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125 दिन का यह अभियान मिशन के रूप में काम करेगा, इसमें 116 जिलों में 25 श्रेणी के कार्यों/ गतिविधियों के कार्यान्वयन पर ध्यान केन्द्रित होगा, इसमें 6 राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा में लौटने वाले प्रवासी कामगारों पर ज्यादा जोर होगा। इस अभियान के दौरान कराए गए सार्वजनिक कार्यों के लिए 50,000 करोड़ रुपये के संसाधन निर्धारित होंगे। यह अभियान 12 विभिन्न मंत्रालयों/ विभागों ग्रामीण विकास, पंचायती राज, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग, खनन, पेयजल एवं स्वच्छता, पर्यावरण, रेलवे, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, नवीन एवं नवीनीकृत ऊर्जा, सीमावर्ती सड़कें, दूरसंचार और कृषि का मिला-जुला प्रयास है। इसके माध्यम से 25 सार्वजनिक आधारभूत ढांचागत कार्य और आजीविका के अवसर बढ़ाने से संबंधित कार्यों का कार्यान्वयन किया जाएगा। इस पहल के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं : वापस लौटने वाले कामगारों और प्रभावित ग्रामीण कामगारों को आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना। गांवों में सार्वजनिक आधारभूत ढांचे का विस्तार और सड़क, आवास, आंगनवाड़ी, पंचायत भवन, विभिन्न आजीविका संपदाएं और सामुदायिक भवन आदि आजीविका के अवसर तैयार करना। विविध प्रकार के कार्यों के समूह से सुनिश्चित होगा कि हर प्रवासी कामगार को आने वाले 125 दिन में उसके कौशल के आधार पर रोजगार के अवसर मिले। यह कार्यक्रम दीर्घावधि में आजीविका के विस्तार और विकास के लिए भी तैयार होगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय इस अभियान के लिए नोडल मंत्रालय है और अभियान को राज्य सरकारों के साथ सामंजस्य में लागू किया जाएगा। संयुक्त सचिव और इससे ऊपर की रैंक के केन्द्रीय नोडल अधिकारियों को चिह्नित जिलों में विभिन्न योजना के प्रभावी और समयबद्ध कार्यान्वयन की नियुक्त किया जाएगा।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कोविड-19 महामारी के चलते गांवों में लौटने वाले प्रवासी कामगारों को रोजगार और आजीविका के व्यापक अवसर उपलब्ध कराने के लिए 20 जून, 2020 को गरीब कल्याण रोजगार अभियान का शुभारम्भ किया अभियान में टिकाऊ ग्रामीण आधारभूत ढांचा और गांवों में इंटरनेट जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर : प्रधानमंत्री घर के नजदीक काम उपलब्ध कराने में मदद के लिए ग्रामीण प्रवासी कामगारों के कौशल की हो रही है पहचान : प्रधानमंत्री 6 राज्यों के 116 जिलों में आगामी 125 दिनों में एक अभियान के तौर पर 50,000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को लागू किया जाएगा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज बड़े पैमाने पर रोजगार और ग्रामीण सार्वजनिक कार्यों से संबंधित ‘गरीब कल्याण रोजगार अभियान’ का शुभारम्भ किया। इसका उद्देश्य कोविड-19 महामारी से प्रभावित बड़ी संख्या में घर वापस लौटने वाले प्रवासी कामगारों को सशक्त बनाना और अपने क्षेत्रों/गांवों में आजीविका के अवसर मुहैया कराना है। 20 जून (शनिवार) को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से ग्राम तेलीहर, विकासखंड बेलदौर, जिला खगड़िया, बिहार से शुरू किए गए इस अभियान में 6 भागीदार राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रतिनिधियों, विभिन्न केन्द्रीय मंत्रियों और अन्य ने भाग लिया। प्रधानमंत्री ने बिहार के खगड़िया जिले में तेलीहर के ग्रामीणों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संवाद किया, जहां औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री गरीब कल्याण रोजगार योजना का शुभारम्भ किया गया। प्रधानमंत्री ने प्रवासियों से उनके रोजगार की वर्तमान स्थिति और लॉकडाउन के दौरान शुरू की गईं विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं की उपलब्धता के बारे में पूछा। श्री मोदी ने अपने संवाद के बाद संतुष्टि जाहिर की और संकेत दिए कि कैसे कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में ग्रामीण भारत मजबूती के साथ खड़ा रहा तथा कैसे इस संकट के दौर में पूरे देश और दुनिया को प्रेरणा दी। प्रधानमंत्री ने कहा कि गरीबों और प्रवासियों के कल्याण को लेकर केन्द्र तथा राज्य सरकारें दोनों ही चिंतित रही हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि पीएम गरीब कल्याण योजना के अंतर्गत आत्म निर्भर भारत अभियान को 1.75 लाख करोड़ रुपये के पैकेज के साथ शुरू किया गया है। उन्होंने कहा कि केन्द्र और राज्य सरकारें घर लौटने के इच्छुक प्रवासी कामगारों के लिए विशेष श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों का परिचालन कर रही हैं। प्रधानमंत्री ने इस दिन को रोजगार के माध्यम से गरीबों के कल्याण के लिए शुरू किए गए व्यापक अभियान के रूप ऐतिहासिक दिन करार दिया। यह अभियान हमारे मजदूर भाइयों और बहिनों, हमारे गांवों में रह रहे युवाओं, बहिनों और बेटियों के लिए समर्पित है। उन्होंने कहा, इस अभियान के माध्यम से हमारा प्रयास है कि मजदूरों और कामगारों को उनके घर के निकट ही काम दिया जाए। प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि गरीब कल्याण रोजगार अभियान के अंतर्गत टिकाऊ बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए 50,000 करोड़ रुपये की धनराशि खर्च की जाएगी। उन्होंने कहा कि गांवों में रोजगार, विविध कार्यों के विकास के लिए 25 कार्य क्षेत्रों की पहचान की गई है। ये 25 कार्य या परियोजनाएं गरीबों के लिए ग्रामीण आवास, पौधारोपण, जल जीवन मिशन के माध्यम से पेयजल के प्रावधान, पंचायत भवन, सामुदायिक शौचालय, ग्रामीण मंडी, ग्रामीण सड़कें, मवेशी घर जैसे अन्य बुनियादी ढांचे, आंगनवाड़ी भवन आदि से संबंधित हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि अभियान से ग्रामीण क्षेत्रों को आधुनिक सुविधाएं भी मिलेंगी। उन्होंने कहा कि युवाओं और बच्चों की सहायता के लिए हर ग्रामीण घर को हाई स्पीड और सस्ता इंटरनेट बड़ी आवश्यकता है। प्रधानमंत्री ने कहा, यह पहली बार है कि शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में ज्यादा इंटरनेट उपयोग हो रहा है। इसलिए, फाइबर केबल बिछाने और इंटरनेट उपलब्ध कराने को भी इस अभियान में शामिल किया गया है। ये कार्य अपने गांव और अपने परिवार के साथ रहते हुए किए जाएंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत के लिए आत्मनिर्भर किसान समान रूप से आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सरकार ने अनचाहे नियमों और शर्तों को हटाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है, जिससे किसान देश के किसी भी हिस्से में मुक्त रूप से अपनी उपज को बेच सकें और फसल का बेहतर मूल्य देने वाले व्यापारियों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ सकें। श्री मोदी ने कहा कि किसानों को बाजार से प्रत्यक्ष रूप से जोड़ा जा रहा है और सरकार ने कोल्ड स्टोरेज आदि जैसे लिंकेज के लिए 1,00,000 करोड़ रुपये का निवेश उपलब्ध कराया है।

