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Pdhna bhi hai, maan bhi nahi lg raha hai pdhne me, na hi nind aa rahi hai, kru to kru kya😖😖
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ना आज के ज़माने में कोई रावण है, ना आज के ज़माने में कोई राम है।
लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न अब बस नाम हैं, रिश्तों में कहाँ वैसा त्याग और सम्मान है।
हर चेहरा अपने मतलब की कहानी लिख रहा, हर दिल अपने ही स्वार्थ का पैगाम है।
मर्यादा किताबों तक ही सिमटती जा रही, इसीलिए हर घर में बढ़ता संग्राम है।
