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I.A.S.(हिंदी माध्यम)

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इमरजेंसी बेसिक इनकम एक निर्धारित समय तक देश के प्रत्येक नागरिक को दिया जाने वाला बिना शर्त नकद हस्तांतरण है। इसके लिये व्यक्ति के सामाजिक या आर्थिक स्थिति पर विचार नहीं किया जाता है। जब सरकार को इस बात का आभास हो जाता है कि देश में वस्तुओं एवं सेवाओं की पर्याप्त माँग की जा रही है और लोगों को रोज़गार भी प्राप्त हो चुका है, तब सरकार हालात सामान्य होने के बाद इमरजेंसी बेसिक इनकम देना बंद कर देती है। वर्तमान में वैश्विक महामारी COVID-19 के कारण विश्व के कई देशों में इमरजेंसी बेसिक इनकम की अवधारणा को अपनाया गया है। भारत में बेसिक इनकम की अवधारणा आवश्यक क्यों? विदित है कि मध्य प्रदेश में ऐसी एक योजना को शुरू किया गया था जिसमें पायलट प्रोजेक्ट के तहत मध्य प्रदेश के आठ गाँवों में छह हजार से ज़्यादा लोगों को मासिक भुगतान किया गया। इसका परिणाम सकारात्मक रहा। अधिकांश ग्रामीणों ने उस पैसे का उपयोग घरेलू सुविधा बढ़ाने (शौचालय, दीवार, छत) में किया, ताकि मलेरिया के खिलाफ सावधानी बरती जा सके। अनुसूचित जाति और जनजाति के परिवारों में यह देखा गया कि बेहतर वित्तीय स्थिति में वे राशन की दुकानों की बजाए बाज़ार जाने लगे, उन्होंने अपने पोषण में सुधार किया और स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति और प्रदर्शन दोनों की स्थिति बेहतर हुई। अतः हम कह सकते हैं कि बेसिक इनकम का यह विचार एक उत्तम पहल है। वैश्विक महामारी के दौरान बेसिक इनकम को पायलट प्रोजेक्ट के ज़रिये बढ़ाना और धीरे-धीरे सावधानीपूर्वक इसे अमल में लाना भारत में आदर्श प्रतीत हो रहा है क्योंकि इसके माध्यम से गाँवों में लोगों के रहन-सहन के स्तर को सुधारा जा सकता है, उन्हें पेयजल उपलब्ध कराया जा सकता है और बच्चों के पोषण में सुधार भी लाया जा सकता है। एक नियमित बेसिक इनकम से भूख और बीमारी से विवेकपूर्ण ढंग से निपटने में मदद मिल सकती है। बेसिक इनकम, बाल श्रम को कम करने में भी मददगार साबित हो सकती है। इसके ज़रिये उत्पादक कार्यों में वृद्धि करके गाँवों की तस्वीर बदली जा सकती है और यह सतत् विकास की दिशा में एक उल्लेखनीय प्रयास होगा। विदित है कि बेसिक इनकम की मदद से सामाजिक विषमता को भी कम किया जा सकता है। यदि एक वाक्य में कहें तो बेसिक इनकम का यह विचार आय असमानता और इसके दुष्प्रभावों से भारत को मुक्त कर सकता। यूनिवर्सल बेसिक इनकम से लाभ वर्तमान में सरकार विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं के माध्यम से लोगों के कल्याण को सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है लेकिन अब सरकार उन्हें नकद पैसा देकर इस प्रवृत्ति को बदलना चाहती है ताकि लोग अपनी आवश्यकता के अनुसार सेवाओं को प्राप्त कर सकें। वर्तमान में चल रहे आर्थिक संकट के दौर में यह स्कीम देश के लोगों के हाथों में अतिरिक्त क्रय शक्ति देगी जिससे देश में उत्पादनकारी गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। इस योजना को लागू करना आसान है क्योंकि इसमें लाभार्थियों को चिन्हित नहीं करना पड़ेगा। यह योजना सरकारी धन के अपव्यय और भ्रष्टाचार को कम करेगी क्योंकि इसका कार्यान्वयन बहुत सरल है और पैसा सीधे लाभार्थियों के खाते में भेजा जायेगा। चुनौतियाँ दुनिया में उच्च असमानता की स्थिति, ऑटोमेशन और वैश्विक महामारी से उत्पन्न आर्थिक संकट के कारण रोज़गार के नुकसान की संभावना ने कई उन्नतशील अर्थव्यवस्थाओं को यूनिवर्सल बेसिक इनकम की अवधारणा पर विचार करने को प्रेरित किया है, ताकि उनके नागरिकों को न्यूनतम स्तर की आय समर्थन की गारंटी दी जा सके। कई विशेषज्ञों का मानना है कि सबके लिये बेसिक इनकम का बोझ कोई बहुत विकसित अर्थव्यवस्था ही उठा सकती है जहाँ सरकार का खर्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 40 फीसदी से भी ज़्यादा हो और टैक्स से होने वाली कमाई का आँकड़ा भी इसके आसपास ही हो। यदि हम भारत की बात करें तो टैक्स और GDP का यह अनुपात 17 फीसदी से भी कम बैठता है। हम तो बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं और आधारभूत ढाँचे के अलावा सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, मुद्रा और बाहरी संबंधों से जुड़ी संप्रभु प्रक्रियाओं का बोझ ही बहुत मुश्किल से उठा पा रहे हैं। बेसिक इनकम की राह में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ‘बेसिक आय’ का स्तर क्या हो, यानी वह कौन-सी राशि होगी जो व्यक्ति की अपनी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा कर सके? इस बात की प्रबल संभावना है कि लोगों को दी गई निःशुल्क रकम उन्हें आलसी बना सकती है और वे काम ना करने के लिये प्रेरित हो सकते हैं। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि लोगों को दी गई निःशुल्क रकम उत्पादक गतिविधियों, स्वास्थ्य और शिक्षा आदि पर खर्च की जाएगी। यह तंबाकू, शराब, ड्रग्स और अन्य लक्जरी वस्तुओं आदि पर भी खर्च की जा सकती है अगर ऐसा हुआ तो इस योजना का उद्देश्य ही विफल हो जायेगा। लोगों को निःशुल्क रकम देने से अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि होगी क्योंकि देश में उपभोक्तावादी गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।

