधि कब अस्तित्व में नहीं थी? जावेद नकवी Jawed Nakvi डॉन (Dawn) में प्रकाशित, जावेद नकवी का लेख, सभार जनचौक.. #फिलिस्तीनइजराइलसघर्ष #vss

जावेद नकवी / इजराइल की वेदी पर एक विश्व का बलिदान ------------------------------------------------------ राजनीति के पर्यवेक्षकों से यह बात छुपी नहीं है कि इज़राइल के आधुनिक राज्य को 1948 में ‘फाइव आइज अलायन्स’ द्वारा बनाया गया था, जिसने फिर हमास को जन्म दिया ताकि पीएलओ जैसे सेक्युलर और गैर-साम्प्रदायिक संगठन को मात दी जा सके। इन दोनों ही परिघटनाओं के पीछे उद्देश्य अरब जगत के तेल के भंडारों के इर्द गिर्द उभरते वामपंथी उत्साह के खतरे को ख़त्म करना था। आर्थर बाल्फोर के रॉथ्सचाइल्ड को भेजे गए पत्र, जिसने भविष्य के इज़राइली राज्य की ज़मीन तैयार की थी, का 2 नवंबर, 1917 को ड्राफ्ट होना और भेजा जाना महत्वहीन नहीं था। दूसरे शब्दों में कहें तो, ये प्रस्ताव बोल्शेविक क्रांति की वजह से यूरोपीय राजधानियों में खतरे की घंटी बजने के बाद भेजा गया था। इन उद्देश्यों के मद्देनज़र एक ज़रूरी उपकरण बाल्फोर घोषणा से एक साल पहले ही आया था। 1916 के गुप्त साइक्स-पिकॉट समझौते ने मध्यपूर्व में स्थित ओटोमन साम्राज्य के इलाके को विभाजित कर दिया जो अब फ्रांस और ब्रिटेन का प्रभाव क्षेत्र बन चुका था। इसी समझौते ने लार्ड बाल्फोर को यहूदी अभिजात वर्ग के लिए अपने वादे के मसौदे को तैयार करने की ज़मीन दी। इंग्लैंड के युद्ध प्रयासों को मिल रहे रॉथ्सचाइल्ड का समर्थन, नेपोलियन के विरुद्ध अभियान के दौरान अपने चरम बिंदु तक पहुंच चुका था। 1813-1815 तक नाथन मेयर रॉथ्सचाइल्ड लगभग अकेले ही पूरे ब्रिटिश युद्ध के वित्तपोषण का काम करते रहे, जिसमें ड्यूक ऑफ़ वेलिंग्टन की सेनाओं को पूरे यूरोप में वित्तीय संसाधन पहुंचाना शामिल था। रॉथ्सचाइल्ड ने ही ब्रिटिशर्स के सहयोगियों की वित्तीय सब्सिडी के भुगतान की भी व्यवस्था की। कहा जाता है कि सिर्फ 1815 में ही रॉथ्सचाइल्ड ने 9.8 मिलियन पौंड (आज के एक अरब पौंड के बराबर) के बराबर की सब्सिडी ऋण के रूप में ब्रिटिश सहयोगियों को मुहैया करवाई। रॉथ्सचाइल्ड को लिखे बाल्फोर के पत्र में, हालांकि, बात फलिस्तीन में यहूदियों के लिए सिर्फ एक “राष्ट्रीय गृह” की हुई थी, “इस स्पष्ट समझ के साथ कि ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाया जायेगा जो फलिस्तीन में रह रहे गैर-यहूदी समुदायों के नागरिक या धार्मिक अधिकारों, या किसी भी अन्य देश में रह रहे यहूदियों को मिली राजनितिक स्थिति या उनके अधिकारों का हनन करता हो।” गैर यहूदी लोगों के फलिस्तीन से निष्कासन की बात तो दूर इसमें किसी भी ऐसे धर्मशासित राज्य का भी उल्लेख नहीं था जिसमें सिर्फ यहूदी समुदाय बस्ता हो। किसी भी स्थिति में इज़रायल बेंजामिन नेतन्याहू और उनके साथियों की कल्पना के अर्थों में एक धर्मशासित राज्य नहीं हो सकता था। यह विचार अंग्रेजी तबकों में कोई उत्सुकता पैदा नहीं करता था, जो शुरू से ही एक बहुसांस्कृतिक परिवेश के पक्षधर थे, जो एक दिन ऋषि सुनक या बराक ओबामा जैसे लोगों को जन्म देता और उनके ड्राइंग रूम्स तक उन्हें लेकर आता। हालांकि, धार्मिक जिन्न को कभी भी पूरी तरह से ख़त्म नहीं किया गया था। दूसरा गाल आगे करने की ईसाई परंपरा का मतलब पुराने नियम, ईट का जवाब पत्थर से देने को चुनौती देना था। लेकिन वास्तविक दुनिया में इसे कभी लोकप्रियता नहीं मिली। यूरोपीय युद्धों, औपनिवेशिक शस्त्रागारों और पश्चिम के अंतहीन मलयुद्धों ने इसी उदासीन सच्चाई को एक बार फिर स्थापित कर दिया था, दास व्यापार के बारे में तो बात न ही की जाये, जो उन्होंने दूसरों की भूमि पर कब्ज़ा करने के लिए किया था। औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धियों ने दुनिया भर में चर्च बनाए लेकिन चोरी और हत्या के खिलाफ निषेधाज्ञा को नजरअंदाज कर