गीता ४.३ में कृष्ण कहते हैं — 'मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः' — मैंने तुम्हें यह योग कहा है। 'मया' — मेरे द्वारा।
किन्तु यह 'मेरे द्वारा कहा गया' है, 'मेरा बनाया गया' नहीं। कृष्ण transmitter हैं, originator नहीं — कम से कम इस specific iteration में नहीं, क्योंकि यह 'पुरातन' है, 'परम्परा-प्राप्त' है।
यह एक profound philosophical move है। कृष्ण — जो स्वयं परमेश्वर हैं, सर्वशक्तिमान, सब कुछ के स्रोत — वे भी इस ज्ञान पर 'copyright' का दावा नहीं करते। वे कहते हैं — यह पहले से था, मैंने इसे (विवस्वान को) दिया था, यह परम्परा में बहा, यह खो गया, और अब मैं इसे फिर से दे रहा हूँ।
यह हमारे observation का केन्द्र है — 'स्वत्व नहीं रखा'।
२०वीं सदी के literary theorist Roland Barthes ने 'The Death of the Author' (1967) में तर्क दिया कि पाठ का अर्थ लेखक से स्वतंत्र है — text अपने पाठकों और परम्पराओं के माध्यम से जीवित रहता है, रचनाकार का 'स्वत्व' एक मिथक मात्र है।
कृष्ण का गीता का श्लोक ४.१-३ — Barthes से सहस्राब्दियों पहले — एक समान अंतर्दृष्टि देता है। कृष्ण 'योग' के 'author' नहीं हैं — वे एक 'link' हैं एक chain में। 'विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्' — यह एक citation chain है, जैसे academic writing में।
Barthes कहते — 'text is a tissue of citations'। गीता का यह opening — 'मैंने विवस्वान को कहा, विवस्वान ने मनु को...' — एक tissue of transmissions है। कृष्ण स्वयं इस tissue का हिस्सा हैं, owner नहीं।
Derrida ने 'Given Time: The Gift' (1991) में एक paradox प्रस्तुत किया — एक 'true gift' impossible है, क्योंकि जिस moment gift को 'gift' के रूप में recognize किया जाता है, वह एक exchange-economy में प्रवेश कर जाता है — giver को कुछ (gratitude, status, recognition) मिलता है, इसलिए वह 'pure gift' नहीं रहता।
कृष्ण का 'पुनर्दान' — क्या यह Derrida के इस paradox से बचता है?
गीता ४.३ में — 'भक्तोऽसि मे सखा चेति' — तुम मेरे भक्त और सखा हो, इसलिए (यह रहस्य कहता हूँ)। यहाँ एक 'reason' दिया गया है gift के लिए — यह pure, unconditional नहीं लगता।
किन्तु एक deeper दृष्टि से — यह gift 'योग' का है, जो स्वयं non-possessable है। कृष्ण कुछ ऐसा 'दे' नहीं रहे जो उनसे अलग हो जाए, या जिसका वे कुछ 'खो' दें। ज्ञान देना — knowledge का transfer — एक ऐसा 'gift' है जो giver को कम नहीं करता।
यह Derrida के paradox को एक नए तरीके से resolve करता है — 'अव्यय योग' ('imperishable/non-decreasing yoga' — गीता ४.१ में 'अव्ययम्' शब्द) ऐसा gift है जो देने पर भी 'खर्च' नहीं होता।
अद्वैत वेदान्त में 'अव्यय' का गहरा अर्थ है।’अव्यय' — जो व्यय (खर्च/क्षय) के अधीन न हो — यह ब्रह्म का एक classical विशेषण है। 'अव्ययम् ब्रह्म' — अक्षय ब्रह्म।जब कृष्ण कहते हैं 'योगम् अव्ययम्' — यह केवल यह नहीं कहते कि यह योग 'पुराना' है, बल्कि यह कि यह योग ब्रह्म-स्वरूप है — और ब्रह्म स्वयं का दान करते हुए घटता नहीं। शंकराचार्य के अनुसार ब्रह्म 'पूर्णम्' है — पूर्ण से पूर्ण लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है (पूर्णमदः पूर्णमिदम् — ईशावास्योपनिषद् का शान्तिमंत्र)। कृष्ण का यह 'पुनर्दान' — पूर्ण से पूर्ण का दान — एक औपनिषदिक सिद्धान्त का गीता में सीधा प्रवर्तन है।
एरिक एरिक्सन के मनोसामाजिक विकास के आठ चरणों में, अंतिम चरण है — 'Integrity vs. Despair', जिसका virtue है 'Wisdom'। एरिक्सन के अनुसार 'wisdom' वह है जो एक व्यक्ति जीवन के अनुभवों से 'earn' करता है, और जिसे वह अगली पीढ़ी को pass करता है — यह 'generativity' (stage 7 का virtue) का natural extension है।
कृष्ण का 'पुनर्दान' इस Eriksonian framework में fit होता है — किन्तु एक twist के साथ। कृष्ण के लिए यह 'earned' wisdom नहीं है (वे सर्वज्ञ हैं, सीखी नहीं) — किन्तु अर्जुन के लिए यह एक generational transmission है — एक wisdom जो human history में बार-बार 'lost and recovered' होती रही है।
Lev Vygotsky की एक 'Zone of Proximal Development' और 'More Knowledgeable Other' की सैद्धांतिकी है।Vygotsky के 'sociocultural theory' में सीखना एक 'More Knowledgeable Other' (MKO) के साथ interaction से होता है — और MKO necessarily 'expert' नहीं होता, बल्कि कोई भी हो सकता है जिसके पास relevant knowledge हो, even एक peer। कृष्ण-अर्जुन सम्बन्ध — सखा से गुरु — Vygotsky के इस 'MKO' concept का एक dramatic illustration है। पहले वे 'peers' (सखा) थे, equal terms पर। युद्ध के इस crisis-moment में, कृष्ण 'MKO' बन जाते हैं — किन्तु यह transition smooth है, क्योंकि उनके बीच पहले से एक 'zone' established है — trust, friendship, shared history (जिसमें खाण्डव-दहन और इस