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बीबीसी दुनिया में आज देखिए अमेरिका से लेकर भारत तक गहराता बेकारी और भूख का संकट। अमेरिका और भारत में नौकरी गंवाने वाली की बात कवर स्टोरी में। तुफान अम्फन के असर से भारत और बांग्लादेश में तीन तीन की मौत। भारत में सोमवार से शुरू होगी घरेलू उड़ानें। खबरें और भी है देखिए बीबीसी दुनिया
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" सामयिकी :- कोरोना वायरस सक्रमंण पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ मनोज नेसरी से आकाशवाणी सवांददाता पसिद्बार्थ सिंह की बातचीत"
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Desh Deshantar: बिजली सेक्टर और सरकार की नई नीति | Power Sector & Government's New Initiative
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विशिष्ट शक्तियाँ
देश के संघात्मक ढाँचे को बनाए रखने के लिये राज्यसभा के पास दो विशिष्ट अधिकार हैं, जो कि लोकसभा के पास नहीं है-अनुच्छेद 249 के अंतर्गत राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले दो तिहाई सदस्यों के बहुमत से राज्य सूची में शामिल किसी विषय को राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित कर सकती है।
अनुच्छेद 312 के अंतर्गत राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले दो तिहाई सदस्यों के समर्थन से कोई नई अखिल भारतीय सेवा स्थापित कर सकती है।
अन्य शक्तियाँआपातकाल की अवधि यदि एक माह से अधिक है और उस समय लोकसभा विघटित हो तो राज्यसभा का अनुमोदन कराया जाना ज़रूरी होता है।
राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल का हिस्सा होते हैं।
उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव केवल राज्यसभा में ही लाया जाता है।
राष्ट्रपति के महाभियोग तथा उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों और अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों को पद से हटाने में अपनी भूमिका निभाते हैं।
राज्यसभा से संबंधित मुद्दे
राज्यों का प्रतिनिधित्व एक समान नहींसंयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसे संघीय देश अपने उच्च सदन में सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान करके, संघवाद के सिद्धांत को भारत की तुलना में अधिक मज़बूती से स्थापित करते हैं।
भारत में अन्य देशों के विपरीत उच्च सदन अर्थात राज्यसभा में राज्यों को उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाता है। परिणामस्वरूप अधिक जनसंख्या वाले राज्यों से अधिक प्रतिनिधि व कम जनसंख्या वाले राज्यों से कम प्रतिनिधि पहुँचते हैं।
उदाहरण के लिये, केवल उत्तर प्रदेश में ही राज्यसभा के लिये आवंटित सीटों की संख्या संयुक्त रूप से उत्तर-पूर्वी राज्यों को आवंटित सीटों की संख्या के तुलना में काफी अधिक है।
राज्यसभा को दरकिनार करने का प्रयासकुछ मामलों में ऐसा भी देखा गया है कि धन विधेयक का रूप देकर साधारण विधेयकों को पारित किया जा रहा है। यह विदित है कि धन विधेयक के संदर्भ में राज्यसभा को सीमित अधिकार प्राप्त है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सत्तारूढ़ दल द्वारा संसद के उच्च सदन की बहुत प्रभावकारिता को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।
राज्यसभा को इस तरह से दरकिनार करने का कारण सत्तारूढ़ दल का इस सदन में बहुमत में न होना है।
राज्यसभा की संघीय विशेषताओं में परिवर्तनजनप्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 2003 के माध्यम से, संसद ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 3 से 'अधिवास' (Domicile) शब्द हटा दिया है।
इसका अनिवार्य रूप से यह अर्थ है कि कोई व्यक्ति जो किसी राज्य का न तो निवासी हैं और न ही उसका अधिवास है, वह व्यक्ति भी उस राज्य से राज्यसभा का चुनाव लड़ सकता है।
इस संशोधन के बाद राज्यसभा की सीटों का उपयोग सत्तारुढ़ दल द्वारा लोकसभा में अपने पराजित उम्मीदवारों को राज्यसभा में चुने जाने के लिये किया जा रहा है।
मनोनीत सदस्यों की न्यून भागीदारीराज्यसभा के लिये मनोनीत सदस्यों में कुछ विशिष्ट हस्तियों का मनोनयन उनके प्रशंसकों की संख्या को देखकर किया जाता है, ताकि उन प्रशंसकों को वोट बैंक में परिवर्तित किया जा सके।
