✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें। ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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*श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026*
2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी।
इस दिन जन्माष्टमी व्रत रखा जाएगा और भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव निशीथ काल यानी मध्यरात्रि में किया जाएगा।
2026 की मुख्य तिथियां
जन्माष्टमी: शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
अष्टमी तिथि प्रारंभ: 3 सितंबर शाम लगभग 4:55 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त: 4 सितंबर दोपहर लगभग 2:43 बजे
रोहिणी नक्षत्र: 3 सितंबर दोपहर लगभग 2:59 बजे से 4 सितंबर दोपहर लगभग 1:34 बजे तक
निशीथ पूजा: 4 सितंबर रात 11:57 बजे से 5 सितंबर रात 12:43 बजे तक
कई परंपराओं में व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है; पारण की विधि/समय के अनुसार अंतर हो सकता है।
*जन्माष्टमी पर 15 साल बाद बनेगा अष्टमी-रोहिणी का संयोग*
इस दिन अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है, जिसे करीब 15 साल बाद होने वाला बताया जा रहा है। *धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म भी इसी संयोग में हुआ था।*
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जन्माष्टमी की पूजा कैसे करें?
1. प्रातःकाल
स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान की सफाई करें और श्रीकृष्ण की बाल-स्वरूप प्रतिमा स्थापित करें या पहले से ही मंदिर में उपस्थित भगवान कृष्ण या लक्ष्मीनारायण हों तो उनकी ही पूजा अर्चना कर सकते हैं
2. व्रत का संकल्प
पूर्व दिशा की ओर मुख करके जल हाथ में लेकर संकल्प करें:
“ॐ विष्णवे नमः।
अद्य श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये।
श्रीकृष्णप्रीत्यर्थं मम सर्वपापक्षयपूर्वकं
सर्वसौभाग्य-आरोग्य-धन-धान्य-पुत्र-पौत्रादि
समृद्ध्यर्थं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतं करिष्ये।”
फिर जल छोड़ दें।
3. दिनभर भगवान का स्मरण
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
संभव हो तो दिनभर सात्त्विक रहें और कृष्ण जन्म की कथा, भागवत या श्रीकृष्ण के भजन स्वयं पाठ करें या गाएं।
4. रात में जन्मोत्सव की तैयारी
पूजा के लिए रखें:
बाल कृष्ण प्रतिमा
पंचामृत ,दूध,दही,घी,शहद
गंगाजल/शुद्ध जल,तुलसी दल,माखन-मिश्री,फल,पंजीरी,चंदन,रोली/अक्षत,पीले वस्त्र,फूल,धूप-दीप,नैवेद्य
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🕉️ मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण की पूजा
निशीथ काल में सबसे पहले भगवान का पंचामृत अभिषेक करें।
अभिषेक करते समय:
“ॐ कृष्णाय नमः।”
फिर दूध, दही, घी, शहद और अंत में शुद्ध जल से स्नान कराएं।
इसके बाद भगवान को पीले वस्त्र पहनाएं।
चंदन, अक्षत, फूल और तुलसी अर्पित करें।
विशेष मंत्र
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।”
कम से कम 108 बार जाप करना बहुत अच्छा माना जाता है।
फिर माखन-मिश्री, फल, पंजीरी आदि का भोग लगाएं।
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🪔 जन्मोत्सव के समय क्या करें?
रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाएं।
घंटी और शंख बजाएं।
“नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” बोलते हुए जन्मोत्सव करें।
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला,
कौसल्या हितकारी ।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी,
अद्भुत रूप बिचारी ॥
लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा,
निज आयुध भुजचारी ।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला,
सोभासिंधु खरारी ॥
कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी,
केहि बिधि करूं अनंता ।
माया गुन ग्यानातीत अमाना,
वेद पुरान भनंता ॥
करुना सुख सागर, सब गुन आगर,
जेहि गावहिं श्रुति संता ।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी,
भयउ प्रगट श्रीकंता ॥
ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया,
रोम रोम प्रति बेद कहै ।
मम उर सो बासी, यह उपहासी,
सुनत धीर मति थिर न रहै ॥
उपजा जब ग्याना, प्रभु मुसुकाना,
चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै ।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई,
जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥
माता पुनि बोली, सो मति डोली,
तजहु तात यह रूपा ।
कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला,
यह सुख परम अनूपा ॥
सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना,
होइ बालक सुरभूपा ।
यह चरित जे गावहिं, हरिपद पावहिं,
ते न परहिं भवकूपा ॥
बिप्र धेनु सुर संत हित,
लीन्ह मनुज अवतार ।
निज इच्छा निर्मित तनु,
माया गुन गो पार ॥
फिर आरती करें।
इसके बाद श्रीकृष्ण की आरती करके प्रसाद वितरित करें।
व्रत में क्या खाएं?
यदि निर्जल व्रत संभव न हो तो फलाहार किया जा सकता है।
फलाहार में सामान्यतः:
फल,दूध,दही,मखाना,सिंघाड़े का आटा,साबूदाना,आलू,शकरकंद
मूंगफली
सेंधा नमक लिया जाता है।
अनाज और सामान्य नमक से बचना चाहिए।
जन्माष्टमी की रात भगवान श्रीकृष्ण के सामने 11 या 108 बार:
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
जन्माष्टमी के कर्म संक्षेप में
भक्ति और श्रद्धा से
श्रीकृष्ण का नाम-जप
गीता का पाठ
मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और आरती
आप सभी पर भगवान श्रीकृष्ण की कृपा बनी रहे।।
| 2 | गणेश चतुर्थी अर्घ्य देने का समय
आज रात को 8:05 PM पर चंद्रोदय है इसके बाद अर्घ्य दे सकते हैं। | 526 |
