सोशल मीडिया का सबसे खतरनाक algorithm शायद यही है।
पहली पोस्ट—
गुस्सा।
दूसरी—
शक।
तीसरी—
जातीय नाराजगी।
चौथी—
“देखो, तुम्हारे साथ कितना अन्याय हुआ।”
पाँचवीं—
“पुराने समर्थक भी अब परेशान हैं।”
छठी—
“मैं तो पहले से कह रहा था…”
और सातवीं पोस्ट तक पहुँचते-पहुँचते आपको लगता है,
“यह फैसला तो मैंने खुद लिया है।”
हो सकता है, फैसला आपका ही हो।
लेकिन एक सवाल पूछना फिर भी जरूरी है...
क्या विचार आपका था, या आपको वहाँ तक पहुँचाने वाली सड़क किसी और ने बनाई थी?
अब सबसे महत्वपूर्ण बात।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि BJP समर्थक किसी भी आलोचना को सुनना बंद कर दें।
बिल्कुल नहीं।
एक मजबूत टीम में कप्तान की गलती बताई जाती है।
एक मजबूत संगठन में गलत नीति पर सवाल उठते हैं।
एक जागरूक नागरिक सरकार की आलोचना करता है।
और एक सच्चा समर्थक भी कह सकता है, “यह फैसला गलत है।”
लेकिन यहाँ फर्क समझिए।
नीति की आलोचना और पूरे राजनीतिक समूह के प्रति अविश्वास पैदा करना एक ही चीज नहीं है।
“यह नीति गलत है।” और “हमारे साथ हमेशा धोखा हुआ है।”
इन दोनों वाक्यों के बीच बहुत बड़ी राजनीतिक दूरी है।
पहला आपको सुधार की तरफ ले जा सकता है। दूसरा आपको विघटन की तरफ।
और जाति?
यहाँ खेल और भी संवेदनशील हो जाता है।
अगर कोई बार-बार आपको बताए....
“देखो, तुम्हारी जाति को क्या मिला।”
“देखो, दूसरी जाति को क्या मिला।”
“देखो, उनके लोग कितनी ताकत में हैं।”
“देखो, तुम्हारे साथ कितना अन्याय हुआ।”
तो गुस्सा करने से पहले एक कदम पीछे हटिए।
और पूछिए, “अगर मैं अपनी पूरी राजनीतिक पहचान को सिर्फ अपनी जाति तक सीमित कर दूँ, तो सबसे ज्यादा फायदा किसका होगा?”
क्योंकि जिस दिन एक बड़ा राजनीतिक समूह जाति × जाति × जाति × समुदाय × वर्ग में टूटने लगता है, उस दिन बाहर बैठे खिलाड़ी को दीवार तोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती।
दीवार खुद कमजोर हो जाती है।
इतिहास में भी सेनाएँ केवल हथियारों से नहीं हारतीं।
कई बार सेना के पास हथियार होते हैं।
खाना होता है।
सैनिक होते हैं।
किला होता है।
फिर भी मनोबल टूट जाता है।
क्यों?
क्योंकि सैनिकों को लगने लगता है, “हम साथ क्यों लड़ रहे हैं?”
युद्ध का सबसे खतरनाक क्षण वह नहीं जब गोली चलती है।
कभी-कभी वह क्षण होता है जब सैनिक अपने ही साथी की तरफ देखकर सोचता है, “शायद असली दुश्मन यही है।”
यही कारण है कि किसी भी बड़े संगठन की सबसे मूल्यवान संपत्ति केवल संख्या नहीं होती।
विश्वास होता है।
और यही बात राजनीतिक समर्थकों पर भी लागू होती है।
आप BJP के समर्थक हैं तो सवाल पूछिए।
नीतियों पर बहस कीजिए।
नेताओं की आलोचना कीजिए।
जहाँ गलती हो, वहाँ गलती कहिए।
लेकिन हर आलोचना पढ़ने के बाद खुद से एक सवाल जरूर पूछिए, “क्या यह मुझे बेहतर समर्थक बना रही है…
या सिर्फ निराश समर्थक?”
क्योंकि दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है।
अब उस पोस्ट को दोबारा पढ़िए जो शुरू होती है, “मैं मोदी जी के खिलाफ नहीं हूँ, लेकिन…”
उससे डरने की जरूरत नहीं।
उसे तुरंत भक्त बनाम विरोधी के चश्मे से भी मत देखिए।
बस ध्यान से पढ़िए।
देखिए
क्या तथ्य दिए गए हैं?
क्या तथ्य छिपाए गए हैं?
क्या कोई समाधान दिया गया है?
या सिर्फ शिकायतों की लंबी सूची है?
क्या आपको नीति पर सोचने के लिए कहा जा रहा है?
या आपकी पहचान पर चोट की जा रही है?
क्या आपको बेहतर विकल्प बताया जा रहा है?
या सिर्फ यह समझाया जा रहा है कि “तुम्हारे अपने लोग तुम्हारे दुश्मन हैं।”
यही अंतर असली है।
क्योंकि propaganda हमेशा झूठ नहीं बोलता।
कभी-कभी वह सच को चुनता है।
एक असली घटना उठाता है।
एक असली शिकायत दिखाता है।
एक असली अन्याय दिखाता है।
फिर उसे दस दूसरी बातों से जोड़ देता है।
और अंत में आपको एक ऐसा निष्कर्ष दे देता है, जो शायद उन तथ्यों से अपने आप निकलता ही नहीं था।
यही कारण है कि सिर्फ यह पूछना पर्याप्त नहीं, “क्या यह बात सच है?”
एक और सवाल पूछिए, “इस सच को इस तरह दिखाने से मैं कहाँ पहुँचूँगा?”
यही राजनीतिक साक्षरता है।
राजनीति में भी सावधानी जरूरी है।
हर शिकायत को दबाना गलत है।
लेकिन हर शिकायत को सामूहिक अविश्वास में बदल देना भी खतरनाक है।
एक गलती को सुधारना चाहिए।
एक अन्याय को ठीक करना चाहिए।
एक कमजोर वर्ग को न्याय मिलना चाहिए।
लेकिन हर समस्या का अंतिम निष्कर्ष, “इसलिए हम सब अलग हैं” हो जाए, तो फिर सवाल उठता है...
किसने हमें अलग-अलग खानों में बाँटा?
और क्यों?
आज भारत सिर्फ भारत की सीमाओं के भीतर होने वाली राजनीति से प्रभावित नहीं होता।
बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ, वैश्विक संस्थाएँ, मीडिया नेटवर्क, डिजिटल प्लेटफॉर्म, विचारधारात्मक समूह और अलग-अलग प्रभावशाली हित, हर देश के राजनीतिक वातावरण को किसी न किसी रूप में प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।
यह कोई रहस्यमयी कहानी नहीं।