यूनिवर्सल बेसिक इनकम के पक्ष में तर्क अगर भारत की बात करें तो यहाँ आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करता है और गरीबों को सब्सिडी एवं सहायता प्रदान करने वाली कई सरकारी योजनाएँ विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त हैं। वर्तमान में केंद्र सरकार की कुल 950 योजनाएँ चल रही हैं। इन योजनाओं को चलाने के लिये GDP का करीब 5 प्रतिशत खर्च होता है। ये योजनाएँ गरीबों को लाभ पहुँचा रही हैं या नहीं, यह चर्चा का विषय है। आर्थिक सर्वेक्षण में भी इस बात को स्वीकार किया गया है कि इन सभी योजनाओं को यदि बंद कर दिया जाए तथा इनमें खर्च होने वाले पैसे को UBI की ओर ले जाया जाए तो गरीबों तक प्रत्यक्ष रूप से पैसा पहुँचेगा और उनकी स्थिति में सुधार होगा। सिस्टम में अनेक खामियों के चलते जिन लोगों को वास्तव में सरकारी सहायता की आवश्यकता होती है, उन्हें छोड़ दिया जाता है। इसलिये यह तर्क दिया जाता है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम सभी नागरिकों को बेसिक आय प्रदान कर इन समस्याओं को दूर कर सकती है। निष्कर्ष इसमें कोई दो राय नहीं है कि बेसिक इनकम का विचार भारत की जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य नागरिक सुविधाओं में सुधार के साथ उनके जीवन-स्तर को ऊपर उठाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास होगा लेकिन सबके लिये एक बेसिक इनकम तब तक संभव नहीं है जब तक कि वर्तमान में सभी योजनाओं के माध्यम से दी जा रही सब्सिडी को खत्म न कर दिया जाए। अतः सभी भारतवासियों के लिये एक बेसिक इनकम की व्यवस्था करने की बजाय सामाजिक-आर्थिक जनगणना की मदद से समाज के सर्वाधिक वंचित तबके के लिये एक निश्चित आय की व्यवस्था करना कहीं ज़्यादा प्रभावी और व्यावहारिक होगा।

कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने हेतु जारी लॉकडाउन के कारण देश के भीतर सभी प्रकार की आर्थिक गतिविधियाँ ठप्प हैं। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था पर आर्थिक मंदी का खतरा मंडरा रहा है। देश में व्यापक पैमाने पर रोज़गार समाप्त हो गए हैं, इस संकट की घड़ी में स्वास्थ्य के साथ ही लोगों की आजीविका भी खतरे में है। इस समय छोटे व्यवसाय या कंपनियों ने ही नहीं बल्कि कई बड़ी बहु-राष्ट्रीय कंपनियों ने भी अपने कर्मचारियों के वेतन में कटौती कर दी है या फिर बड़े पैमाने पर छंटनी कर रह हैं। इस प्रकार की विषम परिस्थिति में सरकार के समक्ष स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए आर्थिक गतिविधियों को बनाए रखने की चुनौती है। ऐसे में कई अर्थशास्त्रियों ने लोगों के आर्थिक संव्यवहार को प्रोत्साहित करने के लिये सरकार को यूनिवर्सल बेसिक इनकम की योजना पर विचार करने का सुझाव दिया है। वर्तमान में वैश्विक महामारी COVID-19 के कारण विश्व के कई देशों में इमरजेंसी बेसिक इनकम (Emergency Basic Income) तथा यूनिवर्सल बेसिक इनकम (Universal Basic Income) को शुरू किया गया है। जापान ने प्रत्येक व्यक्ति को एक लाख येन देने का निर्णय किया है तो वहीं कनाडा ने प्रत्येक व्यक्ति को 2500 डॉलर प्रति माह देने का निर्णय किया है। इस आलेख में यूनिवर्सल बेसिक इनकम, उसके लाभ, विशेषताएँ, उससे जुड़ी चिंताओं पर चर्चा करने के साथ ही यूनिवर्सल बेसिक इनकम और आपातकालीन बेसिक इनकम के बीच अंतर को समझने का भी प्रयास किया जाएगा। पृष्ठभूमि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन यापन के लिये न्यूनतम आय की गारंटी मिलनी चाहिये, यह कोई नया विचार नहीं है। ‘थॉमस मूर’ नाम के एक अमेरिकी क्रांतिकारी दार्शनिक ने हर किसी के लिये एक समान आय की मांग की थी। वह चाहते थे कि एक ऐसा ‘राष्ट्रीय कोष' हो जिसके माध्यम से हर वयस्क को एक निश्चित राशि का भुगतान किया जाए। ‘बर्ट्रेंड रसेल’ ने 'सोशल क्रेडिट' आंदोलन चलाया जिसमें सबके लिये एक निश्चित आय की बात की गई थी। भारत में यह अवधारणा चर्चा में इसलिये रही क्योंकि वर्ष 2016-17 के भारत के आर्थिक सर्वेक्षण में UBI को एक अध्याय के रूप में शामिल कर इसके विविध पक्षों पर चर्चा की गई है। गौरतलब है कि आर्थिक सर्वेक्षण में UBI योजना को गरीबी कम करने के लिये एक संभावित विकल्प बताया गया था। यूनिवर्सल बेसिक इनकम यूनिवर्सल बेसिक इनकम देश के प्रत्येक नागरिक को दिया जाने वाला एक आवधिक (Periodic), बिना शर्त नकद हस्तांतरण है। इसके लिये व्यक्ति के सामाजिक या आर्थिक स्थिति पर विचार नहीं किया जाता है। यूनिवर्सल बेसिक इनकम अवधारणा की दो मुख्य विशेषताएँ हैं- UBI अपनी प्रकृति में सार्वभौमिक (Universal) है, अर्थात् यह लक्षित (Targeted) नहीं है। यह बिना शर्त नकद ट्रांसफर है। अर्थात् किसी भी व्यक्ति को UBI हेतु पात्र होने के लिये बेरोज़गारी की स्थिति या सामाजिक-आर्थिक पहचान को साबित करने की आवश्यकता नहीं है। UBI एक न्यूनतम आधारभूत आय की गारंटी है जो प्रत्येक नागरिक को बिना किसी न्यूनतम अर्हता के आजीविका के लिये हर माह सरकार द्वारा दी जाएगी। इसके लिये व्यक्ति को केवल भारत का नागरिक होना ज़रूरी होगा। क्या है इमरजेंसी बेसिक इनकम?

