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काम संहिता🙏
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सेक्स से जुड़ी हुई प्रेम से जुड़ी हुई सभी जानकारी के लिए सन्देश भेजे जय कामदेव कामसूत्र यौन स्थानों का सच्चा गुरु ग्रंथ है। अपने यौन जीवन में विविधता लाने के तरीके खोज रहे हैं? तब आप सही जगह पर आए हैं .. !!
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❤️रम्भा - शुक,-संवाद ❤️ - 4
❤️❤️
💕क्षामोदरी हंसगतिप्रमत्ता सौंदर्य - सौभाग्यवती प्रलोला ।
न पीडिता येन रतौ यथेच्छं वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम ।।
❤️रम्भा बोली, हे मुनिवर! कृशोदरी अर्थात क्षीणकटि, हंस के सदृश मंद - मंद गमन करने वाली, मदमाती, सुंदरता के सौभाग्य से युक्त, अतिचंचला ऐसी स्त्री को रति-काल में जिसने इच्छानुसार (आत्मतुष्टि - पर्यंत) पीड़ित (नारी के कामाँगों का मर्दन) नही किया उस मनुष्य का जीवन व्यर्थ गया।
❤️रंभा पराजित नही हो रही है। वह फिर नारी और स-काम जीवन एवं तत्परिणामतः स-फल जीवन को ही सार्थक समझती और समझाती है। यह नारी कृशोदरी (पतले पेट) है। इसीलिए नारी को सर्वत्र सुमध्यमा कहा गया है। देवताओं ने भी अपनी पत्नियों (देवियों) को संबोधित करते हुए सुमध्यमे शब्द का प्रयोग किया है। नारी के मध्य भाग का क्षीण होना सौंदर्य लक्षण है। इसी मध्य भाग में त्रिबली, नाभि, उपस्थ - स्थल इत्यादि हैं। यहीं गर्भ और गर्भाशय है। नारी की सार्थकता गर्भधारण में है।
वह हंस के समान मंद मंद गति से चलने वाली हंसिनी है। नायिका भेद में हंसिनी की उत्कृष्टता का उल्लेख है। वह प्रमत्ता अर्थात मदमाती है। नारी सौंदर्य - सौभाग्यवती है। वह सुंदरता के सौभाग्य से अलंकृत है। यहाँ सौभाग्यवती द्वयर्थक शब्द समास है। सुभग (सु-भग =सुंदर भग) से ष्यञ प्रत्यय संयुक्त होने पर सौभाग्य शब्द बनता है। यह नारी सौभाग्यशालिनी है। यह दुर्भगा नही सुभगा है। यह भग अपने अर्थ विस्तार में परमात्म (भगवान) का भी पर्याय बन जाता है।
सौंदर्य सुंदर से व्युत्पन्न शब्द है। जो चित्त को आर्द्र कर दे वह सुंदर है। सुंदर का एक पर्याय है कामदेव। तात्पर्य यह कि वह रमणी इस प्रकार के सौंदर्य के सौभाग्य से युक्त है। वह प्रलोला अर्थात अतिचंचला है। यह जड़ नही चेतन है और चेतन में भी मन की गति से चंचल है। इसीलिए आकर्षणयुक्त है।
रंभा कहती है, हे शुकदेव! जिसने ऐसी नारी का रति-काल में इच्छानुसार आत्मतुष्टि पर्यंत मर्दन नही किया, उसका जीवन व्यर्थ गया।
💕💕क्रमशः - - - - - - - -
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बस इतना सा ख़्वाब है... ❤️💞
जो तेरे ग़ुलाबी लब मेरे लबों को छू जाये
मेरी रूह का मिलन तेरी रूह से हो जाये....
ज़माने की साज़िशों से बेपरवाह हो जायें
मेरे ख़्वाब कुछ देर तेरी बाँहों में सो जायें...
मिटा कर फ़ासले हम प्यार में खो जायें
आ कुछ पल के लिए एक-दूजे के हो जायें...