Current Affairs Quiz 20 Jun 2020 दैनिक सामान्य ज्ञान क्विज https://www.simplifiedshiksha.com/current-affairs-quiz-20-jun/

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अमूमन, आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण अस्थायी सदस्यता की दावेदारी को लेकर चुनाव कई दौर तक चल सकते हैं। वर्ष 1975 में अस्थायी सदस्यता की दावेदारी को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच प्रतिस्पर्धा देखने को मिली और चुनाव आठ राउंड तक चला, जिसमें अंततः पाकिस्तान को सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता प्राप्त हुई। सुरक्षा परिषद की भूमिका तथा शक्तियाँ सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली निकाय है जिसकी प्राथमिक ज़िम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा कायम रखना है। इसकी शक्तियों में शांति अभियानों का योगदान, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों को लागू करना तथा सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के माध्यम से सैन्य कार्रवाई करना शामिल है। यह सदस्य देशों पर बाध्यकारी प्रस्ताव जारी करने का अधिकार वाला संयुक्त राष्ट्र का एकमात्र निकाय है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत सभी सदस्य देश सुरक्षा परिषद के निर्णयों का पालन करने के लिये बाध्य हैं। मौजूदा समय में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों के पास वीटो पॉवर है। वीटो पॉवर का अर्थ होता है ‘निषेधाधिकार’। स्थायी सदस्यों के निर्णय से अगर कोई भी एक स्थायी सदस्य सहमत नहीं है तो वह वीटो पाॅवर का इस्तेमाल करके उस निर्णय को रोक सकता है। सुरक्षा परिषद में परिवर्तन की आवश्यकता क्यों? सुरक्षा परिषद की स्थापना वर्ष 1945 की भू-राजनीति के हिसाब से की गई थी। मौजूदा भू-राजनीति द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि से अब काफी अलग हो चुकी है। शीत युद्ध समाप्त के बाद से ही इसमें सुधार की ज़रूरत महसूस की जा रही है। इसमें कई तरह के सुधार की आवश्यकता है जिसमें संगठनात्मक बनावट और प्रक्रिया सबसे अहम है। मौजूदा समय में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी देशों में यूरोप का सबसे ज़्यादा प्रतिनिधित्व है। जबकि यहाँ विश्व की कुल आबादी का मात्र 5 प्रतिशत ही निवास करती है। अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका का कोई भी देश सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है। जबकि संयुक्त राष्ट्र का 50 प्रतिशत से अधिक कार्य अकेले अफ्रीकी देशों से संबंधित है। शांति स्थापित करने वाले अभियानों में अहम भूमिका निभाने के बावज़ूद भारत जैसे अन्य देशों के पक्ष को मौजूदा सदस्यों द्वारा नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के ढाँचे में सुधार की आवश्यकता इसलिये भी है क्योंकि इसमें अमेरिका का वर्चस्व है। अमेरिका अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति के बल पर संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य अंतराष्ट्रीय संगठनों की भी अनदेखी करता रहा है। सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी दावेदारी के पक्ष में तर्क 1.3 बिलियन आबादी के साथ भारत, दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है। यहाँ विश्व की कुल जनसंख्या का करीब 1/5वाँ हिस्सा निवास करता है। भारत विश्व की उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति है। वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते आर्थिक कद ने भारत के दावों को और मज़बूत किया है। मौजूदा समय में भारत विश्व की छठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसके अलावा पीपीपी पर आधारित जीडीपी की दृष्टि से भारत विश्व की तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। भारत को अब विश्व व्यापार संगठन, ब्रिक्स और जी-20 जैसे आर्थिक संगठनों में सबसे प्रभावशाली देशों में गिना जाता है। भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से विश्व शांति को बढ़ावा देने वाली रही है। भारत संयुक्त राष्ट्र की सेना में सबसे ज़्यादा सैनिक भेजने वाला देश है। सुरक्षा परिषद में अन्य समूहों की दावेदारी जी-4 समूह: भारत, जर्मनी, ब्राज़ील और जापान ने मिलकर जी-4 नामक समूह बनाया है। ये देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यता के लिये एक-दूसरे का समर्थन करते हैं। जी-4 समूह का मानना है कि सुरक्षा परिषद को और अधिक प्रतिनिधित्त्वपूर्ण, न्यायसंगत व प्रभावी बनाने की ज़रूरत है। L-69 समूह: ये समूह भारत, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के क़रीब 42 विकासशील देशों के एक समूह की अगुवाई कर रहा है। L-69 समूह ने UNSC सुधार मोर्चा पर तत्काल कार्रवाई की मांग की है। अफ्रीकी समूह: अफ्रीकी समूह में 54 देश शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की वकालत करने वाला दूसरा महत्त्वपूर्ण समूह है। इस समूह की मांग है कि अफ्रीका के कम से कम दो राष्ट्रों को वीटो की शक्तियों के साथ सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाया जाए। चुनौतियाँ स्थायी सदस्य देश अपने वीटो पाॅवर को छोड़ने के लिये सहमत नहीं हैं और न ही वे इस अधिकार को किसी अन्य देश को देने पर सहमत हैं। भारत की सदस्यता के लिये चार्टर में संशोधन करना पड़ेगा। इसके लिये स्थायी सदस्यों के साथ-साथ दो-तिहाई देशों द्वारा पुष्टि करना आवश्यक है।

