धर्मसम्राट श्री करपात्री जी महाराज🚩
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*अनंत श्री विभूषित यतीचक्रचूड़ामणि अभिनव शंकराचार्य धर्मसम्राट स्वामीश्री करपात्री जी महाराज का आज निर्वाण दिवस है पूज्यपाद परमगुरुदेव भगवान के श्रीचरणों में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।*
बंदउँ अवधभुवाल ,सत्य प्रेम जेहि राम पद।
बिछुरत दीनदयाल,प्रियतनु तृन इव परि हरेउ।।
हा रघुनंदन प्राण पिरिते। तुम बिनु जियत बहुत दिन बीते।।
संवत् 2038 विक्रम1982 ई. 8 फरवरी माघ शुक्ल चतुर्दशी रविवार प्रातः 8:20 बजे पुष्य नक्षत्र सर्व सिद्धि योग में प्रातः स्नान करके पूजन किया।
ब्रह्मचारी से कह कर किवाड़ बंद करवा दिए। शरीर त्यागने से पूर्व अपने अनन्य सहयोगी ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोधआश्रम जी महाराज का स्मरण किया सब लोग चिंतित थे धीरज देते हुए ठेठ बनारसी भाषा में कहां- ताना देल्ली, बाना देल्ली ,जन्तर देल्ली ,मन्तर देल्ली ।
हमारा शुभ आशीर्वाद हइ हइ और तुम्हें क्या चाहिए बोलो ।
इसके बाद जोर से श्री सूक्त का पाठ करने लगे ऊपर श्रीविद्या यंत्र के चित्र में दृष्टि केंद्रित की। त्राटक लगाया ।सर्वेश्वर ब्रह्मचारी जी तथा ब्रह्मचैतन्य को पुकारा इन्होंने गंगाजल, तुलसी दल मुंह में डाला। पूरी सावधानी से ग्रहण किया। फिर उनकी आज्ञा से ठाकुर जी तथा तुलसी वक्षस्थल पर पधराई ।अंतिम समय तक पूर्ण चेतना रही पूर्वोक्त समय आने पर तीन बार शिव शिव का उच्चारण कर लीला संवरण कि। धर्म अध्यात्म का प्रचंड सूर्य अस्त हो गया गंगा तट पर केदार खंड में उनका शरीर भक्तों के दर्शनार्थ रखा गया।
प्रातः 8:00 बजे से जनता दर्शनार्थ आने लगी सफेद कार में दोनों जगतगुरु पुरिपीठाधीश्वर स्वामी निरंजनदेव तीर्थ जी महाराज तथा ज्योतिषपीठाधीश्वर एवं द्वारकाशारदा पीठाधीश्वर
स्वामीस्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के बीच में शरीर ले जाया जा रहा था वेद मंत्रों ,कीर्तन तथा स्वामी जी के दिए गए नारे -
धर्म की जय हो
अधर्म का विनाश हो
प्राणियों में सद्भावना हो
विश्व का कल्याण हो
गौ माता की जय हो
गौ हत्या बंद हो
लगाए जा रहे थे। सभी लोग पुष्प मालाएं समर्पित कर रहे थे।
सर्वप्रथम पुरिपीठाधीश्वर फिर ज्योतिष पीठाधीश्वर एवं द्वारकाशारदा पीठाधीश्वर जीने पुष्प मालाएं समर्पित की। फिर अन्यान्य महापुरुषों ने पुष्पांजलि अर्पित की 9 फरवरी को दिन के 11:00 बजे टाउनहाल से अंतिम यात्रा प्रारंभ हुई। स्वामी जी का शरीर सजाए हुए ट्रक पर पालकी में पधराया गया। शरीर के पास दोनों शंकराचार्य थे इस प्रकार 3 किलोमीटर का मार्ग 3 घंटे में दशाश्वमेध घाट तक तय हुआ। वहां से स्वामी जी के पार्थिव शरीर को सजे हुए बजड़े पर रखा गया ।उसको मोटर से बांधकर केदार घाट लाया गया ।काशी में सभी बाजार ,सिनेमा ,विद्यालय, मुसलमानों तक की दुकानें बंद रहीं ।
काशी के डोम महाराज भी साथ में थे। हरीश चंद्र जिनके यहां बिके थे श्वेत वस्त्र धारी उन डोमराज ने आकर करकी याचना की। महाराज श्री के दैनिक प्रयोग में आने वाली वस्तुएं वस्त्र सिंहासन कालीन आदि उन्हें दिया गया। स्वामी जी को विधि विधान से जल समाधि दी गई स्वामी जी के शरीर को पंचामृत से स्नान कराया गया। फिर शुद्ध जल से स्नान कराकर नवीन वस्त्र धारण कराए गए । सब क्रिया करने के अनंतर जगत्गुरु जी ने कहा मैं ऐसे महान संत का कपालछेदन नहीं कर सकता ।
ऐसा कह कर रुदन करने लगे केवल शंख में गंगाजल भरकर मस्तक का स्पर्श किया। करपात्री जी की अंतिम इच्छा थी कि मेरा शरीर काशी से बाहर न जाए। इसलिए महाराज श्री के पार्थिव शरीर को लोहे के तारों से पत्थर की पेटी के साथ जकड़ कर बांध दिया गया ।कुछ भक्त बेहोश हो गए ।
रविवार को ही स्वामी जी का जन्म हुआ था और रविवार को ही ब्रह्मलीन हुए बाद में श्रद्धांजलि अर्पित होती रही।
आज स्वामी जी की ४० वीं पुण्यतिथि पर श्री चरणों में शत शत नमन
जब तक गौहत्या होती रहेगी तब तक वैदिक धर्म क्षीण होता रहेगा और अंत में विनाश हॉगा, आपको नीचे दी गई लिंक पर जाकर रीट्वीट करना है या
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#गौहत्या_बंद_करो_सरकार
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जय गौमाता 💐🙏🏾
गावो विश्वस्य मातरम्। 💐
गौमाता की जय हो।
गौहत्या बंद हो।
*रामशर्मा(गायत्री परिवार) और दयानन्द(आर्यसमाज) के स्त्रीयों को जनेऊ डालने के पक्ष का खण्डन*
श्री राम शर्मा और स्वामी दयानंद के मत की समीक्षा -