🌹
2 477
तंग लिवास में जवानी से,
मचलती हुई पिंडलियां देखी,,
सुरमई निवास नजरों से,
निकलती हुई बिजलियां देखी।
क्या खबर है दुनिया में आज,
किसकी किसकी ख़ैर नहीं,,
लाल रंग से सने लवों पर,
शोला उगती हुई चिंगारियां देखी।।
,, प्रस्तुत है,शायद मन भावे,,,,,,,,,,,
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मैं लौह खंड, तुम पारस पत्थर, मुझको स्पर्श दे दो न
अकिंचन को कंचन करके तुम मुझको उत्कर्ष दे दो न
कब से पड़ा हूँ मैं गुमसुम धरा के गहरे अन्तःस्थल में
हाथ थामकर बाहर निकालो तुम मुझको हर्ष दे दो न
मेरी मंजिल केवल तुम ही हो आदि अनादि काल से
तुम तक कैसे पहुंचू मैं तुम ही मुझको विमर्श दे दो न
मेरे हिस्से रहीं कालिखें, कटुताएं और बेस्वाद जिंदगी
पास बैठो बहार बनकर और मुझको नववर्ष दे दो न
तुम बिन नीरस बीत गया जीवन मेरा
बाजुपाश में आकर सार्थक तुम मुझको निष्कर्ष दे दो न
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अथ वराङ्गोपस्कार
अन्य सम्भोग सुखों के उपचारों के साथ साथ पुरुष को भरपूर सम्भोग सुख प्रदान करेन हेतु स्त्री की योनि का सुगन्धित होना भी आवश्यक है। कभी-कभी किसी-किसी योनि में बहुत दुर्गन्ध होती है, जो पुरुष में सम्भोग की अनिच्छा तथा स्त्री के प्रति घृणा उत्पन्न करती है। अतः स्त्री की योनि को सुगन्धित होना चाहिये। ताकि दोनों खुलकर सभोग सुख प्राप्त करे, योनि का चुम्बन भी करे तो दुर्गन्ध उसे बाधित न कर पावे। इसीलिये आचार्य सामराज यहाँ योनि शोधन की विधि बता रहे है।
सैले सिद्धार्थसम्भूते, मन्दाग्नौ यत्नतः पचेत् ।
जातिगुमाणि तल्लेशद, योनि सुरभितो बजेत् ॥१४॥
अनुवाद - सिद्धार्थ सम्भूत तेल में जावित्री को पीस कर डाले फिर मन्दाग्नि में पकाएं, तब योनि पर लगाये, तो योनि सुगन्धित हो जायेगी।
टिप्पणी – योनि को सुगन्धित करना अत्यन्त आवश्यक है आजकल तो कई तरह के सुगन्धित क्रीम तथा इत्र मिलते हैं, जो योनि को सुगन्धित कर सकते हैं।
2 477
यौन का कड़वा सच......