ऐसे सदस्य एक बार नामांकित होने के बाद सदन के कामकाज में शायद ही कभी भाग लेते हैं। उदाहरण के लिये सचिन तेंदुलकर को वर्ष 2012 में मनोनीत किया गया था, उनके मनोनयन के बाद कार्यकाल पूरा होने तक सदन 374 दिनों तक प्रचालन में रहा, लेकिन सचिन तेंदुलकर की उपस्थिति मात्र 24 दिनों की ही रही।
आगे की राह
राज्यसभा के संघीय चरित्र को संरक्षित करने के लिये एक उपाय यह हो सकता है कि राज्य सभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से किसी राज्य के नागरिकों द्वारा ही चुने जाएँ। इससे क्रोनी कैपिटलिज्म (धनबल के माध्यम से नीतियों को प्रभावित करना) व राजनैतिक तुष्टीकरण पर लगाम लगेगी।
इसके साथ ही प्रत्येक राज्य के लिये समान प्रतिनिधित्व को सक्षम करने हेतु एक संघीय व्यवस्था तैयार की जा सकती है, ताकि बड़े राज्य सदन में अपने संख्या बल के आधार पर नीतियों को प्रभावित न कर सके।
सदन में चर्चा की गुणवत्ता में सुधार के लिये मनोनयन की बेहतर प्रक्रिया की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
भारतीय राजनीति में उतार-चढ़ाव के बावजूद राज्यसभा राजनीतिक, सामाजिक मूल्यों तथा सांस्कृतिक विविधता का पोषण करने वाली एक संस्था बनी हुई है। इसके अलावा लोक सभा के साथ यह संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य जैसे मूल्यों का ध्वजवाहक भी है। इस प्रकार राज्यसभा को लोकतंत्र की 'विघटनकारी' शाखा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये बल्कि भारतीय लोकतंत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को बनाए रखने के लिये राज्यसभा को सक्षम बनाने के प्रयास किये जाने चाहिये।
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संविधान सभा में राज्यसभा
लोकतांत्रिक सरकारें शक्ति संतुलन के सिद्धांत पर आधारित हैं, लिहाजा लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था में दो सदनों का होना अहम है। एक सदन लोकप्रिय इच्छा का प्रतीक (लोकसभा) होता है वहीं दूसरा सदन किसी तरह की भीड़तंत्र वाली मानसिकता को रोकने (राज्यसभा) का काम करता है। राज्यसभा या राज्यपरिषद (Council of States) भारतीय संसद का दूसरा सदन है, जिसकी स्थापना मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार, 1919 के आधार पर की गई।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार, संघ के लिये एक संसद होगी, जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी। भारतीय संविधान, लोकसभा और राज्यसभा को कुछ अपवादों को छोड़कर कानून निर्माण की शक्तियों में समान अधिकार देता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद-80, राज्यसभा के गठन का प्रावधान करता है। राज्यसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 हो सकती है, परंतु वर्तमान में यह संख्या 245 है। इनमें से 12 सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा से संबंधित क्षेत्रों से मनोनीत किया जाता है। यह एक स्थायी सदन है अर्थात् राज्यसभा का विघटन कभी नहीं होता है। राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। जबकि राज्यसभा के एक-तिहाई सदस्यों का चुनाव हर दूसरे वर्ष में किया जाता है।
इस आलेख में संविधान सभा में राज्यसभा को लेकर पक्ष-विपक्ष की बहस, राज्यसभा की भूमिका तथा उससे संबंधित मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।
संविधान सभा में राज्यसभा के पक्ष में तर्क
राज्यसभा के गठन का सबसे अहम पक्ष यह था कि यह सदन राज्यों के पक्ष को मज़बूती से रखेगा। यदि लोकसभा द्वारा किसी विधेयक को जल्दबाज़ी में पारित किया गया है तो राज्यसभा उस पर व्यापक चर्चा करेगा।
संसद का उच्च सदन, लोकसभा के निर्णयों की समीक्षा करने और सत्तापक्ष के निरंकुशतापूर्ण निर्णयों पर अंकुश लगाने में सहायता करता है।
उच्च सदन शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों को एक मंच प्रदान करता है, जो सरकार की जन-कल्याण योजनाओं के माध्यम से राज्यों के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान देते हैं।
इस व्यवस्था को नियंत्रण और संतुलन (Check and Balance) सिद्धांत के अनुसार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये आवश्यक माना जाता है।
राज्यसभा के विपक्ष में तर्क
संविधान सभा में विशेषज्ञों का राज्यसभा के विपक्ष में मुख्य तर्क यह था कि राज्यसभा का गठन ब्रिटेन की साम्राज्यवादी विरासत को स्थापित करेगी क्योंकि इसका स्वरूप ब्रिटेन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स (House of Lord’s) के समान था।
