✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें। ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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منشورات القناة
कोचिंग संस्थानों से संबंधित पिछले दिनों से जो भी रहा है उसके पीछे की कहानी समझने के लिए आप सब एक वेब सीरीज Jamnapaar Season 2 देखिए।
| 2 | मीडिया बनाम अध्यापक
हाल ही में एक महिला रिपोर्टर ने ऑनलाइन अध्यापकों को जोकर बोल दिया जिन्हें कुछ नहीं आता है बस ढोंग करते रहते हैं उसके बाद एक से बढकर एक अध्यापकों ने भी उनकी आलोचना की।" ऐसे में हमें यह समझने का प्रयास करना चाहिए की आखिर यह सब ऐसा क्यों हो रहा है?
इस समय देश की जो स्थिति उस मुद्दे से भटकाना क्योंकि सामान्यत: न्यूज रिपोर्टर सक्रिय रूप से इसकी शुरुआत नहीं करते हैं वे बस किसी असामान्य घटना का प्रतीक्षा करते हैं जैसे ही वह होता है वह देश का मुद्दा बन जाता है क्योंकि सब उसके बारे में ही बात करने लगते हैं अगर दूसरे तरफ से अगर देखा जाए तो सच में मीडिया का काम है कोई भी समस्या का उजागर करना जो सबके ध्यान में नहीं है और देखा जाए तो जो इन्टरनेट पर इतना हल्ला मचा हुआ है
"इनकी सत्यनिष्ठा को लेकर वह भारत के घरों में इतना फैला हुआ नहीं लेकिन विद्यालय व शिक्षकों की फीस लेकर भारत के घर-घर के अभिभावक अवगत भी हैं और चिन्तित भी तो मुद्दा तो उठ गया सो कुछ हद तक सही भी है क्योंकि वर्तमान ऑनलाइन शिक्षा जगत का एक कड़वा सच यह है कि कई शिक्षक अब केवल 'शिक्षक' नहीं रहे, वे 'इन्फ्लुएंसर' और 'एंटरटेनर' बन चुके हैं व्यूज के लिए कक्षाओं में अनावश्यक शायरी और मेलोड्रामा करते हैं इससे हममें ज्यादातर लोग शायद अवगत हों
लेकिन सभी अध्यापकों को इसमें लपेटना सही नहीं है क्योंकि कुछ है जो सही काम कर रहे हैं और इस तरह की रिपोर्टिंग करते समय अच्छे से रिसर्च करना पड़ता है तरह-तरह के तथ्य इकठ्ठा होते है उसमें फिर बेकार की चीजों को हटा दिया जाता है और बेस्ट सबूतों को पेश करते हैं और रिपोर्टिंग करते समय जो अच्छे अध्यापक है और जो गलत कर रहें हैं उनमें से कुछ की तस्वीरें व नाम दिखाना चाहिए जिससे यह समझ में आए की बात किसके बारे में है और उसे किस तरह लेना है पता चले ऐसे नहीं की माइक पकड़ा और कुछ भी बोल दिया अन्ततः अध्यापकों को भी इन उथली बातों से कोई फर्क
"नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि जब आपको पता है कि सामने वाला गलत है और आपकी नजर में जब उसका मूल्य ही शून्य है फिर इसमें क्यों पड़ना और दूसरी तरफ बच्चे भी हैं वह भी वैसे ही हैं क्योंकि इनमें से ज्यादातर अब अध्ययन नहीं करने आते हैं वह भी ऐसे ही शिक्षा के बजाय 'ड्रामा' का उपभोक्ता बन गए हैं। आप कुछ पढ़ना चाहते हैं पढ़िए बेकार की चीजों में क्यों उलझना "जवाबी वीडियो बनाइए सर उसने आपके बारे में ऐसा कहा" अब अध्यापक भी क्या करे करता है कि वह रिप्लाई कर देता है क्योंकि उसे भी पता है कि इन्हीं सब वीडियोज़ पर ही ज्यादा लोग देखने आएंगे लेकिन यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि जो भी ऐसा करते हैं उनमें से अधिकांश शिक्षक केवल व्यूज और पैसे के लिए विवादों में कूद रहे हैं, और जवाबी सामग्री दे रहे हैं तो वे मीडिया से अलग कैसे हुए? मीडिया भी तो टीआरपी (TRP) के लिए यही कर रहा है
यह शिक्षा के पूर्ण 'बाजारीकरण' का परिणाम है। जब शिक्षा एक उत्पाद बन जाती है, तो उसे अधिकतम लोगों तक पहुंचाने के लिए विवाद सबसे सस्ता route होता है।
तो इसमें किसी एक की ही पूर्ण है कहना गलत होगा