चीन ने दक्षिण कोरिया में अमेरिका की ‘थाड’ (Thaad) मिसाइल रक्षा प्रणाली की मौजूदगी को लेकर पुनः आपत्ति दर्ज कराई है। प्रमुख बिंदु: उल्लेखनीय है कि दक्षिण कोरिया में स्थित अमेरिकी बेस में इस मिसाइल रक्षा प्रणाली के नए संस्करण की तैनाती किये जाने की सूचना के बाद चीन ने यह आपत्ति दर्ज दर्ज कराई है। चीन का पक्ष: चीन ने एक बयान जारी कर अमेरिका से आग्रह किया है कि वह चीन और दक्षिण कोरिया के बीच द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान न पहुँचाए। दक्षिण कोरिया का पक्ष: दक्षिण कोरिया ने भी एक बयान जारी कर कहा है कि मिसाइलों की संख्या में वृद्धि नहीं की गई है। केवल उन्हें नए संस्करणों के साथ प्रतिस्थापित किया गया है। पृष्ठभूमि: ध्यातव्य है कि दक्षिण कोरिया में तैनात अमेरिकी सेना द्वारा ‘थाड मिसाइल रक्षा प्रणाली’ को संचालित किया जाता है। उत्तर कोरिया द्वारा बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण के मद्देनज़र अमेरिका ने संभावित हमलों के खिलाफ एक जवाबी कार्रवाई के लिये दक्षिण कोरिया में ‘थाड मिसाइल रक्षा प्रणाली’ की तैनाती की थी। वर्ष 2017 में उत्तर कोरिया द्वारा जापान में स्थित अमेरिकी ठिकानों की दिशा में कुछ मिसाइलों का परीक्षण किये जाने के पश्चात् कोरियाई प्रायद्वीप में इस घटनाक्रम को लेकर चर्चा बढ़ गई थी। इस घटना के बाद अमेरिका ने अपनी योजनाओं में संशोधन कर दक्षिण कोरिया के ओसान में अपने सेना बेस को स्थानांतरित कर दिया था। तब से चीन अमेरिका की इस तरह की गतिविधियों को लेकर अपनी चिंता व्यक्त कर रहा है। चीन द्वारा थाड के विरोध के कारण: द वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, ‘थाड मिसाइल रक्षा प्रणाली’ में उन्नत रडार सिस्टम है जो चीन की सैन्य गतिविधियों पर नज़र रखने में सक्षम है। अमेरिका ‘जापान और दक्षिण कोरिया’ में अपने कई सैन्य ठिकानों के माध्यम से पूर्वी एशिया क्षेत्र में मौजूद है जिसको लेकर चीन चिंतित है। पूर्वी एशिया के कुछ पर्यवेक्षकों के अनुसार, चीन का मानना है कि अमेरिका ‘दक्षिण कोरिया और जापान’ पर अपना प्रभाव कायम कर रहा है और पूर्वी एशिया में चीन के दीर्घकालिक सैन्य, राजनयिक और आर्थिक हितों पर हस्तक्षेप कर सकता है। पूर्व में थाड को लेकर चीन की प्रतिक्रिया: वर्ष 2017 में चीन ने ‘थाड’ के मद्देनज़र दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया था। दक्षिण कोरियाई व्यवसायों और एलजी, लोटे और सैमसंग जैसी बड़ी कंपनियों के विविध कार्यों में चीन द्वारा बाधा उत्पन्न की गई थी। कई चीनी पर्यटक कोरियाई मनोरंजन के प्रशंसक हैं और दक्षिण कोरिया की यात्रा करते हैं। इस घटनाक्रम के मद्देनज़र दक्षिण कोरिया के पर्यटन क्षेत्र में भारी गिरावट आई थी। दक्षिण कोरियाई सौंदर्य उत्पाद की मांग चीन में अत्यधिक है। सोशल मीडिया पर दक्षिण कोरियाई उत्पादों के बहिष्कार के आह्वान के कारण उनकी बिक्री पर भी असर देखा गया था। थाड (THAAD) थाड का पूरा नाम ‘टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस’ (Terminal High Altitude Area Defence) है, जिसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ मिसाइल रक्षा प्रणालियों में गिना जाता है। थाड अंतरिक्ष-आधारित और जमीन-आधारित निगरानी स्टेशन से जुड़ा होता है। यह स्टेशन अपनी तरफ आने वाली मिसाइलों के बारे में ‘थाड इंटरसेप्टर मिसाइल’ (Thaad Interceptor Missile) को डेटा ट्रांसफर कर खतरे के प्रकार के बारे में सूचित करता है। यह 200 किलोमीटर दूर तक और 150 किलोमीटर की ऊँचाई तक मार करने में सक्षम है। इसकी टेक्नोलॉजी ‘हिट टू किल’ है अर्थात् सामने से आ रहे हथियार को रोकती नहीं बल्कि नष्ट कर देती है।

