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|| क्षात्र धर्म || 🚩

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तुम उस भारतभूमि की संतान हो, जहाँ सती साध्वी नारियों ने अपने शील, सतीत्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिए जौहर की अग्नि को भी सहर्ष स्वीकार कर लिया। ऐसी पुण्यभूमि में जन्म लेकर यदि मनुष्य म्लेच्छ वृत्ति, कुत्सित विचार और वासना प्रधान दृष्टि का आश्रय ले, तो यह केवल किसी स्त्री का ही नहीं, अपितु अपनी संस्कृति, अपने पूर्वजों और अपने धर्म का भी अपमान है। स्मरण रखो प्रत्येक स्त्री में माता, भगिनी अथवा पुत्री का ही स्वरूप देखना आर्य का लक्षण है। जो स्त्री पर कुदृष्टि डालता है, वह पहले अपने ही चरित्र का पतन करता है। अतः नारायण,अपने मन को संयमित करो, दृष्टि को पवित्र बनाओ और अपने आचरण को उस भारतभूमि के गौरव के अनुरूप बनाओ, जिसने संसार को मर्यादा, धर्म और नारी सम्मान का अमूल्य संदेश दिया है। इस वासना रूपी शत्रु को पहचान अपने स्वधर्म का पालन करें, पूज्य श्री गुरुदेव भगवान जी की कृपा का आनंद उठाओ, भारत की अखण्डता भारत को उसके असली स्वरूप में लाने के कार्य में स्वयं की भी भागीदारी लाइए।

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तुम उस भारतभूमि की संतान हो, जहाँ सती साध्वी नारियों ने अपने शील, सतीत्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिए जौहर की अग्नि को भी सहर्ष स्वीकार कर लिया। ऐसी पुण्यभूमि में जन्म लेकर यदि मनुष्य म्लेच्छ वृत्ति, कुत्सित विचार और वासना प्रधान दृष्टि का आश्रय ले, तो यह केवल किसी स्त्री का ही नहीं, अपितु अपनी संस्कृति, अपने पूर्वजों और अपने धर्म का भी अपमान है। स्मरण रखो प्रत्येक स्त्री में माता, भगिनी अथवा पुत्री का ही स्वरूप देखना आर्य का लक्षण है। जो स्त्री पर कुदृष्टि डालता है, वह पहले अपने ही चरित्र का पतन करता है। अतः नारायण,अपने मन को संयमित करो, दृष्टि को पवित्र बनाओ और अपने आचरण को उस भारतभूमि के गौरव के अनुरूप बनाओ, जिसने संसार को मर्यादा, धर्म और नारी सम्मान का अमूल्य संदेश दिया है। इस वासना रूपी शत्रु को पहचान अपने स्वधर्म का पालन करें, पूज्य श्री गुरुदेव भगवान जी की कृपा का आनंद उठाओ, भारत की अखण्डता भारत को उसके असली स्वरूप में लाने के कार्य में स्वयं की भी भागीदारी लाइए।

महतां दर्शनं ब्रह्मञ्जायते नहि निष्फलम्। द्वेषादज्ञानतो वाऽपि प्रसङ्गाद्वा प्रमादतः॥ अयसः स्पर्शसंस्पर्शो रुक्मत्वायैव जायते॥
महतां दर्शनं ब्रह्मञ्जायते नहि निष्फलम्। द्वेषादज्ञानतो वाऽपि प्रसङ्गाद्वा प्रमादतः॥ अयसः स्पर्शसंस्पर्शो रुक्मत्वायैव जायते॥ – श्रीब्रह्ममहापुराण, १६३.३८-३९ “महापुरुषोंका दर्शन अमोघ होता है; भले ही वह द्वेष अथवा अज्ञानसे ही क्यों न हो। यथा– यदि लौहखण्डका पारस-मणिसे प्रसङ्ग या प्रमादवशात् भी स्पर्श हो जाए तो भी वह उसे स्वर्ण बना ही देता है।”

