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ओपन सोर्स पद्धतिगौरतलब है कि अधिकांश क्रिप्टो-करेंसी प्लेटफार्म ओपन सोर्स पद्धति पर आधारित होते हैं। इन प्लेटफॉर्म के सॉफ्टवेयर कोड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहते हैं। इसका प्रभाव यह होता है कि क्रिप्टो-करेंसी प्लेटफार्म में लगातार सुधार की संभावनाएँ बनी रहती हैं। वित्तीय दंड से सुरक्षाविदित हो कि सरकारों के पास बैंक खाते को फ्रीज या जब्त करने का अधिकार है, लेकिन क्रिप्टो-करेंसी के मामले में वे ऐसा नहीं कर सकती हैं। अतः सरकार के नियंत्रण से बचाव के एक प्रभावकारी विकल्प के रूप में भी क्रिप्टो-करेंसी का प्रयोग किया जा रहा है। क्रिप्टो-करेंसी से लाभ भारत में सबसे ज़्यादा नकदी संचालन में है, मार्च 2019 के अंत तक नकदी प्रवाह जीडीपी के 17 प्रतिशत से बढ़कर 21.1 लाख करोड़ रुपए के पार पहुँच गई है। गौरतलब है कि नकद संचालन में भारतीय रिज़र्व बैंक और वाणिज्यिक बैंकों का वार्षिक खर्च 21,000 करोड़ रुपए आता है। ऐसे में क्रिप्टो-करेंसी को बढ़ावा देना कैशलेस अर्थव्यवस्था के लिये महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है। क्रिप्टो-करेंसी वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने में भी अहम् साबित हो सकता है। विदित हो कि वर्ष 2008 की आर्थिक मंदी का सबसे बड़ा कारण बैंकों का दिवालिया हो जाना था और भविष्य में भी ऐसा हो सकता है। इन परिस्थितियों में यदि बैंकिंग व्यवस्था से अलग लेकिन एक विनियमित मुद्रा जैसे की फिएट क्रिप्टो-करेंसी अहम् साबित हो सकती है। क्रिप्टो-करेंसी का प्रचलन हानिकारक क्यों? एक असुरक्षित मुद्राक्रिप्टो-करेंसी की संपूर्ण व्यवस्था के ऑनलाइन होने के कारण इसकी सुरक्षा कमज़ोर हो जाती है और इसके हैक होने का खतरा बना रहता है। क्रिप्टो-करेंसी की सबसे बड़ी समस्या है इसका ऑनलाइन होना और यही कारण है कि क्रिप्टो-करेंसी को एक असुरक्षित मुद्रा माना जा रहा है। देश की सुरक्षा संबंधी चिंताएँयह ‘मुख्य वित्तीय सिस्टम’ और ‘बैंकिंग प्रणाली’ से बाहर रहकर काम करती है। यही कारण है कि इसके स्रोत और सुरक्षा को लेकर गंभीर प्रश्न उठते रहते हैं। इस डिजिटल मुद्रा को फ्रॉड, हवाला और आतंकी गतिविधियों को पोषित करने वाली मुद्रा के रूप में संबोधित किया जाता रहा है। नियंत्रण एवं प्रबंधन की समस्याक्रिप्टो-करेंसी से संबंधित एक बड़ी समस्या इसके नियंत्रण एवं प्रबंधन की भी है। भारत जैसे कई देशों ने अभी तक इसे मुद्रा के रूप में स्वीकृति प्रदान नहीं की है, ऐसे में इसका प्रबंधन एक बड़ी समस्या है। आर्थिक जानकारों का भी मानना है कि इसकी तकनीकी जानकारी रखे बिना इसमें निवेश करने के भारी दुष्परिणाम हो सकते हैं। पर्यावरणीय चिंताएँगौरतलब है कि प्रत्येक बिटकॉइन लेन-देन के लिये लगभग 237 किलोवाट बिजली की खपत होती है और इससे प्रतिघंटा लगभग 92 किलो कार्बन का उत्सर्जन होता है।

क्या है वर्तमान स्थिति? इन तमाम चिंताओं के बावजूद बिटकॉइन और इथेरियम जैसी क्रिप्टो-करेंसियाँ लगातार लोकप्रिय होती जा रही हैं और सरकारें चाह कर भी इन पर नियंत्रण नहीं कर पा रही हैं। विश्व के शीर्ष केंद्रीय बैंकों को यह महसूस होने लगा है कि क्रिप्टो-करेंसी को नियंत्रित करने की कोशिश निरर्थक है और वे स्वयं के क्रिप्टो-करेंसी जारी करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। भारत की अपनी क्रिप्टो-करेंसी फिएट क्रिप्टो-करेंसी के नाम से जानी जाएगी। क्रिप्टो-करेंसी का विनियमन यदि क्रिप्टो-करेंसी को एक इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणाली के रूप में अधिकृत कर वैधानिकता प्रदान की गई तो इसके विनियमन का दायित्व आरबीआई को निभाना होगा। पूंजी लाभ (capital gains) और व्यापारिक लेन-देन (business transaction) पर टैक्स की व्यवस्था करनी होगी। साथ ही, विदेशों में होने वाले भुगतान को विदेशी मुद्रा प्रबंध ‍अधिनियम (Foreign Exchange Management Act) के दायरे में लाना होगा। क्रिप्टो-करेंसी का विनियमन उपभोक्ता संरक्षण को मज़बूती प्रदान करेगा। क्रिप्टो-करेंसी विनिमय केंद्र का महत्त्व स्टॉक एक्सचेंजों के समान, क्रिप्टो-करेंसी विनिमय केंद्र क्रिप्टो-करेंसी के व्यापार के लिये एक ऑनलाइन मंच या बाज़ार प्रदान करते हैं। क्रिप्टो-करेंसी विनिमय केंद्र फिएट