यूरोपीय संघ (European Union) ने कोरोना वायरस (COVID-19) के संकट से प्रभावित अर्थव्यवस्थाओं को संचालित करने के लिये 750 बिलियन यूरो (Euro) की योजना का अनावरण किया है। प्रमुख बिंदु इस प्रस्ताव के तहत यूरोपीय आयोग (European Commission) बाज़ार से धनराशि उधार लेगा और फिर कोरोना वायरस जनित लॉकडाउन के कारण उत्पन्न हुई अभूतपूर्व मंदी को खत्म करने के लिये दो-तिहाई हिस्सा अनुदान (Grants) और शेष ऋण के रूप में वितरित करेगा। उल्लेखनीय है कि यूरोपीय संघ (European Union-EU) के सभी देश कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के कारण सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं और इस प्रस्ताव का अधिकांश हिस्सा इटली और स्पेन को दिया जाएगा। विदित है कि यूरोपीय संघ का यह प्रस्ताव संघ के वर्ष 2021-27 के दीर्घकालिक बजट से अलग है। यूरोपीय संघ (EU) के इस प्रस्ताव को सभी सदस्य देशों और यूरोपीय संसद द्वारा स्वीकृति प्रदान कर दी गई है। प्रभाव यूरोपीय संघ (EU) द्वारा कोरोना वायरस (COVID-19) से प्रभावित अर्थव्यवस्थाओं को पुनः पटरी पर लाने के लिये जो ऋण लिया जा रहा है उसे यूरोपीय संघ द्वारा अंततः चुकाना पड़ेगा, जिसका अर्थ है कि यूरोपीय संघ के सदस्य देशों को अपने राष्ट्रीय योगदान में बढ़ोतरी करनी होगी। महत्त्व यूरोपीय संघ (European Union) के विभिन्न देशों जैसे- इटली, स्पेन, ग्रीस, फ्राँस और पुर्तगाल की अर्थव्यवस्था के लिये काफी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इन देशों की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पर्यटन पर बहुत अधिक निर्भर है और महामारी के कारण पूरी तरह से रुक गई है। EU के नेतृत्त्वकर्त्ताओं का मानना है कि यदि वे मौजूदा समय में लगातार गिरती हुई अर्थव्यवस्था को संभालने में विफल रहते हैं तो अर्थव्यवस्था की स्थिति और भी खराब हो सकती है। ऐसे में यूरोपीय संघ (EU) का यह प्रस्ताव न केवल सदस्य देशों की अर्थव्यवस्था को सुधारने में मदद करेगा, बल्कि उन्हें भविष्य की चुनौतियों से निपटने की क्षमता भी प्रदान करेगा। यूरोपीय संघ (European Union) यूरोपीय संघ (European Union- EU) कुल 27 देशों की एक आर्थिक और राजनीतिक सहभागिता है। ये 27 देश संधि के द्वारा एक संघ के रूप में जुड़े हुए हैं, जिससे कि व्यापार को आसान बनाया जा सके और विभिन्न देशों के मध्य विवाद उत्पन्न न हो। सैद्धांतिक रूप से जो देश आपस में जितना अधिक व्यापार करते हैं, उनके मध्य तनाव और युद्ध की संभावना उतनी ही कम हो जाती है। गौरतलब है कि यूरोपीय संघ के कुल 19 देश यूरो को अपनी आधिकारिक मुद्रा के रूप में प्रयोग करते हैं, जबकि शेष देशों की अपनी अलग मुद्रा है। यूनाइटेड किंगडम (UK) 31 जनवरी, 2020 को यूरोपीय संघ (EU) से अलग होने वाला अंतिम देश था, जिसके बाद सदस्यों की संख्या 27 रह गई। यूरोपीय संघ ने कानूनों की मानकीकृत प्रणाली के माध्यम से एक आंतरिक एकल बाज़ार विकसित किया है, जो कि सदस्य देशों के उन सभी मामलों पर लागू होती हैं, जिन सदस्य देशों ने सहमति व्यक्त की है। एकल बाज़ार सिद्धांत (Single Market Principle) अर्थात् किसी भी तरह का सामान और व्यक्ति बिना किसी टैक्स या बिना किसी रुकावट के कहीं भी आ-जा सकते हैं एवं लोग बिना रोक टोक के नौकरी, व्यवसाय तथा स्थायी तौर पर निवास कर सकते हैं। फ्री मूवमेंट ऑफ पीपल एंड गुड्स (Free Movement of People and Goods) यूरोपीय संघ की खासियत है। यूरोपीय आयोग (European Commission) यह यूरोपीय संघ (EU) का एक कार्यकारी निकाय है, जो कानून का प्रस्ताव करने, निर्णयों को लागू करने, यूरोपीय संघ की संधियों को बरकरार रखने और यूरोपीय संघ के दिन-प्रतिदिन के कार्यों के प्रबंधन हेतु उत्तरदायी है।

भारत का पक्ष वर्ष 2019 में आयोजित 45वें G-7 शिखर सम्मेलन में फ्रांँस के राष्ट्रपति ने लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को बढ़ावा देने और महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले चार भागीदार देशों (ऑस्ट्रेलिया, चिली, भारत और दक्षिण अफ्रीका); पाँच अफ्रीकी भागीदारों [बुर्किना फासो, सेनेगल, रवांडा एवं दक्षिण अफ्रीका और अफ्रीकी संघ आयोग (AUC) के अध्यक्ष] तथा नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को इस सम्मेलन में आमंत्रित किया था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शासनकाल के दौरान भी भारत ने पाँच बार G-7 (तत्कालीन G-8 समूह) में भाग लिया था। उल्लेखनीय है कि भारत लंबे समय से वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने के लिये वैश्विक संस्थानों और समूहों में सुधार करने का आह्वान करता रहा है। भारत सदैव ही United Nations-(UN) जैसी संस्थाओं में सुधार का पक्षधर रहा है। ऐसे में यदि भारत G-7 समूह का हिस्सा बनता है तो उसे वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान प्राप्त करने में मदद मिलेगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने G-7 को एक ‘पुराना समूह’ बताते हुए इसमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और रूस को भी शामिल करने की बात कही है। प्रमुख बिंदु डोनाल्ड ट्रंप ने G-7 के 46वें शिखर सम्मेलन को स्थगित करते हुए कहा कि यह अपने वर्तमान प्रारूप में विश्व की विभिन्न घटनाओं का सही ढंग से प्रतिनिधित्त्व नहीं करता है।