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देशभर में अंगदान को बढ़ावा देने के लिये सरकार ने राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम लागू किया है। वहीं ब्रेन डेड व्यक्ति से अंगदान को बढ़ावा देने के लिये भारत सरकार ने अनेक उपाय किये हैं जैसे- नई दिल्ली में राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (National Organ and Tissue Transplant Organisation-NOTTO) और पूरे भारत में सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के लिये 5 अन्य क्षेत्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (Regional Organ and Tissue Transplant Organisation- ROTTO) स्थापित किये हैं, जिनमें से ऐसा ही एक संस्थान पी.जी.आई चंडीगढ़ में स्थापित किया गया है जोकि उत्तरी भारत के 7 राज्यों पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख तथा उत्तराखंड में अंग और ऊतक दान की निगरानी करता है।
गौरतलब है कि अंगदान करने वाले व्यक्तियों से प्राप्त अंगों को उपयोग के लायक जीवित रखने के लिये राज्यों द्वारा इस संदर्भ में उल्लेखनीय कार्य किया जा रहा है। तमिलनाडु देश का पहला राज्य है, जिसने इस संदर्भ में कई पहलों की शुरूआत की है, जैसे ब्रेन डेड व्यक्ति का प्रमाणपत्र बनाना, अंग वितरण को सुव्यवस्थित करना और अंगों के आवागमन के लिये हरित कॉरिडोर निर्धारित करना आदि।
राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन
राष्ट्रीय अंग व ऊतक प्रत्यारोपण संगठन, स्वास्थ्य सेवा निदेशालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन स्थापित एक राष्ट्रीय स्तर का संगठन है।
इसमें ‘राष्ट्रीय मानव अंग और ऊतक निष्कासन एवं भंडारण’ तथा ‘राष्ट्रीय बॉयोमैटीरियल केंद्र’ जैसे दो प्रभाग हैं।
यह देश में अंगों और ऊतकों की खरीद के नेटवर्क के साथ-साथ अंगों और ऊतक दान एवं प्रत्यारोपण के पंजीकरण में सहयोग जैसी अखिल भारतीय गतिविधियों के लिये सर्वोच्च केंद्र के तौर पर कार्यरत है।
आगे की राह
अंगदान की मांग और आपूर्ति में बड़ा अंतर सांस्कृतिक मान्यताओं, पारंपरिक सोच और कर्मकाण्डों की वजह से है। ऐसे में डॉक्टरों, गैर-सरकारी संगठनों और समाज सेवियों को अंगदान के महत्त्व के प्रति लोगो को जागरूक करना चाहिये।
सरकार को यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिये कि अंग प्रत्यारोपण की सुविधाएँ समाज के कमज़ोर वर्ग तक भी पहुँच सकें। इसके लिये सार्वजनिक अस्पतालों की अंग प्रत्यारोपण क्षमता में वृद्धि की जा सकती है।
अंग दान के बारे में गलत धारणाओं और मिथकों को दूर करना देश में अंग दान करने वालों की कमी को दूर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, यदि भारत में सड़क दुर्घटनाओं के कारण मरने वालों में से 5 प्रतिशत व्यक्ति भी अंग दान करें तो जीवित व्यक्तियों को अंग दान करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।
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उपरोक्त आँकड़े दर्शाते है कि देश में अंग प्रत्यारोपण हेतु लगभग 43 लाख लोगों के लिये ऐसा मात्र 1 ही अस्पताल मौजूद है जहाँ अंग प्रत्यारोपण संबंधी सभी आवश्यक उपकरण मौजूद हैं।
मांग और पूर्ति के बीच अंतर:आँकड़ों के अनुसार, प्रतिदिन औसतन 150 लोगों का नाम अंग प्रत्यारोपण का इंतज़ार कर रहे लोगों की सूची में जुड़ जाता है। जहाँ एक ओर वर्ष 2017 में तकरीबन 2 लाख लोग किडनी प्रत्यारोपण का इंतज़ार कर रहे थे, परंतु इनमें से केवल 5 प्रतिशत लोगों का ही किडनी प्रत्यारोपण हो पाया था।
यह स्थिति तब है जब एक व्यक्ति अंग दान के माध्यम से कुल 8 लोगों की जान बचा सकता है।
हालाँकि विगत कुछ वर्षों में अंग दानकर्त्ताओं की संख्या में काफी वृद्धि दर्ज की गई है, परंतु फिर भी यह वृद्धि लगातार बढ़ती अंगदान की मांग को पूरा करने में समर्थ नहीं है।
प्रत्यारोपण की उच्च लागत:भारत में अंग दान करने वालों में अधिकतर मध्यम निम्न वर्ग या निम्न वर्ग के लोग ही होते हैं, परंतु अंग प्राप्त करने वाले लोगों में इस वर्ग का प्रतिनिधित्व काफी कम होता है, जिसका एक सबसे बड़ा कारण प्रत्यारोपण की उच्च लागत को माना जाता है। उल्लेखनीय है कि भारत में अंग प्रत्यारोपण की लागत लगभग 5 से 25 लाख रुपए के आस-पास है, जो कि मध्यम निम्न वर्ग या निम्न वर्ग के लिये काफी बड़ी लागत है।
जागरूकता की कमी:भारत के आम नागरिकों में अंग दान को लेकर उचित शिक्षा और जागरूकता का अभाव है। कई बार यह देखा जाता है कि दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले अंग विफलता से पीड़ित लोगों को अंग दान और अंग प्रत्यारोपण जैसी प्रणाली के बारे में पता ही नहीं होता है जिसके कारण उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
सामाजिक मान्यताएँ:भारत में अधिकांश लोग मृत्यु के बाद जीवन एवं पारलौकिक विश्वासों में जीता है। अतः अंगों में काट-छाँट उन्हें प्रकृति व धर्म के विपरीत लगता है।
कुछ लोगों का मानना है कि अंग प्रत्यारोपण की सहमति देने पर अस्पताल के कर्मचारी उनका जीवन बचाने के लिये गंभीरता से प्रयास नहीं करेंगे।
भारत में अंगदान को बढ़ावा देने में सरकार के प्रयास
मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम,1994:अंग प्रत्यारोपण में गलत प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिये सरकार द्वारा वर्ष 1994 में मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम बनाया गया।
इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य चिकित्सीय प्रयोजनों के लिये मानव अंगों के निष्कासन, भंडारण और प्रत्यारोपण को विनियमित करना है। साथ ही यह मानव अंगों के वाणिज्यिक प्रयोग को भी प्रतिबंधित करता है।
इस अधिनियम में किसी गैर-संबंधी (माता-पिता, सगे भाई-बहन, पति-पत्नि के अलावा) के अंग प्रत्यारोपण को गैर-कानूनी घोषित किया गया था।
वर्ष 1999 में इस अधिनियम में संशोधन कर चाचा-चाची, मौसा-मौसी और बुआ आदि को तथा वर्ष 2011 में भावनात्मक लगाव रखने वाले संबंधों को भी मान्यता दी गई।