क्रिप्टो-करेंसी के व्यापार या विनिमय को भी सक्षम करते हैं, वे क्रिप्टो-करेंसी और पारंपरिक वित्तीय प्रणालियों को जोड़ते हैं। क्रिप्टो-करेंसी विनिमय केंद्र परियोजना की विश्वसनीयता, मध्यस्थों का आकलन और जारीकर्त्ताओं की पृष्ठभूमि की भी जाँच करते हैं। लाइसेंस प्राप्त क्रिप्टो-करेंसी विनिमय केंद्र के माध्यम से एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद वित्तपोषण कानून के कार्यान्वयन में भी मदद मिल सकती है। आगे की राह पात्रता आवश्यकताओं के अनुपालन और आंतरिक शासन, जोखिम प्रबंधन और वित्तीय संसाधनों पर परिचालन नीतियों और प्रक्रियाओं की विस्तृत जांच के आधार पर लाइसेंस जारी किये जा सकते हैं। निवेशकों के निवेश से पहले क्रिप्टो-करेंसी विनिमय केंद्र द्वारा निवेशकों की केवाईसी का स्वतंत्र सत्यापन करने की आवश्यकता है। पारदर्शिता, सूचना उपलब्धता और उपभोक्ता संरक्षण के बारे में चिंताओं को दूर करने के लिये आँकड़ों का संग्रहण, निरीक्षण, स्वतंत्र ऑडिट, निवेशक शिकायत निवारण और विवाद समाधान पर भी विचार किया जा सकता है।

क्रिप्टो-करेंसी सर्वोच्च न्यायालय ने 6 अप्रैल, 2018 को जारी किये गए भारतीय रिज़र्व बैंक के सर्कुलर को रद्द करके देश में क्रिप्टो एक्सचेंजों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। इस सर्कुलर ने व्यापारियों और एक्सचेंजों की बैंकिंग प्रणाली तक पहुँच को बाधित कर दिया था। व्यापार का संचालन करने में असमर्थ कई एक्सचेंज अन्य देशों में स्थानांतरित हो गए या उन्होंने यहाँ अपना कारोबार बंद कर दिया था। परंतु सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय से कुछ एक्सचेंज वापस आ गए है। विदित है कि मुद्रा के आविष्कार से पहले लोग वस्तु विनिमय प्रणाली के ज़रिये वस्तुओं का लेन-देन किया करते थे लेकिन जैसे-जैसे तकनीक उन्नत होती गई व्यापार के तरीकों में भी बदलाव आता गया। आभासी मुद्रा (virtual currency) का लगातार बढ़ रहा प्रचलन 21वीं सदी के सबसे महत्त्वपूर्ण बदलावों में से एक है, परंतु विकेंद्रीकृत प्रकृति और विनियमन की कमी, उपयोगकर्त्ताओं की गोपनीयता और केंद्रीय प्राधिकरण की कमी आभासी मुद्रा के प्रबंधन को चुनौतीपूर्ण बनाती है। इस आलेख में क्रिप्टो क्रिप्टो-करेंसी, उसके प्रकार, क्रिप्टो-करेंसी की लोकप्रियता के कारण, क्रिप्टो-करेंसी से लाभ, उसकी चुनौतियाँ तथा क्रिप्टो-करेंसी विनिमय केंद्र के महत्त्व पर विमर्श किया जाएगा। क्या है क्रिप्टो-करेंसी? क्रिप्टो-करेंसी क्रिप्टोग्राफी प्रोग्राम पर आधारित एक वर्चुअल करेंसी या ऑनलाइन मुद्रा है। यह पीयर-टू-पीयर कैश सिस्टम पर आधारित है। क्रिप्टो-करेंसी को डिजिटल वालेट में ही रखा जा सकता है। दरअसल, क्रिप्टो-करेंसी के इस्तेमाल के लिये बैंक या किसी अन्य वित्तीय संस्थान की ज़रूरत नहीं होती। वर्ष 2009 में किसी समूह या व्यक्ति ने सतोशी नाकामोतो के छद्म नाम से ‘बिटकॉइन’ के नाम से पहली क्रिप्टोकरेंसी बनाई। क्या है फिएट और नॉन-फिएट क्रिप्टो-करेंसी? “नॉन-फिएट” क्रिप्टो-करेंसी (“non-fiat” cryptocurrency) को लेकर भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ-साथ सरकारें भी समय-समय पर एडवाइजरी ज़ारी करती रहती हैं। एक ‘नॉन-फिएट’ क्रिप्टो-करेंसी जैसे कि बिटकॉइन, एक निजी क्रिप्टो-करेंसी है। जबकि ‘फिएट क्रिप्टो-करेंसी’ एक डिजिटल मुद्रा है जो देश के केद्रीय बैंक द्वारा जारी किया जाता है। “नॉन-फिएट” क्रिप्टो-करेंसी को लेकर तमाम तरह की आशंकाएँ व्यक्त की जा रही हैं और यह तकनीकी उन्नयन विनाशकारी साबित हो सकता है। यदि भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा कोई आभासी मुद्रा जारी की जाती है, तो उसे फ़िएट क्रिप्टो-करेंसी कहा जाएगा। ब्लॉकचेन क्या है? ब्लॉकचेन एक ऐसी प्रौद्योगिकी है जिससे बिटकॉइन जैसी क्रिप्टो-करेंसी का संचालन होता है। यदि सरल शब्दों में कहा जाए तो यह एक डिजिटल ‘सार्वजानिक बही खाता’ (public ledger) है, जिसमें प्रत्येक लेन-देन अथवा ट्रांजेक्शन का रिकॉर्ड दर्ज़ किया जाता है। ब्लॉकचेन में एक बार किसी भी लेन-देन को दर्ज करने पर इसे न तो वहाँ से हटाया जा सकता है और न ही इसमें संशोधन किया जा सकता है। इसके अंतर्गत नेटवर्क से जुड़े उपकरणों (मुख्यतः कंप्यूटर की श्रृंखलाओं, जिन्हें नोड्स कहा जाता है) के द्वारा सत्यापित होने