अतः मीडिया और शिक्षक, दोनों को अपनी गरिमा और जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए क्योंकि दोनों ही देश की गरिमा का अभिन्न हिस्सा हैं
आज के लिए इतना ही। | 1 047 |
| 3 | UPSC की अप्रत्याशितता
आज एक नए विषय पर बात करते हैं। आप सब को पता ही होगा कि कल UPSC के Prelims का पेपर था और हर साल की तरह इस साल भी पेपर Unexpected था क्योंकि सब समझते हैं कि इस पेपर का पैटर्न है पर असल में कोई पैटर्न ही नहीं है। और दूसरी बात यह है कि मैं हमेशा से सोचता रहा हूँ कि इन परीक्षाओं में सवाल कहाँ से और किस प्रकार के आने चाहिए इसकी कोई Accountability ही नहीं है मतलब पूरी आज़ादी है कहीं से भी प्रश्न उठाने के लिए लेकिन वास्तव में कोई भी सभी दिशाओं का गहन अध्ययन और उनके सूक्ष्म तथ्यों को याद नहीं कर सकता है।
अगर इतिहास में जाएं और खोजें कि आखिर परीक्षाएं ऐसी बनायी ही क्यों जाती हैं जिसे ज्यादातर लोग पास ही नहीं कर पाएंगे तो जरूरत क्या है इसकी सबसे पहले इसे समझते हैं। भारत में नालन्दा विश्वविद्यालय में भी इसी प्रकार की entrance exam होता है जिसका विवरण विदेशी यात्रियों के कृतियों और उनके संवादों में देखने को मिलता है। (भारत में शायद उपलब्ध नहीं क्योंकि विदेशी आतताइयों द्वारा ज्यादातर पुस्तकें नष्ट कर दी गई हैं) पूरी परीक्षा ही संस्कृत भाषा में थी तो सबसे पहले इसमें उपस्थित होने के लिए संस्कृत भाषा का ही गहन अध्ययन करना पड़ता था उसके बाद उस समय से सम्बन्धित विषय जैसे दर्शन ज्ञान विज्ञान पर आधारित प्रश्न होते थे।
दूसरी तरफ अगर हम देखें तो जो योग या तांत्रिक विद्यालय भी जो थे वे भी प्रारम्भ में ही क्लिष्ट साधनाएँ, तप, यातनाएँ और योगाभ्यास करवाते थे ताकि जो गम्भीर नहीं है पहले दिन या महीने में भाग जाए और इन्हीं का प्रसिद्धि भी बहुत होती थी कि वे हैं एक गुरु जिन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में 10 साधकों को ही उनके साध्य तक पहुँचाया क्योंकि यही वीर थे जो वहाँ टिक पाए नहीं तो यह गणना और भी कम होती इसीलिए यही चीज इस पेपर पर भी लागू करते हैं लेकिन
ये यह समझ नहीं पाते हैं कि अत्यधिक कठोरता से निकले हुए अधिकारी अक्सर जनता के प्रति असंवेदनशील और तानाशाह बन जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्होंने यह पद अत्यंत कष्ट सहकर "जीता" है, वे बहुत महान हैं इसलिए वे अब जनता के सेवक नहीं, बल्कि शासक हैं।
तो अब हम यहाँ यह तो समझ गए कि यह ऐसा क्यों है तो इसका उपाय क्या है और सुझाव क्या हो सकते हैं।
इससे पहले कि हम आगे बढ़े यह समझ ले कि आखिर इसकी कमियां क्या है
देखो कठिन पेपर बनाना अलग बात है और लेंदी पेपर बनाना (इस बार ऐसा ही बना है) दूसरी बात है क्योंकि कई गरीब परिवार के बच्चे भी इसकी तैयारी करते हैं तो उनके साथ उचित न्याय नहीं हो पाता है यह अच्छी बात है कि हमें गुणवत्ता से समझौता नहीं करना चाहिए लेकिन उसकी सीमाएं तो हो कुछ क्योंकि सिलेब्स में कुछ दिया गया है पूछ कुछ रहे हैं ऐसे कैसे चलेगा क्योंकि हम सोच भी नहीं सकते कि जिनका पेपर था उनकी मानसिक दशा क्या होगी
उपाय क्या है
हमें सवाल जवाब करते रहने चाहिए डिबेट करनी चाहिए जिससे इनकी जवाबदेही बढ़े नहीं तो बार बार इसी तरह की गलतियां दोहराई जाती रहेंगी स्टूडेंट्स के लिए है कि या तो आप इस रेस को छोड़ दें या फिर
टिके रहें क्योंकि चाहे साधनाएँ हो या परीक्षाएं हो या कुछ भी छोड़ने पर उस दिशा में गति रूक जाती है और दूसरी दिशा में शून्य से start करना पड़ता है और रही बात अटेम्प्ट की तो क्या आप सब जानते हैं कि भारत के ही वायुसेना विभाग में Qualify करने के लिए एक CPSS Test होता है और इसका भी एक Rule है कि जीवनभर में केवल एक ही Attempt मिलता है अगर इसमें fail हुए तो फिर भारत के सभी वायु विभाग में विमान उड़ाने के लिए आप Disqualified हो गए क्योंकि यह दूसरा मौका भी नहीं देता है। तो जो बात है सो है
