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काम संहिता🙏
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सेक्स से जुड़ी हुई प्रेम से जुड़ी हुई सभी जानकारी के लिए सन्देश भेजे जय कामदेव कामसूत्र यौन स्थानों का सच्चा गुरु ग्रंथ है। अपने यौन जीवन में विविधता लाने के तरीके खोज रहे हैं? तब आप सही जगह पर आए हैं .. !!
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स्त्री कितनी भी कामुक हो पुरुष को चाहिए योनि Vegina चाटना ,योनि को जीभ से चाटने से स्त्री पूर्णतः संतुष्ट हो जायेगी। इस तरह चाटो की lady discharge हो जाय ।। Vegina सबसे संवेदनशील अंग है शरीर का।
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प्रेम भी चौबीस घंटे नहीं किया जा सकता; वह भी जहर हो जाएगा। उसे छोड़ना भी पड़ता है। वह भी श्वास की तरह है; जैसे दिन और रात हैं; जैसे बाहर आती श्वास और भीतर जाती श्वास। दो प्रेमी कलह करके दूर हट जाते हैं। दूर हटने के कारण फिर पास आने का उपाय हो जाता है। अगर वे पास ही पास बने रहें तो ऊब जाएंगे और पास होना खतरनाक होने लगेगा। और फिर वे भागना चाहेंगे, बचना चाहेंगे। दूरी जरूरी है। फिर दूरी पास आने का आकर्षण पैदा करती है। फिर पास आना सुखद मालूम होने लगता है। अक्सर दो प्रेमी लड़ कर जैसा प्रेम करते हैं, वह प्रेम बहुत ताजा होता है। बिना लड़े प्रेम करते रहते हैं, वह बासा हो जाता है। दूरी जरूरी है पास आने की ताजगी के लिए।
मैं तुमसे कहता हूं यह संसार की
सारी विपरीत परिस्थितियों का उपयोग कर लो।
निश्चित ही यहां लोग हैं जो क्रोध दिलवा देते हैं। लेकिन
इसका मतलब साफ है, इतना ही कि तुम्हारे भीतर अभी
क्रोध है, इसलिए क्रोध दिलवा देते हैं। यहां लोग हैं जो तुम्हें
लोभ में पड़वा देते हैं। इसलिए कि तुम्हारे भीतर लोभ है। यहां
लोग हैं कि जिन्हें देखकर तुम्हारे भीतर में कामवासना जगती
है। लेकिन कामवासना भीतर है, उनका कोई कसूर नहीं।
ऐसा ही समझो कि जैसे कोई आदमी किसी कुएं में बाल्टी
डालता है, फिर पानी से भरकर बाल्टी निकल आती है। कुआं
अगर पानी से रिक्त हो, तो लाख बाल्टी डालो, पानी
भरकर नहीं आएगा। कुआं पानी से भरा होना चाहिए, तो
ही बाल्टी में भरेगा। बाल्टी पानी पैदा नहीं कर सकती।
बाल्टी कुएं में पानी भरा हो तो बाहर ला सकती है।
जब कोई तुम्हें गाली देता है तो क्रोध थोड़े ही पैदा करता
है। उसकी गाली तो बाल्टी का काम करती है, तुम्हारे
भीतर भरे क्रोध को बाहर ले आती है। जब एक सुंदर स्त्री
तुम्हारे पास से निकलती है तो वह तुम्हारे भीतर काम थोडे
ही पैदा करती है! उसकी मौजूदगी तो बाल्टी बन जाती है,
तुम्हारे भीतर भरा हुआ काम भरकर बाहर आ जाता है। अब
स्त्री से भाग जाओ तो पानी तो भीतर भरा ही रहेगा,
बाल्टियों से भाग गए। संसार छोड़ दो, तो क्रोध की
परिस्थिति न आएगी, लोभ की परिस्थिति न आएगी,
लेकिन तुम बदले थोड़े ही!