दिया। रवांडा नरसंहार दो जनजातियों के बीच हुआ था और दोनों अपने औपनिवेशिक आकाओं द्वारा स्थापित एक ही चर्च में गए थे। लेकिन, भारत में कुछ हिंदू कार्यकर्ता ईसाई-यहूदी-मुस्लिमों की अपने धर्मों के पाठ और भावना के बारे में निषेधाज्ञा के विपरीत थे। गांधी ईसाई अंदाज़ में एक शान्तिवादी थे, और इतने कि नागरिक अधिकार नेता और ईसाई उपदेशक मार्टिन लूथर किंग, उन्हें अपना प्रेरणास्रोत समझते थे। वहीं दूसरी तरफ, यह हिंदुत्व की अवधारणा थी, जिसने 1939 में ही भारत में मुसलामानों और इसाइयों के साथ वह करने का प्रस्ताव रखा जो हिटलर यहूदियों के साथ जर्मनी में कर रहा था। हिटलर की अपनी प्रशंसा में, गोलवलकर उतने ही कम्युनिज्म विरोधी थे जितने मोदी जल्दी ही बनने वाले थे। हिंदुत्व के लिए यहुदियों के उपहास को पलट कर इज़राइल के समर्थन में उतरने के पीछे कम्युनिज्म विरोध एक स्पष्ट कारण बन गया। मुसलमानों के प्रति नफरत ने तो केवल इनके आपसी संबंधों को मजबूत किया। ये भी विलक्षणात्मक है कि, 16 दिसंबर, 2001 को संसद में हुए हमले से ठीक एक दिन पहले इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख छपा था।

क्षेत्र से अधिक व्यय की जरूरत है मगर सरकार के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। इसे देखते हुए एमडीबी से अपेक्षा की जाती है कि वे नए वित्तीय प्रारूपों एवं नई साझेदारियों की मदद से निजी पूंजी का लाभ उठाएं। मजबूत एमडीबी सभी स्रोतों से धन एकत्र करने में अधिक प्रभावी हो सकते हैं जिसका सकारात्मक परिणाम यह होगा कि ‘विकास के लिए कहीं अधिक रकम उपलब्ध हो पाएगी और निजी उद्यम विकास को तेजी से बढ़ावा देने और टिकाऊ आर्थिक बदलावों को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।‘ निजी क्षेत्र से पूंजी आकर्षित करने और इसके इस्तेमाल के लिए प्रभावी प्रणाली विकसित करनी होगी। तीसरी जरूरी बात नई वित्तीय ढांचा तैयार करने से संबंधित है। एमडीबी की तरफ से मिश्रित वित्तीय योजनाएं, जोखिम साझा करने की सुविधाएं, मिश्रित पूंजी, प्रतिदेय पूंजी (कॉलेबल कैपिटल), गारंटी और ग्रीन बॉन्ड जैसे विकल्प शुरू किए जाने की जरूरत है। इन वित्तीय उपायों से राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (एनडीसी), कार्बन तटस्थता और शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों की प्राप्ति में मदद मिलेगी। एडीबी ने ‘एनर्जी ट्रांजिशन मैकेनिज्म’ के नाम से एक नई पहल की है जिसके तहत कोयला से चलने वाले संयंत्र बंद करने की मुहिम तेज करने और उनकी जगह अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल का प्रावधान है। इस पहल का खास मकसद विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए ऊर्जा जरूरतें पूरी करना है। इंडोनेशिया, फिलिपींस और वियतनाम में इस योजना का परीक्षण भी शुरू हो गया है, जबकि कजाकिस्तान और भारत में इस बारे में चर्चा चल रही है। विश्व बैंक भी कार्बन उत्सर्जन तार्किक रूप में कम करने के लिए ‘जस्ट ट्रांजिशन इनिशिएविट’ कार्यक्रम चला रहा है। एमडीबी ने कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों के लिए वित्त देना बंद कर दिया है, वहीं कार्बन उत्सर्जन कम करने के विश्वसनीय तरीके उपलब्ध कराने की कुछ शर्तों के साथ प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल की अनुमति दी है। एमडीबी के लिए चौथी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वे विकासशील देशों को उनके एनडीसी के क्रियान्वयन में मदद करें। जी20 ने 2024 में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ‘न्यू कलेक्टिव क्वांटिफाइड गोल’ (एनसीक्यूजी) का आह्वान किया है। शुरू में इसके लिए सालाना 100 अरब डॉलर रकम उपलब्ध होगी। इसकी शुरुआत इसलिए की गई है, क्योंकि 2030 से पूर्व की अवधि में विकासशील देशों को 5.8 से 5.9 