Samalochan : Literature, Arts, and Ideas
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फ़्योदर दसतायेव्स्की (1821–1881) के लिए फ्रेडरिक नीत्शे ने 1889 में ‘Twilight of the Idols’ में लिखा था कि ‘वे मेरे जीवन में मिलने वाले सबसे सुखद आकस्मिक उपहारों में से एक हैं.’ कहना न होगा कि उनके सभी पाठकों के लिए यह आज भी सच है.
विजयशंकर चतुर्वेदी का यह आलेख गम्भीरता से दसतायेव्स्की के कुछ प्रसिद्ध उपन्यासों की विवेचना करता है और उनके अंतःसूत्रों को सुलझाता चलता है. यह हमें दसतायेव्स्की के उपन्यासों के तलघर में आमंत्रित करता है. जो कहीं न कहीं हमारा ही मनघर है.
प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/fyodor-dostoevsky/
समालोचन पर प्रकाशित ख़ालिद जावेद पर अशअर नज्मी के लेख की चर्चा अमिताभ बागची ने ‘Scroll.in’ पर की है.
https://scroll.in/article/1095330/shake-off-the-aura-novelist-amitabha-bagchi-on-originality-and-borrowing-in-literary-writing
प्रख्यात गायिका डॉली पार्टन (19 जनवरी 1946 – 25 अगस्त 2026) का 80 वर्ष की आयु में गत 25 अगस्त को निधन हो गया. यह आलेख उनके महत्व, योगदान और उनकी गायकी की विशेषताओं पर बारीकी से प्रकाश डालता है. हिंदी में पश्चिमी संगीत पर त्रिभुवन लगातार लिख रहे हैं. यह एक ऐसा क्षेत्र रहा है, जो हिंदी में लगभग अछूता था.
यह लेख डॉली पार्टन के प्रति एक प्रभावशाली श्रद्धांजलि भी है. प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/dolly-parton/
उर्दू में क्या शानदार कहानियाँ लिखी जा रही हैं. ‘बेधक’ और ‘मार्मिक’ जैसे शब्दों के अर्थ अशअर नज़्मी की कहानी ‘लुक्का-छिपी’ पढ़ते हुए आप पर कुछ इस तरह तारी हो जाते हैं कि आप निःशब्द हो जाते हैं.
युद्ध की पृष्ठभूमि पर वैसे तो बहुत अच्छी कहानियाँ लिखी गई हैं, लेकिन आज के बाद ‘लुक्का-छिपी’ को शामिल किए बिना वह जिल्द पूरी नहीं होगी. इसका स्वाभाविक और प्रभावशाली अनुवाद रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी ने किया है.
प्रस्तुत है कहानी.
https://samalochan.com/lukka-chhipi/
हिंदी में कुछ ही लेखक हैं जिनका गद्य भी उतना ही मोहक होता है. उनमें से अधिकतर मूलतः कवि हैं. वरिष्ठ लेखिका गगन गिल भी उन्हीं विरल रचनाकारों में हैं.
शोक से शब्द तक की यात्रा एक तरह की सभ्यतागत परिक्रमा है. महाभारत और बुद्ध से होते हुए ईरान तक. जहाँ भी शोक है, वहाँ शब्द पहुँचते हैं. करुणा और प्रेम में भीगे हुए. एक अच्छा पठन हमें भारहीन और मुक्त करता है.
प्रस्तुत है यह अंक.
https://samalochan.com/shoke-se-shabd-tak/
'मैंने ‘विवाह’ करने के लिए नहीं ‘विचार’ करने के लिए जन्म लिया है'
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‘स्त्रीबुद्ध’ श्रृंखला की ये कविताएँ थेरियों के जीवन और दर्शन के साथ लगभग ढाई हजार साल पहले के समय की भी कविताएँ हैं. बुद्ध के प्रभा और प्रभाव से जो स्त्रियाँ भिक्षुणी बनीं, उनका जीवन-स्तर ही नहीं, सामाजिक संघर्ष भी अलग-अलग था. क्या वे मुक्त हो पाईं? क्या कोई मुक्त हो पाता है? और वास्तव में मुक्ति कोई चीज़ भी है? ये सवाल भी अपनी जगह हैं.
