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Maths by Anjan - पढ़ना नहीं, सीखना है (Channel): BANK+SSC+CAT👤©

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“शिक्षक को कम से कम शिक्षक तो रहने दो”। इसका अर्थ यही है कि गुरु का असली धर्म मार्गदर्शन करना है, चाहे शिष्य को वह कठोर या अप
“शिक्षक को कम से कम शिक्षक तो रहने दो”। इसका अर्थ यही है कि गुरु का असली धर्म मार्गदर्शन करना है, चाहे शिष्य को वह कठोर या अप्रिय क्यों न लगे। गुरु वशिष्ठ और राम: वशिष्ठ ने राम को केवल सुख‑सुविधा नहीं दी, बल्कि धर्म, नीति और जिम्मेदारी का कठोर पाठ पढ़ाया। यही शिक्षा राम को आदर्श राजा और मर्यादा पुरुषोत्तम बनाने में सहायक हुई। हनुमान और जामवंत: जामवंत ने हनुमान को उसकी शक्ति याद दिलाई। यदि वह केवल मित्र या प्रशंसक बनकर रह जाते, तो हनुमान अपनी क्षमता पहचान ही नहीं पाता। द्रोणाचार्य और अर्जुन: द्रोण ने अर्जुन को कठोर अनुशासन और कठिन अभ्यास करवाया। यही कठोरता उसे महान धनुर्धर और जिम्मेदार योद्धा बना सकी। विदुर और धृतराष्ट्र: विदुर ने बार‑बार कठोर सत्य सुनाया, भले ही धृतराष्ट्र को अप्रिय लगा। विदुर ने अपना धर्म निभाया—“सत्य कहना”—न कि केवल प्रिय लगना। गुरु का काम शिष्य को खुश करना नहीं, बल्कि उसे योग्य और जिम्मेदार बनाना है। यदि शिक्षक को केवल “पसंद” करने योग्य बना दिया जाए, तो शिक्षा का असली उद्देश्य खो जाएगा।

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हनुमान जी: जब उन्होंने समुद्र पार करके सीता माता को खोज लिया और लंका दहन कर दिया, तो यह सफलता थी जिसने पूरे वानर दल और राम से
हनुमान जी: जब उन्होंने समुद्र पार करके सीता माता को खोज लिया और लंका दहन कर दिया, तो यह सफलता थी जिसने पूरे वानर दल और राम सेना में उत्साह का शोर मचाया। लेकिन असली आंतरिक शक्ति तब दिखी जब वे विनम्र होकर श्रीराम के चरणों में बैठ गए और बोले — “सब प्रभु की कृपा है।” उनकी शक्ति शांत थी, अहंकाररहित। विदुर जी: वे महल में रहते हुए भी अपनी आंतरिक शक्ति और नीति से सबको मार्गदर्शन देते थे। उनकी सफलता का कोई शोर नहीं था, लेकिन उनकी शांत बुद्धि ने धर्मराज युधिष्ठिर को कठिन समय में संभाला। भीष्म पितामह: युद्धभूमि में अपार शक्ति रखते हुए भी वे शांतचित्त रहे। उनकी सफलता उनके पराक्रम में थी, लेकिन उनकी आंतरिक शक्ति उनके मौन और संयम में झलकती थी। आज भी हम देखते हैं कि बाहरी सफलता अक्सर ताली और शोर से पहचानी जाती है, लेकिन असली ताकत — धैर्य, संयम, और आत्मविश्वास — भीतर ही शांत रहती है। यही शक्ति इंसान को स्थायी बनाती है।
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संघर्ष से अर्जित उपलब्धि आत्मगौरव कहलाती है, घमंड नहीं। श्रीराम का वनवास: राम ने राजमहल छोड़कर वनवास स्वीकार किया। कठिनाइयों,