उल्लेखनीय है कि 46वें शिखर सम्मेलन का आयोजन अमेरिका के कैंप डेविड (Camp David) में 10-12 जून के मध्य किया जाना था। बीते वर्ष 45वाँ G-7 शिखर सम्मेलन 24-26 अगस्त को फ्रांँस के बिआरित्ज़ (Biarritz) में आयोजित किया गया था, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक विशेष अतिथि के रूप में भाग लिया था। डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, इस समूह को G-10 अथवा G-11 कहा जा सकता है। G-7 समूह का अर्थ G-7 अर्थात ‘ग्रुप ऑफ सेवन’ (Group of Seven) फ्राँस, जर्मनी, इटली, यूनाइटेड किंगडम, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा जैसे देशों का एक समूह है। यह एक अंतर सरकारी संगठन है जिसे वर्ष 1975 में उस समय की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं द्वारा विश्व के विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करने के लिये एक अनौपचारिक मंच के रूप में गठित किया गया था।कनाडा वर्ष 1976 में और यूरोपीय संघ (European Union) वर्ष 1977 में इस समूह में शामिल हुआ। आर्थिक मुद्दों पर चर्चा करने के लिये अमेरिका तथा उसके सहयोगियों द्वारा एक प्रयास के रूप में गठित G-7 समूह दशकों से वैश्विक समाज के समक्ष मौजूदा विभिन्न चुनौतियों जैसे- वित्तीय संकट, आतंकवाद, हथियारों पर नियंत्रण और मादक पदार्थों की तस्करी आदि पर विमर्श कर रहा है। वर्ष 1997 में रूस के इस समूह में शामिल होने के बाद कई वर्षों तक G-7 को 'G- 8' के रूप में जाना जाता था, हालाँकि वर्ष 2014 में रूस को क्रीमिया विवाद के बाद समूह से निष्कासित कर दिये जाने के पश्चात् समूह को एक बार पुनः G-7 कहा जाने लगा। G-7 देशों के राष्ट्राध्यक्ष वार्षिक शिखर सम्मेलन में मिलते हैं जिसकी अध्यक्षता सदस्य देशों के नेताओं द्वारा एक ‘रोटेशनल बेसिस’ (Rotational Basis) पर की जाती है। उल्लेखनीय है कि G-7 का कोई भी औपचारिक संविधान या एक निर्धारित मुख्यालय नहीं है। इसलिये वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान समूह द्वारा लिये गए निर्णय गैर-बाध्यकारी होते हैं। वर्ष 2016 में राष्ट्रपति के तौर पर अपने चुनाव के बाद से ही डोनाल्ड ट्रंप विभिन्न अवसरों पर रूस के वैश्विक रणनीतिक महत्त्व को देखते हुए उसे पुनः समूह में शामिल करने की बात पर ज़ोर दे चुके हैं। G-7 और G-20 में अंतर G-20 समूह देशों का एक बड़ा समूह है, जिसमें G-7 समूह के सदस्य भी शामिल हैं। G-20 समूह का गठन वर्ष 1999 में वैश्विक आर्थिक चिंताओं से निपटने हेतु और अधिक देशों को एक साथ एक मंच पर लाने के उद्देश्य से से किया गया था। समग्र रूप से G-20 समूह वैश्विक अर्थव्यवस्था के तकरीबन 80 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्त्व करता है। G-7 के विपरीत, जो वैश्विक समुदाय से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करता है, G-20 में केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाज़ारों से संबंधित मुद्दों पर विचार-विमर्श किया जाता है। भारत वर्ष 2022 में G-20 शिखर सम्मेलन की मेज़बानी करेगा। G-7 के विस्तार के निहितार्थ G-7, जिसमें विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ पहले से ही शामिल हैं, में चार अन्य देशों को शामिल करने के कदम को चीन के लिये एक संकेत के रूप में देखा जा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति का यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और चीन के संबंधों में विभिन्न मुद्दों पर तनाव बना हुआ है, जिसमें हॉन्गकॉन्ग की स्वायत्तता, ताइवान, COVID-19 की उत्पत्ति, दक्षिण चीन सागर में तनाव और व्यापार जैसे विभिन्न पहलू शामिल हैं। विभिन्न विशेषज्ञ अमेरिका के इस निर्णय को आगामी भविष्य में चीन की नीतियों से निपटने के लिये सभी पारंपरिक सहयोगियों को एक साथ लाने की योजना के रूप में देख रहे हैं। आलोचकों का सदैव यह मत रहा है कि G-7 समूह की सदस्यता से भारत और ब्राज़ील जैसी महत्त्वपूर्ण उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को वंचित रखना इसकी एक बड़ी कमी है। G-20 (जो भारत, चीन, ब्राज़ील जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है) के उभार ने G-7 जैसे पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले समूह को चुनौती दी है। इस चुनौती से निपटना भी समूह के विस्तार का एक प्रमुख कारण हो सकता है।