| 3 | रक्षाबंधन 2026: तिथि, महत्व और शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, श्रावण पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 27 अगस्त 2026 को सुबह 09 बजकर 08 मिनट पर हो जाएगी। इस तिथि का समापन अगले दिन यानी शुक्रवार 28 अगस्त 2026 को सुबह 09 बजकर 48 मिनट पर होगा। शास्त्रों में उदयातिथि का विशेष महत्व माना जाता है, जिसके अनुसार 28 अगस्त को सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी। इसी कारण से 28 अगस्त को ही मुख्य रूप से रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा रहा है।
*मुख्य (अमृत) शुभ मुहूर्त:*
प्रातः सूर्योदय के बाद सुबह 09 बजकर 05 मिनट तक।
दोपहर का वैकल्पिक मुहूर्त (अभिजीत मुहूर्त):*
दोपहर 12 बजकर 25 मिनट से दोपहर 1 बजे तक।
अपराह्न काल मुहूर्त (वैकल्पिक):
दोपहर 01 बजकर 52 मिनट से शाम 04 बजकर 35 मिनट तक।
वर्जित समय (राहुकाल)
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, राहुकाल में कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित होता है। *28 अगस्त 2026 को सुबह 10 बजकर 46 मिनट से दोपहर 12 बजकर 22 मिनट तक राहुकाल रहेगा।*बहनों को सलाह दी जाती है कि वे इस समयावधि में अपने भाइयों को राखी बांधने से बचें।*
रक्षाबंधन के बाद भूल कर भी राखी को इधर-उधर नहीं फेंकना चाहिए. रक्षाबंधन के बाद राखी को कम से कम एक महीना तक यानी सावन पूर्णिमा से लेकर भादो पूर्णिमा तक रखना चाहिए. अगर आप 1 महीने तक नहीं रख सकते हैं तो राखी को अच्छी तरह से खोलकर जल में प्रवाहित कर देंगे या पूजा स्थल में रख दें. वैसे तो इस राखी को विजयादशमी के दिन ही खोलना चाहिए. अगर बीच में राखी खंडित हो जाती है तो उसे किसी लाल कपड़े में बांधकर रख लें और पूर्णिमा के दिन जल में प्रवाहित कर दें | 758 |
| 4 | "ईश्वर" का ध्यान केवल किसी छवि के रूप में ही नहीं होता, वरन उसे भावरूप से भी भजा जाता है।* उच्च भावनाएँ स्पष्टतः ईश्वरीय स्थिति की प्रतीति है। *जितनी देर मन में सद्भावनाएँ उठती रहें, उतनी देर अंतःकरण में ईश्वर की प्रत्यक्ष उपस्थिति ही मानी जाएगी।* इसलिए अध्यात्म ग्रंथों में स्वास्थ्य, आत्म-निर्माण एवं लोकमंगल की भावना-आकांक्षाओं में, योजनाओं में तन्मय रहना भी ईश्वर उपासना का एक प्रकार माना गया है। *अतः भजन-पूजन आदि का दैनिक नित्य कर्म हर आस्तिक व्यक्ति को करना ही चाहिए ताकि निरंतर प्रभु का स्मरण एवं सान्निध्य लाभ होता रहे। पर साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ईश्वर भक्ति हमारे जीवन में "उत्कृष्टता" एवं "आदर्शवादिता" की गतिविधियों के रूप में भी परिलक्षित हो।* उपासना को साधना के रूप में परिणत होना चाहिए। *"उपासना" एक नियत समय पर नियत विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चन की प्रक्रिया पूर्ण करने को कहते हैं।* इसकी वास्तविकता-अवास्तविता की कसौटी यह है कि वह भावना जीवन क्रम में समाविष्ट होकर साधना बनी या नहीं। *जीवन को "उत्कृष्ट" बनाने की साधना में संलग्न व्यक्ति ही "सफल उपासक" कहा जा सकता है।* ईश्वर महान है। उसका सान्निध्य लाभ करने वाला तुच्छ, घृणित एवं निकृष्ट, स्वार्थी, विषयी एवं संकीर्ण रह ही नहीं सकता। *जो ईश्वर विश्वासी होते हुए भी गुण, कर्म, स्वभाव की, चरित्र एवं व्यवहार दृष्टि से निकृष्ट है, समझना चाहिए कि उसे अभी ईश्वर भक्ति का सच्चा मार्ग नहीं मिला।* अग्नि की समीपता गरमी प्रदान करती ईश्वर की समीपता व्यक्ति को उत्कृष्ट दृष्टिकोण अपनाने के लिए विवश करती है। *हमारी उपासना सच्ची होगी तो यह प्रभाव पग-पग पर लक्षित होगा।* | 776 |
| 5 | निर्जला एकादशी तिथि और पारण का समय
एकादशी तिथि प्रारंभ: बुधवार, 24 जून 2026 (शाम 06:12 बजे)
एकादशी तिथि समाप्त: गुरुवार, 25 जून 2026 (रात 08:09 बजे)
व्रत पारण का समय: शुक्रवार, 26 जून 2026 (सूर्योदय 05:13 बजे से 08:25 बजे के बीच) | 1 347 |
| 6 | कोचिंग संस्थानों से संबंधित पिछले दिनों से जो भी रहा है उसके पीछे की कहानी समझने के लिए आप सब एक वेब सीरीज Jamnapaar Season 2 देखिए। | 1 575 |
| 7 | मीडिया बनाम अध्यापक
हाल ही में एक महिला रिपोर्टर ने ऑनलाइन अध्यापकों को जोकर बोल दिया जिन्हें कुछ नहीं आता है बस ढोंग करते रहते हैं उसके बाद एक से बढकर एक अध्यापकों ने भी उनकी आलोचना की।" ऐसे में हमें यह समझने का प्रयास करना चाहिए की आखिर यह सब ऐसा क्यों हो रहा है?
इस समय देश की जो स्थिति उस मुद्दे से भटकाना क्योंकि सामान्यत: न्यूज रिपोर्टर सक्रिय रूप से इसकी शुरुआत नहीं करते हैं वे बस किसी असामान्य घटना का प्रतीक्षा करते हैं जैसे ही वह होता है वह देश का मुद्दा बन जाता है क्योंकि सब उसके बारे में ही बात करने लगते हैं अगर दूसरे तरफ से अगर देखा जाए तो सच में मीडिया का काम है कोई भी समस्या का उजागर करना जो सबके ध्यान में नहीं है और देखा जाए तो जो इन्टरनेट पर इतना हल्ला मचा हुआ है
"इनकी सत्यनिष्ठा को लेकर वह भारत के घरों में इतना फैला हुआ नहीं लेकिन विद्यालय व शिक्षकों की फीस लेकर भारत के घर-घर के अभिभावक अवगत भी हैं और चिन्तित भी तो मुद्दा तो उठ गया सो कुछ हद तक सही भी है क्योंकि वर्तमान ऑनलाइन शिक्षा जगत का एक कड़वा सच यह है कि कई शिक्षक अब केवल 'शिक्षक' नहीं रहे, वे 'इन्फ्लुएंसर' और 'एंटरटेनर' बन चुके हैं व्यूज के लिए कक्षाओं में अनावश्यक शायरी और मेलोड्रामा करते हैं इससे हममें ज्यादातर लोग शायद अवगत हों
लेकिन सभी अध्यापकों को इसमें लपेटना सही नहीं है क्योंकि कुछ है जो सही काम कर रहे हैं और इस तरह की रिपोर्टिंग करते समय अच्छे से रिसर्च करना पड़ता है तरह-तरह के तथ्य इकठ्ठा होते है उसमें फिर बेकार की चीजों को हटा दिया जाता है और बेस्ट सबूतों को पेश करते हैं और रिपोर्टिंग करते समय जो अच्छे अध्यापक है और जो गलत कर रहें हैं उनमें से कुछ की तस्वीरें व नाम दिखाना चाहिए जिससे यह समझ में आए की बात किसके बारे में है और उसे किस तरह लेना है पता चले ऐसे नहीं की माइक पकड़ा और कुछ भी बोल दिया अन्ततः अध्यापकों को भी इन उथली बातों से कोई फर्क
"नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि जब आपको पता है कि सामने वाला गलत है और आपकी नजर में जब उसका मूल्य ही शून्य है फिर इसमें क्यों पड़ना और दूसरी तरफ बच्चे भी हैं वह भी वैसे ही हैं क्योंकि इनमें से ज्यादातर अब अध्ययन नहीं करने आते हैं वह भी ऐसे ही शिक्षा के बजाय 'ड्रामा' का उपभोक्ता बन गए हैं। आप कुछ पढ़ना चाहते हैं पढ़िए बेकार की चीजों में क्यों उलझना "जवाबी वीडियो बनाइए सर उसने आपके बारे में ऐसा कहा" अब अध्यापक भी क्या करे करता है कि वह रिप्लाई कर देता है क्योंकि उसे भी पता है कि इन्हीं सब वीडियोज़ पर ही ज्यादा लोग देखने आएंगे लेकिन यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि जो भी ऐसा करते हैं उनमें से अधिकांश शिक्षक केवल व्यूज और पैसे के लिए विवादों में कूद रहे हैं, और जवाबी सामग्री दे रहे हैं तो वे मीडिया से अलग कैसे हुए? मीडिया भी तो टीआरपी (TRP) के लिए यही कर रहा है
यह शिक्षा के पूर्ण 'बाजारीकरण' का परिणाम है। जब शिक्षा एक उत्पाद बन जाती है, तो उसे अधिकतम लोगों तक पहुंचाने के लिए विवाद सबसे सस्ता route होता है।
तो इसमें किसी एक की ही पूर्ण है कहना गलत होगा
अतः मीडिया और शिक्षक, दोनों को अपनी गरिमा और जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए क्योंकि दोनों ही देश की गरिमा का अभिन्न हिस्सा हैं
आज के लिए इतना ही। | 1 678 |
| 8 | UPSC की अप्रत्याशितता
आज एक नए विषय पर बात करते हैं। आप सब को पता ही होगा कि कल UPSC के Prelims का पेपर था और हर साल की तरह इस साल भी पेपर Unexpected था क्योंकि सब समझते हैं कि इस पेपर का पैटर्न है पर असल में कोई पैटर्न ही नहीं है। और दूसरी बात यह है कि मैं हमेशा से सोचता रहा हूँ कि इन परीक्षाओं में सवाल कहाँ से और किस प्रकार के आने चाहिए इसकी कोई Accountability ही नहीं है मतलब पूरी आज़ादी है कहीं से भी प्रश्न उठाने के लिए लेकिन वास्तव में कोई भी सभी दिशाओं का गहन अध्ययन और उनके सूक्ष्म तथ्यों को याद नहीं कर सकता है।
अगर इतिहास में जाएं और खोजें कि आखिर परीक्षाएं ऐसी बनायी ही क्यों जाती हैं जिसे ज्यादातर लोग पास ही नहीं कर पाएंगे तो जरूरत क्या है इसकी सबसे पहले इसे समझते हैं। भारत में नालन्दा विश्वविद्यालय में भी इसी प्रकार की entrance exam होता है जिसका विवरण विदेशी यात्रियों के कृतियों और उनके संवादों में देखने को मिलता है। (भारत में शायद उपलब्ध नहीं क्योंकि विदेशी आतताइयों द्वारा ज्यादातर पुस्तकें नष्ट कर दी गई हैं) पूरी परीक्षा ही संस्कृत भाषा में थी तो सबसे पहले इसमें उपस्थित होने के लिए संस्कृत भाषा का ही गहन अध्ययन करना पड़ता था उसके बाद उस समय से सम्बन्धित विषय जैसे दर्शन ज्ञान विज्ञान पर आधारित प्रश्न होते थे।
दूसरी तरफ अगर हम देखें तो जो योग या तांत्रिक विद्यालय भी जो थे वे भी प्रारम्भ में ही क्लिष्ट साधनाएँ, तप, यातनाएँ और योगाभ्यास करवाते थे ताकि जो गम्भीर नहीं है पहले दिन या महीने में भाग जाए और इन्हीं का प्रसिद्धि भी बहुत होती थी कि वे हैं एक गुरु जिन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में 10 साधकों को ही उनके साध्य तक पहुँचाया क्योंकि यही वीर थे जो वहाँ टिक पाए नहीं तो यह गणना और भी कम होती इसीलिए यही चीज इस पेपर पर भी लागू करते हैं लेकिन
ये यह समझ नहीं पाते हैं कि अत्यधिक कठोरता से निकले हुए अधिकारी अक्सर जनता के प्रति असंवेदनशील और तानाशाह बन जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्होंने यह पद अत्यंत कष्ट सहकर "जीता" है, वे बहुत महान हैं इसलिए वे अब जनता के सेवक नहीं, बल्कि शासक हैं।
तो अब हम यहाँ यह तो समझ गए कि यह ऐसा क्यों है तो इसका उपाय क्या है और सुझाव क्या हो सकते हैं।
इससे पहले कि हम आगे बढ़े यह समझ ले कि आखिर इसकी कमियां क्या है
देखो कठिन पेपर बनाना अलग बात है और लेंदी पेपर बनाना (इस बार ऐसा ही बना है) दूसरी बात है क्योंकि कई गरीब परिवार के बच्चे भी इसकी तैयारी करते हैं तो उनके साथ उचित न्याय नहीं हो पाता है यह अच्छी बात है कि हमें गुणवत्ता से समझौता नहीं करना चाहिए लेकिन उसकी सीमाएं तो हो कुछ क्योंकि सिलेब्स में कुछ दिया गया है पूछ कुछ रहे हैं ऐसे कैसे चलेगा क्योंकि हम सोच भी नहीं सकते कि जिनका पेपर था उनकी मानसिक दशा क्या होगी
उपाय क्या है
हमें सवाल जवाब करते रहने चाहिए डिबेट करनी चाहिए जिससे इनकी जवाबदेही बढ़े नहीं तो बार बार इसी तरह की गलतियां दोहराई जाती रहेंगी स्टूडेंट्स के लिए है कि या तो आप इस रेस को छोड़ दें या फिर
टिके रहें क्योंकि चाहे साधनाएँ हो या परीक्षाएं हो या कुछ भी छोड़ने पर उस दिशा में गति रूक जाती है और दूसरी दिशा में शून्य से start करना पड़ता है और रही बात अटेम्प्ट की तो क्या आप सब जानते हैं कि भारत के ही वायुसेना विभाग में Qualify करने के लिए एक CPSS Test होता है और इसका भी एक Rule है कि जीवनभर में केवल एक ही Attempt मिलता है अगर इसमें fail हुए तो फिर भारत के सभी वायु विभाग में विमान उड़ाने के लिए आप Disqualified हो गए क्योंकि यह दूसरा मौका भी नहीं देता है। तो जो बात है सो है
सुधार यह कर सकत हैं कि विश्लेषणात्मक और critical प्रश्नों की ओर ही ज्यादा से ज्यादा रहना चाहिए क्योंकि हमें प्रशासनिक अधिकारी चाहिए रट्टू तोता नहीं
और स्टूडेंट्स को भी इस तरह के अप्रत्याशित exam पेपर के लिए स्वयं को तैयार रखना चाहिए।
तो बस आज के लिए इतना ही।। | 1 490 |
| 9 | *🛕आने वाले पर्व त्यौहार*
20 May अधिक विनायक चतुर्थी
21 May अधिक स्कन्द षष्ठी
