श्रीमद आद्य शंकराचार्य परम्परा के दिव्य संदेश 🚩
Відкрити в Telegram
Показати більше
Країна не вказанаКатегорія не вказана
592
Підписники
Немає даних24 години
Немає даних7 днів
Немає даних30 днів
Архів дописів
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - १०२*
_भौतिकवाद सुख-शान्ति देने में समर्थ नहीं_
भौतिक उन्नति माया के प्रसार की ही उन्नति है। माया के सहारे सुख शान्ति की इच्छा करना अन्धकार को अन्धकार से ढूढ़ने का प्रयत्न करना है। जिस प्रकार बिल के ऊपर लाठी पीटने से अन्दर का सर्प नहीं मारा जा सकता, उसी प्रकार शारीरिक भोग-विलास की सामग्री के बाहुल्य से सूक्ष्म शरीर (मन) में होने वाली अशान्ति को भी नहीं मिटाया जा सकता । सुख-दुःख मन में होता है। सोये हुए को गाली दो, तो उसे दुःख नहीं होगा; क्योंकि उसका मन उस समय अपने ? कारण अविद्या में लीन रहता है । तात्पर्य यह है कि मन ही सुखी - दुःखी होता है । इसलिये मन जब तक तृप्त नहीं होगा, तब तक अशान्ति जा नहीं सकती। मन तब तक भटकता रहेगा, जब तक वह पूर्णानन्दमय भगवान् न प्राप्त न कर सकेगा । जैसे छोटे-छोटे बच्चों को खिलौना देकर बहलाते हो, वैसे ही आप लोग धन, स्त्री, पुत्र, मान प्रतिष्ठा आदि से मन को बहला सकते हो । पर ये वस्तुयें मन को सन्तुष्ट नहीं कर सकतीं । ये मन उसी को पाकर सन्तोष मानता है जो सब से बड़ी वस्तु है । संसार में परमात्मा ही ऐसी बड़ी वस्तु है जिसके जान लेने के बाद और कोई वस्तु जानने योग्य नहीं रह जाती ।
*उपदेश १०३*
_उदर-पोषण के लिये_
_अपने भाग्य पर विश्वास रखो_
_किसी के दबाव में आकर अनुचित कार्य करके_
_पाप का संग्रह मत करो_
"यदस्मदीयं न हि तत्परेशाम्" जो हमारे भाग्य में है वह अवश्य ही हमें मिलेगा, उसे कोई दूसरा नहीं पा सकता यह कर्म-मीमांसा शास्त्र का अकाट्य सिद्धान्त है । हमारा तो यह कई बार का सिद्ध अनुभूत प्रयोग भी है। ऐसे घनघोर वनों में जहाँ कोई मनुष्य की कल्पना भी नहीं कर सकता है। वहाँ अपना भाग्य अपने साथ रहता है ! प्रारब्ध का भोग्य वहाँ भी प्राप्त होता है । जिस समय प्रारब्ध समाप्त हो जायगा, उसी समय शरीर छूट जायगा । यह निश्चय है-- जब तक शरीर है, तब तक प्रारब्ध का भोग अवश्य है, इसमें सन्देह की बात नहीं । इसलिये अपने योगक्षेम के लिये चिन्तित होना, अपने पूर्व संचित कोष की विस्मृति का परिचायक है ।
जो पहले की कमाई है वह तो मिलेगी ही, इसमें सन्देह नहीं। बैंक में जमा किया हुआ रुपया अपने को ही मिलेगा, इसमें सन्देह ही क्या ? संसारी बैंक का रुपया तो कभी बैंक के फेल होने पर डूब भी जा सकता है; परन्तु अपने कर्मों के फल जिस बैंक में जाकर जमा होते हैं, वह बैंक कभी फेल होने वाला नहीं है । वह सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् का अक्षय कोष है, जिसमें कभी हिसाब में भी भूल नहीं हो सकती । अतः जिसने जो जैसा किया है, वह उसे रत्ती रत्ती भोगना पड़ेगा । अपने समीप जो आता है वह अपना ही प्रारब्ध-भोग है । पर जो सामने आये उसे विचार पूर्वक ही भोगना चाहिये । मनुष्य और पशु में केवल यही अंतर है कि पशु उचितानुचित का विचार नहीं कर सकता कि क्या उचित है और क्या अनुचित आप मनुष्य हैं, इसलिये उचितानुचित का विचार करते हुए ही व्यवहार चलाओ । कभी भी किसी के दबाव या संकोच में आकर कोई ऐसा कार्य मत कर बैठो जिसमें पाप का संग्रह हो । पाप से आगे का मार्ग बिगड़ता है। जैसा पहले कर आये हो उसका फल इस समय भोग रहे हो - इसी से शिक्षा लेकर ऐसे उत्तम कार्य करो जिससे आगे तरक्की में जाओ। कहीं ऐसा न हो कि जिसने भोजन वस्त्र का प्रबन्ध कर दिया, उसके अच्छे-बुरे सभी कार्यों का समर्थन करने लगे। “जाकर खाई ताकर दुहाई "II तो कुत्तों का काम है; मनुष्य को तो विचारपूर्वक कार्य करना चाहिये । उचित का ही समर्थन करो और अनुचित का यदि खंडन नहीं कर सकते तो कम से कम उससे तटस्थ तो रहो ।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - १००*
_अविवेक से मनुष्य बहुत कष्ट उठाते हैं_
सर्वदानन्दमय सर्वशक्तिमान् भगवान् सर्वान्तर्यामी हैं । सबके हृदय में अभेद रूप से स्थित हैं; फिर भी लोग दुःखी और अशान्त देखे जाते हैं। संसार का सारा दुःख और सारी अशान्ति अविवेक के ही कारण है। सुख शान्ति के भण्डार- स्वरूप भगवान् का तो अन्दर ही निवास है, परन्तु अविवेक के कारण सुख शान्ति की प्राप्ति के लिए लोग बाहर भटक रहे हैं । भौतिक सामग्री संचय में सुख-बुद्धि हो गई है, यही सारे दुःखों और कष्टों का कारण है ।
औरों को क्या कहा जाय, द्रोपदी तक को भ्रम हो गया था । जब दुःशासन ने उठकर द्रोपदी की साड़ी खींचना प्रारम्भ किया तो एक बार द्रोपदी ने एक से एक महाबलशाली अपने पाँचो पतियों की ओर देखा, पितामह भीष्म की ओर भी देखा । जब सब असहाय से बैठे रह गये, तब द्रोपदी को पता चला कि आपत्ति-काल में कोई भी सहायक नहीं होता। बड़ी से बड़ी भौतिक सामग्री समय आने पर सब बेकार सिद्ध हो जाती है और हितैषी सब मुँह फेर लेते हैं। यह सोचकर निस्सहाय अवस्था में उसने भगवान् कृष्ण का स्मरण किया- उन्हें पुकारा – “हे नाथ ! द्वारिका वासिन् !”
अब यहीं विचार का विषय है। यदि द्रोपदी को विवेक होता तो वह भगवान् को द्वारिका वासिन् कह कर न पुकारती । भगवान् तो अनिष अन्तर्यामी अन्तर्वासिन् हैं। भगवान् को अपने निकट अपने में न देखकर द्रोपदी ने उन्हें द्वारिका से बुलाया, यही अविवेक है। सर्वशक्तिमान् भगवान् को सदा सर्वदा सर्वव्यापक न मानना ही सबसे बड़ा अविवेक है। इसी के कारण लोग अनन्त दुःख भोगते हुए भी भगवान् की कृपा प्राप्त नहीं कर पाते ।
जब द्रोपदी का चीर बढ़ने लगा तो द्रोपदी समझ गई कि भगवान् आ गये। तब उसने कहा - "भगवन ! आपको आने में कुछ विलम्ब हुआ ।" भगवान् ने कहा – “द्रोपदी ! मैं तो तेरे पास ही था, तूने मुझे द्वारका से बुलाया ( द्वारका वासिन् कह कर ) तो मुझे वहाँ जाकर फिर आना पड़ा, इसी में विलम्ब हुआ।"
स्पष्ट ही है कि भगवान सर्वत्र विराजमान हैं और भक्त पर सब प्रकार का अनुग्रह करने को तैयार हैं । "जो मुझे जैसा भजता है, उसे मैं वैसा हो मानता हूँ," यह भगवान् की प्रतिज्ञा है :
"ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तां स्तथैव भजाम्हम्।" -गीता
इसलिए भगवान् को सर्वत्र विराजमान मानते उनकी उपासना करके एक बार उनकी कृपा के पात्र बन जाओ, तो फिर सदा के लिए दुःख और अशान्ति से छुटकारा मिल जाएगा।
*उपदेश १०१*
_स्वार्थ प्रबल है_
संसार इतना स्वार्थी है कि मनुष्य का चमड़ा यदि किसी काम में आता होता तो चमड़ी खिचवाकर चिता पर भेजता । इसमें लेश मात्र भी सन्देह नहीं है। जब तक लोगों का स्वार्थ सिद्ध होता है तभी तक सब मान-सम्मान और अनुराग दिखाते हैं। भगवान् आदि शंकराचार्य ने ठीक कहा है :-
यावत् वित्तोपार्जन सक्त:,तावन्निज परिवारो रक्तः ।
पश्चाद्धावति जर्जर देहे,वार्ता कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥
अर्थात्, जब तक धन कमाने की सामर्थ्य है, तब तक अपने स्वजन कुटुम्बी लोग भी अनुराग करते हैं। फिर जब वृद्धावस्था आती है और शरीर जीर्ण-शीर्ण हो जाता है, तब घर में उससे कोई बात भी नहीं पूछता। इसलिए 'भज गोविन्दं' 'भज गोविन्द' । 'भज गोविन्दं' मूढ़ मते ॥
हे अज्ञानी ! मतिमन्द जीव ! भगवान का भजन कर।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ९८*
_भगवान के भजन और स्वधर्म पालन से कल्याण होगा_
_जाति-पांति कल्याण कारक नहीं_
जन्म तो कर्म के आधीन है, परन्तु भगवान् की दयालुता कर्म के आधीन नहीं है, वह भाव के आधीन है। कोई भी चाहे वह ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो, वैश्य हो, शूद्र हो - भगवान् में भाव बना कर भगवान् को प्राप्त कर सकता है । भगवान् का गुणानुवाद मनुष्यमात्र कर सकता है; ऐसा नहीं कि केवल ब्राह्मण ही भगवान् का गुणानुवाद कर सके। भक्त तो चारों वर्णों के लोग हो सकते हैं, परन्तु आचार्य चारों वर्ण के लोग नहीं हो सकते । इसके लिये तो आदि-शङ्कराचार्य का डंका है कि-
"यावत् वित्तोपार्जन सक्तः तावन्निज-परिवारोक्तः,
पश्चात् धावति जर्जर देहे वाती कोऽपि न पृच्छति गेहे।"
इसलिये -
“भज गोविन्दं, भज गोविन्दं । भज गोविन्दं मूढ़मते ।"
कोई भी हो, किसी जाति का हो वृद्धावस्था आने के पहले ही सचेत होकर भगवान् का भजन-पूजन पर्याप्त कर ले, इसी में कल्याण है। कल्याण किसी जाति में पैदा होने से नहीं होगा। कल्याण तो होगा भगवान् के भजन से और भगवान् के भजन का मनुष्य मात्र को अधिकार है। ब्राह्मण होने से ही मुक्त हो जायगा, ऐसी बात नहीं है । यदि भगवान् की भक्ति है तब तो ठीक है, नहीं तो ब्राह्मण भी नरक का अधिकारी हो सकता है और भक्तिमान् शूद्र भगवान् को प्राप्त कर सकता है। जहाँ कल्याण होता है, वहाँ न कोई ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है, न वैश्य है, न शूद्र है। परमार्थ में कोई भेद ही नहीं है, भेद तो व्यवहार में है।
*उपदेश ९९*
_त्याग और ग्रहण से मुक्त होकर_
_स्वरूपानन्द में निमग्न रहो।_
त्यागोगे क्या ?
