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•legal updates •current affairs • BA LLB, BBA LLB, LLB • LLM, CLAT, CUET • Judiciary (PCS-J), APO • AIBE, UGC-NET (Law) •NOTES 📚 #ballb #llb #llm #judiciary #adpo #aibe

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No Particular Form Of Medical Certificate Required To Treat Dying Declaration As Valid If It Is Truthful & Voluntary: Allahabad High Court https://www.verdictum.in/allahabad-high-court/tilluka-manoj-v-state-of-up-2026ahc130820-db-dying-declaration-validity-1617474
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Daily Vocabulary 9--7.pdf
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لا يوجد نص...
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لا يوجد نص...
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Magistrate's Jurisdiction for Bail: The Allahabad High Court clarified that a Judicial Magistrate has the power to grant bail
Magistrate's Jurisdiction for Bail: The Allahabad High Court clarified that a Judicial Magistrate has the power to grant bail under Section 437 of the Code of Criminal Procedure, 1973, even in cases that are exclusively triable by a Court of Session, provided the offense is not punishable by death or imprisonment for life. The "Negative Tendency": The Court strongly criticized the practice of Judicial Magistrates automatically refusing or avoiding bail applications simply because a case is Sessions-triable. It noted that Magistrates often treat these applications as an "untouchable" subject due to a mistaken belief that they lack jurisdiction. Disclaimer: shared only for informational/ Educational purposes. #advocate Join WhatsApp group https://chat.whatsapp.com/Cup0LdQkUS578Rkh0z7BJ8?s=cl&p=a&ilr=0&amv=2 https://t.me/Justicejunction1
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7 वर्ष से कम सजा वाले मामलों में पुलिस द्वारा बिना 35 (3) की नोटिस का अनुपालन कराए बिना गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट ने की सख्त टिप्पणी यह मामला Habeas Corpus Writ Petition (HABC) No. 198 of 2026 का है, जिसकी सुनवाई Justice Rajesh Singh Chauhan एवं Justice Divesh Chandra Samant की खंडपीठ द्वारा की जा रही है। यह निर्णय अभी अंतिम नहीं है; फिलहाल न्यायालय ने सुनवाई के दौरान गंभीर मौखिक टिप्पणियाँ (oral observations) की हैं और संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा है। मामले के तथ्य एक 17 वर्ष से कम आयु के किशोर को चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। एफआईआर में लगाए गए अपराधों की अधिकतम सजा 3 वर्ष और 5 वर्ष थी। ऐसे मामलों में सामान्यतः BNSS की धारा 35(3) के तहत पहले उपस्थिति नोटिस (Notice of Appearance) देना आवश्यक होता है; सीधे गिरफ्तारी अपवाद स्वरूप ही की जा सकती है। पुलिस ने बिना नोटिस दिए गिरफ्तारी कर ली और न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया। हाईकोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ गिरफ्तारी प्रथम दृष्टया अवैध (Prima Facie Illegal) न्यायालय ने माना कि पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के गिरफ्तारी संबंधी निर्देशों का पालन नहीं किया। यदि अपराध की अधिकतम सजा 7 वर्ष से कम है, तो गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होनी चाहिए। नाबालिग की उम्र की जांच नहीं की गई पुलिस ने आयु संबंधी दस्तावेजों का सत्यापन नहीं किया। यदि आयु की जांच की जाती, तो किशोर को जेल भेजने का प्रश्न ही नहीं उठता। मजिस्ट्रेट की भूमिका पर टिप्पणी अदालत ने कहा कि रिमांड आदेश बिना पर्याप्त न्यायिक विवेक के, यांत्रिक ढंग से पारित किया गया। केस डायरी और आयु संबंधी रिकॉर्ड का उचित परीक्षण नहीं किया गया। जांच अधिकारी (IO) को चेतावनी न्यायालय ने कहा कि यदि Satender Kumar Antil v. CBI (2022) के निर्देशों की अवहेलना की जाती है तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के जिन निर्णयों का उल्लेख हुआ Satender Kumar Antil v. CBI (2022) 7 वर्ष तक की सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी अपवाद है। पहले नोटिस देना और गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में दर्ज करना आवश्यक है। Arnesh Kumar v. State of Bihar (2014) अनावश्यक गिरफ्तारी पर रोक। पुलिस को गिरफ्तारी की आवश्यकता का रिकॉर्ड रखना होगा। मजिस्ट्रेट को भी स्वतंत्र रूप से गिरफ्तारी की वैधता की जांच करनी होगी। हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिए? नाबालिग की तत्काल रिहाई का आदेश पहले ही दिया जा चुका था। गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारियों को तलब किया गया। संबंधित ACJM से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा गया। मामले की अगली सुनवाई 16 जुलाई 2026 निर्धारित की गई, जिसमें आगे की कार्रवाई पर विचार होगा। इस मामले का कानूनी महत्व यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि: BNSS की धारा 35(3) का पालन अनिवार्य है। 