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रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि 2029-30 तक रक्षा उपकरणों का निर्यात 50 हज़ार करोड़ रुपये तक पहुँचाने का लक्ष्य है।
पिछले पाँच से छह साल में भारत के रक्षा निर्यात में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है।2023-24 में भारत का कुल रक्षा निर्यात क़रीब 21 हज़ार करोड़ रुपये था,2024-25 में यह बढ़कर 28 हज़ार करोड़ रुपये हो गया और 2025-26 में यह क़रीब 38 हज़ार करोड़ रुपये तक पहुँच गया।
भारत के रक्षा निर्यात में गोला-बारूद, ड्रोन, ब्रह्मोस, आकाश.. सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल और मल्टी-बैरल गाइडेड पिनाका मिसाइल शामिल हैं। दो साल पहले भारत ने आकाश और पिनाका मिसाइलें आर्मेनिया को बेची थीं।पिनाका एक मल्टी-बैरल मिसाइल सिस्टम है, जिसमें एक समय फ्रांस ने भी दिलचस्पी दिखाई थी।
फ़िलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देश आधुनिक मिसाइलें ख़रीदने के लिए बड़ी ताक़तों के बजाय भारत का रुख़ कर रहे हैं,इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि ब्रह्मोस एक परखी हुई और सफल मिसाइल है दूसरीयह दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में काफ़ी सस्ती है और भारत इन मिसाइलों की तैनाती, ट्रेनिंग और स्पेयर पार्ट्स बहुत कम क़ीमत पर या कई बार मुफ़्त में उपलब्ध कराता है।इसी वजह से मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश भी इसमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
साथ ही साथ पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष में भी इन मिसाइलों का उपयोग हुआ था जिसकी पूरी दुनिया में प्रशंसा हुई,इससे भी भारतीय मिसाइलो का महत्व बढ गया है।
भारत में 2001 तक डिफ़ेंस सेक्टर में सरकारी कंपनियाँ जैसे डीआरडीओ और आर्डिनेंस फ़ैक्टरी का ही दबदबा था।2001 के बाद सरकार ने निजी कंपनियों की भागीदारी को मंज़ूरी दी।लेकिन आज भी रक्षा सौदों में उनकी हिस्सेदारी 8-10 फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं बढ़ पाई है।भारत की कंपनियाँ डिफ़ेंस सेक्टर में निवेश करने से क्यों कतराती हैं। क्योंकि डिफ़ेंस एक ऐसा सेक्टर है, जिसमें पूँजी लगाने पर रिटर्न मिलने में समय काफ़ी लगता है,दूसरी समस्या ये है कि इस क्षेत्र में छोटे बजट से शुरुआत नहीं की जा सकती,इनमें निवेश भी ज़्यादा करना होता है और तीसरी समस्या ये है कि भारत में इस सेक्टर में निवेश के बाद रिटर्न की गारंटी नहीं होती है विदेश में रक्षा क्षेत्र की जिन कंपनियों के नाम है, साख है, वो 70- 80 सालों से इसी काम में लगी हैं,भारतीय कंपनियाँ उनके मुक़ाबले में अभी कहीं नहीं हैं और चौथी समस्या है, इन उत्पादों की मार्केट में डिमांड बहुत कम होती है, और ये उपकरण जल्द ख़राब नहीं होते। रक्षा क्षेत्र में कंपनियों को एक अलग साख बनाने की ज़रूरत होती है, जिसमें कंपनियों को वक़्त और पैसा दोनों ख़र्च करना पड़ता है,ये राह इतनी आसान भी नहीं है।
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