वर्तमान परिवेश में
मनुष्य के अन्दर तनाव बढने का
मुख्य कारण असन्तुष्ट यौन सम्बन्ध है ।
असन्तुष्ट यौन के कारण ही मनुष्य आज
आनन्दपुर्वक जीवन जीने से असफल है ।
असफल और असन्तुष्ट यौन सम्बन्ध में
पचहत्तर प्रतिशत पुरुष शीघ्रपात के शिकार होते हैं ।
जो गहन मिलन से पहले ही वे स्खलित हो जाते हैं
और उन की क्रीड़ा समाप्त हो जाती है ।
उसमें नब्बे प्रतिशत स्त्रियाँ
कभी चरम सन्तुष्टि को उपलब्ध नहीं हो पाती हैं ।
वह कभी भी गहन सम्भोग के
शिखर आनन्द तक नहीं पहुँच पाती हैं ।
असन्तुष्टी और असफल यौन सम्बन्ध के कारण ही
अक्सर स्त्रियाँ चिड़चिड़ी और क्रोधी होती हैं ।
सन्तुष्टी की चाह में जब उनको असन्तुष्टि मिलती है
वह चिलमिला उठती हैं ।
एक स्त्री सम्भोग में बहुत कम उतरती है ।
और जब वह उतरती है तो
चरमता तक पहुँचना चाहती है ।
जब वह चरमता में पहुँचने का आश रख कर
सम्भोग में उतरती है
और निराशा हाथ लगती है
तो वह चिड़चिड़ी और कोध्री हो जाती है ।
एक स्त्री की कामुकता
परमाणु बम से कम नहीं होती है ।
उसको सम्भालना
हर किसी की बस की बात नहीं है ।
उसकी कामुकता को
फ़िर कोई औषधि शान्त नहीं कर सकती है ।
कोई दर्शनशास्त्र, धर्म या नीति उसे
अपने पुरुषों के प्रति सहृदय नहीं बना सकती है ।
वह स्त्री अतृप्त है तो वह क्रुद्ध होगी ही ।
और आधुनिक मनोविज्ञान और तन्त्र
दोनों में स्पष्ट लिखा है कि
जब तक स्त्री काम भोग में
गहन तृप्ति को नहीं प्राप्त करती,
वह परिवार और समाज के लिए
समस्या बनी रहती है ।
जिससे वह वञ्चित हो गयी ।
वह चीज उसे क्षुब्ध करती रहेगी ।
वह उसके कारण तनाव महसूस करती रहेगी ।
स्त्री पुरुष के बीच झगड़ा हो, तनाव हो,
वह उदास हो, घर में शान्ति ना हो तो
उस स्थिती का अवलोकन कर चिन्तन मनन करना ।
उस स्थिती का मूल कारण समझ में आ जायेगा ।
उस स्थिती के लिये सिर्फ स्त्री ही दोषी नहीं है ।
इस गलती में कहीं ना कहीं हमारा हाथ भी है ।
इसका प्रमुख कारण
यौन के प्रति पुरुष का रुका स्वभाव
सबसे ज्यादा कारण होता है ।
सम्भोग में पुरुष का स्वखलन होते ही
वह स्त्री के प्रति बेपरवाह हो जाता है ।
वह यह नहीं सोचता कि
वह भी चरम आनन्दता प्राप्त करना चाहती है ।
वह सम्भोग में लम्बा और गहरे तह तक जाना चाहती है ।
बस पुरुषों का स्वखलन हुआ,
आनन्द लिया और स्त्री को
उसके हाल में छोड देते हैं ।
इस रूखा स्वभाव और
अतृप्त यौन सम्बन्ध के चलते
स्त्री मन हीनभावना से कुण्ठित हो जाता है ।
वह कामुकता के चरमता को
ना उपलब्ध होने के कारण
काम विमुख हो जाती है ।
फ़िर वह आसानी से काम भोग में
उतरने को नहीं राजी होती है ।
बहुत कम पुरुष स्त्री को
गहन सुख की उपलब्धि करा पाते हैं ।
स्त्री जब तक सम्भोग के चरमता को नहीं छू पाती,
तव तक वह भोगरत रहना पसन्द करती है ।
वह भोग की गहनता में उतर कर
सम्भोग करना पसन्द करती है ।
लेकिन एक पुरूष
भोग के गहरे पन में उतरने से डरता है ।
पुरूष का भोग केवल शारीरिक होता है ।
उसमें गहनता होती ही नहीं है ।
स्त्रियों को सम्भोग में
चरम आनन्द का अहसास नहीं मिलता
तो वह तनाव में आ जाती है ।
मन में प्रश्नों का ज्वार-भाटा उठने लगता है ।
और उसे लगने लगता है कि
पुरुष केवल अपने आनन्द के लिये
उसका उपयोग कर रहा है ।
उनका शोषण कर रहा हैं ।
उसे लगता है कि
पुरुष को
उसकी खुशी से कोई लेना देना नहीं है ।
उसे वह भोग्या वस्तु समझ रहा है ।
पुरुष का तो स्खलित होते ही
वह सन्तुष्ट हो जाता है ।
फिर वह करवट ले कर सो जाता है ।
लेकिन स्त्री को
सम्भोग के चरम आनन्द का
अहसास ना होने के कारण
वह आँसू बहाती रहती है ।
वह अनुभव उसके लिए तृप्तिदायक नहीं होता है ।
जिसके वजह से सम्भोग के प्रति
वह कुण्ठित और रूखी स्वभाव की हो जाती है ।
बस पुरूष को तृप्ती कर सन्तुष्टि देती है ।
लेकिन खुद असन्तुष्ट और अतृप्त रह जाती है ।
आज प्रायः स्त्री को तो
चरम आनन्द का ज्ञान ही नहीं है ।
उनको सम्भोग का अर्थ केवल
योनी लिंग का घर्षण ही पता है ।
वह यह भी नहीं जानती कि
कामुकता के चरम तक कैसे पहुँचे ।
बस बिस्तर पर लेट जाना और
पुरुष जैसा करे
उसी को स्त्री सम्भोग मानती है ।
वह यह भी नहीं जानती हैं कि
चरम कामुकता क्या होती है ?