संघर्ष से अर्जित उपलब्धि आत्मगौरव कहलाती है, घमंड नहीं। श्रीराम का वनवास: राम ने राजमहल छोड़कर वनवास स्वीकार किया। कठिनाइयों, तपस्या और संघर्ष के बाद जब वे रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे, तो उनका गौरव घमंड नहीं था, बल्कि धर्म और परिश्रम का परिणाम था। हनुमान का समुद्र पार करना: हनुमान ने अपनी शक्ति को साधारण रूप में रखा, लेकिन जब समय आया तो कठिन परिश्रम और समर्पण से समुद्र पार किया। उनकी सफलता का आत्मविश्वास घमंड नहीं, बल्कि सेवा और तपस्या का फल था। अर्जुन का गांडीव और साधना: अर्जुन ने वर्षों तक तपस्या और अभ्यास से धनुर्विद्या में निपुणता प्राप्त की। जब उन्होंने युद्धभूमि में अपनी क्षमता दिखाई, तो वह घमंड नहीं था, बल्कि कठिन साधना का परिणाम था। कर्ण का संघर्ष: कर्ण ने समाज के तिरस्कार और कठिनाइयों के बीच अपनी पहचान बनाई। जब वह अपनी शक्ति और दानवीरता दिखाता है, तो वह घमंड नहीं बल्कि संघर्ष से अर्जित आत्मविश्वास है। “संघर्ष से अर्जित आत्मविश्वास कभी घमंड नहीं होता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन बनता है।”
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श्रीराम का वनवास स्वीकार करना: जब उन्हें अन्यायपूर्ण वनवास मिला, तो उन्होंने किसी की स्वीकृति या समर्थन की परवाह नहीं की। उनक
श्रीराम का वनवास स्वीकार करना: जब उन्हें अन्यायपूर्ण वनवास मिला, तो उन्होंने किसी की स्वीकृति या समर्थन की परवाह नहीं की। उनकी सच्चाई और धर्मनिष्ठा ही उन्हें "मर्यादा पुरुषोत्तम" बनाती है। भरत का त्याग: भरत ने सिंहासन ठुकरा दिया और राम की खड़ाऊँ को राजसिंहासन पर रखा। उन्होंने यह नहीं देखा कि लोग क्या कहेंगे, बल्कि अपनी सच्चाई और धर्म का पालन किया। युधिष्ठिर का सत्य पालन: जुए में सब कुछ हारने और वनवास झेलने के बाद भी उन्होंने असत्य का सहारा नहीं लिया। उनकी सच्चाई को सबने तुरंत स्वीकार नहीं किया, लेकिन अंततः वही धर्मराज कहलाए। भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा: उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य और हस्तिनापुर की सेवा की प्रतिज्ञा निभाई। चाहे लोग सहमत हों या असहमत, उन्होंने अपनी सच्चाई से कभी समझौता नहीं किया। सच्चाई का मूल्य दूसरों की मंज़ूरी से नहीं, बल्कि आपके अपने धर्म और असलियत से तय होता है।
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ईर्ष्या और शक इंसान को इतना अंधा बना देते हैं कि वह अपने ही हित के विरुद्ध जाकर दूसरों का साथ देने लगता है। धृतराष्ट्र और दुर
ईर्ष्या और शक इंसान को इतना अंधा बना देते हैं कि वह अपने ही हित के विरुद्ध जाकर दूसरों का साथ देने लगता है। धृतराष्ट्र और दुर्योधन: धृतराष्ट्र को बार‑बार विदुर और संजय ने समझाया कि दुर्योधन का मार्ग गलत है। लेकिन धृतराष्ट्र का मोह और शक इतना प्रबल था कि उसने दुर्योधन की हर बात को मान लिया, चाहे वह कितनी भी विनाशकारी क्यों न हो। परिणामस्वरूप, उसने पांडवों को शत्रु मान लिया और दुर्योधन जैसे "कुत्ते को भाई" बना लिया, जिससे महाभारत का महायुद्ध हुआ। विभीषण और रावण: विभीषण ने बार‑बार रावण को समझाया कि सीता का अपहरण गलत है और श्रीराम से शत्रुता विनाशकारी होगी। लेकिन रावण का अहंकार और शक इतना बेलगाम था कि उसने विभीषण को ही देशद्रोही कहकर निकाल दिया। परिणामस्वरूप, विभीषण श्रीराम के पक्ष में चले गए और रावण का पतन हुआ। यहाँ रावण का शक और ईर्ष्या उसे अपने ही भाई को शत्रु मानने पर मजबूर कर देता है, जैसे आपके कथन में "कुत्ते को भी भाई बना लेना" वाली स्थिति है—जहाँ विवेक खोकर गलत को सही मान लिया जाता है। जब ईर्ष्या और शक बेलगाम हो जाते हैं, तो व्यक्ति विवेक खोकर अपने ही पतन का मार्ग चुन लेता है।
