uz
Feedback
Vaidic Physics

Vaidic Physics

Kanalga Telegram’da o‘tish

If you are interested in VAIDIC PHYSICS and want to promote it, you can join the amazing Research on Aitarey Brahman being done by Rev. Acharya Agnivrat Ji. You can help us as per your interest and ability. Join Channel and contribute in this noble work.

Ko'proq ko'rsatish
1 727
Obunachilar
Ma'lumot yo'q24 soatlar
-27 kunlar
-430 kunlar
Obunachilarni jalb qilish
Iyun '26
Iyun '26
+17
1 kanalda
May '26
+25
1 kanalda
Get PRO
Aprel '26
+18
0 kanalda
Get PRO
Mart '26
+17
0 kanalda
Get PRO
Fevral '26
+23
0 kanalda
Get PRO
Yanvar '26
+22
2 kanalda
Get PRO
Dekabr '25
+20
0 kanalda
Get PRO
Noyabr '25
+18
0 kanalda
Get PRO
Oktabr '25
+30
1 kanalda
Get PRO
Sentabr '25
+14
0 kanalda
Get PRO
Avgust '25
+24
0 kanalda
Get PRO
Iyul '25
+31
1 kanalda
Get PRO
Iyun '25
+32
0 kanalda
Get PRO
May '25
+45
2 kanalda
Get PRO
Aprel '25
+44
4 kanalda
Get PRO
Mart '25
+37
1 kanalda
Get PRO
Fevral '25
+33
0 kanalda
Get PRO
Yanvar '25
+57
0 kanalda
Get PRO
Dekabr '24
+45
0 kanalda
Get PRO
Noyabr '24
+50
0 kanalda
Get PRO
Oktabr '24
+59
0 kanalda
Get PRO
Sentabr '24
+66
0 kanalda
Get PRO
Avgust '24
+57
1 kanalda
Get PRO
Iyul '24
+38
1 kanalda
Get PRO
Iyun '24
+33
0 kanalda
Get PRO
May '24
+35
0 kanalda
Get PRO
Aprel '24
+35
0 kanalda
Get PRO
Mart '24
+44
0 kanalda
Get PRO
Fevral '24
+79
2 kanalda
Get PRO
Yanvar '24
+88
2 kanalda
Get PRO
Dekabr '23
+70
0 kanalda
Get PRO
Noyabr '23
+21
0 kanalda
Get PRO
Oktabr '23
+21
0 kanalda
Get PRO
Sentabr '23
+19
0 kanalda
Get PRO
Avgust '23
+17
0 kanalda
Get PRO
Iyul '23
+23
0 kanalda
Get PRO
Iyun '23
+17
0 kanalda
Get PRO
May '23
+31
0 kanalda
Get PRO
Aprel '23
+18
0 kanalda
Get PRO
Mart '23
+18
0 kanalda
Get PRO
Fevral '23
+12
0 kanalda
Get PRO
Yanvar '23
+40
0 kanalda
Get PRO
Dekabr '22
+43
0 kanalda
Get PRO
Noyabr '22
+29
0 kanalda
Get PRO
Oktabr '22
+18
0 kanalda
Get PRO
Sentabr '22
+43
0 kanalda
Get PRO
Avgust '22
+48
0 kanalda
Get PRO
Iyul '22
+90
0 kanalda
Get PRO
Iyun '22
+56
0 kanalda
Get PRO
May '22
+38
0 kanalda
Get PRO
Aprel '22
+32
0 kanalda
Get PRO
Mart '22
+54
0 kanalda
Get PRO
Fevral '22
+35
0 kanalda
Get PRO
Yanvar '22
+36
0 kanalda
Get PRO
Dekabr '21
+32
0 kanalda
Get PRO
Noyabr '21
+34
0 kanalda
Get PRO
Oktabr '21
+59
0 kanalda
Get PRO
Sentabr '21
+46
0 kanalda
Get PRO
Avgust '21
+31
0 kanalda
Get PRO
Iyul '21
+69
0 kanalda
Get PRO
Iyun '21
+104
0 kanalda
Get PRO
May '21
+78
0 kanalda
Get PRO
Aprel '21
+77
0 kanalda
Get PRO
Mart '21
+43
0 kanalda
Get PRO
Fevral '21
+59
0 kanalda
Get PRO
Yanvar '21
+89
0 kanalda
Get PRO
Dekabr '20
+936
0 kanalda
Sana
Obunachilarni jalb qilish
Esdaliklar
Kanallar
20 Iyun0
19 Iyun0
18 Iyun0
17 Iyun0
16 Iyun0
15 Iyun0
14 Iyun+3
13 Iyun+2
12 Iyun0
11 Iyun+1
10 Iyun0
09 Iyun+1
08 Iyun0
07 Iyun+3
06 Iyun+2
05 Iyun0
04 Iyun0
03 Iyun+1
02 Iyun+2
01 Iyun+2
Kanal postlari
ऋषि दयानन्द पर ही आक्रमण क्यों? https://youtu.be/_j3fRfct5VE

2
🎧 Podcast | Einstein के सापेक्षता सिद्धान्त को चुनौती देने वाले भारतीय वैज्ञानिक https://youtu.be/J2RVK-cY1SM
170
3
वेद के बारे में ऐसी जानकारी और कहीं नहीं मिलेगी https://youtu.be/-UURM6wNn8U
278
4
Matn yo'q...
