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सनातन धर्म • Sanatan Dharma Ebooks & Quotes | Hinduism | Bhagavad Gita | Ramayan & Mahabharat | Ayurveda & Upanishads

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विप्रा ऋतस्य वाहसा। ज्ञानी सत्य के प्रचारक होते हैं।
अथर्व. - 20.138.2

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः। सभी दिशाओं से अच्छे विचार मेरी ओर आएँ।
ऋग्वेद- 1.89.1

सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषास्त्रयः। शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम्॥ तीन व्यक्ति पृथ्वी (से) सुवर्णपुष्प को तोड़ते हैं - एक शूरवीर, एक विद्यावान्, और एक जो सेवा करना जानता है ।
महाभारतम् ५.३५.७४

तेजोविहीनं विजहाति दर्पः शान्तार्चिषं दीपमिव प्रकाश:। तेजहीन व्यक्ति को उत्साह उसी प्रकार त्याग देता है जैसे दिए की लौ बुझ जाने पर उसका प्रकाश।
किरातार्जुनीयम्१७/१६

विद्वान् भवते नातिवादी। विद्वान् (तत्त्वज्ञ) अतिवादी (ज्यादा बोलने वाला) नहीं होता है।
मु. उ. ३.१.४

उद्यानं ते पुरुष नावयानम्। हे मनुष्य! तुम्हारा सदा उत्थान हो, पतन नहीं।
अथर्ववेद - 8.1.6

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वशास्त्राणां धर्मस्य च धनस्य च॥ घड़ा जल के बूंदो के गिरने से धीरे-धीरे भरता है । वही सभी शास्त्रों का, धर्म व धन पर भी लागू होता है ।
हितोपदेशः २.४

क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्। सारे आभूषण चाहे कोई भी हों एक समय आने पर नष्ट हो जाते हैं। परन्तु वाणी रूपी आभूषण सदा बना रहता है, यह कभी नष्ट नहीं होता। इसलिए वाणी का आभूषण पहनना श्रेष्ठ है।
नीतिशतकम्-भर्तृहरि

कण्टकावरणं यादृक्फलितस्य फलाप्तये । तादृक्दुर्जनसङ्गोSपि साधुसङ्गाय बाधनं ॥ जिस प्रकार एक फलदायी वृक्ष के कांटे उसके फलों को प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न करते हैं, वैसे ही दुष्ट व्यक्तियों की सङ्गति (मित्रता) भी साधु और सज्जन व्यक्तियों की सङ्गति में बाधा उत्पन्न करती है ।
अज्ञात

पण्डिते च गुणाः सर्वे मूर्खे दोषा हि केवलम् । तस्मान्मूर्खसहस्त्रेषु प्राज्ञा एको विशिष्यते ।। विद्वान व्यक्ति में गुण ही गुण होते हैं और मूर्ख में केवल अवगुण होते हैं । अतः संसार में हजार मूर्खो के स्थान पर एक विद्वान व्यक्ति का सम्मान होता है ।
अज्ञात

न वाच्य: परिवादोऽयं न श्रोतव्य: कथञ्चन। कर्णावपि पिधातव्यौ प्रस्थेयं चान्यतो भवेत्।। दूसरे की निंदा कभी भी न तो करनी चाहिए और न ही सुननी चाहिए। या तो कान बंद कर लेना चाहिए या कहीं अन्यत्र चल देना चाहिये।
महाभारत,शान्तिपर्व,१३२/१२

इस क्षणको मस्तीसे व्यतीत होने दो। अगले क्षणकी कल्पना करके इसे खोओ मत। इस तरह कुछ भी हाथ नहीं लगता। भूत-भविष्यकी चिन्ता छोड़कर, आगे-पीछेके क्षणोंको न देखकर, वर्तमान क्षणमें ही अपने स्वरूपको देखो।
स्वामी अखंडानंद सरस्वती

जब कोई ऐसा कार्य सामने आ जाता है जो हृदयके विरुद्ध है तो घबराओ नहीं, भागो नहीं । आत्मविश्वास और दृढ़ताके साथ उसका सामना करो। समझो कि आत्मोन्नति करनेका अवसर प्राप्त हुआ है। इसीसे आत्मशक्तिका विकास होता है। वस्तुतः तुममें वह बल वह शक्ति वह आनन्द है जो असीम, अनंत और अगाध है, परन्तु तुम भूल गये हो, इसीसे घबराहटमें पड़ जाते हो। उस शक्तिका स्मरण करो, उसका अनुभव करो! यह घरमें भी सम्भव है और बाहर भी।'
स्वामी अखंडानंद सरस्वती