23 May अधिक मासिक दुर्गाष्टमी
25 May गंगा दशहरा
27 May पद्मिनी एकादशी
28 May अधिक प्रदोष व्रत व अग्नि नक्षत्रम समाप्त
29 May ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा व अंवाधान | 1 480 |
| 10 | ।। राम-राम ।।
*देवता कौन ?* *तथा देवता कितने प्रकार के होते हैं ?*
*मनुष्योंके पृथ्वीतत्त्वप्रधान शरीरोंकी अपेक्षा देवताओंके शरीर तेजस्तत्त्वप्रधान, दिव्य और शुद्ध होते हैं। मनुष्योंके शरीरोंसे मल, मूत्र, पसीना आदि पैदा होते हैं। अतः जैसे हम लोगोंको मैलेसे भरे हुए सूअरसे दुर्गन्ध आती है, ऐसे ही देवताओंको हमारे ( मनुष्योंके ) शरीरोंसे दुर्गन्ध आती है।*
*देवताओंके शरीरोंसे सुगन्ध आती है । उनके शरीरोंकी छाया नहीं पड़ती। उनकी पलकें नहीं गिरतीं।*
*वे एक क्षणमें बहुत दूर जा सकते हैं और जहाँ चाहें, वहाँ प्रकट हो सकते हैं। इस दिव्यता के कारण ही उनको देवता कहते हैं।*
*बारह आदित्य, आठ वसु , ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार - ये तैंतीस कोटि ( तैंतीस प्रकार के ) देवता सम्पूर्ण देवताओंमें मुख्य माने जाते हैं।उनके सिवाय मरुद्गण, अप्सराएँ आदि भी देवलोकवासी होने से देवता कहलाते हैं।*
*देवता तीन तरह के होते हैं -*
*( १ )* *आजानदेवता - जो महासर्गसे महाप्रलयतक*
*( एक कल्प तक ) देवलोकमें रहते हैं, वे ' आजानदेवता ' कहलाते हैं।*
*ये देवलोकके बड़े अधिकारी होते हैं।*
*उनके भी दो भेद होते हैं -*
*( क ) ईश्वरकोटिके देवता -* *शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य और विष्णु - ये पाँचों ईश्वर भी हैं और देवता भी।*
*इन पाँचोंके अलग- अलग सम्प्रदाय चलते हैं। शिवजी के शैव, शक्ति के शाक्त,* *गणपति के गाणपत, सूर्य के सौर और विष्णु के वैष्णव कहलाते हैं।*
*इन पाँचोंमें एक ईश्वर होता है तो अन्य चार देवता होते हैं। वास्तव में ये पाँचों ईश्वरकोटिके ही हैं।*
*( ख ) साधारण देवता -* *इन्द्र, वरुण, मरुत, रुद्र, आदित्य, वसु आदि सब साधारण देवता हैं।*
*( २ ) मर्त्यदेवता -* *जो मनुष्यलोकमें*
*यज्ञ आदि करके* *स्वर्गादि लोकोंको*
*प्राप्त करते हैं, वे '* *मर्त्यदेवता ' कहलाते हैं। ये अपने पुण्योंके बलपर वहाँ रहते हैं और पुण्य क्षीण होनेपर फिर मृत्युलोक में लौट आते हैं -*
*ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं*
*क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।*
( गीता ९ । २१ )
*( ३ ) अधिष्ठातृदेवता -* सृष्टि की प्रत्येक वस्तु का एक मालिक होता है,
जिसे ' अधिष्ठातृदेवता ' कहते हैं ।
नक्षत्र, तिथि, वार, महिना, वर्ष, युग,चन्द्र, सूर्य, समुद्र, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सृष्टिकी मुख्य - मुख्य वस्तुओंके अधिष्ठातृदेवता 'आजानदेवता ' बनते हैं। और कुआँ, वृक्ष आदि साधारण वस्तुओंके अधिष्ठातृदेवता ' मर्त्यदेवता ' ( जीव )
बनते हैं।* | 1 817 |
| 11 | परम धन्य सो नर तनधारी, हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन, मध वेदांगनाम रवि उदय।
भानु उदय वैसाख गिनावै, ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै।
यम भादों आश्विन हिमरेता, कातिक होत दिवाकर नेता।
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं, पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं।
दोहा-
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहै विविध, होंहि सदा कृतकृत्य।। | 1 645 |
| 12 | ।। सूर्यदेव की स्तुति ।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन-तिमिर-निकन्दन, भक्त-हृदय-चन्दन।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
सप्त-अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।
दु:खहारी, सुखकारी, मानस-मल-हारी।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
सुर-मुनि-भूसुर-वन्दित, विमल विभवशाली।
अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
सकल-सुकर्म-प्रसविता, सविता शुभकारी।
विश्व-विलोचन मोचन, भव-बन्धन भारी।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
कमल-समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।
सेवत साहज हरत अति मनसिज-संतापा।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
नेत्र-व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा-हारी।
वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै।
हर अज्ञान-मोह सब, तत्वज्ञान दीजै।।
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन।।
।। सूर्यदेव की आरती ।।
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।
जगत् के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा।
धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
सारथी अरुण हैं प्रभु तुम, श्वेत कमलधारी। तुम चार भुजाधारी।
अश्व हैं सात तुम्हारे, कोटि किरण पसारे। तुम हो देव महान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
ऊषाकाल में जब तुम, उदयाचल आते। सब तब दर्शन पाते।
फैलाते उजियारा, जागता तब जग सारा। करे सब तब गुणगान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
संध्या में भुवनेश्वर अस्ताचल जाते। गोधन तब घर आते।
गोधूलि बेला में, हर घर हर आंगन में। हो तव महिमा गान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
देव-दनुज नर-नारी, ऋषि-मुनिवर भजते, आदित्य हृदय जपते।
स्तोत्र ये मंगलकारी, इसकी है रचना न्यारी, दे नव जीवनदान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
तुम हो त्रिकाल रचयिता, तुम जग के आधार, महिमा तब अपरम्पार।
प्राणों का सिंचन करके भक्तों को अपने देते, बल, बुद्धि और ज्ञान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
भूचर जलचर खेचर, सबके हो प्राण तुम्हीं, सब जीवों के प्राण तुम्हीं।।