अमेरिका जहाँ बहुपक्षवाद के खिलाफ है। तो वहीं रूस भी किसी तरह के सुधार के पक्ष में नहीं है। सुरक्षा परिषद में एशिया का एकमात्र प्रतिनिधि होने की मंशा रखने वाला चीन भी संयुक्त राष्ट्र में किसी तरह का सुधार नहीं चाहता। चीन नहीं चाहता कि भारत सुरक्षा परिषद का सदस्य बने। G-4 समूह में शामिल देशों के साथ भी विभिन्न मानकों पर भारत को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। जैसे- मानव विकास सूचकांक, लैंगिक अंतराल सूचकांक इत्यादि में भारत की रैंकिंग जर्मनी और जापान जैसे देशों से खराब है। स्थायी सदस्यता प्राप्त करने के लाभ सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख निर्णय लेने वाली संस्था है। प्रतिबंध लगाने या अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के फैसले को लागू करने के लिये सुरक्षा परिषद के समर्थन की आवश्यकता होती है। स्थायी सीट भारत को वैश्विक भू-राजनीति में अधिक मज़बूती से अपनी बात कहने में सक्षम बनाएगी। सुरक्षा परिषद स्थायी सदस्यता भारत को वीटो पॉवर प्रदान करेगी। सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाह्य सुरक्षा खतरों और भारत के खिलाफ राज्य प्रायोजित आतंकवाद के समाधान के लिये तंत्र को मज़बूत करने में सहायक सिद्ध होगी। निष्कर्ष संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की अस्थायी सदस्यता निश्चित तौर पर स्थायी सदस्यता की दिशा में अग्रसर होने के लिये एक महत्त्वपूर्ण प्रयास होगा। स्थायी सदस्यता भारत को वैश्विक राजनीति के स्तर पर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, चीन और रूस के समकक्ष लाकर खड़ा कर देगा। अतः संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये भारत को भी और अधिक गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council-UNSC) वैश्विक सुरक्षा प्रबंधन का सबसे बड़ा मंच माना जाता है। सुरक्षा परिषद पर विश्व में शांति-व्यवस्था को बनाए रखने और सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत का अनुपालन सुनिश्चित कराने का उत्तरदायित्व रहता है। समय-समय पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता में परिवर्तन होता रहता है। हाल ही में भारत 8वीं बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य (Non-Permanent Members) चुना गया है। भारत, वर्ष 2021-22 के बीच सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराएगा। इस आलेख में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के इतिहास, संगठन, उसकी भूमिका, अस्थायी सदस्यता तथा सुरक्षा परिषद की संरचना में सुधार की आवश्यकता और भारत की दावेदारी के संदर्भ में विभिन्न पहलूओं पर विमर्श करने का प्रयास किया जाएगा। सुरक्षा परिषद: पृष्ठभूमि सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई है, जिसका गठन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1945 में हुआ था। सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, रूस और चीन हैं। मूल रूप से सुरक्षा परिषद में 11 सदस्य थे जिसे वर्ष 1965 में बढ़ाकर 15 कर दिया गया। गौरतलब है कि इन स्थायी सदस्य देशों के अलावा 10 अन्य देशों को दो वर्ष के लिये अस्थायी सदस्य के रूप में सुरक्षा परिषद में शामिल किया जाता है। सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार होता है। इन देशों की सदस्यता दूसरे विश्व युद्ध के बाद के शक्ति संतुलन को प्रदर्शित करती है। क्या है अस्थायी सदस्यता? अस्थायी सदस्यों का चुनाव दो वर्ष के लिये होता है। अस्थायी सदस्य देशों को चुनने का उद्देश्य सुरक्षा परिषद में क्षेत्रीय संतुलन कायम करना है। इस अस्थायी सदस्यता के लिये सदस्य देशों में चुनाव होता है। इसमें पाँच सदस्य एशियाई या अफ्रीकी देशों से, दो दक्षिण अमेरिकी देशों से, एक पूर्वी यूरोप से और दो पश्चिमी यूरोप या अन्य क्षेत्रों से चुने जाते हैं। अफ्रीका और एशिया महाद्वीप के लिये विनिर्धारित पाँच सीटों में से तीन सीट अफ्रीका के लिये और दो सीट एशिया के लिये निश्चित की गई हैं। अफ्रीका और एशिया महाद्वीप दोनों में परस्पर मतैक्यता के आधार पर अरब देशों के लिये 1 सीट आरक्षित करने का भी प्रावधान है। दोनों महाद्वीप के द्वारा प्रत्येक दो वर्ष में क्रमशः 1 अरब देश की सदस्यता का अनुमोदन करना होता है। चुनाव की प्रक्रिया सम संख्या से प्रारंभ होने वाले वर्षों में अफ्रीका महाद्वीप से 2 सदस्य देश और पूर्वी यूरोप, एशिया-प्रशांत क्षेत्र, लैटिन अमेरिका व कैरीबियाई क्षेत्र से एक-एक सदस्य देश चुने जाते हैं। वहीं विषम संख्या से प्रारंभ होने वाले वर्षों में पश्चिमी यूरोप और अन्य क्षेत्रों से दो सदस्य, एशिया-प्रशांत क्षेत्र, अफ्रीका महाद्वीप, लैटिन अमेरिका व कैरीबियाई क्षेत्र से एक-एक सदस्य देश चुने जाते हैं। जून 2019 में एशिया-प्रशांत क्षेत्र से 1 सदस्य के लिये सर्वसम्मति से भारत का अनुमोदन किया गया था। ध्यातव्य है कि इस अनुमोदन को चीन पाकिस्तान का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। पश्चिमी यूरोप और अन्य क्षेत्रों से दो सदस्य के चयन हेतु कनाडा, आयरलैंड व नार्वे ने दावेदारी प्रस्तुत की थी। लैटिन अमेरिका व कैरीबियाई क्षेत्र से एक सदस्य के लिये मैक्सिको का सर्वसम्मति से अनुमोदन किया गया था। अफ्रीका महाद्वीप से एक सदस्य के चयन के लिये केन्या और जिबूती ने दावेदारी प्रस्तुत की थी। यदि कोई देश सर्वसम्मति से उम्मीदवार बना है और उसके समूह द्वारा उसे पूर्ण समर्थन प्राप्त है तो भी उसे वर्तमान सत्र में उपस्थित और मतदान करने वाले दो-तिहाई सदस्यों के वोट सुरक्षित करने की आवश्यकता है जो कि न्यूनतम 129 वोट हैं, यदि सभी 193 सदस्य राज्य भाग लेते हैं। भारत ने जनवरी 2021 से दिसंबर 2022 तक की समयावधि के लिये मतदान करने वाले 192 देशों के सापेक्ष 184 देशों का समर्थन प्राप्त किया। पूर्व में भी भारत अस्थायी सदस्य रहा इससे पूर्व भी भारत वर्ष 1950-51, 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92 और 2011-12 में सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रहा है। वर्ष 2011-12 में कजाख़स्तान द्वारा अपनी दावेदारी से पीछे हटने के बाद भारत ने मतदान करने वाले 190 देशों के सापेक्ष 187 देशों का समर्थन प्राप्त कर किया था। जहाँ अफ्रीका महाद्वीप ने तीन सीटों की दावेदारी को लेकर रोटेशन की पद्धति को अपनाया है, वहीं एशिया-प्रशांत क्षेत्र में इस तरह के समन्वय का अभाव दिखता है। सुरक्षा परिषद में दावेदारी को लेकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों में अक्सर प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है। वर्ष 2018 में अस्थायी सदस्यता की दावेदारी को लेकर मालदीव और इंडोनेशिया के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा देखने को मिली थी।