संसार तो पहले से ही त्यक्त है । शब्द, रूप, रस, गन्ध आदि जितने पदार्थ हैं वे तो तुमसे अलग हैं ही, उनकी सत्ता ही तुमसे भिन्न है। जब संसार तुमसे अलग ही है तो उसको त्यागोगे क्या ? तुम्हारे त्यागने के पहले ही वह तुम से व्यक्त।है, अलग है। इसलिए किसी के त्याग की बात कहना या।त्याग का भाव मन में बनाना मिथ्या दम्भ ही है। मरे को मारने से क्या गौरव ? कोई मरे हुए शेर को गोली मार कर कहे कि मैने शेर का शिकार किया है - वह इसी तरह की बात है, जिस प्रकार यदि कोई कहे कि मैंने अमुक वस्तु का त्याग किया है। संसार में सब कुछ त्यक्त ही हैं, कोई ऐसी, वस्तु नहीं है जो त्यागने योग्य हो । स्वभाव से तो सभी कुछ तुमसे व्यक्त ही है ।
ग्रहण क्या करोगे ?
संसार में ग्रहण करने योग्य कुछ भी नहीं है, क्या ग्रहण करोगे ? यह जो कुछ देख रहे हो, सब मदारी के रुपये के समान मिथ्या है, इसमें कोई तथ्य नहीं है । ग्रहण करने योग्य तो वह वस्तु हो सकती है जो सुखास्पद हो या शान्ति -प्रद हो। संसार की सभी वस्तुइँ क्षणभंगुर हैं, वियोगान्त हैं । इनके संयोग में जितना सुख नहीं मिलता उतना इनके वियोग में दुःख होता है और इनका संयोग भी परिणाम में दुःखद ही होता है । इसलिए कोई भी वस्तु यहाँ की संग्रहणीय नहीं है, संसार में तो कुछ भी ग्रहण करने योग्य नहीं है ।
तत्व दृष्टि से देखो तो भी 'सर्व खल्विदं ब्रह्म' की भावना से देखो। यह संसार सब ब्रह्म ही है, यहाँ स्वरूप के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं । तो फिर जब सब कुछ अपना स्वरूप ही है, अपने से भिन्न कुछ दूसरी वस्तु ही नहीं है, तो ग्रहण किसका करोगे ? इस प्रकार भी संसार में ग्रहण करने योग्य कुछ नहीं है । अतः किसी भी दृष्टि से संसार में ग्रहण करने योग्य कुछ है ही नहीं ।
इसीलिए कहा जाता है कि यहाँ न कुछ ग्रहण करने की भावना बनाओ और न कुछ त्यागने की ही इच्छा करो । त्याग ग्रहण से सर्वंथा अलग रहो । जब न कुछ त्यागने की इच्छा करोगे और न कुछ ग्रहण करने की इच्छा तो वासना रहित होकर अपने स्वरूप में स्थिति हो जाओगे । इसीलिए विचार करते हुए यह बात अपने मन में दृढ़ कर लो कि यहाँ न कुछ त्यागने योग्य है और न कुछ ग्रहण करने योग्य । ऐसा विचार पुष्ट करके अपने स्वरूपानन्द में निमग्न रहो यही मनुष्य जन्म की सार्थकता है ।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
भगवान् का नाम लेते रहना चाहिये, मन कहीं तो जाने दो ।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ९७*
दुर्जन के लिये दुर्जन बनना
निन्दक के लिये स्वयं निन्दक बन जाना उचित नहीं
“क्षमा खड्गः करे यस्थ, दुर्जनः किं करिष्यति"
अर्थात् क्षमा रूपी खड्ग जिसके हाथ में हैं उसका दुर्जन कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।
"अतृणे पतिते त्रहिः स्वयमेवोपशाम्यति"
जहाँ तृण न हो वहाँ अग्नि का अङ्गार गिरे भी तो क्या करेगा ? स्वयं ही शान्त हो जायगा । इसी प्रकार जो क्षमावन्त हैं, उनके प्रति किए गए दुर्जनों के दुर्व्यवहार स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं। इसी लिये सदैव ही उपेक्षावर्ती का सहारा लेना चाहिए ।
इसी प्रकार मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा इन्हीं चार वृत्तियों में रहते हुए व्यवहार चलाना चाहिये । और किसी पाँचवीं वृत्ति का सहारा नहीं लेना चाहिये। ऐसा करोगे तो कभी अशान्त होने का अवसर नहीं आयेगा। धन के दुरुपयोग के सम्बन्ध में यह बात है कि नम्बर एक का दुरुपयोग यह है कि पापाचार - दुराचार में धन खर्च किया जाय। नम्बर दो का दुरुपयोग यह है कि पूर्व की कमाई खाकर आगे के लिए कुछ संचय न किया जाय । धन को बुरे कामों में न भी लगाओ तब भी यदि उसको सत्कार्य में न लगाया गया तो उसका दुरुपयोग ही है। दुष्कर्म में धन का उपयोग न करते हुये यदि सत्कर्म में नहीं लगाया जा रहा है तो यही नम्बर दो का दुरुपयोग है। धन का उचित उपयोग यही है कि उसकी 'प्रथम गति हो अर्थात् सत्पात्र में उसका व्यय हो ।
(https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah)
जीवन के सदुपयोग के लिये सचेष्ट रहना चाहिये । आजकल लोग जाति-पांति के फेर में पड़ कर ही व्यर्थ के वर्गवाद् में जीवन का अमूल्य समय नष्ट करते हैं । किसी जाति में जन्म हो गया, बस भगवान् को छोड़कर जातियों के संगठन के फेर में पड़ जाते हैं । जहाँ कहीं जिस जाति में जन्म हो गया हो, उसी से किसी तरह जन्म-मरण रूपी कारागार से निकलने का प्रयत्न करना चाहिये, न कि एक जाति रूपी कारागार का समर्थन करते रहो। अपनी जाति-पाँति से इतना ही लाभ उठाना चाहिये कि उसमें जो वेद-शास्त्रानुसार अच्छी बातें हों उन्हें तो अपनाओ और जो वेद शास्त्र के विरुद्ध प्रथायें हों उनसे कोई सम्बन्ध न रक्खो, उनका त्याग कर दो। इसी में जात्याभिमान की सार्थकता है । यह निश्चय रखना चाहिये कि अच्छी बात वही है जो वेद-शास्त्र के अनुकूल है । केवल हमारे विचार से कोई बात अच्छी-बुरी नहीं हो सकती । अच्छी बात वही है, जिसे वेद-शास्त्र अच्छा कहता है और बुरी बात वही है जिसे वेद-शास्त्र बुरा कहता है ।
धन की इच्छा हो तो ऐसे धन का संग्रह करो जो साथ जाय । जिसको यहीं छूट जाना है ऐसे 'टेम्पररी' धन का संग्रह करने से क्या लाभ ?
यह बात जरूर है कि अविवेक कारण -
"धनाशा जीविताशा च जीर्यतोऽपिनजीर्यते ।"
धन संग्रह करने की और जीते रहने की इच्छा जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर भी नहीं मिटती । इस पर एक दृष्टान्त है कि एक बहुत बृद्धा स्त्री थी। किसी तरह से लकड़ी बीन-बीन कर बेचकर अपनी आजीविका चलाती थी । उसका जीवन कष्टमय था । एक दिन जंगल में लकड़ी बीनते-बीनते लोभ के कारण उसने बहुत बड़ा गट्ठर बाँध लिया जो उससे उठाया नहीं उठता था । गट्ठर उटाने का उसने कई बार प्रयत्न किया, परन्तु उठा न सकी । अन्त में निराश होकर बड़े दुःख के साथ उसने कहा कि यदि किसी तरह मृत्यु आ जाती तो मैं इस जंजाल से छूट जाती । उसने इतना कहा ही था कि मृत्यु सामने आकर खड़ी हो गई । मृत्यु ने कहा कि कहिये माताजी किसलिए बुलाया है ? वृद्धा ने पूंछा कि तुम कौन हो? मृत्यु ने कहा कि मैं मृत्यु हूँ; आपने अभी मुझको बुलाया, इस लिए मैं आई हूँ । बृद्धा ने कहा कि अच्छा हुआ, तुम आ गए। आ इसी गट्ठे को उठाने के लिए बुलाया था ।
तात्पर्य यह है कि प्राणी चाहे जिस स्थिति में हो, वह मरना नहीं चाहता। परन्तु यदि केवल खाते-पीते हुये ही जीते रहना है तो ऐसे जीने से कोई लाभ नहीं । जीना वही सार्थक है कि जो कुछ आगे के लिए बनाया जाय । यदि केवल विषय- भोग के लिए जीना है तो इस प्रकार पाप संग्रह करते हुए जीने से तो मर जाना ही अच्छा है।
व्यवहार में यह अवश्य स्मरण रखना चाहिये कि अपने से यदि किसी की भलाई न हो सके, तो किसी की बुराई भी न करना । साथ ही साथ भगवान का भजन-पूजन कुछ न कुछ अवश्य करते रहना । मन तो चंचल है, मन लगे या न लगे, भजन- पूजन में समय खर्च करना चाहिये । यदि अभी नहीं लगता है तो थोड़े दिनों में लगने लगेगा, परन्तु करते जाना चाहिये । जिस गिलास में पीनी पीते हो, उसी गिलास से थोड़े दिनों में प्रेम हो जाता है, क्योंकि जब दूसरा गिलास आता है तो ऐसा लगता है कि वह पुराना गिलास कहाँ गया। इसी प्रकार जिस छड़ी को रोज हाथ में लेते हो, कुछ दिनों में उससे प्रेम हो जाता है। वैसे ही भगवान् के नाम को जपते जपते, उस नाम में भी छड़ी - गिलास के समान प्रेम हो जाएगा। इसलिए बिना मन के भी
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ९६*
सिवाय परमात्मा के कोई सहायक नहीं
इस संसार में रहना किसी को नहीं। यहाँ तो धर्मशाले का निवास है । आ गये हो, दुर्लभ मानव शरीर मिल गया है,भव- सागर से पार हो सकते हो । इसी शरीर से ज्ञान-भक्ति पैदा कर सकते हो । अब न किया, अब न बनाया, तो कब बनाओगे ? परमात्मा व्यापक है, सर्वत्र है; किन्तु हम एकदेशीय हैं। इसलिए हम व्यापक परमात्मा को भक्ति द्वारा एक देश में प्रकट करें, तभी हमारा काम बनेगा। साकार-निराकार हैं क्या ? काष्ठ में अग्नि सर्वत्र परिपूर्ण है, परन्तु आप उससे जलते नहीं । चूल्हे में चैला लगा कर चाहो कि रोटी बन जाय तो क्या रसोई बन जायगी ? उसी काष्ठ को घर्षण करके अग्नि प्रकट कर लो तो सब काम सिद्ध हो जायगा ।
परमात्मा अखण्ड है, प्रत्येक देश-काल-वस्तु में है। कहीं भी कोई ऐसी वस्तु नहीं, जहाँ परमात्मा न हो । सर्वशक्तिमान् होते हुए भी परमात्मा में एक शक्ति नहीं है। वह यह कि यदि वह चाहे भी तो हम से अलग नहीं हो सकता। अब आप ही बतावें,.इतना हमारा और परमात्मा का अभेद होते हुए भी हम दुखी हैं, तो किसकी ओर से गलती है ?