विदित हो कि बीते कुछ दशकों में भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे देशों के आर्थिक उदय ने वैश्विक स्तर पर G-7 की प्रासंगिकता को कम कर दिया है और वैश्विक GDP में G-7 समूह की हिस्सेदारी लगातार कम होती जा रही है। ऐसे में समूह के अस्तित्त्व पर खतरा उत्पन्न हो गया है।

भारत का राष्ट्रीय AI पोर्टल National AI Portal of India केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रसारण मंत्रालय (Union Ministry for Electronics and IT) ने www.ai.gov.in नामक भारत का राष्ट्रीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पोर्टल लॉन्च किया। प्रमुख बिंदु: यह पोर्टल ‘केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रसारण मंत्रालय’ और ‘आईटी उद्योग’ द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रसारण मंत्रालय के राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस डिवीज़न और आईटी उद्योग निकाय ‘नैसकॉम’ (NASSCOM) मिलकर इस पोर्टल को चलायेंगे। नैसकॉम (National Association of Software and Services Companies -NASSCOM) भारत के सूचना प्रौद्योगिकी तथा बीपीओ का एक व्यापारिक संघ है। इसकी स्थापना वर्ष 1988 में हुई थी। यह एक लाभ-निरपेक्ष (non-profit) संस्था है। यह पोर्टल भारत में AI से संबंधित संसाधनों के साझाकरण करने हेतु भारत में AI से संबंधित विकास के लिये एक ‘स्टॉप डिजिटल प्लेटफॉर्म’ के रूप में काम करेगा। यह पोर्टल दस्तावेज़ों, केस स्टडी, शोध रिपोर्टों आदि को भी साझा करेगा। इस अवसर पर इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ने युवाओं के लिये एक राष्ट्रीय कार्यक्रम ‘युवाओं के लिये ज़िम्मेदार AI’ भी लॉन्च किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य देश के युवा छात्रों को एक मंच प्रदान करना है और उन्हें नए युग के तकनीकी दिमाग, प्रासंगिक AI कौशल विकास एवं आवश्यक AI टूल-सेट तक पहुँच प्रदान करना है ताकि उन्हें भविष्य के लिये डिजिटल रूप से तैयार किया जा सके।

कोविड-19 भारत राष्ट्रीय सुपरमॉडल की शुरुआत विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) ने संक्रमण के भविष्य में होने वाले प्रसार की निगरानी करने और इस प्रकार, स्वास्थ्य प्रणाली की तैयारी तथा संक्रमण में कमी लाने वाले अन्य उपायो से संबंधित निर्णय निर्माण में सहायता करने के लिए एक कोविड-19 भारत राष्ट्रीय सुपरमॉडल की शुरुआत की है। क्यों और किसलिए की गयीराष्ट्रीय सुपरमॉडल की शुरुआत जहां सरकार संक्रामकता और मृत्यु दर पर करीबी नजर रख रही है, रोग के प्रसार का अनुमान लगाने के लिए एक मजबूत पूर्वानुमान मॉडल लाने तथा रोग के निरीक्षण में वृद्धि करना भी आवश्यक है। डीएसटी-एसईआरबी (विज्ञान एवं इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड) तथा अन्य एजेन्सियों द्वारा वित्तपोषित अन्वेषकों द्वारा कोविड-19 पूर्वानुमान एवं निरीक्षण के लिए अनगिनत गणीतीय मॉडलों पर कार्य किया जा रहा है। मेट्रोलोजिकल कार्यक्रमों की आपदा प्रबंधन योजनाओं के लिए गणीतीय मॉडलों के उपयोग के भारत के इतिहास से प्रेरित होकर, डीएसटी ने इस क्षेत्र की विशेषज्ञता को इकट्ठा करने में और पूरे देश के लिए एक मॉडल का निर्माण करने के लिए यह प्रक्रिया आरंभ की है जिसे साक्ष्य आधारित पूर्वानुमान, जिसका उपयोग पारंपरिक रूप से मौसम भविष्यवाणी समुदायों में किया जाता है, के लिए आवश्यक सख्त परीक्षणों के अधीन होगा। यह मॉडल पूरी तरह उस डाटा पर भरोसा करेगा जो कोविड-19 के संगत होगा और इसमें डाटा में नए रुझानों से सीखने के लिए एक अनुकूली निर्मित्त घटक भी होगा। यह सफल साक्ष्य आधारित गणीतीय और सांख्यिकीय पूर्वानुमान मॉडल को एकत्र करेगा और संक्रामक रोग के विस्तार के मजबूत पूर्वानुमान के लिए सर्वश्रेष्ठ भविष्यसूचक विश्लेषण को शामिल करेगा। इस सुपरमॉडल का उपयोग भारत एवं पूरे