सुधार यह कर सकत हैं कि विश्लेषणात्मक और critical प्रश्नों की ओर ही ज्यादा से ज्यादा रहना चाहिए क्योंकि हमें प्रशासनिक अधिकारी चाहिए रट्टू तोता नहीं
और स्टूडेंट्स को भी इस तरह के अप्रत्याशित exam पेपर के लिए स्वयं को तैयार रखना चाहिए।
तो बस आज के लिए इतना ही।। | 1 424 |
| 4 | *🛕आने वाले पर्व त्यौहार*
20 May अधिक विनायक चतुर्थी
21 May अधिक स्कन्द षष्ठी
23 May अधिक मासिक दुर्गाष्टमी
25 May गंगा दशहरा
27 May पद्मिनी एकादशी
28 May अधिक प्रदोष व्रत व अग्नि नक्षत्रम समाप्त
29 May ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा व अंवाधान | 1 480 |
| 5 | ।। राम-राम ।।
*देवता कौन ?* *तथा देवता कितने प्रकार के होते हैं ?*
*मनुष्योंके पृथ्वीतत्त्वप्रधान शरीरोंकी अपेक्षा देवताओंके शरीर तेजस्तत्त्वप्रधान, दिव्य और शुद्ध होते हैं। मनुष्योंके शरीरोंसे मल, मूत्र, पसीना आदि पैदा होते हैं। अतः जैसे हम लोगोंको मैलेसे भरे हुए सूअरसे दुर्गन्ध आती है, ऐसे ही देवताओंको हमारे ( मनुष्योंके ) शरीरोंसे दुर्गन्ध आती है।*
*देवताओंके शरीरोंसे सुगन्ध आती है । उनके शरीरोंकी छाया नहीं पड़ती। उनकी पलकें नहीं गिरतीं।*
*वे एक क्षणमें बहुत दूर जा सकते हैं और जहाँ चाहें, वहाँ प्रकट हो सकते हैं। इस दिव्यता के कारण ही उनको देवता कहते हैं।*
*बारह आदित्य, आठ वसु , ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार - ये तैंतीस कोटि ( तैंतीस प्रकार के ) देवता सम्पूर्ण देवताओंमें मुख्य माने जाते हैं।उनके सिवाय मरुद्गण, अप्सराएँ आदि भी देवलोकवासी होने से देवता कहलाते हैं।*
*देवता तीन तरह के होते हैं -*
*( १ )* *आजानदेवता - जो महासर्गसे महाप्रलयतक*
*( एक कल्प तक ) देवलोकमें रहते हैं, वे ' आजानदेवता ' कहलाते हैं।*
*ये देवलोकके बड़े अधिकारी होते हैं।*
*उनके भी दो भेद होते हैं -*
*( क ) ईश्वरकोटिके देवता -* *शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य और विष्णु - ये पाँचों ईश्वर भी हैं और देवता भी।*
*इन पाँचोंके अलग- अलग सम्प्रदाय चलते हैं। शिवजी के शैव, शक्ति के शाक्त,* *गणपति के गाणपत, सूर्य के सौर और विष्णु के वैष्णव कहलाते हैं।*
*इन पाँचोंमें एक ईश्वर होता है तो अन्य चार देवता होते हैं। वास्तव में ये पाँचों ईश्वरकोटिके ही हैं।*
*( ख ) साधारण देवता -* *इन्द्र, वरुण, मरुत, रुद्र, आदित्य, वसु आदि सब साधारण देवता हैं।*
*( २ ) मर्त्यदेवता -* *जो मनुष्यलोकमें*
*यज्ञ आदि करके* *स्वर्गादि लोकोंको*
*प्राप्त करते हैं, वे '* *मर्त्यदेवता ' कहलाते हैं। ये अपने पुण्योंके बलपर वहाँ रहते हैं और पुण्य क्षीण होनेपर फिर मृत्युलोक में लौट आते हैं -*
*ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं*
*क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।*
( गीता ९ । २१ )
*( ३ ) अधिष्ठातृदेवता -* सृष्टि की प्रत्येक वस्तु का एक मालिक होता है,
जिसे ' अधिष्ठातृदेवता ' कहते हैं ।
नक्षत्र, तिथि, वार, महिना, वर्ष, युग,चन्द्र, सूर्य, समुद्र, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सृष्टिकी मुख्य - मुख्य वस्तुओंके अधिष्ठातृदेवता 'आजानदेवता ' बनते हैं। और कुआँ, वृक्ष आदि साधारण वस्तुओंके अधिष्ठातृदेवता ' मर्त्यदेवता ' ( जीव )
बनते हैं।* | 1 817 |
| 6 | परम धन्य सो नर तनधारी, हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन, मध वेदांगनाम रवि उदय।