द्रौपदी का उदाहरण देखिये । पाँचो पति एक से एक वीर, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य एक से एक महारथी बैठे थे । एक कुलाङ्गना की बेइज्जती की जा रही थी। संसारियों का इस्तीफा देखो | इससे बड़ा ज्वलन्त उदाहरण और क्या मिल सकता हैं ?
आप चाहें कि पिता, पुत्र, भाई, बहिन, पति से कुछ सहायता मिल सकती है, तो सर्वथा असम्भव । परमात्मा न करे कोई आपत्ति का समय आये, नहीं तो सब सम्बन्धी इस्तीफा दे देंगे ।
सिवाय परमात्मा के कोई सहायक नहीं होगा। ऐसी भावना ही अनर्गल है कि अमुक हमारी रक्षा करेगा। जब द्रौपदी की रक्षा के लिये बड़े-बड़े महारथियों ने इस्तीफा दे दिया तो तुम्हारे सहायकों को क्या गिनती है ! संसारियों से केवल शिष्टाचार चलाये जाओ, ये रागास्पद नहीं हैं। द्रौपदी को जब संसारियों से निराशा हो गई, तब भगवान् आये । प्रह्लाद के लिए जड़ से प्रकट हुए। यह भगवान् की व्यापकता है। परन्तु व्यापक परमात्मा से हमारा लाभ नहीं । व्यापक अग्नि से आपका काम नहीं हो सकता । काम के लिये काष्ठ का घर्षण करके अग्नि को एक देश में लाना ही पड़ेगा। इसी प्रकार परमात्मा को भी उपासना द्वारा एक देश में लाने से ही कल्याण है । भगवान् को देश में आने में कोई आपत्ति भी नहीं है, क्योंकि वे स्वयं कहते हैं कि-
-
यदा यदा हि धर्मंस्य, ग्लानिर्भवति भारत !
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां, विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ||
इतना ही नहीं, भगवान् यह भी कहते हैं कि :—
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
अर्थात्, जो जिस प्रकार से मेरा स्मरण करता है, मैं उसी प्रकार से उसका स्मरण करता हूँ। कितना बड़ा आश्वासन भगवान् दे रहे हैं । अब भी हम न चेते तो हमारा दुर्भाग्य !
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
रहे थे । एक परमहंस आए और कहा कि क्यानआप भी पूजा-पाठ करते हैं ? हमको तो बड़ा आश्चर्य हुआ । हमने कहा, आप से अधिक आश्चर्य तो हमको हुआ कि रिटायर्ड होकर आप दफ्तरों में धक्का खाते-फिरते हो। हम तो आश्रमी हैं, संन्यासी हैं । आप तो अपने को परमहंस कहते हो, परमहंस तो आश्रमातीत होता है। कौन संसार में व्यभिचार कर रहा है, कौन पूजा-पाठ कर रहा है - यह देखते-फिरना तो आप का काम नहीं है । आप की वृत्ति तो निरन्तर स्वरूपाकार रहनी चाहिये । हम तो प्रिन्सिपल हैं; स्वयं पाठ-पूजा करेंगे क्योंकि दूसरों को सिखाना है। प्रयोजन यह है कि मन इतना बेईमान है कि वेदान्त के सहारे उपासना छोड़ देने परं न जाने कब फिसल जाय । अच्छे-बुरे कर्म तो प्रारब्धानुसार होते ही रहते हैं । उपासना तो अवश्य ही होती रहनी चाहिये ।
जब तक प्रारब्ध हैं, कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा । इसलिए भगवान् का चिन्तन करते हुए विहिताविहित का विचार करके कर्म करो । विहताविहित का निर्णय करने वाला शास्त्र ही हैं; इसका निर्णय कोई कमेटी नहीं कर सकती। हमारे संचालक तो वेद-शास्त्र ही हैं । व्यवहार चलाते रहो । मन भगवान् में लगाओ । अन्त समय में भगवान् का चिन्तन करते हुए जाओ । ऐसा न कर पाये तो कुछ भी नहीं कर पाये । नौकारूढ़ होकर भी नदी में डूब गये ।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ९४*
संसार शोक-सागर हो है
आत्म-ज्ञानी ही इसे पार कर सकता है
विचार - दृष्टि से देखा जाय तो संसार में सुख का लेश मात्र भी नहीं है । यहाँ सुख की भावना करना ऐसा ही है, जैसे ससुराल की गाली सुनकर प्रसन्न होना। गाली तो गाली ही, है, उसमें प्रसन्नता कैसी ? परन्तु नहीं, अनिष्ट में भी इष्ट बुद्धि रखने वाले लोग हैं। जैसे नाली में पड़ा हुआ मद्यप नाली में पड़े रहने में ही सुख मानता है; कोई उसे हाथ पकड़ कर बाहर निकालना चाहे ता भी प्रयत्न करके वह वहीं पड़ा रहना चाहता है। इसी प्रकार संसार में सुख की भावना करने वालों का हाल है। संसारी पदार्थों में सुख का लेश मात्र नहीं, संसार तो शोक-सागर ही है । लिखा है कि – 'तरति- शोकमात्मवित्' शोकोपलक्षित जो अज्ञान् है उसको आत्मवित् ही करता है । श्रुति कहती है—
'आचार्यवान् पुरुषो वेद'
अर्थात्, आचार्यवान् को ही ज्ञान होता है ।
'धनवान् पुरुषो वेद' 'पुत्रवान् पुरुषो वेद' 'स्त्रीवान् पुरुषो वेद' आदि यह नहीं कहा । 'आचार्यवान् पुरुषो वेद' यही श्रुति ने कहा है ।
इसलिये शोक-सागर, संसार सागर पार होने के लिए आत्म-ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है ।
*उपदेश ९५*
भवसागर से पार होने का प्रयत्न करो
नौकारूढ़ होकर भी यदि डूब गये
तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा
प्रत्येक मनुष्य यह चाहता है कि लोक में वह सुखी रहे और परलोक भी न बिगड़े । जो परलोक को नहीं जानता वह नास्तिक है। नास्तिक भी यह चाहता है कि वह सुखी और शान्त रहे । आस्तिक लोग दोनों लोक बनाना चाहते हैं परन्तु सुख-शान्ति केवल इच्छा मात्र से तो हो नहीं सकती । इच्छा तो केवल प्रयत्न कराने वाली होती है, सुख शान्ति प्रयत्न करने से ही मिल सकती है । इसलिए सुख शान्ति के लिए प्रयत्न करो और ऐसा प्रयत्न करो जो वैध हो । वैध प्रयत्न वही है जैसा शास्त्र कहता है। किसी कवि ने कहा है
न पीतं जाह्नवी तोयं
न गीतं भगवद् यशः
न जाने जानकी जाने जाने
यमाह्वाने किमुत्तरम् ।
गंगा-जल का पान नहीं किया। अब देखना यह है कि गंगाजल पान करने से होता क्या है ? गंगाजल पान करने से पाप नष्ट होते हैं, पाप नष्ट होने से बुद्धि शुद्ध होती है और बुद्धि शुद्ध हो जाने पर भगवान् की ओर प्रेम बढ़ता है। ऐसा गंगा-जल यहाँ उपलब्ध है। सरल से सरल यह साधन यहाँ प्राप्त ही है ।
भगवान् की भक्त वत्सलता का चिन्तन और गान ही भगवान् का गुणानुवाद है । हिरण्यकश्यपु के वध के लिये भगवान् का जड़ से उत्पन्न होना उसी प्रकार है, जिस प्रकार 'पिपीलिका मारने के लिए तोप लगाना । भगवान् के लिए यह साधारण सी बात रही। भगवान तो उसकी मति ही बदल सकते थे । फिर प्रह्लाद कार्य तो तभी हो गया जब-जब जिस-जिस तत्त्व से प्रह्लाद को कष्ट दिया गया तब-तत्र प्रह्लाद वही वही तत्त्व हो गये । जब वे अग्नि में डाले गये तो अग्नि हो हो गये । अग्नि, अग्नि को क्या जलायेगा ? जब प्रह्लाद जल में डुबोये गये तो वे जल तत्त्व ही हो गये । परन्तु भगवान् ने 'ऐसा इसीलिए किया कि आगे के भक्तों को विश्वास हो, आश्वासन रहे । अपने यश के विस्तार के लिए वे प्रह्लाद के सामने प्रत्यक्ष प्रकट हुए । सांसारिक लोग कह सकते हैं कि भगवान् को अपने यश-विस्तार के लिए क्या पड़ी है । परन्तु यह भगवान् की भक्त-वत्सलता ही थी कि जिसके आगे के भक्त लोग गुणानुवाद करके, उनका यशगान करके, भवसागर को पार करें। इसी लिये इस प्रकार भगवान् प्रह्लाद के लिए नृसिंह रूप में पैदा हुए ।
द्रौपदी के कष्ट में भगवान् चीर ही हो गये । इस प्रकार भगवान् का स्मरण, चिन्तन और गान करने से बुद्धि शुद्ध होती है और भगवान् में विश्वास होता है। भगवान् को जानने का साधन वेद-शास्त्र पर विश्वास करना भी है। यदि वेद-शास्त्र पर विश्वास न करोगे, तो भगवान् की सत्ता पर भी विश्वास न होगा । भगवान् की सत्ता पर विश्वास न करने से संशय बना रहेगा। संशयवान् पुरुष का न लोक ही बनता है और न परलोक ही ।
भगवान् को जानोगे नहीं, विश्वास नहीं करोगे, तो ढूंढोगे कहाँ ? जैसे हमको रामनगर जाना है तो हम नक्शे में देख कर पता लगावेंगे कि रामनगर कहाँ है । तब आत्म-भवन में रुकेंगे। नक्शा है वेद-शास्त्र | वेद-शास्त्र द्वारा भगवान् को जानो ।
(https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah)
परन्तु भगवान् को जान लेने मात्र से तो काम चलेगा नहीं, कुछ अनुभव भी करो । अनुभव बहुत बड़ी चीज है । एकान्तवास भगवान् के ढूंढ़ने का अच्छा साधन है । अतः एकान्त में रह कर अनुभवी महात्मा बनो। इस प्रकार साधू-सन्यासी ही नहीं, संसारी भी कर सकते हैं, क्योंकि संसारियों से ही तो महात्मा होते हैं । इनकी कोई खदान नहीं,इन्हीं माताओं के पेट से महात्मा भी हुए हैं । आज जो दुराचार-पापाचार रत हैं कल वे ही उच्च कोटि के महात्मा हो सकते हैं । के एक समय को बात है, हम उपनिषद् का पाठ कर
(https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah)
आत्मा का ज्ञान होने पर सम्पूर्ण दुःख सदैव के लिये नष्ट हो जाते हैं। एक ही चैतन्य भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा से जाता है। परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मारूप से व्याप्त है । आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं । जो आत्मा है वही चैतन्य जीव भी कहलाता है । भेद केवल उपाधि का है । उपाधि - युक्त चैतन्य ही जीव कहलाता है और सम्पूर्ण उपाधियों को त्याग देने पर वही चैतन्य आत्मा है । आत्मा और जीव का भेद ऐसा है जैसे धान और चावल का जब तक एक भूसी बनी हुई है उसे धान कहा जाता है और जब उसकी भूसी हटा दी जाती है तब वही चावल कहलाता है | तत्वतः जो धान है वही चावल ।