श्री राम शर्मा आचार्य (शान्ति कुञ्ज वाले ) स्त्रियों के वेदाध्ययन , यज्ञोपवीत संस्कार जैसे नवीन सिद्धांत ख्यापित करते हैं और स्वामी दयानन्द तो इस विषय में सबसे आगे हैं जो #इमं_मन्त्रं_पत्नी_पठेत् - इस शतपथब्राह्मणवचन से स्त्री के वेदाध्ययन की पुष्टि भी कर चुके है , जबकि इनका मत अयुक्त है, क्योंकि ये यह वचन वेदाध्ययन का विधिवाक्य नहीं है , वेदाध्ययन का विधिवाक्य है - स्वाध्यायोऽध्येतव्यः (तै० आ० २|१५ ) अपितु वेदाध्ययानानन्तर कर्मानुष्ठान के अन्तर्गत इसका अन्तर्भाव है | स्त्रियों हेतु विवाह ही उनकी उपनयन विधि है , पतिसेवा ही गुरुवास है ,इत्यादि जैसा कि -
#वैवाहिको_विधिः_स्त्रीणां_संस्कारो_वैदिकः_स्मृतः |
#पतिसेवा_गुरौ_वासो_गृहार्थोँऽग्निपरिक्रिया || (मनुस्मृति २|६७)
पति के साथ स्त्री का कर्म में अधिकार होता है - ये शास्त्र का सिद्धान्त है | आधानवाक्य ( वसन्ते ब्राह्मणोs ग्रीनादधीत , ग्रीष्मे राजन्यो , वर्षासु वैश्यः | (शतपथ ब्राह्मण २|१|३|५ ) में पुंस्त्व का ही ग्रहण होने से अध्ययनके उपरान्त उन्हीं का उपनयन विधान शास्त्र से विहित हुआ है | ये विषय भी कात्यायन श्रौतसूत्र के परिभाषा प्रकरण में स्पष्ट हुआ है
मेखलया यजमानं दीक्षयति योक्त्रेण पत्नीम् (तै० सं० ६|१|३ ) , आज्यमुद्वास्य पत्नीमवेक्षयति (का० श्रौ० २|७|४) इत्यादि वाक्यों से स्त्री का भी यज्ञादि कर्म में अधिकार विवक्षित हुआ है किन्तु भर्त्ता के साथ ही उसका अधिकार होता है , स्वतन्त्र नहीं , जैसा कि शास्त्र ने कहा है -
#नास्ति_स्त्रीणां_पृथग्यज्ञो_न_व्रतं_नाप्युपोषणम् |
#शुश्रूषयति_भर्त्तारं_तेन_स्वर्गे_महीयते || (मनु ० ५|५५)
अधिक जानकारी हेतु स्ववतोस्तु वचनादैककर्म्यं स्यात् जै० मी० ६|१|१७इत्यादि पूर्वक पूर्व मीमांसा के दंपत्तिसहाधिकार अधिकरण को पढ़ना चाहिए , जहां ये विषय विस्तार से सुस्पष्ट किया गया है |
जय श्री राम
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ट्रेड के नाम पर मीडिया ने किया जगतगुरु शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती जी महाभाग पर वार जगतगुरु शंकराचार्य को बदनाम करने की कोशिश करने वाले मीडिया हाउस का बहिष्कार हो।
लिंक : https://m.youtube.com/watch?v=f86xbeFHdkQ
आवाज़ दबाने के लिए इनके विरुद्ध रिपोर्टिंग कर उन्हें जोम्बी आदि की संज्ञा दे रही है,इनका राजनीतिकरण होने लगा है,यह भी मानना पड़ेगा की इन trad में बहुत सारी नकली प्रोफाइल भी घुस चुकी है जो इन युवाओ को भटका रही है पर मिडिया का एवं सरकारों का बैर वैदिक सनातन धर्म से नया नहीं है वर्सो से यह लोग परम्परा विरूद्ध ही रहे है,कभी संतो को विवादित बताकर कभी धर्म के सिद्धांतो को पिछड़ा बताकर आदि,अब trad पर मिडिया बरस रही है ताकि इन युवाओ को खुद को परम्परावादी कहने पर घृणा लगे, पर मिडिया को यह समजना होगा की यह कोई अबुद्ध लोगो का गिरोह नही है जो राइट विंग या लेफ्ट विंग जैसे मेट्रिक्स प्रोग्राम में फिट बैठ शके यहाँ एक से बढ़कर एक बुद्धिजीवी युवा है जो अपनी परम्परा अपनी संस्कृति एवं संस्कार को बचाने के लिए लड़ाई कर रही है,trad से उलझना बहुत कठिन है उनके पास शास्त्र है तथ्य है प्रमाण है! इसलिए स्वतन्त्र सोच के कारण लेफ्ट विंग या राईट विंग से अधिक बुद्धिशाली है!
यहाँ पर केवल trad मंडन की बात नहीं हो रही,जो कुछ गलत इन लोगो ने किया हा जैसे अन्य का अपमान अन्य को निचा दिखाना वो तो गलत ही है, सनातन में सबके लिए वर्णाश्रम मर्यादा में अपनी अपनी जगह है अपने अपने अधिकार है, इसलिए लड़ाई अपनी मर्यादा में रहकर करनी चाहिए यह भी सत्य है! बाकि अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ना किसीको निचा न बताकर अपने ही सिद्धांत का प्रचार करना यही यूवाओ को करना चाहिए यह मेरा मंतव्य है!
कुल मिलकर देखा जाए तो यह वर्तमान व्यवस्था का ही दोष है जिसने युवाओ को यह कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है! क्योंकि अब इन युवाओको वैदिक हिन्दू राष्ट्र से कम कुछ नहीं चाहिए!
अस्तु
श्रीमन्नारायण
लेखन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी,क्षेत्रज्ञ
परमधर्म संसद १००८
*ट्रैड/Trad कौन है? जिसकी बातें मिडिया पर आजकल हो रही है!*
trad को जानने से पूर्व मामला क्या है यह जानना आवश्यक है, कुछ समुदाय वा जाति विशेष पर मिम्स या टिप्पणी करने पर कुछ युवाओ की गिरफ्तारी हुई जिनके कारण trad मेइन स्ट्रीम मिडियामें छाया हुआ है!