चीनी वैज्ञानिकों के एक अध्ययन दल ने ‘मिसियस’ (Micius) क्वांटम उपग्रह का प्रयोग कर विश्व में पहली बार ‘क्वांटम इंटेंगलमेंट’ (Quantum Entanglement) पर आधारित लंबी दूरी के बीच ‘क्वांटम क्रिप्टोग्राफी’ (Quantum Cryptography) को सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है, जो क्वांटम दूरसंचार के व्यावहारिक इस्तेमाल में एक महत्त्वपूर्ण प्रगति माना जा रहा है। प्रमुख बिंदु: पान जियान-वी (Pan Jian-Wei), जिन्हें चीन में 'क्वांटम तकनीक का पिता' माना जाता है, के नेतृत्त्व वाली ऑपरेटिंग टीम ने क्वांटम तकनीक की दिशा में कई सफलताओं को प्राप्त किया है। मिसियस उपग्रह के माध्यम से मूल ग्राउंड स्टेशन जो एक-दूसरे से 1,200 किमी. की दूरी पर स्थित थे, के मध्य इंटैंगलमेंट क्वांटम क्रिप्टोग्राफी को सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है। इंटैंगलमेंट फोटॉन आपस में संबंधित हल्के कण होते हैं जिनके गुण आपस में संबंधित रहते हैं। यदि किसी एक फोटॉन में हेराफेरी की जाती है, तो इसका प्रभाव दूसरे फोटॉन पर भी होता है। क्वांटम संचार: क्वांटम क्रिप्टोग्राफी या क्वांटम कुंजी वितरण (Quantum Key Distribution- QKD) सुरक्षित संचार के लिये ‘सममित कूटबद्ध कुंजी’ (Symmetric Encoded Key) के वितरण को सुरक्षित करने की एक तकनीक है। इसमें संचार के लिये फोटॉन जो कि 'क्वांटम कण है, का प्रयोग किया जाता है। विभिन्न QKD प्रोटोकॉल को यह सुनिश्चित करने के लिये डिज़ाइन किया गया है कि संचार में काम आने वाले फोटॉनों में किसी प्रकार की हेराफेरी संपूर्ण संचार प्रणाली को रोक दे। क्वांटम संचार उपग्रह मिसियस (Micius): मिसियस (Micius) विश्व का प्रथम क्वांटम संचार उपग्रह है, जिसे वर्ष 2016 में लॉन्च किया गया था। उपग्रह का नाम प्राचीन चीनी दार्शनिक मोज़ि (Mozi) के नाम पर रखा गया है। क्वांटम दूरसंचार में चुनौतियाँ: ऑप्टिकल आधारित QKD का उपयोग कर केवल कुछ किलोमीटर की दूरी तक संचार स्थापित किया जा सकता है, अत: इस समस्या का समाधान करने के लिये उपग्रह आधारित क्वांटम संचार प्रणाली पर कार्य किया जा रहा है। लंबी दूरी के लिये संचार स्थापित करना: अब तक ऑप्टिकल आधारित QKD का उपयोग कर केवल 100 किलोमीटर तक ही सुरक्षित संचार स्थापित किया गया है। हालाँकि रिपीटर (Repeater) के प्रयोग से क्वांटम दूरसंचार की लंबाई बढ़ाई जा सकती है। उदाहरण के लिये विश्व में पहली क्वांटम गोपनीय दूर संचार लाइन पेइचिंग-शांगहाई की लंबाई 2000 किमी. है, जिसमें 32 रिपीटरों का प्रयोग किया गया है। रिपीटर एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जो संकेत प्राप्त करता है और इसे आगे पहुँचाता है। ट्रांसमीटरों का विस्तार करने के लिये रिपीटर का उपयोग किया जाता है ताकि सिग्नल लंबी दूरी को कवर कर सके। सुरक्षा का मुद्दा: जब रिपीटर का प्रयोग क्वांटम संचार दूरी बढ़ाने में किया जाता है तो इस रिपीटर की सुरक्षा मानव द्वारा सुनिश्चित की जाती है अत: सूचनाओं के लीक होने का खतरा रहेगा। शोध का महत्त्व: क्वांटम उपग्रह आधारित लंबी दूरी की संचार तकनीक 'क्वांटम इंटरनेट' की दिशा में प्रमुख कदम होगा। क्वांटम तकनीक के राजनीतिक और सैन्य निहितार्थ हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता है। वर्ष 2013 में एडवर्ड स्नोडेन द्वारा पश्चिमी सरकारों द्वारा की जाने वाली इंटरनेट निगरानी के खुलासे के बाद संचार को अधिक सुरक्षित बनाने के लिये चीन जैसे देशों ने क्वांटम क्रिप्टोग्राफी में अनुसंधान बढ़ाने को प्रोत्साहित किया है। निष्कर्ष: एक लंबी दूरी की क्वांटम संचार संपर्क की सफलता यह बताती है कि हम संचार प्रणाली के नए युग में प्रवेश कर रहे हैं। जहाँ प्रारंभ में देशों की क्वांटम संचार के लिये चीन पर निर्भरता बढ़ सकती है परंतु भविष्य में ये देश स्वयं की क्वांटम उपग्रह संचार प्रणाली विकसित कर सकते हैं।

'विदेश मंत्रालय' (Ministry of External Affairs- MEA) के अनुसार, भारत 23 जून को रूस-भारत-चीन (Russia-India-China- RIC) समूह की होने वाली 'आभासी बैठक' (Virtual Meeting) में भाग लेगा। प्रमुख बिंदु: RIC की ‘आभासी बैठक' पर भारत-चीन 'वास्तविक नियंत्रण रेखा' (Line of Actual Control- LAC) पर उत्पन्न तनाव के कारण अनिश्चितता की स्थति बनी हुई थी। रूस, भारत तथा चीन के मध्य LAC पर उत्पन्न तनाव को कम करने में 'रचनात्मक संवाद’ (Constructive Dialogue) स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभा सकता है। यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि 15 जून को गलवान घाटी (Galwan Valley) में चीनी सैनिकों के साथ मुठभेड़ में कम-से-कम 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। पृष्ठभूमि: RIC समूह के निर्माण का विचार BRICS समूह से बहुत पहले वर्ष 1998 में तत्कालीन रूसी विदेश मंत्री द्वारा दिया गया था। हालाँकि RIC समूह को उतना महत्त्व नहीं दिया गया जितना BRICS समूह को दिया गया है। यद्यपि तीनों देशों के नेताओं द्वारा संयुक्त राष्ट्र महासभा जैसे बहुपक्षीय सम्मेलनों के दौरान बैठक का आयोजन किया जाता रहा है। भारत-चीन संबंधों के लिये बैठक का महत्त्व: RIC त्रिपक्षीय समूह होने के कारण, प्राय: इसमें द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा नहीं की जाती है। रूस ने भारत को RIC की बैठक में किसी भी द्विपक्षीय मुद्दे को न उठाने की सलाह दी है। बैठक में चर्चा किये जाने वाले विषयों का निर्धारण पहले ही किया जा चुका है। अत: नवीन मुद्दों को बैठक में नहीं उठाया जाएगा। भारत भी अपने सीमा विवादों को द्विपक्षीय रूप से हल करने का समर्थन करता है, अत: इस बात की भी पूरी संभावना है कि भारत अपने सीमा विवादों को RIC की बैठक में न उठाए। RIC का महत्त्व: तीनों देश बहुपक्षीय संस्थानों जैसे संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार का समर्थन करते हैं। तीनों देश अंतर्राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता को बढ़ावा देने के लिये सभी स्तरों पर नियमित रूप से वार्ता का समर्थन करते हैं। तीनों देश BRICS, शंघाई सहयोग संगठन (Shanghai Cooperation Organisation- SCO), पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (East Asia Summit- EAS), एशिया-यूरोप बैठक (Asia-Europe Meeting- ASEM) जैसे साझा समूहों के माध्यम से आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने पर सहमत हैं। तीनों देश यूरेशिया तथा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक अवस्थिति के आधार पर वैश्विक शक्तियाँ हैं। भारत के लिये RIC का महत्त्व: QUAD (भारत, अमेरिका, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया) तथा JAI (जापान-अमेरिका-भारत) जैसे समूह भारत को केवल एक समुद्री शक्ति होने तक ही सीमित कर देंगे, जबकि RIC समूह वास्तव में भारत को महसागरीय शक्ति