पवन करण ‘स्त्री मुग़ल’ में मुग़लकालीन स्त्रियों को सफलतापूर्वक कविता में लिखने के बाद अब थेरियों को कुछ इस तरह समझ रहे हैं कि वे अपनी सम्पूर्णता में सामने आएँ और भाषा का सौन्दर्य भी अक्षुण्ण रहे. ज़ाहिर है, इतिवृत्तात्मक कविताओं की अपनी चुनौतियाँ होती हैं. कविताएँ पढ़ें और देखें कि किस तरह एक युग आपके सामने प्रत्यक्ष होता है और कविता उसे कैसे गढ़ती चली जाती है. प्रस्तुत है
https://samalochan.com/buddhist-theris/
‘नेमत ख़ाना’ के अंग्रेज़ी अनुवाद के लिए ‘जेसीबी प्राइज़’ (2022) से सम्मानित ख़ालिद जावेद इस समय उर्दू के शीर्ष कथाकारों में शुमार हैं. ‘मौत की किताब’, ‘नेमत ख़ाना’, ‘एक ख़ंजर पानी में’, ‘अर्सलान और बहज़ाद’ तथा ‘इक्कीस एक सौ बाईस’ उनके प्रकाशित उपन्यास हैं, जो हिंदी में भी उपलब्ध हैं.
अशअर नज़्मी उर्दू के वरिष्ठ लेखक हैं. 2021 में प्रकाशित उनके उपन्यास ‘उसने कहा था’ को उर्दू का पहला पोस्टमॉडर्न नॉवेल माना जाता है. वे दो दशकों तक भारतीय टेलीविज़न इंडस्ट्री से जुड़े रहे और उर्दू की साहित्यिक पत्रिका ‘इसबात’ के संपादक हैं.
बड़ी आलोचना बड़ी रचनाओं के बिना संभव नहीं है. ख़ालिद जावेद के सभी उपन्यासों की जिस तरह से यहाँ विवेचना की गई है, वह इन उपन्यासों के ताकत की भी परिचायक है. अशअर नज़्मी ने बड़ी तीक्ष्णता के साथ विदेशी साहित्य से इनके साम्य और प्रभावों की तलाश की है. मैं समझता हूँ कि हिंदी के पाठकों को बहुत दिनों बाद इस तरह की कोई आलोचना पढ़ने को मिलेगी, जो यह भी बताती है कि उर्दू आलोचना कहाँ पहुँच चुकी है.
और यह कि दरअसल कहानी का विश्वसनीय लगना ही कहानी है. हम सब कथाओं के मेटा-नैरेटिव में ही तो रहते हैं. प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/javed-nama-jadid/
‘नेमत ख़ाना’ के अंग्रेज़ी अनुवाद के लिए ‘जेसीबी प्राइज़’ (2022) से सम्मानित ख़ालिद जावेद इस समय उर्दू के शीर्ष कथाकारों में शुमार हैं. ‘मौत की किताब’, ‘नेमत ख़ाना’, ‘एक ख़ंजर पानी में’, ‘अर्सलान और बहज़ाद’ तथा ‘इक्कीस एक सौ बाईस’ उनके प्रकाशित उपन्यास हैं, जो हिंदी में भी उपलब्ध हैं.
अशअर नज़्मी उर्दू के वरिष्ठ लेखक हैं. 2021 में प्रकाशित उनके उपन्यास ‘उसने कहा था’ को उर्दू का पहला पोस्टमॉडर्न नॉवेल माना जाता है. वे दो दशकों तक भारतीय टेलीविज़न इंडस्ट्री से जुड़े रहे और उर्दू की साहित्यिक पत्रिका ‘इसबात’ के संपादक हैं.