वेद-पुराण बखाने, धर्म सभी तुम्हें माने, तुम ही सर्वशक्तिमान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
पूजन करतीं दिशाएं, पूजे दश दिक्पाल, तुम भुवनों के प्रतिपाल।।
ऋतुएं तुम्हारी दासी, तुम शाश्वत अविनाशी, शुभकारी अंशुमान।।
ॐ जय सूर्य भगवान...।।
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।
जगत् के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा।।
धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान।।
।। सूर्य चालीसा ।।
दोहा-
कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग।।
चौपाई-
जय सविता जय जयति दिवाकर, सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।
भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर, विभाकर।
विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन।
अम्बरमणि, खग, रवि कहलाते, वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।
सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि, मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।
अरुण सदृश सारथी मनोहर, हांकत हय साता चढ़ि रथ पर।
मंडल की महिमा अति न्यारी, तेज रूप केरी बलिहारी।
उच्चैश्रवा सदृश हय जोते, देखि पुरन्दर लज्जित होते।
मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता, सूर्य, अर्क, खग, कलिहर, पूषा, रवि, आदित्य, नाम लै, हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै।
द्वादस नाम प्रेम सो गावैं, मस्तक बारह बार नवावै।
चार पदारथ सो जन पावै, दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै।
नमस्कार को चमत्कार यह, विधि हरिहर कौ कृपासार यह।
सेवै भानु तुमहिं मन लाई, अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।
बारह नाम उच्चारन करते, सहस जनम के पातक टरते।
उपाख्यान जो करते तवजन, रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।
छन सुत जुत परिवार बढ़तु है, प्रबलमोह को फंद कटतु है।
अर्क शीश को रक्षा करते, रवि ललाट पर नित्य बिहरते।
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत, कर्ण देश पर दिनकर छाजत।
भानु नासिका वास करहु नित, भास्कर करत सदा मुख कौ हित।
ओठ रहैं पर्जन्य हमारे, रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा, तिग्मतेजसः कांधे लोभा।
पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर, त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर।
युगल हाथ पर रक्षा कारन, भानुमान उरसर्मं सुउदरचन।
बसत नाभि आदित्य मनोहर, कटि मंह हंस, रहत मन मुदभर।
जंघा गोपति, सविता बासा, गुप्त दिवाकर करत हुलासा।
विवस्वान पद की रखवारी, बाहर बसते नित तम हारी।
सहस्रांशु, सर्वांग सम्हारै, रक्षा कवच विचित्र विचारे।
अस जोजजन अपने न माहीं, भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं।
दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै, जोजन याको मन मंह जापै।
अंधकार जग का जो हरता, नव प्रकाश से आनन्द भरता।
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही, कोटि बार मैं प्रनवौं ताही।
मन्द सदृश सुतजग में जाके, धर्मराज सम अद्भुत बांके।
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा, किया करत सुरमुनि नर सेवा।
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों, दूर हटत सो भव के भ्रम सों। | 1 546 |
| 13 | जिस पात्र में वर्षो से तेल ही रखा जाता है , ऐसे बर्तन को पाँच दस बार धोने पर वह स्वच्छ तो होगा , किन्तु तेल की वास नहीं जायेगी, अब उस बर्तन में यदि चटनी अचार रखा जायेगा तो वह बिगड़ जायेगा, हमारा मस्तिष्क भी ठीक ऐसा ही है, जिसमें कई वर्षो से कामवासना रुपी तेल रखा गया है।
बुद्धि रुपी पात्र में श्रीकृष्ण रुपी रस रखना है, मस्तिष्क रुपी बर्तन में काम का अंशमात्र भी होगा तो उसमें प्रेमरस , जमेगा ही नहीं, जब बुद्धि में परमात्मा का निवास होगा, तभी पूर्ण शान्ति मिलेगी, जब तक बुद्धि में ईश्वर का अनुभव नहीं होगा तब तक आनन्द का अनुभव नहीं हो पायेगा, संसार के विषयों का ज्ञान बुद्धि में आने पर विषय सुख रुप बनते हैं, परमात्मा को बुद्धि में रखना है, मस्तिष्क में जब ईश्वर आ बसते हैं, तभी ईश्वर स्वरुप का ज्ञान पूर्ण आनन्द देता है।
जैसे तेल के अंश से चटनी अचार बिगड़ते हैं वैसे ही बुद्धि में वासना का अंश रह जाने पर वह अस्थिर ही रहेगी,
बुद्धि को स्थिर और शुद्ध करने हेतु मन के स्वामी चंद्र और बुद्धि के स्वामी सूर्य की आराधना करनी है, त्रिकाल संध्या करने से बुद्धि शुद्ध होगी, जब तक राम नहीं आते, तब तक कृष्ण भी नहीं आते जिसके घर मे राम नहीं आते, उसका रावण (काम) नहीं मरता और जब तक कामरुपी रावण नहीं मरता तब तक श्रीकृष्ण नहीं आते, जब राम की मर्यादा का पालन किया जायेगा तभी काम मरेगा, चाहे जिस संप्रदाय में विश्वास हो , किन्तु जब तक रामचन्द्र की मर्यादा का पालन नहीं किया जायेगा तब तक आनन्द नहीं मिलेगा।
रामचन्द्र की उत्तम सेवा यही है कि उनकी मर्यादा का पालन किया जाए, उनका सा ही वर्तन रखो, रामजी का भजन करना अर्थात् उनकी मर्यादा का पालन करना, उनका वर्तन हमें जीवन में उतारना चाहिए, यदि राम जी को मन में बसाने , मर्यादा- पुरुषोत्तम रामचन्द्र का अनुकरण करने पर भगवान मिलेगें।
रामजी की लीलाएँ अनुकरणीय एवं श्रीकृष्ण की लीलाएँ चिंतनीय हैं, रामचन्द्र का मातृ प्रेम, पितृ प्रेम, बंधु प्रेम , एक पत्नी प्रेम आदि सब कुछ जीवन में उतारने योग्य है।
श्रीकृष्ण के कृत्य हमारे लिए अशक्य है, उनका कालियानाग को वश में करना, गोवर्धन उठाना आदि । रामचन्द्र ने अपना ऐश्वर्य छिपाकर मानव जीवन का नाटक किया साधक का वर्तन कैसा होना चाहिए यह रामचन्द्र जी बताया है, साधक का वर्तन रामचन्द्र जैसा होना चाहिए, सिद्ध पुरुष का वर्तन श्रीकृष्ण जैसा हो सकता है।
