BPSC- "THE AiM"
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Important Points For #bpsc_uppcs_jpsc
#Modern_History
#डच_ईस्ट_इण्डिया कम्पनी की स्थापना
👍
1602 ई. में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की गई। ये ड्च हॉलैण्ड के निवासी थे।
डचों की प्रथम फैक्ट्री
-1605 ई. में डचों ने अपनी सबसे पहली फैक्ट्री मूसलीपट्टम में स्थापित की इनकी और भी फैक्ट्रियां सूरत, कासिम बाजार, बडा नगर, पटना, बालापट्टनम, कोचीन आदि थी।
-इनके आगमन से भारत में पुर्तगालियों का व्यापार में एकाधिकार समाप्त हो गया।
डचों द्वारा निर्यात
-ये मसाले, वस्त्र, नील, शोरा, सिल्क आदि सभी का निर्यात करते थे।
जहांगीर का फरमान
-डचों ने पश्चिमी तट पर व्यापार करने के लिए मुगल बादशाह जहांगीरसे फरमान जारी करवाया।
राहदारी से मुक्ति
-1642 ई. में शाहजहाँ ने पीपली से आगरा तक राहदारी से मुक्त कर दिया।
डचों के व्यापार का अंत
-18 वीं सदी की शुरुआत में डचों के व्यापारिक कार्य कलापों का अंत होना शुरु हो गया ।अंतत: 1759 में वेदरा के युध्द में अंग्रेजों द्वारा पराजित होने पर इनकी गतिविधियां पूर्णत: समाप्त हो गई।
डचों के पतन के कारण
-डचों के पतन के कारण थे कि मसालों के द्वीप पर बहुत अधिक ध्यान देना जो इण्डोनेशिया मे था।
-अंग्रेजों की तुलना में डचों की नौशक्ति कम थी, अत्याधिक केंद्रियकरण की नीति इनकी सत्ता काफी केंद्रियकृत थी।
- डचों की बिगडती हुई आर्थिक स्थिति
-डचों ने भारत में अंग्रेजो और फ्रांसिसीयों के साथ गम्भीर प्रतियोगिता की।
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#modernhistory
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अंग्रेजों का भारत आगमन
1578ई. में सर फ्रांसिस ड्रेक नामक एक अंग्रेज नाविक ने जो कि समुद्र मार्ग से पृथ्वी की परिक्रमा करने निकला था, उसने लिसबन- जो कि पुर्तगाल की राजधानी थी, वहाँ जाने वाले एक पुर्तगाली जहाज को लूटा ।
इस लूट से उसे कुछ नक्शे मिले और भारत की समृध्दि और आशा अंतरी की ओर जाने वाले मार्ग का ज्ञान मिला ।
मर्चेट एडवेंचरस
-उसे पता चला कि भारत एक बहुत समृध्द स्थल है। ऐसे उसे भारत आने का मार्ग पता चला ।व्यापारियों के एक समूह जिसे मर्चेट एडवेंचरस कहा जाता था। इनके द्वारा 1599 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गठन किया गया।
महारानी एलिजाबेथ द्वारा कम्पनी को एक चार्टर
1600 ई. में ब्रिट्रेन की महारानी एलिजाबेथ के द्वारा कम्पनी को एक चार्टर दिया गया, जिसमें कम्पनी को पूर्वी देशों के साथ 15 वर्षो के लिए व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया।
हॉकिंस का भारत आगमन
महारानी एलिजाबेथ इन कम्पनी के हिस्सेदारों में से एक थी। इसके पश्चात व्यापारिक रियायतें प्राप्त करने के लिए हेक्टर नामक जहाज पर कप्तान हॉकिंस 1608 ई. में सूरत आया।
जहाँगीर के दरबार में हॉकिंस
-हॉकिंस ने जहाँगीर के दरबार में जाकर फारसी भाषा में बात की ।जहाँगीर ने उससे प्रभावित होकर उसे इंग्लिश खाँ की उपाधि दी और 400 का मनसब भी दिया।
ब्रिट्रिश कम्पनी की पहली फैक्ट्री
- सन 1611 में मसूलीपट्टनम आन्ध्राप्रदेश में ब्रिट्रिश कम्पनी की अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित हुई।
सूरत में स्थायी रूप से कोठी
-1613 ई. में जहाँगीर ने एक आज्ञा पत्र द्वारा अंग्रेजों को सूरत में स्थायी रूप से एक कोठी स्थापित करने की अनुमति प्रदान की।
सर टॉमस रो का जहाँगीर के दरबार में आगमन
-1615 में इंग्लैड के राजा जेम्स प्रथम का राजदूत सर टॉमस रो जहाँगीर के दरबार में आया और 3 साल तक यहीं रहा। इसका उद्देश्य व्यापारिक संधि करना था। इसने साम्राज्य के सभी भागों में व्यापारिक कोठियां स्थापित करने की अनुमति प्राप्त कर ली।
मैग्नाकार्टा या महाधिकार पत्र
-1717 में जॉन सुमिरन का शिष्य मण्डल मुगल सम्राट फरुखशियर के दरबार में पहुँचा ।इस शिष्ट मण्डल का एक सदस्य विलियम हेमिल्टन जो कि चिकित्सक था उसने फरुख्शियर की कोई बहुत ही गम्भीर बीमारी ठीक कर दी। फरुख्शियर ने प्रसन्न होकर 1717 ई. में कम्पनी के नाम एक फरमान जारी,किया जिसे कम्पनी का मैग्नाकार्टा या महाधिकार पत्र भी कहा जाता है.