ल
धान और चावल का व्यावहारिक भेद यह है कि धान में जल और मृत्तिका के योग से अंकुर उत्पन्न हो जाता है, परन्तु चावल चाहे जितने समय तक जल मृत्तिका के संयोग में रहे उसमें अंकुर नहीं हो सकता । इसी प्रकार जब तक शुभाशुभ कर्मों का बन्धन है, तब तक वही चैतन्य जीव है और कर्म-बन्धन क्षीण होने पर वह शुद्ध बुद्ध आत्मा है । जीव का पुनर्जन्म ही उसका अंकुरित होना है। शुभाशुभ कर्म जीव के के लिये भूसी के समान है। भूसी हटा देने से फिर अंकुर नहीं हो सकता । अर्थात्, शुभाशुभ कर्मों का परित्याग हो जाने पर फिर पुनर्जन्म नहीं होता ।जब तक भूसी लगी हुई है तब तक धान, धान ही है ।
यद्यपि चावल भी उसी में है। परन्तु उसे उबालकर कोई खा नहीं सकता । यदि कोई धान उबाल कर किसी को खाने के लिये देवे तो उसे पागल ही समझा जायगा । ठीक इसी प्रकार जब तक कर्म - बन्धन नष्ट नहीं किया जाता, तब तक जीव परमानन्द की अनुभूति के वञ्चित रहता है ।
अज्ञान से मोहित हुआ जीव कर्म के बन्धनों में पड़ता है । अज्ञान ही भ्रम कहलाता है। इनकी निवृत्ति यथार्थ ज्ञान से होता है । ज्ञान प्राप्त करने के लिये शास्त्र और सद्गुरु की सहायता अपेक्षित है । बिना गुरु के कोई जीवन भर माथा रगड़े, परन्तु आत्मज्ञान नहीं हो सकता। नदी पार करने वाले दस पुरुषों के दृष्टान्त में जब तक एक महात्मा ने आकर उनका भ्रम दूर नहीं कर दिया, तब तक वे अपने एक साथी के डूबने के भ्रम में विलाप करते रहे । जब महात्मा ने गणना करवा कर बतलाया कि 'दशमस्त्वमसि' दसवें तुम हो, तब उनका शोक नष्ट हुआ । इसी प्रकार गुरु के द्वारा ही 'तत्वमसि' का यथार्थ बोध होता है ।
भगवान् के अस्तित्व और उसकी दयालुता में अपना विश्वास दृढ़ करो । धैर्यपूर्वक प्रारब्ध भोग करते हुये अपने-अपने वर्ण और आश्रम के धर्म का ठीक रूप से पालन करते जाओ । स्वधर्म का पालन करते रहने से अन्तःकरण पवित्र होगा और तभी आत्म-ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता प्राप्त होगी। ज्ञान-प्राप्ति के लिये व्यवहार से दूर भागने का आवश्यकता नहीं । संसार का व्यवहार तो चलाते रहो, परन्तु मन को उसमें न फँसाओ । संसार में जो राग हो गया है। वही बन्धन का हेतु है, संसार बन्धन का हेतु नहीं है । अतःराग का त्याग करके अक्षय सुख का अनुभव करो। हम किताबी बातें नहीं कहते, यह सब हमारी अनुभूत बातें हैं । यदि आप निष्ठापूर्वक इनका पालन करें तो अवश्यमेव सुखी हो सकते हैं ।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ९३*
_दुःख की प्रातिभासिक सत्ता है, वास्तविक नहीं_
आजकल चारों ओर लोग अशान्त और दुःखी दिखाई देते हैं। इसका कारण यथार्थ ज्ञान का अभाव है । विवेक पूर्वक विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि बाहरी परिस्थितियाँ हमें तब तक प्रभावित नहीं कर सकतीं, जब तक हम दृढ़ता पूर्वक उनसे अप्रभावित रहने के लिये उद्योग-शील रहते हैं। जब हम अपने मन से बाह्य परिस्थितियों को सुखद या दुःखद मान लेते हैं, तभी वे हमें सुखी-दुःखी बनाती हैं । यदि निरन्तर यह भाव बना रहे कि हम स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर, इन तीन शरीरों से परे शुद्ध सच्चिदानन्दमय आत्मा हैं, तो किसी भी परिस्थिति में दुख की अनुभूति नहीं हो सकती ।
प्रारब्ध भोग टाला नहीं जा सकता। ज्ञानी भी उसे भोगना है और अज्ञानी भी। अन्तर केवल यह है कि ज्ञानी तो प्रसन्नतापूर्वक अच्छा-बुरा सभी प्रकार का प्रारब्ध भोगता है और अज्ञानी रोते हुये भोगता है। जब यह निश्चित है कि प्रारब्ध अवश्य भोगना पड़ेगा, तब उसे प्रसन्नता के साथ ही क्यों न भोग लिया जाय । दुःख यथार्थ में है ही नहीं । उसको तो प्रातिभासिक सत्ता है जो केवल भ्रम के कारण दिखाई देती है । जैसे किसी कमरे में पड़ी हुई रस्सी को अन्धकार में देखने वाला सर्प का अनुमान करके भय से काँपने लगता है, परन्तु जिसने सूर्य के आलोक में उस रस्सो को देखा है वह न तो कम्पित होता है और न व्याकुल । यद्यपि वह उन्हीं लोगों के बीच में है जो रस्सी में सर्प को कल्पना करके भयभीत हो रहे हैं । इसी प्रकार से ज्ञानी भो आपके बीच में रहता है, परन्तु दुःख उसे विचलित नहीं कर सकते ।
आप लोग विचार कर देखिये कि रज्जु तो सबके लिये समान था, परन्तु जो प्रकाश में उसके यथार्थ स्वरूप को देख चुका था वह अंधेरे में उनका देखकर कंपित नहीं हुआ । जो उसके स्वरूप को नहीं जानते थे वे ही भ्रम से उसे सर्प मानकर भयभीत और दुःखी हुये । यदि किसी प्रकार उन लोगों का भ्रम दूर हो जाता तो फिर उनके लिये दुःख का अस्तित्व ही नहीं रहता । इसका निष्कर्ष यही है कि दुःख का कारण है भ्रम । भ्रम की निवृत्ति हो सकती है, इसीलिये दुःख की भी निवृत्ति हो सकती है। यदि दुःख भ्रम-मूलक न होता और पारमार्थिक सत्तावान् होता तो उसकी निवृत्ति विधाता भी नहीं कर सकते थे; क्योंकि सत् वस्तु का अभाव कभी भी नहीं होता ।
भ्रम - नाश दो प्रकार से होता है । इसे समझने के लिये उसी रज्जुवत् सर्प के दृष्टांत को ले लीजिये । दीपक लेकर रज्जु के वास्तविक स्वरूप को देख लेने पर उसमें सर्प का भ्रम मिट सकता था । रस्सी से तो कोई भयभीत होता नहीं, केवल सर्प की कल्पना ही भय कम्प का कारण थी । अतः अधिष्ठान का प्रत्यक्ष ज्ञान होने पर उसका अस्तित्व ही नहीं रहता।
भ्रम-नाश का दूसरा उपाय है - जानने वाले की बात पर विश्वास करना । जिसने उस रज्जु को दिन के प्रकाश में ठीक-ठीक समझ लिया है, उसकी बात पर विश्वास करके भी भय को मिटाया जा सकता है।
विवेक, वैराग्य, षट्-सम्पत्ति, मुमुक्षुता इत्यादि साधनों से सम्पन्न होकर ज्ञानी समाधि के द्वारा जगत् और ब्रह्म के यथार्थ स्वरूप का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करता है । वह जानता है कि आत्म और अनात्म सभी रूपों में एक परमात्मा ही व्याप्त है । अतः जगत् में रहते हुए भी वह द्वन्द्व रहित हो जाता है । समाधि-काल में प्राप्त किये हुये ज्ञान के बल से वह व्यवहार काल में भी कभी व्यथित नहीं होता; क्योंकि जहाँ अज्ञानी लोग भय देखते हैं वहाँ भी ज्ञानी ईश्वर को देखता है । चराचर सम्पूर्ण जगत् का एकमात्र अघिष्ठान परमात्मा हो है । जैसे सर्प के अधिष्ठान रज्जु को जान लेने पर भय मिट जाता है, उसी प्रकार जगत् के अधिष्ठान परमात्मा को जान लेने पर भय के लिये कहीं स्थान ही नहीं रहता।
साधनहीनता के कारण जो परमात्मा का अपरोक्ष ज्ञान करने में असमर्थ हैं, वे भी यदि शास्त्र और ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुओंके शब्दों में श्रद्धा और विश्वास करना सीखें तो बहुत अंशों में उनका दुःख दूर हो जायेगा । जब तक अन्तःकरण में भ्रम बना हुआ है, तब तक लाख उपाय करने पर भी दुःख से सदैव के लिये छुटकारा नहीं मिल सकता । व्यथित मनुष्य को यदि मदिरा पिलाकर बेहोश कर दिया जाय तो अवश्य कुछ क्षणों के लिये, जब तक मदिरा का नशा रहेगा, वह अपनी व्यथा भूला रहेगा। परन्तु नशा उतरते ही वह पुनः उसी अवस्था को प्राप्त हो जायेगा। इसी प्रकार जगत् के विषयों में मन फँसा कर कोई दुःखों से छुटकारा पाना चाहे तो यह सम्भव नहीं ।
आए,कदाचित धर्म के शोधन, राजशोधन, व्यासपीठ शोधन, मठ शोधन, और मुलसिद्धान्त शोधन की प्रक्रिया आप से ही शुरू होगी। सत्य स्वयं ईश्वर स्वरूप है सत्य ही ईश्वर है, सत्य और धर्म के पक्ष में रहे न कि व्यक्तिगत या संस्थागत पक्ष में।
*भगवान सनातन धर्म के समष्टि शोधन का मार्ग प्रशस्त करें ऐसी प्रार्थना के साथ त्रिवेदी जी का सर्व को अभिवादन।*
सर्वेशां स्वस्तिर्भवतु ।
सर्वेशां शान्तिर्भवतु ।
सर्वेशां पुर्णंभवतु ।
सर्वेशां मङ्गलंभवतु ।
(यह मूल आर्टिकल है,इनकी विकृति या दुरुपयोग की मैं जिम्मेदारी नहीं लेता मूल आर्टिकल मेरे स्वयं के पृष्ठ पर है जो लिंक मैंने दी हुई है।)
https://www.facebook.com/HrtSpeaks
अभी और भी शोध जारी है, आगे और भी चीज प्रकाशित होगी तो निर्भयता से सत्य का पक्ष जरूर पड़ने पर इसी विषय पर एक और आर्टिकल बनाकर सत्य और धर्म का पक्ष रखा जाएगा।
श्रीमन्नारायण 💐
पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिकब्राह्मणः 🚩 गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
#नकली_धर्मप्रचारकों_का_भंडाफोड़
आपको जिन शांकर मठो के प्रचारकों पर विश्वास है या अन्य जो संप्रदाय है उनके प्रचारकों पर विश्वास है ! वो प्रचारक स्वयं शांकर सिद्धांत भी या जो सो मत के सिद्धांत को जानते है?