के बाद प्रत्येक लेन-देन के विवरण को खाता बही खाते में रिकॉर्ड किया जाता है। क्रिप्टो-करेंसी की लोकप्रियता के कारण निजता बनाए रखने में सहायकक्रिप्टो-करेंसी के ज़रिये लेन-देन के दौरान छद्म नाम एवं पहचान बताए जाते हैं। ऐसे में अपनी निजता को लेकर अत्यधिक संवेदनशील व्यक्तियों को यह माध्यम उपयुक्त जान पड़ता है एक लागत-प्रभावी विकल्पक्रिप्टो-करेंसी में लेन-देन संबंधी लागत अत्यंत ही कम है। घरेलू हो या अंतर्राष्ट्रीय किसी भी लेन-देन की लागत एक समान ही होती है। क्रिप्टो-करेंसी के ज़रिये होने वाले लेन-देन में ‘थर्ड-पार्टी सर्टिफिकेशन’ (third party certification) की आवश्यकता नहीं होती। अतः धन एवं समय दोनों की बचत होती है। प्रवेश जनक औपचारिकताएँ कमगौरतलब है कि बैंक में अकाउंट खोलने से लेकर लगभग सभी लेन-देन के लिये कई तरह के प्रमाण पत्रों की ज़रूरत होती है, जबकि क्रिप्टो-करेंसी के मामले में ऐसा नहीं है। वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले लेन-देन के लिये भी कई तरह की औपचारिकताओं से गुज़रना होता है जबकि क्रिप्टो-करेंसी से होने वाले लेन-देन में इन बातों का संज्ञान नहीं लिया जाता है। पारंपरिक बैकिंग व्यवस्था का विकल्पबैंकिंग प्रणालियों तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले लेन-देन पर सरकार का सख्त नियंत्रण होता है। वहीं क्रिप्टो-करेंसी उपयोगकर्त्ताओं को राष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम के प्रत्यक्ष नियंत्रण के बाहर धन के आदान-प्रदान का एक विश्वसनीय और सुरक्षित माध्यम प्रदान करता है।

एनर्जीप्रो एसेट्स लिमिटेड (ईपीएएल) ब्रिटेन में सबसे तेजी से वृद्धि दर्ज करने वाली भारतीय कंपनी ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की एनर्जी एफिशिएंसी सर्विसेज़ लिमिटेड (ईईएसएल) की संयुक्तं उद्यम कंपनी एनर्जीप्रो एसेट्स लिमिटेड (ईपीएएल) ब्रिटेन में सबसे तेजी से विकास करने वाली भारतीय कंपनी के रूप में उभरी है। कंपनी ने उद्योग मंडल भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) तथा ग्रांट थॉर्नटन द्वारा विकसित ‘इंडिया मीट्स ब्रिटेन ट्रैकर 2020’ में ब्रिटेन में सबस तेजी से बढ़ने वाली भारतीय कंपनी का दर्जा हासिल किया है। ग्रांट थॉर्नटन एंड सीआईआई द्वारा 842 भारतीय-ब्रिटिश कंपनियों के बीच कामकाज को लेकर किये गये सर्वे में ईईएसएल और ब्रिटेन की कंपनी एनर्जीप्रो एसेट मैनेजमेंट लिमिटेड (ईपीएएम) की संयुक्त उद्यम कंपनी शीर्ष स्थान पर रही। फिल्म मीडिया इकाइयों को तर्कसंगत बनाने तथा स्वायत्त निकायों की समीक्षा पर गठित विशेषज्ञ समितियों ने अपनी रिपोर्टें सौंपी

इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए नयी नीतियों की घोषणा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आत्म निर्भर भारत का स्पष्ट आह्वान किया है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री श्री रवि शंकर प्रसाद कहते रहे हैं कि इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत आइसोलेशन में है, बल्कि भारत उपयुक्त प्रौद्योगिकी, एफडीआई सहित पूंजी और असाधारण मानव संसाधन के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय योगदान देने वाला एक प्रमुख देश है। किन योजनाओं को प्रारंभ किया गया है? एक मजबूत विनिर्माण तंत्र, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक परिसंपत्ति होगा, का निर्माण करने के उद्वेश्य से हम पूरी मूल्य श्रृंखला में एक मजबूत तंत्र का विकास करने और इसे वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ समेकित करने की योजना बना रहे हैं। इन तीन योजनाओं, जिनके नाम हैं- (1) बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन स्कीम (पीएलआई), (2) इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट एवं सेमीकंडक्टरों के विनिर्माण के संवर्धन के लिए स्कीम (एसपीईसीएस) तथा (3) संशोधित इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर (ईएमसी 2.0) स्कीम का सार तत्व है। पीएलआई स्कीम भारत में विनिर्मित एवं टारगेट सेगमेंटों के तहत कवर्ड वस्तुओं की संवृद्धि बिक्री (आधार वर्ष पर) पर पात्र कंपनियों को आधार वर्ष के बाद के पांच वर्षों की अवधि के लिए 4 प्रतिशत से 6 प्रतिशत का प्रोत्साहन प्रदान करेगी। एसपीईसीएस इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं अर्थात इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, सेमीकंडक्टर/डिस्प्ले फैब्रीकेशन इकाइयों, असेंबली, टेस्ट, मार्किंग एवं पैकेजिंग (एटीएमपी) इकाइयों, स्पेशलाइज्ड सब-असेंबलीज एवं उपरोक्त वस्तुओं के निर्माण के लिए पूंजीगत वस्तुओं की चिन्हित सूची के लिए पूंजीगत व्यय पर 25 प्रतिशत का वित्तीय प्रोत्साहन उपलब्ध कराएगी। ईएमसी प्रमुख वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माताओं को उनकी आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ साथ आकर्षित करने के लिए 2.0 रेडी बिल्ट फैक्टरी (आरबीएफ) शेड्स/ प्लग एंड प्ले सुविधाओं सहित सामान्य फैसिलिटीज एवं सुविधाओं के साथ साथ विश्व स्तरीय अवसंरचना के सृजन के लिए सहायता उपलब्ध कराएगी। इन तीनों स्कीमों के लिए लगभग 50,000 करोड़ रुपये (लगभग 7 बिलियन डालर) की आवश्यकता है। ये योजनाएं घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए कमी को खत्म करने में मदद करेगी और इस प्रकार, देश में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण तंत्र को मजबूत बनायेंगी। तीनों योजनाएं एक साथ मिल कर बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, कंपोनेंट्स की घरेलू आपूर्ति श्रृंखला तथा अत्याधुनिक अवसंरचना तथा बड़ी एंकर इकाइयों तथा उनकी आपूर्ति श्रृंखला साझीदारों के लिए सामान्य सुविधाओं में सक्षम बनाएंगी। ये योजनाएं 1 ट्रिलियन डालर डिजिटल अर्थव्यवस्था तथा 2025 तक 5 ट्रिलियन डालर जीडीपी अर्जित करने में उल्लेखनीय रूप से योगदान देंगी। इन तीनों नई येाजनाओं से उल्लेखनीय निवेश आकर्षित होने, मोबाइल फोनों के उत्पादन में बढोत्तरी होने और उनके पार्ट्स/कंपोनेंट्स के 2025 तक लगभग 10,00,000 करोड़ रूपये के होने तथा लगभग 5 लाख प्रत्यक्ष और 15 लाख अप्रत्यक्ष रोजगारों के सृजित होने की उम्मीद है। इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के सन्दर्भ में वर्तमान स्थिति इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का संवर्धन मेक इन इंडिया कार्यक्रम का एक प्रमुख घटक रहा है। राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति, 2019, संशोधित विशेष प्रोत्साहन स्कीम (एमएसआईपीएस), इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर तथा इलेक्ट्रॉनिक्स विकास फंड जैसे प्रयासों के कारण भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन 2014 के 29 बिलियन डालर से बढ़कर 2019 में 70 बिलियन डालर तक पहुंच गया। विशेष रूप से, मोबाइल फोन विनिर्माण की बढोत्तरी इस अवधि के दौरान उल्लेखनीय रही है। 2014 में केवल दो मोबाइल फैक्टरियों की तुलना में, भारत अब विश्व में दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन उत्पादक बन गया है। 2018-19 में मोबाइल हैंडसेटों का उत्पादन 29 करोड़ इकाइयों तक पहुंच गया जो 1.70 लाख करोड़ रुपये के बराबर है जबकि 2014 में केवल 6 करोड़ इकाइयां थीं जो 19 हजार करोड़ रुपये के बराबर थीं। जहां 2014-15 में इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्यात 38,263 करोड़ रुपये का था, 2018-19 में यह बढ़कर 61,908 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में 2012 में भारत का हिस्सा केवल 1.3 प्रतिशत था जो बढ़कर 2018 में 3 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

कोविड-19 परीक्षण प्रयोगशाला’ का सीएसआईआर-एनईआईएसटी, जोरहाट में उद्घाटन एक कोविड-19 परीक्षण प्रयोगशाला पूर्वोत्तर विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (एनईआईएसटी) के जोरहाट परिसर में स्थापित की गई है। डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा, मंत्री, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, वित्त, शिक्षा (उच्च, माध्यमिक व प्राथमिक), परिवर्तन एवं विकास, पीडब्ल्यूडी, असम सरकार ने इस प्रयोगशाला का उद्घाटन किया। संस्थान के 10 वैज्ञानिकों की एक टीम वायरस से आरएनए को अलग करने के अहम कार्य में सक्रियतापूर्वक जुटी हुई है। इसके अलावा, संस्था न के स्टाफ के 40 अन्य सदस्य एक सहायक प्रणाली के रूप में कार्यरत हैं। संस्थान का जैव-प्रौद्योगिकी प्रभाग ‘आरटी-पीसीआर आधारित कोविड-19 परीक्षण’ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसके अलावा, असम सरकार और जोरहाट का जिला प्रशासन इस संस्थान द्वारा किए जा रहे उल्लेरखनीय प्रयासों में सक्रियतापूर्वक सहयोग दे रहे हैं और इसे सुविधाजनक बना रहे हैं। असम सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के एक सूक्ष्मजीव विज्ञानी की सेवाएं इस संस्थान की कोविड-19 परीक्षण प्रयोगशाला के लिए ली जा रही हैं, ताकि परीक्षण को प्रमाणित किया जा सके। परीक्षण के लिए नमूने राज्य सरकार और जोरहाट के जिला प्रशासन के आपसी समन्वय से प्राप्त होने की उम्मीद है। यह संस्थान परीक्षण के उद्देश्य से एक परियोजना वैज्ञानिक और एक अनुसंधान विद्वान की भी सेवाएं अनुबंध के आधार पर ले रहा है।

नई राष्ट्रीय विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवोन्मेष नीति (STIP) चर्चा में क्यों? एसटीआईपी के लिए भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की ओर से संयुक्त रूप से विकेंद्रीकृत, व्यापक और समावेशी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। भारत सरकार की ओर से पांचवी विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति एक ऐसे महत्वपूर्ण समय में बनाई जा रही है जब पूरी दुनिया कोविड माहामारी के संकट से जूझ रही है। यह पिछले एक दशक में हुए कई ऐसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों के बीच नवीनतम है, जिसमें विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवप्रवर्तन के लिए एक नए दृष्टिकोण और रणनीति की आवश्यकता महसूस की गई। जिस तरह के नए संकटो का दुनिया को सामना करना पड़ रहा है वैसे हालात में यह नई नीति अपने विकेन्द्रीकृत तरीकों से प्राथमिकताओं वाले क्षेत्र तय करेगी। यह निर्धारित करेगी की किन क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दिया जाना है। अनुसंधान के तरीके कैसे होने चाहिए तथा सामाजिक और आर्थिक कल्याण के लिए प्रौद्योगिकी का किस पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है। नयी नीति के निर्माण से सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य नई नीति बनाने की प्रक्रिया में चार महत्वपूर्ण चरण शामिल किए गए हैं। पहले चरण के तहत विज्ञान नीति फोरम के माध्यम से एक व्यापक सार्वजनिक और विशेषज्ञ परामर्श प्रक्रिया निर्धारित की गई है। विज्ञान नीति फोरम नीति प्रारूपण प्रक्रिया के दौरान और बाद में बड़े सार्वजनिक और विशेषज्ञ पूल से इनपुट प्राप्त करने के लिए एक समर्पित मंच है। नीति-निर्माण प्रक्रिया के दूसरे चरण में साक्ष्य-आधारित सिफारिशों को फीड करने के लिए विशेषज्ञों के विषयगत परामर्श शामिल हैं। इसके लिए इक्कीस केंद्रित विषयगत समूहों का गठन किया गया है। तीसरे चरण में मंत्रालयों और राज्यों के साथ परामर्श प्रक्रिया शामिल की गई है जबकि चौथे चरण में शीर्ष स्तर पर विभिन्न-हितधारकों के साथ परामर्श की व्यवस्था की गई है। तीसरे चरण में विभिन्न मंत्रालयों और राज्यों के बीच व्यापक स्तर पर विचार विमर्श के लिए राज्यों, मंत्रालयों और एजेंसियों में नोडल अधिकारी नियुक्त किए जा रहे हैं। विभिन्न चरणों में परामर्श प्रक्रियाएं शुरू हो चुकी हैं और समानांतर रूप से चल रही हैं। दूसरे चरण का विषयगत समूह परामर्श पिछले सप्ताह सूचना सत्रों की एक श्रृंखला के साथ शुरू हुआ। सूचना सत्र के दौरान, डीएसटी के नीति समन्वय और कार्यक्रम निगरानी प्रभाग के प्रमुखडॉ अखिलेश गुप्ता ने प्रस्तुतियां दीं और चर्चाओं को आगे बढ़ाया। सत्रों में 21 नीतिगत समूहों के लगभग 130 सदस्यों के साथ 25 नीति अनुसंधान अध्येताओं और डीएसटी और पीएसए के कार्यालय के वैज्ञानिकों ने भाग लिया। “विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने कहा “न्यू इंडिया के लिए बनाई जा रही नई विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति में कोविड महामारी से मिले सबक को भी शामिल किया जाएगा। इसमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा नवाचार के माध्यम से अनुसंधान और विकास तथा विशाल बाजारों और जनसांख्यिकीय लाभांश की हमारी ताकत का लाभ उठाते हुए एक आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का लक्ष्य शामिल किया गया है।” नीति निमार्ण की छह महीने की प्रक्रिया में देश के वैज्ञानिक पारिस्थितिक तंत्र के बाहर और भीतर सभी हितधारकों के अलावा शिक्षा, उद्योग, सरकार, वैश्विक साझेदार, युवा वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीविद्, नागरिक निकाय और आम जनता के साथ व्यापक परामर्श किया जाना शामिल है। डीएसटी-एसटीआई नीति फेलोशिप प्राप्तकर्ताओं के कैडर को शामिल करते हुए इन-हाउस पॉलिसी नॉलेज और डेटा सपोर्ट यूनिट के साथ एक सचिवालय (प्रौद्योगिकी भवन) में स्थापित किया गया है ताकि चार चरणों की परामर्श प्रक्रिया के बीच परस्पर समन्वय बनाया जा सके।