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी। इनके अलावा, 2050 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए उन्हें 2030 तक सालाना 4 लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। पूंजी उपलब्ध कराने के अलावा एमडीबी को विकासशील देशों को प्रभावी रणनीति एवं नीति, क्षमता निर्माण, परियोजना, निवेश योग्य परियोजनाओं की कतार तैयार करने और विश्वसनीय प्रभाव समीक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। दुनिया भर के नेता जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने की जरूरत से लगातार जूझ रहे हैं, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि एमबीडी इन महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव एवं लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने में किस तरह अपनी भूमिका निभाते हैं। (लेखक चुनाव आयुक्त एवं वित्त सचिव और एशियन डेवलपमेंट बैंक के उपाध्यक्ष के पद पर रह चुके हैं)

बहुपक्षीय विकास बैंक पर सबकी नजर (अशोक लवासा) (साभार बिजनस स्टैन्डर्ड) भारत अपनी अध्यक्षता में जी20 शिखर सम्मेलन सफलतापूर्वक आयोजित करने और दिल्ली घोषणापत्र में सभी सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने में सफल रहा है। निश्चित रूप से भारत की इसके लिए सराहना होनी चाहिए। अब एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इसके बाद आगे का मार्ग क्या होगा? यह सभी जानते हैं कि कोविड महामारी और यूक्रेन संकट के बाद दुनिया के देश जलवायु परिवर्तन के परिणामों को गंभीरता से समझने लगे हैं और साथ मिलकर प्रयास करने के लिए तैयार हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन का खतरा तेजी से वास्तविक एवं गंभीर संकट का रूप ले रहा है। दिल्ली घोषणापत्र में हुए 12 संकल्पों में आठ टिकाऊ विकास, जलवायु परिवर्तन और समावेशी विकास से संबंधित हैं। जलवायु परिवर्तन के संकट का सामना करने के लिए आवश्यक धन का प्रबंध करने का दायित्व बहुपक्षीय विकास बैंकों (एमडीबी) के कंधों पर डाला गया है। ये बैंक अपने पास उपलब्ध वित्तीय संसाधनों एवं अन्य स्रोतों से आवश्यक धन जुटाएंगे। उदाहरण के लिए एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) एशिया और प्रशांत क्षेत्र के अन्य ऋणदातों के साथ मिलकर आवश्यक वित्त का प्रबंध करने का लक्ष्य तैयार कर रहे हैं। घोषणापत्र में एमडीबी में सुधार की रूपरेखा तैयार की गई है उसकी चर्चा पिछले कुछ समय से हो रही है। विकसित और विकासशील देश दोनों ही संयुक्त रूप से इनमें सुधार का मार्ग प्रशस्त करेंगे। अमेरिका के नेतृत्व में जी7 देश एमडीबी को अपने बहीखाते का आकार बड़ा करने और ऋण आवंटन बढ़ाने, खासकर जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए 200 अरब डॉलर का प्रबंध करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। विकासशील देश इस बात की शिकायत करते रहे हैं कि अनुसूची 1 (अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देश) में शामिल देश जलवायु संकट के लिए अतिरिक्त 100 अरब डॉलर रकम उपलब्ध कराने में विफल रहे हैं। संभवतः विकसित देशों का यह कदम इसी आलोचना का नतीजा है। यह वादा पूरा नहीं होने से दीर्घकाल से हानिकारक गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार देशों और वर्तमान समय में इसमें (उत्सर्जन) योगदान देने वाले देशों के बीच विश्वास का अभाव हो गया है। इन बदलती परिस्थितियों के बीच बहुपक्षीय विकास बैंक चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। इन बैंकों ने घोषणा की है कि उनकी सभी संप्रभु एवं गैर-संप्रभु उधारी क्रमशः 2023 और 2025 तक पेरिस समझौते के अनुसार हो जाएंगी। उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु संकट से निपटने के लिए वे अधिक योगदान देंगे। उदाहरण के लिए एडीबी ने 2019 से 2030 के बीच जलवायु संकट से निपटने के लिए रकम उपलब्ध कराने का लक्ष्य 80 अरब डॉलर से बढ़ाकर 100 अरब डॉलर कर दिया है। टिकाऊ विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के क्रियान्वयन का लक्ष्य भी अधूरा रह गया है। इन लक्ष्यों में विकासशील देशों के सामाजिक-आर्थिक विकास के बहु-आयामी बिंदु शामिल हैं। ये बिंदु पहले सही एमडीबी की देश आधारित रणनीति का हिस्सा थे। 