मानव अंग प्रत्यारोपण (संशोधन) अधिनियम, 2011:इस अधिनियम में मानव अंग दान के लिये प्रक्रिया को आसान बनाने के प्रावधान किये गए थे। साथ ही अधिनियम के दायरे को और अधिक व्यापक कर उसमें ऊतकों (Tissues) को भी शामिल कर लिया गया था।
इन प्रावधानों में रिट्रिवल सेंटर और मृतक दानकर्त्ताओं से अंगों के रिट्रिवल के लिये उनका पंजीकरण, स्वैप डोनेशन और अस्पताल के पंजीकृत मेडिकल प्रेक्टिशनर द्वारा अनिवार्य जाँच करना शामिल है।
इस अधिनियम में राष्ट्रीय स्तर पर दानकर्त्ताओं और प्राप्तकर्त्ताओं के पंजीकरण का भी प्रावधान है।
मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 2014इस अधिनियम के द्वारा अंगदान के कार्य को सहज, सरल और पारदर्शी बनाने तथा नियमों की गलत व्याख्या रोकने के प्रावधान किये गए हैं।
यदि अंग दान हासिल करने वाला विदेशी नागरिक हो और दानदाता भारतीय, तो बगैर निकट रिश्तेदारी के प्रत्यारोपण की अनुमति नहीं मिलेगी और इस संबंध में निर्णय प्राधिकार समिति द्वारा लिया जाएगा।
जब प्रस्तावित अंग दानकर्त्ता और अंग प्राप्तकर्त्ता करीब संबंधी न हों तो प्राधिकार समिति यह मूल्यांकन करेगी कि अंग दानकर्त्ता और अंग प्राप्तकर्त्ता के बीच किसी भी तरह का व्यावसायिक लेन-देन न हो।
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भारत में अंगदान
भारत महिर्षि दधीचि जैसे ऋषियों का देश है, जिन्होंने एक कबूतर के प्राणों व असुरों से जन सामान्य की रक्षा के लिये अपना देहदान कर दिया था। परंतु समय के साथ भारत में अंगदान की प्रवृत्ति में गिरावट देखी गई। निश्चित तौर पर अंगदान करके किसी अन्य व्यक्ति की जिंदगी में नई उम्मीदों का सवेरा लाया जा सकता है। इस तरह अंगदान करने से एक प्रेरणादायी शक्ति पैदा होती है, जो अद्भुत होती है। इस तरह की उदारता व्यक्ति की महानता का द्योतक है, जो न केवल आपको बल्कि दूसरे को भी प्रसन्नता प्रदान करती है।
भारत में ही प्रतिवर्ष लगभग 5 लाख लोग अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रत्यारोपण की संख्या और अंग उपलब्ध होने की संख्या के बीच एक बड़ा अंतराल है। अंग दान एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें अंग दाता अंग ग्राही को अंगदान करता है। दाता जीवित या मृत हो सकता है। दान किये जा सकने वाले अंग गुर्दे, फेफड़े, आंख, यकृत, कॉर्निया, छोटी आंत, त्वचा के ऊतक, हड्डी के ऊतक, हृदय वाल्व और शिराएँ हैं। अंगदान जीवन के लिये अमूल्य उपहार है। अंगदान उन व्यक्तियों को किया जाता है, जिनकी बीमारियाँ अंतिम अवस्था में होती हैं तथा जिन्हें अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है।
इस आलेख में अंगदान, अंगदान के समक्ष चुनौतियाँ, प्रत्यारोपण, भारत में अंगदान के कानूनी पहलू, सरकार के द्वारा अंगदान को बढ़ावा देने में किये जा रहे प्रयास तथा अंगदान कानून की तुलनात्मक समझ पर चर्चा की जाएगी।
अंगदान से तात्पर्य
अंगदान ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति (जीवित या मृत, दोनों) से स्वस्थ अंगों और ऊतकों को लेकर किसी अन्य ज़रूरतमंद व्यक्ति के शरीर में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।
प्रत्यारोपित होने वाले अंगों में दोनों गुर्दे (किडनी), यकृत (लीवर), ह्रदय, फेफड़े, आंत और अग्न्याशय शामिल होते हैं। जबकि ऊतकों के रूप में कॉर्निया, त्वचा, ह्रदय वाल्व कार्टिलेज, हड्डियों और वेसेल्स का प्रत्यारोपण होता है।
अंगदान कौन कर सकता है?
जीवित व्यक्ति के लिये अंगदान के समय न्यूनतम आयु 18 वर्ष होना अनिवार्य है। साथ ही अधिकांश अंगों के प्रत्यारोपण का निर्णायक कारक व्यक्ति की शारीरिक स्थिति होती है, उसकी आयु नहीं।
जीवित अंगदाता द्वारा एक किडनी, अग्न्याशय, और यकृत के कुछ हिस्से दान किये जा सकते हैं।
कॉर्निया, हृदय वाल्व, हड्डी और त्वचा जैसे ऊतकों को प्राकृतिक मृत्यु के पश्चात् दान किया जा सकता है, परंतु हृदय, यकृत, गुर्दे, फेफड़े और अग्न्याशय जैसे अन्य महत्त्वपूर्ण अंगों को केवल ब्रेन डेड (Brain Death) के मामले में ही दान किया जा सकता है।
कार्डियक डेथ अर्थात प्राकृतिक रूप से मरने वाले का सामान्यतः नेत्र (कॉर्निया) दान किया जाता है।
अंगदान में भारत की स्थिति
भारत में प्रति वर्ष लाखों लोग अंग प्रत्यारोपण का इंतजार करते-करते मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। इसका कारण मांग और दान किये गए अंगों की संख्या के बीच बड़ा अंतराल है।
भारत में अंग प्रत्यारोपण करने की सुविधा अच्छी है लेकिन यहाँ पर अंगदान करने वालों की संख्या बहुत ही कम है। विश्व संदर्भ में देखें तो अंगदान करने के मामले में भारत दुनिया में बेहद पिछड़ा हुआ देश है। यहाँ प्रति दस लाख की आबादी पर केवल 0.16 लोग अंगदान करते हैं। जबकि प्रति दस लाख की आबादी पर स्पेन में 36 लोग, क्रोएशिया में 35 और अमेरिका में 27 लोग अंगदान करते हैं।
भारत में ‘ब्रेन डेड’ या ‘मानसिक मृत’ हो चुके लोगों के परिवार जन भी अंगदान करने से बचते हैं जबकि यह निश्चित हो जाता है कि ऐसे लोगों का जीवनकाल बढ़ाना अब संभव नहीं है। यही कारण है कि इस मामले में भी अंगदान बहुत कम हो रहा है। वर्ष 2018 में महाराष्ट्र में 132, तमिलनाडु में 137, तेलंगाना में 167 और आंध्रप्रदेश में 45 और चंडीगढ़ में केवल 35 अंगदान हुए।
तमिलनाडु ने बीते कुछ समय में इस क्षेत्र में बेहतर काम किया है। यहाँ प्रत्येक वर्ष लगभग 80 हजार कॉर्निया का अंगदान होता है।
दिसंबर 2018 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा एक प्रश्न के उत्तर में राज्यसभा में यह जानकारी दी गई कि प्रत्येक वर्ष भारत में लगभग 2 लाख गुर्दे, 30 हजार ह्रदय और 10 लाख नेत्र की ज़रूरत है। जबकि केवल ह्रदय 340 और 1 लाख नेत्र यानी कॅर्निया ही प्रतिवर्ष मिल रहे हैं।
मार्च 2020 में अंग दान तथा प्रत्यारोपण करने के मामले में महाराष्ट्र ने तमिलनाडु और तेलंगाना को पीछे छोड़ दिया है।
भारत में अंगदान के समक्ष चुनौतियाँ