बदलाहट इतनी सस्ती होती तो सभी पलायनवादी, सभी
एस्केपिस्ट महात्मा हो गए होते। और तुम्हारे सौ महात्माओं
में निन्यानबे पलायनवादी हैं। उनसे जरा सावधान रहना। वे
खुद भी भाग गए हैं, वे तुमको भी भागने का ही उपदेश देंगे।
मैं भागने के जरा भी पक्ष में नहीं हूं क्योंकि मुझे दिखायी
पड़ता है, इस संसार में रहकर ही विकास होता है। इस संसार में
पड़ती रोज की चोट ही तुम्हें जगा दे तो जग जाओ, और कोई
उपाय नहीं। निश्चित ही कष्टपूर्ण है यह बात, लेकिन बस
यही एक उपाय है, और कोई उपाय ही नहीं। यही एक मार्ग है,
और कोई शार्टकट नहीं है। कठिन है, दुस्तर है, पीड़ा होती है,
बहुत बार बहुत कठिनाइयां खड़ी होती हैं, मगर वे सभी
कठिनाइयां, अगर समझ हो, सहयोगी हो जाती हैं। वे सभी
कठिनाइयां सीढ़ियां बन जाती हैं।
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इसलिए अपने मन में सेक्स के विरुद्ध एक भी विचार लेकर मत चलो, अन्यथा तुम कभी भी उसके पार न जा सकोगे। वे लोग जो सेक्स का अतिक्रमण कर गए ये वही लोग थे जिन्होंने उसे सहज स्वाभाविक रूप में स्वीकार किया। यह बहुत कठिन है। मैं जानता हूं क्योंकि तुमने जिस समाज में जन्म लिया है। वह सेक्स के बारे में इस तरह या उस तरह से मानसिक रूप से विकारग्रस्त है। लेकिन यह मानसिक विक्षिप्तता सभी जगह एक ही सी है। इस मानसिक दशा से बाहर निकलना बहुत कठिन है, लेकिन यदि तुम थोड़े से सजग हो, तो तुम उससे बाहर आ सकते हो।
सेक्स सुंदर है। सेक्स अपने आप में एक स्वाभाविक लयबद्ध घटना है। यह तब घटती है, जब शिशुगर्भ में आने के लिए तैयार होता है और यह अच्छा है कि ऐसा होता है, अन्यथा जीवन का अस्तित्व ही न होता। जीवन का अस्तित्व सेक्स के ही द्वारा है, सेक्स उसका माध्यम है। यदि तुम जीवन को समझते हो, यदि तुम जीवन को प्रेम करते हो, तो तुम उसमें प्रसन्नता का अनुभव करोगे,
इसलिए जब कभी भी तुम किसी भी कार्य को आधे— अधूरे हृदय से करते हो, तो वह लम्बे समय तक कहीं अटका रहता है। यदि तुम मेज पर बैठे हुए आधे— अधूरे हृदय से भोजन कर रहे हो, और तुम्हारी भूख बनी ही रहती है तो तुम पूरे ही दिन भोजन के ही बारे में सोचते रहोगे। तुम उपवास करने की कोशिश कर सकते हो और सोचते रहोगे। तुम उपवास रखने की कोशिश कर सकते हो और तुम देखोगे कि तुम निरंतर भोजन के बारे में ही सोचते रहोगे। लेकिन तुमने भरपेट तृप्ति से भोजन किया है, और जब मैं कहता हूं भरपेट तृप्ति से तो मेरा अर्थ नहीं है कि तुमने डूंस— ठूंस कर भोजन किया है, सम्यक भोजन करना एक कला है।
तंत्र कहता है—कि किसी भी स्त्री या किसी भी पुरुष से प्रेम करने के पूर्व पहले प्रार्थना करो क्योंकि वहां दो ऊर्जाओं का दिव्य मिलन होने जा रहा है। परमात्मा तुम्हारे चारों ओर ही होगा। जहां भी दो प्रेमी होते हैं, वहां परमात्मा होता ही है। जहां कहीं भी दो प्रेमियों की ऊर्जाएं मिल रही हैं। एक दूसरे में समाहित हो रही हैं, वहां जीवन और जीवंतता अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में है और परमात्मा चारों ओर से घेरे हुए है। चर्च खाली पडे हैं और जिन कक्षों में प्रेम किया जा रहा है, वे सभी परमात्मा से भरे हुए हैं। यदि तुमने प्रेम का स्वाद उस तरह से लिया है जिस तरह से उसका स्वाद लेने को तंत्र कहता है यदि तुम प्रेम करने की वह विधि जानते हो जिसे जानने की बात ताओ कहता है तो बयालिस वर्ष की आयु तक पहुंचने पर प्रेम स्वयं ही अपने आप तिरोहित होना शुरू हो जाता है। और तुम उसे गुडबाई कह देते हो, क्योंकि तुम अहोभाव और उसके प्रति कृतज्ञता से भरे हुए हो। वह तुम्हारे लिए परम प्रसन्नता और परमानंद बन कर रहा है, इसीलिए तुम उसे गुडबाई कहते हो।