2030 के मध्य तक एसडीजी के 12 प्रतिशत लक्ष्य ही पूरे होते दिख रहे हैं। दिल्ली घोषणापत्र में एमडीबी को बेहतर, व्यापक और अधिक प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक सुधार करने का भी जिक्र किया गया है ताकि वे ‘विकास की राह में आड़े आ रही वैश्विक चुनौतियों से निपट सकें’। दिल्ली घोषणापत्र के बाद एमडीबी चार मार्गों का स्पष्ट रूप से अनुसरण कर सकते हैं। पहली बात, इन बैंकों का बहीखाता बढ़ाकर ऋण आवंटन के लिए अधिक गुंजाइश बनाने की जरूरत है। एमडीबी के पूंजी पर्याप्तता ढांचे (कैपिटल एडिक्वेसी फ्रेमवर्क्स) पर जी20 इंडिपेंडेंट रिव्यू की अनुशंसाओं को को क्रियान्वित करने के प्रस्ताव को पहले ही समर्थन मिल चुका है। इसके क्रियान्वयन की समीक्षा के बीच इन बैंकों को अपनी ‘दीर्घकालिक वित्तीय क्षमताओं, मजबूत क्रेडिट रेटिंग और तरजीही ऋणदाता के ओहदे की रक्षा जरूर करनी चाहिए’। जोखिम लेने की क्षमता की परिभाषाओं के अनुरूप काम करने के साथ ही एमडीबी को अपनी रेटिंग सुरक्षित रखने के लिए क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के साथ बातचीत करनी चाहिए। इससे उन्हें सस्ती दर पर पूंजी जुटाने में मदद मिलेगी। एमडीबी अपने नए अवतार पर बातचीत कर रहे हैं, इसलिए यह प्रस्ताव पूंजी पर्याप्तता ढांचे के क्रियान्वयन में और तेजी ला सकता है। मोरक्को के मराक्कश में होने वाली विश्व बैंक की सालाना बैठक में यह अपने अंतिम चरण में पहुंच सकता है। तब तक एमडीबी को मजबूत करने पर गठित स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट का दूसरा हिस्सा भी आ जाएगा। दूसरा मार्ग है निजी क्षेत्र से पूंजी जुटाना, जिसमें परोपकार कार्यों के लिए आई रकम भी शामिल होगी। एसडीजी पर दोबारा ध्यान देना जरूरी है और इनकी प्राप्ति के लिए अब अधिक रकम खर्च करने की जरूरत होगी। गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जलवायु को सार्वजनिक हित की श्रेणी में रखे गए हैं और इनके लिए सार्वजनिक

National_and_Regional_Political_Parties,_Ideological_and_Social.pdf

पेरियार की नजर में रामायण कोई धार्मिक किताब नहीं है. यह एक राजनीतिक ग्रंथ है; जिसका उद्देश्य आर्यों का अनार्यों पर, ब्राह्मणों का गैर-ब्राह्मणों पर, पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व और वर्चस्व के अन्य रूपों को न्यायसंगत ठहराना है. सच्ची रामायण की भूमिका में पेरियार लिखते हैं, “इनके मूल आख्यानों का सावधानी से विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाए, तो पता चलता है कि जो भी घटनाएं हुईं, वे असभ्य और बर्बर थीं” और इनकी कथाओं को इस तरह से लिखा गया है कि ब्राह्मण दूसरों की नजर में महान दिखें; महिलाओं को दबाया जा सके और उनको दासी बनाया जा सके. इनका उद्देश्य उनकी रूढ़ियों और मनु की संहिता को समाज में लागू कराना है.” पेरियार पितृसत्ता के मूल ढांचे को सीधी चुनौती देते हैं. पेरियार की क्रांतिकारी प्रगतिशील सोच सबसे ज्यादा उनके स्त्री संबंधी चिंतन में सामने आती है. पेरियार महिलाओं की ‘पवित्रता’ या स्त्रीत्व की दमनकारी अवधारणा के कटु-विरोधी थे. उनका कहना था कि “यह मान्यता कि केवल महिलाओं के लिए पवित्रता आवश्यक है, पुरुषों के लिए नहीं; इस विचार पर आधारित है कि महिलाएं पुरुषों की संपत्ति हैं. यह मान्यता वर्तमान में महिलाओं को निकृष्ट दर्जे का साबित करने की द्योतक है.” पेरियार महिलाओं के शिक्षा प्राप्त