627
5
Matn yo'q...
390
6
Matn yo'q...
402
7
है, स्वयं वैज्ञानिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि जीवविज्ञान सहित अनेक विज्ञानों के बड़े भाग गणितीय समीकरणों पर आधारित नहीं होते। वैदिक फिजिक्स वास्तव में आधुनिक भौतिकी से आगे की अवधारणा प्रस्तुत कर रही है, तो स्वाभाविक है कि उसके परीक्षण भी सामान्य स्तर के नहीं होंगे। असाधारण अनुसंधानों के परीक्षण के लिए असाधारण स्तर की शोध, संसाधन और समय चाहिए होता है। ऐसे कार्य वर्षों नहीं, दशकों में विकसित होते हैं। अतः किसी भी मत, सिद्धान्त या ज्ञान-परम्परा के सम्बन्ध में सबसे उचित मार्ग यही है कि उसके तर्कों की समीक्षा की जाए, उसके प्रमाणों काj परीक्षण किया जाए और उसके निष्कर्षों पर खुले मन से विचार किया जाए। केवल ‘छद्मविज्ञान’ जैसे शब्दों का प्रयोग करके किसी विचार को अस्वीकार कर देना, न तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, न बौद्धिक ईमानदारी। यह वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं बल्कि अधैर्यपूर्ण निर्णय है। वास्तविक विज्ञान प्रश्न पूछने, तर्क करने और सत्य की खोज करने का नाम है, लेबल लगाने और संवाद समाप्त करने का नहीं। ज्ञान-विमर्श का उद्देश्य पूर्वनिर्धारित धारणाओं की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि सत्य की खोज होना चाहिए। —विशाल आर्य
377
8
क्या वेदों का विज्ञान ‘छद्मविज्ञान’ है? आजकल कुछ लोगों द्वारा किसी भी ऐसे विचार, सिद्धान्त या ज्ञान-परम्परा, जो आधुनिक पश्चिमी धारणाओं से भिन्न हो, को तुरन्त ‘छद्मविज्ञान’ (Pseudoscience) कहकर नकारने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। वास्तव में ‘छद्मविज्ञान’ का आविष्कार पश्चिमी लोगों ने एक वैचारिक लेबल के रूप में प्रयुक्त किया है, जिसके माध्यम से ‘वैदिक विज्ञान’ (ऋषियों के ज्ञान-विज्ञान) को नीचा दिखाया जा सके। वैदिक मत को उसके तर्कों की समीक्षा किए बिना ही सन्देहास्पद या हास्यास्पद सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है। वास्तव में छद्मविज्ञान उस विचार, मत या सिद्धान्त को कहा जाता है, जो तर्कसंगतता और प्रमाण पर खरा नहीं उतरता। आधुनिक विज्ञान के भी अनेक मत वा सिद्धान्त तर्कों और प्रमाणों पर खरे नहीं उतरते, तो उसे ‘छद्मविज्ञान’ की श्रेणी में क्यों नहीं रखा जाना चाहिए? यदि किसी को आचार्य अग्निव्रत जी बातों से असहमति है, तो उसका विवाद वास्तव में आचार्य जी से नहीं, बल्कि उन वेद एवं आर्ष ग्रन्थों से है, जिनके आधार पर वे अपने सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं। वे अपने मन से कोई कल्पना नहीं कर रहे, बल्कि ऋषियों के ग्रन्थों की ऋषियों के प्रमाणों के आधार पर ही उनकी की व्याख्या कर रहे हैं। यदि उन व्याख्याओं को अस्वीकार किया जाता है, तो ऐसा करने वालों को स्पष्ट रूप से यह स्वीकार करना चाहिए कि उन्हें ऋषियों को प्रमाण नहीं मानना। यदि शब्दप्रमाण का उनके लिए कोई महत्त्व नहीं है, तो आधुनिक वैज्ञानिकों के कथनों को वे किस आधार पर स्वीकार करते हैं? क्या प्रत्येक व्यक्ति स्वयं उन सभी प्रयोगों को कर सकता है या वैज्ञानिकों के कथनों पर विश्वास करता है? यदि वहाँ शब्दप्रमाण मान्य है, तो यहाँ उसे अस्वीकार कर देना निष्पक्षता नहीं, बल्कि दोहरे मापदण्ड का परिचायक है। किसी भी विचारधारा या सिद्धान्त पर निर्णय देने से पूर्व उसके मूल ग्रन्थों का अध्ययन आवश्यक है। यदि बिना मूल ग्रन्थ पढ़े केवल कुछ वीडियो देखकर निष्कर्ष बना लिया, तो यह पूर्वाग्रह का द्योतक है। विज्ञान का वास्तविक आधार किसी