आधारिक संरचना का अभाव:भारत के सभी अस्पतालों में अंग प्रत्यारोपण संबंधी उपकरणों की व्यवस्था नहीं है। वर्ष 2017 के आँकड़ों के अनुसार, देश में लगभग 301 अस्पताल ऐसे हैं जहाँ अंग प्रत्यारोपण संबंधी उपकरण मौजूद हैं और इनमें से केवल 250 अस्पताल ही राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) के साथ पंजीकृत हैं।
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भारत के सेना प्रमुख ने सेना की दक्षिण पश्चिमी कमान को संबोधित करते हुए बताया कि भारतीय सेना ‘समग्र बदलाव’ (Overall Transformation) की दिशा में शीघ्र ही 'एकीकृत युद्ध समूह' (Integrated Battle Groups- IBG) का परिचालन किया जाएगा।
प्रमुख बिंदु:
भारतीय सेना ने युद्ध में बेहतर प्रदर्शन और दुश्मन पर त्वरित आक्रमण करने की अपनी क्षमता में वृद्धि करने के लिये ‘एकीकृत युद्ध समूह’ (Integrated Battle Groups-IBG) को अपनाने का निर्णय लिया है।
IBG का गठन सेना की ‘कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रिन’ (Cold Start Doctrine) के एक भाग के रूप में किया जा रहा है।
ब्रिगेड (Brigade):
कमांड एक परिभाषित भौगोलिक क्षेत्र में फैली सेना की सबसे बड़ी स्थैतिक इकाई (Static Formation) होती है, जबकि वाहिनी (Corps) सबसे बड़ी गतिशील इकाई (Mobile Formation) होती है।
सामान्यत: प्रत्येक वाहिनी (Corps) में तीन डिवीज़न होते हैं और प्रत्येक डिवीज़न में तीन ब्रिगेड होते हैं।
एकीकृत युद्ध समूह (IBG):
IBG का आकार ब्रिगेड के आकार के समान होता है जो एक दक्ष और आत्मनिर्भर युद्ध व्यवस्था है जो युद्ध की स्थिति में शत्रु के विरुद्ध त्वरित आक्रमण करने में सक्षम है।
IBG का गठन:
प्रत्येक IBG का गठन संभावित खतरों (Threat), भू-भाग (Terrain) एवं कार्यो (Task) के निर्धारण के आधार पर किया जाएगा और इन्हीं तीन आधारों (3Ts) पर IBG को संसाधनों का आवंटन भी किया जाएगा।
IBG कार्यवाही करने हेतु अपनी अवस्थति के आधार पर 12 से 48 घंटों के भीतर संगठित होने में सक्षम होंगे।
IBG की कार्यप्रणाली:
IBG आक्रामक और रक्षात्मक दोनों प्रकार की होंगे। जहाँ एक ओर आक्रामक IBG तीव्रता से कार्यवाही करते हुए दुश्मन के क्षेत्र में हमला करने में सक्षम होंगे, वहीं दूसरी ओर रक्षात्मक IBG दुश्मन के संभावित हमले के प्रति सुभेद्य क्षेत्रों की सुरक्षा करेंगे।
‘कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रिन’ (Cold Start Doctrine):
भारतीय संसद पर आतंकवादी हमले (वर्ष 2001) के बाद भारतीय सेना को आक्रामक प्रतिक्रिया करने में बहुत अधिक समय लगा। संसद पर हमले के बाद सैनिकों की 'तीव्र आक्रामक गतिशीलता' (Swift Offensive Mobilisation) बढ़ाने की दिशा में भारतीय सेना द्वारा 2004 में 'कोल्ड स्टार्ट' के सिद्धांत को तैयार किया।
तात्कालिक जनरल विपिन रावत द्वारा वर्ष 2017 में पहली बार 'कोल्ड स्टार्ट' के अस्तित्त्व को स्वीकार किया गया, लेकिन अतीत में इसके अस्तित्त्व को लगातार नकार दिया गया था।
यह डॉक्ट्रिन भारतीय सेना को दुश्मन के क्षेत्र में प्रवेश कर तीव्रता से कार्यवाही करने का लक्ष्य प्रदान करती है।
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एनर्जी एफिशिएंसी सर्विसेज़ लिमिटेड’ (Energy Efficiency Services Limited-EESL) ने घोषणा की कि देश में बिजली उपभोक्ताओं की सुविधा को बढ़ाने और बिजली खपत को तर्कसंगत बनाने के लिये ‘स्मार्ट मीटर नेशनल प्रोग्राम’ (Smart Meter National Programme-SMNP) के तहत अब तक कुल 1.2 मिलियन से अधिक स्मार्ट मीटर स्थापित किये हैं।
प्रमुख बिंदु
ध्यातव्य है कि EESL के इस निर्णय से मौजूदा लॉकडाउन के दौरान बिजली वितरण कंपनियों (DISCOM) को स्मार्ट मीटर के उपयोग के माध्यम से 95 प्रतिशत बिलिंग दक्षता प्राप्त करने में मदद मिली है, जिससे उनके प्रति उपभोक्ता मासिक राजस्व में औसतन 15-20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
EESL द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, उत्तरप्रदेश (984,000 स्मार्ट मीटर), हरियाणा (123,000 स्मार्ट मीटर), दिल्ली (57,000 स्मार्ट मीटर) और बिहार (28,000 स्मार्ट मीटर) जैसे राज्यों में सर्वाधिक स्मार्ट मीटर लगाए गए हैं।
ध्यातव्य है कि नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (New Delhi Municipal Council-NDMC) अपने क्षेत्र में 100 प्रतिशत स्मार्ट मीटरिंग समाधान को लागू करने वाला भारत का पहला नगरपालिका परिषद था।
उल्लेखनीय है कि स्मार्ट मीटर की मदद से उक्त राज्यों में संकट के समय में भी डिस्कॉम अपने परिचालन को सुचारू रूप से चलाने में सक्षम हो गया है।
हालाँकि उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में स्मार्ट मीटर की स्थापना के बावजूद बिजली की बकाया राशि के संग्रह की चुनौती का सामना कर रहा है। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में तकरीबन 4 लाख स्मार्ट मीटर लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
COVID-19 के दौर में स्मार्ट मीटर
वर्तमान स्थिति में स्मार्ट मीटर काफी आवश्यक हो गए हैं, क्योंकि ये COVID-19 जनित देशव्यापी लॉकडाउन के बावजूद भी दूर से ही मीटर की निगरानी और रीडिंग एकत्र करने की क्षमता के कारण डिस्कॉम को सुचारू रूप से कार्य करने में मदद कर रहे हैं।
स्मार्ट मीटर के माध्यम से डिस्कॉम को अपने वित्तीय स्वास्थ्य में सुधार करने, ऊर्जा संरक्षण को प्रोत्साहित करने, बिल भुगतान की सुगमता को बढ़ाने और बिलिंग सटीकता सुनिश्चित करने में मदद मिलती है।
इसके अलावा, स्मार्ट मीटर के माध्यम से उपभोक्ताओं को अपने उपयोग को ट्रैक करने और मोबाइल फोन के माध्यम से आसानी से अपने बिलों का भुगतान करने की सुविधा मिलती है। इस प्रकार यह बेहतर शिकायत प्रबंधन तथा विश्वसनीयता और पारदर्शिता के माध्यम से उपभोक्ता संतुष्टि को बढ़ाता है।
स्मार्ट मीटर और स्मार्ट मीटर नेशनल प्रोग्राम (SMNP)
ध्यातव्य है कि ‘स्मार्ट मीटर नेशनल प्रोग्राम’ (Smart Meter National Programme-SMNP) पूरे भारत में तकरीबन 25 करोड़ पारंपरिक मीटरों को स्मार्ट मीटर के साथ बदलने की दिशा में कार्य कर रहा है।
स्मार्ट मीटर विद्युत मीटर का एक उन्नत रूप है। अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित स्मार्ट मीटर की कार्य-प्रणाली एक छोटे से कंप्यूटर के जैसी ही होती है।