विश्व में संक्रमण के प्रसार की दर और किस प्रकार यह स्वास्थ्य क्षेत्र को प्रभावित करेगा, का पूर्वनुमान लगाने में आने वाली कठिनाइयों से उबरने में नीति निर्माताओें द्वारा किया जाएगा और इस प्रकार महामारी पर अंकुश लगाया जा सकेगा। इस पहल के एक हिस्से के रूप में, जवाहर लाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (जेएनसीएएसआर) तथा आईआईएससी, बंगलुरू देश में सभी कोविड-19 मॉडेलिंग परियोजनाओं और कार्यक्रमों से संपर्क करने एवं कार्य करने के लिए समन्वय करेगा। यह विभिन्न मॉडलों का आकलन करने के लिए मानकों का एक सेट विकसित करेगा और अंतिम रूप से कोविड-19 भारत राष्ट्रीय सुपरमॉडल की प्रदायगी करेगा। समन्वय टीम मॉडलिंग में सक्रिय अनुसंधान समूहों, विभिन्न सॉफ्टवेयर डेवेलपरों एवं विख्यात कंपनियों के साथ परामर्श करेगा एवं कार्य करेगा, जिससे कि एक उपयुक्त यूजर इंटरफेस तथा सॉफ्टवेयर की प्रदायगी की जा सके।

हर्बल दवा वाली स्मार्ट बैंडेज विकसित भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अधीनस्वायत्त संस्थान इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईएएसएसटी) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी स्मार्ट बैंडेज विकसित की है, जो घाव तक दवा की सही डोज पहुंचाकर उसे ठीक कर सकती है। यह स्मार्ट बैंडेज घाव में संक्रमण की स्थिति के अनुरुप उसके पीएच स्तर को देखते हुए दवा की डोज जारी करती है। बैंडेज को नैनोटेक्नोलॉजी आधारित सूती पैच से बनाया गया है, जिसमें कपास और जूट जैसी टिकाऊ और सस्ती सामग्रियों का इस्तेमाल किया गया है। स्मार्ट बैंडेज की कार्यप्रणाली आईएएसएसटी के एसोसिएट प्रोफेसर डाक्टर देवाशीष चौधरी द्वारा किए गए एक शोध में, जूट के कार्बन डॉट्स के साथ एक नैनोकॉम्पोजिट हाइड्रोजेल बाध्य कॉम्पैक्ट कपास पैच बनाया गया। कार्बन डाट्स, बैंडेज मे लगाई गई दवा को रिलीज करने के लिए बनाए गए हैं। जूट का उपयोग पहली बार फ्लोरोसेंट कार्बन डॉट्स को संश्लेषित करने के माध्यम के रूप में किया गया है, जबकि पानी का उपयोग फैलाव माध्यम के रूप में किया गया है। बैंडेज में इस्तेमाल हर्बल दवा में मूल रूप से अजादिराचिता इंडिका अर्थात नीम के सत का उपयोग किया गया है। एसीएस सस्टेनेबल केम इंजीनियरिंग नामक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन रिपोर्ट में जूट और नीम जैसे प्राकृतिक उत्पादों के अर्क को दवा के रूप में बैंडेज के जरिए घाव पर रिलीज करने की एक सक्षम प्रणाली को दर्शाया गया है। इसके तहत जूट कार्बन डॉट्स को हाइड्रोजेल मैट्रिक्स-बाउंड कॉटन पैच में डुबो कर पीएच स्केल पर 5 के स्तर से नीचे तथा 7 के स्तर से उपर अलग-अलग तरीके से दवा रिलीज होनेकी विधि को दिखाया गया है। जूट और सूती कपड़े से बनायी गई यह बैंडेज घाव में बैक्टीरिया का संक्रमण किस स्तर का है, इसे देखते हुए काम करती है। संक्रमण जिस स्तर का है, दवा भी बैंडेज से उसी के अनुरूप खुद ब खुद निकलती है। यदि घाव में बैक्टीरिया का स्तर बढ़ रहा हो तो बैंडेज से दवा का रिसाव कम पीएच स्तर पर होता है। संक्रमण के अनुकूल दवा के रिसाव की इसकी यह विशेषता इस बैंडेज के अनूठे व्यवहार को दर्शाती है। स्मार्ट बैंडेज के लाभ किसी भी घाव के आसपास, बैक्टीरिया का संक्रमण होने पर उसके पीएच अर्थात अम्लीयता या क्षारीयता में बदलाव आ जाता है। इसलिए स्मार्ट बैंडेज में पीएच की स्थिति के अनुरूप दवा के रिसाव की प्रणाली विकसित की गई है। कार्बन डॉट्स जो कि शून्य-डायनामिक नैनोमीटर हैं,के अद्वितीय कार्बन युक्त छोर और सतह अपने कार्यात्मक समूहों के कारण विभिन्न पीएच के प्रति अलग व्यवहार प्रदर्शित करने के लिए डिज़ाइन किए जा सकते हैं। वे अपनी कम विषाक्तता और प्रचुर जैव-रासायनिक गुणों के लिए भी जाने जाते हैं। इसलिए, ड्रग रिलीज व्यवहार की जांच करने के लिए हाइब्रिड कपास पैच यानी कि स्मार्ट बैंडेज में नैनो-भराव के रूप में विभिन्न कार्बन डॉट्स का उपयोग किया गया है। घाव भरने के लिए बैंडेज का इस तरह का अनुकूल व्यवहार स्मार्ट घाव-ड्रेसिंग सामग्री के रूप में इसके इस्तेमाल का मार्ग प्रशस्त करता है। बैंडेज बनाने के लिए कपास और जूट जैसी सस्ती और टिकाऊ सामग्री का इस्तेमाल इसे जैविक रुप से दुष्प्रभाव रहित , विषाक्तता रहित, कम खर्चीला और टिकाऊ बनाता है।