व्यक्ति, संस्था, विश्वविद्यालय, पत्रिका अथवा विशेषज्ञ-समूह की स्वीकृति नहीं, बल्कि तर्क और प्रमाण है। किसी विचार की सत्यता इस बात से निर्धारित नहीं होती कि उसे कितने लोग स्वीकार करते हैं, बल्कि इस बात से होती है कि उसके द्वारा प्रस्तुत तर्क और प्रमाण कितने सुदृढ़ हैं। यदि प्रमाण ऋषियों के हों, तो उस पर सन्देह करना मूर्खता और मानसिक गुलामी का परिचायक है। यदि बहुमत ही सत्य का निर्णायक होता, तो इतिहास में अनेक वैज्ञानिक धारणाएँ कभी स्थापित ही नहीं हो पातीं, क्योंकि प्रारम्भ में वे भी अल्पसंख्यक मत ही थीं। भारतीय ज्ञान-परम्परा का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि यहाँ विचारों का निर्णय शास्त्रार्थ द्वारा किया जाता था। किसी मत से असहमति होने पर उसके तर्कों का उत्तर दिया जाता था, उसे किसी अपमानजनक उपाधि से चिह्नित कर चर्चा समाप्त नहीं कर दी जाती थी। यही कारण था कि भारतीय बौद्धिक परम्परा में शास्त्रार्थ को अत्यन्त महत्त्व प्राप्त था। वर्तमान में एक ऐसी मानसिकता विकसित हो गई है, जिसमें किसी विचार का मूल्यांकन उसके तर्कों से अधिक उसकी संस्थागत स्वीकृति के आधार पर किया जा रहा है। यदि कोई विचार किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित है, तो उसे स्वतः विश्वसनीय मान लिया जाता है और यदि वह वहाँ प्रकाशित नहीं है, तो उसे बिना गम्भीर परीक्षण के ही अस्वीकार कर दिया जाता है। जबकि इतिहास यह दर्शाता है कि पेपर की प्रणाली स्वयं त्रुटिरहित नहीं है। अनेक बार त्रुटिपूर्ण शोध-पत्र प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं और अनेक महत्त्वपूर्ण विचार प्रारम्भ में मुख्यधारा की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सके थे। अतः किसी विचार का अन्तिम मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वह किसी विशेष मंच पर प्रकाशित हुआ है या नहीं। भारतीय परम्परा में ऋषियों को ज्ञान का स्रोत इसलिए माना गया, क्योंकि उनके प्रतिपादन तर्क, अनुभव और साधना पर आधारित माने गए। यदि उनके किसी कथन पर चर्चा करनी है, तो उसका परीक्षण भी उसी प्रकार होना चाहिए— तर्क और प्रमाण के आधार पर। यह मान लेना कि किसी पश्चिमी अकादमिक संस्था की स्वीकृति के बिना कोई विचार विचारणीय ही नहीं है, बौद्धिक दासता से बढ़कर कुछ नहीं है। ज्ञान का मूल्यांकन ज्ञान के आधार पर होना चाहिए, न कि उसके स्रोत की प्रतिष्ठा या अप्रतिष्ठा के आधार पर। किसी विचार के समर्थन में यदि अभी पर्याप्त गणितीय प्रतिपादन, प्रयोगात्मक सत्यापन या व्यापक वैज्ञानिक स्वीकृति उपलब्ध नहीं है, तो उससे अधिकतम इतना कहा जा सकता है कि वह सिद्ध एवं स्थापित विज्ञान नहीं है। किन्तु केवल इसी आधार पर उसे छद्मविज्ञान घोषित कर देना स्वयं अवैज्ञानिक दृष्टिकोण है। यह कहना कि जहाँ गणित नहीं है, वहाँ विज्ञान नहीं
305
9
🔬 वैज्ञानिकों के साथ मेरे अनुभव विज्ञान-जगत के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों और वैज्ञानिकों के साथ वर्षों तक संवाद और चर्चा करके आचार्य जी को अनेक महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त हुए। इस वीडियो में उन्होंने अपने कुछ ऐसे अनुभव साझा किए हैं, जो विज्ञान, शोध और सत्य की खोज से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए विचारणीय हैं। यदि आप वैज्ञानिक जगत और दृष्टिकोण की वास्तविकता को समझना चाहते हैं, तो यह वीडियो अवश्य देखें। 🎥 वीडियो लिंक 👇 https://youtu.be/eNGdpxV50nk #Science #Scientists #Research #IndianScience #Physics #VaidicPhysics #AcharyaAgnivrat
322
10
Matn yo'q...