राज्यसभा के सदस्यों में हाउस ऑफ लॉर्ड्स की भांति उद्योगपति और धनी लोग होंगे, जिनका भारत के लोगों व उनकी परिस्थितियों से कोई सरोकार नहीं होगा।
राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता के द्वारा नहीं किया जाता है, ऐसे में जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों से मिलकर बने सदन लोकसभा के द्वारा पारित किसी विधेयक पर राज्यसभा के द्वारा किये गए अनावश्यक विलंब से ‘देश आर्थिक रूप से पिछड़’ सकता है।
राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन
राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति द्वारा एकल संक्रमणीय मत के आधार पर होता है। भारत में राज्यसभा, राज्य विधान परिषद, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का निर्वाचन एकल संक्रमणीय मत के आधार पर ही होता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80(4) के अनुसार, राज्य विधानमंडल (विधान सभा) के निर्वाचित सदस्यों द्वारा राज्यसभा के सदस्यों का चयन किया जाता है।
एकल संक्रमणीय मत
एकल संक्रमणीय मत अर्थात एकल मत, मतदाता एक ही मत देता है लेकिन वह कई उम्मीदवारों को अपनी प्राथमिकता के आधार पर रैंक देता है। अर्थात् वह बैलेट पेपर पर यह बताता है कि उसकी पहली पसंद कौन है और दूसरी तथा तीसरी पसंद कौन है।
यदि पहली पसंद वाले मतों से विजेता का निर्णय नहीं हो सका, तो उम्मीदवार के खाते में मतदाता की दूसरी पसंद को नए एकल मत की तरह ट्रांसफर किया जाता है। इसलिये इसे एकल संक्रमणीय मत कहा जाता है।
राज्यसभा के सदस्यों की अर्हता
व्यक्ति भारत का नागरिक हो।
30 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।
किसी लाभ के पद पर न हो।
विकृत मस्तिष्क का न हो।
यदि संसद विधि द्वारा कुछ और अर्हताएँ निर्धारित करे तो यह ज़रूरी है कि उम्मीदवार उसे भी धारण करे।
राज्यसभा की शक्तियाँ एवं कार्य
विधायी शक्तियाँगैर-वित्तीय विधेयकों के संदर्भ में लोकसभा की भांति राज्यसभा को भी उतनी ही शक्ति प्राप्त है। ऐसे विधेयक दोनों सदनों की सहमति के बाद ही कानून बनते हैं।
धन विधेयक के मामले में राज्यसभा को लोकसभा की तुलना में सीमित शक्ति प्राप्त है। इस संदर्भ में राज्यसभा को 14 दिनों के भीतर विचार करके अपनी राय लोकसभा को भेजनी होती है।
संविधान संशोधन विधेयकों के संदर्भ में राज्य सभा की शक्तियाँ लोकसभा की शक्तियों के बराबर है।
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विभिन्न उद्योगों ने COVID-19 से उत्पन्न आर्थिक समस्याओं से निपटने हेतु Goods and Services Tax- (GST) में छूट देने की मांग की है।
प्रमुख बिंदु:
हालाँकि वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) का मानना है कि ‘वस्तु एवं सेवा कर’ में छूट देने से राज्य के वित्त पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, उद्योगों को नुकसान होगा जिसके परिणामस्वरुप उपभोक्ताओं को मूल्य वृद्धि का सामना करना पड़ेगा।
ध्यातव्य है कि पूर्व में सैनिटरी नैपकिन (Sanitary Napkins) पर ‘वस्तु एवं सेवा कर’ में छूट देने के कारण घरेलू उद्योगों को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा था।
हाल ही में व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (Personal Protective Equipment), मास्क (Mask) पर भी ‘वस्तु एवं सेवा कर’ में छूट देने से घरेलू उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था।
जीएसटी में छूट वस्तुओं के आयात को प्रोत्साहित करेगी जिसके परिणामस्वरूप स्थानीय वस्तुओं की तुलना में आयातित वस्तुएँ सस्ती हो जाएंगी तथा घरेलू उद्योगों को नुकसान पहुँचेगा।
‘वस्तु एवं सेवा कर’ में छूट देने से इनपुट टैक्स क्रेडिट (Input Tax Credit- ITC) प्रभावित होगा जिसके कारण विनिर्माण की लागत में वृद्धि और उपभोक्ताओं को उच्च लागत पर वस्तुएँ प्राप्त होंगी।
देशभर में लॉकडाउन के मद्देनज़र बहुत से विनिर्माता, थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेताओं ने अपने गोदामों में वस्तुओं को इकट्टा कर लिया है जिनकी इनपुट टैक्स क्रेडिट कई लाख करोड़ रुपए हैं। ऐसी हालत में ‘वस्तु एवं सेवा कर’ में छूट देने से उपभोक्ताओं के लिये वस्तुओं की कीमत में वृद्धि होगी।
‘वस्तु एवं सेवा कर’ में छूट से कच्चा माल तथा उत्पादित वस्तुओं का खाता अलग-अलग तैयार करना आवश्यक होगा जिसके कारण विनिर्माताओं को एक अलग समस्या का सामना करना पड़ेगा।
वस्तु एवं सेवा कर
(Goods and Services Tax- GST):