बड़ी आलोचना बड़ी रचनाओं के बिना संभव नहीं है. ख़ालिद जावेद के सभी उपन्यासों की जिस तरह से यहाँ विवेचना की गई है, वह इन उपन्यासों के ताकत की भी परिचायक है. अशअर नज़्मी ने बड़ी तीक्ष्णता के साथ विदेशी साहित्य से इनके साम्य और प्रभावों की तलाश की है. मैं समझता हूँ कि हिंदी के पाठकों को बहुत दिनों बाद इस तरह की कोई आलोचना पढ़ने को मिलेगी, जो यह भी बताती है कि उर्दू आलोचना कहाँ पहुँच चुकी है.
और यह कि दरअसल कहानी का विश्वसनीय लगना ही कहानी है. हम सब कथाओं के मेटा-नैरेटिव में ही तो रहते हैं. प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/javed-nama-jadid/
इतिहास विभाजन, विस्थापन और निर्वासन के घावों से भरा पड़ा है. इनकी गुम चोटों की शिनाख्त की कोशिशें इसलिए ज़रूरी हैं कि इन्हें फिर से दोहराया न जाए. बलवंत कौर की पुस्तक ‘स्मृति और दंश: विभाजन, निरंतरता और तीसरी पीढ़ी’ इसी दर्द का विवरण, व्याख्या और विश्लेषण है, जिसका प्रकाशन राजकमल ने किया है.
इसकी चर्चा कर रहे हैं कुँवर प्रांजल सिंह.
https://samalochan.com/smriti-aur-dansh-vibhajan-nirantarata-aur-teesri-pirhi/
देवी प्रसाद मिश्र का आज जन्म दिन है. इस बीच वह 68 वर्ष के हो गए हैं. पर वही नव्यता, प्रयोगधर्मिता, आग और वही ऊर्जा. इधर वह अपने निर्माणाधीन फ़िल्म को लेकर भी व्यस्त और बेहद उत्साहित हैं. ज़ाहिर है माध्यमों का समुच्चय उनके कवि को समृद्ध कर रहा है. प्रस्तुत कविताओं में काव्य की दो धाराएँ कलकल करती हुईं बह रही हैं. साथ में उनकी ही आवाज़ और संगीत में एक गान भी प्रस्तुत है. तो इस तरह हम अपने कवि को उसकी नव्यता के साथ फिर पा रहे हैं.
‘नव देवी’ शतायु हों. इसी कामना के साथ यह ख़ास अंक प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/some-new-poems-by-devi-prasad-mishra/
साहित्य और भाषा में अश्लीलता का प्रश्न कोई नया नहीं है. अलंकारशास्त्र में इसे ऐसा दोष माना गया है, जो ‘ग्राम्य’ है. संदर्भ और मन्तव्य ही तय करते प्रतीत होते हैं कि क्या शिष्ट है और क्या नहीं. जेन ज़ी पीढ़ी के ‘जंतर-मंतर’ के असरदार ऐतराज़ के शिल्प और कथ्य इन दिनों चर्चा में हैं.
लेखक-पत्रकार त्रिभुवन ने इस विषय को विस्तार से समझते हुए इसके लगभग सभी संभावित पक्षों पर प्रकाश डाला है. ऐसा लेख अभी कहीं देखा नहीं गया है. प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/the-obscene-language-of-jantar-mantar/
जिसका भविष्य है, उसी का कल है. सत्ताएँ गिर गईं, संरचनाएँ बदल गईं. धर्मों से नए धर्म निकल आए. कब तक रोकेंगे? रोक पाएँगे? वे अलग हैं, अनोखे हैं और आपसे बेमेल हैं, इसीलिए तो नए हैं.
युवाओं के इन आंदोलनों ने व्यापक स्तर पर लेखकों और कलाकारों को विचलित किया है और प्रभावित भी. वे इसे समझ रहे हैं और अपनी प्रासंगिकता लिख रहे हैं.
