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ना घर खरीद पाया, ना बाजार खरीद पाया...
तेरे गला पड़ा है खाली, ना हार खरीद पाया..
सोचा था सजा दूँगा तेरे दामन को सितारों से मैं...
मैं अपनी किस्मत का एक सितारा ना खरीद पाया...
दुनिया की भीड़ में बस सुकून ढूँढता रहा...
ना खुद को सुकून दे सका, ना तेरा करार खरीद पाया...
हाथ खाली है मगर दिल में उमड़ता है प्यार का दरिया है...
अफ़सोस मैं तेरी खुशी का एक भी त्योहार ना खरीद पाया
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🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
देखना................
एक दिन तुमको तुम्हारे पिता डांटना छोड़ देंगे
एक दिन तुम्हारे पिता तुमको समझाना छोड़ देंगे
एक दिन तुम्हारे पिता यह दुनिया छोड़ देंगे
*देखना................*
"तेरे लिए बार–बार खाना गर्म नहीं करूंगी, अभी खा ले"
एक दिन तुम्हारी मां की आवाज किचन से आना बंद हो जाएगी
*देखना................*
एक दिन तुम्हारी मां का नाता तुमसे टूट जाएगा
*देखना................*
एक दिन तुम्हारी का पल्लू तुम्हारे हाथों से छूट जाएगा
*देखना................*
एक दिन तुम्हारे सर पर मां के हाथों की धोल नहीं पड़ेगी
*देखना................*
एक दिन तुम्हारी मां तुम्हारे लिए दुनिया से नहीं लड़ेगी
*देखना................*
एक दिन तुम्हारी बहन तुमसे झूठ–मूठ का लड़ना छोड़ देगी
*देखना................*
एक दिन वो राखी का कलावा हाथों से तोड़ देगी
*देखना................*
एक दिन तुम्हारा भाई, सिर्फ तुम्हारा रिश्तेदार बन जाएगा
*देखना................*
एक दिन तुम्हारा भाई, सिर्फ तीज़ त्यौहारों पर ही घर आएगा
*देखना................*
एक दिन तुम्हारा भाई, तुमको गैर लगने लगेगा
*देखना................*
एक दिन तुमको भाई को भाई से बैर लगने लगेगा
*देखना................*
एक दिन तुम अपने पिता की तस्वीर से अकेले में बाते किया करोगे
*देखना................*
एक दिन तुम अपनी मां की तस्वीर से शिकायतें किया करोगे.....
*देखना................*
यह सब होगा जब तुम्हारी खुद की अपनी दुनिया बस जाएगी,
*देखना................*
जब तुम्हारे घर में एक काले बालों वाली आएगी....................
*देखना................*
एक दिन वो तुमको तुम्हारा ही अंश देगी, और बदले में तुमसे सब छीन लेगी.........
बदले में तुमसे सब छीन लेगी.........
बदले में तुमसे सब छीन लेगी.........
जगदीश.......✒️
1 876
अब खुद ही गिर जाओ तुम, टूट कर जमीं पर ।
पत्थर मारने वाला बचपन, मोबाइल मे व्यस्त है।।
अच्छी थी, पगडंडी अपनी।
सड़कों पर तो, जाम बहुत है।।
फुर्र हो गई फुर्सत, अब तो।
सबके पास, काम बहुत है।।
नहीं जरूरत, बूढ़ों की अब।
हर बच्चा, बुद्धिमान बहुत है।।
उजड़ गए, सब बाग बगीचे।
दो गमलों में, शान बहुत है।।
मट्ठा, दही, नहीं खाते हैं।
कहते हैं, ज़ुकाम बहुत है।।
पीते हैं, जब चाय, तब कहीं।
कहते हैं, आराम बहुत है।।
बंद हो गई, चिट्ठी, पत्री।
व्हाट्सएप पर, पैगाम बहुत है।।
आदी हैं, ए.सी. के इतने।
कहते बाहर, गर्मी बहुत है।।
झुके-झुके, स्कूली बच्चे।
बस्तों में, सामान बहुत है।।
नही बचे, कोई सम्बन्धी।
अकड़,ऐंठ,अहसान बहुत है।!
सुविधाओं का, ढेर लगा है।
पर इंसान, परेशान बहुत है।।
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कोशिश भी मत करना मुझे संभालने की....
अब बे हिसाब टूटा हूँ
जी भर के बिखर जाने दो मुझे...
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काश..
बचपन के खिलौने की तरह छुपा लूं तुम्हें,
आसूं बहाऊ पांव पटकू और पा लूं तुम्हे....
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Yeh khoon, yeh wafa, yeh dua khandaan ki...
keemat bahut badi hai purane makaan ki...
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Bichad gaye toh yeh dil umr bhar lagega nahi ...
lagega lagne laga hai, magar lagega nahi ...
nahi lageya usse dekh kar, magar woh khush hai ...
main khush nahi hoon, magar dekh kar lagega nahi....
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"मेरा लहजा कैक्टस सा खुरदुरा,
तेरी बातें रात-रानी की तरह...
गम कोई देना है तो दे दे मुझे,
दिल में रख लूंगा निशानी की तरह"