काम के गहन तल तक
कैसे पहुँचा जा सकता है ?
उन्होंने कभी इसका अनुभव ही नहीं किया ।
वह कभी भी
उस शिखर तक पहुँच ही नहीं पायी है ।
सम्भोग के समय जहाँ
उनके शरीर का रोआँ-रोआँ से कम्पित हो उठे,
वह तृप्त हो,
अङ्ग-अङ्ग उससे निखरे ।
उसका अनुभव करना ही
एक स्त्रीत्व का सपना रहता है ।
2 477
अथ योनि संकोचन
आचार्य सामराज योनि को सकुचित करने के उपाय बताते है क्योंकि अधिक चौडी योनि में सम्भोग करने पर घर्षण के अभाव में पुरुष को अधिक आनन्द नहीं आता, क्योंकि प्रायः एक बच्चा होने के बाद योनि चौड़ी हो ही जाती है। भरपूर आनन्द के लिये उसका संकुचित होना आवश्यक है।
न नागराणों भवति प्रवृत्ति, नवप्रसूतासु सुलोचनासु।
पोतदानन्दनिमित्तमात्र, प्रसा संकोचविधि भगस्य॥१४॥
अनुवाद - कुछ समय पहले ही जिनको प्रसव हुआ है, उस सुन्दर नयनों वाली स्त्रियों के प्रति सुशिक्षित सभ्य पुरुषों को सम्भोग इच्छा नहीं होती, क्योंकि उनकी योनी फैल जाती है। अतः पुरुष को वह आनन्द नहीं आता, जो बच्चा पैदा होने से पहले आता था। अत: उस सुन्दरी के प्रति पुरुष की सम्भोगेच्छा कम हो जाती है. स्वाभाविक है कि कुछ पुरुष अन्य स्त्रियों के आकांक्षी हो ही जायेंगे। इसीलिये आचार्य सामराज ने पुरुष अन्यमनस्क न हो, इसके लिये उनको भरपूर आनन्द प्राप्त कराने के उद्देश्य से, योनि को संकुचित करने की विधि बता रहे हैं।
तैलं भर्जितवृत्तांकसमुद्भूतं निकेतने।
स्मरस्य लेपयेनारी, योनेः सङ्कोचहेतवे॥१४९॥
अनुवाद- भूंजे हुये बैंगन से निकाले (बचे) तेल को योनि का संकोच करने के लिये स्त्री की योनि में लेप करना चाहिये, इससे योनि सङ्कुचित होगी ।
2 477
एक #स्त्री जब श्रृंगार करती है तब वह सबसे कम समय परन्तु सर्वाधिक एकाग्रता अपनी #बिंदी लगाते वक्त रखती है। वह आइने में एक नजर में जान जाती है कि भौहों के बीच कहां बिंदी जचेगी।
परन्तु रात में वो स्त्री उसी बिंदी को आइने पर चिपका देती है, या फिर बेड के किसी कोने पर। अगर नहीं चिपका पाती है तो वही बिंदी तकिए पर लग जाती है, और वहां से बच गई तो उसे आप बाथरूम के फर्श पर अपनी पकड़ खोते हुए बहते हुए पा सकते है।
है तो आखिर एक बिंदी ही ना, जो हर सुबह नई होकर परिचित #माथे पर लग जाती है, फिर भी एक स्त्री का बिंदी से मोह भंग नहीं होता।
यह कोई बिंदी दर्शन नहीं है। यह कुछ और ही है..