एक ऐतिहासिक कर बदलाव के रूप में वस्तु एवं सेवा कर 1 जुलाई, 2017 से लागू हुआ है।
केंद्र व राज्य दोनों स्तरीय अधिभारों को समेटते हुए GST सहकारी संघवाद को सरकारों द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 के द्वारा अनुच्छेद 366 में एक नया खंड (12A) जोड़ा गया, जिसके अनुसार, ‘वस्तु एवं सेवा कर’ का अर्थ है- मानव उपभोग के लिये मादक पेय पदार्थों की आपूर्ति पर लगने वाले कर को छोड़कर वस्तुओं या सेवाओं या दोनों की आपूर्ति पर लगने वाला कर।
वस्तु एवं सेवा कर का स्वरूप:
एक राज्य के भीतर होने वाले लेन-देन पर केंद्र सरकार द्वारा लगाए कर को केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (CGST) कहा जाता है। CGST केंद्र सरकार के खाते में जमा किया जाता है।
राज्यों द्वारा लगाए गए करों को राज्य वस्तु एवं सेवा कर (SGST) कहा जाता है। SGST कर को राज्य सरकार के खाते में जमा किया जाता है।
इसी प्रकार केंद्र द्वारा प्रत्येक अंतर-राज्य वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति पर एकीकृत जीएसटी (IGST) लगाने और प्रशासित करने की व्यवस्था है।
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प्रत्येक वर्ष मानसून के बाद आने वाले स्वाइन फ्लू या मौसमी इन्फ्लूएंज़ा (Seasonal Influenza- H1N1) का मुकाबला करने के लिये हरियाणा सरकार ने राज्यव्यापी टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किया है।
प्रमुख बिंदु
ध्यातव्य है कि जहाँ एक ओर कोरोनोवायरस के मामले दैनिक आधार पर लगातार बढ़ते जा रहे हैं, वहीं मानसून के स्वाइन फ्लू (H1N1) की संभावना ने हरियाणा सरकार के समक्ष एक कड़ी चुनौती उत्पन्न कर दी है।
इसी चुनौती को मद्देनज़र रखते हुए हरियाणा सरकार ने स्वास्थ्य संबंधित 3 कार्यक्रम शुरू किये हैं, जिसमें स्वास्थ्य कर्मियों के लिये H1N1 टीकाकरण अभियान, राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम के तहत हेपेटाइटिस-बी (Hepatitis-B) नियंत्रण कार्यक्रम और राज्य के 21 ज़िला अस्पतालों में नेत्रदान केंद्र शामिल हैं।
H1N1 टीकाकरण अभियान के तहत राज्य भर में लगभग 13,000 स्वास्थ्य कर्मचारियों को H1N1 से बचाव के लिये टीका लगाया जाएगा।
सरकार ने इस संबंध में जिस वैक्सीन का उपयोग करने की योजना बनाई है, वह एकल खुराक वैक्सीन है और एक वर्ष की अवधि के लिये प्रभावी है।
उल्लेखनीय है कि राज्य के सभी 22 ज़िलों में पहले से ही मुफ्त H1N1 परीक्षण, निदान और उपचार सेवाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं।
वहीं हेपेटाइटिस-बी (Hepatitis-B) नियंत्रण कार्यक्रम के पहले चरण में राज्य के कारागारों में नवजात शिशुओं, गर्भवती महिलाओं और कैदियों को कवर किया जाएगा।
कार्यक्रम की आवश्यकता
आँकड़ों के अनुसार, भारत में 2016 के बाद से अब तक लगभग 85,000 लोग H1N1 वायरस से संक्रमित हुए हैं और बीते कुछ वर्षों में इस वायरस के कारण 4,900 लोगों की मृत्यु हुई है।
इस वायरस पर किये गए विभिन्न शोधों से ज्ञात होता है कि भारत में इस वायरस का प्रकोप एक वर्ष में मुख्यतः 2 बार दिखाई देता है, पहला जनवरी माह से मार्च माह के दौरान और दूसरा मानसून के पश्चात् अगस्त माह से अक्तूबर माह के दौरान।
कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी के तीव्र प्रसार को मद्देनज़र रखते हुए स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता उच्च जोखिम वाली श्रेणी में आते हैं और उन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
WHO के वर्ष 2018 के आँकड़ों के अनुसार, हेपेटाइटिस से प्रत्येक वर्ष दक्षिण-पूर्व एशिया में लगभग 3,50,000 लोगों की मौत होती है। यह संख्या मलेरिया और HIV द्वारा संयुक्त रूप से होने वाली मौतों से भी अधिक है।
स्वाइन फ्लू
स्वाइन फ्लू H1N1 नामक फ्लू वायरस के कारण होने वाला एक संक्रामक रोग है। H1N1 एक प्रकार का संक्रामक वायरस है।
H1N1 संक्रमण को स्वाइन फ्लू कहा जाता है, क्योंकि अतीत में यह उन्हीं लोगों को होता था जो सूअरों के सीधे संपर्क में आते थे।
H1N1 की तीन श्रेणियाँ हैं - A, B और C
A और B श्रेणियों को घरेलू देखभाल की आवश्यकता होती है, जबकि श्रेणी C में तत्काल अस्पताल में भर्ती कराने और चिकित्सा की आवश्यकता होती है क्योंकि इसके लक्षण और परिणाम बेहद गंभीर होते हैं और इससे मृत्यु भी हो सकती है।
H1N1 संक्रमण किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है।
हेपेटाइटिस-बी (Hepatitis-B)