रघुनाथ जी का अवतार राक्षसों की हत्या के हेतु नहीं , मनुष्यों को मानव धर्म सिखाने के लिए हुआ था, वे जीवमात्र को उपदेश देते हैं, रामजी ने किसी भी मर्यादा को भंग नहीं किया, हमें भी मर्यादा का पालन करते हुए श्रीकृष्ण को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। | 936 |
| 14 | *आपको यह समझना चाहिए कि एक भक्त कभी भी किसी कर्म-फल के अधीन नहीं होता।* जो कुछ भी हो रहा है, वह कृष्ण की कृपा है। भक्त का दृष्टिकोण यही होना चाहिए। *एक बार कृष्ण के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाने पर, कर्म-फल तुरंत समाप्त हो जाते हैं; लेकिन यदि वह पुनः स्वतंत्र रूप से कार्य करता है, तो वह फिर से माया के चंगुल में फँस जाता है।* वह 'सीमांत अवस्था' (marginal state) सदैव बनी रहती है, *किंतु एक शुद्ध भक्त के लिए—जिसने वास्तव में कृष्ण के प्रति समर्पण कर दिया है—कोई कर्म-फल शेष नहीं रहता।* इसका वही उदाहरण है जैसे बिजली का पंखा बंद कर देने पर भी वह कुछ देर तक घूमता रहता है, किंतु बहुत शीघ्र ही वह पूरी तरह रुक जाता है। भक्त की स्थिति भी ठीक वैसी ही होती है। इसलिए, यदि किसी शुद्ध भक्त को किसी प्रकार के प्रतिकूल परिणाम (कष्ट) का सामना करना पड़ता है, तो वह उसे बुरा नहीं मानता। *वह जानता है कि उसके कर्मों का फल तो पहले ही समाप्त हो चुका है; अब जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह तो पंखे के बंद हो जाने के बाद भी उसकी 'अवशिष्ट गति' के समान ही है।* अतः एक शुद्ध भक्त इसे भगवान की कृपा ही मानता है, *क्योंकि भगवान 'संक्षिप्त दण्ड' के माध्यम से उसके समस्त कर्म-फलों को समाप्त कर रहे होते हैं।* | 0 |
| 15 | आख़िर खतरा किसे है किससे है और किसको है
सब लोग अपना प्रतिदिन का कार्य कर रहे हैं. कोई बच्चे खेल रहे है. कुछ किसान हाथ में कुदाल लेकर खेत की तरफ जा रहे हैं. कुछ ऑफिस जा रहे हैं कुछ बच्चे स्कूल जाने की तैयारी भी कर रहे हैं औरतें जल्दी-जल्दी घर की काम कर रही है लगता है आज भी देरी होगी कुछ को अपने गंतव्य
तक जाने में तभी दिखता है कि जो लोग गाँव से बाहर थे अचानक वे भस्म हो गए आसमान के एक दिशा से अंधेरा पैर पसारने लगा लेकिन कैसे अभी तो सुबह थी क्या सूर्य ग्रहण लग रहा है नहीं एक व्यक्ति ने कहा शायद कोई बड़ी शिप आ रही है क्या इसमें दूसरे ग्रह के जीव है पता नहीं लेकिन लोगों को पता चल चुका है कि खतरा सामने से आ चुका है अब सब लोग जिसे जब पता चला वे तेजी से दूसरी दिशा में भाग रहे है. सब एक दूसरे को पीछे छोड़ना चाहते है. भागते-भागते ये उस शिप को शायद पीछे छोड़ दिए पीछे मुड़कर देखे दिखा नहीं शायद काफी पीछे छूट गया है या शायद धुएँ और धूल ने उसे ढँक लिया है जो भी हो, मौत का साया पल भर के लिए टल गया है इसलिए ये भी अब अपने कदम थोड़े धीमे कर दिए कुछ लोग घुटनों पर हाथ रखकर लंबी-लंबी और खुरदरी साँसें खींचने लगे। पसीने और धूल से उनके चेहरे सन गए हैं उस पल, जब वे सिर्फ जिंदा बचने की राहत महसूस कर रहे हैं
तब इनके पीछे-पीछे वो भी आ रहे थे कैसे आ रहे हैं किस दिशा से आ सकते हैं. यह किसी को अभी नहीं पता है लेकिन फिर भी अब ये बात करते हुए धीरे धीरे चल रहे हैं
चलते चलते ये अपने आस-पास की चीजें अपनी सूखी आँखों से देखते हैं आस पास कचरे के ढेर लदे हुए हैं उनसे धुंआ निकाल रहा है तभी उनकी नज़र उस चीज़ पर पड़ती है जिसे वे हमेशा से जानते थे, लेकिन आज वह एक अलग ही भयानक रूप में उनके सामने है
गंगा।
वह नदी जिसे कभी जीवनदायिनी कहा जाता
था आज वह किसी दूसरे रूप में ही है गंगा का पानी एक बड़ी नहर के रूप में बह रहा है जिसका जल काला तेल के समान गाढ़ा भूरा है बहने की गति भी कम है इतना गाढ़ा है कि इसमें अब कोई तैर भी नहीं सकता है तेल जैसे उस पानी में एक पक्षी फंसा हुआ है वह डूब भी नहीं पा रहा है क्योंकि पानी इतना गाढ़ा था कि उसने उसे वहीं जमा दिया है इसकी तुलना अब दल-दल से हो रही है क्योंकि इसमें हाथ पैर चलाना असंभव है जिधर देखा जाए उधर ही कचरा है बड़ी-बड़ी गाड़ियां और टूटे हुए हेलीकॉप्टर बड़े-बड़े ठेला गाड़ियाँ कचरे को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रही हैं, लेकिन इससे क्या ही हो जाएगा सब जगह कचरा ही फैला हुआ है ऐसा लग रहा है जैसे यह कचरे यात्री है जिसे यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ पहुँचाया जा रहा है लेकिन फिर भी कहीं नहीं पहुँच रहे हैं जाएंगे भी कहाँ रहेंगे तो यहीं पर ही ना हम और कचरा दोनों ही।। | 0 |
| 16 | "क्रिटिकल थिंकिंग क्या है?"
दो व्यक्ति हैं. एक वह है जो दूसरे द्वारा कही गई बातों को बिना किसी नापतोल के स्वीकार कर लेता है लेकिन ऐसा नहीं है कि यह किसी की भी बात मान लेगा यह वही बात स्वीकार करता है जो इसके कबीले के लोगों द्वारा बताई जाए या फिर यह व्यक्ति जिस किसी को भी एक अथोरिटी स्टेटस पर रखा होता है उसकी सभी बात को बिना सोचे प्रश्न पूछे स्वीकार कर लेता है ऐसा नहीं है कि यह सोच समझ नहीं सकता है लेकिन यह इन जगहों पर इसका उपयोग नहीं करता है दूसरी तरफ है वह दूसरा व्यक्ति जो सभी बातों को जब तक अपनी कसौटी पर न कस ले जब तक उन बातों को साबित करने वाले डाटा या आथेंटिक सबूत जो एक विश्वसनीय स्रोत से आते हों उनको अध्ययन करके किसी नतीजे पर पहुंचता है अन्यथा तब तक वह यह प्रश्न करता रहता है जब तक वह उस चीज के जड़ तक न जाए यह एक-एक वाक्य को समझने के लिए इम्पीरिकल सबूत ढूढता है तब जाकर वह वाक्य इसके मस्तिष्क (BRAIN) का हिस्सा बनता है कहने का मतलब यह है कि जब हम किसी सत्य तक पहुँचने के लिए एक SYSTEMATIC WAY में जाते हैं या समस्या निवारण (PROBLEME SOLVING) तरीका (APPROACH) रखते हैं
यहीं क्रिटिकल थिंकिंग है ।
असल में क्रिटिकल थिंकिंग केवल दूसरों की बातों पर संदेह करना नहीं है; यह "स्वयं के विचारों पर निर्मम प्रहार" करना है। जिससे कम से कम bias होकर थिंकिंग करना होता है। | 0 |
