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तमाम लफ़्ज़ों की सरगोशियाँ सुनीं कल शब सदाएँ देती हुई शहर से जब भी वो गुज़री थी
मुझे ही बात नहीं करनी थी कोई वर्ना
मेरे क़रीब से कल ज़िन्दगी भी गुज़री थी
तुम गली से गुज़रने का एक वक़्त मुकर्रर कर लो
यूँ दीवार से खड़े खड़े मेरे पैर दुखने लगते हैं..! 😊