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हर व्यक्ति सब्र नहीं कर पाता, क्योंकि सब्र में त्याग, धैर्य और आत्मनियंत्रण की आवश्यकता होती है। सब्र से ही विजय, सम्मान और स
हर व्यक्ति सब्र नहीं कर पाता, क्योंकि सब्र में त्याग, धैर्य और आत्मनियंत्रण की आवश्यकता होती है। सब्र से ही विजय, सम्मान और स्थिरता प्राप्त होती है।सब्र आत्मा को मजबूत करता है और अहंकार को शांत करता है। यही कारण है कि धर्मग्रंथों में सब्र को तपस्या और साधना के बराबर माना गया है। श्रीराम का वनवास: जब कैकेयी ने वनवास का आदेश दिया, तो राम ने बिना क्रोध किए, धैर्य और सब्र से उसे स्वीकार किया। यही सब्र उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाता है और अंततः वही सब्र उन्हें विजय दिलाता है। पांडवों का वनवास: दुर्योधन के छल से जब पांडवों को वनवास मिला, तो उन्होंने सब्र रखा। यही सब्र उन्हें शक्ति और अनुभव देता है, और अंततः धर्मयुद्ध में विजय दिलाता है। विदुर का धैर्य: जब धृतराष्ट्र बार-बार अन्यायपूर्ण निर्णय लेते थे, तब भी विदुर ने सब्र रखा और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। उनका सब्र ही उन्हें महाभारत का सबसे बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ पात्र बनाता है।
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दुःख का असली अर्थ तभी समझ आता है जब वह हमें यह सिखा दे कि जीवन में क्या प्राथमिक है और क्या गौण। रामायण: जब भगवान राम वनवास ग
दुःख का असली अर्थ तभी समझ आता है जब वह हमें यह सिखा दे कि जीवन में क्या प्राथमिक है और क्या गौण। रामायण: जब भगवान राम वनवास गए, तो भरत को अयोध्या का राजसिंहासन मिल सकता था। लेकिन भरत ने दुःख को सही दृष्टि से देखा—उसने समझा कि प्राथमिकता सिंहासन नहीं, बल्कि भाई का सम्मान और पिता की आज्ञा है। यही कारण था कि भरत ने राम के चरणों में राजगद्दी अर्पित कर दी और स्वयं नंदिग्राम में साधु जीवन जीते। महाभारत: अर्जुन जब युद्धभूमि में खड़ा था, तो उसे अपार दुःख हुआ—अपने ही परिजनों और गुरुओं से लड़ने का। उस क्षण यदि उसने प्राथमिकता नहीं समझी होती, तो वह युद्ध छोड़ देता। लेकिन श्रीकृष्ण ने उसे गीता का उपदेश देकर यह सिखाया कि प्राथमिकता धर्म है, व्यक्तिगत मोह नहीं। दुःख ने अर्जुन को यह बोध कराया कि जीवन का सबसे बड़ा कर्तव्य धर्म की रक्षा है। इसीलिए कहा जाता है कि दुःख केवल पीड़ा नहीं देता, बल्कि हमें यह भी दिखाता है कि जीवन में असली प्राथमिकता क्या है।
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IBPS PO 2026 भर्ती में पदों की संख्या बढ़कर 7565 हुई
IBPS PO 2026 भर्ती में पदों की संख्या बढ़कर 7565 हुई
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ईमानदार नीयत ही सबसे बड़ी ताकत है — चाहे पढ़ाई हो, परीक्षा हो या जीवन का कोई संघर्ष। जब नीयत शुद्ध होती है, तो चाहे परिस्थिति