| 17 | मन्त्र के आठ दोष
मन्त्र के बारे में लोगों में बहुत भ्रान्ति है, अगर किसी को समजाया जाए की मन्त्र करने के यह विधि निषेध है तो लोग सामने से ज्ञान देते है की भगवन की भक्ति में दोष कैसा? उसका उत्तर है आप भगवन्नाम का कीर्तन करो वो भक्ति मार्ग है, उसमे कोई बाधा नहीं कोई मात्रा छंद बिज आदि का बंधन नहीं। भक्ति आनंद स्वरूप है।
मन्त्र उपासना मार्ग है, और मन्त्र केवल गुरु से प्राप्त हो वही फलीभूत होता है, उपासना मार्ग के विधिनिषेध, बहुत सारे यम नियम है जिनका पालन न किया जाए तो मंत्र विपरीत असर करता है, कई लोग प्रश्न करते है हम यह देवी वो देवता का मंत्र करते है पर वह फलीभूत नहीं होता उसके कुछ दोष नीचे दिए गए है।
(1) अभक्ति दोष 👉 मन्त्र को अक्षर एवं वर्णों की समष्टि मात्र समझना अभक्ति दोष है ।
(2) अक्षरभ्रान्ति दोष 👉 मन्त्राक्षरों में उलट-फेर या एकाध अक्षर बढ़ जाना अक्षरभ्रान्ति दोष है ।
(3) लुप्त दोष 👉 मन्त्राक्षरों में किसी वर्ण की न्यूनता हो जाना लुप्त दोष है ।
(4) ह्रस्व दोष 👉 मन्त्र में किसी दीर्घ वर्ण का ह्रस्व हो जाना ह्रस्व दोष है ।
(5) दीर्घ दोष 👉 ह्रस्व वर्ण के स्थान में दीर्घ वर्ण कर देना दीर्घ दोष है ।
(6) कथन दोष 👉 जाग्रत् अवस्था में अपना मन्त्र किसी से कह देना कथन दोष है ।
(7) छिन्न दोष 👉 संयुक्त वर्णों में से किसी वर्ण का छूट जाना छिन्न दोष है ।
(8) स्वप्नकथन दोष 👉 स्वप्न में अपना मन्त्र किसी को बता देना स्वप्नकथन दोष होता है।
मन्त्र के एक-एक अक्षर के उच्चारण में परमानन्द का अनुभव करते हुए उसका जप करने से शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है, क्योंकि – 'संविदेव मन्त्र: ' अर्थात् मन्त्र संवित् तत्त्व है ।
याद रहें मंत्र तारक भी है और मारक भी है। जो विधिनिषेध यम नियम पालन नहीं कर सकते उनके लिए भगवन्नाम कीर्तन ही तारक है, उनके लिए भक्तिमार्ग ही उत्तम है। | 0 |
| 18 | कहानी का समय
गृहस्थ
बूढी मां और लाचार बाप को बिलखता छोड़ कर एक व्यक्ति साधु बनकर तपस्या करने के लिए वन में चला गया। तप करने के बाद जब साधु उठा तो देखा कि एक कौवा अपनी चोंच में एक चिड़िया का बच्चा दबाकर उड़ रहा है।
ऋषि ने क्रोध से कौवे की ओर देखा और उसकी आंखों से अग्नि की ज्वाला टूट पड़ी जिससे कौवा जलकर वहीं भस्म हो गया।
अपनी इस सिद्धि को देखकर वह फूला नहीं समाया और अहंकार से भरा हुआ वह मठ की ओर चला रास्ते में वह एक दरवाजे पर जाकर भिक्षा के लिए खड़ा हुआ।उनके बार-बार पुकारने पर कोई बाहर नहीं आया तो साधु क्रोधित हो गया।
उन्होंने फिर पुकारा, पर इस बार आवाज आई, स्वामी जी ठहरिए, मैं अभी साधना कर रही हूँ जब साधना पूरी हो जाएगी तब मैं आपको भिक्षा दे दूँगी अब साधु के क्रोध की सीमा पार हो गई।
ऋषि क्रोध में आकर बोले, दुष्टा! तुम साधना कर रही हो या एक साधु का अपमान कर रही हो ; जानती नहीं कि इस अवहेलना का परिणाम क्या हो सकता है।
भीतर से उत्तर आया, मैं जानती हूँ आप श्राप देना चाहेंगे किंतु मैं कोई कौवा नहीं जो आपके प्रकोप से जलकर नष्ट हो जाऊँगी।
जिसने जीवन भर पाला है मैं उस माँ को छोड़ कर तुम्हें भिक्षा कैसे दे सकती हूँ साधु का सिद्धि का अहंकार चूर-चूर हो गया कुछ देर बाद वह महिला बाहर आई तो ने आश्चर्य पूर्वक महिला से पूछा आप कौन सी साधना करती हैं जिससे तुम मेरे बारे में सब कुछ जानती हो।
उस महिला ने कहा, महात्मन, मैं अपने पति, बच्चे, परिवार और समाज के प्रति कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करती हूँ यही मेरी सिद्धि है..!! इसीलिए सभी प्रकार के आश्रमों में गृहस्थ आश्रम सर्वोपरि माना जाता है। | 0 |
| 19 | अधिकांश लोगों ने "धन" के वास्तविक दर्जे को भूल कर उसे बहुत ऊँचे आसन पर बैठा दिया है।* आजकल की अवस्था को देख कर तो हमको यही प्रतीत होता है कि मानव जीवन का सबसे *"बड़ा शत्रु धन"* ही है, यह स्वीकार करना होगा । *ईसा मसीह ने गलत नहीं लिखा है कि "धनी" का स्वर्ग में प्रवेश पाना असम्भव है।"* इसका अर्थ केवल यही है कि धन मनुष्य को इतना अन्धा कर देता है कि वह संसार के सभी कर्तव्यों से गिर जाता है। *"धन" का इसी में महत्व है कि वह "लोकसेवा" में व्यय हो।* नहीं तो धन के समान अनर्थकारी और कुछ नहीं है ।
👉 *श्रीमद्भागवत में कहा है-*
*स्तेयं हिंसानृतं दम्भः कामः क्रोधः स्मयो मदः ।*
*भेदोः वैरमविश्वासः संस्पर्धा व्यसनानि च ।।*
*एते पञ्चदशानर्था ह्यर्थमूला मता नृणाम् ।*
*तस्मादनर्थमर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत् ।।*
*-११/२३/१८-१९*
अर्थात्
*"(धन) से ही मनुष्यों में ये पन्द्रह अनर्थ उत्पन्न होते हैं-चोरी, हिंसा, झूठ, दम्भ, काम, क्रोध, गर्व, मद, भेद बुद्धि, बैर, अविश्वास, स्पर्धा, लम्पटता, जूआ और शराब । इसलिए कल्याणकामी पुरुष को 'अर्थ' नामधारी अनर्थ को दूर से ही त्याग देना चाहिए ।"*
👉 *आज संसार में बहुत ही कम लोग "सुखी" कहे जा सकते हैं।* भूतकाल में हमारा जीवन केवल रोटी कमाने में बीता। अब हमको समाज में अपना स्थान कमाने में बिताना चाहिए। *केवल "धन" और "समृद्धि" ही जीवन का लक्ष्य नहीं होना चाहिए ।* लक्ष्य होना चाहिए कभी भी दुःखी न रहना। हरेक के जीवन में सबसे महान् प्रेरणा यह होनी चाहिए कि हमारा जीवन प्रकृति के अधिक से अधिक निकट हो और तर्क तथा बुद्धि से दूर न हो । *हमको अपने जीवन में काम करने का "आदर्श" समझ लेना चाहिए। यह "आदर्श" पेट का धन्धा नहीं, "सेवा" होना चाहिए ।* सर्वकल्याण, समाज सेवा, सामाजिक जीवन तथा शिक्षा ही हमारा कार्यक्षेत्र हो, हमको ऐसे युग की कल्पना करनी चाहिए, जब हमारा जीवन ध्येय केवल जीविका उपार्जन न रह जाय। *जीवन "अर्थशास्त्र" या "प्रतिस्पर्धा" की वस्तु न रह जाए ।* व्यापार के नियम बदल जाएं । एक काम के अनेक करने वाले हों और अनेक व्यक्ति एक ही काम को अपना सके । मालिक और नौकर में काम करने के घंटों की झिकझिक दूर हो । *मनुष्य केवल मनुष्य ही नहीं है, उसकी "आत्मा" भी है, उसका "देवता" भी है, उसका इहलोक और परलोक भी है ।*