यह एक वायरल संक्रमण (Viral Infection) है जो लीवर की बीमारी का कारण बन सकता है।
यह वायरस जन्म और प्रसव के दौरान माँ से बच्चे में फैल सकता है। इसके अतिरिक्त यह रक्त अथवा शरीर के अन्य तरल पदार्थों के संपर्क में आने के कारण भी फैलता है।
यह लीवर कैंसर (Liver cancer) का प्राथमिक कारण है।
वैक्सीन द्वारा हेपेटाइटिस-बी की रोकाथाम की जा सकती है जो कि एक सुरक्षित और प्रभावी उपाय हैं।
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लेस इनवेसिव सर्फैक्टेंट एडमिनिस्ट्रेशन
Less Invasive Surfactant Administration
हाल ही में एक चिकित्सा तकनीक जिसे ‘लेस इनवेसिव सर्फैक्टेंट एडमिनिस्ट्रेशन’ (Less Invasive Surfactant Administration- LISA) के रूप में जाना जाता है, को राजस्थान के ‘जे.के. लोन गवर्नमेंट चिल्ड्रेन हॉस्पिटल’ में समय से पहले बच्चों में फेफड़ों की बीमारी या ‘रिस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम’ के उपचार के लिये शुरू किया गया है।
प्रमुख बिंदु:
मैकेनिकल वेंटिलेशन के मद्देनज़र नवजात शिशुओं के अपरिपक्व फेफड़ों को होने वाले नुकसान से बचाने हेतु LISA को श्वसन प्रबंधन एवं वेंटिलेशन के लिये फेफड़े की सुरक्षात्मक रणनीति के रूप में विकसित किया गया है।
LISA के लिये उपयुक्त माने जाने वाले शिशुओं को प्राथमिक ‘निरंतर सकारात्मक वायुमार्ग दबाव’ (Continuous Positive Airway Pressure- CPAP) या श्वसन संकट बढ़ने के प्रमाण के साथ उच्च प्रवाह तथा बढ़ती ऑक्सीजन आवश्यकता के साथ प्रबंधित किया जा रहा है।
LISA का नियमित अनुप्रयोग बहुत उपयोगी होगा और समय पूर्व शिशुओं के जीवन को बचाने में मदद करेगा।
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हंको
Hanko
पिछले कुछ दिनों में जैसे-जैसे जापान में COVID-19 के मामलों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है वैसे-वैसे वहाँ के उद्योग जगत के नेताओं द्वारा हंको (Hanko) परंपरा को छोड़ने की मांग की जाने लगी है।
प्रमुख बिंदु:
हंको आमतौर पर लकड़ी या प्लास्टिक से बनी एक मुहर होती है।
यह लंबाई में छोटा होता है तथा इसका स्याही वाला सिरा गोल या चौकोर आकार का होता है। इस मुहर पैड में जिस स्याही का प्रयोग होता है उसे ‘शुनिकु’ (Shuniku) कहा जाता है और वह निशान जो किसी दस्तावेज़ पर छपता है उसे ‘इंकान’ (Inkan) कहा जाता है।
इसका उपयोग अनुबंध, विवाह पंजीकरण और यहाँ तक कि वस्तु वितरण पर्ची से लेकर आधिकारिक दस्तावेज़ों को अधिकृत करने के लिये किया जाता है।
वर्तमान में जब कई देश पेपरलेस सिस्टम की ओर बढ़ने और डिजिटल हस्ताक्षर अपनाने की बात कर रहे है तो वहीं जापान में सुरक्षा कारणों की वजह से हेंको आज भी लोकप्रिय बना हुआ है।
गौरतलब है कि जापान में कई कंपनियों द्वारा वर्क-फ्रॉम-होम शुरू किये जाने के बावजूद हंको जैसी सदियों पुरानी प्रथा कर्मचारियों को उनके कार्यस्थल पर जाने का कारण बन रही है क्योंकि कंपनियाँ सुरक्षा कारणों से कार्यालय परिसर में अपनी पंजीकृत मुहरें रखना पसंद करती हैं।
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गेहूं में वैकल्पिक बौना जीन चावल की फसल के अवशेषों को जलाने की समस्या दूर कर सकता है
भारत में किसानों द्वारा सालाना बचे हुए चावल के लगभग 23 मिलियन टन अवशेषों को जला दिया जाता है जिससे कि उन्हें पुआल से छुटकारा मिले और अगली फसल जोकि गेहूं होती है, उसे बोने के लिए वे अपने खेतों को तैयार कर सकें। इसके परिणामस्वरूप वायु प्रदूषण पैदा होता है। इसके अतिरिक्त, शुष्क वातावरण लघु कोलियोपटाइल के साथ गेहूं की किस्मों के अंकुरण के लिए एक चुनौती भी पैदा करता है।
इन समस्याओं को दूर करने के लिए विभाग एवं प्रौद्योगिकी विभाग को एक स्वायत्तशासी संस्थान पुणे स्थित अघरकर अनुसंधान संस्थान (एआरआई) के वैज्ञानिकों ने गेहूं में दो वैकल्पिक बौना करने वाला जीनों-आरएचटी14 एवं आरएचटी18 का मानचित्रण किया है। ये जीन बेहतर नवांकुर ताकत और लंबे कोलियोपटाइल के साथ जुडे होते हैं।
प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. रविन्द्र पाटिल ने एआरआई के जेनेटिक्स एवं प्लांट ब्रीडिंग ग्रुप की टीम के साथ दुरुम गेहूं में क्रोमोजोम 6ए पर बौना करने वाले जीनों का मानचित्रण किया है और गेहूं प्रजनन लाइनों में इन जीनों के बेहतर चयन के लिए डीएनए आधारित मार्करों का विकास किया गया। डीएनए आधारित मार्कर गेहूं के प्रजनकों को गेहूं के प्रजनन के बड़े पूल से इन विकल्पी बौना करने वाला जीनों के वाहक गेहूं लाइनों को उपयुक्त रूप से चयन करने में सहायता करेगे। यह अनुसंधान द क्रॉप जर्नल एंड मोलेकुलर ब्रीडिंग में प्रकाशित किया गया था।