मैग्नाकार्टा के फरमान
-1717 के फरमान में अंग्रेजों को 3,000 वार्षिक कर के बदले बंगाल में मुक्त व्यापार की अनुमति दी जाये।
-दूसरा उन्हें किराये पर कलकत्ता के आस-पास की जमीन लेने की अनुमति दी गई।
-तीसरा हैदराबाद के समूचे सूबे में उन्हें जो पहले से चुंगी की छूट मिली थी वह कायम रहे।
-चौथा 10,000रु. वार्षिक कर के बदले उन्हें चुंगी देने से छूट मिले।
-पाँचवा बम्बई में कम्पनी द्वारा ढाले गये सिक्कों को सम्पूर्ण राज्य में चलाने की अनुमति दे दी गई।
अंग्रेजों की फैक्ट्रियां
1623 ई. में कम्पनी ने सूरत, अहमदाबाद, आगरा, कन्नौज और बडौदा में फैक्ट्री स्थापित कर ली। ये सभी फैक्ट्रियां सूरत की कोठी के प्रिसिंडेंट और कौसिंल के नियंत्रण में रख दी गई।
भडौच और बडौदा में फैक्ट्री स्थापित करने का उद्देश्य
भडौच और बडौदा में अंग्रेजी फैक्ट्री स्थापित करने का उद्देश्य पूरे इलाकों में बने कपडों को सीधे खरीद लेना था ।आगरा में कोठी स्थापित करने का उद्देश्य शाही दरबार के अफसरों को कपडा बेचना और नील खरीदना।
-सबसे अच्छी किस्म का नील बयाना में होता था
अतिरिक्त जानकारी👍👍
सन 1600 में शुरू हुई ये अंग्रेजी कम्पनी 2005 में एक भारतीय कारोबारी “संजीव मेहता” द्धारा खरीद ली गयी, और अब ये कम्पनी एक भारतीय के नाम है, संजीव मेहता ने इस कम्पनी को इसके 30-40 मालिकों से खरीदा, और इसे दोबारा शुरू किया अब ये कम्पनी Food, real state, furniture, health, hospitality आदि में बिजनेस करती है।
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डेनिस का भारत आगमन 👍
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बाद 1616 ई. में डेनिस कम्पनी का भारत आगमन हुआ।
डेनिसों की पहली फैक्ट्री
-इसकी पहली फैक्ट्री तंजौर के त्रावन कौर में 1620 ई. में स्थापित हुई।
अन्य फैक्ट्रियां
- इसके बाद बंगाल के श्रीरामपुर या सीरापुर में 1676 ई. में इनकी फैक्ट्री स्थापित हुई।
- यही सीरापुर डेनिस कम्पनी की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था।
डेनिस की असफलता का कारण
-डेनिस भारत में अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ नहीं कर पाये और अंतत: अपनी भारतीय बस्तियों को अंग्रेजो को 1845 ई. में इन्होंने बेच दिया।
- इन्होंने व्यापार की तुलना में धर्म प्रचार सम्बधी कार्यो में अधिक ध्यान दिया यहीं इनकी असफलता का कारण बना।
अतिरिक्त जानकारी-👌👍
तमिलनाडु स्थित “ट्रांकेबार”(वर्तमान तरंगमबाडी) 1620 से 1845 तक डेनिश बस्ती हुआ करता था, ट्रांकेबार जो कि तमिल शब्द तरंगमबाडी से बना है जिसका अर्थ होता है, “एक स्थान जहॉं तरंगें गाती हैं” , ये स्थान 1845 में श्रीरामपुर(वर्तमान में पश्चिम बंगाल में स्थित) और कुछ अन्य स्थानों के साथ अंग्रेजों को बेच दिया गया।
निकोबार द्वीप भी पहले डेनिश लोगों द्वारा ही बसाया गया था जो कि 1868 में अंग्रेजों को बेच दिया गया
आजादी के बाद सन 1957 में निवर्तमान प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु द्वारा डेनमार्क यात्रा करके भारत और डेनमार्क के बीच दोस्ती की नींव डाली, जो अभी भी कायम है।