और बयालीस वर्ष की आयु ध्यान के लिए बिलकुल ठीक आयु है। सेक्स विसर्जित हो जाता है, वह अतिरेक से बहती हुई ऊर्जा अब वहां नहीं है। कोई भी ऐसा व्यक्ति कहीं अधिक शांत हो जाता है। वासना चली जाती है, करुणा का जन्म होता है। अब वहां वह ज्वर और ज्वार नहीं अब कोई भी किसी दूसरे में रुचि नहीं ले रहा है। सेक्स के विलुप्त होने के साथ ही दूसरा व्यक्ति अब केंद्र में रहा ही नहीं। अब वह अपने स्वयं के स्रोत की ओर वापस आना शुरू कर देता है। वापस लौटने की यात्रा का शुभारंभ हो जाता है।
सेक्स का अतिक्रमण तुम्हारे किन्हीं प्रयासों के द्वारा नहीं होता। वह तभी घटता है यदि तुम समग्रता से जिये हो। इसलिए मेरा सुझाव है कि सभी जीवन— विरोधी व्यवहार छोड़ कर वास्तविक सच्चाई को स्वीकार करो। सेक्स है, इसलिए तुम उसे छोड़ने वाले होते कौन हो? और है कौन, जो उसे छोड़ने का प्रयास कर रहा है? वह केवल अहंकार है। स्मरण रहे सेक्स ही अहंकार के लिए सबसे बड़ी समस्या उत्पन्न करता है।
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सुंदरता शून्य है अगर उसकी तारीफ न हो । पुरुष को हमेशा ईश्वर की सबसे सुंदर रचना स्त्री की सौंदर्य का तारीफ करना चाहिए और स्त्री को पुरुष की तारीफ करना चाहिए ।
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ऐसा प्यार भी करो !
अभी घर गए होगे सब , तुम्हारी पत्नी खाना बना रही होगी , पीछे से चुपके से उसको अपनी बाहों में भर लो वो कसमसाएगी ,इतराएगी, शर्माएगी ये उसका प्यार है फिर तुम उसके गर्दन , गाल,होठ को चूमना शुरू कर दो, धीरे से स् त न दबाओ और नाभी के पास हाथ फेर दो ।
फिर अपनी तरफ घुमाओ उसे और होठों को चूस लो , देखना पत्नी कितना खुश हो जाएगी ,उसके चेहरे प्यार से गुलाबी मुस्कान लाएगी संतुष्ट हो जाएगी।
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!!!! बात लंम्बाई की नहीं,,,,,,,,,,,
किसी पुरुष के प्राइवेट पार्ट की लंम्बाई दो इंच से ज्यादा है तो वो किसी भी महिला को संतुष्ट करने और पोटेंसी सही होने से प्रेग्नेंट करने में सझम है। दरअसल महिला के प्राईवेट पार्ट की गहराई,, छै,, इंच होती है। इससे ज्यादा शायद किसी की होती होगी।जब कोई गाइनेकोलॉजिस्ट महिला के प्राईवेट पार्ट से संम्बधित कोई जांच करता है तो अपने हाथ में दस्ताने लगाकर महिला के प्राईवेट पार्ट के आंतरिक छोर तक छूता है ताकि स्थित का सही आंकलन कर सके। ऐसे में यह समझने वाली बात है कि किसी महिला या पुरुष की उंगली की लंम्बाई चार या पांच इंच से ज्यादा नहीं होगी। एक सच यह भी है कि महिला के प्राईवेट पार्ट की कुल और अधितम गहराई ,,छै,, इंच से पहले एक तिहाई ,,दो इंच,, हिस्से में ही संवेदना होती है। आगे का बाक़ी हिस्सा संवेदनविहीन होते हैं। ऐसे में अगर पुरुष के प्राइवेट पार्ट की लंम्बाई,, दो,, इंच से ज्यादा है तो लंम्बाई की वजह से असंतुष्टि का सबाल ही नहीं उठता। जैसे किसी धनुर्धर की पहचान उसके अचूक निशाने से होती है न कि बाणों की लंम्बाई से। कमोबेश यही स्थिति पुरुष प्राइवेट पार्ट पर भी लागू होती है।