740
11
अदृश्य वैश्विक षड्यन्त्र और वैदिक समाधान (वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान — वार्षिक कार्यक्रम) 📆 दिनांक— 25, 26 व 27 दिस
अदृश्य वैश्विक षड्यन्त्र और वैदिक समाधान (वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान — वार्षिक कार्यक्रम) 📆 दिनांक— 25, 26 व 27 दिसम्बर (शुक्रवार, शनिवार एवं रविवार) पौष कृ. २, ३ व ४ वि. सं. २०८३, सृष्टि सम्वत् १,९६,०८,५३,१२७ 📑 कार्यक्रम के विषय— 1. आर्यावर्त का प्राचीन गौरव 2. विदेशी षड्यन्त्र 3. विनाश की ओर सभ्यता 4. अन्त की ओर सनातन धर्म 5. गौ आधारित कृषि 6. पूर्ण समाधान - वैदिक विज्ञान 7. फार्मा कम्पनियों का मकड़जाल 8. रुपये का खेल 9. मानसिक गुलामी 10. संयुक्त राष्ट्र एजेंडा 2030 ...और भी ऐसे ही अनेक गम्भीर विषयों पर चर्चा होगी। पंजीकरण करने के लिए लिंक— 🔗 https://tinyurl.com/vaishvikshadyantra 📍स्थान— श्री विजयपताका महातीर्थ, सिरोही अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें— ☎️ 9829148400
575
12
Matn yo'q...
886
13
(Meditation) और योग को तनाव कम करने तथा मानसिक स्वास्थ्य सुधारने में उपयोगी मानने लगा है। जब तक मनुष्य का मन शुद्ध नहीं होगा, तब तक बाहरी व्यवस्था भी स्थायी रूप से संतुलित नहीं हो सकती। यदि मनुष्य भीतर से अशान्त होगा, तो वह प्रकृति, समाज और संसाधनों का भी असन्तुलित उपयोग करेगा। इसी कारण वैदिक विचारधारा बाहरी व्यवस्था से पहले आन्तरिक सन्तुलन पर बल देती है। इसीलिए मैं आज यह आह्वान करता हूँ कि यदि मानवता को प्राकृतिक आपदाओं, रोगों, मानसिक तनाव और सामाजिक अशान्ति से बचना है, तो जीवन की दिशा बदलनी होगी। सादगी और सहजता को अपनाना होगा। विलासिता और अति-उपभोग की प्रवृत्ति को छोड़ना होगा। जिन वस्तुओं से प्रदूषण और असन्तुलन बढ़ता है, उनका न्यूनतम उपयोग करना होगा। यदि मनुष्य प्रकृति के साथ सामञ्जस्य स्थापित करके, सीमित आवश्यकताओं और शुद्ध विचारों के साथ जीवन जीना सीख ले, तो वही भविष्य में शान्तिमय और सन्तुलित सभ्यता का आधार बन सकता है। —आचार्य अग्निव्रत प्रमुख, वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान (श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास द्वारा संचालित) 🌍 https://vaidicphysics.org
386
14
शान्तिमय वैदिक मार्ग यदि विकास मनुष्य को रोगी बना रहा है, यदि विकास प्राकृतिक आपदाओं को बढ़ा रहा है, यदि विकास मनुष्य को भय, तनाव और मृत्यु की ओर धकेल रहा है, तो फिर ऐसा विकास किस काम का? आज विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार मानसिक तनाव, अवसाद, हृदय रोग और जीवनशैली-सम्बन्धी रोग तीव्र गति से बढ़ रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली में सुविधा तो बढ़ी है, किन्तु मानसिक शान्ति और सन्तुलन घटता जा रहा है। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र और जलवायु वैज्ञानिकों की अनेक रिपोर्टों में यह बताया गया है कि बढ़ता औद्योगिकीकरण, अत्यधिक ऊर्जा-उपभोग और प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुन्ध दोहन जलवायु असन्तुलन को बढ़ा रहा है। इसलिए मनुष्य को उस सृष्टि को समझना होगा, जिसमें वह रह रहा है। जब तक मनुष्य सृष्टि, जीवात्मा और परमात्मा के विषय में ठीक प्रकार से नहीं समझेगा, तब तक वह संसार में सन्तुलित ढंग से जीना नहीं सीख पाएगा। सृष्टि को समझने का सबसे निरापद और सबसे व्यापक मार्ग वेद तथा वैदिक विज्ञान है। संसार की अन्य शिक्षा-पद्धतियाँ भौतिक उन्नति तो दे सकती हैं, किन्तु वे मनुष्य को सृष्टि, चेतना और जीवन के गहरे सन्तुलन के विषय में पूर्ण ज्ञान नहीं दे सकतीं। आधुनिक विज्ञान आज ब्रह्माण्ड, क्वाण्टम सिद्धान्त, चेतना-अध्ययन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषयों पर शोध कर रहा है, किन्तु अभी भी ‘चेतना क्या है?’ इस प्रश्न का उत्तर विज्ञान के पास नहीं है। मनुष्य आकाश में उड़ सकता है, समुद्रों की यात्राएँ कर सकता है, चन्द्रमा और मंगल तक पहुँच सकता है; किन्तु यदि उसे धरती पर रहना नहीं आयेगा, इसलिए उसकी सभी उपलब्धियाँ अधूरी रहेंगी। धरती पर रहना केवल भौतिक रूप से जीवित रहना नहीं है, बल्कि यह जानना है कि मनुष्यों के साथ कैसा व्यवहार करना है, पशु-पक्षियों और अन्य प्राणियों के साथ कैसा सम्बन्ध रखना है, प्रकृति के साथ कैसे सन्तुलन बनाना है। यही वैदिक जीवन-दृष्टि का मूल आधार है। वेद सम्पूर्ण सृष्टि को एक परिवार के रूप में देखते हैं। कोई मत केवल अपने समुदाय को परिवार मानता है, तो कोई केवल अपने सम्प्रदाय को। किन्तु वेद यह कहता है कि सभी प्राणी एक ही परमात्मा की सन्तान हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना इसी व्यापक दृष्टि को प्रकट करती है। ईश्वर पिता है और प्रकृति माता है। यह पृथिवी/भूमि माता है। अथर्ववेद में “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” कहा गया है अर्थात् ‘भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।’ जब मनुष्य धरती को माता और ईश्वर को पिता मानने लगेगा, तब वह किसी जीव को केवल भक्ष्य या उपभोग की वस्तु नहीं समझेगा। तब सभी प्राणी उसके सहचर और सहयोगी बनेंगे। इसीलिए वैदिक जीवन-दृष्टि में सादगी, आत्मसंयम, आत्मनिर्भरता और परस्पर मैत्री को महत्त्व दिया गया। वास्तविक विकास को बाहरी चमक-दमक, मशीनों और उपभोग से नहीं जोड़ा गया, बल्कि सत्य, ईमानदारी, शान्ति, भाईचारे, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, तपस्या और सादगी से जोड़ा गया। आज ‘मिनिमलिज़्म’ और ‘सस्टेनेबल लिविंग’ जैसे विचार पश्चिमी देशों में भी लोकप्रिय हो रहे हैं, जहाँ लोग सीमित उपभोग और प्रकृति-सम्मत जीवन की ओर लौटने की बात कर रहे हैं। यदि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर ले और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीना सीखे, तो वही स्थायी सुख और शान्ति का मार्ग हो सकता है। वर्तमान व्यवस्था में जीडीपी बढ़ाने के लिए मनुष्य को बाज़ार पर निर्भर बनाया जा रहा है। विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाएँ भी आर्थिक वृद्धि को मुख्यतः उत्पादन और उपभोग से मापती हैं। किन्तु वैदिक दृष्टि आत्मनिर्भरता पर बल देती है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी मूल आवश्यकताओं को यथासम्भव स्वयं पूरा कर सके, प्रकृति के साथ जुड़ा रहे और सीमित संसाधनों में संतोषपूर्वक जीवन जी सके, इसी को वास्तविक समृद्धि कहा गया। भारत की पारम्परिक ग्राम-व्यवस्था भी इसी सिद्धान्त पर आधारित थी, जहाँ अधिकांश आवश्यकताएँ स्थानीय स्तर पर पूर्ण हो जाती थीं। वैदिक जीवनशैली को इसी कारण केवल धार्मिक विचार नहीं, बल्कि जीवन और सृष्टि के संतुलन का मार्ग बताया गया। यही एकमात्र मार्ग मनुष्य, समाज, प्रकृति और सम्पूर्ण सृष्टि के बीच सामंजस्य स्थापित कर सकता है। आधुनिक सभ्यता में सबसे बड़ा प्रदूषण केवल वायु, जल या भूमि का नहीं, बल्कि विचारों का प्रदूषण है। ईर्ष्या, क्रोध, हिंसा, लालच और भोगवाद मनुष्य के मन को अशान्त कर रहे हैं। सोशल मीडिया, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और उपभोगवादी संस्कृति ने मानसिक तनाव को और बढ़ाया है। अनेक अध्ययनों में बताया गया है कि डिजिटल व्यसन, निरन्तर तुलना और भोगवादी जीवनशैली से अकेलापन, तनाव और मानसिक अशान्ति बढ़ रही है। वैदिक मार्ग मन और विचारों की शुद्धि पर बल देता है, जिसमें योग, ध्यान, यज्ञ, स्वाध्याय और सात्त्विक जीवनशैली को मन की शान्ति का आधार माना गया। आज आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान भी ध्यान
311
15
धर्म की चिता जलाते तथाकथित धर्मगुरु https://youtu.be/HqDRSKlom7Y
483
16
Matn yo'q...