सोचिए स्त्री को बिंदी से इतनी #मुहब्बत क्यों हुई, वो भी उस बिंदी से जो हर सुबह बदल दी जाएगी।
असल में वो मुहब्बत है उसके #प्रियतम के प्रति, अपने मान के प्रति, अपने सम्मान के प्रति..
बिंदी तो सिर्फ एक बहाना है क्योंकि भारतीय स्त्रियां खुल कर प्यार जता नहीं पाती, परन्तु वो बताना चाहती है कि हर रोज बदलने वाली बिंदी पर मेरा इतना ध्यान है तो फिर प्रियतम तुम तो मेरे अर्धांग हो..❤️❤️
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प्रेम की भावनाएं
सराय जैसी नहीं हैं
कि
कोई भी आया ,रूका और चला गया.....!❤️
प्रेम की भावनाएं
महल जैसी हैं
जिसमें
या तो कोई आ नहीं सकता
और
यदि आ जाए तो
फिर जीवन भर
जा नहीं सकता.........❤️❤️
मेरी रती को समर्पित💋😊
2 477
वासना भी आवश्यक है
स्वस्थ काम के लिए।
बिना वासना के सृजन भी नहीं।
काम की कार्य प्रणाली के लिए भी वासना जरूरी है। अकेली काम ऊर्जा असमर्थ है सृजन में।
अनावश्यक वासना ही विध्वंसकारी है।
💕💕💕💕💕
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एक #स्त्री जब श्रृंगार करती है तब वह सबसे कम समय परन्तु सर्वाधिक एकाग्रता अपनी #बिंदी लगाते वक्त रखती है। वह आइने में एक नजर में जान जाती है कि भौहों के बीच कहां बिंदी जचेगी।
परन्तु रात में वो स्त्री उसी बिंदी को आइने पर चिपका देती है, या फिर बेड के किसी कोने पर। अगर नहीं चिपका पाती है तो वही बिंदी तकिए पर लग जाती है, और वहां से बच गई तो उसे आप बाथरूम के फर्श पर अपनी पकड़ खोते हुए बहते हुए पा सकते है।
है तो आखिर एक बिंदी ही ना, जो हर सुबह नई होकर परिचित #माथे पर लग जाती है, फिर भी एक स्त्री का बिंदी से मोह भंग नहीं होता।
यह कोई बिंदी दर्शन नहीं है। यह कुछ और ही है..
सोचिए स्त्री को बिंदी से इतनी #मुहब्बत क्यों हुई, वो भी उस बिंदी से जो हर सुबह बदल दी जाएगी।
असल में वो मुहब्बत है उसके #प्रियतम के प्रति, अपने मान के प्रति, अपने सम्मान के प्रति..