जहां तक पत्नी की असंतुष्टि की बात है तो यह कुछ और वज़ह हो सकती हैं।उन पर ध्यान देकर सुधार करने की जरूरत होगी।
,,, फोरप्ले की टाइमिंग बढ़ायें।
,,,, पत्नी से उनकी पसंद और ना पसंद को पूंछे। उनसे खुल कर बात करे।
,,,अगर आप पत्नी से पहले क्लाइमेक्स पर पहुंच जाते हैं तो उन्हें दूसरे तरीके से संतुष्ट करें।
,,,यह भी देखें कि वो घर का या दफ्तर का काम करते हुए थक तो नहीं जाती हैं और इस वजह से सहवास टालने की कोशिश तो नहीं करती हैं। तो कुछ और उपाय अपनाएं फिर सहवास के लिए राजी करें। जैसे उन्हें आराम देना या उनके काम में हाथ बंटाना आदि आदि। क्यों कि सहवास का मतलब है दोनों की बराबर भूमिका।
,,,डा, प्रकाश कोठारी के सौजन्य से,,,
,,, मालूम हुआ, कह दिया और अन्यथा ना लें।
,, सिर्फ और सिर्फ लेख पर ध्यान दें। उसके भाव और भावनाओं को समझें।
,,, किसी अशोभनीय टिप्पणी और तर्क वितर्क और कुतर्क कि कोई जरुरत नहीं और ना ही कोई वजह।
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स्तनों को छूने, सहलाने, दबाने से जागती है कामोत्तेजना
जिस प्रकार पुरुषों में उत्तेजक दृश्यों को देखकर, पत्र-पत्रिकाओं में मॉडलों या अपनी किसी पसंदीदा अभिनेत्री की तस्वीर को देखकर, किसी युवती को कम कपड़ों में देखकर, प्रेमी जोड़ों की हरकतों को देखकर या सेक्सुअल फैंटेसी के बारे में सोचकर, कामोत्तेजना उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार स्त्रियों के स्तनों को छूने, सहलाने, दबाने,मसलने और उनके निपल्स को चूसने से उनकी कामेच्छा जाग्रत हो जाती है और वे संभोग करने के लिए सहर्ष तैयार हो जाती हैं।
सेक्स के दौरान पुरुष द्वारा स्त्री के स्तनों को छूना,सहलाना,दबाना, मसलना, निप्पल को चूसना, दांतों से धीरे-धीरे काटना, उस पर अपना चेहरा रगड़ना प्यार और सेक्स का सर्वाधिक आनंद प्राप्त करने का जरिया होता है। निप्पल को चाटने और चूसने का काम बारी-बारी से करें।पुरुषों द्वारा इन क्रियाओं के करने से स्त्री को आनंद और उत्तेजना की अनुभूति होती है। स्त्री के स्तनों को दबाने, मसलने, चूसने और सहलाने से उनके भग में आनंददायक थिरकन का एहसास होता है, जिसके कारण उनकी कामोत्तेजना बढ़ने लगती है और वे सेक्स करने के लिए तैयार हो जाती है और संतुष्टि प्राप्त करती हैं।
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*🙏....प्रात:वंदन 😊🙏*
✍✍.❤️❤️
*स्त्री का जिस्म एक पर्यटक स्थल है,*
*कही सुरज की लाली जैसा चेहरा तो कही घने बादलो जैसे बाल तो कही पर्वत जैसे दुधारू स्तन तो कही घाटी के चीरे जैसी योनी जिस पर कही चिकनापन तो कही घना जंगल और उसके ऊपर औस की बूंदे जैसी कामरस तो कही प्राकृतिक गुफा जैसी नरम चूतड़..............*
*❤️💕💋सेक्सी सुप्रभात💋💕❤️*
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जितने सभ्य समाज है, उतनी वेश्याएँ हैं !