अभी हम जैसे "उदाहरण के तौर" पर शंकराचार्य मठों के प्रचारको का ही करें तो,आपने कभी उनके साथ सैद्धांतिक बात की है?क्या वे लोग सामान्य शांकर सिद्धांत या सामान्य शास्त्रीय सिद्धांत को भी जानते है?
आप जनसामान्य उन लोगों का बड़ा ग्रुप दबदबा देखकर चकाचौंध देखकर जुड़ तो जाते बाद में आप भी उन लोगों जैसे *सिद्धांतविहीन* बन जाते है। आप किसी भी ५ प्रचारकों को यादृच्छिक रूप से पकड़िए और उन्हें सामान्य वैदिक धर्मसिद्धांत,शंकर परम्परा के सिद्धांत और शंकराचार्य मठों का संविधान पूछिए यह लोग वास्तव में कुछ नहीं जानते, इनको केवल जो सो सम्प्रदाय में जो अमुक लाभ पाने हेतु पहले सीनियर जुड़े होते है उनकी आज्ञा का पालन करना होता है,आप भावुक होकर हिन्दू धर्म को बचाने के लिए शीर्ष आचार्य का मुख देखकर जुड़ते है वो आपको मूर्ख समझते है एक और मुफ़्त का प्रचारक जुड़ गया। फ़िर आप जैसे सामान्य लोगों की भावनाओं का लाभ उठाकर यह मठ के गुट में भी रहते है और अपना विशेष गुट भी बनाते है ताकि स्वयं को मठ प्रशासन के सामने प्रतिभाशाली साबित किया जाए।
बड़े बड़े प्रकल्प चलाकर अन्य के प्रति अपनी मर्यादा का उल्लंघन एवं सम्प्रदाय के संविधान का अतिक्रमण ही इन लोगों का आशय है। पुनः इन लोगों को न कोई गुरु से लेना देना है न कोई सम्प्रदाय से न धर्म से न शास्त्र से न किसी भी प्रकार हिन्दुधर्म के सिद्धांत से, केवल आर्थिक उपार्जन के लिए मठ से लिंक बनाई हुई होती है, ताकि *मठ या संस्था के नेटवर्क* के दम पर उनके धंधे का भी प्रचार हो।यह लोग अपना धंधा चलाने के लिए मठ के नेटवर्क में सेंध करते है, और अपने निजीस्वार्थवश मठ के नेटवर्क का अपने लाभ के लिए उपयोग करते है, वास्तव में इन लोगों को शंकर सिद्धांत के साथ कोई लेनादेना नहीं होता केवल अपने स्वार्थवश अपने आप को मठ से जुड़ा या मठ का प्रचारक बताकर आपको उनके बिज़नेस की भी स्किम दे देतें है। यहीं आजकल न केवल शंकर सम्प्रदाय तमाम सम्प्रदाय तथा धार्मिक संस्थाओं में चलता है।
आगे सुनिए, इनके गुरुओं के आपके घर पदार्पण के भाव यह सुनिश्चित करते है(गुरु नहीं) जहां कम से कम एक लाख से लेकर पांच लाख तक कथित दक्षिणा के तौर पर मांगे जाते है।
मठ में रह रहे, शीर्ष आचार्य निःसंदेह ही विद्वान होते है किन्तु उनके अलावा कोई भी पांच - सात यादृच्छिक रूप से ब्रह्मचारी या भगवावस्त्र पहने व्यक्ति को पकड़िए उनको सामान्य हिन्दू शास्त्रीय सिद्धांत पूछिए,उनके मूल सम्प्रदाय के संविधान के सिद्धांत पूछिए उनकी ही गुरु परम्परा के १० पूर्व आचार्यो का नाम पूछिए। आपको स्वयं को पता चल जाएगा कि यह कितने योग्य है।
मठ या संस्थाओं के अंदर क्या चल रहा है, वहां शास्त्रीय नियमो का पालन हो रहा है कि नहीं? शीर्ष आचार्य के साथ घूमते तमाम लोग उनके साथ रहकर भी ज्ञान युक्त है कि नहीं? *वह लोग जातिय एवं आचार के परीक्षण से ब्रह्मचारीत्व या सन्यासी बनने के लायक भी है या नहीं।*
कुछ तो अपनी तमाम मर्यादाओं का उल्लंघन कर चुके है। जो पटल पर ला भी नहीं सकते।
इनसे सामान्य जुड़े लोगों या अनुयायियों के साथ कदाचित कोई जिम्मेदार व्यक्ति के द्वारा गलत भी होता है तो भी वो बेचारे बंध मुह सह लेते है। मठ के आंतरिक लोग में भावना हो न हो बाहर से जो जुड़े है वो लोकलज्जा और मठ की मर्यादा, मान बने रहे ऐसी भावना से मौन का सेवन करते है।
अन्य सम्प्रदाय मैं जैसे बोला यही एक जैसा ही पैटर्न है। विदेशों में धनलालसा से मंदिर बनाए जाते है, अपनी अमर्यादित भक्तो की संख्या के कारण राजनीति दलों के भी यह लोग अनुगमन करते है की आपके जो सो संस्था या सम्प्रदाय के इतने अनुयायी है आपको हमारी सरकार से यह वो लाभ मिलेंगे ऐसा कर वोट बटोरे जाते है।
ऐसे भी बहुत यानी बहुत सारे पहलू है जो सार्वजनिक तौर पर नहीं बोले जाते जिनके अनुभव में आया वे स्वयं ही जानते है। किंतु लोकलज्जा से भी वो मौन रहते है।
*हिन्दू धर्म को बचाना है तो आवाज़ उठाइए और जहां शास्त्र विरुद्ध का कृत्य या आप के साथ निजी तौर पर ऐसी घटना हुई तो सार्वजनिक करिए ताकि और भी जनसामान्य लोग यह जाल से बचे।*
अब आपको क्या करना है। आचार्य चाणक्य का वचन है,वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः।
यह मत भूलिए परम्परा,सम्प्रदाय,धार्मिक संस्थाओं आदि के समकक्ष कुलीन ब्राह्मण की गृहस्थ परम्परा है, और सन्यासी आपके दूसरे क्रम के गुरु है,पहले क्रम के गुरु हम सब कुलीन गृहस्थ ब्राह्मण है यही शास्त्र सिद्धांत है। यही #निर्णय है। केवल योग्य गृहस्थ ब्राह्मण गुरु के अभाव में ही अन्य परम्परा का आलंबन ले सकते है तब तक आपके प्रथम गुरु गृहस्थ ब्राह्मण है। चुप न रहें बोले आपके साथ अगर कोई छल हुआ है तो सामने
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ९२*
_भगवान् के पास पहुँचना है_
_तो उनके नाम का सहारा लो_
हनुमान भगवान् राम के अनन्य भक्त थे । उन्होंने भगवान् की इतनी सेवा की। परन्तु उसके बदले में कुछ चाहा नहीं - यह अनन्यता है । उच्च कोटि के सेवक के लिये कहना नहीं पड़ता; वह भाव को जानकर काम करता है । भगवान् राम ने हनुमान को सीता की खबर लाने के लिये ही भेजा था — इतनी ही आज्ञा थी कि पता लगाकर चले आओ। परन्तु हनुमान ने लंका को भी जलाया और रावण को लड़ने की चुनौती भी दी; क्योंकि वह जानते थे कि रावण का विनाश करना है— इसमें भगवान् प्रसन्न होंगे।
भगवान् तो कहते हैं कि-
दुराचाररतो वामि मन्नामभजनात्कपे ।
सालोक्यमुक्तिमाप्नोति न तु लोकान्तरादिकम् ॥
अर्थात्, दुराचारी भी यदि हमारा भजन करता है तो वह अन्य लोक-लोकान्तरों में न जाकर हमारे सालोक्य मोक्ष को प्राप्त करता है ।
सालोक्य मोक्ष में भगवान् में लीन होने में कुछ बिलम्ब तो होता है, परन्तु गर्भवास से तो मुक्त हो ही गया । फिर इस संसार में वह लोटकर नहीं आता। दुराचारी मनुष्य जब भगवान् का भजन करने लग जाता है, तो वह भी धर्मात्मा हो जाता है । इसका अर्थ यह नहीं है कि दुराचार-पापाचार भी करते चलो और भगवान् का भजन भी । भगवान् का भजन करनेवाला दुराचारी कैसे रह सकता है ?