बिंदी तो सिर्फ एक बहाना है क्योंकि भारतीय स्त्रियां खुल कर प्यार जता नहीं पाती, परन्तु वो बताना चाहती है कि हर रोज बदलने वाली बिंदी पर मेरा इतना ध्यान है तो फिर प्रियतम तुम तो मेरे अर्धांग हो..❤️❤️
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स्त्री के लिए सहवास एक सहज क्रिया प्रक्रिया है। क्यों कि साधारण तह वो सहवास डिमांड नहीं करती। और ना ही खुले रूप में कहती। संकोच करती है मगर सैक्स एक्शन में कामैच्छा ज्यादा रहती है। और चाहती है कि वो उसे मिले पर वो मुख्यत पुरुष के व्यवहार पर निर्भर करता है।
हां कुछ ही स्त्री डिमांड भी करती हैं और खुले रूप से कहती भी हैं। और वो अपने इच्छा अनुसार पुरूष से सहयोग करवा भी लेती हैं।पर ये चाहत उसकी सिर्फ मित्र पुरुष से ही हो पाती है
पुरूष के लिए सहवास की क्रिया प्रक्रिया रोजमर्रा की ही है। जैसे रोज़ खाना और रोज सोना। और इसको पूरा करने को वो सहज नहीं रहता।बस डिमांड करता है और खुलेपन में कहता है। यहां तक वो जब चाहे तब की भावना से इसे कार्य रूप में परिवर्तित करने की कोशिश में रहता है।
कुछ ही पुरुष ऐसे होते हैं जो सहज रूप में सहवास की बातें करते हैं अगर पूरी हो तो ठीक और नहीं पूरी हो तो ठीक। ये विरले ही पाये जाते हैं क्योंकि ये सब पुरुष स्वभाव के विपरीत ही है।
मतलब ये पुरूष का सहवास रोज का काम है और स्त्री का सहवास जब तब स्थित परस्थिति के अनुसार ही होता है।ये दूसरी बात है कि पुरुष की रोज की जरूरत को भी स्वीकार कर पूरी करती रहती है।
जो मालूम हुआ, वो पेश है,,,,,,,,
2 477
कुछ भी ध्यान बन सकता!
अपने कमरे के कोने में खड़े हो जाना!
इसे करके देखें। कमरे के कोने में, कुछ न करते हुए, बस चुपचाप खड़े हो जाएं। अचानक ऊर्जा भी आपके भीतर थिर खड़ी हो जाएगी। बैठे हुए आप कई तरह के उपद्रव मन में महसूस करेंगे, क्योंकि बैठने की मुद्रा एक विचारक की मुद्रा है। खड़े होने में ऊर्जा एक स्तंभ के समान प्रवाहित होती है और समान रूप से पूरे शरीर में बहती है। खड़ा होना एक सुंदर अनुभव है।
इसका प्रयोग करके देखें, क्योंकि आप में से बहुतों को यह बहुत अच्छा लगेगा। यदि आप एक घंटा आप मौन खड़े रहें तो तुरंत एक तरह की शांति आपको घेरने लगेगी। इसे अपने कमरे के कोने खड़े रह सकें तो बहुत अच्छा होगा। बिना कुछ किए, बिना हिले-डुले खड़े भर रहने से ही आप पाएंगे कि आपके भीतर कोई चीज ठहर गई है, शांत हो गई है और आप स्वयं को एक ऊर्जा का स्तंभ जैसा महसूस करेंगे। शरीर का पता नहीं चलेगा
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जब हम किसी को प्रेम करते हैं, तो वह जैसा भी है, हम उसे वैसा पूरा स्वीकार कर लेते हैं। वह हमारे साथ जो भी करेगा, वह बुरा तो हो ही नहीं सकता। यह प्रेम की सहज निष्पत्ति है कि वह सारी दुनिया को बुरा दिखाई पड़े, लेकिन प्रेमी को बुरा दिखाई नहीं पड़ सकता।
प्रेमी अपने अहंकार को छोड़ ही चुका होता है। और राम सीता को भेज सकते हैं वनवास, क्योंकि यह सीता का भेजना नहीं, खुद का ही जाना है। यह भेद इतना भी नहीं रहा है।