इन डीएनए आधारित मार्करों का उपयोग एआरआई में भारतीय गेहूं की किस्मों में इन जीनों के मार्कर समर्थित अंतरण के लिए किया जा रहा है जिससे कि उन्हें चावल की ठंठ युक्त स्थितियों एवं शुष्क वातावरणों के तहत बुवाई के लिए उपयुक्त बनाया जा सके। इन विकल्पी बौना करने वाले जीनों के साथ गेहूं प्रजनन लाइन वर्तमान में उन्नत चरण में हैं।
फसल अवशेष जलाने में कमी के अतिरिक्त इन विकल्पी बौना करने वाले जीनों के साथ गेहूं की किस्में शुष्क वातावरणों के तहत मृदा में अवशेष आर्द्रता का लाभ उठाने के लिए गेहूं के बीजों की गहरी बुवाई में भी सहायक हो सकती हैं।
वर्तमान में उपलब्ध अर्ध बौनी गेहूं किस्मों, जिनकी खोज हरित क्रांति के दौरान की गई थी, में पांरपरिक आरएचटी1 एलेल होते हैं और वे उच्च उर्वरता सिंचित स्थितियों के तहत ईष्टतम फसल की ऊपज करते हैं। बहरहाल, छोटे सेलियोप्टाइल के कारण शुष्क वातावरणों में गहरी बुवाई स्थितियों के अधिक अनुकूल नहीं हैं।
बचे हुए चावल फसल के अवशेषों को जलाया जाना पर्यावरण, मृदा तथा मानव स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदायक है। इसलिए, गेहूं सुधार कार्यक्रमों में विकल्पी बौना करने वाले जीनों को शामिल किए जाने का आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, आरएचटी1 के केवल दो ड्वार्फिंग ऐलेल की ही भारतीय गेहूं किस्मों में प्रधानता हैं इसलिए भारत में गेहूं उगाए जाने वाले विविध क्षेत्रों को देखते हुए ड्वार्फिंग जीनों के जेनेटिक आधार को विविधीकृत करने की आवश्यकता है।
उन्नत गेहूं किस्में जो एआरआई में विकसित की जा रही हैं, चावल-गेहूं फसल प्रणाली के तहत डंठलों को जलाये जाने के मामलों में कमी लाएंगी। ये किस्में शुष्क वातावरणों के तहत मृदा में अवशेष आर्द्रता का लाभ उठाने के लिए गेहूं के बीजों की गहरी बुवाई में भी सहायक होंगी जिससे बहुमूल्य जल संसाधनों की बचत होगी और किसानों के लिए खेती की लागत कम हो जाएगी।
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ईआईटी गुवाहाटी ने अल्जाइमर के कारण भूलने की आदत रोकने के नये तरीकों का पता लगाया
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने ऐसी सृजनात्मक सोच पर काम किया है जो अल्जाइमर रोग से जुड़ी भूलने की आदत को रोकने या कम करने में मदद कर सकते हैं।
अनुसंधान दल का नेतृत्व बायोसाइंसेज एंड बायोइंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी गुवाहाटी के प्रोफेसर वाइबिन रामकृष्णन, इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी गुवाहाटी केप्रोफेसर हर्षल नेमाड़े ने किया। उन्होंने अल्जाइमर के न्यूरोकेमिकल सिद्धांतों का अध्ययन कियाऔर मस्तिष्क में न्यूरोटॉक्सिक अणुओं का संचय रोकने के नए तरीकों की खोज की जो भूलने की आदत से जुड़े हैं।
आईआईटी गुवाहाटी टीम ने कम वोल्टेज वाले विद्युत क्षेत्र के अनुप्रयोग और मस्तिष्क में न्यूरोटॉक्सिक अणुओं को एकत्र होने से रोकने के लिए ‘ट्रोजन पेप्टाइड्स’के उपयोग जैसे दिलचस्प तरीकों की जानकारी की। वैज्ञानिकों को उनके कार्यों में शोध छात्र डॉ. गौरव पांडे और श्री जाह्नु सैकियाने सहायता की। उनके अध्ययनों के परिणाम एसीएस केमिकल न्यूरोसाइंस, रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री के आरएससी एडवांस, बीबीए और न्यूरोपेप्टाइड जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।
अल्जाइमर रोग का इलाज भारत में विकसित करने का महत्व है क्योंकि चीन और अमेरिका के बाद, दुनिया में अल्जाइमर के रोगियों की तीसरी सबसे बड़ी संख्या भारत में है, भारत में 40 लाख से अधिक लोग अल्जाइमर से जुड़ी भूलने की आदत के शिकार हैं। वर्तमान उपचारों में केवल रोग के कुछ लक्षण कम हो जाते हैं, फिर भी चिकित्सा संबंधी कोई ऐसी विध्वंसक पद्धति नहीं है जो अल्जाइमर के अंतर्निहित कारणों का इलाज कर सकती हो।
डॉ. रामाकृष्णन का कहना है, "अल्जाइमर रोग के इलाज के लिए लगभग सौ संभावित दवाएं 1998 और 2011 के बीच विफल रही हैं, जो समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।"
अल्जाइमर का एक निर्धारक हॉलमार्क मस्तिष्क में एमीलॉइड बीटा पेप्टाइड्स का संचय है। डॉ. रामाकृष्णन और डॉ.नेमाड़े ने अल्जाइमर की प्रगति को रोकने के लिए इन पेप्टाइड्स के संचय को कम करने के तरीकों की तलाश की।