विदित हो कि सभी स्मार्ट मीटर केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (Central Electricity Authority) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही स्थापित किये जा रहे हैं।
जिस उपभोक्ता के यहाँ स्मार्ट मीटर लगाया जाएगा, उसे मीटर से संबंधित पूरी जानकारी मीटर स्क्रीन पर हर समय मिलती रहती है। स्मार्ट मीटर लगने के पश्चात् उपभोक्ता को अपना बिल जानने, बिल भुगतान करने या फिर किसी अन्य जानकारी के लिये इधर-उधर नहीं भटकना होगा। यह सारी जानकारी उपभोक्ता स्मार्ट मीटर की स्क्रीन पर आराम से पढ़ सकता है।
विदित हो कि ये मीटर इंटरनेट से जुड़े हुए और सेंसरयुक्त है, इस प्रकार जैसे ही इनमें छेड़-छाड़ की कोशिश कि जाएगी नेटवर्किंग कंपनियों के माध्यम से विद्युत् आपूर्तिकर्त्ता तक सूचना पहुँच जाएगी। इस प्रकार बिजली चोरी की समस्या को काफी हद तक हल किया जा सकता है।
एनर्जी एफिशिएंसी सर्विसेज़ लिमिटेड
(Energy Efficiency Services Limited-EESL)
EESL, चार राष्ट्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों NTPC लिमिटेड, पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (PFC), ग्रामीण विद्युतीकरण निगम लिमिटेड (Rural Electrification Corporation-REC) और पॉवरग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (POWERGRID) का एक संयुक्त उपक्रम है। इसे ऊर्जा मंत्रालय के अधीन स्थापित किया गया था।
इसका उद्देश्य कुशल और परिवर्तनकारी समाधानों द्वारा बाज़ार तक पहुँच बनाकर सभी हितधारकों को सफलता प्राप्त करने में मदद करना है।
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‘साइंस फॉर इक्विटी एम्पावरमेंट एंड डेवलपमेंट’ (Science for Equity Empowerment and Development) द्वारा COVID-19 से निपटने हेतु सहायक विभिन्न उपकरणों, प्रौद्योगिकियों और तकनीकों को विकसित करने में संस्थानों की सहायता की जा रही है।
प्रमुख बिंदु:
गौरतलब है कि ‘साइंस फॉर इक्विटी एम्पावरमेंट एंड डेवलपमेंट’ द्वारा ‘टेक्नोलॉजी इंटरवेंशन फॉर डिसेबल्ड एंड एल्डर्ली’ (Technology Interventions for Disabled and Elderly-TIDE) कार्यक्रम के माध्यम से यह सहायता की जा रही है।
ई-टूल (e-Tool):
‘टेक्नोलॉजी इंटरवेंशन फॉर डिसेबल्ड एंड एल्डर्ली’ कार्यक्रम के अंतर्गत राजलक्ष्मी इंजीनियरिंग कॉलेज (Rajalakshmi Engineering College), चेन्नई ने COVID-19 से उत्पन्न समस्याओं से निपटने हेतु ई-टूल (e-Tool) विकसित किया है।
ई-टूल के माध्यम से दिव्यांगजनों और बुजुर्गो के अकेलेपन को दूर करने हेतु शिक्षा, मनोरंजन के साथ-साथ स्वास्थ्य तथा स्वच्छता से संबंधित जानकारी एवं जागरूकता प्रदान की जाएगी।
यह ई-टूल व्यक्तियों को टैब और मोबाइल के माध्यम से किसी भी कार्य को सीखने (मनोरंजन के साथ) में सहायक साबित होगा। इस टूल को अन्य स्वदेशी भाषाओं में भी परिवर्तित किया जा सकता है
ई-टूल के बीटा संस्करण का उपयोग 200 विशेष-दिव्यांग बच्चों द्वारा किया जा रहा है।
सेंसर डिवाइस:
पीएसजी कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी, कोयंबटूर (PSG College of Technology, Coimbatore) द्वारा एक पहनने वाला सेंसर डिवाइस विकसित किया गया है।
इस सेंसर डिवाइस की मदद से बुजुर्गों और दिव्यांगजनों के क्वारंटाइन या आइसोलेशन वार्ड में होने की स्थिति में उनकी गतिविधियों पर दूर से ही नजर रखी जा सकती है।
यह उपकरण पूर्वानुमान भी बताता है और बुजुर्गों के स्वास्थ्य में गिरावट तथा कमज़ोरी के स्तर की भी जानकारी देता है।
इस उपकरण की कीमत थोक उत्पादन की स्थिति में 1,500 रुपए है।
हाथ में पहना जा सकने वाला बैंड:
मोटर फंक्शन से पीड़ित बुजुर्गों हेतु रियल टाइम निगरानी और पुनर्वास निर्देशित प्रोटोकॉल के माध्यम से फीडबैक प्रक्रिया से युक्त एक बैंड विकसित किया गया है।
यह उपकरण के पुनर्वास के दौरान मांसपेशियों की शक्ति, लचीलापन और उनकी सहनशीलता में सुधार लाने की दिशा में उपयुक्त तथा मात्रात्मक परिणाम को प्राप्त करने में मदद करेगा।
भारत सरकार के दिव्यांग सशक्तिकरण विभाग (Department of Empowerment of Persons with Disabilities) को शामिल करते हुए इन उपकरणों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने हेतु एक कार्य योजना की भी शुरूआत की गई है।
टेक्नोलॉजी इंटरवेंशन फॉर डिसेबल्ड एंड एल्डर्ली
(Technology Interventions for Disabled and Elderly-TIDE):
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Science and Technology) के अंतर्गत ‘साइंस फॉर इक्विटी एम्पावरमेंट एंड डेवलपमेंट’ (Science for Equity Empowerment and Development) ने ‘‘टेक्नोलॉजी इंटरवेंशन फॉर डिसेबल्ड एंड एल्डर्ली’ नामक कार्यक्रम की शुरुआत की थी।
इस कार्यक्रम के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-
दिव्यांगजनों और बुजुर्गों के सशक्तिकरण हेतु प्रौद्योगिकियों पर ‘अनुसंधान और विकास’ को बढ़ावा देना।
शैक्षणिक संस्थान, प्रतिष्ठित प्रयोगशाला, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आधारित स्वैच्छिक संगठन, इत्यादि को अनुसंधान हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करना।
दिव्यांगजनों और बुजुर्गों का सामाजिक समावेशन करना।
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COVID-19 की रोकथाम हेतु देशभर में लागू लॉकडाउन के कारण देश के अधिकांश राज्यों के राजस्व में भारी गिरावट देखने को मिली है।
प्रमुख बिंदु:
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ‘इंडिया रेटिंग एंड रिसर्च (फिच समूह)’ {India Ratings and Research (Fitch Group)} के अनुमान के अनुसार, देश में लागू लॉकडाउन के कारण केवल अप्रैल (वर्ष 2020) माह में ही 21 राज्यों को संयुक्त रूप से कुल 97,100 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हुआ है।
देश में COVID-19 महामारी के कारण केंद्र और राज्य सरकारें की आय में गिरावट हुई है परंतु वर्तमान में COVID-19 से उत्पन्न चुनौतियों और इस महामारी के नियंत्रण पर होने वाले भारी खर्च से राज्यों की समस्याएँ और अधिक बढ़ गई हैं।