1 001
17
वेव्स और जलवायु असन्तुलन के रूप में। आज संसार के अनेक भागों में हीट वेव्स की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ती दिखाई दे रही है। भारत में भी दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में 45°C से अधिक तापमान सामान्य होता जा रहा है। वैज्ञानिक संस्थाएँ इसे बढ़ती ऊर्जा-खपत, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि से जोड़कर देखती हैं। पहले मनुष्य और पशुओं की ऊर्जा का उपयोग अधिक होता था। बैल हल चलाते थे, कोल्हू चलाते थे। मनुष्य अपने हाथों से कार्य करता था। उस व्यवस्था में न वायु प्रदूषण था, न भारी ऊर्जा की आवश्यकता। बैल खेत में चलते हुए गोबर और मूत्र के माध्यम से भूमि को उर्वर भी बनाते जाते थे। गाँवों की अर्थव्यवस्था स्थानीय और प्रकृति-सापेक्ष थी। किन्तु ट्रैक्टर और मशीनों के आने के बाद डीजल, पेट्रोल और भारी उद्योगों पर निर्भरता बढ़ गई। अब जहाँ मशीनें हैं, वहाँ ईंधन है; जहाँ ईंधन है, वहाँ प्रदूषण है। रीसाइकलिंग को भी समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, किन्तु उसमें भी ऊर्जा लगती है। यदि प्लास्टिक बनाया गया, तो उसमें प्रदूषण हुआ। उसे गलाकर पुनः उपयोग में लाया जाएगा, तब भी ऊर्जा और प्रदूषण होगा। फिर उससे नई वस्तु बनेगी, उसमें भी ऊर्जा और प्रदूषण होगा। एल्यूमिनियम, इस्पात, प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे के पुनर्चक्रण में बड़ी मात्रा में बिजली और तापीय ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस प्रकार आधुनिक सभ्यता एक ऐसे चक्र में फँस गई है जहाँ हर समाधान के भीतर भी ऊर्जा-उपभोग और प्रदूषण छिपा हुआ है। आज डिजिटल सभ्यता स्वयं भी विशाल ऊर्जा-उपभोग का स्रोत बन चुकी है। इंटरनेट, क्लाउड कम्प्यूटिंग, क्रिप्टोकरेंसी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डाटा भण्डारण के लिए विश्वभर में विशाल डाटा सेन्टर बनाए जा रहे हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार AI आधारित डाटा सेन्टरों के कारण अमेरिका और यूरोप में बिजली की माँग तेजी से बढ़ रही है। इसलिए प्रकृति-सम्मत ऊर्जा और कृत्रिम ऊर्जा में अन्तर समझना आवश्यक है। मनुष्य और पशुओं की स्वाभाविक ऊर्जा निरापद थी, किन्तु आधुनिक ऊर्जा-व्यवस्था ने वायु, जल, भूमि और यहाँ तक कि आकाश तक को प्रभावित कर दिया। यदि विकास का अर्थ केवल ऊर्जा-उपभोग बढ़ाना बन जाएगा, तो अन्ततः उसका परिणाम प्रदूषण, तापवृद्धि और प्रकृति के असन्तुलन के रूप में सामने आएगा। अतः आवश्यक यह है कि विकास की परिभाषा केवल अधिक उत्पादन, अधिक उपभोग और अधिक ऊर्जा-व्यय तक सीमित न रहे, बल्कि प्रकृति-सन्तुलन, स्थानीय जीवन-पद्धति, सीमित उपभोग और पर्यावरणीय सामञ्जस्य को भी उसमें सम्मिलित किया जाए, अन्यथा विनाश निश्चित है। —आचार्य अग्निव्रत प्रमुख, वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान (श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास द्वारा संचालित) 🌍 https://vaidicphysics.org सन्दर्भ— 1. International Energy Agency (IEA) — Electricity 2025 Report https://www.iea.org/reports/electricity-2025 2. Reuters — Global electricity demand to grow by 4% through 2027 https://www.reuters.com/business/energy/global-electricity-demand-grow-by-4-through-2027-iea-says-2025-02-14/ 3. Reuters — Canada