भगवान् के पास पहुँचना है, तो उनके नाम का सहारा लो । भगवान् तो अपनाने के लिये तैयार हैं, हमारी हो तरफ से कमी है। भगवान् तीन हाथ से तो जगत् का कार्य करते हैं. परन्तु एक हाथ खाली रखते हैं। उदाहरण है — जैसे स्त्रियाँ जब पानी भरने जाती हैं, तो दो घड़ा एक के ऊपर एक सर पर रख लेती हैं और एक हाथ में रस्सी व डोल, परन्तु एक हाथ खाली रखती हैं । बच्चा जब माता की गोद में आने के लिये रोता है तब वह कहती है कि मेरा चरण पकड़ ले तो मैं एक हाथ से उठा लूं । उसका कोई व्यापार बन्द नहीं होता । उत्पत्ति, पालन, संहार यही घड़े हैं - इन तीनों कामों को करते हुए भी भगवान् अपना एक हाथ भक्त के लिये खाली रखते हैं। परन्तु उपाय यही है कि भगवान् का चरण पकड़ लो तभी वह उठा सकते हैं, ऐसे नहीं । भगवान् की सेवा-पूजन करना, उनका भजन करना, यही भगवान् का चरण पकड़ना है । भगवान् को अगर अपना लिया तो भगवान् भी तुम से दूर नहीं रह सकते । भगवान् का भजन करते-करते शरीर छूट गया, तो फिर जन्म-जन्म की दरिद्रता मिट जायगी।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ९१*
मन को संसार में अधिक न फँसाकर भगवान् की तरफ लगाओ
संसार में मन को अधिक फँसा देना ठीक नहीं । विचार से काम लेने की आवश्यकता है । तन, मन, धन - तीन ही हैं। यदि इन तीनों का ठीक-ठीक उपयोग करते बन जाय तो फिर अन्त समय में पछताना नहीं पड़ेगा। पहले की जो बिगड़ी सो बिगड़ी, पर ऐसा करो कि अब तो न बिगड़ने।पाये। वेद-शास्त्र का सहारा लेकर चलोगे तो पतन से बचे रहोगे। एक दिन यहाँ से जाना अवश्य है अतः चलते समय के लिये कुछ पूंजी इकट्ठी कर लो जो परलोक में सहायक हो । वस्तु का सदुपयोग करना ही बुद्धिमानी है। मन का सदुपयोग यही है कि उससे भगवान् का चिन्तन किया जाय । संसार का चिन्तन करना मन का दुरुपयोग है।
किसी के परोपकार में शरीर को लगाना, भगवान् के भजन-पूजन में लगाना, शरीर का सदुपयोग है । दूसरे को कष्ट देना, चोरी करना, ये सब शरीर का दुरुपयोग है। इसी तरह अच्छे कार्यों में धन को लगाना, यही उसका सदुपयोग है और बुरे कामों में लगाना दुरुपयोग है । 'दानं भोगो नाश : ' वन की तीन ही गति हैं - या तो दान में खर्च होगा या भोग में या नाश हो जायगा - यही इसकी अन्तिम गति है।
जो धन न भोगा जायगा, न दान दिया जायगा तो उसकी तीसरी गति होगी ही अर्थात् नाश हो जायगा । दान भी तीन प्रकार का है - सात्विक, राजस, तामस । सात्विक दान का उत्तम फल है । भोग का अर्थ यह नहीं हैं जैसा आजकल।लोग भोगते हैं। अत्यन्त विलासी जीवन ठीक नहीं । भोग भी मर्यादापूर्वक होना चाहिये । मन की तो कभी भी विषयों से तृप्ति नहीं हो सकती और न तृप्त होने की आशा ही रखनी चाहिये । इन्द्रियाँ शिथिल हो जायँ, किसी काम की न रह जायँ तो भी मन तृप्त नहीं हो सकता। भोग से किसी की तृप्ति होनी असम्भव है। थोड़ा सा अनुभव कर लो, तब भी वही बात है और दिन-रात उसी में लिप्त रहो तब भी वही बात । मदिरा एक कप पियो या दस बोतल पियो बात एक ही है । नशा करना है तो ऐसा नशा करो जो कभी उतरे नहीं, ऐसा नशा किस काम का कि धन भी गया और नशा भी उतर गया ।
भगवान् की प्राप्ति ही ऐसा नशा है जो एक बार आकर फिर नहीं उतरता । नशा तो वही करना चाहिये, जो कभी उतरे नहीं और उसी नशे में शरीर छूट जाय ।
मनुष्य जीवन में कोई काम करना हो तो सोच-समझकर।करो । ऐसा नहीं कि जो सामने आया, जैसे संगी-साथी।मिल गये, वही करने लगे। अपना हानि-लाभ देख कर काम।करना चाहिये । कुछ लोग सत्संग में इसलिये नहीं जाते कि उनका मद्य-मांस छूट जायगा । इस डर से सत्संग में न जाना, इससे भारी प्रमाद और क्या हो सकता है । स्वयं यदि उसे छोड़ने में असमर्थ हो तो संग अच्छा बनाओ । सम्भव है, सत्संग से ही लाभ हो जाय ! अन्धकार को हटाना है तो
प्रकाश का सहारा लो । प्रकाश के सामने अन्धकार अपने आप हट जायगा । प्रकाश के लिये चेष्टा करनी चाहिये । इसलिए संसार से मन को हटा कर परमात्मा में लगाना चाहिये, और वेदशास्त्र, साधु-महात्माओं की बात पर विश्वास करना चाहिये ।
हम तो कहते हैं, पहले संसार को भज लो, फिर भगवान् को भजो तो संसार वाधक नहीं होगा। संसार का भजना यही है कि इसके स्वरूप को जान लो । पहले संसार ही गुरु बनता है । कहीं कुटुम्बियों ने अपमान किया, कहीं पुत्र के द्वारा अपमान हुआ तो संसार से वैराग्य हो गया ।
इसलिये पहिले से हो सचेत होकर भगवान की ओर मन लगाने का अभ्यास करना चाहिये। जब तक हम धन संग्रह में समर्थ हैं तभी तक संसारियों का प्रेम है | हमेशा तो शक्तिशाली रहेंगे नहीं, एक दिन वृद्धावस्था आयेगो हो, तो जो कुटुम्बी लोग आगे चल कर।हमारे साथ करेंगे वह हम आज ही क्यों न जान लें ।
अभी हम उनको अपना प्रेमास्पद मानते हैं। जिस समय हमारी वह अवस्था आयेगी तो पछतायेंगे । फिर यही कहेंगे कि लड़का कहा नहीं मानता, बहू कहा नहीं मानती, जिसके लिए हमने इतना सब किया अब वही हमारा अपमान करते हैं । तो ऐसा क्यों करो जिसके लिये अन्त में रोना पड़े । अभी के उसके लिए सावधान हो जाओ । संसार में कोई किसी का नहीं है । सब अपने-अपने स्वार्थ के साथी हैं । जब तक जिसका स्वार्थ सिद्ध होता है तभी तक उसका प्रेम है। इसलिए इन लोगों की अश्रद्धा होने के पहले ही भगवान् की तरफ झुक जाओ। यदि अभी से भगवान् का भजन पूजन करते रहोगे, तो कुटुम्बियों के अपमान की परवाह नहीं होगी । प्रेमास्पद तो परमात्मा ही है, उससे ही प्रेम करो तभी सुखी रह सकते हो ।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ८९*
_अपने किये का फल तो भोगना ही पड़ेगा।_
चाहे आज या दस बरस के बाद या दस जन्मों के बाद, कभी न कभी अवश्य ही किये हुए कर्म का फल भोगना पड़ेगा । कोई भी कार्य छोटा हो या बड़ा, जो किया जायगा उसका फल होकर ही रहेगा । यह अवश्य है कि -
अत्युग्र पुण्यपापानां, इहैव फलमश्नुते ।
अत्यन्त उग्र पुण्य किया जाय या पाप किया जाय, अति प्रभावशाली कोई भी कार्य किया जाय तो उसका फल यहीं इसी जन्म में, जल्दी ही मिलता है। सामान्य पुण्य पापों का फल कालान्तर में जाकर मिलता है। पर ऐसा नहीं हो सकता कि किसी कार्य का फल न मिले ।
जो कर्मों के फल देने वाला है, वह सर्वज्ञ है। कर्म तो जड़ होता है और कर्म का फल भी जड़ ही होता है। जड़ कर्मों के फलों का नियामक चेतन परमात्मा सर्वान्तर्यामी सर्वज्ञ है, व्यापक हैं । वह सबके सब कर्मों का ठीक हिसाब रखता है। जिसका जैसा कर्म होता है, उसको वैसा ही फल देता है । मनुष्यों की आँख बचाकर तो आप कोई कार्य कर सकते हो, पर परमात्मा के नेत्र में धूल नहीं झोंक सकते। उसकी आँख बचा कर कोई कार्य नहीं किया जा सकता। इसलिये ऐसा कार्य मत करो जिसको तुम पाप समझते हो । यह नहीं भूलना चाहिये कि पाप कर्मों का फल दुःख होता है । जो कर्म करोगे उसका फल तो भोगना ही पड़ेगा। अच्छे कर्म करोगे तो सुख होगा और बुरे करोगे तो दुःख मिलेगा - यह निश्चय है | बबूल का वृक्ष लगाओगे तो उसमें कांटे ही होंगे, आम नहीं फलेंगे।
*उपदेश ९०*
जैसा मन में हो, वैसा ही कहो और वैसा हो करो
जिन दिनों में हम जंगलों में एकान्त में रहते थे, एक समय रीवां के पास किसी जंगल में नदी के किनारे एक मन्दिर था, उसी में ठहरे। कुछ दूर पर एक गाँव था। वहाँ का एक आदमी आया और उसने मन्दिर में पूजन किया और हमसे आकर पूंछा कि महाराज ! ज्ञानी लोग तो अपने ज्ञान के बल पर मोक्ष प्राप्त कर लेंगे, भक्त लोग अपनी भक्ति के कारण तर जायेंगे, और जो पतित हैं उनको पतित-पावन भगवान् का सहारा है तो फिर नरक में कौन लोग जाते हैं ? हमने कहा कि इसका उत्तर कल सबेरे देंगे। सबेरे वही आदमी आया । मन्दिर में जाकर भगवान् के सामने प्रार्थना के रूप में कहने लगा-
पापोऽहं पापकर्माऽहं, पापात्मा पापसम्भवः ।
इसी प्रकार के वाक्य बहुत देर तक कहता रहा, अर्थात् मैं पापी हैं, पापात्मा हूँ, पाप कर्म करने वाला हूँ। - यह सब कह कर जब वह हमारे पास आने लगा, तो हमने ब्रह्मचारी से कहा कि हटाओ यह पापी सबेरे-सबेरे कहाँ से सामने आ गया, इसका मुख देखने लायक नहीं है। हटाओ इस पापी को जल्दी से दूर करो।
हमारे सामने से हटकर उसने ब्रह्मचारी से कहा कि इतने पापी तो हम नहीं हैं जितना महाराज जी हमको समझ रहे हैं। यह सुनकर हमने उसको बुलवाया और कहा कि हम तुम्हें पापी नहीं कह रहे हैं, तुम्हारे कल के प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं ।
तुमको हमने पापी कहा तो तुमको बुरा लगा, इससे मालूम पड़ता है कि तुम भीतर से अपने को पापी नहीं मानते। परन्तु सबेरे-सबेरे आकर भगवान् के सामने यही कहते हो कि – पापोऽहं, पापकर्माऽहं-मैं पापी हूँ, पाप करने वाला हूँ। ऐसा तो भगवान् के सामने कहते हो, परन्तु अपने मन में अपने को पापी नहीं मानते। ऐसे ही 'मनसि अन्यत् वचसि अन्यत्' लोग नरक में जाते हैं कि जो मन में कुछ और रखें और ऊपर से कुछ और कहें । यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। मनुष्य को भीतर बाहर एकसा रहना चाहिये, जैसा मन में हो वैसा ही कहो और वैसा ही करो तो किसी दूसरे को भी तुम्हारे द्वारा धोखा न होगा और तुम भी सुखशान्ति का अनुभव करोगे।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
दिखाये। निराकार रूप तो केवल सत्ता मात्र है ।
निराकारवादी जो निराकार का ध्यान करते हैं, उस सम्बन्ध में हम उनसे पूँछते हैं कि क्या निराकार का ध्यान किया जा चकता है ? कोई ध्येय बनाया जायगा तभी उसमें वृत्ति टिकेगी। पर जो निराकार है उसको ध्येय कैसे बनाया जा सकता है ?