*अब trads क्या है?*
यह मामले की शुरुआत २०१४ में सरकार बदलने के बाद हुई, देश और धर्म पहले से ही लेफ्ट विंग(वामपंथी) के सताये हुए थे,धर्मपरिवर्तन जोरो पर थे,हिन्दुओकी छबी पूर्ववर्ती सरकारों ने ख़राब कर दी थी, वामपंथी आइडियोलोजी के कारण युवा वर्ग धर्म से विचलित होता जा रहा था,आधुनिकता के नाम पर व्यभिचार बढ़ रहे थे, ब्राह्मणों का मानसिक शोषण एवं मानसिक दमन हो रहा था! इसलिए धर्मरक्षा हो उस आशा से वर्तमान सरकार जो है सत्ता में है उसे लाया गया, २०१४ में युवाओ का पूरा वर्ग इस सरकार के साथ था, किन्तु धीरे धीरे इन लोगो के सामने वास्तविकता आने लगी,की हिन्दू के नाम पर यह भी ठगी ही कर रहे है,धर्म कोई कार्य नही हो रहे,गौरक्षा आदि के कार्य नही हो रहे,कदाचित कुछ धर्म के कार्य हो रहे है वो भी शास्त्र का उल्लंघन कर के हो रहे है,संक्षिप्त में बताया जाए तो यह भी वही करने लगे जो पूर्ववर्ती सरकारे करती थी केवल “अपनी प्रवृतिओ को भगवा रंग दे दिया,” यह कथित रायता या राईट विंग भी सनातन वैदिक धर्म के मूलसिद्धांत के विपरीत की बात करने लगे! अब मामला शुरू यहाँ से हुआ जो सिद्धांतवादी जिन्हें यह trad कहते है, इनके संज्ञान में आया की जैसे लेफ्ट विंग ने शास्त्र आदि के विकृत अर्थघटन किए वैसे ही राइट विंग ने भी शास्त्र के मूलसिद्धांतो को छोडकर विकृत अर्थघटन करने लगे या पूर्व से जो विकृत अर्थघटन थे उनका समर्थन करने लगे इसी कारण जो जागृत आधुनिक पढ़े लिखे नवयुवाओने राईट विंग के शास्त्र के विकृत अर्थघटन को छोडकर ने मूलशास्त्र का अध्ययन शुरू किया, जिनसे मूलशास्त्रीय सिद्धांतो का प्रचार आधुनिक माध्यम से मीम के माध्यम से किया, हालाकी इसमें दो राय नहीं की बहुत अतिरेक भी हुआ है,मार्गभी भटक गये है किन्तु युवाओ का बड़ा वर्ग जो राईट विंग के साथ था,वो राइट विंग के छद्म हिंदुत्व को जानकर और राईट विंग के कथित जूठे (मोडिफाइड) सिद्धांतो को जानकर राइट विंग से किनारा कर लिया,और मूल सिद्धांत के टकराव के कारण अलग होने लगा!
*अब trads कौन है?*
ट्रेड सर्वप्रथम तो वो युवाओ का unorganized समूह है जो लाखो की संख्या में मौजूद है और यह बढ़ता जा रहा है और सरकार की सनातन धर्म एवं सनातन पारंपरिक गुरुओ की अवहेलना के कारण बढेगा,यह वो वर्ग है जो सनातन धर्म के मूलसिद्धांतो का पूर्णतया समर्थन करते है, जैसे वर्णाश्रम हुआ आंतरजातिय विवाह निषेध हुआ आदि आदि, यह समूह में अधिक से अधिक युवा १८ से लेकर २५ तक का वर्ग है,जो सनातन धर्म के सिद्धांतो एवं प्रशस्त मानबिंदुओ की रक्षा के लिए कोई भी हद तक जा सकते है, जैसे की हम जानते थे की पहले धर्म के विरोध में बोलना cool लगता था आज धर्म के समर्थन में बोलना cool है, यह काल की गति है!
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trad के बारे में कुछ तथ्य –
- सनातन धर्म के मूलसिद्धांत के यह पक्के होते है
- कोई भी राजनितिक दल से इन लोगो का कोई भी सबंध नही है
- किसी भी नेता का इन लोगो के साथ कोई लेना देना नहीं है
- यह स्वंतत्र पारम्परिक विचार वाले होते है
- उदेश्य इनका शास्त्रसम्मत राजतन्त्र की स्थापना करना है
- तमाम शास्त्रों के सिद्धांत इनकी अलग शैली में प्रस्तुत करते है
- जैसे की उपर बताया कहीं कहीं पर अतिरेक भी होता है
- महत्वपूर्ण बिंदु : मिडीया इनको अल्ट्रा राईट विंग बनाने में लगी है किन्तु यह न राईट विंग है न लेफ्ट विंग यह, तीसरा मोर्चा है जिसे सनातन विंग कहते है
- यह स्वयं स्फुरित युवाओ का असंगठन है जिसका कोई नेता नही सब युवा अपनी अपनी तरह से धर्म को बचाने के लिए कार्यरत है(मिडिया उस युवाओ को जोम्बी की संज्ञा दे रही है)
- यह असंगठित युवाओ का वो ग्रुप है जो अशास्त्रीय साशन तंत्र से परेशान है, यह वो दबे कुचले युवाओ का असमुह है जिसने ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य होने के कारण खूब गालिया खाई है, अपने साथ पढाई से लेकर नौकरी तक में हो रहे अन्यायों को झेला है, इनके टेलेंट की वर्तमान सिस्टम ने जो अवहेलना की है इनके कारण ही यह ग्रुप जागृत हुआ है!
*मिडिया का रोल*
अब तक जो सुस्त मिडिया थी, इनके पास न्यूज़ मसाले के लिए एक नया मुद्दा आया है उसका नाम है “trad” राईट विंग सत्ता पर आते ही तमाम लेफ्ट विंग का प्रर्दाफाश होने लगा लेफ्ट विंग धर्म विरोधी है यह सर्वविदित है, इसलिए तमाम हिन्दूने मिलकर एक मौका ही खोज रहे थे जैसे मौका मिला लेफ्ट विंग को टाटा कर दिया, किन्तु वर्तमान की कथित हिन्दुत्ववादी सरकार युवाओ की अपेक्षा पर खरी न उतरी इसलिए इन लोगो ने इनका भी बहिष्कार शुरू किया,अब इस विवाद में मिडिया कूद पड़ी है, जो इन युवा वर्ग की
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*स्नान क्या है?*
स्नान-
नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्याद्दवपिपिततर्पणम् (मनु)
अर्थात्-प्रतिदिन प्रातः स्नान करके शुचि होकर सन्ध्यावन्दन तथा देवर्यि तर्पणादि नित्य कर्म करे।
हिन्दु जाति के सभी धार्मिक तथा सामाजिक कृत्यों में 'स्नान' एक अनिवार्य और आवश्यक कृत्य है । संध्या वन्दनादि साधारण दैनिक कृत्यो से लेकर बड़े से बड़े अश्वमेध यज्ञ पर्यन्त सभी कर्मों का प्रारम्भ स्नान से ही होता है। यही क्यों, एक हिन्दू के जीवन का प्रारम्भ भी स्नान से ही होता है और पर्यवसान भी स्नान में ही । बालक, जन्म लेकर ज्योंही जीवन रक्षा के लिये आकुल वाणी में पुकारना प्रारम्भ करता है,-चिरबन्धन से विमुक्त हो ज्योंही वह मुक्तवायु में प्रथम उच्छवास ग्रहण करता है, तभी कुशल धात्री सर्व प्रथम उसके शरीर को स्वच्छ करके स्नान करावी है।
इसी प्रकार जीवन के पर्यवसान में, जब कि उसकी आत्मा शरीर को छोड़कर अनन्त में लीन हो जाती है, तब भी हिन्दू के शरीर को चितारोहण से पूर्व एक बार पुनः स्नान कराया जाता है और अन्त मे जब सब कुछ 'भस्मान्त शरीरम्' बन जाता है उस समय उस भस्म में से चुनी हुई हिन्दू की वह अस्थिये भी पतित पावनी जाह्नवी में अनन्त स्नान के लिये विसर्जित की जाती हैं। इससे अधिक स्नान का महत्व किस देश और किस जाति में देखने को मिल सकता है ? हिन्दुओं के हरिद्वार काशी प्रयाग कुरुक्षेत्र उज्जैन पुष्कर आदि सभी तीर्थ स्थानों की महिमा स्नान पर ही निर्भर है। इन स्थानों पर विना किसी विशेष प्रोपेगेण्डे के तत्चत् समय में स्नान के लिये उमड़ पड़ने वाले जन समुद्र को देखकर हिन्दुओं की स्नानप्रियता का अनुमान करना कुछ कठिन नहीं है। वेदादि शास्त्रों में स्नान महिमा के सूक्त के सूक्त भरे पड़े हैं।
गङ्गे ! त्वदर्शनान्मुक्तिर्न जाने स्नानजं फलम् ।
-आदि अनेक शास्त्रीय वचनों में स्नान का अवर्णनीय महत्व प्रतिपादित किया है। उसके आगे मुक्ति जैसा पदार्थ भी अत्यन्त तुच्छ माना गया है। यह स्नान (अभिषेक) ही है जो कलके एक सामान्य जन को दूसरे ही दिन सार्वभौम सम्राट् के महान् पद पर प्रतिष्ठित कर देता है।
सौजन्य : क्यों?