अपनी निर्मित मूर्ति को बार-बार तोड़ना एक सच्चे कलाकार का आत्महंता आत्मसंघर्ष है. कुमार अम्बुज ऐसे ही कवि हैं. उनकी प्रस्तुत कविताओं में समय अपने तीखे और बेहद विडम्बनात्मक स्वर के साथ उपस्थित है.
जब अंतर्विरोध तीखा हो जाता है, तब स्वर उठता है. गुनगुनाने और फुसफुसाने का समय नहीं रह जाता. गहरी बेचैनी से भर देने वाली इन कविताओं में कुमार अम्बुज कथ्य को जोड़ते चलते हैं और देखते-देखते वह एक व्यापक सामाजिक रूपक में बदल जाता है. पुनरावृत्तियाँ इसे और सघन करती हैं. समकालीन यथार्थ की ऐसी सधी हुई व्यापकता अर्जित करना आसान नहीं.
प्रस्तुत है यह ख़ास अंक.
https://samalochan.com/more-of-kumar-ambujs-poems/
प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास 'गोदान' के पात्रों की संततियाँ आज कहाँ हैं? 1936 से 2026 तक के इन नब्बे वर्षों में, गुलाम भारत से स्वतंत्र भारत की यात्रा के दौरान क्या उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों में कोई बुनियादी परिवर्तन आया है? क्या होरी के वंशज आज भी कर्ज़ के उसी दुष्चक्र में फँसे हैं?
रविन्द्र कुमार ने 'गोदान' के पात्रों की संततियों का समकालीन परिप्रेक्ष्य में ऐसा सजीव आकलन किया है कि वे मानो हमारे सामने उपस्थित हो उठते हैं. समाज-विज्ञान और साहित्य का यह सृजनात्मक संगम 'गोदान' के अध्ययन का एक नया मार्ग खोलता है.
प्रेमचंद जयंती के अवसर पर यह विशेष प्रस्तुति.
https://samalochan.com/what-are-the-descendants-of-godaan-doing-today/
जेन ज़ी की भाषा को समझने में पुरानी पीढ़ियों को भले कठिनाई हो, उनकी संवेदनाओं, बेचैनियों और संघर्षों को समझने में नहीं. पीढ़ियाँ अंततः इसी तरह एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं. भाषा बदलती है, मनुष्य की आकांक्षाएँ और न्याय की इच्छा नहीं.
‘बेबी बूमर्स’ पीढ़ी के शैलेन्द्र चौहान ने इन कविताओं में भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में जेन ज़ी के संघर्षों, उनके प्रतिरोध के तौर-तरीकों और उन्हें लेकर उठने वाले सवालों से संवाद किया है. साहित्य अंततः वही टिकता है जो अपने समय के जन-जीवन, उसके सुख-दुःख, संघर्ष और यातना को स्वर देता है.
प्रस्तुत हैं शैलेन्द्र चौहान की ये कविताएँ.
https://samalochan.com/poetry-for-gen-z/
भारत के युवा नागरिकों के जंतर-मंतर के आंदोलन ने न केवल भारत बल्कि पड़ोसी देशों के लोकतंत्र के मुरझाते वृक्ष में जीवन-जल डालने का कार्य किया है. इसका असर भारतीय राजनीति पर क्या पड़ेगा, इसे तो समय ही बताएगा, पर इसने नागरिकता का उत्सव ही रच दिया है, यह प्रत्यक्ष है.
रविन्द्र कुमार अमेरिका के ओरेगन विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं और भारत आए हुए हैं. वह इसमें शामिल भी हुए और इस पूरे आंदोलन का उन्होंने यह विश्लेषण भी किया है.
यह खास आलेख आपके लिए प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/citizenship-at-jantar-mantar/
विश्वप्रसिद्ध चित्रकार सैयद हैदर रज़ा को स्मरण करते हुए उन पर दो दुर्लभ सामग्री प्रस्तुत की जा रही हैं. रज़ा जब फ्रांस पहुँचे ही थे और कला-जगत में अपनी पहचान गढ़ रहे थे, तब रामकुमार ने उनकी विशिष्टता को पहचानते हुए यह उल्लेखनीय लेख लिखा था. बाद के वर्षों में, जब रज़ा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित हो गए और भारत आए, तब प्रयाग शुक्ल ने उनसे यह ख़ास बातचीत की थी. पत्रिकाओं के पुराने अंकों से यह दुर्लभ सामग्री मनोज मोहन ने उपलब्ध कराई है.