7 वर्ष से कम सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी सामान्य नियम नहीं है। पुलिस और मजिस्ट्रेट दोनों की जवाबदेही तय होगी यदि वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी करते हैं। किशोरों के मामलों में आयु का सत्यापन किए बिना गिरफ्तारी और रिमांड गंभीर कानूनी त्रुटि मानी जाएगी। #caselaw Join WhatsApp group https://whatsapp.com/channel/0029Vb9AckzJUM2jigEft43g Join telegram group https://t.me/Justicejunction1
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*⚜️🔥 चाणक्य नीति – और छोटा, और तीखा 🔥⚜️* 🦅 “समय पहचानो— वहीं जीत छुपी है।” *⚔️ मित्र पर अंधा भरोसा* *और शत्रु को हल्का समझना—* दोनों विनाश हैं। 🔥 दुनिया भला नहीं, ताकत मानती है।
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SC Seeks Response On Plea By Students Affected By Cancellation Of Class XII Board Exam In Gulf Countries Due To War https://www.verdictum.in/supreme-court/sc-seeks-response-on-plea-by-students-affected-by-cancellation-of-class-xii-board-exam-in-gulf-countries-due-to-war-1617372
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Important_Notice_132026_POPre_Admit_Card_BPSC_20260708_qaxd75.pdf
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*Sumit v. State of UP (2026 SC)* 1. The HC granted anticipatory bail u/S.438 CrPC (S.482 BNSS) to the petitioner *till the filing of the chargesheet*. 2. *Bharat Chaudhary v. State of Bihar (2003 SC)*: Anticipatory bail can be granted at any stage so long as the applicant has not been arrested. It can be granted even after filing of chargesheet and taking cognizance. 3. *Sushila Aggarwal v. State (NCTD) (2020 SC)*: The life or duration of an anticipatory bail order does not end normally at the time and stage when the accused is summoned by the court, or when charges are framed, but can continue *till the end of the trial*. Again, if there are any special or peculiar features necessitating the court to limit the duration/tenure of anticipatory bail, it is open for it to do so. However, the protection of anticipatory bail should not invariably be limited to a fixed period; it should enure in favour of the accused without any restriction on time. Normal conditions u/S.437(3) r.w. S.438(2) CrPC should be imposed; if there are specific facts or features in regard to any offence, it is open for the court to impose any appropriate condition (including fixed nature of relief, or its being tied to an event), etc. 4. Thus, the position of law is well settled: once anticipatory bail is granted, it ordinarily continues without fixed expiry. The filing of a charge-sheet, taking of cognizance, or issuance of summons does not terminate protection unless special reasons are recorded. Risk management can be taken care of by way of imposing conditions of cooperation, attendance, and non-tampering, not by imposing time limits. Where circumstances change, modification or cancellation of bail may be sought under the BNSS, but expiry clauses inserted at inception are unsustainable. Join telegram channel https://t.me/justicejunction1
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Cross Examination (प्रतिपरीक्षण) को 7 भागों में बाँटकर प्रश्न पूछने की एक व्यावहारिक तकनीक नीचे बताई गई है। यह कोई वैधानिक नियम (Law) नहीं है, बल्कि अनुभवी अधिवक्ताओं द्वारा अपनाई जाने वाली एक Trial Strategy है। यदि इन सात भागों के अनुसार जिरह की जाए तो गवाह की विश्वसनीयता (Credibility) को प्रभावी ढंग से परखा जा सकता है। 1. Question on Identity (पहचान संबंधी प्रश्न) उद्देश्य: यह जानना कि गवाह वास्तव में घटना, अभियुक्त या पीड़ित को कितनी अच्छी तरह पहचानता है। पूछे जाने वाले प्रश्न आप अभियुक्त को कब से जानते हैं? पहली बार कहाँ मिले थे? घटना के समय कितनी दूरी थी? प्रकाश (Light) की क्या स्थिति थी? आपने कितनी देर तक देखा? पहचान परेड (TIP) हुई थी या नहीं? क्या आपने पुलिस को पहले ही नाम बता दिया था? यदि विरोधाभास मिले तो गवाह की पहचान संदिग्ध सिद्ध की जा सकती है। 