करने, काम करने, अपने ढंग से जीने और प्यार करने के अधिकार के जबरदस्त समर्थक थे. इस मुद्दे पर उनके विचार इतने क्रांतिकारी थे कि द्रविड़ कड़गम के उनके कई घोर समर्थकों को भी वे रास नहीं आए और इसलिए पार्टी ने न तो उनका प्रचार किया और न ही उनके अनुरूप आचरण. जैसा कि स्त्रीवादी व पेरियार के विचारों की अध्येता वी. गीता ने हाल में 19वीं सदी की समाज-सुधारक सावित्रीबाई फुले की स्मृति में आयोजित एक परिचर्चा में भाग लेते हुए कहा- ‘‘पेरियार के क्रांतिकारी विचारों को दरकिनार कर उन्हें केवल आरक्षण, भौंडे नास्तिकवाद और कटु ब्राह्मण-विरोध के प्रतिपादक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है और जाति, ऊंच-नीच, लिंग व सेक्स आदि से जुड़े प्रश्नों पर उनके विचारों को मानो किसी अलमारी में बंद करके भुला दिया गया है.” श्रम और पूंजी के संघर्ष में पेरियार श्रमिक वर्ग के साथ खड़े होते हैं. वह साफ शब्दों में लिखते हैं कि “यह श्रमिक ही है, जो विश्व में सब कुछ बनाता है. लेकिन, यह श्रमिक ही चिंताओं, कठिनाइयों और दुःखों से गुजरता है.” पेरियार ने एक ऐसे समाज की कल्पना की जिसमें शोषण और अन्याय का नामो-निशान नहीं होगा. उस दुनिया का खाका खींचते हुए वह लिखते हैं, “एक समय ऐसा आएगा, जब धन-संपदा को सिक्कों में नहीं आंका जाएगा. न सरकार की जरूरत रहेगी. किसी भी मनुष्य को जीने के लिए कठोर परिश्रम नहीं करना पड़ेगा. ऐसा कोई काम नहीं होगा, जिसे ओछा माना जाए या जिसके कारण व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाए.” बर्बर माध्यकालीन मूल्यों और विचारों में जी रहे भारत को पेरियार के दर्शन, चिंतन और विचारों की सख्त जरूरत हैं. सिद्धार्थ रामू Siddharth Ramu (कारवां में प्रकाशित) #स्मरण #जन्मदिन #पेरियार #vss

पेरियार का भविष्य की दुनिया का सपना मार्क्स-एंगेल्स के साम्यवाद के सपने से मेल खाता है. अपने लेख ‘भविष्य की दुनिया’ में अपने आदर्श समाज की परिकल्पना प्रस्तुत करते हुए उन्होंने तमिल पुस्तक इनि वारुम उल्लगम में लिखा : नए विश्व में किसी को कुछ भी चुराने या हड़पने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. पवित्र नदियों जैसे कि गंगा के किनारे रहने वाले लोग उसके पानी की चोरी नहीं करेंगे. वे केवल उतना ही पानी लेंगे, जितना उनके लिए आवश्यक है. भविष्य के उपयोग के लिए वे पानी को दूसरों से छिपाकर नहीं रखेंगे. यदि किसी के पास उसकी आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में होंगी, तो वह चोरी के बारे में सोचेगा तक नहीं. इसी प्रकार किसी को झूठ बोलने, धोखा देने या मक्कारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. क्योंकि, उससे उसे कोई प्राप्ति नहीं हो सकेगी. नशीले पेय किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. न कोई किसी की हत्या करने का ख्याल दिल में लाएगा. वक्त बिताने के नाम पर जुआ खेलने, शर्त लगाने जैसे दुर्व्यसन समाप्त हो जाएंगे. उनके कारण किसी को आर्थिक बरबादी नहीं झेलनी पड़ेगी.’’ इसी किताब में वह आगे लिखते हैं, ‘‘पैसे की खातिर अथवा मजबूरी में किसी को वेश्यावृत्ति के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा. स्वाभिमानी समाज में कोई भी दूसरे पर शासन नहीं कर पाएगा. कोई किसी से पक्षपात की उम्मीद नहीं करेगा. ऐसे समाज में जीवन और काम-संबंधों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण उदार एवं मानवीय होगा. वे अपने स्वास्थ्य की देखभाल करेंगे. प्रत्येक व्यक्ति में आत्मसम्मान की भावना होगी. स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और किसी का प्रेम बलात् (जबरन) हासिल करने की कोशिश नहीं की जाएगी. स्त्री-दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी. पुरुष सत्तात्मकता मिटेगी. दोनों में कोई भी एक-दूसरे पर बल-प्रयोग नहीं करेगा. आने वाले समाज में कहीं कोई वेश्यावृत्ति नहीं रहेगी. “ भविष्य के जिस समाज का सपना पेरियार देखते हैं, उसकी भारत में स्थापना की पहली शर्त वह अंबेडकर की तरह जाति के विनाश को मानते थे. उनका मानना था कि वर्ण-जाति की रक्षा के लिए हिंदू-धर्म की स्थापना की गई. वर्ण-जाति की रक्षा के लिए जन्म लेने वाले ईश्वरों को गढ़ा गया है और मनुस्मृति, रामायण, गीता और पुराणों की रचना की गई है. उन्होंने लिखा, “इस जाति-व्यवस्था ने भारतीय समाज को जड़ और बर्बर समाज में तब्दील कर दिया है.” 