लेखक : धर्मसम्राट करपात्रीजी महाराज
संकलन : पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः 🚩 गुजरात
💐🙏🏾जय माँ भगवती🙏🏾💐
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उतना शारीरिक कार्यों के लिये नहीं।
इन सूक्ष्म किन्तु महत्व पूर्ण तथ्यों के मुला देने से ही हम लोग अनेक प्रकार के कष्ट एठाते हैं । डाक्टर और वैद्य रोगों का निदान अन्य बातों में ढूंढते हैं उन को क्या पता कि रोगी ने यह बीमारी प्रकृति के नियमों का उलङ्घन करके प्राप्त की है।
महर्षियों ने तैल मर्दन के इस निषेधात्मक वचन के परिहार के लिये भी एक व्यवस्था की है जो उनकी सूक्ष्मदर्शिनी बुद्धि ज्वलन्त उदाहरण तो है ही, किन्तु वनस्पति के ज्ञान पर आधिन होने के कारण अमोघ भी है।
रखौ पुष्पं गुरौ दूर्वा, भौमवारे च मृतिका ।
गोमयं शुक्रवारे च तैलाम्यङ्ग न दोपभाक्
अर्थात-यदि रविवार को पुष्प, गुरुवार को दूर्वा, मंगल को मिट्टी और शुक्र को जरा सा गोमय हाल लिया जाय तो कोई दोष नहीं।
उपर्युक्त श्लोक में वर्णित सभी वस्तुएं उन २ दोषों की उपशमक हैं । सभी जानते हैं, कि गुलाब आदि के फूल ठण्डे होते हैं, उन्हें ठण्डाई आदि में डालकर पिया भी जाता है। उन्हें तेल में डालकर मालिश करने से तेल के सुगन्धित होने के अतिरिक्त इस की उष्णता शान्त हो जाती है और गर्मी बढ़ाने वाला न होकर पित्त को शान्त करने वाला बन जाता है। हरी दूर्वा स्मृतिशक्ति के लिये अत्युपयोगी, नेत्रों को ज्योति प्रदान करती है। प्रातःकाल उस पर घूमने से मस्तिष्क निर्मल हो जाता है। तेल में संयुक्त होने से उसके गुण तेल में आ जाते हैं और वह शरीर में ज्ञानशक्ति की अभिवृद्धि करती है। विवाहादि के अवसर पर इसीलिये उसको तेल में डुबा २ कर वर का उससे अभिषेक किया जाता है।
मंगल भूमि पुत्र है। हमारा रक्त भी पार्थिव वस्तुओं से ही बनता है। जरा सी मिट्टी मिला देने से तेल की उग्र उष्ण शक्ति निष्प्रभ हो जाती है। और वह रक्त के लिए हानिकारक नहीं रहता। गोमय और गोमूत्र जैसी वीर्यशोधक औषधी कोई नहीं। शोधन की जो प्रबल शक्ति इन दोनों वस्तुओं में है, वह अन्यत्र नहीं मिल सकती । तेल के साथ गोमय को मिलाकर मलने से उसका वीर्य पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव दूर हो जाता है। वह हानिकारक होने की बजाय त्वचा सम्बन्धी रोगों के लिये औषध बन जाता है।
तेल मर्दन के सम्बन्ध मे यहां इतना अधिक और समझ लेना चाहिये , कि अमुक वार को तेल मर्दन न करने की, और अत्यावश्यक दशा मे उसमें अमुक वस्तु के संमिश्रण की जो बात हमने लिखी है, वह वस्तुत सबकी सब व्यवस्था तिल निसृत स्नेह के सम्बन्ध मे ही लागू होती हैं, क्योंकि संस्कृत व्याकरणानुसार तिलों से निकाली हुई चिकनाई का नाम ही तेल है, आजकल सरसों, गिरी मूंगफली आदि सभी वस्तुओं से निकलने वाली चिकनाई को 'तेल' कह देने की जो परिपाटी पड़ गई है वह वस्तुतः हिन्दी उर्दू आदि भाषाओं के अभूरेपन का ही परिणाम है। संस्कृत साहित्य में सरसों से निकलने वाले स्नेह = चिकनाई को 'सार्षप' कहते है। इसीप्रकार अन्यान्य वस्तुओं के नाम के अनुसार ही उनसे तद्धित प्रत्यय लगाने पर तादृश नाम सिद्ध होते हैं। इसीलिये शास्त्र मे सुस्पष्ट रूप से सदैव लगा सकने योग्य तेल का वर्णन करते हुए लिखा है कि-
सार्षपं गन्धलं च यत्तैलं पुष्पवासितम् ।
अन्यद्रव्ययुतं तैलं न दुष्यति कदाचन ।।
अर्थात्--सरसों का तेल, सुगन्ध युक्त तेल, फूलों से वासित तेल और अन्य द्रव्य जिसमें मिलाया गया हो ऐसे सब तेल सब दिन लगाये जा सकते हैं।
आशा है, इस विवेचन से हमारे पाठकों को इन शास्त्रीय श्लोकों की यथार्थता समझने में कुछ कुछ सहायता अवश्य मिलेगी।
संदर्भ ग्रन्थ : क्यों?