बिमल जुल्का समिति चर्चा में क्यों? सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली फिल्म मीडिया इकाइयों को तर्कसंगत बनाने / बंद करने / विलय करने तथा मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त निकायों की समीक्षा पर गठित विशेषज्ञ समितियों ने अपनी रिपोर्टें सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री प्रकाश जावडेकर को सौंपी। बिमल जुल्का समिति के बारे में श्री बिमल जुल्का के अधीन नियुक्त इन समितियों को फिल्म गतिविधियों से संबंधित संस्थानों को तर्कसंगत बनाने और व्यावसायिकता के लिए की अध्यक्षता में समितियों की नियुक्ति की गई थी। इस समिति की आठ बैठक हुईं थीं और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम, फिल्म डिवीजन, चिल्ड्रंस फिल्म सोसायटी ऑफ इंडिया, सत्यजित रे फिल्म और टेलीविजन संस्थान, फिल्म महोत्सव निदेशालय और भारत के राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय आदि के विकास के लिए एक विशेष रोडमैप सुझाया गया। समिति ने कई संस्थानों द्वारा समान गतिविधियों का संचालन पाया और 4 व्यापक कार्यक्षेत्रों के साथ एक प्रमुख संगठन (अम्ब्रेला ऑर्गनाइजेशन) बनाने का सुझाव दिया गया है, जिसके अंतर्गत संस्थानों को उत्पादन, महोत्सव, विरासत और ज्ञान जैसे कार्य करने चाहिए। इन क्षेत्रों की अगुआई पेशेवर लोगों द्वारा की जाएगी। रिपोर्ट में व्यावसायिक फिल्मों के निर्माण के लिए स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं को वित्तपोषण के लिए फिल्म प्रमोशन फंड के निर्माण का सुझाव दिया गया है। स्वायत्त संस्थानों की समीक्षा के लिए गठित श्री बिमल जुल्का की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति में श्री राहुल रवेल, श्री ए. के. बीर, श्री श्यामा प्रसाद और श्री टी. एस. नागाभराना जैसी प्रमुख फिल्मी हस्तियों के अलावा विशेष सचिव और वित्तीय सलाहकार (आई एंड बी) तथा संयुक्त सचिव (फिल्म) सदस्य के रूप में शामिल रहे। फिल्म मीडिया इकाइयों को तर्कसंगत बनाने / बंद करने / विलय करने पर गठित विशेषज्ञ समिति के प्रमुख श्री बिमल जुल्का थे। इस समिति के अन्य सदस्य श्री राहुल रवेल, श्री ए. के. बीर, श्री श्यामा प्रसाद, श्री टी. एस. नागाभराना, विशेष सचिव और वित्तीय सलाहकार (आई एंड बी), एमडी एनएफडीसी, सीईओ सीएफएसआई, निदेशक एनएफएआई, निदेशक डीएफएफ, डीजी फिल्म फिल्म डिवीजन और संयुक्त सचिव (फिल्म) सदस्य के रूप में शामिल रहे। पृष्ठभूमि स्वायत्त संस्थानों की समीक्षा पर विशेषज्ञ समिति के लिए विचारार्थ विषय इस प्रकार थे : मेमोरैंडम ऑफ एसोसिएशन के अंतर्गत भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई), सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एसआरएफटीआई) और चिल्ड्रंस फिल्म सोसायटी ऑफ इंडिया के प्रदर्शन की समीक्षा की गई। क्या इन संस्थानों ने उन लक्ष्यों को हासिल किया जिनके लिए उनकी स्थापना की गई थी/ कौन सी कमियां रहीं और उनकी वजह। क्या ये अभी भी औचित्यपूर्ण हैं और “सार्वजनिक उद्देश्य” को पूरा करने के लिए जारी रखे जाने के बारे में आकलन के लिए इन संस्थानों के उद्देश्यों की समीक्षा। यह आकलन करना कि क्या सरकारी या निजी क्षेत्र की अन्य इकाइयों द्वारा ज्यादा कुशलता से इन सार्वजनिक उद्देश्यों को पूरा किया जा सकता है। क्या गतिविधियों की प्रकृति ऐसी है कि उन्हें सिर्फ एक स्वायत्त संगठन द्वारा ही किए जाने की आवश्यकता है। यह सुझाव देना कि क्या सरकार इनके निगमीकरण, विलय और विघटन या इन संस्थानों को बंद करने पर विचार कर सकती है। क्या उपयोग शुल्क उचित दर पर लगाए गए हैं और दीर्घकाल में संस्थान को वित्तीय रूप से आत्म निर्भर बनाने के लिए राजस्व अर्जित करने में सुधार के लिए उपाय सुझाना। उपयोग शुल्कों को जोड़ने के लिए उचित मूल्य सूचकांकों के बारे में भी सुझाव