1 012
Подписчики
Нет данных24 часа
-47 дней
-2830 дней
Архив постов
1 011
अपने पाठ्यक्रम के हर भाग की सामग्री का एक एक स्रोत अपनी अध्ययन टेबल पर रखा जाए और फिर उस सामग्री को उतनी बार पढ़ा जाएँ कि याद भी न रहे कि कितनी बार पढ़ा है , तत्पश्चात् पुराने पेपर की एक - दो पुस्तकें पास रखें और उसके हर एक सवाल पर विश्लेषणात्मक अभ्यास किया जाएँ , और यह दोनों कार्य पूर्ण सिद्दत से किए जाएँ तो एक स्टूडेंट को सफलता से कोई दूर नहीं कर सकता।
आजकल बाजारू व्यावसायिक विक्रेताओं ( टेस्ट सीरीज संचालक । तथाकथित लेखक वर्ग ) ने इस पीढ़ी के अभ्यर्थियों को डराकर , उन पर दबाव बनाकर अपने उत्पाद ख़रीदने का अच्छा ख़ासा बल बना रखा है।
जहां लेखक लोग डराने के तरीक़े के रूप में किसी परीक्षा में आये हुए 2-5% अत्यंत टफ क़िस्म के रेयर सवालों का सहारा लेते है , वहीं टेस्ट संचालक बेबुनियादी सवाल बनाकर डरा देते है। ये दोनों ही वर्ग अभ्यर्थी को अहसास करवाते है कि आप हमारा उत्पाद ख़रीदेंगे तो ही आप चयन की दौड़ में आयेंगे और देखते ही देखते अभ्यर्थी मजबूरन उसका ग्राहक बन ही जाता है।
जबकि असलियत यह है कि चयन में ऐसे रेयर सवालों और बेबुनियादी सवालों का कोई योगदान नहीं होता , क्योंकि ये पूरे पेपर में 5-10% होते है, 90% पेपर सामान्य पैटर्न पर होता है , और मेरिट 70% क्रॉस करती नहीं है । इसलिए सजग बनें और ऐसे बाजारू लोगों को पहचाने ।
किसी भी व्यक्ति को ये लेख बुरा लगें तो उन्हीं के लिए लिखा गया है और अगर किसी स्टूडेंट को बुरा लगें तो इस लेख को इग्नोर करें और किसी स्टूडेंट को ठीक लगें तो अनुसरण कर लीजिए , कुछ ही दिनों में फ़ायदा देखने को मिलेगा और आत्मविश्वास भी बढ़ेगा ।
✍️ डॉ गणपत सिंह राजपुरोहित
1 011
कोई दिल से आपका अपना होता है, कोई मजबूरीवश होता है; कोई इसलिए आपका अनुसरण करता है कि उसे आप जैसा बनना होता है, औऱ कोई इसलिए कि आप ग़लती करो, औऱ वो आप पर प्रहार करें; कोई दिल से आपसे जुड़ा हुआ है, औऱ कई स्वार्थसिद्धि के ख़ातिर; कोई आपका शुभचिंतक होता है, औऱ कोई शुभचिंतक बना हुआ होता है; कोई मन से आपका होता है, कोई मस्तिष्क से आपका होता है; कोई खुला विरोधी होता है, उसका सम्मान करना चाहिए, कोई छुपा होता है, उसको प्रेम औऱ स्नेह देना चाहिए।
अतः जरूरत है हमें दोनों श्रेणियों को जानने की औऱ उनको पहचानने की कि कौन वास्तविक है, और कौन वास्तविक बना हुआ है...औऱ यह आत्मज्ञान स्वयं तक ही रखना चाहिए, प्रकट नहीं करना चाहिए....❣️
✍️ Dr.गणपत सिंह राजपुरोहित
1 011
Repost from Dr Ganpat Singh Rajpurohit
अपने पाठ्यक्रम के हर भाग की सामग्री का एक एक स्रोत अपनी अध्ययन टेबल पर रखा जाए और फिर उस सामग्री को उतनी बार पढ़ा जाएँ कि याद भी न रहे कि कितनी बार पढ़ा है , तत्पश्चात् पुराने पेपर की एक - दो पुस्तकें पास रखें और उसके हर एक सवाल पर विश्लेषणात्मक अभ्यास किया जाएँ , और यह दोनों कार्य पूर्ण सिद्दत से किए जाएँ तो एक स्टूडेंट को सफलता से कोई दूर नहीं कर सकता।
आजकल बाजारू व्यावसायिक विक्रेताओं ( टेस्ट सीरीज संचालक । तथाकथित लेखक वर्ग ) ने इस पीढ़ी के अभ्यर्थियों को डराकर , उन पर दबाव बनाकर अपने उत्पाद ख़रीदने का अच्छा ख़ासा बल बना रखा है।
जहां लेखक लोग डराने के तरीक़े के रूप में किसी परीक्षा में आये हुए 2-5% अत्यंत टफ क़िस्म के रेयर सवालों का सहारा लेते है , वहीं टेस्ट संचालक बेबुनियादी सवाल बनाकर डरा देते है। ये दोनों ही वर्ग अभ्यर्थी को अहसास करवाते है कि आप हमारा उत्पाद ख़रीदेंगे तो ही आप चयन की दौड़ में आयेंगे और देखते ही देखते अभ्यर्थी मजबूरन उसका ग्राहक बन ही जाता है।
जबकि असलियत यह है कि चयन में ऐसे रेयर सवालों और बेबुनियादी सवालों का कोई योगदान नहीं होता , क्योंकि ये पूरे पेपर में 5-10% होते है, 90% पेपर सामान्य पैटर्न पर होता है , और मेरिट 70% क्रॉस करती नहीं है । इसलिए सजग बनें और ऐसे बाजारू लोगों को पहचाने ।
किसी भी व्यक्ति को ये लेख बुरा लगें तो उन्हीं के लिए लिखा गया है और अगर किसी स्टूडेंट को बुरा लगें तो इस लेख को इग्नोर करें और किसी स्टूडेंट को ठीक लगें तो अनुसरण कर लीजिए , कुछ ही दिनों में फ़ायदा देखने को मिलेगा और आत्मविश्वास भी बढ़ेगा ।
✍️ डॉ गणपत सिंह राजपुरोहित