1959 में उन्होंने लिखा, “हमारे देश में जाति के विनाश का मतलब है- भगवान, धर्म, शास्त्र और ब्राह्मणों (ब्राह्मणवाद) का विनाश. जाति तभी खत्म हो सकती है, जब ये चारों भी खत्म हो जाएं. यदि इसमें से एक भी बना रहता है, तो जाति का विनाश नहीं हो सकता.” लेकिन ब्राह्मणों के खात्मे से उनका सीधा मतलब ब्राह्मणवाद के खात्मे से है. इस संदर्भ में वह लिखते हैं कि, उन्हें “ब्राह्मण-प्रेस द्वारा ब्राह्मण-विरोधी के रूप में चित्रित किया गया है. किन्तु, मैं व्यक्तिगत रूप से किसी भी ब्राह्मण का दुश्मन नहीं हूं. एकमात्र तथ्य यह है कि मैं ब्राहमणवाद का धुर-विरोधी हूं. मैंने कभी नहीं कहा कि ब्राह्मणों को खत्म किया जाना चाहिए.” पेरियार ने गैर-द्विजों और महिलाओं से आह्वान किया कि वे “उस ईश्वर को नष्ट कर दें, जो तुम्हें शूद्र कहता है. उन पुराणों और महाकाव्यों को नष्ट कर दो, जो हिंदू ईश्वर को सशक्त बनाते हैं”. पेरियार धर्म को प्रभुत्व और अन्याय का पोषक मानते हैं. वह सभी धर्मों को खारिज करते हुए विज्ञान और बुद्धिवाद का समर्थन करते. वह धर्माचार्यों और विज्ञान के समर्थक बुद्धिवादियों की तुलना करते हुए लिखते हैं, “धर्माचार्य सोचते हैं कि परंपरा-प्रदत्त ज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है; उसमें कोई भी सुधार संभव नहीं है. अतीत को लेकर जो पूर्वाग्रह और धारणाएं प्रचलित हैं, वे उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए तैयार नहीं होते.” पेरियार ने गैर-द्विजों और महिलाओं से आह्वान किया कि वे “उस ईश्वर को नष्ट कर दें, जो तुम्हें शूद्र कहता है. उन पुराणों और महाकाव्यों को नष्ट कर दो, जो हिंदू ईश्वर को सशक्त बनाते हैं.” उनका मानना था कि “हिंदू-धर्म और जाति-व्यवस्था नौकर और मालिक का सिद्धांत स्थापित करते हैं.” पेरियार ने ऐसा केवल कहा नहीं, बल्कि अपने अनुयायियों के साथ ऐसा किया भी. उन्होंने मनुस्मृति और रामायण को जलाया. रामायण की हकीकत को सामने लाने के लिए उन्होंने रामायण का एक मुकम्मल पाठ ‘रामायण पादीरंगल’ प्रस्तुत किया जो 1959 में अंग्रेजी भाषा में में ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ. इसका हिंदी अनुवाद 1968 में ‘सच्ची रामायण’ के नाम से ललई सिंह यादव ‘पेरियार’ ने प्रकाशित किया; जिसका अनुवाद राम आधार ने किया था.

पेरियार ने वामपंथियों के साथ मिलकर भी काम किया लेकिन उन्होंने देखा कि वामपंथियों द्वारा जाति, पितृसत्ता और धर्म के गठजोड़ की उपेक्षा की जा रही है. वामपंथियों की वर्ग की यांत्रिक यूरोपीय धारणा, इतिहास की एक रेखीय आर्थिक व्याख्या और जाति, पितृसत्ता, धर्म, राष्ट्रवाद और वर्ग के गठजोड़ को समझ पाने में नाकामी के चलते पेरियार को उनसे भी अपना रास्ता अलग करना पड़ा. पेरियार ने भारत के वामपंथियों के बारे में लिखा, “हमारे देश में साम्यवाद की जितनी भी बातें हो रही हैं, वे बकवास हैं... वे जातिवाद की दुष्टता और प्रतिक्रियावादी गांधी के दुष्प्रचार के कुप्रभावों के प्रति चिंतित नहीं लगते. वे उस राजाजी के प्रति चिंतित नहीं हैं जिनकी चिंता सिर्फ यह है कि ब्राह्मण कैसे सुख से जीवित रहेंगे. वे उस कांग्रेस पार्टी के बारे में चिंतित नहीं हैं, जो वर्णाश्रम धर्म को सही ठहराती है.” बाद में पेरियार ने तमिलनाडु में गैर-ब्राह्मणवाद की अगुवा जस्टिस