देना। कामकाज में परिचालन और लागत कुशलता लाने के लिए इन संस्थानों द्वारा किए गए व्यय की समीक्षा करना। सीपीएसई की तर्ज पर मंत्रालय संस्थान के बीच होने वाले सहमति ज्ञापन का मसौदा सुझाना और इस उद्देश्य से आगे किए जाने वाले कार्यों के लिए प्रदर्शन मानदंड और रोडमैप तैयार करना। एफटीआईआई और एसआरएफटीआई में प्रशासन में प्रभावशीलता और पारदर्शिता, खरीद प्रणाली की पारदर्शिता, छात्र शिकायत निवारण तंत्र की समीक्षा और कैम्पस में उचित अनुशासन बनाए रखना। फिल्म मीडिया इकाइयों को तर्कसंगत बनाने / बंद करने / विलय करने पर गठित विशेषज्ञ समिति के विचारार्थ विषय : एनएफडीसी और सीएफएसआई के कामकाज की समीक्षा क्या एनएफडीसी और सीएफएसआई को बंद करने की जरूरत है और आवश्यकता पड़ने पर दूसरे विकल्पों को तलाशना चाहिए, इस बारे में सिफारिश देना। प्रस्तावित प्रमुख संगठन (अम्ब्रेला ऑर्गनाइजेशन) यानी सरकारी संगठन, एक पीएसयू या एक स्वायत्त संगठन के स्वरूप को अंतिम रूप देना। सभी मीडिया इकाइयों के अधिकार क्षेत्र की समीक्षा के बाद प्रस्तावित अम्ब्रेला ऑर्गनाइजेशन के अधिकार क्षेत्र को अंतिम रूप देना। प्रस्तावित अम्ब्रेल ऑर्गनाइजेशन के संगठनात्मक ढांचे को अंतिम रूप देना।

एनसीवीटीसी,कोविड - 19 के लिए होस्ट-निर्देशित एंटीवायरल दवा विकसित करेगा माना जाता है कि इनमेंदवा प्रतिरोध करने की प्रवृत्ति कम होती है साइंस एंड इंजीनियरिंग रिसर्च बोर्ड (एसईआरबी) ने हिसार, हरियाणा स्थित आईसीएआर-एनआरसी के नेशनल सेंटर फॉर वेटरनरी टाइप कल्चर (एनसीवीटीसी) के एक अध्ययन के लिए समर्थन को मंजूरी दे दी है, जो कोरोनविरस के खिलाफ एंटीवायरल के लिए अपनी लाइब्रेरी के 94 छोटे अणुओं की स्क्रीनिंग करेगा। । अणुओं को कोशिकीय काइनेस, फॉस्फेट, और हिस्टोन मिथाइल ट्रांसफरेज़,हिस्टोन डेसेटाइलेज़ और डीएनए मिथाइल ट्रांसफ़ेज़जैसे एपिजेनेटिक रेगुलेटर को रोकने के लिए जाना जाता है। इन अवरोधकों के लक्ष्यों को कैंसर के लिए अच्छी तरह से जाना जाता है, हालांकि, वायरस जीवन चक्र में उनकी भूमिका ज्ञात नहीं है। इसके तहत एंटी-कोरोनावायरस गुणों वाले चयनित उम्मीदवारों (हिट) का अध्ययन किया जाएगा। पारंपरिक रूप से, एंटीवायरल ड्रग्स को कुछ वायरल प्रोटीनों को सीधे लक्षित करके विकसित किया जाता है। हालांकि, दवा-प्रतिरोधी वायरस के तेजी से बढ़ने के कारण यह रणनीति अक्सर विफल हो जाती है। अन्य जीवों के विपरीत वायरल एंजाइम, जो अपने न्यूक्लिक एसिड (आरएनए) को संश्लेषित करता है, में प्रूफरीडिंग क्षमता नहीं होती है। इसलिए, कोरोनावायरस जैसे आरएनए वायरस में वायरल जीनोम के संश्लेषण के दौरान गलत तरीके से शामिल न्यूक्लियोटाइड्स (वायरल आरएनए के निर्माण ब्लॉकों) को हटाने की क्षमता नहीं है। प्रूफरीडिंग क्षमता की कमी के परिणामस्वरूप वायरल जीनोम में बिंदु म्यूटेशन का संचय होता है। इससे वायरल प्रोटीन में परिवर्तन होता है। परिवर्तित वायरल प्रोटीन तब उपलब्ध एंटीवायरल दवाओं के लिए प्रतिरोधी बन सकता है। तेजी से और बार-बार खुद को बदलने की वायरस की इस क्षमता के कारण एंटीवायरल ड्रग्स विकसित करना, वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। वायरस केवल होस्ट सेल के अंदर बढ़ (प्रतिकृति) सकते हैं। एक मेजबान (मानव) कोशिका में लगभग 25,000 प्रोटीन होते हैं। प्रतिकृति के दौरान, वायरस इन सेलुलर प्रोटीन के साथ कई संपर्क स्थापित करते हैं। एक वायरस को होस्ट सेल के अंदर प्रभावी ढंग से प्रतिकृति के लिए 1000 से अधिक विभिन्न सेलुलर प्रोटीनों की आवश्यकता होती है। एसईआरबी के सचिव प्रोफेसर संदीप वर्माने कहा "औषधीय रसायन विज्ञान अनुसंधान में रासायनिक लाइब्रेरी स्क्रीनिंग एक उपयोगी पद्धति है जो विशेष रूप से नए पहचाने गए सार्स -कोव -2 के लिए कम समय में दवा की खोज और विकास कर सकती है। इस तरह के दृष्टिकोण उपयोगी फार्मास्युटिकल्स के लिए तेजी से पहुंच प्रदान करते हैं और खोज की अवधि को कम कर देते हैं। कोव -2 वैक्सीन विकास कार्यक्रमों का समर्थन के साथएंटी-कोरोनावायरस दवा पर भी पर्याप्त ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।" एनसीवीटीसी के वैज्ञानिक डॉ नवीन कुमार ऐसे सेलुलर प्रोटीन, प्रोटीन-प्रोटीन (वायरस-होस्ट) इंटरैक्शन, या एपिजेनेटिक नियामकों को लक्षित करने के साथएंटीवायरल ड्रग विकसित के लिए एक वैकल्पिक रणनीति