राजस्व में आई गिरावट के कारण:
देश में COVID-19 के नियंत्रण हेतु लागू लॉकडाउन के कारण औद्योगिक गतिविधियों को पूरी तरह बंद करना पड़ा है।
सार्वजनिक आवाजाही और पर्यटन की गतिविधियों पर रोक से होटल, परिवहन आदि क्षेत्रों से आने वाला राजस्व प्रभावित हुआ है।
हालाँकि लॉकडाउन के दौरान भी लगभग 40% ‘अतिआवश्यक’ श्रेणी की व्यावसायिक गतिविधियों को चालू रखने की अनुमति दी गई थी, परंतु मज़दूरों के पलायन, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) और परिवहन के प्रभावित होने आदि कारणों से अपेक्षित राजस्व की प्राप्ति नहीं की जा सकी।
लॉकडाउन के कारण उन राज्यों पर और अधिक प्रभाव पड़ा है जिनकी अर्थव्यवस्था में स्थानीय राजस्व की भूमिका अधिक थी।
उदाहरण के लिये गुजरात, तेलंगाना, हरियाणा, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्य जिनका 70% से अधिक राजस्व स्थानीय स्रोतों से प्राप्त होता है, उन्हें लॉकडाउन से सबसे अधिक आर्थिक क्षति हुई है।
इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र और केरल के कुल राजस्व का लगभग 70% भाग स्थानीय स्रोतों से आता है।
राज्य सरकारों की आय का एक बड़ा स्रोत पेट्रोलियम पदार्थों और शराब जैसे उत्पादों पर लगने वाले कर से आता है परंतु लॉकडाउन के दौरान अधिकांश उत्पादों की मांग में गिरावट या बिक्री न होने से राज्यों को आर्थिक क्षति हुई है।
राज्य सरकारों के राजस्व के मुख्य स्रोत:
राज्य का अपना कर राजस्व
गैर-कर राजस्व
केंद्रीय कर में राज्य का हिस्सा
केंद्र से प्राप्त अनुदान
राज्य सरकारों के राजस्व का अधिकांश भाग 7 प्रमुख स्रोतों से प्राप्त होता है:
राज्य वस्तु एवं सेवा कर (State Goods and Service Tax-SGST)
राज्यों द्वारा लागू ‘मूल्य वर्द्धित कर’ (Value Added Tax- VAT), मुख्यतः पेट्रोलियम उत्पादों से
राज्य उत्पाद शुल्क
स्टांप और पंजीकरण शुल्क,वाहन कर, विद्युत कर और राज्य के अपने गैर कर राजस्व
आगे की राह:
COVID-19 के कारण उत्पन्न हुई स्थितियों ने राज्यों को कड़े कदम उठाने और राजस्व बढ़ाने के नए उपायों पर विचार करने पर विवश किया है।
हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा लॉकडाउन में छूट दिये जाने और उद्यमों के लिये आर्थिक सहायता की घोषणा से वर्तमान स्थिति में कुछ सुधार होने का अनुमान है।
कुछ राज्य सरकारों ने शराब और पेट्रोलियम जैसे उत्पादों पर VAT में वृद्धि कर तात्कालिक रूप से राजस्व का प्रबंध करने का प्रयास किया है।
लॉकडाउन में छूट के साथ-साथ सोशल डिस्टेंसिंग (Social Distancing) के नियमों का पालन करते हुए चरणबद्ध तरीके से औद्योगिक गतिविधियों को शुरू कर राज्य सरकारों के घाटे को कुछ सीमा तक कम किया जा सकता है।
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‘पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो’ (Bureau of Police Research and Development-BPRD) ने फेक न्यूज़ और वीडियो की पहचान करने के लिये कानून प्रवर्तन एजेंसियों की सहायता हेतु दिशा-निर्देश जारी किया है।
प्रमुख बिंदु:
उल्लेखनीय है कि डिजिटल युग में ‘फेक न्यूज़ या यलो जर्नलिज़्म’ दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। फेक न्यूज़ किसी एजेंसी, इकाई या व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने और आर्थिक या राजनीतिक रूप से लाभ पाने के उद्देश्य से प्रकाशित किये जाते हैं।
फेक न्यूज़ का उपयोग अक्सर सनसनीखेज, गलत या स्पष्ट रूप से मनगढ़ंत सुर्खियों का उपयोग पाठकों की संख्या बढ़ाने के लिये भी किया जाता है।
गौरतलब है कि महामारी के मद्देनज़र, फेक न्यूज़ और वीडियो ने लोगों में दहशत फैलाने के साथ ही घृणा और सांप्रदायिक हिंसा को भी बढ़ावा दिया है।
साइबर अपराधियों ने फेक यूआरल (Fake URL) का उपयोग कर उन लोगों को गुमराह करने की कोशिश की है जो PM-CARES फंड में दान करना चाहते थे।
प्रमुख दिशा-निर्देश
जाँच अधिकारियों को ऐसी वेबसाइट और लिंक से सतर्क रहना चाहिये जिनमें वर्तनी की गलतियाँ हों तथा किसी व्यक्ति द्वारा भेजी गई लिंक वास्तविक सामग्री से मेल न खाती हो।
वायरल फोटो, ऑडियो रिकॉर्डिंग और वीडियो को तुरंत संज्ञान में लेना चाहिये।
न्यूज़ को सत्यापित करने हेतु विभिन्न विश्वसनीय समाचार स्रोतों का अवलोकन करना चाहिये। यदि विभिन्न समाचार पत्रों में एक ही घटना प्रकाशित की गई हो तो उसके सत्य होने की संभावना अत्यधिक होती है।
किसी भी समाचार की सत्यता हेतु लेखक की भी पहचान की जानी चाहिये।
इन दिशा-निर्देशों में अधिकारियों को कुछ वेबसाइटों की सूची भी प्रदान की गई है जो तथ्य/जाँच में मददगार साबित हो सकती हैं।
क्या है इंटरनेट मीडिया:
आज का दौर ‘ इंटरनेट मीडिया’ का है। बिल जमा करने, नौकरी-परीक्षा के फॉर्म भरने-जमा करने, फोन करने, पढ़ने व खरीदारी आदि के लिये लम्बी लाइनों में लगने की बात अब बीते दौर की बात हो गई है। लोग अब लाइन में खड़े होने के बजाय ऑनलाइन होना ज़्यादा पसंद करते हैं, जो कि सही भी है।
इंसान अपनी प्रकृति में ही जिज्ञासु होता है, अपने पास-पड़ोस और देश-दुनिया के बारे में जानना उसकी प्रवृत्ति होती है, और आज जब इंटरनेट फ्री अथवा एकदम सस्ता उपलब्ध है, ऐसे में इंटरनेट मीडिया का उदय होना निश्चित था।
इंटरनेट मीडिया के खतरे:
पहले जब व्यक्ति न्यूज़ पढ़ने के लिये समाचार-पत्रों पर निर्भर था तो वह वैसी ख़बरों से रूबरू होता था जो कई माध्यमों से छनकर उस तक पहुँचती थी लेकिन अब ‘रियल टाइम खबरों’ का दौर है जहाँ कोई भी फेक न्यूज़ लाखों लोगों द्वारा शेयर की जाती है, ट्विट और रि-ट्विट की जाती, कभी-कभी तो किसी का विचार, किसी का निजी प्रोपगेंडा भी सत्य मान लिया जाता है।
पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो
(Bureau of Police Research and Development- BPRD):
पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो की स्थापना गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) के तहत 28 अगस्त, 1970 को भारत सरकार द्वारा की गई थी।