- धर्मसम्राट करपात्रीजी महाराज
संकलन - पं.हिरेनभाई त्रिवेदी,क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः🚩गुजरात
💐🙏🏾जय माँ भगवती।🙏🏾💐
*तेल मर्दन रवि मङ्गल आदि वारों को क्यों नहीं?*
यह स्मरण रखिए कि आप तेल मर्दन का वास्तविक लाभ तभी उठा सकते हैं जब इसका आचरण धर्मशास्त्रानुसार करें।
बिना समझे बूझे यदि आप अन्धाधुन्ध तेल रगड़ने वैठ जाय, तो उनका परिणाम खुजली आदि रोगों से भी भयङ्कर रोगों में फंसना हो सकता है। उदाहरण के तौर पर यु समझिये। धर्मशास्त्रकारों ने-
तैलाभ्यङ्ग रखौ तापः सोमे शोभा कुजे भृतिः ।
अर्थान्-रविवार को तेल मर्दन से ताप (गर्मी सम्बन्धी रोग) सोम को शारीरिक सौन्दर्य, मगल को मृत्यु, बुध को धनप्राप्ति, गुरु को हानि, शुक्र को दुःख और शनि को सुख होता है।
इस श्लोक में रवि मङ्गल आदि वारों को तेलमर्दन का निषेध किया है। इस निषेध की वैज्ञानिकता को न समझते हुए जन साधारण या तो इसे व्यर्थ का ढोंग बतलाने लग जाते हैं-या इसकी नितान्त उपेक्षा करते है। लेकिन किसी बात को न मानने या जान उसकी उपेक्षा करने से उस वस्तु के गुणावगुण और बूझकर प्रभाव तो नष्ट नहीं हो सकता । धतूरा विष होता है, उसके खा लेने पर व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है। एक बालक ने उसे विना जाने खा लिया दूसरे अल्हड़ युवक ने जानते हुए भी अविश्वास के कारण खा लिया । क्या इन दोनों दशाओं में धतूरे की मारण शक्ति कुण्ठित हो जाएगी? कदापि नहीं उसका प्रभाव अवश्य होगा। यही नियम धार्मिक विधानों के विषय में लागू है। यदि किसी नियम की यथार्थता को न समझ, हम उसका पालन करना छोड़ दें तो इससे उसका प्रभाव तो हुवे बिना न रहेगा।
संसार में रविवार' को सब जगह सूर्य-सम्बधित वार ही कहा जाता है। उसको किसी व्यक्ति विशेष के नाम से न पुकार, पृथ्वी से करोड़ों वर्ग मील दूरी पर विद्यमान अग्नि गोले-सूर्य-के नाम पर ही पुकारा जाता है । हिन्दुस्तान तो ग्रह पूजक देश है, यहां की बात छोड़िये, सुदूर यूरोपीय प्रदेशों में भी इसे Sunday अर्थात् सूर्य का दिन कहा जाता है। यही बात सोम मङ्गलादि सभी वारों के विषय में भी है। प्रश्न होता है, कि क्या वास्तव में इन आकाशम्यग्रहों का अमुक अमुक दिन पर कोई प्रभाव है ? क्यों-संसार के समम्न देश इस विषय मे एक मत है, कहना न होगा कि अवश्य ही सभी देशों के प्राचीन अनुसन्धायकों ने इस प्रभाव को अनुभव किया है तभी सब एक ही परिणाम पर पहुचे हैं । इन दिन का अमुक २ ग्रहके साथ कैसे सम्बन्ध हुवा और क्यों ये उनके नाम से पुकारे जाने लगे ? यह इस प्रकरण से बाहर की बात अन्यत्र प्रसङ्गानुसार इसका विवेचन किया गया है यहां तो केवल इतना समझ लेना पर्याप्त होगा कि अमुक अमुक ग्रहों का अमुक अमुक दिनों के साथ सम्बन्ध है। इस विषय मे पूर्व और पश्चिम दोनों देशों के विचारक एक मत है और वास्तव मे अमुक २ ग्रह का उस २ दिन पर निश्चय ही प्रभाव पड़ता है इस सामान्य सी बात को समझ लेने पर यह समझने मे आपको कोई कठिनता नहीं होगी, कि अमुक अमुक दिन तेल मालिश क्यों नहीं चाहिये । रविवार को ही लीजिये! यह दिन उस ग्रह से सम्बद्ध है, जो संसार भर की तेज, शक्ति का एक मात्र केन्द्र है, गर्मी का भण्डार है, आग की एक ऐसी दहकती हुई भट्टी है, जिसकी गर्मी करोड़ों वर्ग मील की दूरी पर रहने वाले हम लोगों को भी असह्य आंच पहुंचाये बिना नहीं छोड़ती। वास्तव में यह गर्मी या उष्णता ही जीवन है। शरीर मे जब तक पित्त (गर्मी) विद्यमान है वह उस समय तक जीवित है, ठण्डा हुआ कि मरा । पित्त (गर्मी) का इतना महत्व होते हुए भी उसका परिमाण निश्चित है। वह जब तक शरीर में निश्चित मात्रा में रहेगा शरीर निरोग होगा। अपनी मात्रा से बढ़ा, कि अनेक गर्मी सम्बन्धी रोग तुरन्त उत्पन्न हो जाते हैं । रविवार को सम्पूर्ण दिन का वातावरण अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक गर्म होगा ही, जिसके प्रभाव से हमारे शरीर में भी पित्त, अन्य दिनों की अपेक्षा बढ़ा हुआ होगा इधर आपने तेल की बोतल उठाई और लगे शरीर पर रगड़ा लगाने । रग्विार की गर्मी तत्प्रभाव जन्य पित्त की गर्मी, और आपके मर्दन से उत्पन्न हुई गर्मी ।
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आखिर इतनी गर्मी समाएगी कहां ? शरीर में विद्यमान पित्त में उबाल आ जाएगा और परिणाम होगा-"रवो तापः। इसी प्रकार मङ्गल ग्रह को लीजिए । यह पृथ्वी का पुत्र (हमारी भूमि का ही एक टुकड़ा है)। लाल रंग का अत्युष्ण ग्रह है और इसका प्रभाव हमारे रक्त पर पड़ता है। मङ्गल के दिन रक्त में दबाव तो पहिले से ही विद्यमान है तब मालिश के द्वारा उस दबाव में और वृद्धि होगी जो कि अपस्मार मृगी खुजली फोडे फुन्सी आदि अनेक रोगों के रूप में प्रगट होकर शीघ्र मृत्यु का कारण बन सकती है। यही वात शुक्र-जो कि मनुष्य शरीरान्त वर्ती शुक्र वीर्य) का स्वामी है–के विषय मे समझनी चाहिये। शुक्र को तेल मर्दन से वीर्य में उष्णता की अभिवृद्धि होने के कारण उसका दूषित होना और मनुष्य को अनेक कष्टों में डाल देना स्वाभाविक है। चूंकि बृहस्पति का सम्बन्ध हमारी बुद्धि से है इसलिये वहदिन बौद्धिक कार्यों के लिये जितना उपयुक्त हो सकता है