पार्टी के साथ भी मिलकर काम किया. जस्टिस पार्टी की स्थापना सन 1916 में (आधुनिक चेन्नई) में हुई थी. तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन की औपचारिक शुरुआत 1916 में तब हुई, जब जस्टिस पार्टी ने गैर-ब्राह्मण घोषणा-पत्र जारी किया. ब्राह्मणवाद बनाम गैर-ब्राह्मणवाद का संघर्ष ही इस घोषणा-पत्र का मूल स्वर था. मद्रास प्रेसीडेंसी में ब्राह्मणों का वर्चस्व किस कदर था, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1912 में वहां ब्राह्मणों की आबादी सिर्फ 3.2 प्रतिशत थी, जबकि 55 प्रतिशत जिला अधिकारी और 72.2 प्रतिशत जिला जज ब्राह्मण थे. मंदिरों और मठों पर ब्राह्मणों का कब्जा तो था ही जमीन की मिल्कियत भी उन्हीं लोगों के पास थी. इस प्रकार तमिल समाज के जीवन के सभी क्षेत्रों में ब्राह्मणों का वर्चस्व था. इस वर्चस्व को तोड़ने के लिेए ब्राह्मण विरोधी आंदोलन शुरू हुआ. 1915-1916 के आस-पास मंझोली जातियों की ओर से सी.एन. मुलियार, टी. एन. नायर और पी. त्यागराज चेट्टी ने जस्टिस आंदोलन की स्थापना की थी. इन मंझोली जातियों में तमिल वल्लाल, मुदलियाल और चेट्टियार प्रमुख थे. इनके साथ ही इसमें तेलुगु रेड्डी, कम्मा, बलीचा नायडू और मलयाली नायर भी शामिल थे. 1920 में मोंटेग-चेम्सफोर्ड सुधारों के अनुसार मद्रास प्रेसीडेंसी में एक द्विशासन प्रणाली बनायी गई जिसमें प्रेसीडेंसी में चुनाव कराने के प्रावधान किए गए. इस चुनाव में जस्टिस पार्टी ने भाग लिया और एक गैर-ब्राह्मणों के नेतृत्व और प्रभुत्व वाली जस्टिस पार्टी सत्ता में आई. इस पार्टी के नेतृत्व में पहली बार तमिलनाडु में 1921 में सरकारी नौकरियों में गैर ब्राह्मणों के लिए आरक्षण लागू हुआ. लेकिन पेरियार ने देखा कि जस्टिस पार्टी तमिलनाडु में ब्राह्मणों के राजनीतिक वर्चस्व को तोड़कर गैर-ब्राह्मणों के राजनीतिक वर्चस्व को तो कायम करना चाहती है, मगर वर्चस्व और अन्याय के अन्य रूपों के खिलाफ वह चुप रहती है जबकि वह एक ऐसे क्रांतिकारी बदलाव के लिए संघर्ष कर रहे थे जिसमें वर्चस्व और अन्याय के सभी रूपों का खात्मा हो जाए और ऐसी दुनिया का निर्माण हो जहां किसी तरह का अन्याय और शोषण न हो. उन्होंने अपने आंदोलन को आत्मसम्मान-आंदोलन ( सेल्फ रिस्पेक्ट मूवमेंट) नाम दिया. पेरियार ने अपनी पत्रिका ‘कुदी आरसू’ में 20 अक्टूबर 1945 को लिखा कि “देश में बहुत सारे आंदोलन चल रहे हैं... कांग्रेस पार्टी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष कर रही है. जस्टिस पार्टी ब्राह्मणों के राजनीतिक वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष कर रही है. आदि द्रविड़ पार्टी उच्च जातीय हिंदुओं के वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष कर रही है और वर्कर्स पार्टी पूंजीपतियों के वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष कर रही है. इस तरह हर एक पार्टी का उद्देश्य वर्चस्व के किसी एक रूप का खात्मा करना है. लेकिन, यदि कोई पार्टी वर्चस्व के सभी रूपों के खिलाफ एक साथ संघर्षरत है, तो वह आत्मसम्मान-आंदोलन है.” पेरियार भारत में चल रहे स्वराज आंदोलन के उद्देश्य के संदर्भ में प्रश्न करते हैं : हम जोर-शोर से स्वराज की बात कर रहे हैं. क्या स्वराज आप तमिलों के लिए है या उत्तर भारतीयों के लिए है? क्या यह आपके लिए है या पूंजीवादियों के लिए है? क्या स्वराज आपके लिए है या कालाबाजारियों के लिए है? क्या यह मजदूरों के लिए है या उनका खून चूसने वालों के लिए है? अपने आत्मसम्मान-आंदोलन के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए पेरियार लिखते हैं, “आत्मसम्मान आंदोलन का मकसद उन ताकतों का पता लगाना है, जो हमारी प्रगति में बाधक बनी हुई हैं. यह उन ताकतों का मुकाबला करेगा, जो समाजवाद के खिलाफ काम करती हैं. यह समस्त धार्मिक प्रतिक्रियावादी ताकतों का विरोध करेगा.”