इसने पुलिस के आधुनिकीकरण के प्राथमिक उद्देश्य के साथ पुलिस अनुसंधान और सलाहकार परिषद (Police Research and Advisory Council) को प्रतिस्थापित किया था।
वर्ष 2008 में भारत सरकार ने देश में पुलिस बलों की कार्यप्रणाली में सुधार लाने के उद्देश्य से BPRD के तहत राष्ट्रीय पुलिस मिशन (National Police Mission) के सृजन का निर्णय लिया था।
आगे की राह:
फेक न्यूज़ के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं जो राष्ट्र की एकता व अखंडता को बाधित करते हैं तथा सांप्रदायिक दंगों आदि को प्रेरित करते हैं। इसलिये फेक न्यूज़ या गलत सूचना हेतु लोगों को जागरूक किया जाना चाहिये ताकि लोग प्रसारित हो रही सूचनाओं के मूल तथ्यों व इनके पीछे की मंशा को समझने में सक्षम हों।
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प्रमुख बिंदु:
उत्तरी इटली के बेरगामो (Bergamo) क्षेत्र में चिकित्सकों ने बच्चों में कावासाकी रोग जैसे लक्षणों वाली एक असामान्य बीमारी के मामलों में 30 गुना वृद्धि देखी है।
फरवरी (वर्ष 2020) के मध्य तक इस बीमारी से क्षेत्र में 5 वर्ष तक के मात्र 19 बच्चों में इस बीमारी की पुष्टि की गई थी परंतु 18 फरवरी से 20 अप्रैल, 2020 के बीच इस बीमारी के 10 नए मामले सामने आए थे।
चिकित्सकों के अनुसार, 18 फ़रवरी, 2020 के बाद अस्पताल में लाए गए 10 मरीज़ों में से 8 एंटीबॉडी टेस्ट के दौरान COVID-19 से संक्रमित पाए गए थे।
ऐसे ही कुछ मामले न्यूयार्क और इंग्लैंड के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में भी देखे गए हैं।
क्या है कावासाकी रोग?
कावासाकी एक असामान्य रोग है जो मुख्यतः 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों को प्रभावित करता है।
इस रोग पीड़ित व्यक्ति के शरीर में रक्त वाहिकाओं में सूजन हो जाती है। बुखार, हाथों-पैरों की सूजन, होंठ और गले में जलन और सूजन आदि इस बीमारी के प्रमुख लक्षण हैं।
यह रोग मरीज़ के शरीर में हृदय को सबसे गंभीर रूप से प्रभावित करता है क्योंकि इस रोग के कारण हृदय को रक्त पहुँचाने वाली धमनियों में सूजन हो जाती है जिससे हृदय की गति प्रभावित होती है।
कावासाकी रोग को कावासाकी सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता है।
वर्ष 1967 में जापान के एक बाल रोग विशेषज्ञ ‘टोमीसाकू कावासाकी’ (Tomisaku Kawasaki) ने पहली बार इस रोग की पहचान कर इसके बारे में जानकारी उपलब्ध कराई थी।
वर्ष 1976 में पहली बार जापान से बाहर अमेरिका के ‘हवाई’ (Hawaii) राज्य में इस रोग के कुछ मामले देखे गए थे।
COVID-19 और कावासाकी:
चिकित्सकों के अनुसार, COVID-19 महामारी के बाद जिन बच्चों में कावासाकी रोग की पुष्टि की गई उनकी आयु आमतौर पर (COVID-19 से पहले) कावासाकी ग्रस्त बच्चों की तुलना में अधिक थी।
COVID-19 के बाद कावासाकी से ग्रस्त बच्चों में पूर्व (COVID-19 से पहले) की तुलना में इस रोग की गंभीरता और तीव्रता बहुत अधिक थी।
साथ ही COVID-19 महामारी के बाद कावासाकी से ग्रस्त बच्चों में अतिसक्रिय प्रतिरक्षा प्रणाली के लक्षण भी देखे गए हैं।
हालाँकि इस अध्ययन से जुड़े चिकत्सकों ने माना है कि उनकी रिपोर्ट बहुत ही कम मामलों पर आधारित है और COVID-19 तथा कावासाकी रोग के बीच किसी जुड़ाव की पुष्टि के लिये बड़े अध्ययनों की आवश्यकता होगी।
चुनौतियाँ:
वर्तमान में कावासाकी रोग के विस्तार के सही आँकड़े जान पाना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि COVID-19 महामारी के बाद स्वास्थ्य सुविधाओं पर दबाव बढ़ने से अस्पतालों में COVID-19 के अतिरिक्त अन्य मरीज़ों के दाखिलों में गिरावट आई है।
विश्व के अधिकांश देशों में अस्पतालों में COVID-19 मरीज़ों में वृद्धि के कारण स्वास्थ्य तंत्र का अधिकांश हिस्सा COVID-19 के नियंत्रण में लगा है ऐसे में अन्य रोगों की सही समय पर जाँच कर पाना और उचित उपचार उपलब्ध कराना कठिन हो गया है।
आगे की राह:
इस शोध से जुड़े एक चिकित्सक के अनुसार, अभी तक COVID-19 से संक्रमित ऐसे बच्चों की संख्या बहुत ही कम हैं जिनमें कावासाकी रोग के लक्षण देखे गए हैं, हालाँकि छोटे बच्चों में इस वायरस के गंभीर प्रभावों को समझाना बहुत ही आवश्यक है, विशेषकर वर्तमान में जब विश्व के अधिकांश देश लॉकडाउन में ढील देने पर विचार कर रहे हैं।
भारत में कावासाकी रोग के मामलों की संख्या बहुत अधिक नहीं है (वर्ष 2009-14 के बीच चंडीगढ़ में 5 वर्ष आयु के प्रति 1 लाख बच्चों में लगभग 5 मामले) परंतु पिछले दो दशकों में इसके मामलों में तीव्र वृद्धि हुई है, ऐसे में इस महामारी के दौरान बच्चों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना होगा।
हाल के कुछ दिनों में विश्व के विभिन्न हिस्सों में COVID-19 को कई अन्य बीमारियों से जोड़कर देखा गया है। अतः यह सुनिश्चित करना बहुत ही आवश्यक है कि COVID-19 के उपचार के प्रयासों के साथ ही अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं (टीकाकरण, दवाओं की उपलब्धता आदि) में कमी न हो।
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इटली में किये गए एक अध्ययन में चिकित्सकों ने COVID-19 के संपर्क में आने वाले बच्चों में कावासाकी रोग (Kawasaki disease) जैसे लक्षणों वाली एक असामान्य बीमारी के फैलने के बारे में जानकारी दी है।
प्रमुख बिंदु:
उत्तरी इटली के बेरगामो (Bergamo) क्षेत्र में चिकित्सकों ने बच्चों में कावासाकी रोग जैसे लक्षणों वाली एक असामान्य बीमारी के मामलों में 30 गुना वृद्धि देखी है।
फरवरी (वर्ष 2020) के मध्य तक इस बीमारी से क्षेत्र में 5 वर्ष तक के मात्र 19 बच्चों में इस बीमारी की पुष्टि की गई थी परंतु 18 फरवरी से 20 अप्रैल, 2020 के बीच इस बीमारी के 10 नए मामले सामने आए थे।
चिकित्सकों के अनुसार, 18 फ़रवरी, 2020 के बाद अस्पताल में लाए गए 10 मरीज़ों में से 8 एंटीबॉडी टेस्ट के दौरान COVID-19 से संक्रमित पाए गए थे।
ऐसे ही कुछ मामले न्यूयार्क और इंग्लैंड के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में भी देखे गए हैं।
क्या है कावासाकी रोग?