कोविड -19 बायो-बैंक की स्थापना कोविड-19 महामारी को नियंत्रित करने के लिए आरएंडडी के प्रयास टीके, निदान और औषधि के विकास पर आधारित होते हैं। आरएंडडी प्रयासों के लिए कोविड-19पॉजिटिव लोगों के नमूने मूल्यवान संसाधन होते हैं। नीति आयोग ने हाल ही में कोविड-19से संबंधित अनुसंधान के लिए जैव नमूनों और डेटा को साझा करने से सम्बंधित दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कैबिनेट सचिव के निर्देशों के अनुसार, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने कोविड-19रोगियों के नैदानिक नमूनों (मुंह का लार/नाक द्रव/गला, फेफड़ा द्रव/थूक/रक्त/मूत्र और मल) के संग्रह, भंडारण और रख-रखाव (नमूनों को बनाये रखना) के लिए 16 जैव – भण्डार (बायो-रिपॉजिटरी) की अधिसूचना जारी की है। 16 बायो रिपोजिटरी की सूची इस प्रकार है: आईसीएमआर-9, डीबीटी-4 और सीएसआईआर-3।जैव प्रौद्योगिकी विभाग के तहत चार बायो रिपोजिटरी हैं - एन सी आर –बायोटेक साइंस सेंटर (i) टीएचएसटीआई, फरीदाबाद-नैदानिक नमूने (ii) आरसीबी फरीदाबाद-वायरल सैंपल, इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ साइंसेज, भुवनेश्वर, इनस्टेम, बैंगलोर और आईएलबीएस, नई दिल्ली। कोविड-19 रोगियों के नमूनों (मुंह का लार/नाक द्रव/गला, फेफड़ा द्रव/थूक/रक्त/मूत्र और मल) का संग्रह किया जाएगा और इसे सुरक्षित रखा जायेगा ताकि भविष्य में निदान, चिकित्सा विज्ञान, टीके आदि विकसित करने के लिए इसका उपयोग किया जा सके। क्या करेंगी ये कोविड -19 बायो-बैंक? ये नामित सुविधाएं नमूना संग्रह, परिवहन, विभाजन, भंडारण और साझा करने के लिए समान मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) विकसित करेंगी। कोविड-19 नमूनों के लिए जैव बैंकों की भूमिका निम्न होगी - वैक्सीन और उपचार का विकास करना; नाक द्रव समेत नमूनों के रख-रखाव के बारे में मार्गदर्शन; और उन परिस्थितियों का विवरण, जिसके अंतर्गत बीएसएल-3 से सम्बंधित निर्देशों का पालन किया जाना है। जैव प्रौद्योगिकी विभाग भविष्य कीएक बेहतर रणनीतिक योजना के माध्यम से इन कोविड-19 नामित जैव-बैंक सुविधाओं का समर्थन करेगा, ताकि समय के साथ नये तकनीकी हस्तक्षेप विकसित किये जा सकें। ये नामित बायो - रिपोजिटरी अपने संबंधित संस्थानों में अनुसंधान एवं विकास के उद्देश्य के लिए रोग-संबंधी नमूनों का उपयोग करेंगे। इसके अलावा,बायो –रिपोजिटरीनिदान,चिकित्सा,वैक्सीन आदि के विकास में शामिल अकादमिक, उद्योग और वाणिज्यिक संस्थाओं के साथ नमूने साझा करने के लिए भी अधिकृत किये गए हैं। लेकिन नमूने साझा करने से पहले बायो –रिपोजिटरीअनुरोध के उद्देश्य की जांच करेंगे और देश को मिलने वाले लाभ को भी सुनिश्चित करेंगे।क्लीनिकल और वायरल दोनों के लिए तरह के जैव-नमूनों को साझा करना, हमारे शोधकर्ताओं, स्टार्ट-अप्स और उद्योग द्वारा नई प्रौद्योगिकी और उत्पाद विकास के लिए महत्वपूर्ण होगा। यह आत्म-निर्भर भारत बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

तीन भारतीय कंपनियों को नासा से वेटिलेटर विनिर्माण का लाइसेंस तीन भारतीय कंपनियों को अमेरिका के राष्ट्रीय वैमानिकी एवं अंतरिक्ष प्रशासन (नासा) से कोविड-19 के मरीजों के लिए वेंटिलेटर के विनिर्माण का लाइसेंस मिला है। ये तीन भारतीय कंपनियां...अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लि., भारत फोर्ज लि. और मेधा सर्वो ड्राइव्स प्राइवेट लि. हैं। नासा के अनुसार तीन भारतीय कंपनियों के अलावा 18 अन्य कंपनियों को भी यह लाइसेंस मिला है। इनमें आठ अमेरिका और तीन ब्राजील की कंपनियां शामिल हैं। नासा अमेरिका की अंतरिक्ष अनुसंधान, वैमानिकी और संबंधित कार्यक्रमों की स्वतंत्र एजेंसी है। नासा ने दक्षिण कैलिफोर्निया की जेट प्रॉपल्शन लैब (जेएलपी) में कोरोना वायरस के मरीजों के लिए विशेष रूप से वेंटिलेटर विकसित किया है। जेएलपी के इंजीनियरों ने एक माह से कुछ अधिक समय में इस विशेष वेंटिलेटर ‘वाइटल’ को डिजाइन किया है। इसे अमेरिका के खाद्य एवं दवा प्रशासन से 30 अप्रैल को ‘आपात प्रयोग की अनुमति’ मिल चुकी है। नासा का कहा है कि वाइटल को चिकित्सकों तथा चिकित्सा उपकरण विनिर्माण से सलाह लेकर विकसित किया गया है। कोरोना वायरस से अब तक अमेरिका में 1,02,836 लोगों की जान जा चुकी है। अमेरिका में इस महामारी से संक्रमित लोगों का आंकड़ा 17 लाख को पार कर चुका है।