आज पेरियार का जन्मदिन है ~ ईवीआर पेरियार : भारतीय आधुनिकता के प्रस्तावक ------------------------------------------------------- ईवीआर पेरियार का जन्म 17 सितंबर 1879 में हुआ था. उन्होंने उत्तर भारत के द्विजों की आर्य श्रेष्ठता, मर्दवादी दंभ, राष्ट्रवाद और शोषण-अन्याय के सभी रूपों को दी। भारतीय समाज और व्यक्ति का मुकम्मल आधुनिकीकरण जिन चिंतकों के विचारों के आधार पर होना है, उनमें ई.वी. रामासामी पेरियार अग्रणी हैं. पेरियार ने उन सभी बिंदुओं को चिह्नित और रेखांकित किया है जिनका खात्मा भारतीय समाज के आधुनिकीकरण की अनिवार्य शर्त है. ई.वी. रामासामी नायकर ‘पेरियार’ भारत की प्रगतिशील श्रमण बहुजन-परंपरा के ऐसे लेखक हैं जिन्होंने उत्तर भारत के द्विजों की आर्य श्रेष्ठता और मर्दवादी दंभ, राष्ट्रवाद, ब्राह्मणवाद, वर्ण-जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और शोषण-अन्याय के सभी रूपों को चुनौती दी. वर्चस्व, अन्याय, असमानता और दासता का कोई रूप उन्हें स्वीकार नहीं था. उनकी आवेगात्मक अभिव्यक्ति पढ़ने वालों को हिला देती है. तर्क-पद्धति, तेवर और अभिव्यक्ति की शैली के चलते उन्हें यूनेस्को ने 1970 में “दक्षिणी एशिया का सुकरात” कहा था. पेरियार 1920 से 1925 तक कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़े रहे. वह औपचारिक तौर पर 1920 में कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए और 1920 और 1924 में वह तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और 1921 और 1922 में उसके सचिव रहे. इस दौरान उन्होंने गांधी के सशक्त सहयोगी के रूप में काम किया लेकिन कांग्रेस और गांधी के साथ काम करते हुए बहुत जल्दी उन्हें अहसास हो गया कि यह पार्टी और गांधी उत्तर भारतीय आर्य-द्विज मर्दों के वर्चस्व को कायम रखने का उपकरण हैं. उन्होंने कांग्रेसी पार्टी के भीतर काम करने के अपने अनुभवों के बारे में लिखा : "जब मैं तमिलनाडु कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष था, तो मैंने 1925 के सम्मेलन में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया था. उस प्रस्ताव में मैंने जातिविहीन समाज के निर्माण का प्रस्ताव किया था. मेरे मित्र चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) ने इसे अस्वीकृत कर दिया था. मैंने यह भी अनुरोध किया था कि कांग्रेस के विभिन्न पक्षों और क्षेत्रों में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व (वंचित एवं अल्पसंख्यक तबकों के लिए आरक्षण) का पालन किया जाना चाहिए. लेकिन यह प्रस्ताव भी विषय समिति में थिरु वि. का. (एक सम्मानित तमिल विद्वान कल्यानासुन्दरानर) के द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया. तब मुझे अपने प्रस्ताव के समर्थन में 30 प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर प्राप्त करने के लिए कहा गया था. श्री एस. रामानाथन ने 50 प्रतिनिधियों से हस्ताक्षर प्राप्त कर लिए. तब सर्वश्री सी. राजगोपालाचारी, श्रीनिवास आयंगर, सत्यमूर्ति और अन्य लोगों ने अपना प्रतिरोध दर्ज कराया. उन्हें डर था कि अगर मेरा प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया, तो कांग्रेस खत्म हो जाएगी." "बाद में यह प्रस्ताव थिरु वि. का. और डॉ. पी. वरदाराजुलू के द्वारा रोक दिया गया. ब्राह्मण बहुत खुश हुए. इतना ही नहीं, उन्होंने मुझे सम्मेलन में बोलने की इजाजत भी नहीं दी. पेरियार ने बाद में कांग्रेस के बारे में लिखा, “कांग्रेस पार्टी से अकेले ब्राह्मण और धनी लोग ही लाभ उठा रहे हैं. यह आम आदमी, गरीब आदमी और श्रमिक वर्गों के लिए अच्छा काम नहीं करेगी. यह बात मैं काफी लम्बे समय से कह रहा था.” कांग्रेस के अध्यक्ष या सचिव के रूप में तमिलनाडु में ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों के वर्चस्व को तोड़ने की हर कोशिश को कांग्रेस पार्टी पर अपना वर्चस्व कायम रखने वाले द्विज मर्दों ने नाकाम कर दिया. इतना ही नहीं, गांधी ने स्पष्ट शब्दों में तमिलनाडु में सार्वजनिक तौर पर वर्ण-व्यवस्था की महानता और ब्राह्मणों की श्रेष्ठता की घोषणा की. भीखू पारेख ने अपनी किताब कोलेनिज्म, ट्रेडिशन एंड रिफॉर्म : एनालिसिस ऑफ गांधी पोलिटिकल डिस्कोर्स में गांधी को उद्धृत करते हुए बताया है कि गांधी ने कहा था, “वर्णाश्रण धर्म अभिशाप नहीं है; बल्कि यह उन बुनियादों में से एक है, जिन पर हिंदू धर्म टिका हुआ है और यह (वर्णाश्रम धर्म) बताता है कि धरती पर जन्म लेने का इंसान का उद्देश्य क्या है? गांधी आगे कहते हैं, “ब्राह्मण हिंदू-धर्म और मानवता के सबसे खूबसूरत फूल हैं.’ वह आगे अपनी बात पर जोर देते हुए कहते हैं, “मुझे इनके (ब्राह्मणों) लिए कुछ करने की जरूरत नहीं है. ये अपनी हिफाजत खुद ही अच्छी तरह कर सकते हैं. ये पहले भी बहुत सारे तूफानों का सामना कर चुके हैं. मुझे गैर-ब्राह्मणों से सिर्फ इतना कहना है कि वे इन फूलों ( ब्राह्मणों) को उनकी खुशबू और चमक के साथ रौंद देने की कोशिश कर रहे हैं.”

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