जो बीत गया, उसे भूल जाओ। जो आनेवाला है, वह तुम्हारे अधिकारके बाहर है। तुम केवल वर्तमानको सुधारो, कहीं यह क्षण व्यर्थ न बीत जाये। अनुभव करो, आज तुम्हारा दिन सार्थक बीत रहा है। तुम भगवान् की ओर बढ़ रहे हो।
स्वामी अखंडानंद सरस्वती

प्रश्न-भगवान् ने गीता में कहा है कि शरीर रूप यन्त्र पर चढ़े हुए प्राणियों को उनके हृदय में स्थित परमेश्वर घुमाता है अर्थात् उनसे कर्म करवाता है, तब फिर उनका फल प्राणियों को क्यों भोगना पड़ता है? उत्तर-क्रिया में और कर्म में अन्तर है। उस अन्तर को समझ लेने पर यह प्रश्न हल हो जायगा। जिसमें कोई कर्त्ता नहीं होता, जो किया नहीं जाता, अपने आप होता है; जैसे हवा से पेड़ों का हिलना आदि, वह तो क्रिया है और जो कर्त्ता बनकर राग द्वेषपूर्वक किया जाता है, वह कर्म है। अतः जिसका सचमुच यह भाव है कि जो कुछ हो रहा है, वह ईश्वर की शक्ति और प्रेरणा से ही हो रहा है, मेरा उससे कोई सम्बन्ध नहीं है। इस भाव से जो अपने को सर्वथा असंग समझ लेता है, न तो उस कर्म का कर्त्ता बनता है औश्र न उसमें आसक्त होता है, वह भोक्ता भी नहीं होता। उसके द्वारा होने वाला कर्म वास्तव में कर्म नहीं है। वह तो क्रिया मात्र है। अतः उसका कोई फल नहीं बनता; किंतु जो मनुष्य स्वयं किसी कर्म का कर्त्ता बनकर उसे आसक्तिपूर्वक, किसी प्रकार की फल कामना से करता है, उसे उस कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है। जो कर्त्ता है, वही भोक्ता है।।
स्वामी शरणानंद