भानु उदय वैसाख गिनावै, ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै।
यम भादों आश्विन हिमरेता, कातिक होत दिवाकर नेता।
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं, पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं।
दोहा-
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहै विविध, होंहि सदा कृतकृत्य।। | 1 645 |
| 7 | ।। सूर्यदेव की स्तुति ।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन-तिमिर-निकन्दन, भक्त-हृदय-चन्दन।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
सप्त-अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।
दु:खहारी, सुखकारी, मानस-मल-हारी।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
सुर-मुनि-भूसुर-वन्दित, विमल विभवशाली।
अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
सकल-सुकर्म-प्रसविता, सविता शुभकारी।
विश्व-विलोचन मोचन, भव-बन्धन भारी।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
कमल-समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।
सेवत साहज हरत अति मनसिज-संतापा।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
नेत्र-व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा-हारी।
वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै।
हर अज्ञान-मोह सब, तत्वज्ञान दीजै।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
।। सूर्यदेव की आरती ।।
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।
जगत् के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा।
धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
सारथी अरुण हैं प्रभु तुम, श्वेत कमलधारी। तुम चार भुजाधारी।
अश्व हैं सात तुम्हारे, कोटि किरण पसारे। तुम हो देव महान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
ऊषाकाल में जब तुम, उदयाचल आते। सब तब दर्शन पाते।
फैलाते उजियारा, जागता तब जग सारा। करे सब तब गुणगान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
संध्या में भुवनेश्वर अस्ताचल जाते। गोधन तब घर आते।
गोधूलि बेला में, हर घर हर आंगन में। हो तव महिमा गान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
देव-दनुज नर-नारी, ऋषि-मुनिवर भजते, आदित्य हृदय जपते।
स्तोत्र ये मंगलकारी, इसकी है रचना न्यारी, दे नव जीवनदान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
तुम हो त्रिकाल रचयिता, तुम जग के आधार, महिमा तब अपरम्पार।
प्राणों का सिंचन करके भक्तों को अपने देते, बल, बुद्धि और ज्ञान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
भूचर जलचर खेचर, सबके हो प्राण तुम्हीं, सब जीवों के प्राण तुम्हीं।।
वेद-पुराण बखाने, धर्म सभी तुम्हें माने, तुम ही सर्वशक्तिमान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
पूजन करतीं दिशाएं, पूजे दश दिक्पाल, तुम भुवनों के प्रतिपाल।।
ऋतुएं तुम्हारी दासी, तुम शाश्वत अविनाशी, शुभकारी अंशुमान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।
जगत् के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा।।
धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान।।
।। सूर्य चालीसा ।।
दोहा-
कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग।।
चौपाई-
जय सविता जय जयति दिवाकर, सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।
भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर, विभाकर।
विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन।