2019 में, आईआईटीगुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने पाया कि कम-वोल्टेज, सुरक्षित विद्युत क्षेत्र के अनुप्रयोग से विषाक्त न्यूरोडीजेनेरेटिव अणुओं का निर्माण और संचय कम हो सकता है जो अल्जाइमर रोग में भूलने का कारण बनते हैं। उन्होंने पाया कि बाहरी विद्युत / चुंबकीय क्षेत्र इन पेप्टाइड अणुओं की संरचना को व्यवस्थित करता है, जिससे एकत्रीकरण को रोका जा सकता है।
“विद्युत क्षेत्र के संपर्क में आने पर, हम तंत्रिका कोशिकाओं के पतन को 17–35 प्रतिशत तक सीमित कर सकते हैं। डॉ. रामाकृष्णन का कहना है, "इस बीमारी की शुरुआत में लगभग 10 साल की देरी होगी।"
इस क्षेत्र में आगे काम करते हुए, वैज्ञानिकों ने इन न्यूरोटॉक्सिन अणुओं के एकत्रीकरण को रोकने के लिए ‘ट्रोजन पेप्टाइड्स ’का उपयोग करने की संभावना का पता लगाया। ‘ट्रोजन पेप्टाइड ’का उपयोग करने का विचार पौराणिक" ट्रोजन हॉर्स "से आता है, जिसका ट्रॉय की लड़ाई में यूनानियों नेदांव-पेच के रूप में इस्तेमाल किया था। शोधकर्ताओं ने ट्रोजन पेप्टाइड्स को अमाइलॉइड पेप्टाइड के एकत्रीकरण को रोकने के लिए ‘छल-कपट’के समान दृष्टिकोण को अपनाते हुए, विषाक्त फाइब्रिलर संयोजन का गठन रोकने और भूलने की आदत की ओर ले जाने वाली तंत्रिका की विषाक्तता को कम करने के लिए डिज़ाइन किया है।
परियोजना समन्वयक, डॉ. रामकृष्णन और डॉ. नीमेड ने कहा,"हमारे शोध ने एक अलग रास्ता प्रदान किया है जो अल्जाइमर रोग की शुरुआत की अवधि को बढ़ा सकता है। हालांकि, इस तरह के नए चिकित्सीय दृष्टिकोणों को मानव उपचार में लाने से पहले पशु मॉडल और नैदानिक परीक्षणों में इसका परीक्षण किया जाएगा।”
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व्यापक रूप से लोकप्रिय खादी फेस मास्क "वैश्विक" होने के लिए तैयार है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा सभी प्रकार के गैर-चिकित्सा/ गैर-सर्जिकल मास्क के निर्यात पर प्रतिबंध हटा लिए जाने के बाद, खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) अब विदेशों में खादी कॉटन और रेशम फेस मास्क के निर्यात की संभावनाओं का पता लगा रहा है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) की ओर से इस संदर्भ में 16 मई को अधिसूचना जारी कर दी गई है।
यह कदम, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के "आत्मनिर्भर भारत अभियान" को ध्यान में रखते हुए "स्थानीय से वैश्विक" आह्वान के कुछ दिनों बाद उठाया गया है। कोविड-19 वैश्विक महामारी के दौरान फेस मास्क की अत्यधिक मांग को ध्यान में रखते हुए, केवीआईसी ने क्रमशः दो स्तरीय और तीन स्तरीय कॉटन के साथ-साथ सिल्क फेस मास्क को विकसित किया है, जो पुरुषों के लिए दो रंगों में और महिलाओं के लिए कई रंगों में उपलब्ध है।
अब तक केवीआईसी को 8 लाख फेस मास्क की आपूर्ति के ऑर्डर प्राप्त हो चुके हैं और लॉकडाउन अवधि के दौरान 6 लाख से ज्यादा फेस मास्क की आपूर्ति की जा चुकी है। केवीआईसी को राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय, केंद्र सरकार के मंत्रालयों, जम्मू-कश्मीर सरकार से ऑर्डर प्राप्त हुए हैं और आम नागरिकों द्वारा ईमेल के माध्यम से ऑर्डर मिले हैं। फेस मास्क की बिक्री करने के अलावा, पूरे देश में खादी संस्थानों द्वारा जिला प्राधिकरणों को 7.5 लाख से ज्यादा खादी के फेस मास्क मुफ्त में बांटे गए हैं।
केवीआईसी की योजना दुबई, अमेरिका, मॉरीशस और कई यूरोपीय और मध्य पूर्व देशों में खादी फेस मास्क की आपूर्ति करने की है, जहां पर पिछले कुछ वर्षों में खादी की लोकप्रियता काफी बढ़ी है। केवीआईसी की योजना इन देशों में भारतीय दूतावासों के माध्यम से खादी फेस मास्क बिक्री करने की है।
केवीआईसी के चेयरमैन, श्री विनय कुमार सक्सेना ने कहा कि खादी फेस मास्क का निर्यात, ‘स्थानीय से वैश्विक’ होने का सबसे बढ़िया उदाहरण है। सक्सेना ने कहा, “प्रधानमंत्री की अपील के बाद हाल के वर्षों में खादी के कपड़े और अन्य उत्पादों की लोकप्रियता पूरी दुनिया में काफी बढ़ी है। खादी फेस मास्क के निर्यात से उत्पादन में गतिशीलता आएगी और अंतत भारत में कारीगरों के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे।” सक्सेना ने यह भी कहा कि, "फेस मास्क कोरोना महामारी से निपटने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपकरणों में से एक है। खादी फैब्रिक से तैयार ये डबल ट्विस्टेड मास्क न केवल गुणवत्ता और मांग के पैमाने पर खरे उतरते हैं बल्कि वे लागत प्रभावी, सांस लेने में उपयुक्त, धोने योग्य, पुन: उपयोग करने योग्य और बायो-डिग्रेडेबल हैं।”