कभी आपने सोचा है कि
वेश्याएँ कैसे पैदा हो गयीं ?
किसी आदिवासी गाँव में जा कर
वेश्या की खोज सकते हैं आप !
आज भी बस्तर के गाँव में वेश्या खोजनी मुश्किल है !
और कोई कल्पना में भी मानने को राज़ी नहीं होगा कि
स्त्रियाँ ऐसी भी हो सकती हैं !
जो अपनी इज्जत बेचती हों !
अपना सम्भोग बेचती हों !
लेकिन सभ्य आदमी जितना सभ्य होता चला गया !
उतनी वेश्याएँ बढ़ती चली गयी — क्यों ?
यह फूलों को खाने की कोशिश शुरू हुई है !
और आदमी की ज़िन्दगी में कितने विकृत रूप से
सेक्स ने जगह बनायी है,
इसका अगर हम हिसाब लगाने चलेंगे तो
हैरान रह जायेंगे कि आदमी को क्या हुआ है ?
इसका जिम्मा किस पर, किन लोगों पर !
इसका जिम्मा उन लोगों पर है,
जिन्होंने आदमी को —
सेक्स को समझना नहीं लड़ना सिखाया !
जिन्होंने सप्रेशन सिखाया है !
जिन्होंने दमन सिखाया है !
दमन के कारण सेक्स की शक्ति
जगह-जगह से फूट कर
गलत रास्तों से बहनी शुरू हो गयी है !
हमारा सारा समाज रूग्ण और पीड़ित हो गया है !
इस रूग्ण समाज को अगर बदलना है तो हमें
यह स्वीकार कर लेना होगा कि काम का आकर्षण है !
क्यों है काम का आकर्षण ?
काम के आकर्षण का जो बुनियादी आधार है,
उस आधार को अगर हम पकड़ लें तो मनुष्य को
हम काम के जगत से उपर उठा सकते है !
और मनुष्य निश्चित काम के जगत से ऊपर उठ जाये,
तो ही राम का जगत शुरू होता है !
खजुराहो के मन्दिरों के सामने मैं खड़ा था !
दस-पाँच मित्रों को ले कर मैं वहाँ गया था ।
खजुराहो के मन्दिर के चारों तरफ की दीवाल पर
जो मैथुन चित्र है, काम-वासनाओं की मूर्तियाँ हैं १
मेरे मित्र कहने लगे कि
मन्दिर के चारों तरफ यह क्या है ?
मैंने उनसे कहा,
जिन्होंने यह मन्दिर बनाये थे वे बड़े समझदार थे !
उनकी मान्यता थी कि
जीवन की बाहर की परिधि पर काम है !
और जो लोग अभी काम से उलझे है,
उनको मन्दिर में भीतर प्रवेश का कोई हक नहीं है !
फिर मैंने अपने मित्र से कहा भीतर चलें,
फिर उन्हें भीतर ले कर गया !
वहाँ तो कोई काम प्रतिमा न थी !
वहाँ भगवान की मूर्ति थी !
वे कहने लगे कि भीतर कोई प्रतिमा नहीं है !
मैंने उनसे कहा कि
जीवन की बाहर की परिधि काम वासना है !
जीवन की बाहर की परिधि दीवाल पर काम-वासना है !
जीवन के भीतर भगवान का मन्दिर है !
लेकिन जो अभी कामवासना में उलझे है,
वे भगवान के मन्दिर में
प्रवेश के अधिकारी नहीं हो सकते हैं !
उन्हें अभी बहार की दिवाल का ही चक्कर लगाना पड़ेगा !
जिन लोगों ने ये मन्दिर बनवाये थे,
वे बड़े समझदार थे १
यह मन्दिर एक ‘’मेडिटेशन मन्दिर’’ था !
यह मन्दिर एक ध्यान का केन्द्र था !
जो लोग आते थे, उनसे वे कहते थे !