अम्बरमणि, खग, रवि कहलाते, वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।
सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि, मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।
अरुण सदृश सारथी मनोहर, हांकत हय साता चढ़ि रथ पर।
मंडल की महिमा अति न्यारी, तेज रूप केरी बलिहारी।
उच्चैश्रवा सदृश हय जोते, देखि पुरन्दर लज्जित होते।
मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता, सूर्य, अर्क, खग, कलिहर, पूषा, रवि, आदित्य, नाम लै, हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै।
द्वादस नाम प्रेम सो गावैं, मस्तक बारह बार नवावै।
चार पदारथ सो जन पावै, दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै।
नमस्कार को चमत्कार यह, विधि हरिहर कौ कृपासार यह।
सेवै भानु तुमहिं मन लाई, अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।
बारह नाम उच्चारन करते, सहस जनम के पातक टरते।
उपाख्यान जो करते तवजन, रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।
छन सुत जुत परिवार बढ़तु है, प्रबलमोह को फंद कटतु है।
अर्क शीश को रक्षा करते, रवि ललाट पर नित्य बिहरते।
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत, कर्ण देश पर दिनकर छाजत।
भानु नासिका वास करहु नित, भास्कर करत सदा मुख कौ हित।
ओठ रहैं पर्जन्य हमारे, रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा, तिग्मतेजसः कांधे लोभा।
पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर, त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर।
युगल हाथ पर रक्षा कारन, भानुमान उरसर्मं सुउदरचन।
बसत नाभि आदित्य मनोहर, कटि मंह हंस, रहत मन मुदभर।
जंघा गोपति, सविता बासा, गुप्त दिवाकर करत हुलासा।
विवस्वान पद की रखवारी, बाहर बसते नित तम हारी।
सहस्रांशु, सर्वांग सम्हारै, रक्षा कवच विचित्र विचारे।
अस जोजजन अपने न माहीं, भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं।
दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै, जोजन याको मन मंह जापै।
अंधकार जग का जो हरता, नव प्रकाश से आनन्द भरता।
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही, कोटि बार मैं प्रनवौं ताही।
मन्द सदृश सुतजग में जाके, धर्मराज सम अद्भुत बांके।
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा, किया करत सुरमुनि नर सेवा।
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों, दूर हटत सो भव के भ्रम सों। | 1 546 |
| 8 | जिस पात्र में वर्षो से तेल ही रखा जाता है , ऐसे बर्तन को पाँच दस बार धोने पर वह स्वच्छ तो होगा , किन्तु तेल की वास नहीं जायेगी, अब उस बर्तन में यदि चटनी अचार रखा जायेगा तो वह बिगड़ जायेगा, हमारा मस्तिष्क भी ठीक ऐसा ही है, जिसमें कई वर्षो से कामवासना रुपी तेल रखा गया है।
बुद्धि रुपी पात्र में श्रीकृष्ण रुपी रस रखना है, मस्तिष्क रुपी बर्तन में काम का अंशमात्र भी होगा तो उसमें प्रेमरस , जमेगा ही नहीं, जब बुद्धि में परमात्मा का निवास होगा, तभी पूर्ण शान्ति मिलेगी, जब तक बुद्धि में ईश्वर का अनुभव नहीं होगा तब तक आनन्द का अनुभव नहीं हो पायेगा, संसार के विषयों का ज्ञान बुद्धि में आने पर विषय सुख रुप बनते हैं, परमात्मा को बुद्धि में रखना है, मस्तिष्क में जब ईश्वर आ बसते हैं, तभी ईश्वर स्वरुप का ज्ञान पूर्ण आनन्द देता है।
जैसे तेल के अंश से चटनी अचार बिगड़ते हैं वैसे ही बुद्धि में वासना का अंश रह जाने पर वह अस्थिर ही रहेगी,