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#फ्रांसिसियों का आगमन
भारत में व्यापारिक यूरोपीय कम्पनियों में फ्रांसिसी ईस्ट इण्डिया कम्पनी का आगमन सबसे अंत में हुआ।
फ्रेंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना
फ्रेंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना 1664 ई. में फ्रांसिसी सम्राट लुई 14वें के मंत्री कोलबर्ट द्वारा की गयी।
पहली फैक्ट्री
इस कम्पनी का मूल नाम ‘ कम्पनी द इंद ओरिएंतल’ था इसकी पहली फैक्ट्री 1668 ई. में सूरत में फ्रैंको कैरो के द्वारा स्थापित की गई ।बाद में मर्कारा ने गोलकुण्डा के सुल्तान से अनुमति ले कर मूसलीपट्टम में 1669 ई. में दूसरी फैक्ट्री स्थापित की।
कम्पनियों का मुख्यालय
भारत में फ्रेंच कम्पनीयों का मुख्यालय पंण्डिचेरी था, जहाँ पर फ्रांसिसियों ने 1673 से 74 ई. में फैक्ट्री स्थापित की।
बंगाल के क्षेत्र में इनकी प्रमुख फैक्ट्री चंद्र नगर में थी, जिसे 1690-91 ई. में स्थापित किया गया था।
फ्रेंच व अंग्रेजों के बीच संघर्ष
-फ्रेंच कम्पनी के आने से पहले अंग्रेज भारत में आ चुके थे, इसलिए दोनों कम्पनियों में अपने प्रभुत्व को लेकर संघर्ष आरम्भ हो गया।
मॉरिशियस पर अधिकार
-1721 ई. में फ्रांसिसियों ने मॉरिशियस पर अधिकार कर लिया और 1725 ई. में मालावाड तट पर स्थित माही पर भी अधिकार कर लिया।
-तंजौर के नबाब ने कोरो मण्डल तट पर स्थित कलीकट फ्रांसिसियों को 1639 ई. में उपहार स्वरूप दे दिया।
गवर्नर डूप्ले
-1742 ई. में डूप्ले गवर्नर बन कर आया तो उसके काल में फ्रांसिसियों की महत्वकांशाए और बढ गयी।
-दूपले ने भारत में अपना राज्य स्थापित करना चाहा, परिणाम स्वरूप फ्रांसिसी और अंग्रेजों के मध्य संघर्ष शुरु हो गया।
कर्नाटक क्षेत्र में आंग्ल फ्रांसिसी संघर्ष
- इन दोनों कम्पनियों के बीच दक्षिण भारत के कर्नाटक क्षेत्र में कुल तीन संघर्ष हुए जिसे आंग्ल फ्रांसिसी संघर्ष कहा गया
फ्रांसिसियों का अंत
-इन तीन संघर्षों में प्रथम तथा अंतिम युध्द का कारण अंतराष्ट्रीय रहा। इस तरह वॉन्डिबॉश के निर्णायक परिणाम स्वरूप फ्रांसिसियों का वर्चस्व भारत से समाप्त हो गया और इंग्लिश कम्पनी भारत में चुनौती देने वाला और कोई नहीं बचा।
फ्रांस के बारे में कुछ मजेदार बातें
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“अप्रैल फूल डे” की शुरुआत फ्रांस से ही हुई थी, 16 वीं शताब्दी में जब फ्रांस ने केलेंडर बदला और नये साल की शुरुआत जनवरी से की, उसके बाद भी कुछ लोगों ने मार्च के अंत में अपना नया साल मनाया तो उन लोगों को मूर्ख माना गया और तभी से ये परम्परा चल पडी।
फ्रांस को “सुरा और सुंदरीयों ” का देश कहा जाता है, और ये एक ऐसा देश है जहॉं 1000 से भी अधिक प्रकार की चीज़ (cheese)बनायी जाती है।
आपको जानकर शायद हैरानी हो परन्तु आज भी फ्रांस का न्यायिक प्रक्रिया नेपोलियन बोनपार्टा के सिविल कोड (1800 ई.) पर ही आधारित है।
क्या आपको पता है आज तक सबसे अधिक साहित्य के नोबल पुरस्कार फ्रांस के खाते में ही गये हैं, वहॉं अब तक 16 लोग साहित्य का नोबल पुरस्कार जीत चुके हैं।