साइंस पढ़े हुए लोग जाति या वर्ण की व्यवस्था इस प्रकार समझें कि जैसे स्वर्ण, रजत और ताम्र आदि 3 धातु 3 गुण सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हैं।
अब 3 धातुओं से आपने 4 मिश्रण तैयार कर लिया जिसे अंग्रेजी में एलॉय कहते हैं जिसमे 3 धातुओं की मात्रा भिन्न भिन्न हैं। अब जिसमे स्वर्ण की मात्रा सबसे अधिक होगी वो ही मिश्रण सबसे मूल्यवान होगा। मान लीजिए 4 मिश्रण A,B,C और D हैं।
यही नियम वर्ण व्यवस्था में हैं जिसमे सतोगुण सबसे अधिक होता है वो होता ब्राह्मण और जिसमे सबसे कम वो शुद्र और मध्य क्षत्रिय और वैश्य आदि।
तो अब आप स्वयं सोचिये कि यदि आप किसी भी दो मिश्रण को मिलाकर कोई नई वस्तु बना दें तो जो नई वस्तु बनेगी वो मिलाए हुए किस मिश्रण के समान होगी तो उत्तर है किसी के नही वो एक स्वतन्त्र मिश्रण हो जाएगी क्योंकि नए मिश्रण में मूल तीनो धातुओं की मात्राएँ बदल जायेंगे।
उदाहरण के लिए A और B को मिला दिया तो जो नया बनेगा वो न A होगा और न B होगा ये एक अलग ही नयी मिश्रण तैयार हो जाएगी जिसे E कह सकते हैं क्योंकि इसमें सोने, चांदी और ताम्बे की मात्राएँ A और B से अलग भिन्न भिन्न हो जाएगी।
पर यदि आप किसी एक मूल मिश्रण से ही कोई वस्तु बनाते हैं तो आप उसी शुद्ध मिश्रण के कहलायेंगे। जैसे A मिश्रण से कोई वस्तु बनाते हैं बिना कुछ मिलाए तो वो A ही कहलायेगा।
यही नियम है वर्ण व्यवस्था में।
यह संसार त्रिगुणात्मक हैं
इन्ही 3 गुणों से मनुष्य भी बना जिसमे सबसे पहले 4 जातियाँ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र ईश्वर द्वारा बनाया गया जिन्हें वर्ण भी कहते हैं। गीता में भगवान् ने स्वयं कहा कि ये चारों वर्ण उन्होंने स्वयं बनाये हैं।
अब इन जातियों को मिश्रित संतान उत्पन्न करने की मनाही है पर कुछ लोग नही माने और मिश्रित संतान उत्पन्न करते गए जिससे नई नई जातियाँ बनती गयी। यहाँ तक कि सन्यास ले चुके या साधु बन चुके लोगों ने भी काम के वशीभूत होकर संतान उत्पन्न कर दिए जिससे और भी नई जातियाँ बन गयी।
आज कलयुग आते आते हजारों जातियाँ हैं जो इन्ही मूल चार जातियों के कुछ लोगों ने उत्पन्न कर दी हैं।
सनातन धर्म वास्तव में इन्ही चार मूल ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र जातियों में विभक्त हैं।
भारत की समृद्धि का मूल भी यह जाति व्यवस्था ही रही है जब जब नई उत्पत्ति हो गयी तब तब हमारे पूर्वजों ने उसे एक नयी स्वतन्त्र जाति बनाकर, उस जाति को एक जन्मना कार्य देकर जाति व्यवस्था को बचाये रखने का प्रयास किया। पर अंग्रेजों ने आर्य समाज, इस्कान, ब्रह्म समाज, राम कृष्ण मिशन, आरएसएस जैसे तमाम संगठन बनाकर धर्म अध्यात्म, वेद, योग आदि के नाम पर वर्ण अथवा जाति की व्यवस्था को नष्ट करने लगे। आज परिणाम यह है कि इतना ज्यादा मिश्रण हो गया कि कुछ पता ही नही है कि कौन कितने पीढ़ी पहले क्या था?
ईसाई और मुसलमान कभी न कभी किसी 4 वर्ण में रहने वाले सनातन धर्मी ही होंगे पर वो हजारों वर्ष पूर्व सनातनधर्म छोड़ दिये और वर्ण अथवा जाति की पहचान को ही मिटा दिए। अब यदि उनमें से कोई सनातनधर्म के अनुसार जीवन जीना चाहता है तो बिल्कुल जी सकता है पर उसकी जाति किसी चार मूल जाति तो छोड़िए उनके द्वारा मिश्रित होकर बने अन्य स्वतंत्र जातियों में भी नही गिनी जा सकती।
सब कलयुग का प्रभाव है कलयुग में वर्ण और जाति तो नष्ट होने ही हैं पर भगवान् की यह भी प्रतिज्ञा है कि मूल बीज को नष्ट नही होने देंगे अतः शुद्ध रूप से ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र तो कलयुग के अंत तक रहेंगे ही बीज को नष्ट करने की छमता संसार के किसी नरसिंघानंद मे नही है।
कलयुग में दो जातियों से संतान उत्पन्न करना निषेध है अतः जितने भी विवाह भिन्न भिन्न जातियों में हो रहे हैं वो सब शास्त्र विधि के विरुद्ध होने से अवैध हैं और उनकी संताने भी अवैध संताने कहलाएंगी। हा कोर्ट या संविधान के नियम से भले वैध हो पर धर्मराज यमराज के यहाँ उन्हें अवैध ही माना जायेगा वहाँ तो शास्त्र ही चलता है संविधान नही।
आदि शंकराचार्य भी इसी जाति की व्यवस्था बचाये रखने के लिए निर्देश देकर चले गए क्योंकि जाति धर्म ही स्वधर्म है सनातन धर्म है। गीता में जातिधर्म कुलधर्म को सनातन कहा गया है- जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः।।
जो लोग वर्ण व्यवस्था को कर्मणा कहते हैं और वर्ण अथवा जाति को नष्ट करने पर लगें है वो सब सनातनधर्म के मूल शत्रु हैं और धर्मरक्षकों के द्वारा वध करने योग्य हैं ये शास्त्रों में ऋषियों का आदेश हैं।
जाति पेट से पैदा हुए बच्चे को मिलती है वो भी तब जब स्त्री पुरुष दोनों एक उसी जाति के हो। किसी मनुष्य को बिना दूसरे जाति में पैदा हुए वो जाति नही मिल सकती। यही सत्य है।
दीपक कुमार केशरी
#सनातनी
घरवापसी पर गैर हिन्दू की जाती का आवंटन कैसे हो?