के साथ-साथ महाद्वीपीय शक्ति के रूप में उबरने में मदद कर सकता है। भारत और चीन दोनों देशों के रूस के साथ बेहतर संबंध है ऐसे में रूस इन दोनों देशों के बीच सेतु का कार्य कर सकता है। समूह के समक्ष चुनौतियाँ: भारत-रूस के राजनीतिक संबंध अच्छे हैं लेकिन द्विपक्षीय व्यापार या निवेश कम है। इसके विपरीत भारत-चीन व्यापार बहुत अधिक है लेकिन द्विपक्षीय राजनीतिक संबंध अच्छे नहीं हैं। रूस और चीन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं जबकि भारत नहीं, अत: यह समूह इस दृष्टि से असंतुलित नज़र आता है। अमेरिका के संबंध में तीनों देशों की नीतियाँ भी बेमेल नज़र आती हैं। रूस और चीन अमेरिका की एशिया-प्रशांत नीति से खुश नहीं हैं वही भारत इस संबंध में अमेरिका का समर्थन करता है। निष्कर्ष: रूस-भारत-चीन (RIC) समूह एक महत्त्वपूर्ण बहुपक्षीय समूह है, क्योंकि यह तीन सबसे बड़े यूरेशियन देशों को एक साथ लाता है जिनकी भौगोलिक सीमाएँ आपस में जुड़ी हैं। 23 जून को आयोजित की जा रही आभासी बैठक ज़रूरी है क्योंकि इसमें COVID-19 महामारी जैसे महत्त्वपूर्ण मामलों पर चर्चा की

एशियाई विकास बैंक (Asian Development Bank- ADB) द्वारा जारी एशियाई विकास आउटलुक (Asian Development Outlook) के अनुसार, मौजूदा वित्तीय वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था में कुल 4 प्रतिशत का संकुचन आ सकता है। प्रमुख बिंदु एशियाई विकास बैंक (ADB) के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के कारण काफी बुरी तरह से प्रभावित हुई है, जिसका प्रभाव जल्द ही भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास पर देखने को मिल सकता है। COVID-19 के प्रभावस्वरूप दक्षिण एशिया की तमाम अर्थव्यवस्थाओं में समग्र रूप से मौज़ूदा वित्तीय वर्ष में 3 प्रतिशत का संकुचन हो सकता है। कारण ध्यातव्य है कि सभी उच्च-आवृत्ति वाले संकेतक जैसे क्रय प्रबंधक सूचकांक (Purchasing Manager's Index- PMI) आदि अप्रैल माह में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच गए हैं। बड़े-बड़े शहरों में अपनी नौकरी गँवाने के बाद सभी प्रवासी कामगार अपने गाँव लौट गए हैं, इतनी समस्याओं का सामने करने के बाद उन्हें उत्पादन के लिये वापस शहरों में लाना काफी चुनौतीपूर्ण है, ऐसे में वित्तीय वर्ष 2020-21 में भारत का उत्पादन काफी धीमा रहने वाला है। ADB का अनुमान है कि वर्ष 2020-21 में एशिया का विकास अपेक्षाकृत काफी धीमा रहेगा, क्योंकि कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी को संबोधित करने के लिये अपनाए गए उपायों जैसे लॉकडाउन आदि के कारण आर्थिक गतिविधियों के कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न होती है और मांग भी कमज़ोर होती है। अन्य एशियाई क्षेत्रों की स्थिति अनुमान के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2020-21 में एशिया मुश्किल से 0.1 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ विकास करेगा, जो कि बीते 6 दशकों में सबसे कम विकास दर है। इससे पूर्व वर्ष 1961 में इतनी कम वृद्धि दर्ज की गई थी। वित्तीय वर्ष 2020-21 में पूर्वी एशिया के लिये विकास दर का अनुमान 2.0 प्रतिशत से घटकर 1.3 प्रतिशत हो गया है। एशियाई विकास आउटलुक के मुताबिक, मौजूदा वित्तीय वर्ष (2020-21) में चीन में 1.8 प्रतिशत की सकारात्मक वृद्धि दर्ज करने का अनुमान है, जबकि वित्तीय वर्ष 2019-20 में चीन की आर्थिक वृद्धि दर 6.1 प्रतिशत थी, इस प्रकार स्पष्ट है कि कोरोना वायरस (COVID-19) के कारण चीन के आर्थिक विकास में काफी कमी आई है। दक्षिण पूर्व एशिया में उपभोग, निवेश और व्यापार में व्यापक गिरावट आई है। इस क्षेत्र में मौजूद सभी देशों की समग्र अर्थव्यवस्था में वित्तीय वर्ष 2020-21 में 2.7 प्रतिशत का संकुचन होने का अनुमान है। एशियाई विकास बैंक (Asian Development Bank- ADB) एशियाई विकास बैंक (ADB) एक क्षेत्रीय विकास बैंक है। इसकी स्थापना 19 दिसंबर 1966 को हुई थी। ADB का मुख्यालय मनीला, फिलीपींस में है। 1966 में ADB की शुरुआत 31 सदस्यों के साथ हुई थी, किंतु वर्तमान में ADB में कुल 68 सदस्य हैं, जिनमें से 49 एशिया-प्रशांत क्षेत्र के हैं। इसका उद्देश्य एशिया में सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। ADB विकासशील देशों की उन परियोजनाओं को समर्थन प्रदान करता है जो सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के सहयोग के माध्यम से आर्थिक विकास की दिशा में कार्य करती हैं। एशियाई विकास बैंक (ADB) द्वारा ‘एशियाई विकास आउटलुक’ नाम से एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है, जिसमें एशिया के अधिकांश देशों का आर्थिक विश्लेषण और संबंधित पूर्वानुमान प्रस्तुत किया जाता है। आगे की राह एशिया महाद्वीप में मौजूद अर्थव्यवस्थाओं पर मौजूदा वित्तीय वर्ष में COVID-19 महामारी का प्रकोप इसी प्रकार जारी रहेगा, बावजूद इसके कि समय के साथ लॉकडाउन को शिथिल किया जा रहा है और आर्थिक गतिविधियों को 'नए सामान्य' परिदृश्य में फिर से शुरू किया जा रहा है। ADB के अनुसार, आने वाले समय में कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी और भी गंभीर रूप धारण कर सकती है, जिसका स्पष्ट प्रभाव विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं पर देखने को मिलेगा, जिसके कारण वित्तीय संकट से इनकार नहीं किया जा सकता है। आवश्यक है कि विभिन्न सरकारों को COVID-19 के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिये नीतिगत उपाय अपनाने चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि अर्थव्यवस्था पर कोरोना वायरस का प्रभाव कम-से-कम हो।