इसलिए जब हम दूसरे को कुछ कष्ट दे रहे हों, तो विचार भी उठता है। जब अपने को ही किसी त्याग या कष्ट में ले जा रहे हों, तो विचार का कोई सवाल नहीं। सीता इतनी अपनी है राम को कि छोड़ने में उन्हें यह विचार नहीं उठा कि कुछ अनुचित हो रहा है। जैसे वे खुद एक दिन पिता के कहने पर जंगल चले गए थे, वैसे ही सीता भी जंगल चली जाती है। जहां प्रेम है, वहां प्रश्न नहीं है, वहां एक परम स्वीकृति है।
राम और सीता के बीच जो घटना घटी है, वह प्रेम की ही अनन्य घटना है। और पति-पत्नी होना गौण है। वह सामाजिक उपचार है। वह समाज की स्वीकृति है। वह मूल आधार नहीं है।
और सीता के मन में दूसरे पुरुष का सवाल नहीं उठेगा। जहां प्रेम की कमी है, वहीं दूसरे का सवाल उठता है। और राम के मन में दूसरी स्त्री का प्रश्न नहीं उठेगा। जहां प्रेम की कमी है, जहां हम तृप्त नहीं हैं, अतृप्त हैं, वहीं दूसरा हमें आकर्षित करता है।
🙏🙏🙏🙏🙏
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सेक्स तो आमोद-प्रमोद पूर्ण होना चाहिए। न कि गंभीर मामला जैसा कि अतीत में बना दिया गया। यह तो एक नाटक की तरह होना चाहिए, एक खेल कि तरह: मात्र दो लोग एक दूसरे की शारीरिक ऊर्जा के साथ खेल रहे है। यदि वे दोनों खुश है, तो इसमें किसी दूसरे की दखल अंदाजी नहीं होनी चाहिए। वे किसी को नुकसान नहीं पहुंचा रहे। वे बस एक दूसरे की ऊर्जा का आनंद ले रहे है। यह ऊर्जाओं का एक साथ नृत्य है। इसमें समाज का कुछ लेना देना नहीं है। जब तक कि कोई एक दूसरे के जीवन में नुकसान न दें। अपने को थोपे, लादे, हिंसात्मक न हो, किसी के जीवन को नुकसान न पहुँचाए, तब ही समाज को बीच में आना चाहिए। अन्यथा कोई समस्या नहीं है; इसका किसी तरह से लेना देना नहीं होना चाहिए।
सेक्स के बारे में भविष्य में पूरा अलग ही नजरिया होगा। यह अधिक खेल पूर्ण, आनंद पूर्ण, अधिक मित्रतापूर्ण, अधिक सहज होगा। अतीत की तरह गंभीर बात नहीं। इसने लोगों का जीवन बर्बाद कर दिया है। बेवजह सरदर्द बन गया था। इसने बिना किसी कारण—ईर्ष्या, अधिकार, मलकियत, किचकिच, झगड़ा, मारपीट, भर्त्सना पैदा की।
सेक्स साधारण बात है, जैविक घटना मात्र। इसे इतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। इसका इ तना ही महत्व है कि ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन किया जा सके। यह अधिक से अधिक आध्यात्मिक हो सकता है। और अधिक आध्यात्मिक बनाने के लिए इसे कम से कम गंभीर मसला बनाना होगा।
सेक्स से संबंधित नैतिकता के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित मत होओ, यह पूरी तरह से समाप्त हो जाने वाला है। भविष्य में सेक्स के बारे में पूरी तरह से नया ही दृष्टिकोण होगा। और एक बार सेक्स का नैतिकता से इतना गहरा संबंध समाप्त हो जायेगा। तो नैतिकता का संबंध दूसरी अन्य बातों से हो जायेगा जिनका अधिक महत्व है।
सत्य, ईमानदारी, प्रामाणिकता, पूर्णता, करूण, सेवा, ध्यान, असल में इन बातों का नैतिकता से संबंध होना चाहिए। क्योंकि ये बातें है जो तुम्हारे जीवन को रूपांतरित करती है। ये बातें है जो तुम्हें अस्तित्व के करीब लाती है।
2 477
कोई वादा नही
फिर भी तेरा इंतेज़ार है
जुदाई के बाद भी
तुझसे प्यार है
तेरे चेहरे की उदासी
दे रही है गवाही
मुझसे मिलने के लिए
तू भी बेकरार है!!
Kontent 18 yoshdan oshgan foydalanuvchilar uchun mavjud
Xizmatga kirish orqali siz 18 yoshdan oshganingizni tasdiqlaysiz.
