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Obunachilar
Ma'lumot yo'q24 soatlar
-157 kun
-8930 kun
Postlar arxiv
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ज़िंदा हूं मगर जिंदगी से दूर हूं
आज इस कदर में क्यूं मजबूर हुं
बिना गलती के सजा मिलती ह मुझको
मैं किससे कहूं आखिर बेकसूर हूं
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वो टूटा हर बार टूटा दिखता नहीं है
वो लूटा कई बार फिर भी सीखता नहीं है
नसीब में लिख दिए हैं दर्द लिखने वालो ने
मेरे जैसा दर्द कागजों पे कोई लिखता नही है
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बहुत उदास ह दिल तेरे चुप हो जाने से
बात कर तू किसी बहाने से
तू लाख खफा ह मगर इंतहा तो देख
कोई टूट गया ह तेरे चुप हो जाने से