लिक खोले
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*अधर्मियों ने मिलकर पुरानी आईडी उड़ा दी, नई आईडी से जुड़िए।*
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पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिक ब्राह्मणः 🚩
*प्रातः जागरण क्यों ?*
यद्यपि उपरोक्त प्रश्न का वास्तविक उत्तर तो इसका आचरण करने पर ही मिल सकता है, क्योंकि किसी भी शंका का समाधान उसके उत्तर में प्रतिपादित तथ्यों की अनुभूति से ही सम्भव है, तथापि इतना जान लेना चाहिये कि यह समय शारीरिक स्वास्थ्य, बुद्धि, आत्मा, मन आदि सभी की दृष्टि से निद्रा छोड़कर जग जाने के लिए परम उपयुक्त है। इस समय प्रकृति मुक्तहस्त से स्वास्थ्य, बुद्धि मेधा प्रसन्नता और सौन्दर्य की अपार राशि लुटाती है। इस समय बहने वाली वायु के एक एक कण में संजीवनी शक्ति का अपूर्व संमिश्रण रहता है। यह वायु रात्रि में चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी पर बरसाये हुये अमृत विन्दुओं को अपने साथ लेकर बहती है। इसीलिये शास्त्रों मे इसे वीरवायु के नाम से स्मरण किया है।
जो व्यक्ति इस समय निद्रा त्याग कर तथा चैतन्य होकर इस वायु का सेवन करते हैं उनका स्वास्थ्य सौन्दर्य और आयुष्य वृद्धि को प्राप्त होता है। मन प्रफुल्लित हो जाता है एव आत्मा में नव चेतनता का अनुभव होता है। आयुर्वेद कहता है-
वर्ण कीर्ति मतिं लक्ष्मी स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति ।
ब्राममुहूर्ते संजाग्रच्छ्रियं वा पंकजं यथा ॥ (भै० सार-६३)
अर्थात्-ब्रह्म मुहूर्त मे उठने से पुरुष को सौन्दर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। उसका शरीर कमल के सदृश सुन्दर हो जाता है।
इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण रात्री के पश्चात् प्रातः जब भगवान् सूर्य उदय होने वाले होते हैं तो उनका चैतन्यमय तेज आकाश मार्ग द्वारा विस्तृत होने लगता है। यदि मनुष्य सजग होकर स्नानादि से निवृत्त हो, उपस्थान एवं जप द्वारा उन प्राणाधिदेव भगवान सूर्य की किरणों से अपने प्राणों में अतुल तेज का आह्वान करे, तो वह पुरुष दीर्घजीवी हो जाता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त वायु का विभाग साधारणतया निम्नक्रम से किया जाता है।
आक्सीजन ( प्राणप्रदवायु)२१ प्रतिशत
कारवन डाईऑक्साइड ( दूषित वायु) ६ प्रतिशत
नाईट्रोजन ७३ प्रतिशत
कुल १०० प्रतिशत
विज्ञान के अनुसार सम्पूर्ण दिन वायु का यही प्रवहण क्रम रहता है किन्तु प्रातः और सायं जब सन्धि काल होता है इस क्रम में कुछ परिवर्तन हो जाता है । साय काल जगत्प्राणप्रेरक भगवान् सूर्य के अस्त हो जाने से आक्सीजन (प्राण प्रद वायु) अपने स्वाभाविक स्तर से मन्द पड़ जाती है और मनुष्यों की प्राणशक्ति भी क्षीण हो जाती है उन्हें विश्राम की आवश्यकता अनुभव होने लगती है।
इसी प्रकार प्रातः काल के सूर्योदय के साथ ही उस वायु के स्तर में वृद्धि होना स्वाभाविक है । इसलिये यदि इस समय निद्रामुक हो कर मनुष्य उस वायु का सेवन करे तो उस का स्वास्थ्य वहुत अच्छा हो जाएगा- यह बतलाने की विशेष आवश्यकता ही नहीं है । वास्तव में दीर्घजीवन का एक ही मूल मन्त्र है-जल्दी सोओ जल्दी उठो । Early to go bed early to rise, make a man Healthy Wealthy and wise अर्थात्
जल्दी सोना और जल्दी उठना मनुष्य को स्वस्थ, धनवान और बुद्धि- मान बना देता है" की अंग्रेजी कहावत सर्वाश में सत्य ही है।
प्रातः जागरण और महानता का पारस्परिक योग है। सभी महान व्यक्ति प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में ही उठते हैं, और इस समय नियम-पूर्वक प्रति दिन उठने वाले प्रत्येक व्यक्ति का जीवन, शारीरिक और बौद्धिक उन्नति से विलक्षण हो जाता है इस में किंचित् भी सन्देह नहीं ।
लिखने पढ़ने के लिये तो वास्तव में इस से उपयुक्त समय हो ही नहीं सकता । एकान्त और सर्वथा शान्त वायुमण्डल में जब कि मस्तिस्क बिलकुल उर्वर होता है, ज्ञानतन्तु रात्री विश्राम के बाद नव-शक्ति-युत होते हैं मनुष्य को वौद्धिक कार्य करने में विशेष श्रम नहीं करना पड़ता।
इसलिये हमें प्रकृति के इस अमूल्य वरदान से लाभ उठाना चाहिये और ऐसा अभ्यास डाल लेना चाहिये कि बिना किसी की महायता के प्रतिदिन उठ जावें। इस के लिये एक छोटा सा उपाय कार्य में लाया जा सकता है। रात्री में सोते समय यदि व्यक्ति अपनी आत्मा से प्रातः अमुक समय पर उठने का संकल्प व्यक्त करदे तो निश्चय ही उसी समय पर नींद खुल जायगी और यदि उस समय हमने आलस्य का।आश्रय नहीं लिया तो फिर कुछ दिनों में बिना किसी की सहायता के स्वतः उठने लगेगे।
- धर्मसम्राट करपात्रीजी महाराज
जय श्रीमन्नारायण
संकलन - श्रीवैदिक ब्राह्मणः 🚩 गुजरात
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*"शिखा (चूड़ाकर्म) जनेऊ (उपनयन) संस्कार को आप एक छोटा सा चिन्ह मात्र मानते हैं। यदि शास्त्र का प्रामाण्य स्वीकृत नहीं है तो अन्य संस्कारों का भी कोई महत्व नहीं है, फिर इस अधकचड़े हिंदुत्व और संस्कार आदि की अपेक्षा तो अप्टूडेट पूर्ण परिवर्तनवादी कम्युनिस्ट ही अच्छे हैं।*