COVID -19 महामारी के चलते प्रवासी मज़दूरों के समक्ष उत्पन्न रोज़गार की समस्या को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 20 जून, 2020 को ‘गरीब कल्याण रोज़गार अभियान’ (Garib Kalyan Rojgar Abhiyan- GKRA) की शुरुआत की जाएगी । प्रमुख बिंदु: इस अभियान की शुरुआत प्रधानमंत्री द्वारा वीडियो-कॉन्फ्रेंस के माध्यम से बिहार के खगड़िया ज़िले के ग्राम तेलिहार से की जाएगी। ‘गरीब कल्याण रोज़गार अभियान’ के अंतर्गत सरकार द्वारा लगभग 50 हज़ार करोड़ रुपए का निवेश किया जायेगा। यह 125 दिनों का अभियान होगा, जिसे मिशन मोड रूप में संचालित किया जाएगा। इस अभियान में छ: राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड तथा ओडिशा को शामिल किया गया है। छ: ज़िलों के 25,000 से अधिक प्रवासी श्रमिकों के साथ कुल 116 ज़िलों को इस अभियान के लिये चुना गया है, जिसमें 27 आकांक्षी ज़िले (aspirational districts) भी शामिल हैं। इस कार्यक्रम में शामिल छ: राज्यों के 116 ज़िलों के गाँव कॉमन सर्विस सेंटर (Common Service Centres) तथा ‘कृषि विज्ञान केंद्रों’ (Krishi Vigyan Kendras) के माध्यम से शामिल होंगे, जो कोरोना के कारण लागू शारीरिक दूरी के मानदंडों को भी ध्यान में रखेंगे । इस अभियान में 12 विभिन्न मंत्रालयों को समनवित किया जाएगा, जिसमें पंचायती राज, ग्रामीण विकास, सड़क परिवहन और राजमार्ग, खान, पेयजल और स्वच्छता, पर्यावरण, रेलवे, नवीकरणीय ऊर्जा, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, सीमा सड़कें, दूरसंचार तथा कृषि मंत्रालय शामिल हैं। अभियान का महत्त्व: इस अभियान को ऐसे समय में शुरू किया जा रहा है जब COVID-19 के प्रकोप के कारण लाखों प्रवासी मज़दूर गाँवों की तरफ लौट रहे हैं जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार की समस्या उत्पन्न हो रही है। मनरेगा के तहत काम करने वाले परिवारों की संख्या भी मई 2020 में एक स्तर पर पहुँच गई है। यह अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में ही प्रवासी श्रमिकों को रोज़गार प्रदान करने के साथ-साथ गाँवों के टिकाऊ बुनियादी ढाँचे का निर्माण करने में सहायक होगा। यह अभियान प्रवासी श्रमिकों तथा ग्रामीण नागरिकों के सशक्तीकरण तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा अर्थात् गाँवों में ही आजीविका के अवसरों को इस अभियान के माध्यम से विकसित किया जाएगा।

ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट Great Oxidation Event हाल ही में नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) नामक पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया कि पृथ्वी के आतंरिक भाग में मेंटल का विकास न केवल वायुमंडल के विकास को नियंत्रित कर सकता था बल्कि जीवन के विकास को भी नियंत्रित कर सकता था। अध्ययन के अनुसार, ‘ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट’ (Great Oxidation Event) से पहले वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा मौजूद थी किंतु यह वायुमंडल में संकेंद्रित नहीं हो सकी। प्रमुख बिंदु: वायुमंडल में ऑक्सीजन के संकेंद्रित न होने का मुख्य कारण ज्वालामुखी द्वारा उत्सर्जित गैसों की बड़ी मात्रा के साथ ऑक्सीजन की प्रतिक्रिया थी। जब ज्वालामुखी सक्रिय होते हैं तो उनसे बड़ी मात्रा में गैसों का वायुमंडल में उद्गार होता हैं। इन गैसों की प्रकृति पृथ्वी के मेंटल में सामग्रियों की प्रकृति पर निर्भर करती है। ज्वालामुखी उद्गार के लगातार जारी रहने के कारण इससे बाहर आने वाली सामग्री का उत्पादन कम होता गया जिसने आसानी से ऑक्सीजन के साथ संयोजन किया। और पृथ्वी का मेंटल अधिक से अधिक ऑक्सीकृत होता गया। समय के साथ विभिन्न जीवन-रूपों द्वारा उत्पन्न ऑक्सीजन वातावरण में जमा होती गई। इससे ‘ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट’ की शुरुआत हुई जिससे जटिल जीवन का मार्ग प्रशस्त हुआ। ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट (Great Oxidation Event): माना जाता है कि पृथ्वी के वायुमंडल में मुक्त ऑक्सीजन की उपस्थिति के कारण ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट की घटना हुई। यह घटना ऑक्सीजन उत्पन्न करने वाले साइनोबैक्टीरिया के कारण संभव हो सकी जो 2.3 अरब वर्ष पहले बहुकोशिकीय रूपों में थे। साइनोबैक्टीरिया पृथ्वी पर सबसे पुराने जीव माने जाते हैं। ये जीव आज भी महासागरों एवं गर्म क्षेत्रों में मौजूद हैं। इन जीवों ने ऑक्सीजन का उत्पादन करके और बहुकोशिकीय रूपों में विकसित होकर साँस लेने वाले जीवों के उद्भव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्र एवं वातावरण में मुक्त ऑक्सीजन के स्तर में वृद्धि से कुछ ही समय पहले बहुकोशिकीयता (Multicellularity) विकसित हुई थी।

सलामी-स्लाइसिंग रणनीति Salami-Slicing Tactics भारत और चीन के मध्य हालिया तनाव के मद्देनज़र एक बार पुनः चीन की सलामी-स्लाइसिंग रणनीति (Salami-Slicing Tactics) चर्चा के केंद्र बिंदु में है। प्रमुख बिंदु: सैन्य बोलचाल की भाषा में ‘सलामी-स्लाइसिंग’ शब्द ऐसी रणनीति के रूप में वर्णित किया जाता है जिसमें अपने खिलाफ हो रहे विरोध को समाप्त करने एवं नए क्षेत्रों को हासिल करने के लिये खतरों एवं गठबंधनों की प्रक्रिया को विभाजित करना तथा उन पर जीत हासिल करना शामिल है अर्थात् एक संचित प्रक्रिया के माध्यम से एक बहुत बड़ी कार्यवाही को अंजाम देना है। चीन के संदर्भ में सलामी स्लाइसिंग रणनीति: चीन के संदर्भ में सलामी स्लाइसिंग दक्षिण चीन सागर एवं हिमालयी क्षेत्रों में क्षेत्रीय विस्तार की रणनीति को दर्शाता है। कई रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि डोकलाम गतिरोध हिमालयी क्षेत्र में चीन की सलामी स्लाइसिंग रणनीति का ही परिणाम था और हाल ही में गलवान घाटी में गतिरोध भी चीन की इसी रणनीति का परिणाम है। विश्लेषकों का मानना है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चीन दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है जो अपने पड़ोसी देशों के क्षेत्राधिकार वाले देशों में अपनी विस्तारवादी नीति को बढ़ावा दे रहा है। यह विस्तार क्षेत्रीय एवं समुद्री दोनों क्षेत्रों में हुआ है। तिब्बत का अधिग्रहण, अक्साई चिन पर कब्ज़ा और पार्सेल द्वीपों का अधिग्रहण चीनी विस्तारवादी नीति के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। भारत का वह स्थान जहाँ चीन सलामी स्लाइसिंग रणनीति का प्रयोग कर रहा है: पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल प्रदेश के 90,000 वर्ग किमी. क्षेत्र पर चीन इस रणनीति का प्रयोग करता है भारत के इस भाग को वह ‘दक्षिण तिब्बत’ कहता है। इसी प्रकार चीन उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर के छोटे क्षेत्रों पर भी अपना दावा करता है। उल्लेखनीय है कि चीन डोकलाम पठार पर नज़र गड़ाए हुए है क्योंकि यहाँ से वह भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर नज़र रख सकता है। गौरतलब है कि सिलिगुड़ी कॉरिडोर पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को विशेषज्ञों ने बीमारियों से लड़ने में बताया अहम “सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (सार्स), निमोनिया और दूसरी बीमारियों का पता लगाने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक उपयोगी हो सकती है।” आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में कार्यरत विशेषज्ञ डॉ वैभव आनंद देशपांडे ने यह बात कही है।