निराकार का ध्यान नहीं बन सकता। यदि कोई कहता है कि निराकार का ध्यान होता है तो उसका कथन उसी प्रकार है जैसे कोई कहे कि बन्ध्या के पुत्र की बारात में जा रहे हैं । बन्ध्या के पुत्र ही नहीं होता तो उसकी बारात कैसी ? निराकार की जब कोई रूप-रेखा ही नहीं तो उसका ध्येय कैसे बनेगा ? वृत्ति को जमाने के लिये कुछ तो आधार चाहिये । जिसका आधार लोगे वही साकार होगा ।
निराकार तत्व, ध्याता, ध्यान ध्येय, और ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय आदि त्रिपुटी से परे है। निराकार का ध्यान विडम्बना मात्र है। निराकार तत्व को न समझने वाले लोग ही निराकार के ध्यान की बात कर सकते हैं। निराकार तत्व केवल मानने के लिए हैं; सिद्धान्त रूप से वह स्वीकार किया जाता है केवल उसकी सत्ता मात्र है, उससे जगत् का कुछ उपकार नहीं हो सकता | क्या कोई निराकार लड़के से लाभ उठा सकता है ? निराकार स्कूल में जाकर कोई पढ़ सकता है ? निराकार कुर्सी पर कोई मिनिस्टर बैठ सकता है ? निराकार औषधि से कोई रोगी अच्छा हो सकता है ? निराकार भोजन से किसी की तृप्ति हो सकती है ? निराकार बिलकुल बेकार चीज है, उससे कुछ भी काम नहीं हो सकता । इससे केवल निराकारवाद सर्वथा अमान्य है, सर्वथा बेकार है।
निराकार चीज बीज के समान है, उसको उसी रूप में रखे रहो । बीज पेटी में बन्द पड़ा रहे, तो किस काम का ? तक उसे बोओगे नहीं, खनन सिंचन नहीं करोगे और जब तक वह पल्लवित पुष्पित नहीं होगा, तब तक उस बीज से क्या लाभ है ?
निराकार परमात्मा ब्यापक रूप से है, सर्वत्र है । फर्नीचर कमरे में भरा है और फर्नीचर के काष्ठ में निराकार अग्नि है, पर उस कमरे का अंधकार उस व्यापक निराकार अग्नि से नहीं हटता । यदि किसी फर्नीचर को रगड़ कर निराकार अग्नि को साकार रूप में प्रकट कर लिया जाय तो तुरन्त ही कमरे का अंधकार दूर हो सकता है । परन्तु जब तक अग्नि प्रकट नहीं होगी, वह निराकार रूप में साकार जगत् के व्यवहार में नहीं आ सकती। निराकार से जब वह साकार होगी तभी जगत का कुछ उपकार उससे हो सकता है।
यदि परमात्मा साकार नहीं हो सकता तो क्या वह तुम्हारा पशु है कि जैसा चाहो उसको बनाओ - वह परम स्वतन्त्र है । वेद कहता है :-
'सोऽक्षर : परम स्वराट्'
अर्थात, वह अक्षर अविनाशी है ।
परमात्मा परम स्वतन्त्र है । इसलिए 'वह निराकार ही है, साकार नहीं हो सकता या वह साकार ही है, निराकार नहीं है।' ऐसा मानने वाले परमात्म-तत्व के सिद्धान्त को नहीं समझते, केवल एक पक्ष बनाकर झगड़ा मचाते हैं । साकार-निराकार के झगड़े में नहीं पड़ना चाहिये । जो साकार है वही निराकार होता है। निराकार केवल मानने के लिए है और साकार जगत् का कल्याण करने के लिये ।
निराकार परमात्मा जब साकार रूप में प्रकट होता है तभी उसके निराकार रूप की प्रत्यक्ष सिद्धि होती है । काष्ठ को घर्षण करने से जब व्यापक निराकार अग्नि साकार रूप होकर एक वेष में प्रकट हो जाती है तभी प्रत्यक्ष रूप से यह निश्चय होता है कि काष्ठ में अग्नि थी । उसी प्रकार निर्गुण विराकार परमात्मा का संशय विपर्यय रहित बोध तभी होता है जब वह सगुण साकार रूप में प्रकट हो जाते हैं । जिसने काष्ठ को घर्षण करके अग्नि प्रकट कर लिया है, वही दावे के साथ निर्भ्रान्त रूप के कह सकता है कि काष्ठ में अग्नि रहती है । साकार रूप में अग्नि प्रकट हो जाने पर ही निराकार अग्नि का काष्ठ में अस्तित्व सिद्ध होता है । यदि काष्ठ से साकार अग्नि प्रकट न हो तो उसमें निराकार अग्नि का अस्तित्व ही प्रत्यक्ष रूप से नहीं कहा जा सकेगा । जब साकार रूप में भगवान् प्रकट होते हैं, तभी यह निश्चय होता हैं कि निराकार रूप में भी बे हैं । साकार से ही निराकार की प्रत्यक्ष सिद्धि होती है — नहीं तो निराकार को कौन कैसे जान सकता है। जैसे अग्नि निर्गुण से सगुण होती है उसी प्रकार परमात्मा भी निर्गुण से सगुण होता है । यह बात सर्वथा अमान्य हैं कि निर्गुण से सगुण नहीं होता। निर्गुणवादियों के द्वारा ही समाज में अधिक पाप फैलता है क्योंकि ये लोग साकार भगवान को तो मानते नहीं और निराकार के लिये सोचते हैं कि वह तो कुछ देखता-सुनता नहीं, मन चाहा किया करते हैं; उन्हें पाप-पुण्य से कोई मतलब नहीं।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ८८*
_भक्ति और ज्ञान, निराकार और_ _साकार के झगड़ों में न पड़ो_
भक्ति और ज्ञान के सम्बन्ध में परस्पर लोगों में बहुत सी बातें चला करती हैं। किसी के मत से ज्ञान बहुत बड़ा है।और किसी के मत से भक्ति बहुत बड़ी है । जिनको न भक्ति।का कुछ बोध है और न ज्ञान को ही कुछ समझते हैं, वे लोग ही भक्ति और ज्ञान सम्बन्ध में भेद मानकर परस्पर झगड़ा।मचाते हैं। इस सम्बन्ध में यह बात कही जा चुकी है कि परमात्मा को जान लेने का नाम ज्ञान है और जान कर सेवा करने का नाम भक्ति है।
जिसको जानोगे नहीं, उसकी सेवा क्या करोगे। इसलिये स्पष्ट है कि बिना ज्ञान के भक्ति नहीं हो सकती। जो ज्ञान का खण्डन और भक्ति का समर्थन करते हैं या जो भक्ति का खण्डन और ज्ञान का समर्थन करते हैं, वे दोनों ही नहीं समझते, दोनों अन्धे हैं । अन्धों की बात का क्या विश्वास करना — आँखों वाला कोई बात कहे तो मानी भी जाय ।
कई लोग साकार निराकार का भेद मान कर बड़ा विवाद उठाते हैं। परमात्मा को यदि सर्वं शक्तिमान् मानते हो तो फिर कैसे कह सकते हो कि वह साकार नहीं होता या निराकार ही रहता है। परमात्मा को सर्व शक्तिमान् मानते हुए यह कहना कि वह निराकार हो है, साकार नहीं होता, सर्वथा असंगत बात है। जब उसे सर्वंतन्त्र स्वतन्त्र कहते हो तो फिर वह क्या नहीं हो सकता और क्या नहीं कर सकता भगवान के निर्गुण और सगुण रूप से समझने के लिये हम एक उदाहरण देते हैं— अग्नि सर्वत्र परिपूर्ण है । जल में भी अग्नि है, थल में भी अग्नि है, काष्ठ में भी अग्नि है, ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ अग्नि न हो। यह निर्विवाद सिद्ध है। कि अग्नि व्यापक है। अग्नि के समान ही परमात्मा सर्वत्र व्यापक है।
लकड़ी के चैले में जो अग्नि है वह निराकार रूप से उसमें स्थित है। यदि चैले को चूल्हे में डाल कर प्रार्थना करो कि अग्नि जल जाय, परन्तु प्रार्थना करने से अग्नि जलेगी नहीं। निराकार अग्नि से जब तक साकार अग्नि प्रकट नहीं होगी तब तक कुछ काम नहीं हो सकता । निर्गुण अग्नि रह जायेगी, परन्तु तुम्हारे काम नहीं आ सकती। इसी प्रकार अग्नि के समान ही निर्गुण, निराकर परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र चराचर में पूर्णतया व्याप्त होते हुए भी वह तुम्हारे किसी काम का नहीं है। जब कुछ काम होगा तो साकार ब्रह्म से ही होगा। यदि गुरु मिल जायँ तो चैले को घर्षण करके उसी में से साकार अग्नि प्रकट कर सकते हैं और मन चाहा काम ले लेते हैं । जब तक निराकार से साकार रूप में भगवान।प्रकट नहीं हो जाते, जब तक जरूरत का कोई कार्य नहीं बनता । इसी भाव को लेकर गीता में कहा है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
'आत्मानं सृजामि' अर्थात में निराकार रूप से साकार होता हूँ। कब ? जब धर्म घटता और अधर्म बढ़ता है तब किस लिये भगवान को निराकार से साकार होना पड़ता है, यह बताते हुए कहते हैं-
परित्राणाय साधूनां, विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥
साधुओं के कल्याण के लिए और दुष्कृतियों के संहार के लिए मैं प्रकट होता हूँ और धर्म की स्थापना करता हूँ। साधु शब्द से गेरुआ तिलक छाप या कंठी-माला वालों को न समझ लेना । साधु शब्द का अर्थ है - अच्छे साधु वृत्तीय पुरुष जो अच्छे स्वभाव वाले हैं, जो वेद शास्त्र की मर्यादा मानने वाले हैं, स्वधर्म - पालन में जिनकी निष्ठा है, उन्हीं के कल्याण के लिये भगवान् का अवतार होता है ।