25.सन्त सौरभ ::51:: (१०) प्रश्न-गीता में निष्काम कर्म के द्वारा परमात्मा की प्राप्ति का उपाय बताया गया है। हम लोग गृहस्थ हैं। हम लोगों के लिये लौकिक उन्नति की चेष्टा करते हुए निष्काम कर्म करना बड़ा कठिन है, तो कैसे करना चाहिये? उत्तर-लौकिक उन्नति और पारलौकिक उन्नति के अर्थात् भगवत्प्राप्ति के साधन अलग-अलग नहीं हैं। जो वास्तविक लौकिक उन्नति का साधन है, वही पारलौकिक उन्नति का भी साधन है। इन दोनों का भेद मानकर लोग अपने कर्त्तव्य में भूलकर बैठते हैं। वास्तव में लौकिक उन्नति वाला वही है कि जिसकी आवश्यकता दूसरों को हो जाय, संसार में जो बड़े आदमी समझे जाते हैं, वे भी जिसके पीछे-पीछे फिरते रहें और उनकी कोई वस्तु वह अपने उपयोग में ले ले तो लोग अपना अहोभाग्य समझें। जो मनुष्य दूसरों से कुछ लेना चाहता है, अपने सुख का आधार दूसरों को मानता है, दूसरों से आशा लगाये रहता है, वह क्या उन्नतिशील कहा जा सकता है? वह तो चाहे कितना भी बड़ा वैभवशाली क्यों न हो, दरिद्र ही है। उन्नति शील तो वही है जो प्राप्त विवेक का आदर और बल का सदुपयोग करता है। दूसरों के हित में अपने तन, मन, धन को लगा देता है। लोभी मनुष्य कभी भी उन्नति शील नहीं हो सकता। विचार करना चाहिये कि कर्म करने का विधान किसलिये है? विचार करने पर मालूम होगा कि मनुष्य में जो क्रियाशक्ति का वेग है, उसकी जो कर्म करने में आसक्ति है, उसे मिटाने के लिये ही कर्मों का विधान है। अतः अपने स्वभाव और परिस्थिति के अनुसार जो कर्म कर्त्तव्य रूप से प्राप्त हुआ है, उसे खूब सावधानी के साथ उत्साहपूर्वक सांगोपांग पूरा कर दे; किंतु उस कर्म के फलरूप में प्राप्त होने वाले पदार्थों से अपना मूल्य अधिक समझें। उनके बदले में अपने आपको बेचे नहीं; क्योंकि जो कर्म से प्राप्त होने वाले फल से अपना मूल्य कम कर लेता है, उनके बदले में अपने को बेच देता है, वह न तो वास्तविक लौकिक उन्नति कर सकता है और न पारलौकिक उन्नति ही कर सकता है। वह उन वस्तुओं की दासता के कारण सदैव अभाव का ही अनुभव करता रहता है। जो यह समझता है कि यदि मुझे कर्म से कुछ लेना ही नहीं है तो मैं कर्म क्यों करूँ, वह भी कर्म को ठीक ठीक नहीं कर सकता, आलसी बन जाता है। जो फल के लालच से कर्म करता है, उसका लक्ष्य भी कर्म की सुन्दरता पर नहीं रहता। अतः वह भी करने योग्य कर्म को ठीक-ठीक पूरा नहीं कर सकता। लोभ के वश में होकर वह उस कर्म में अनेक प्रकार की त्रुटियों का समावेश कर लेता है। कर्म को सांगोपांग तो वही कर सकता है, जिसके मन में फल का लोभ नहीं है, प्रत्युत् कर्त्तव्य-कर्म को सांगोपान पूरा करना ही जिसका उद्देश्य है। कर्म का जो दृश्य फल है, वह तो कर्त्ता चाहेगा तो भी होगा और न चाहेगा तो भी होगा। चाहने और न चाहने से उसमें कोई अन्तर नहीं पड़ेगा। जैसे भोजन करने से भूख की निवृत्ति तो दोनों की ही होगी; परंतु जो स्वाद के लालच से भोजन करेगा, वह कर्म-विधान के विपरीत वस्तुओं को खाकर उलटा अपना अहित कर लेगा। इसीप्रकार व्यापार में भी समझ लेना चाहिये। व्यापार में लाभ या हानि तो जो होनी है, वही होगी; परंतु जो मनुष्य लाभ के लालच से और हानि के भय से युक्त होकर व्यापार करेगा, वह उस व्यापार में उन नियमों को भी यथायोग्य पालन नहीं कर सकेगा, जिनका पालन करना लौकिक उन्नति की दृष्टि से आवश्यक है। इससे यह सिद्ध हुआ कि निष्काम कर्म में कोई कठिनाई नहीं है, प्रत्युत् सकाम की अपेक्षा निष्काम कर्म ही सुगम है और वही लौकिक उन्नति का भी उपाय है। जो सम्पत्तिशाली मनुष्य लोभ के वश होकर उस सम्पत्ति का सदुपयोग नहीं करता, उससे निर्धनों के अभाव की पूर्ति नहीं करता, वह लोक में भी उन्नतिशील नहीं माना जाता तथा जो निर्धन मनुष्य धन की कामना का त्याग नहीं करता, वह भी सुखी नहीं हो सकता। अतः लौकिक उन्नति के लिये भी सब प्रकार से कामना का त्याग आवश्यक है। जो साधक अपने स्वभाव और परिस्थिति के अनुरूप कर्त्तव्य रूप से प्राप्त कर्म को बिना किसी प्रकार के फल की चाह के ठीक-ठीक पूरा कर देता है, जिस प्रकार उसे करना चाहिये, ठीक वैसे ही करता है, आलस्य या प्रमादवश उसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं करता; शौच जाना, स्नान करना, जीविका के कर्म करना, सेवारूप कर्म करना, भोजन करना, शयन करना आदि जितने भी आवश्यक कर्म हैं, सबको जो यथावश्यक समय पर भलीभाँति कुशलता और उत्साहपूर्वक पूरा कर देता है, उस कर्त्तव्य पालन से उसकी क्रिया शक्ति का वेग और कर्म करने की आसक्ति मिटती जाती है। चित्त शुद्ध हो जाता है। भोगवासना नष्ट हो जाती है। किसी प्रकार की चाह न रहने से चित्त निर्विकल्प हो जाता है। फिर योग से सामर्थ्य, विवेक से बोध और वैराग्य से भगवत्प्रेम की प्राप्ति होकर उसका परलोक भी सब प्रकार से सुधर जाता है।
स्वामी शरणानंद

प्रश्न-शारीरिक रोग आने पर दुःख क्यों होता है? उत्तर-‘मैं शरीर हूँ’ या ‘शरीर मेरा है’-ऐसा समझने से दुःख होता है।
स्वामी शरणानंद

प्रश्न-स्वामी जी! आज तक तो मेरी आँखें बिल्कुल ठीक रही हैं। परन्तु अब 75 वर्ष के बाद रोशनी कम होने पर अभाव खटकने लगता है। उत्तर-आँख तो भैया पहले भी अपनी नहीं थीं। परन्तु इसका पता अभी चला है। गहरी नींद में हर रोज आँखों के रहते हुए भी अन्धे हो जाते हैं। इस पर विचार ही नहीं किया।
स्वामी शरणानंद