बाहर पहले मैथुन के ऊपर ध्यान करो,
पहले सेक्स को समझो और जब
सेक्स को पूरी तरह समझ जाओ और
तुम पाओ कि मन उससे मुक्त हो गया है,
तब तुम भीतर आ जाना !
फिर भीतर भगवान से मिलना हो सकता है !
लेकिन धर्म के नाम पर हमने
सेक्स को समझने की स्थिति पैदा नहीं की,
सेक्स की शत्रुता पैदा कर दी !
सेक्स को समझो मत, आँख बन्द कर लो और
घुस जाओ भगवान के मन्दिर में आँखें बन्द कर के !
आँखें बन्द कर रके
कभी कोई भगवान के मन्दिर में जा सका है !
और आँखें बन्द कर के
अगर आप भगवान के मन्दिर में पहुँच भी गये तो
बन्द आँखों में आपको भगवान दिखायी नहीं पड़ेंगे !
जिससे आप भाग कर आये है,
वही दिखायी पड़ता रहेगा !
आप उसी से बन्धे रह जायेंगे !
ओशो - सम्भोग से समाधि की और — 2
सम्भोग : अहं-शून्यता की झलक — (पोस्ट 22)
पोस्ट - 222/222
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आप की पार्टनर फोरप्ले में ज्यादा वक्त चाहती है...
सेक्स के तीन चरण होते हैं :
फोरप्ले, (सहवास) और आफ्टरप्ले । ऋषि वात्स्यायन ने अपनी किताब कामसूत्र में फोरप्ले, और आफ्टरप्ले तीनों पर एक-एक चैप्टर लिखा है । यानी तीनों को बराबर महत्व दिया है। हालांकि आजकल के जमाने में पुरुषों की रुचि फोरप्ले और आफ्टरप्ले में कम और प्ले में ज्यादा होती है । दूसरी तरफ महिलाओं की रुचि आज भी फोरप्ले में ही ज्यादा है ।
फोरप्ले ज्यादा होने के कई फायदे हैं । ज्यादा फोरप्ले करने से स्त्री की उत्तेजना में इजाफा होता है । अगर कोई स्त्री फोरप्ले में ज्यादा वक्त बिताएगी तो सहवास की शुरुआत में या उसके दौरान होने वाले दर्द से उसे छुटकारा मिल सकता है और आनंद में भी इजाफा हो सकता है । अपने देश में ज्यादातर पुरुष फोरप्ले में जितना चाहिए, उतना वक्त नहीं बिताते और जल्दबाजी करके सहवास करने लगते हैं । इससे स्त्रियों को दर्द होता है और इसके बाद सहवास में उनकी दिलचस्पी कम हो जाती है । अगर हर पुरुष फोरप्ले में ज्यादा समय बिताने लगे तो स्त्रियों की दर्द की समस्या गायब हो जाएगी ।
कई बार फोरप्ले में ज्यादा वक्त लगाने से पुरुष के प्राइवेट पार्ट में ढीलापन आ जाता है । अगर वह फिक्र करने लगेगा कि इरेक्शन वापस आएगा या नहीं और उसका ध्यान उसी पर बना रहेगा तो उत्तेजना की संभावना कम हो जाएगी। मिसाल के तौर पर मैं आपसे सवाल पूछूं कि क्या आप सांस ले रहे हैं? यही सवाल मैं दोबारा पूछूं कि क्या आप सचमुच सांस ले रहे हैं ? पहले अहसास नहीं था, अब आपको अहसास हो गया। मतलब प्राइवेट पार्ट पर जितना ज्यादा ध्यान लगाओगे, उतना ही इरेक्शन कम आएगा । जितने बेफिक्र रहोगे, उतना ही ज्यादा आएगा ।