यदि साकार रूप में भगवान् न आयें तो जगत् की व्यवस्था नहीं कर सकते । जो जैसी चीज होती है उसी रूप में उसकी व्यवस्था हो सकती है। जैसे हम यहाँ बैठे हैं, आप लोगों ने हमारे सामने लाउड स्पीकर लाकर रख दिया तो यदि हम मौन बैठे रहे तो आपको क्या लाभ होगा। निराकार का ऐसा ही स्वरूप है कि हम सर्वथा निश्चेष्ट मौन बैठे रहे ।
हमारे मौन बैठे रहने से आप लोगों को क्या लाभ हो सकता है ? निराकार भगवान् से कोई लाभ नहीं होता, जब तक साकार रूप में न आयें । जो बात जैसी है, हम वैसी हो कहते हैं। हमें आप लोगों को वेद-शास्त्र के सिद्धान्तों को ही बताना है, अपनी तरफ से कोई बात नहीं कहनी है | हमको स्पष्ट रूप से सिद्धान्त का विवेचन करते हैं। इसकी हमें परवाह नहीं कि इसको सुनकर कौन प्रसन्न होगा, कौन नाराज होगा।
(https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah)
हमें न किसी का रञ्जन करना है और न किसी को प्रसन्न करने के लिये कुछ कहना है । निराकारवादियों हम पूछते हैं — वैसे तो हम भी निराकार को मानते हैं परन्तु जो केवल निराकार को मानते हैं और साकार को नहीं मानते, ऐसे ही लोगों को निराकारवादी कहा जाता है, ऐसे ही लोगों से हम पूछते हैं कि क्या लकड़ी के चैले में जो निराकार अग्नि है उससे क्या कोई लाभ उठाया जा सकता है ? निराकार अग्नि से कोई रोटी बनाकर
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ८६*
_भगवान का भजन अवश्य करो--मन लगे या न लगे_
दुष्ट चित्त से, मलिन चित्त से भी भगवान् का स्मरण किया जाय तो भी वे पापों का नाश कर देते हैं, जैसे कि बिना इच्छा के भी यदि अग्नि को छू लिया जाय तो भी वह जला ही देती है। भगवान् में प्रेम बनाना तो कठिन है क्योंकि अनेक जन्मों का बिगड़ा हुआ मन है, सहसा भजन के लिए बैठो अवश्य । मन भागता है तो भागने दों, पर तुम उसके साथ मत उठकर भागने लगो। भजन करने बैठो और मन बाहर जाय तो चिन्ता नहीं, वे मन के ही माला फेरते बैठे रहो - ऐसा नहीं कि मन हटा और तुम उठ खड़े हुए। धीरे-धीरे मन भी लगने लगेगा, घबराना नहीं चाहिये । परन्तु एक बात अवश्य ध्यान देने की है कि भगवान् का भजन तो करो, पर पाप से अवश्य बचते रहो। ऐसा मत सोचो कि भगवान के भजन से पाप कट ही जायेगा तो क्यों न थोड़ा और कर ले। यदि पाप करने लगोगे तो फिर पाप ही तुम्हे भगवान के भजन से भी हटा देंगे - यह भी निश्चय रखो।
*उपदेश ८७*
_'ज्ञान से भगवान् के दर्शन का भाव रखना ठोक है या प्रत्यक्ष का ?'_
यह दोनों प्रकार से होता है। जिस प्रकार से वे सामने आयें, जिस रूप में वे सामने आये, उसी रूप में देखो, हठ नहीं करना चाहिये । साकार रूप में आयें, तो उसी रूप में देखो और निराकार रूप में रहें तो वैसी ही निष्ठा बना लो । परन्तु नित्य के अपने अभ्यास के लिये एक आधार बनाकर नियम बना लेना चाहिये। साकार में वृत्ति टिकने का आधार स्पष्ट ही है। निराकार में निष्ठा करनी हो तो मन को नेत्र बनाकर देखना चाहिये । यह अवश्य है कि नियम बना लेना चाहिये । अभ्यास करते-करते, ध्यान करते-करते, इष्टदेव में प्रेम बढ़ जाता है और जहाँ प्रेम बढ़ा कि इष्ट का साक्षात् हो जाता है।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ८५*
सुख चाहते हो तो सुख-सागर की ओर चलो
जो वस्तु जहाँ होती है वहीं से वह प्राप्त की जा सकती है। धन चाहते हो तो धनिकों के पास मिलेगा, विद्या चाहते हो तो विद्वान् के पास जाना होगा। यदि हीरा-मोती खरीदना है तो सराफा में जाने से मिलेगा, साग के बाजार में ढूंढ़ने से हीरा नहीं मिलेगा चाहे जितना परिश्रम करो। इसी प्रकार सुख-शान्ति चाहते हो तो सुख-स्वरूप व शान्ति स्वरूप परमात्मा के पास जाने से ही सुख-शान्ति की प्राप्ति हो सकती है। इधर-उधर चाहे जितना सिर पीटते रहो, संसार में चाहे जितना परिश्रम करो, सुख-शान्ति से भेंट न होगी।
जितना-जितना संसार में परिश्रम करके, धनार्जन करके या मान प्रतिष्ठा प्राप्त करके सुख शान्ति प्राप्त करने के लिए करोगे, उतना-उतना दुख और अशान्ति ही हाथ लगेगी। सुख मान लेना तो दूसरी बात है - मान लो कि अमुक वस्तु मिल जाय तो मैं सुखी हो जाऊँगा; और वह वस्तु मिल गई तो ऐसा मानो कि मैं सुखी हो गया । इस प्रकार मान लेना तो दूसरी बात है। परन्तु विचार करो तो यहाँ की किसी भी वस्तु में न सुख है, न शान्ति है।
संसार की चकाचौंध में पड़कर अनन्त आनन्द स्वरूप परमात्मा को भूल गये हो। ईश्वर के विमुख होने से ही दुःख आया है, और वह दुःख उसी के सामने से जायगा। संसार की बाहरी चीजों में इतना भूल गये हो कि स्वयं अपने सम्बन्ध में ही भ्रम हो गया है— यही पता नहीं है कि हम हैं कौन !
जो इतना बावला हो गया हो,कि स्वयं को भूल गया हो,अपने ही स्वरूप को न पहचान पाता हो, उस पागल को क्या कहा जाय । वह तो ऐसा कर ही सकता है कि प्रकाश पाने की इच्छा से किसी अँधेरी गुफा में घुस जाय । संसारी पदार्थों से सुख-शान्ति की इच्छा करना इसी प्रकार है जैसे प्रकाश की इच्छा वाले का अँधेरी गुफा में प्रवेश करना।
सुख चाहते हो तो सुख-सागर जो परमात्मा है उसकी ओर चलो। परमात्मा की ओर चलोगे तभी सुख-शान्ति मिलेगी और लौकिक-पारलौकिक ऐश्वर्य भी मिलेगा । जिस प्रकार प्रकाश से विमुख होने पर अँधकार घेर लेता है, वैसे ही परमात्मा से विमुख रहोगे तो दुःख और विपत्तियाँ घेर लेंगी।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
*अनंतश्री विभूषितश्री ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग के १०८ उपदेश*
*उपदेश - ८३*
_अच्छे कार्यों को जल्दी करो_
संसार का अनुभव जीव अनेक जन्मों से करता चला आ रहा है। संसार की ओर उसकी प्रवृत्ति स्वाभाविक हो गई है। इसको संसार से हटाकर परमात्मा की ओर लगाने में ही प्रयत्न करना है। पुरुषार्थ वास्तव में मन को संसार से रोकने के लिए करना है। भगवान का भजन-पूजन, चिंतन-कथन आदि होता रहे, इसी में मन घूमे तो कुछ समय में संसार से स्वतः हट जायगा।
व्यवहार में यह नीति रखनी चाहिये कि अच्छे कर्मों को, भगवत्संबन्धी कार्यों को तो जल्दी से जल्दी पूरा करने की कोशिश रहे और यदि कोई बुरा संकल्प उठे तो उसको उसी समय टालना चाहिये कि कल कर लेंगे या परसों कर लेंगे-इस प्रकार बराबर उसे टालते रहना चाहिये।
*उपदेश ८४*
_भगवान् से लाभ उठाना चाहते हो तो उपासना करके उन्हें एक देश में प्रकट करो_
व्यापक निराकार भगवत्सत्ता से कोई कार्य नहीं हो सकता, वह तो साक्षी मात्र है। वह जब माया का सहारा लेकर एक देश में आती है तभी माया के त्रिगुणात्मक व्यवहारिक जगत् में कुछ कार्य करती है। जैसे निराकार अग्नि काष्ठ में सर्वत्र व्यापक होते हुए उस काष्ठ को नहीं जलाती और न उससे कुछ कार्य ही लिया जा सकता है। किन्तु जब उसे घर्षण करके काष्ठ को भी जला सकती है और इच्छानुसार उससे कार्य लिया जा सकता है। इसी प्रकार व्यापक भगवत्सत्ता जब उपासना द्वारा एक- देश में प्रकट की जाती है तभी वह व्यवहारोपयोगी हो सकती है।
उपासना ही ऐसा सोपान (सीढ़ी) है जिससे भक्त भगवान के पास पहुँचता है और भगवान् भक्त के पास आते हैं। उपासना ही के द्वारा सर्वत्र चराचर में एक-रस रमी हुई भगवान् की सत्ता एक देश में प्रकट होकर भक्त की इच्छानुसार कार्य करती है। निर्गुण निराकार सत्ता जब सगुण साकार होती है तभी कुछ व्यावहारिक कार्य होते हैं। इसलिए भगवान से लाभ उठाना चाहते हो तो उपासना करके उन्हें अपने हृदय में या बाहर कहीं भी प्रकट करो। एक बार भगवान का उद्घाटन हृदय में हो जाय तो फिर जन्म की सारी गरीबी मिट जायगी।
--
हर हर शंकर 💐🚩
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
https://www.instagram.com/shrivaidikbrahmanah