यह अंक इस जिज्ञासा के साथ प्रस्तुत है कि आज दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं का जो आंदोलन चल रहा है, वहाँ हिंसा और क्रूरता के दृश्य हैं, तो साहस, प्रतिरोध और मनुष्यता के भी हैं. यदि रज़ा आज हमारे बीच होते, तो क्या यह उन्हें प्रेरणा से भर नहीं देता? क्या बाद में ही सही, इस अनुभव से उनकी कोई नई कृति जन्म लेती?
कला का तात्कालिक जनांदोलनों से क्या संबंध होता है?
https://samalochan.com/raza-remembrance/
सभ्यताओं की कुंजी उनके प्राचीनतम महाकाव्यों में निहित है. विश्व के लगभग सभी महाकाव्यों में उल्लेखनीय उभयनिष्ठता दिखाई देती है. लगभग दो हजार ईसा पूर्व सुमेरियन भाषा में रचा गया गिलगमेश विश्व का सबसे प्राचीन ज्ञात महाकाव्य है. यह प्राचीन मेसोपोटामिया की सभ्यता की कथा कहते हुए मनुष्य के मृत्यु-बोध, मित्रता और अर्थपूर्ण जीवन की खोज जैसे सार्वकालिक प्रश्नों से हमारा सामना कराता है. इसकी प्रतिध्वनियाँ बाद के अनेक महत्त्वपूर्ण महाकाव्यों में भी सुनी जा सकती हैं.
विजयशंकर चतुर्वेदी ने इस महाकाव्य और उसके साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा दार्शनिक महत्त्व का विस्तृत और सहज विवेचन किया है.
प्रस्तुत है उनका यह विचारोत्तेजक आलेख.
https://samalochan.com/gilgamesh/
साहित्य, संस्कृति और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण-विमर्श के क्षेत्र में प्रफुल्ल कोलख्यान का नाम सुपरिचित है. विभिन्न विषयों पर उनसे महेश मिश्र की यह विचारोत्तेजक बातचीत विशेष रूप से आपके लिए प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/a-conversation-with-prafulla-kolkhyan-by-mahesh-mishra/
प्रमाण दिखाने और ख़ुद को साबित करने की इस महामारी में न जाने कितने लोग पिस रहे हैं. आधार कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र, निवास प्रमाण-पत्र, शजरा, खसरा, पट्टा और नागरिकता के काग़ज़ों की इस गिर्दाब में एक गाँव का खेतिहर मुस्तफ़ा भी फँस जाता है. यह कहानी कमोबेश हमारे समय की एक आम यंत्रणा है.
उज़्मा कलाम की यह कहानी इसी त्रासद यथार्थ को बखूबी सामने लाती है. प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/girdab/
वरिष्ठ पत्रकार-लेखक त्रिभुवन जिस विषय पर भी लिखते हैं, उसे व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हुए उसकी जड़ों तक पहुँच जाते हैं. उल्लेखनीय यह है कि इस पूरी रचनात्मक यात्रा में पठनीयता कहीं क्षीण नहीं होती.
राजकमल प्रकाशन से हाल ही में प्रकाशित गीताश्री की पुस्तक ‘हब्बा की खोज: बुलबुल-ए-कश्मीर: शख़्सियत और शायरी’ के बहाने उन्होंने दक्षिण एशिया की स्त्री-चेतना का एक व्यापक वृत्तांत ही रच डाला है, जो इतिहास को वर्तमान से भी जोड़ता है. यह आलेख इस ख़ित्ते की तमाम ‘हब्बाओं’ को सजीव करता है. प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/habba-khatoon/