👉 यदि हम अपने तथा दूसरों के हृदय के भीतर बैठकर यह सब समझ जाएं तो हमारा जीवन कितना सुखी हो जाएगा, पर आज हम ऐसा नहीं करते हैं । यह क्यों ? *इसका कारण "धन" की विपत्ति है । "धन" की दुनिया में "निर्धन" का व्यक्तित्व समाप्त हो जाता है ।* जब तक अपने व्यक्तित्व के विकास का अवसर न मिले, आदमी सुखी नहीं हो सकता । यह सभ्यता व्यक्तित्व के विकास को रोकती है, बिना इसके विकसित हुए सुख नहीं मिल सकता । *"सुख" वह इत्र है, जिसे दूसरों को लगाने से पहले अपने को लगाना आवश्यक होता है ।* यह इत्र तभी बनता है, जब हम अपने एक कार्य को दूसरे की सहायता के भाव से करें । हमें चाहे अपनी इच्छाओं का दमन ही क्यों न करना पड़े, पर हमें दूसरे के सुख का आदर करना पड़ेगा। *"सुख" का सबसे बड़ा साधन नि:स्वार्थ सेवा है ।* | 0 |
| 20 | कहानी का समय
*रसोई की दो रानियाँ*
*_सुमन की शादी को अभी बीस दिन ही हुए थे।_*
*_विदाई के वक्त उसकी माँ ने समझाया था, "बेटी, ससुराल में अपनी जगह बनानी है तो काम से जी मत चुराना। सास को पूरा आराम देना।" सुमन ने माँ की यह सीख गांठ बांध ली थी।_*
*_सुबह के छह बजते ही सुमन बिस्तर छोड़ देती।_* *_नहा-धोकर, पूजा करके सीधे रसोई में मोर्चा संभाल लेती। उसकी सास, मनोरमा जी, जो पिछले पैंतीस सालों से इस घर की धुरी थीं, जब सुबह सात बजे अपनी आदत के मुताबिक रसोई की ओर बढ़तीं, तो देखतीं कि चाय की केतली से भाप निकल रही है, नाश्ते की तैयारी पूरी है और रोटियों के लिए आटा लग चुका है।_*
*_शुरुआत के दो-चार दिन तो मनोरमा जी को बहुत अच्छा लगा। पड़ोसियों से कहती फिरीं, "मेरी बहू तो हीरा है, मुझे तो रसोई में पैर ही नहीं रखने देती। कहती है—माँ जी, अब आपकी उम्र आराम करने की है।"_*
*_लेकिन जैसे- जैसे दिन बीतते गए, वह 'आराम' मनोरमा जी को काटने लगा।_*
*_आज रविवार था। घर में सबके लिए छोले-भटूरे बनने थे। मनोरमा जी को छोले बनाने का बहुत शौक था। उनके हाथ के 'अमृतसरी छोले' पूरे खानदान में मशहूर थे। वह बड़े उत्साह से रसोई की तरफ बढ़ीं। उन्होंने सोचा कि आज बहू को सिखाएंगी कि मसालों का सही अनुपात क्या होता है।_*
*_जैसे ही वह रसोई के दरवाजे पर पहुंचीं, उनके कदम ठिठक गए।_*
*_सुमन पहले से वहां मौजूद थी। कड़ाही में तेल गर्म हो रहा था और छोले उबल चुके थे। खुशबू बता रही थी कि तड़का लग चुका है।_*
*_"अरे बहू," मनोरमा जी ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, "तूने छोले बना भी दिए? मैं सोच रही थी कि आज मैं बनाती। सबको मेरे हाथ का स्वाद पसंद है।"_*
*_सुमन ने मुस्कुराते हुए, बिना रुके भटूरे बेलते हुए कहा, "माँ जी, आप क्यों तकलीफ करती हैं? मैंने यूट्यूब पर आपकी रेसिपी देख ली थी, कोशिश की है वैसा ही बनाने की। आप बस डाइनिंग टेबल पर बैठिए, मैं_*
*_गरमा-गरम लाती हूँ।"_*
*_मनोरमा जी चुपचाप वहां से हट गईं। वह जाकर अपने कमरे में खिड़की के पास बैठ गईं। बाहर का मौसम सुहाना था, लेकिन उनके अंदर एक अजीब सा तूफ़ान चल रहा था।_*
*_उन्हें लगा जैसे उनके हाथों से सिर्फ़ करछुल नहीं छीनी गई है, बल्कि इस घर पर उनकी 'सत्ता' छीन ली गई है। पिछले पैंतीस सालों से, रसोई उनका साम्राज्य था। कौन क्या खाएगा, कब खाएगा, यह सब वह तय करती थीं। इसी बहाने बेटे-पति उनसे जुड़े रहते थे। "माँ, नमक कम है," या "माँ, आज वो बना दो"—ये संवाद ही तो उनकी अहमियत का सुबूत थे।_*
*_लेकिन अब?_*
*_नाश्ते की मेज पर सबने सुमन के छोलों की तारीफ की।_*
*_"वाह सुमन! मज़ा आ गया," पति ने कहा।_*
*_"बिल्कुल माँ के हाथ जैसा स्वाद है," ससुर जी ने भी हामी भरी।_*
*_मनोरमा जी चुपचाप खाती रहीं। किसी ने नोटिस नहीं किया कि उनकी थाली में भटूरा वैसे का वैसा रखा था। उन्हें लग रहा था कि वह धीरे-धीरे इस घर के लिए 'अदृश्य' होती जा रही हैं। अगर काम नहीं, तो उनकी ज़रूरत क्या है? क्या वह सिर्फ़ एक पुरानी कुर्सी की तरह घर के कोने में पड़ी रहने के लिए हैं?_*
*_दोपहर को सुमन जब काम निपटाकर अपने कमरे में आराम करने गई, तो उसे प्यास लगी। वह पानी लेने रसोई में आई। वहां का नज़ारा देख वह हैरान रह गई।_*
*_मनोरमा जी रसोई के स्लैब के पास खड़ी थीं। वह मसालों के डिब्बे (मसालेदानी) को खोलकर एक-एक कटोरी को छू रही थीं। हल्दी, जीरा, धनिया... जैसे कोई माँ अपने बच्चों को सहला रही हो। उनकी आँखों से आंसू टपक रहे थे और मसालों के डिब्बे में गिर रहे थे।_*
*_सुमन दरवाज़े पर ही जम गई। उसे अपनी माँ की कही बात याद आई—"सास को आराम देना।" लेकिन उसे यह नहीं बताया गया था कि एक गृहिणी के लिए उसका काम सिर्फ़ 'काम' नहीं, उसकी 'पहचान' होता है। उसे छीन लेना, उसकी पहचान को मिटा देने जैसा है।_*
*_सुमन दबे पाँव वापस मुड़ी। वह अपने कमरे में गई और कुछ देर सोचती रही। उसे अपनी गलती का अहसास हो चुका था। वह 'आदर्श बहू' बनने की होड़ में यह भूल गई थी कि मनोरमा जी अभी 'रिटायर' होने के लिए तैयार नहीं हैं।_*
*_शाम की चाय का वक्त हुआ।_*
*_रोज की तरह सुमन ने चाय नहीं बनाई। वह अपने कमरे में बैठी रही। साढ़े पांच बज गए। बाहर ससुर जी की आवाज़ आई, "अरे भाई, आज चाय मिलेगी या नहीं?"_*
*_मनोरमा जी ने घड़ी देखी। बहू अभी तक नहीं उठी? कहीं तबीयत तो खराब नहीं?_*
*_वह चिंतित होकर सुमन के कमरे में गईं। "सुमन? बेटा, तबीयत ठीक है?"_*
*_सुमन बिस्तर पर लेटी मोबाइल देख रही थी। उसने उठकर कहा, "हाँ माँ जी, सब ठीक है। बस... आज मेरा चाय बनाने का बिल्कुल मन नहीं है। क्या आप बना देंगी? और हां, वो अदरक वाली। मेरे हाथ से वो स्वाद ही नहीं आता जो आपके हाथ में है। सुबह छोले भी फीके ही लगे मुझे तो।"_* | 0 |