ईमानदार नीयत ही सबसे बड़ी ताकत है — चाहे पढ़ाई हो, परीक्षा हो या जीवन का कोई संघर्ष। जब नीयत शुद्ध होती है, तो चाहे परिस्थितियाँ कठिन हों, लोग और स्वयं प्रभु आपके पक्ष में खड़े हो जाते हैं। जैसे शबरी और केवट को प्रभु का साथ मिला, वैसे ही विदुर और अर्जुन को भी धर्म और सत्य का समर्थन मिला। विदुर का धर्मनिष्ठ व्यवहार: विदुर ने बार-बार दुर्योधन को अन्याय से रोका और धर्म का मार्ग दिखाया। उनकी नीयत शुद्ध थी — राज्य और परिवार को विनाश से बचाना। परिणामस्वरूप पांडव और स्वयं श्रीकृष्ण उनके पक्ष में खड़े रहे। कृष्ण का अर्जुन के साथ होना: अर्जुन ने युद्ध में केवल कृष्ण को सारथी रूप में माँगा, सेना नहीं। उसकी नीयत शुद्ध थी — धर्म की रक्षा। परिणामस्वरूप स्वयं भगवान कृष्ण उसके पक्ष में खड़े हुए और धर्मयुद्ध में विजय दिलाई। “सच्ची नीयत रखो, तो जैसे शबरी को राम और अर्जुन को कृष्ण मिले — वैसे ही लोग और प्रभु तुम्हारे पक्ष में खड़े होंगे।”
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जो व्यक्ति खुद बेईमानी करता है, वही सबसे ज़्यादा दूसरों पर बेईमानी का आरोप लगाता है। रामायण और महाभारत दोनों में इसके कई उदाह
जो व्यक्ति खुद बेईमानी करता है, वही सबसे ज़्यादा दूसरों पर बेईमानी का आरोप लगाता है। रामायण और महाभारत दोनों में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। रामायण: रावण: रावण ने सीता का अपहरण किया और धर्म का उल्लंघन किया। लेकिन जब राम ने लंका पर चढ़ाई की, तो रावण बार‑बार चिल्लाता रहा कि उसके साथ अन्याय हो रहा है। असल में बेईमानी उसी की थी। कैकेयी: कैकेयी ने अपने स्वार्थ और कपट से राम को वनवास दिलाया। बाद में जब परिणाम सामने आए, तो उसने खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश की। महाभारत: दुर्योधन: दुर्योधन ने पांडवों के साथ जुए में कपट किया, उनका राज्य छीन लिया। लेकिन जब पांडवों ने न्याय माँगा, तो वही दुर्योधन सबसे ज़्यादा चिल्लाने लगा कि उसके साथ अन्याय हो रहा है। शकुनि: शकुनि ने छल से जुए का खेल रचा। असल बेईमानी उसी की थी, लेकिन वह बार‑बार दूसरों को दोषी ठहराता रहा। रामायण और महाभारत हमें यही सिखाते हैं कि “जो स्वयं बेईमान होता है, वही सबसे ज़्यादा दूसरों पर बेईमानी का आरोप लगाता है।”
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🔥🔥 SSC Selection Phase 14 Exam Date 2026 - Out ➡ Exam Date 16-26 September 2026
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📌 आवेदन करने की अंतिम तिथि को बढ़ा दिया गया है ✅ 🔥🔥 IBPS Clerk (CSA) 16th Online Form 2026 ➡️ Start Date : 01 August 2026 ➡️ Last Date : 28 August 2026 Extended ➡️ Total : 11403 Posts
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Baccho, आज का दिन आपके सपनों की ओर पहला बड़ा कदम है! @mathsbyanjan की तरफ से आप सभी को IBPS PO Pre 2026 के लिए ढेर सारी शुभका
Baccho, आज का दिन आपके सपनों की ओर पहला बड़ा कदम है! @mathsbyanjan की तरफ से आप सभी को IBPS PO Pre 2026 के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ। याद रखिए — मेहनत की गई रातें, किए गए sacrifices और हर एक practice का फल आज मिलेगा। “Focus. Believe. Achieve. — Aasaan Hai! 🚀” Exam hall में बस यही सोचें: आप capable हैं, आप तैयार हैं, और आप जीतेंगे। Best of luck warriors — आज आपकी मेहनत चमकेगी
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