कावासाकी एक असामान्य रोग है जो मुख्यतः 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों को प्रभावित करता है।
इस रोग पीड़ित व्यक्ति के शरीर में रक्त वाहिकाओं में सूजन हो जाती है। बुखार, हाथों-पैरों की सूजन, होंठ और गले में जलन और सूजन आदि इस बीमारी के प्रमुख लक्षण हैं।
यह रोग मरीज़ के शरीर में हृदय को सबसे गंभीर रूप से प्रभावित करता है क्योंकि इस रोग के कारण हृदय को रक्त पहुँचाने वाली धमनियों में सूजन हो जाती है जिससे हृदय की गति प्रभावित होती है।
कावासाकी रोग को कावासाकी सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता है।
वर्ष 1967 में जापान के एक बाल रोग विशेषज्ञ ‘टोमीसाकू कावासाकी’ (Tomisaku Kawasaki) ने पहली बार इस रोग की पहचान कर इसके बारे में जानकारी उपलब्ध कराई थी।
वर्ष 1976 में पहली बार जापान से बाहर अमेरिका के ‘हवाई’ (Hawaii) राज्य में इस रोग के कुछ मामले देखे गए थे।
COVID-19 और कावासाकी:
चिकित्सकों के अनुसार, COVID-19 महामारी के बाद जिन बच्चों में कावासाकी रोग की पुष्टि की गई उनकी आयु आमतौर पर (COVID-19 से पहले) कावासाकी ग्रस्त बच्चों की तुलना में अधिक थी।
COVID-19 के बाद कावासाकी से ग्रस्त बच्चों में पूर्व (COVID-19 से पहले) की तुलना में इस रोग की गंभीरता और तीव्रता बहुत अधिक थी।
साथ ही COVID-19 महामारी के बाद कावासाकी से ग्रस्त बच्चों में अतिसक्रिय प्रतिरक्षा प्रणाली के लक्षण भी देखे गए हैं।
हालाँकि इस अध्ययन से जुड़े चिकत्सकों ने माना है कि उनकी रिपोर्ट बहुत ही कम मामलों पर आधारित है और COVID-19 तथा कावासाकी रोग के बीच किसी जुड़ाव की पुष्टि के लिये बड़े अध्ययनों की आवश्यकता होगी।
चुनौतियाँ:
वर्तमान में कावासाकी रोग के विस्तार के सही आँकड़े जान पाना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि COVID-19 महामारी के बाद स्वास्थ्य सुविधाओं पर दबाव बढ़ने से अस्पतालों में COVID-19 के अतिरिक्त अन्य मरीज़ों के दाखिलों में गिरावट आई है।
विश्व के अधिकांश देशों में अस्पतालों में COVID-19 मरीज़ों में वृद्धि के कारण स्वास्थ्य तंत्र का अधिकांश हिस्सा COVID-19 के नियंत्रण में लगा है ऐसे में अन्य रोगों की सही समय पर जाँच कर पाना और उचित उपचार उपलब्ध कराना कठिन हो गया है।
आगे की राह:
इस शोध से जुड़े एक चिकित्सक के अनुसार, अभी तक COVID-19 से संक्रमित ऐसे बच्चों की संख्या बहुत ही कम हैं जिनमें कावासाकी रोग के लक्षण देखे गए हैं, हालाँकि छोटे बच्चों में इस वायरस के गंभीर प्रभावों को समझाना बहुत ही आवश्यक है, विशेषकर वर्तमान में जब विश्व के अधिकांश देश लॉकडाउन में ढील देने पर विचार कर रहे हैं।
भारत में कावासाकी रोग के मामलों की संख्या बहुत अधिक नहीं है (वर्ष 2009-14 के बीच चंडीगढ़ में 5 वर्ष आयु के प्रति 1 लाख बच्चों में लगभग 5 मामले) परंतु पिछले दो दशकों में इसके मामलों में तीव्र वृद्धि हुई है, ऐसे में इस महामारी के दौरान बच्चों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना होगा।
हाल के कुछ दिनों में विश्व के विभिन्न हिस्सों में COVID-19 को कई अन्य बीमारियों से जोड़कर देखा गया है। अतः यह सुनिश्चित करना बहुत ही आवश्यक है कि COVID-19 के उपचार के प्रयासों के साथ ही अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं (टीकाकरण, दवाओं की उपलब्धता आदि) में कमी न हो। इटली में किये गए एक अध्ययन में चिकित्सकों ने COVID-19 के संपर्क में आने वाले बच्चों में कावासाकी रोग (Kawasaki disease) जैसे लक्षणों वाली एक असामान्य बीमारी के फैलने के बारे में जानकारी दी है।
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इस प्रकार के दिशा-निर्देश राज्य के परामर्श के विधायी जनादेश को दरकिनार करते हैं।
केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि वे निगम जिन्होंने PM-CARES फंड में दान दिया है, CSR छूट का लाभ उठा सकते हैं, किंतु मुख्यमंत्री राहत कोष में दान देने वाले लोग इसका लाभ प्राप्त नहीं कर सकते हैं।
इस प्रकार यह निर्णय मुख्यमंत्री राहत कोष में दान को हतोत्साहित करता है और राज्यों को वित्तीय सहायता के लिये केंद्र पर और अधिक निर्भर बनाता है।
इसके अतिरिक्त देश में लंबे समय तक शराब बिक्री पर रोक लगी रही, जिसके कारण राज्यों का राजस्व काफी कम हो गया है। हालाँकि अब देश भर के विभिन्न क्षेत्रों में शराब पर प्रतिबंध हटा दिये गए हैं।
वहीं पेट्रोल और डीज़ल की शून्य बिक्री के कारण भी राज्यों को राजस्व की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
इन सभी कारणों के परिणामस्वरूप राज्यों के लिये वेतन, पेंशन और कल्याणकारी योजनाओं के खर्चों को उठाना अपेक्षाकृत काफी मुश्किल हो गया है।
निष्कर्ष
उल्लेखनीय है कि राज्य वे पहली इकाई होते हैं, जो किसी भी आपदा अथवा महामारी (मौजूदा समय में COVID-19) के समय में पहली प्रतिक्रिया देते हैं, इस प्रकार पर्याप्त धन राशि की आपूर्ति करना संकट से प्रभावी ढंग से निपटने की पूर्व आवश्यकता बन जाता है। किंतु मौजूदा समय में केंद्र सरकार द्वारा जिस प्रकार के निर्णय लिये जा रहे हैं, वे स्पष्ट तौर पर इस सिद्धांत का उल्लंघन कर रहे हैं। आवश्यक है कि केंद्र सरकार राज्यों को बराबरी में देखे और स्वयं पर निर्भरता बढ़ाने के स्थान पर उनकी क्षमता को मज़बूत करे।