वह राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी), नागपुर द्वारा आयोजित एक ऑनलाइन परिचर्चा को संबोधित कर रहे थे। यूनाइटेड किंगडम (यूके) की कंपनी एआई फॉर वर्ल्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी देशपांडे ने वैज्ञानिकों से ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित करने का आग्रह किया है, जो छाती के एक्स-रे की मदद से कोविड-19 का पता लगा सके। उन्होंने बताया कि अस्पतालों के प्रबंधन और आवश्यक उपकरणों की आपूर्ति को सुनिश्चित करने में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की नागपुर स्थित प्रयोगशाला नीरी द्वारा ‘फाइट अगेंस्ट कोविड-19: ए पीक इन टू ग्लोबल सीन’ विषय परहाल में यह परिचर्चा आयोजित की गई थी। इसमें डॉ देशपांडे के अलावा सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ शेखर सी. मांडे, जापान की राजधानी टोक्यो की एजोगवा सिटी के काउंसलर योगेंद्र पुराणिक, चीन की दवा कंपनी वीपी फार्मा से जुड़े डॉ दीपक हेगड़े, यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल; फ्लोरिडा से जुड़ीं डॉ अस्मिता गुप्ते, केईएम अस्पताल; मुंबई की डॉ अमिता अठावले, अमेरिका की कंपनी पीस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं केमिकल एन्वायरमेंटल इंजीनियर डॉ विक्रम पत्रकिने और सीएसआईआर-एनसीएल; पुणे के वैज्ञानिक डॉ अमोल कुलकर्णी समेत देश-विदेश के विशेषज्ञ शामिल थे। इस मौके पर डॉ मांडे ने कोविड-19 से लड़ने के लिए सीएसआईआर द्वारा निर्धारित किए गए पाँच आयामों– डिजिटल एवं आणविक निगरानी, त्वरित एवं किफायती निदान, नई दवाओं का विकास व दूसरी बीमारियों की दवाओं का कोविड-19 के उपचार में उपयोग, अस्पतालों की सहायक सामग्री एवं निजी सुरक्षा उपकरण और आपूर्ति श्रृंखला व रसद समर्थन प्रणाली के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि सीएसआईआर दस दवाओं के चिकित्सीय परीक्षण पर काम कर रहा है। सीएसआईआर से संबंधित संस्थान विभिन्न कंपनियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। सीएसआईआर निजी सुरक्षा उपकरणों के विकास व नैदानिक तकनीकों के लिए रिलायंस, अस्पतालों के सहायक उपकरणों के लिए टाटा, डिजिटल व आणविक निगरानी के लिए टीसीएस एवं इंटेल, दवाओं की रिपर्पजिंग के लिए सिप्ला, कोरोना वायरस थेरैपी के लिए कैडिला, इनएक्टिवेटेड वैक्सीन के विकास के लिए भारत बायोटेक, इलेक्ट्रोस्टेटिक स्प्रे व वेंटिलेटर विकास के लिए भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड और थर्मोमीटर व ऑक्सीजन संवर्द्धन यूनिट के विकास के लिए भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ काम कर रहा है। योगेंद्र पुराणिक ने बताया कि जापान में कोविड-19 के मामलों की संख्या काफी कम है, जिसकी एक वजह जापानियों की मास्क पहनने की आदत है और वहाँ पर लोग अपने दैनिक जीवन में अत्यधिक स्वच्छता भी बनाए रखते हैं। उन्होंने बताया कि जापान में बड़ी संख्या में विदेशी रहते हैं, इसीलिए अलग-अलग भाषाओं में कोरोना वायरस के बारे में पूछताछ करने के लिए प्रत्येक शहर में कॉल सेंटर स्थापित किए गए हैं। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था का समर्थन करने के लिए जापान ने कभी भी पूर्ण लॉकडाउन का विकल्प नहीं चुना। डॉ हेगड़े ने बताया कि चीन में चिकित्सीय परीक्षण के लिए विभिन्न दवाओं और टीकों को मंजूरी दी गई है, जिसमें रेमेड्सविर भी शामिल है। चीन ने कोविड-19 के इलाज के लिए कुछ पारंपरिक चीनी दवाओं का भी इस्तेमाल किया, जिनमें जिंहुआ किंगगन ग्रैन्यूल्स, लियानहुआ क्विंगवेन कैप्सूल आदि शामिल हैं, जिसके मरीजों पर सकारात्मक प्रभाव देखे गए हैं। डॉ गुप्ते ने हेल्थकेयर के दृष्टिकोण पर बोलते हुए कहा कि अमेरिका में हेल्थकेयर प्रोटोकॉल तेजी से बदल रहे हैं। डॉ कुलकर्णी ने कहा कि शोधकर्ताओं को कोविड-19 के संबंध में बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए अपनीशोध एवं विकास आधारित गतिविधियों में डॉक्टरों को भी शामिल करना उपयोगी हो सकता है। जबकि, डॉ पत्रकिने ने लॉकडाउन के दौरान पर्यावरणीय परिस्थितियों के बारे में बोलते हुए कहा कि लॉकडाउन के बाद से अविश्वसनीय पर्यावरणीय परिवर्तनों को देखा गया है। हमें वर्तमान परिवेश को हमेशा के लिए संरक्षित करने की जरूरत है। उन्होंने भारत के गांवों को आत्मनिर्भर बनाने और सकल घरेलू उत्पाद सूचकांक के स्थान पर हैप्पीनेस सूचकांक अपनाने पर भी जोर दिया।

पर्यटन मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए सप्ताह भर चलने वाले समारोहों का आयोजन किया केंद्रीय थीम ‘ योग @ होम एवं परिवार के साथ योग’ के तहत सोशल मीडिया कार्यकलापों को लांच किया पर्यटन मंत्री देखो अपना देश वेबीनार के तहत 20 जून, 2020 को ‘भारत: एक सांस्कृतिक खजाना ’ नामक एक विशेष सत्र में भाग लेंगे पर्यटन मंत्रालय की अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए सप्ताह भर चलने वाले समारोहों की शुरूआत 15 जून, 2020 को हुई जिसमें देश भर के इसके क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा आरंभ की गई गतिविधियों की श्रृंखला शुरू की गई तथा केंद्रीय थीम ‘ योग@ होम एवं परिवार के साथ योग‘ के तहत योग के विषयों पर केंद्रित सोशल मीडिया कार्यकलापों को लांच किया गया। इन गतिविधियों की योजना लॉकडाउन के दौरान स्वस्थ दिमाग एवं शरीर की आत्म-चैतन्य स्थिति को प्रेरित करने के ध्येय से बनाई गई है। इन गतिविधियों को वर्चुअल माध्यम के जरिये सुगम्य बनाया गया है। समारोहों की मुख्य विशेषता पर्यटन मंत्रालय द्वारा 20 जून, 2020 को देखो अपना देश वेबीनार समारोह का आयोजन होगा जिसमें पर्यटन मंत्री श्री प्रहलाद सिंह पटेल भाग लेंगे तथा सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी के साथ एक संवाद का भी आयोजन होगा। इस सत्र का नाम होगा ‘भारत: एक सांस्कृतिक खजाना ’ तथा यह 20 जून, 2020 को दोपहर 2 बजे से 3 बजे तक आयोजित किया जाएगा। श्री प्रहलाद सिंह पटेल संवाद में अग्रणी भूमिका निभाएंगे, जबकि इसमें पांच विख्यात पैनलिस्ट-स्पाइसजेट के सीएमडी श्री अजय सिंह, ओयो के श्री रितेश अग्रवाल, फैशन डिजाइनर सुश्री अनीता डांगरे, विख्यात शेफ श्री रणवीर बरार, मैरियट मार्केटिंग की उपाध्यक्ष सुश्री रंजू एलेक्स आदि की भी सहभागिता रहेगी। देखो अपना देश वेबीनार श्रंखला पर्यटन मंत्रालय की एक भारत श्रेष्ठ भारत कार्यक्रम के तहत भारत की समृद्ध विविधता प्रदर्शित करने की एक कोशिश है। यह सत्र अतुल्य भारत सोशल मीडिया हैंडल्स facebook.com/incredibleindia/ and Youtube.com/incredibleindia पर लाइव होगा। यह सत्र योग एवं कल्याण पर आधारित अन्य देखो अपना देश वेबीनार पर लाइव होगा जिसमें शामिल हैं:- 19/06/2020 -1100-1200 बजे - योग एवं कल्याण- अंतरराष्ट्रीय योग गुरु एवं अध्यात्मिक गुरु भरत ठाकुर, देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रो वाइस चांसलर डा चिन्मय पांड्या, नाडी विज्ञान, योग उपचार एवं हीलिंग साईंसेज में विशेषज्ञ डा. लक्ष्मीनारायण जोशी द्वारा चुनौतीपूर्ण समय के लिए एक प्रस्तुति 20/06/2020 -1400-1500 बजे - पांच विख्यात पैनलिस्ट-स्पाइसजेट के सीएमडी श्री अजय सिंह, ओयो के श्री रितेश अग्रवाल, फैशन डिजाइनर सुश्री अनीता डांगरे, विख्यात शेफ श्री रणवीर बरार, मैरियट मार्केटिंग की उपाध्यक्ष सुश्री रंजू एलेक्स आदि के साथ केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री प्रहलाद सिंह पटेल के नेतृत्व में ‘भारत: एक सांस्कृतिक खजाना ‘ वेबीनार। 