plans to double electricity grid by 2050 https://www.reuters.com/business/energy/canada-unveils-plan-double-capacity-electricity-grid-by-2050-2026-05-14/ 4. Reuters — US power use expected to hit record highs due to AI and data centres https://www.reuters.com/business/energy/us-power-use-beat-record-highs-2026-2027-ai-use-surges-eia-says-2026-05-12/ 5. The Guardian — Data centres consuming massive electricity https://www.theguardian.com/technology/2026/may/13/datacentres-electricity-consumption-uk-us-ai
670
18
विकास की दौड़ विनाश की ओर आज संसार में विकास का सबसे बड़ा मानदण्ड ऊर्जा की खपत को बना दिया गया है। जो देश जितनी अधिक ऊर्जा का उपयोग करता है, उसे उतना ही अधिक विकसित माना जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेन्सी (IEA) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक विद्युत-उपभोग में तीव्र वृद्धि हो रही है और 2025 से 2027 तक प्रतिवर्ष लगभग 4% वृद्धि का अनुमान व्यक्त किया गया है। आधुनिक उद्योग, एयर कण्डीशनर, डाटा सेन्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इलेक्ट्रिक वाहन और डिजिटल तन्त्र इस बढ़ती हुई ऊर्जा-आवश्यकता के प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि किसी देश को विकसित बनना है, तो उसे अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न भी करनी होगी और उसका उपभोग भी बढ़ाना होगा। यही कारण है कि आज सब कुछ बिजली से चलाने की बात की जा रही है— वाहन, रेलें, उद्योग, घर, मशीनें और सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था। आज अनेक देशों में पेट्रोल और डीजल वाहनों को धीरे-धीरे हटाकर इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ने की नीतियाँ बनाई जा रही हैं। कनाडा जैसे देश तो 2050 तक अपनी विद्युत-ग्रिड क्षमता को लगभग दुगुना करने की योजनाएँ प्रस्तुत कर चुके हैं, क्योंकि भविष्य की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को बिजली-आधारित माना जा रहा है। किन्तु प्रश्न यह है कि इतनी ऊर्जा आएगी कहाँ से? कहा जाता है कि परमाणु ऊर्जा होगी, सोलर प्लांट होंगे, बैटरियाँ होंगी। किन्तु हर प्रकार की ऊर्जा के साथ कोई न कोई प्रदूषण और असन्तुलन जुड़ा हुआ है। यदि पेट्रोलियम, डीजल और कोयले से ऊर्जा बनेगी, तो वायु प्रदूषण बढ़ेगा। विश्व के अनेक देशों में आज भी विद्युत उत्पादन का बड़ा भाग कोयले और गैस से ही होता है। भारत में भी 2024 में लगभग 74% विद्युत उत्पादन कोयले पर आधारित बताया गया। यदि धरती के भीतर से निरन्तर खनिज, कोयला और तेल निकाला जाएगा, तो धरती भीतर से खोखली होती जाएगी और खनन से भूमि, जल तथा वन-तन्त्र पर भी प्रभाव पड़ेगा। यदि बड़े-बड़े सोलर प्लांट लगाए जाएँगे, तो भूमि और स्थानीय तापमान प्रभावित होंगे। विशाल सौर-पार्कों के लिए हजारों एकड़ भूमि की आवश्यकता होती है। राजस्थान, गुजरात, चीन और अमेरिका में बने विशाल सौर-उद्यानों के कारण स्थानीय जैव-विविधता, भूमि-ताप और पारिस्थितिकी पर प्रभाव सम्बन्धी अध्ययन सामने आए हैं। यदि सब कुछ बैटरी पर आधारित होगा, तो भविष्य में लिथियम, कोबाल्ट और बैटरियों के विशाल कचरे का संकट उत्पन्न होगा। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आने वाले दशकों में प्रयुक्त बैटरियों के पुनर्चक्रण और निस्तारण की समस्या अत्यन्त बड़ी हो सकती है। ऊर्जा का उत्पादन जितना बढ़ेगा, उतनी ही ऊष्मा भी बढ़ेगी। किसी भी प्रकार की ऊर्जा में ऊष्मा अवश्य होती है। ऊष्मागतिकी के सिद्धान्तों के अनुसार ऊर्जा-परिवर्तन के साथ ऊष्मा उत्पन्न होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। जहाँ ऊर्जा उत्पन्न होती है, वहाँ भी ताप बढ़ता है और जहाँ उसका उपयोग होता है, वहाँ भी ताप उत्पन्न होता है। ताप-विद्युत संयन्त्रों, डाटा सेन्टरों, भारी मशीनों और औद्योगिक इकाइयों से निरन्तर ऊष्मा वातावरण में जाती रहती है। आज बड़े-बड़े AI डाटा सेन्टरों की बिजली-खपत इतनी अधिक हो चुकी है कि ब्रिटेन और अमेरिका में कुछ अध्ययनों के अनुसार डाटा सेन्टर कुल बिजली-आपूर्ति का लगभग 6% तक उपयोग कर रहे हैं। एसी और फ्रिज जैसे उपकरण भीतर की गर्मी को बाहर फेंकते हैं। वे वास्तव में शीत उत्पन्न नहीं करते, बल्कि ताप को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजते हैं। यही कारण है कि अत्यधिक एसी उपयोग वाले महानगरों में बाहरी तापमान और “अर्बन हीट आइलैण्ड” प्रभाव बढ़ने की चर्चा की जाती है। यदि सम्पूर्ण सभ्यता निरन्तर ऊर्जा-उपभोग पर आधारित होगी, तो धरती का तापमान बढ़ना स्वाभाविक माना गया। आज वायुमण्डल को रेडियो वेव्स, माइक्रोवेव्स और असंख्य कृत्रिम तरंगों से भर दिया गया है। मोबाइल, टावर, वायरलेस तन्त्र, उपग्रह और डिजिटल उपकरण लगातार तरंगें उत्पन्न कर रहे हैं। 5G नेटवर्क, उपग्रह इंटरनेट और निरन्तर बढ़ते डिजिटल संचार ने विद्युत-उपभोग को और अधिक बढ़ाया है। जब किसी पदार्थ के अणुओं की गति और कम्पन बढ़ते हैं, तो तापमान बढ़ता है। माइक्रोवेव तकनीक भी इसी सिद्धान्त पर कार्य करती है, जहाँ तरंगें अणुओं की गति बढ़ाती हैं। यदि वायुमण्डल में निरन्तर कृत्रिम तरंगें भरी जाएँगी, तो वे वायु के कणों से टकराएँगी और उनकी ऊर्जा तथा कम्पन को बढ़ाएँगी। परिणामस्वरूप तापमान भी बढ़ेगा। इस कारण धरती का तापमान केवल औद्योगिक धुएँ से ही नहीं बढ़ रहा, बल्कि सम्पूर्ण आधुनिक ऊर्जा-केन्द्रित जीवनशैली उससे जुड़ी हुई है। जितनी अधिक ऊर्जा उत्पन्न होगी और जितना अधिक उसका उपयोग होगा, उतनी ही अधिक गर्मी बढ़ेगी। यही बढ़ती हुई गर्मी कभी कैलिफोर्निया के जंगलों में आग के रूप में दिखाई देती है, कभी ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील के वनों में, तो कभी हीट
447
19
*289th Saturday (weekly) webinar* Date *17.5.2025* Time *11:00 AM* Subject *वेदों में क्या है? हम वेद क्यों पढ़ने चाहिए* Main speaker *आचार्य श्री अग्निव्रत जी, संस्थापक वेद विज्ञान मन्दिर, भागलभीम, जालोर (राजस्थान)* वेबिनार के प्रारम्भ में हर बार की तरह उन स्वतन्त्रता सेनानियों के कृतित्व और व्यक्तित्व पर चर्चा कर श्रद्धांजलि दी जाएगी, जिनका जन्म अथवा निधन मई माह में हुआ। To join the meeting on Google Meet, click this link: https://meet.google.com/ekb-ngpc-ywo Or open Meet and enter this code: ekb-ngpc-ywo To be coordinated by... ssbissa.ias@gmail.com
379
20
🚨 क्या आने वाला है— बड़ा ऊर्जा संकट? PM मोदी ने पेट्रोल-डीजल का कम उपयोग करने की अपील क्यों की? आचार्य जी का इस विषय पर किया गया गम्भीर विश्लेषण। देखिए यह महत्वपूर्ण वीडियो— काश! पहले ही जाग गये होते l आने वाले संकट का संकेत 🎥 https://youtu.be/hFQVLzr3HwE 👉 अभी देखें और दूसरों तक भी पहुँचाएँ।
432