इन्द्रियाणामनुत्सर्गो मृत्युनापि विशिष्यते । अत्यर्थं पुनरुत्सर्गः सादयेद् दैवतान्यपि ॥ ५१ ॥ इन्द्रियों को सर्वथा रोक रखना तो
इन्द्रियाणामनुत्सर्गो मृत्युनापि विशिष्यते । अत्यर्थं पुनरुत्सर्गः सादयेद् दैवतान्यपि ॥ ५१ ॥ इन्द्रियों को सर्वथा रोक रखना तो मृत्यु से भी बढ़कर कठिन है और उन्हें बिलकुल खुली छोड़ देना देवताओं का भी नाश कर देता है। ~ विदुर नीति (महाभारत ५.३९.५१)

Painting depicting a Jhunjhar ( झुंझार ​/ जुझार ), a warrior who keeps fighting after he is decapitated, circa 1775 CE, Kota.
Painting depicting a Jhunjhar ( झुंझार ​/ जुझार ), a warrior who keeps fighting after he is decapitated, circa 1775 CE, Kota.

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सीता राम चरित अति पावन 🌸

धर्मप्राण भारतवर्ष में भी वैध और अवैध बूचड़खाने।

Why Indian Families Stay So Strong & Stable ✨ Ever wondered what keeps the traditional Bhartiya family system so incredibly resilient and grounded, generation after generation? The secret lies in one profound word: Dharma (धर्म). In many modern societies, relationships are viewed through the lens of individual rights, which can sometimes lead to a constant cycle of pointing fingers, finding faults, and trying to "fix" or change the people around us. But Dharma teaches us a completely different approach to life: 🎯 1. Focus on Duty, Not Just Rights: Dharma shifts our focus from "What am I getting from others?" to "What is my duty toward others?" When every family member focuses on their own responsibilities (as a parent, child, or spouse), harmony follows naturally. 🧘‍♂️ 2. Fixing Ourselves, Not Others: Instead of wasting energy trying to change or control the people around us, Dharma encourages self-reflection (Atma-Chintan) . It teaches us that the only person we truly need to master and improve is ourselves. 🤝 3. Acceptance over Judgment: By understanding that everyone is on their own karmic journey, we develop patience and acceptance for our family members' flaws, rather than constantly finding fault. When a home is guided by Dharma, it doesn't need rigid rules or constant arguments. It naturally builds a culture of mutual respect, emotional stability, and deep-rooted support. 🌿🙏 Proud of our timeless values! #Copy-paste

✨ Why Indian Families Stay So Strong & Stable ✨ Ever wondered what keeps the traditional Bhartiya family system so incredibly resilient and grounded, generation after generation? The secret lies in one profound word: Dharma (धर्म). In many modern societies, relationships are viewed through the lens of individual rights, which can sometimes lead to a constant cycle of pointing fingers, finding faults, and trying to "fix" or change the people around us. But Dharma teaches us a completely different approach to life: 🎯 1. Focus on Duty, Not Just Rights: Dharma shifts our focus from "What am I getting from others?" to "What is my duty toward others?" When every family member focuses on their own responsibilities (as a parent, child, or spouse), harmony follows naturally. 🧘‍♂️ 2. Fixing Ourselves, Not Others: Instead of wasting energy trying to change or control the people around us, Dharma encourages self-reflection (Atma-Chintan) . It teaches us that the only person we truly need to master and improve is ourselves. 🤝 3. Acceptance over Judgment: By understanding that everyone is on their own karmic journey, we develop patience and acceptance for our family members' flaws, rather than constantly finding fault. When a home is guided by Dharma, it doesn't need rigid rules or constant arguments. It naturally builds a culture of mutual respect, emotional stability, and deep-rooted support. 🌿🙏 Proud of our timeless values!