21/06/2020 -1100-1200 बजे- एक योग गंतव्य के रूप में भारत - प्रस्तोता: श्री अचल मेहरा- सीईओ, ग्रीनवे (एक सोशल इंपैक्ट कंपनी), संस्थापक -महुआ वन रिसौर्ट, पंच एवं सह संस्थापक -द योग हाउस, मुंबई सेशल मीडिया के जरिये जुड़ाव: अतुल्य भारत इंडिया सोशल मीडिया जुड़ाव में योग उत्साहियों, जो अपने परिवार के साथ योग का अभ्यास करते हैं, के साथ सहयोग शामिल है। दैनिक पोस्ट में चित्रों या वीडियो के जरिये अपने वास्तविक जीवन अनुप्रयोगों के साथ प्रत्येक दिन विभिन्न आसन करना शामिल है। मंत्रालय जुड़ाव संबंधी कार्यकलापों का भी संचालन कर रहा है जहां लोग अपने चित्र साझा कर सकते हैं और क्विज का उत्तर दे सकते हैं। इस सप्ताह के दौरान योग उत्साहियों के कुछ लाइव सत्रों को भी शामिल किया जाएगा। अन्य मुख्य विशेषताओं में लोगों को उनके घरों पर अभ्यास करने का सुझाव देने के लिए एक ई-न्यूजलेटर भेजना तथा महत्वपूर्ण ‘योग गंतव्यों को सूचीबद्ध करना शामिल है जहां यात्रा आरंभ होने के बाद जाया जा सकता है और उसकी खोज की जा सकती है। मंत्रालय आयुष मंत्रालय द्वारा संचालत ‘माई लाइफ माई योगा‘ प्रतियोगिता को भी बढ़ावा दे रहा है और आम लोगों द्वारा घरों पर अपने परिवार के साथ योग का अभ्यास करते समय का एक वीडियो भी प्रकाशित करेगा। पर्यटन मंत्रालय देश में घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रौद्योगिकी की मदद से नागरिकों के बीच एक साझीदारी का निर्माण करने के लिए माईगाव के साथ सक्रियतापूर्वक सहयोग कर रहा है। इलेक्ट्रोनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा सृजित देखो अपना देश वेबीनार राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस डिवीजन (एनईजीडी) द्वारा सक्रिय तरीके से समर्थित है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के दौरान पर्यटन मंत्रालय की कोशिश योग एवं कल्याण पर्यटन की भारत की समृद्ध विरासत का प्रतिनिधित्व करने की है।

आगामी सूर्य ग्रहण का सोशल मीडिया पर लाइव टेलिकास्ट करेगा एरीज ज़ूम, यूट्यूब और फेसबुक के माध्यम से सूर्य ग्रहण के सीधा प्रसारण की व्यवस्था की गई है "ग्रहण जैसी खगोलीय घटनाएं विज्ञान के बारे में युवाओं को उत्साहित करने और वास्तव में उनके साथ ही बड़े पैमाने पर समाज को समझाने और वैज्ञानिक मनोभाव पैदा करने के असाधारण अवसर होते हैं" : प्रोफेसर आशुतोष शर्मा, सचिव, डीएसटी 21 जून, 2020 को भारत के उत्तरी हिस्सों में सुबह 10:25 बजे से वलयाकार सूर्य ग्रहण दिखाई देगा। इस संदर्भ में, भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान एवं शोध संस्थान (एआरआईईएस या एरीज), नैनीताल ने 19 जून 2020 को दोपहर 03.30 बजे एरीज के निदेशक डॉ. दीपांकर बनर्जीद्वारा 'सूर्य ग्रहण का विज्ञान' विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया है। ज़ूम, यूट्यूब और फेसबुक के जरिए सूर्य ग्रहण के सीधा प्रसारण की व्यवस्था की गई है। सूर्य ग्रहण अफ्रीका, एशिया और यूरोप के कुछ हिस्सों से देखा जा सकेगा और दिलचस्प बात यह है कि ग्रहण का पीक भारत के उत्तरी हिस्से में दिखाई देगा, जो सुबह 10:25 बजे से शुरू होकर 12:08 बजे अधिकतम ग्रहण और 01:54 बजे समाप्त हो जाएगा। इससे पहले वलयाकार ग्रहण 26 दिसंबर 2019 को दक्षिण भारत से और आंशिक ग्रहण के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों से देखा गया था। अगला वलयाकार सूर्य ग्रहण भारत में अगले दशक में दिखाई देगा, जो 21 मई 2031 को होगा, जबकि 20 मार्च 2034 को पूर्ण सूर्य ग्रहण देखा जाएगा। सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा (अमावस्या के चरण में) सूरज की आंशिक या पूरी रोशनी को रोक लेता है और उसी हिसाब से आंशिक, वलयाकार और पूर्ण सूर्यग्रहण होता है। ग्रहण के दौरान चंद्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है और घना अंधेरा छा जाता है जिसे उम्ब्रा और कम अंधेरे वाले क्षेत्र को पेनम्ब्रा के रूप में जाना जाता है। पूर्ण सूर्य ग्रहण सूर्य ग्रहणों में सबसे दुर्लभ है। भले ही हर महीने अमावस्या आती हो, लेकिन हम ग्रहण को इतनी बार नहीं देख पाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि पृथ्वी-सूर्य प्लेन के लिहाज से चंद्रमा की कक्षा लगभग 5 डिग्री के कोण पर झुकी हुई है। इस कारण सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी का संयोग (एक ही सीध में) एक दुर्लभ खगोलीय घटना के तौर पर दिखाई देता है। डीएसटी के सचिव, प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने कहा, 'ग्रहण जैसी खगोलीय घटनाएं विज्ञान के बारे में युवाओं को उत्साहित करने और वास्तव में उनके साथ ही बड़े पैमाने पर समाज को समझाने और वैज्ञानिक मनोभाव पैदा करने के असाधारण अवसर होते हैं।' एरीज ने ग्रहण देखने के दौरान क्या करें और क्या न करें, इसको लेकर एक सूची तैयार की है: क्या करें: 1- ग्रहण देखने के लिए और आंखों को किसी भी नुकसान से बचाने के लिए ग्रहण देखने वाले चश्मों (आईएसओ प्रमाणित) या उचित फिल्टर्स के साथ कैमरे का इस्तेमाल करें। 2- वलयाकार सूर्य ग्रहण देखने का सबसे सुरक्षित तरीका पिनहोल कैमरे से स्क्रीन पर प्रोजेक्शन या टेलिस्कोप है। 3- ग्रहण के दौरान खाना-पीना, स्नान करना, बाहर जाने में कोई दिक्कत नहीं है। ग्रहण को देखना एक शानदार अनुभव होता है। क्या न करें: 1- नंगी आंखों से सूरज को न देखें। 2- ग्रहण देखन के लिए एक्स-रे फिल्म्स या सामान्य चश्मों (यूवी सुरक्षा वाले भी नहीं) का इस्तेमाल न करें। 3- ग्रहण देखने के लिए पेंट किए ग्लास का भी इस्तेमाल न करें। 4- इस ग्रहण को देखने से न चूकें।