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हाल के दिनों में कई विशेषज्ञों ने केंद्र सरकार पर COVID-19 महामारी के दौर में भारतीय संघवाद को कमज़ोर करने का आरोप लगाया है।
प्रमुख बिंदु
उल्लेखनीय है कि आज़ादी के पश्चात् भिन्न-भिन्न प्रकार की परिस्थितियों ने भारतीय संघवाद और भारतीय लोकतंत्र का अपने-अपने ढंग से परीक्षण किया और प्रत्येक चुनौती में भारतीय लोकतंत्र ने नए-नए प्रतिमान स्थापित किये, किंतु देश में नवीनतम परिस्थितियों जैसी चुनौती कभी भी देखने को मिली, यह समय न केवल भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के लिये चुनौतीपूर्ण है बल्कि भारतीय संघीय ढाँचे के लिये भी एक संकट का समय है।
विश्लेषकों का मत है कि COVID-19 संकट को सक्रिय रूप से हराने में भारत की सफलता पूर्ण रूप से केंद्र-राज्य सहयोग पर टिकी हुई है। यह वास्तव में संघवाद के प्रति भारत की प्रतिबद्धता है जो वर्तमान समय में सर्वाधिक तनाव के अधीन है।
संघवाद और सहकारी संघवाद
ज्ञातव्य है कि संघवाद (Federalism) शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द ‘Foedus’ से हुई है जिसका अर्थ एक प्रकार के समझौते या अनुबंध से होता है। वास्तव में महासंघ दो तरह की सरकारों के बीच सत्ता साझा करने और उनके संबंधित क्षेत्रों को नियंत्रित करने हेतु एक समझौता होता है।
इस आधार पर कहा जा सकता है कि संघवाद सरकार का वह रूप है जिसमें देश के भीतर सरकार के कम-से-कम दो स्तर मौजूद हैं- पहला केंद्रीय स्तर पर और दूसरा स्थानीय या राज्य स्तर पर। भारत की स्थिति में संघवाद को स्थानीय, केंद्रीय और राज्य सरकारों के मध्य अधिकारों के वितरण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
केंद्र और राज्य सरकार के बीच संबंधों के आधार पर संघवाद की अवधारणा को दो भागों में विभाजित किया गया है (1) सहकारी संघवाद (2) प्रतिस्पर्द्धी संघवाद।
सहकारी संघवाद में केंद्र व राज्य एक-दूसरे के साथ क्षैतिज संबंध स्थापित करते हुए एक-दूसरे के सहयोग से अपनी समस्याओं को हल करने का प्रयास करते हैं। सहकारी संघवाद की इस अवधारणा में यह स्पष्ट किया जाता है कि केंद्र और राज्य में से कोई भी किसी से श्रेष्ठ नहीं है।
प्रतिस्पर्द्धी संघवाद में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के मध्य संबंध लंबवत होते हैं जबकि राज्य सरकारों के मध्य संबंध क्षैतिज होते हैं। प्रतिस्पर्द्धी संघवाद में राज्यों को आपस में और केंद्र के साथ लाभ के उद्देश्य से प्रतिस्पर्द्धा करनी होती है।
ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के संविधान विशेषज्ञ के. सी. व्हेअर (K.C. Wheare) के अनुसार, संघवाद पारंपरिक रूप से क्षेत्र विशिष्ट में एक देश की संघ और राज्य सरकारों की स्वतंत्रता का प्रतीक है।
जब संविधान सभा के सदस्यों ने अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और स्विटज़रलैंड जैसे अन्य महान संघों के संविधानों का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया, तो उन्होंने भारतीय गणतंत्र की आवश्यकता के अनुरूप एक प्रणाली तैयार करने हेतु ‘पिक एंड चूज़’ (Pick and Choose) की नीति अपनाई।
परिणामस्वरूप, भारत की संविधान सभा ‘सहकारी संघवाद’ को अपनाने के लिये विश्व में पहली बार निर्वाचित निकाय बन गई।
COVID-19 के दौर में सहकारी संघवाद पर संकट
मौजूदा दौर में कोरोनावायरस (COVID-19) विश्व के लगभग सभी देशों को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है, जिसमें समृद्ध और चिकित्सकीय रूप से उन्नत पश्चिमी देश भी शामिल हैं। कोरोनावायरस संक्रमण का आँकड़ा वैश्विक स्तर पर 44 लाख के पार जा चुका है, भारत में भी यह संख्या दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही है।
इस वायरस के संक्रमण को रोकने के लिये सरकार द्वारा विभिन्न प्रयास किये जा रहे हैं, किंतु देश में कई विशेषज्ञों ने COVID-19 के संबंध में कुछ हालिया घटनाक्रमों के आधार पर केंद्र-राज्य संबंधों में आए तनाव पर चिंता ज़ाहिर की है।
उदाहरण के लिये केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों का रेड (Red), ऑरेंज (Orange) और ग्रीन (Green) ज़ोन में किये गए वर्गीकरण का विभिन्न राज्य सरकारों ने विरोध किया है। राज्यों ने केंद्र सरकार से इस प्रकार के वर्गीकरण में अधिक स्वायत्तता की मांग की है।
विदित हो कि आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 जिसके तहत केंद्र द्वारा राज्यों को COVID-19 संबंधी दिशा-निर्देश जारी किये जा रहे हैं, केंद्र सरकार के लिये राज्यों के साथ परामर्श को अनिवार्य करता है। किंतु केंद्र के हालिया कई निर्णयों में इस बाध्यता का पालन नहीं किया गया है।
आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 11 के तहत एक 'राष्ट्रीय योजना' बनाने की परिकल्पना की गई है, साथ ही अधिनियम की धारा 11 (2) इस 'राष्ट्रीय योजना' को तैयार करने से पूर्व राज्य के परामर्श को अनिवार्य करता है।
हालाँकि, केंद्र सरकार ने अभी तक ‘राष्ट्रीय योजना’ तैयार नहीं की है, इसके स्थान पर COVID-19 का मुकाबला करने के लिये केंद्र सरकार राज्यों को ‘तदर्थ बाध्यकारी दिशा-निर्देशों’ (Ad Hoc Binding Guidelines) जारी कर रही है।