बुद्धि को स्थिर और शुद्ध करने हेतु मन के स्वामी चंद्र और बुद्धि के स्वामी सूर्य की आराधना करनी है, त्रिकाल संध्या करने से बुद्धि शुद्ध होगी, जब तक राम नहीं आते, तब तक कृष्ण भी नहीं आते जिसके घर मे राम नहीं आते, उसका रावण (काम) नहीं मरता और जब तक कामरुपी रावण नहीं मरता तब तक श्रीकृष्ण नहीं आते, जब राम की मर्यादा का पालन किया जायेगा तभी काम मरेगा, चाहे जिस संप्रदाय में विश्वास हो , किन्तु जब तक रामचन्द्र की मर्यादा का पालन नहीं किया जायेगा तब तक आनन्द नहीं मिलेगा।
रामचन्द्र की उत्तम सेवा यही है कि उनकी मर्यादा का पालन किया जाए, उनका सा ही वर्तन रखो, रामजी का भजन करना अर्थात् उनकी मर्यादा का पालन करना, उनका वर्तन हमें जीवन में उतारना चाहिए, यदि राम जी को मन में बसाने , मर्यादा- पुरुषोत्तम रामचन्द्र का अनुकरण करने पर भगवान मिलेगें।
रामजी की लीलाएँ अनुकरणीय एवं श्रीकृष्ण की लीलाएँ चिंतनीय हैं, रामचन्द्र का मातृ प्रेम, पितृ प्रेम, बंधु प्रेम , एक पत्नी प्रेम आदि सब कुछ जीवन में उतारने योग्य है।
श्रीकृष्ण के कृत्य हमारे लिए अशक्य है, उनका कालियानाग को वश में करना, गोवर्धन उठाना आदि । रामचन्द्र ने अपना ऐश्वर्य छिपाकर मानव जीवन का नाटक किया साधक का वर्तन कैसा होना चाहिए यह रामचन्द्र जी बताया है, साधक का वर्तन रामचन्द्र जैसा होना चाहिए, सिद्ध पुरुष का वर्तन श्रीकृष्ण जैसा हो सकता है।
रघुनाथ जी का अवतार राक्षसों की हत्या के हेतु नहीं , मनुष्यों को मानव धर्म सिखाने के लिए हुआ था, वे जीवमात्र को उपदेश देते हैं, रामजी ने किसी भी मर्यादा को भंग नहीं किया, हमें भी मर्यादा का पालन करते हुए श्रीकृष्ण को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। | 936 |
| 9 | *आपको यह समझना चाहिए कि एक भक्त कभी भी किसी कर्म-फल के अधीन नहीं होता।* जो कुछ भी हो रहा है, वह कृष्ण की कृपा है। भक्त का दृष्टिकोण यही होना चाहिए। *एक बार कृष्ण के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाने पर, कर्म-फल तुरंत समाप्त हो जाते हैं; लेकिन यदि वह पुनः स्वतंत्र रूप से कार्य करता है, तो वह फिर से माया के चंगुल में फँस जाता है।* वह 'सीमांत अवस्था' (marginal state) सदैव बनी रहती है, *किंतु एक शुद्ध भक्त के लिए—जिसने वास्तव में कृष्ण के प्रति समर्पण कर दिया है—कोई कर्म-फल शेष नहीं रहता।* इसका वही उदाहरण है जैसे बिजली का पंखा बंद कर देने पर भी वह कुछ देर तक घूमता रहता है, किंतु बहुत शीघ्र ही वह पूरी तरह रुक जाता है। भक्त की स्थिति भी ठीक वैसी ही होती है। इसलिए, यदि किसी शुद्ध भक्त को किसी प्रकार के प्रतिकूल परिणाम (कष्ट) का सामना करना पड़ता है, तो वह उसे बुरा नहीं मानता। *वह जानता है कि उसके कर्मों का फल तो पहले ही समाप्त हो चुका है; अब जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह तो पंखे के बंद हो जाने के बाद भी उसकी 'अवशिष्ट गति' के समान ही है।* अतः एक शुद्ध भक्त इसे भगवान की कृपा ही मानता है, *क्योंकि भगवान 'संक्षिप्त दण्ड' के माध्यम से उसके समस्त कर्म-फलों को समाप्त कर रहे होते हैं।* | 0 |
| 10 | आख़िर खतरा किसे है किससे है और किसको है
सब लोग अपना प्रतिदिन का कार्य कर रहे हैं. कोई बच्चे खेल रहे है. कुछ किसान हाथ में कुदाल लेकर खेत की तरफ जा रहे हैं. कुछ ऑफिस जा रहे हैं कुछ बच्चे स्कूल जाने की तैयारी भी कर रहे हैं औरतें जल्दी-जल्दी घर की काम कर रही है लगता है आज भी देरी होगी कुछ को अपने गंतव्य