याद रहे, आदमी का इरेक्शन मरते दम तक कम नहीं होता, अगर वह बेफिक्र है, लेकिन अगर वह चिंता करेगा तो ऐंगज़ाइअटी उसके सेक्स रिस्पॉन्स को कम कर देगी । अगर उस दौरान दिमाग से चिंता न हटे तो पुरुष को लंबी सांसें लेनी चाहिए । कहते हैं कि इससे 50 फीसदी ऐंगज़ाइअटी अपने आप खत्म हो जाती है । लंबे समय के फोरप्ले के दौरान तनाव का आना और चले जाना आम बात है । यह किसी बीमारी का लक्षण नहीं है । तनाव का आना-जाना व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर निर्भर है । याद रखें ,एक बार नाकामयाब होने का मतलब यह नहीं है कि आप हमेशा ही नाकामयाब होंगे ।
30 से 40 मिनट बाद आप दोबारा सेक्स करे इससे आपका समयभी बढेगा और इरेक्ट भी काफी समय तक रहेगा
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#माना कि जायज नहीं था,
मेरा तुझसे इश्क करना....💞
#पर तेरी आंखों की कशिश ने,
ये गुनाह करवा ही दिया...💞
🌹🌹
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नियमित और नियंत्रित सहवास के लाभ,,,,
,,,,शरीर की केलोरी सात हजार पांच सौ बर्न
,,,, दिल की बीमारी का खतरा कम
,,,, जीवन आगे बढ़ाने में मदद
,,सिर दर्द और कई बीमारियों में लाभ
,,, गहरी नींद आती है और गहराई से आराम
,,,, त्वचा में चमक और तेज़
,,, संम्बन्ध अच्छे और संतुष्टि
,,,अच्छी कसरत
,,, दिमाग में सुंदर अहसास
,,,,,,, नियमित का मतलब एक निश्चित अंतराल जैसे दो तीन के बाद,या और कोई,पर ज्यादा दिनों का नहीं
,,,,,,,, नियंत्रित,,,,,,माने एक दिन में एक बार,,,,चार से ज्यादा कोई नहीं,हो सके तो चार नहीं, सिर्फ एक
,,,,,,,ये बस एक जानकारी है जो मालूम हुई,कह दी गई और अन्यथा ना लें
,,,,,,,लेख पर ही ध्यान दें,लेखक के लिए अशोभनीय टिप्पणी ना करें और तर्क वितर्क कुतर्क को जगह ना दें।
,,,,,, फिर भी सब अपनी मर्जी के मालिक।जो अच्छा लगे जैसा समझ आये वो करें
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नारी को छू पाना एक साधन है मूर्ख होते है वो लोग जो शरीर को छू कर बोलें कि मेने नारी को छूआ है शरीर तो एक बलात्कारी भी छू लेता है पर बात तो तब बने जब कोई पुरुष किसी नारी के ह्रदय ओर आत्मा दोनो को छू पाये,
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"प्यार यानी की सम्भोग यानी की इस सभ्य समाज में कह सकते हो अवैध संबंध"
ये करने की उम्र 40 के बाद है ,40 तक आपकी कैरियर सेट हो जाती है फिर प्रेम करो जहां आप अपने मन की बात कह सको ,जिंदगी की थकान उतार सको ।
इस उम्र तक प्रेम के लिए जगह भी रहेगा कोई शक नहीं पापा भाई का डर नहीं आदि
प्रेम शादी शुदा लोगों से करो अब कहोगे क्यों तो शादी शुदा लोग मेच्योर होते हैं तुम्हारी बातों की कद्र करेंगे सच कहेंगे रिश्ते को समझेंगे और सम्मान भी करेंगे।
क्योंकि मर्द को उसकी पत्नी और औरत को उसके पति की एहसास पसंद दिल का ख्याल रहता है उन्हे पता होता है प्रेम क्या है !!