*आश्चर्य है आप एक तरफ शास्त्रों का प्रामाण्य नहीं मानते, प्राचीन किसी भी व्यवस्था की उपयोगिता समाप्त हो जाने पर फेंक देना उचित मानते हैं, और दूसरी तरफ शास्त्रैकसमधिगम्य संस्कारों के बल पर हिंदुत्व की बात करते हैं।"*
*- अनन्त श्री विभूषित धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज।*
*प्रातः जागरण*
_- अनंतश्री विभूषितश्री यतिचक्रचूड़ामणि धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज_
हमारी दैनिक चर्या का प्रारम्भ प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में जागरण से होता है । शास्त्रों की आज्ञा है-
ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत ।
अर्थात् प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठना चाहिये । ब्रह्म मुहूर्त की व्याख्या करते हुए बतलाया गया है--
रात्रः पश्चिमयामस्य मुहतों यस्ततीयकः।
स ब्राह्म इति विज्ञेयो विहितः स प्रबोधने ॥
अर्थात्-रात्रि के अन्तिम प्रहर का जो तीसरा भाग है उसको ब्राह्म मुहूर्त कहते हैं। निद्रा त्याग के लिये यही समय शास्त्र विहित है।
प्रात जागरण का यह नियम हमारी दैनिक चर्या का अत्यंत महत्व पूर्ण नियम है। समस्त दैनिक क्रियाओ की सफलना या असफलता बहुत कुछ इसी पर निर्भर है, क्यों कि प्रत्येक प्रभात हमारे नये जीवन का प्रारम्भ काल है। उस में नव जीवन के निर्माण का स्फूर्तिप्रद सन्देश निहित है। यदि हम उस समय प्रमाद और आलम्य में सोते रहकर- उस सन्देश को न सुन पाए तो हम जीवन में पिछड़े ही समझो। जो जीवन के प्रारम्भ में ही अपने साथियों से पीछे रह गया हो भविष्य में उस के आगे बढ़ने की क्या आशा? वस्तुत देखा जाय तो ज्ञात होगा कि हमारा प्रत्येक दैनिक जीवन हमारे पचास सौ वर्ष के वृहत्तर जीवन का ही नहीं, किन्तु अर्बो खर्बो वर्षों के सृष्टि जीवन का संक्षिप्त संस्करण है।
विशाल सृष्टि और प्रलय की एक हल्की सी झांकी हम अपने दैनिक जीवन में प्रतिदिन अच्छी तरह देख सकते हैं। जिस प्रकार प्रलय काल में समस्त सृष्टि, कर्म-विरत एवं चेतना-शून्य होकर निश्चष्ट भाव से, तमोमयी कालरात्रि की गोद में समा जाती है और समय आने पर प्रकृति की प्रेरणा से उबुद्ध होने लगती है, उसी भांति दैनिक जीवन में भी दिन भर के परिश्रम से थके मांदे प्राणी चेतना शून्य हो कर रात्रि की गोद में विश्राम लेते हैं और प्रातः होने पर प्रकृति की प्रेरणा से पुनः प्रबुद्ध हो जाते हैं। यह कितनी बड़ी विडम्बना है, कि इस प्रेरणा को, उच्छृङ्खल मानव सुन कर भी नहीं सुन पाता, जब कि प्रकृति के नियन्त्रण में रहने वाले चराचर के समस्त जीव उस के समान्य से इंगित पर अपने आप जाग जाते हैं।
कभी सूक्ष्म दृष्टि से इस समय का अध्ययन कीजिए फिर आप देखेंगे, कि उस समय का प्राकृतिक वातावरण कितना मधुर और निराला होता है। प्रातः काल होते ही कमल खिल उठते हैं भ्रमरावली गुजार करने लग जाती हैं, पक्षी अपने कलरव से उपवनों और उद्यानों को मुखरित कर देते हैं, शीतल मन्द समीर अपने आवरण में मकरन्द को मादक गन्ध लिये डोलने लग जाता है। सचमुच ही समस्त सृष्टि एक नवीन जीवन की अनुभूति से खिल उठती है। और तो और, विभक्षी कुक्कुट सा अधम जीव भी प्रातः होने के साथ ही तार-स्वर में बांग देकर अपने जग जाने का प्रमाण देना प्रारम्भ कर देता है। और तब, -मानव-आज का मानव। प्रकृति को धता बता, प्रातः जागरण के वैदिक उपदेश को चन्द्र व्यक्तियों के लिये ही आचरणीय उपदेश समझ, सूर्य चढ़े तक बिस्तर पर करवटे लेता नहीं अघाता। उसका प्रातःकाल तो तब होता है जब ८ बजे रेडियो के मधुर श्वरो से
जागा सब संसार उठो अब भोर भई!
की सुरीली आवाज, उसको प्रातःकाल हो जाने की सूचना देने लगती है।
जय गुरुदेव 🙏🏾💐
संकलन - हिरेन त्रिवेदी,'क्षेत्रज्ञ'
श्रीवैदिक ब्राह्मण ग्रुप,गुजरात
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*विचार कैसे संचार बनता है।*
श्रीवैदिक ब्राह्मण ग्रुप गुजरात दो व्यक्तियों(हिरेन त्रिवेदी व हर्ष जोशी) के विचार से संचार की यात्रा है। जो आज आप सब इस समूह से जुड़े है वो गुजरात में डिजिटल सोशल मीडिया पर *ऑथेंन्टिक सत्य सनातन धर्मप्रचार* का सबसे बड़ा उभरता प्रकल्प है। अर्थात यह कहां जाए सोशल मीडिया के माध्यम से धर्म क्रांति है।
आज श्रीवैदिक ब्राह्मण ग्रुप केवल व्हाट्सएप पर ५० ग्रुप के साथ १०००० लोग जुड़े है।
इनके अलावा ७००० लोग नीचे दिए गए लिंक टेलीग्राम से जुड़े है
धर्मसम्राट श्री करपात्री जी महाराज
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हर हर शंकर जय जय शंकर 💐
हर हर महादेव। 💐
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२. *वेद ही सदाचार के मुख्य निर्णायक।(शंकराचार्य स्वामीश्री अभिनव विद्यातीर्थ जी - श्रृंगेरी)*
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हर हर शंकर 💐
वंदे गुरु परंपरा। 🙏🏾💐
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हर हर महादेव
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