तक जाने में तभी दिखता है कि जो लोग गाँव से बाहर थे अचानक वे भस्म हो गए आसमान के एक दिशा से अंधेरा पैर पसारने लगा लेकिन कैसे अभी तो सुबह थी क्या सूर्य ग्रहण लग रहा है नहीं एक व्यक्ति ने कहा शायद कोई बड़ी शिप आ रही है क्या इसमें दूसरे ग्रह के जीव है पता नहीं लेकिन लोगों को पता चल चुका है कि खतरा सामने से आ चुका है अब सब लोग जिसे जब पता चला वे तेजी से दूसरी दिशा में भाग रहे है. सब एक दूसरे को पीछे छोड़ना चाहते है. भागते-भागते ये उस शिप को शायद पीछे छोड़ दिए पीछे मुड़कर देखे दिखा नहीं शायद काफी पीछे छूट गया है या शायद धुएँ और धूल ने उसे ढँक लिया है जो भी हो, मौत का साया पल भर के लिए टल गया है इसलिए ये भी अब अपने कदम थोड़े धीमे कर दिए कुछ लोग घुटनों पर हाथ रखकर लंबी-लंबी और खुरदरी साँसें खींचने लगे। पसीने और धूल से उनके चेहरे सन गए हैं उस पल, जब वे सिर्फ जिंदा बचने की राहत महसूस कर रहे हैं
तब इनके पीछे-पीछे वो भी आ रहे थे कैसे आ रहे हैं किस दिशा से आ सकते हैं. यह किसी को अभी नहीं पता है लेकिन फिर भी अब ये बात करते हुए धीरे धीरे चल रहे हैं
चलते चलते ये अपने आस-पास की चीजें अपनी सूखी आँखों से देखते हैं आस पास कचरे के ढेर लदे हुए हैं उनसे धुंआ निकाल रहा है तभी उनकी नज़र उस चीज़ पर पड़ती है जिसे वे हमेशा से जानते थे, लेकिन आज वह एक अलग ही भयानक रूप में उनके सामने है
गंगा।
वह नदी जिसे कभी जीवनदायिनी कहा जाता
था आज वह किसी दूसरे रूप में ही है गंगा का पानी एक बड़ी नहर के रूप में बह रहा है जिसका जल काला तेल के समान गाढ़ा भूरा है बहने की गति भी कम है इतना गाढ़ा है कि इसमें अब कोई तैर भी नहीं सकता है तेल जैसे उस पानी में एक पक्षी फंसा हुआ है वह डूब भी नहीं पा रहा है क्योंकि पानी इतना गाढ़ा था कि उसने उसे वहीं जमा दिया है इसकी तुलना अब दल-दल से हो रही है क्योंकि इसमें हाथ पैर चलाना असंभव है जिधर देखा जाए उधर ही कचरा है बड़ी-बड़ी गाड़ियां और टूटे हुए हेलीकॉप्टर बड़े-बड़े ठेला गाड़ियाँ कचरे को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रही हैं, लेकिन इससे क्या ही हो जाएगा सब जगह कचरा ही फैला हुआ है ऐसा लग रहा है जैसे यह कचरे यात्री है जिसे यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ पहुँचाया जा रहा है लेकिन फिर भी कहीं नहीं पहुँच रहे हैं जाएंगे भी कहाँ रहेंगे तो यहीं पर ही ना हम और कचरा दोनों ही।। | 0 |
| 11 | "क्रिटिकल थिंकिंग क्या है?"
दो व्यक्ति हैं. एक वह है जो दूसरे द्वारा कही गई बातों को बिना किसी नापतोल के स्वीकार कर लेता है लेकिन ऐसा नहीं है कि यह किसी की भी बात मान लेगा यह वही बात स्वीकार करता है जो इसके कबीले के लोगों द्वारा बताई जाए या फिर यह व्यक्ति जिस किसी को भी एक अथोरिटी स्टेटस पर रखा होता है उसकी सभी बात को बिना सोचे प्रश्न पूछे स्वीकार कर लेता है ऐसा नहीं है कि यह सोच समझ नहीं सकता है लेकिन यह इन जगहों पर इसका उपयोग नहीं करता है दूसरी तरफ है वह दूसरा व्यक्ति जो सभी बातों को जब तक अपनी कसौटी पर न कस ले जब तक उन बातों को साबित करने वाले डाटा या आथेंटिक सबूत जो एक विश्वसनीय स्रोत से आते हों उनको अध्ययन करके किसी नतीजे पर पहुंचता है अन्यथा तब तक वह यह प्रश्न करता रहता है जब तक वह उस चीज के जड़ तक न जाए यह एक-एक वाक्य को समझने के लिए इम्पीरिकल सबूत ढूढता है तब जाकर वह वाक्य इसके मस्तिष्क (BRAIN) का हिस्सा बनता है कहने का मतलब यह है कि जब हम किसी सत्य तक पहुँचने के लिए एक SYSTEMATIC WAY में जाते हैं या समस्या निवारण (PROBLEME SOLVING) तरीका (APPROACH) रखते हैं
यहीं क्रिटिकल थिंकिंग है ।
असल में क्रिटिकल थिंकिंग केवल दूसरों की बातों पर संदेह करना नहीं है; यह "स्वयं के विचारों पर निर्मम प्रहार" करना है। जिससे कम से कम bias होकर थिंकिंग करना होता है। | 0 |
| 12 | मन्त्र के आठ दोष