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स्त्री का हर एक अंग महत्वपूर्ण है जब हम उसके साथ अन्तरंग क्षणों में होते हैं, तो हमें उसके हर अंग के साथ प्रेम करना चाहिए।
सबसे पहले स्त्री के क़दमो में अपना सर रखकर उसको सम्मान देना चाहिए। पुरुष जितना अधिक सम्मान स्त्री को देगा उतना अधिक प्रेम स्त्री पुरुष को लौटा देगी।
अधिकांश पुरुष सिर्फ औरत के तीन अंगों पर सबसे अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं, वो है उसके होंठ, उसके वक्ष और उसकी योनि।
इसके अलावा भी स्त्री के बहुत से अंग होते हैं जिनमे उतेजना के स्त्रोत होते हैं। जैसे स्त्री के कान और उसके पीछे का हिस्सा, स्त्री की गर्दन, स्त्री के कांख के पास वाला हिस्सा और उसके पसीने की खुशबू पुरुष में आग लगा देने वाली होती है,
इन सबको पुरुष को अपने होंठों से चूमना चाहिए,
इसके अलावा स्त्री की नाभि बहुत महत्वपूर्ण है, उसके बाद स्त्री की नितंब, दोनो हाथों से स्त्री के वक्ष और नितंबों को धीरे धीरे प्रेशर देकर मर्दन करना चाहिए।
और अंत मे स्त्री की योनि का रसपान किया जाना चाहिए, योनि रसपान के लिये कुछ सावधानियां भरती जानी चाहिए।
जैसे योनि रसपान माहवारी के दिनों से कुछ दिन छोड़कर करना चाहिए, साथ ही योनि को अच्छे से धोकर रसपान करें। योनि रसपान करते समय योनि को एक पवित्र मंदिर के समान समझना चाहिए क्योंकि स्त्री पुरुष दोनो के जननांग बहुत सम्मानीय होते हैं, इनको गलत भावना से नही देखना चाहिए।
#बावरा_मन
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संभोग करते समय जब वीर्य गिर जाता है तो तुरंत लिंग को योनि से नही निकालें । जब लिंग पूर्ण रूप से ढीला हो जाए तब निकाले और तबतक पहले की ही तरह स्त्री की होठ या निप्पल को चूमते चूसते रहो । फिर आराम से लिंग को बाहर करो स्त्री जब संतुष्ट हो जाय तब फिर एक साथ दोनो सफाई करो कुछ देर नंगे ही चिपक कर विस्तर पर लेटे रहिए बात चीत सेक्स की रोमांस की करिए ।
ऐसा नहीं की वीर्य गिरा और आप निकाल कर लिंग पोंछ लिए और खर्राटे की नींद लेना शुरू कर दिए ऐसा करने से औरत में हीनता की भाव जागती है।
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संभोग का सबसे मुख्य महत्त्वपूर्ण अंग जीभ है जहां ये टच कर ले वहीं आनंद की लहर दौड़ जाती है । जीभ से जब लिंग को चूसो तो जीभ को लिंग के ऊपरी हिस्से पर सही से घुमाओ ,कान कांख गर्दन पीठ इस सब पर जीभ का बहुत ही उत्तेजना बढ़ाने का काम करता है।
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*योनी*
वैसे इस्तेमाल में सभी योनीयां लगभग एक जैसी होती है, और उनकी सुगंध भी।
परन्तु दिखने में कोई कोई योनी इतनी चिकनी और आकर्षक होती है कि लिंग देखते ही खड़ा हो जाये।
ऐसी योनी हिंदुस्तान में मिलना बहुत मुश्किल है जो बिल्कुल गौरी होने के साथ साथ बिल्कुल चिकनी हो।
अद्बुत रचना ईश्वर की।
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“संभोग कब ?”
---ओशो
जब पुरूष संभोग करना चाहे तब नहि ! पर स्त्री संभोग करना चाहे तब ! संभोग तभी करना उचित होगा जब स्त्री आनंद कि ऊँचाई पर हो ओर वो संभोग करना चाहती हो !
ज़्यादा तर पुरुष संभोग करना तब पसंद करते हे जब वो तनाव में हो! ख़ुशी में नहि! ख़ुशी में तो वो अकेला रहना पसंद करता हे या अपने दोस्तों के साथ रहना पसंद करता हे ! और “तनाव में कभी प्रेम नहि होता !”
स्त्री को पुरूष के भीतर प्रेम को जन्म देनी वाली जनेता भी कहा जाता हे ! ओर स्त्री आनंद में अपने प्रेमी या पति के साथ रहना पसंद करेगी ! क्यूँकि स्त्री संभोग तभी करना पसंद करेगी जब वो भीतर से आनंद से भरी होंगी !
ओर “प्रेम से हि आप आनंद को जान सकते हो !”
और इसलिए कहते हे की आप प्रेम ओर संभोग आपकी आध्यात्मिक ऊँचाई से भी जो ऊपर हो उसके साथ करो ! क्यूँकि वो ही आपको
“प्रेम से परमात्मा का अनुभव करवा सकता हे!
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