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DR NARAYAN DUTT SHRIMALI

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Document from Chandan

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *प्रेम हरदम रहता है, पर दर्शन हरदम नहीं रहते। दर्शन की इच्छा दोषी नहीं है, पर तुलना करें तो दर्शन की अपेक्षा प्रेम ऊंचा है । दर्शन होने पर प्रेम हो जाए - यह नियम नहीं है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या 179* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *सब ज्ञानी प्रेमी हों - यह नियम नहीं है, पर सब प्रेमी ज्ञानी होंगे - यह नियम है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १७६* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *काम - क्रोध न चेतन में रहते हैं, न जड़ में रहते हैं, प्रत्युत "मैं हूं" इस मान्यता में रहते हैं ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १७५* 👏👏

Document from Chandan

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *परमात्म प्राप्ति के लिए किसी को भी मना नहीं है । अतः परमात्म प्राप्ति में कभी किसी को निराश नहीं होना चाहिए । मां की गोद में जाने के लिए कौन सा बालक अयोग्य है ?* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १६७* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *साधक में साधन विरुद्ध बात नहीं आनी चाहिए। साधन विरुद्ध बात आए तो समझो बहुत काम हो गया ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १६६* 👏👏

Document from Chandan

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *भगवान् का होने से ऐसा नहीं होता कि "मैं भगवान् का हूं, दूसरे भगवान् के नहीं हैं," प्रत्युत ऐसा भाव होता है कि सारा संसार भगवान् का है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५८* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *मनुष्य योनि भोगयोनि नहीं है, प्रत्युत साधनयोनि है, प्रेमयोनि है, भक्तियोनि है । भोगयोनि वह होती है, जिसमें नया कर्म करने का अधिकार न हो ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५५* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *भगवान् के सामने अपने पाप कहने से पाप नष्ट हो जाते हैं । भगवान् निर्दोषता की अंतिम सीमा हैं ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५४* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *साधक में साधन विरुद्ध बात नहीं आनी चाहिए। साधन - विरुद्ध बात न आए तो समझो बहुत काम हो गया ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५४* 👏👏

Document from Chandan

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *मनुष्य में यह सामर्थ्य और योग्यता है कि वह अपना उद्धार भी कर सकता है और जगत् तथा परमात्मा को प्रसन्न भी कर सकता है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *प्रेम के भोक्ता भगवान् हैं, निष्काम भाव से यदि कुत्ते से भी प्रेम करें तो वह भगवान् तक पहुंचता है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *हम भगवान् के हैं, भगवान् हमारे हैं - इस प्रकार भगवान् के साथ सम्बन्ध जोड़ने से ज्ञानी और भक्त के सब लक्षण अपने - आप आ जाएंगे ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *संसार की प्रवृत्ति रोकने से परमात्मा की तरफ गति अपने आप होती है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १५१* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