2. Question on Conduct (आचरण संबंधी प्रश्न) उद्देश्य: घटना के समय और बाद में गवाह का व्यवहार सामान्य था या असामान्य। उदाहरण घटना देखकर आपने क्या किया? पुलिस को सूचना कब दी? अस्पताल क्यों नहीं गए? शोर क्यों नहीं मचाया? FIR लिखवाने में देरी क्यों हुई? आपने किसी को बताया या नहीं? यदि व्यवहार सामान्य मानव आचरण के विपरीत हो, तो गवाही पर संदेह उत्पन्न किया जा सकता है। 3. Documentary Proof (दस्तावेजी साक्ष्य) उद्देश्य: मौखिक गवाही को दस्तावेजों से मिलाना। दस्तावेज FIR साइट प्लान केस डायरी मेडिकल रिपोर्ट पोस्टमार्टम रिपोर्ट FSL रिपोर्ट CDR CCTV फोटो बैंक रिकॉर्ड रजिस्टर प्रश्न क्या यह आपका हस्ताक्षर है? क्या आपने यह बयान दिया था? इसमें यह बात क्यों नहीं लिखी है? दस्तावेज और आपकी गवाही में अंतर क्यों है? 4. Question on Motive (उद्देश्य/दुश्मनी) उद्देश्य: झूठी गवाही या पक्षपात साबित करना। उदाहरण क्या पहले से विवाद था? जमीन का मुकदमा चल रहा है? परिवार में रंजिश है? चुनावी दुश्मनी है? पैसे का विवाद है? यदि पूर्व शत्रुता सिद्ध हो जाए तो गवाह की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाया जा सकता है। 5. Facts with Law (BSA और BNSS की धाराओं के साथ) जिरह केवल तथ्यात्मक नहीं होनी चाहिए, बल्कि कानून आधारित भी होनी चाहिए। उदाहरणतः भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) के अंतर्गत: गवाह की विश्वसनीयता पर प्रश्न। पूर्व बयान से विरोधाभास। जिरह की सीमा। दस्तावेजों द्वारा विरोधाभास। BNSS, 2023 पुलिस जांच की वैधानिक प्रक्रिया। FIR, विवेचना, गिरफ्तारी, बयान आदि में प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं। उदाहरण विवेचक ने कानून के अनुसार कार्यवाही की? गवाह का बयान समय से लिया गया? अनिवार्य प्रक्रिया का पालन हुआ? 6. Legal Infirmities (TIP एवं जांच की कानूनी कमियाँ) उद्देश्य: विवेचना की त्रुटियाँ उजागर करना। उदाहरण TIP नहीं हुई। घटना स्थल का नक्शा सही नहीं। स्वतंत्र गवाह नहीं। जब्ती पंचनामा में त्रुटि। सील सुरक्षित नहीं रही। Chain of Custody टूटी। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का प्रमाणपत्र नहीं। इन कमियों से अभियोजन की कहानी कमजोर हो सकती है। 7. Medical & Forensic Evidence (चिकित्सीय एवं वैज्ञानिक साक्ष्य) उद्देश्य: मौखिक गवाही और वैज्ञानिक साक्ष्य का मिलान करना। पूछे जाने वाले प्रश्न चोट किस हथियार से संभव है? डॉक्टर की राय क्या है? मृत्यु का समय क्या है? DNA रिपोर्ट क्या कहती है? Fingerprint मिले या नहीं? Blood Group मेल खाता है? FSL रिपोर्ट क्या बताती है? यदि मेडिकल साक्ष्य और मौखिक गवाही में विरोधाभास हो तो गवाह की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। प्रभावी Cross Examination के 10 स्वर्णिम नियम केवल Leading Questions पूछें। एक प्रश्न में केवल एक तथ्य रखें। ऐसे प्रश्न पूछें जिनका उत्तर "हाँ" या "नहीं" में हो। ऐसा प्रश्न न पूछें जिसका उत्तर पहले से ज्ञात न हो। गवाह से बहस न करें। अनावश्यक प्रश्न न पूछें। प्रत्येक उत्तर को अगले प्रश्न से जोड़ें। दस्तावेजों से विरोधाभास अवश्य दिखाएँ। जिरह का स्पष्ट उद्देश्य रखें। जब आवश्यक तथ्य सिद्ध हो जाएँ, तो जिरह समाप्त करें। निष्कर्ष - Cross examination उपरोक्त 7-भागीय पद्धति कानून में निर्धारित नियम नहीं, बल्कि अनुभवी अधिवक्ताओं द्वारा अपनाई जाने वाली एक प्रभावी Cross-Examination Framework है। यदि इसे BSA, 2023, BNSS, 2023, और उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालय के सिद्धांतों के साथ अपनाया जाए, तो यह आपराधिक मुकदमों में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हो सकती है। #crossexamination
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#सुप्रीम_कोर्ट का अहम फैसला: भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियां RTI के दायरे से बाहर नहीं!+1
#सुप्रीम_कोर्ट का अहम फैसला: भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियां RTI के दायरे से बाहर नहीं!
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Trying To Play Dilatory Tactics; Made Inconsistent Statements In Pleadings: Madhya Pradesh HC Imposes Cost on Petitioner Who Is Lawyer https://www.verdictum.in/madhya-pradesh-high-court/divyaprakash-v-brijesh-kumar-2026mphc-ind17448-dilatory-tactics-practicing-lawyer-1617132
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Delhi HJS 2026 Notification.pdf
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UP APO MAINS 2026 --Sakshya Adhiniyam Exam Paper.pdf
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20
UP APO MAINS 2026-- Anya Adhiniyam exam Paper.pdf
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