मन्त्र के बारे में लोगों में बहुत भ्रान्ति है, अगर किसी को समजाया जाए की मन्त्र करने के यह विधि निषेध है तो लोग सामने से ज्ञान देते है की भगवन की भक्ति में दोष कैसा? उसका उत्तर है आप भगवन्नाम का कीर्तन करो वो भक्ति मार्ग है, उसमे कोई बाधा नहीं कोई मात्रा छंद बिज आदि का बंधन नहीं। भक्ति आनंद स्वरूप है।
मन्त्र उपासना मार्ग है, और मन्त्र केवल गुरु से प्राप्त हो वही फलीभूत होता है, उपासना मार्ग के विधिनिषेध, बहुत सारे यम नियम है जिनका पालन न किया जाए तो मंत्र विपरीत असर करता है, कई लोग प्रश्न करते है हम यह देवी वो देवता का मंत्र करते है पर वह फलीभूत नहीं होता उसके कुछ दोष नीचे दिए गए है।
(1) अभक्ति दोष 👉 मन्त्र को अक्षर एवं वर्णों की समष्टि मात्र समझना अभक्ति दोष है ।
(2) अक्षरभ्रान्ति दोष 👉 मन्त्राक्षरों में उलट-फेर या एकाध अक्षर बढ़ जाना अक्षरभ्रान्ति दोष है ।
(3) लुप्त दोष 👉 मन्त्राक्षरों में किसी वर्ण की न्यूनता हो जाना लुप्त दोष है ।
(4) ह्रस्व दोष 👉 मन्त्र में किसी दीर्घ वर्ण का ह्रस्व हो जाना ह्रस्व दोष है ।
(5) दीर्घ दोष 👉 ह्रस्व वर्ण के स्थान में दीर्घ वर्ण कर देना दीर्घ दोष है ।
(6) कथन दोष 👉 जाग्रत् अवस्था में अपना मन्त्र किसी से कह देना कथन दोष है ।
(7) छिन्न दोष 👉 संयुक्त वर्णों में से किसी वर्ण का छूट जाना छिन्न दोष है ।
(8) स्वप्नकथन दोष 👉 स्वप्न में अपना मन्त्र किसी को बता देना स्वप्नकथन दोष होता है।
मन्त्र के एक-एक अक्षर के उच्चारण में परमानन्द का अनुभव करते हुए उसका जप करने से शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है, क्योंकि – 'संविदेव मन्त्र: ' अर्थात् मन्त्र संवित् तत्त्व है ।
याद रहें मंत्र तारक भी है और मारक भी है। जो विधिनिषेध यम नियम पालन नहीं कर सकते उनके लिए भगवन्नाम कीर्तन ही तारक है, उनके लिए भक्तिमार्ग ही उत्तम है। | 0 |
| 13 | कहानी का समय
गृहस्थ
बूढी मां और लाचार बाप को बिलखता छोड़ कर एक व्यक्ति साधु बनकर तपस्या करने के लिए वन में चला गया। तप करने के बाद जब साधु उठा तो देखा कि एक कौवा अपनी चोंच में एक चिड़िया का बच्चा दबाकर उड़ रहा है।
ऋषि ने क्रोध से कौवे की ओर देखा और उसकी आंखों से अग्नि की ज्वाला टूट पड़ी जिससे कौवा जलकर वहीं भस्म हो गया।
अपनी इस सिद्धि को देखकर वह फूला नहीं समाया और अहंकार से भरा हुआ वह मठ की ओर चला रास्ते में वह एक दरवाजे पर जाकर भिक्षा के लिए खड़ा हुआ।उनके बार-बार पुकारने पर कोई बाहर नहीं आया तो साधु क्रोधित हो गया।
उन्होंने फिर पुकारा, पर इस बार आवाज आई, स्वामी जी ठहरिए, मैं अभी साधना कर रही हूँ जब साधना पूरी हो जाएगी तब मैं आपको भिक्षा दे दूँगी अब साधु के क्रोध की सीमा पार हो गई।
ऋषि क्रोध में आकर बोले, दुष्टा! तुम साधना कर रही हो या एक साधु का अपमान कर रही हो ; जानती नहीं कि इस अवहेलना का परिणाम क्या हो सकता है।
भीतर से उत्तर आया, मैं जानती हूँ आप श्राप देना चाहेंगे किंतु मैं कोई कौवा नहीं जो आपके प्रकोप से जलकर नष्ट हो जाऊँगी।
जिसने जीवन भर पाला है मैं उस माँ को छोड़ कर तुम्हें भिक्षा कैसे दे सकती हूँ साधु का सिद्धि का अहंकार चूर-चूर हो गया कुछ देर बाद वह महिला बाहर आई तो ने आश्चर्य पूर्वक महिला से पूछा आप कौन सी साधना करती हैं जिससे तुम मेरे बारे में सब कुछ जानती हो।
उस महिला ने कहा, महात्मन, मैं अपने पति, बच्चे, परिवार और समाज के प्रति कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करती हूँ यही मेरी सिद्धि है..!! इसीलिए सभी प्रकार के आश्रमों में गृहस्थ आश्रम सर्वोपरि माना जाता है। | 0 |
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