Trust par representation hone ka sabka apna mat ho sakta hai** us line ko ignore kare Koi dharm ki dristi se dekhega koi inki dristi se dono apni jagah hai wah vishay alag hai

दुःखद है कि प्रभु श्रीराम जी के मुख्य मंदिर का धन भी सुरक्षित नहीं। जब मंदिर से धन की लूट हो ही रही है, जगह जगह पुराने मंदिर तोड़े ही जा रहे हैं, तो यह लोकतंत्र मुगलों या अंग्रेजों के शासन से कैसे भिन्न है ? जो वास्तव में सनातनी हैं, मनुवादी हैं, वर्णाश्रम धर्म को मानने वाले लोग हैं, वो तो शुरू से ही मंदिर में हो रहे अनैतिक कार्यों का विरोध कर रहें हैं। जब आपका मन करें मंदिर का उद्घाटन कर दीजिए, एक-दो या तीन बार से मन न भरे तो चौथी बार भी कर दीजिए। मंदिर-मंदिर न रहा चौराहे का रोड हो गया कि चुनाव आ रहा तो बिना पूरा बने ही कर दो उद्घाटन, जनता तो मूर्ख है ही, शास्त्रों के विधि से आपका क्या ही वास्ता। धन कोई चोर ले गया या नहीं, दान किए हुआ धन का कौन सा प्रयोग आप धर्म के उन्नति के लिए करने वाले थें। मंदिर तो कमाई का जरिया और धर्म तो धंधा है ही आपके लिए। गौशाला, भक्तों के लिए भोजन व्यवस्था और गुरुकुल खोलने की क्या ही आवश्यकता है। सारे मंदिरों का पूरा धन, धार्मिक कार्यों के लिए प्रयोग होने लगे तो कही आपका कलेजा टुकड़े टुकड़े न हो जाये। ख़ैर हम क्षत्रियों को तो आपने बोलने का आधिकार ही नहीं दिया, 500 साल तक चप्पल-पगड़ी त्यागने वाले स्थानीय क्षत्रियों को तो अपने बुलाया ही नहीं उद्घाटन में, न ही ट्रस्ट में एक भी क्षत्रिय को रखा। इसे पहले कितनी बार राम मंदिर बना और किनके बलिदानों से बना ये सुनते ही आपके कानों से खून तो नहीं निकलने लगता ? प्रभु को सूर्यवंशी तो कहते हैं पर क्षत्रिय कहने में ऐसी शर्मातें हैं कि पूछो मत, आखिर किसी और को इतिहासचोरी करने में मदद भी तो करना है 😁 इतना तो सुनिश्चित कर लेते कि धर्मी व्यक्ति ही लगा है धन की व्यवस्था में कम से कम ये बदनामी तो न होती। ~ रुद्र सिंह

हमारे क्षत्रियशिरोमणि क्षत्रियकुलभूषण, महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया जी की जयंती पर उनको शत् शत् नमन।
हमारे क्षत्रियशिरोमणि क्षत्रियकुलभूषण, महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया जी की जयंती पर उनको शत् शत् नमन।

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हे राष्ट्रध्वज तेरा वन्दन। हे वन्दनीय तेरा वन्दन।। हे माननीय तेरा हे शौर्यप्रदर्शक नन्दन। हे मानबिन्दु तेरा रक्षण।। हे शौर्यप
हे राष्ट्रध्वज तेरा वन्दन। हे वन्दनीय तेरा वन्दन।। हे माननीय तेरा हे शौर्यप्रदर्शक नन्दन। हे मानबिन्दु तेरा रक्षण।। हे शौर्यप्रदर्शक शक्तिस्वरूप। हे मानरक्षक क्रान्तिरूप।। हे सूर्य चन्द्र अरु अग्निरूप। हे विद्युल्लेखा चक्ररूप।। है त्रिकोणमध्य बालसूर्य। तन्मध्यगत स्वस्तिक अपूर्व।। केसरिया वस्त्र त्यागरूप। वैदिकध्वज वैभवस्वरूप।। हे श्रुति-स्मृति-पुराणस्वरूप। हे युगप्रवर्तक रामरूप।।