की खोज कर रहे है जिसे आमतौर पर होस्ट-निर्देशित एंटीवायरल थेरेपी कहा जाता है। माना जाता है कि होस्ट-निर्देशित एंटीवायरल में दवा प्रतिरोध करने की प्रवृत्ति कम होती है क्योंकि म्यूटेशन द्वारा वायरस द्वाराछूट गए सेलुलर कार्यों को आसानी से बदलना संभव नहीं होता है। इसके अलावा, होस्ट-निर्देशित एंटीवायरल एजेंट में व्यापक एंटीवायरल प्रभावों की संभावना होती हैं क्योंकि होस्ट कारकों की आवश्यकता को आमतौर पर एक विशेष वायरस परिवार के सदस्यों या कभी-कभी विभिन्न वायरस परिवारों के सदस्यों के द्वारा संरक्षित किया जाता है। संस्थान के छोटे अणु अवरोधकों का संग्रह वह संसाधन होगा जिससे डॉ कुमार को सेलुलर प्रोटीन, प्रोटीन-प्रोटीन (वायरस-होस्ट) इंटरैक्शन या कोविड 19 के लिए एपिजेनेटिक नियामकों को लक्षित करते हुए अपनी एंटीवायरल दवा को विकसित करने की उम्मीद है।

ट्यूलिप भारत के स्नातकों के बाज़ार मूल्‍य को बढ़ाने में मदद करेगा और शहरी नियोजन, परिवहन इंजीनियरिंग, पर्यावरण, नगरपालिका वित्त आदि जैसे विविध क्षेत्रों में एक संभावित प्रतिभा पूल बनाने में मदद करेगा। इससे न केवल संभावित शहर प्रबंधकों बल्कि प्रतिभाशाली निजी / गैर-सरकारी क्षेत्र के पेशेवरों के सृजन में तेजी आएगी। ट्यूलिप से यूएलबीऔर स्मार्ट शहरों को अत्यधिक लाभ होगा। यह भारत की शहरी चुनौतियों के समाधान के लिए सह-निर्माण में युवाओं को जोड़ने के साथ नए विचारों और ऊर्जा के प्रसार को बढ़ावा देगा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सामुदायिक भागीदारी और सरकार-शिक्षा-उद्योग-नागरिक समाज के संबंधों को बढ़ावा देने के लिए सरकार के प्रयासों को आगे बढ़ाएगा। इस प्रकार ट्यूलिप- "द अर्बन लर्निंग इंटर्नशिप प्रोग्राम" भारत के यूएलबी और स्मार्ट शहरों के कामकाज में नई ऊर्जा और विचारों को विकसित करने के साथ-साथ प्रशिक्षुओं के सीखने के अनुभव के दोहरे लक्ष्य को पूरा करने में मदद करेगा। यह शुरूआत वर्ष 2025 तक एमएचआरडी और एआईसीटीई के 1 करोड़ सफल इंटर्नशिप के लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। ट्यूलिप को अधिकार देने वाला डिजिटल प्लेटफॉर्म खोज, जुड़ाव, एकत्रीकरण, प्रवर्धन और पारदर्शिता को सक्षम बनाएगा। प्लेटफ़ॉर्म विशिष्‍ट रूप से निर्मित है और सुविधाजनक पहुँच के लिए यूएलबी / स्मार्ट शहरों और प्रशिक्षुओं को अत्यधिक लचीलापन प्रदान करता है। सुरक्षा विशेषताओं का पूरी तरह से परीक्षण किया गया है। एमओएचयूएऔर एआईसीटीईके बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। एमओयू, अन्य बातों के साथ, एआईसीटीईऔर एमओएचयूएकी भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को 5 साल की अवधि में पूरा करता है। मंच के लिए तकनीकी सहायता एआईसीटीई द्वारा और एमओएचयूए द्वारा कार्यक्रम के अनुसार गैर-तकनीकी सहायता दी जाएगी। कार्यक्रम की प्रगति की समय-समय पर समीक्षा करने के लिए एआईसीटीई के अध्यक्ष सहित एचयूए सचिव सहित अन्य अधिकारियों की अध्यक्षता में एक संचालन समिति का गठन किया गया है। कार्यान्वयन में आसानी के लिए, दिशानिर्देश भी तैयार किए गए हैं, जो उद्देश्य, पात्रता की शर्तों, इंटर्नशिप की अवधि, व्‍यवसाय की शर्तों, रसद और कार्यक्रमों की अन्य परिचालन विशेषताओं आदि के बारे में बताते हैं। ये दिशानिर्देश इंटर्न के लिए व्‍याख्‍यात्‍मक भूमिका भी प्रदान करते हैं जिन्हें यूएलबी और स्मार्ट शहरों के स्तर परऔर अधिक परिष्कृत किया जा सकता है। कार्यान्वयन में आसानी के लिए यूएलबी / स्मार्ट सिटीज और इंटर्न के लिए एक हैंडबुक भी तैयार की गई है। कार्यक्रम के तहत एमओएचयूएवजीफा/ भत्तों के भुगतान के लिए अपने मिशनों / कार्यक्रमों के तहत प्रशासनिक खर्चों के उपयोग की अनुमति देने पर भी सहमत हुआ है। एमओएचयूएअपने शहरों में इंटर्नशिप को बढ़ावा देने में मदद करने के लिए राज्य सरकारों तकपहुंचेंगे। ट्यूलिप के अंतर्गत यूएलबीऔर स्मार्ट शहरों की भागीदारी को सक्षम करने के लिए राज्य सरकारों के साथ साझेदारी में क्षमता निर्माण की पहल करेगा। चूंकि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को शहरी स्तर पर क्षेत्रीय चुनौतियों और अवसरों की गहरी समझ है, इसलिए वे इस तरह की इंटर्नशिप के माध्यम से विकसित कौशल के साथ अपनी आवश्यकताओं को पूरा करके ट्यूलिपको प्रभावी ढंग से लागू कर सकते हैं।