इन मास्क के निर्माण में केवीआईसी द्वारा विशेष रूप से डबल ट्विस्टेड खादी कपड़े का उपयोग किया जा रहा है क्योंकि यह नमी की मात्रा को अंदर तक बनाए रखने में मददगार साबित होता है और हवा को अंदर जाने देने के लिए एक आसान मार्ग प्रदान करता है। इन मास्क को जो बात विशेष रूप से खास बनाती है वह हाथ से बुने हुए कॉटन और सिल्क के कपड़े हैं। कॉटन एक मैकेनिकल अवरोधक के रूप में जबकि रेशम एक इलेक्ट्रोस्टैटिक अवरोधक के रूप में काम करता है।
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स्थानीय से वैश्विक: खादी मास्क की विदेशी बाजारों में दस्तक
व्यापक रूप से लोकप्रिय खादी फेस मास्क "वैश्विक" होने के लिए तैयार है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा सभी प्रकार के गैर-चिकित्सा/ गैर-सर्जिकल मास्क के निर्यात पर प्रतिबंध हटा लिए जाने के बाद, खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) अब विदेशों में खादी कॉटन और रेशम फेस मास्क के निर्यात की संभावनाओं का पता लगा रहा है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) की ओर से इस संदर्भ में 16 मई को अधिसूचना जारी कर दी गई है।
यह कदम, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के "आत्मनिर्भर भारत अभियान" को ध्यान में रखते हुए "स्थानीय से वैश्विक" आह्वान के कुछ दिनों बाद उठाया गया है। कोविड-19 वैश्विक महामारी के दौरान फेस मास्क की अत्यधिक मांग को ध्यान में रखते हुए, केवीआईसी ने क्रमशः दो स्तरीय और तीन स्तरीय कॉटन के साथ-साथ सिल्क फेस मास्क को विकसित किया है, जो पुरुषों के लिए दो रंगों में और महिलाओं के लिए कई रंगों में उपलब्ध है।
अब तक केवीआईसी को 8 लाख फेस मास्क की आपूर्ति के ऑर्डर प्राप्त हो चुके हैं और लॉकडाउन अवधि के दौरान 6 लाख से ज्यादा फेस मास्क की आपूर्ति की जा चुकी है। केवीआईसी को राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय, केंद्र सरकार के मंत्रालयों, जम्मू-कश्मीर सरकार से ऑर्डर प्राप्त हुए हैं और आम नागरिकों द्वारा ईमेल के माध्यम से ऑर्डर मिले हैं। फेस मास्क की बिक्री करने के अलावा, पूरे देश में खादी संस्थानों द्वारा जिला प्राधिकरणों को 7.5 लाख से ज्यादा खादी के फेस मास्क मुफ्त में बांटे गए हैं।
केवीआईसी की योजना दुबई, अमेरिका, मॉरीशस और कई यूरोपीय और मध्य पूर्व देशों में खादी फेस मास्क की आपूर्ति करने की है, जहां पर पिछले कुछ वर्षों में खादी की लोकप्रियता काफी बढ़ी है। केवीआईसी की योजना इन देशों में भारतीय दूतावासों के माध्यम से खादी फेस मास्क बिक्री करने की है।
केवीआईसी के चेयरमैन, श्री विनय कुमार सक्सेना ने कहा कि खादी फेस मास्क का निर्यात, ‘स्थानीय से वैश्विक’ होने का सबसे बढ़िया उदाहरण है। सक्सेना ने कहा, “प्रधानमंत्री की अपील के बाद हाल के वर्षों में खादी के कपड़े और अन्य उत्पादों की लोकप्रियता पूरी दुनिया में काफी बढ़ी है। खादी फेस मास्क के निर्यात से उत्पादन में गतिशीलता आएगी और अंतत भारत में कारीगरों के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे।” सक्सेना ने यह भी कहा कि, "फेस मास्क कोरोना महामारी से निपटने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपकरणों में से एक है। खादी फैब्रिक से तैयार ये डबल ट्विस्टेड मास्क न केवल गुणवत्ता और मांग के पैमाने पर खरे उतरते हैं बल्कि वे लागत प्रभावी, सांस लेने में उपयुक्त, धोने योग्य, पुन: उपयोग करने योग्य और बायो-डिग्रेडेबल हैं।”
इन मास्क के निर्माण में केवीआईसी द्वारा विशेष रूप से डबल ट्विस्टेड खादी कपड़े का उपयोग किया जा रहा है क्योंकि यह नमी की मात्रा को अंदर तक बनाए रखने में मददगार साबित होता है और हवा को अंदर जाने देने के लिए एक आसान मार्ग प्रदान करता है। इन मास्क को जो बात विशेष रूप से खास बनाती है वह हाथ से बुने हुए कॉटन और सिल्क के कपड़े हैं। कॉटन एक मैकेनिकल अवरोधक के रूप में जबकि रेशम एक इलेक्ट्रोस्टैटिक अवरोधक के रूप में काम करता है।स्थानीय से वैश्विक: खादी मास्क की विदेशी बाजारों में दस्तक
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एनसीएमसी ने ओडिशा और पश्चिम बंगाल के चक्रवाती तूफान प्रभावित क्षेत्रों में बचाव एवं राहत कार्यों की समीक्षा की
कैबिनेट सचिव ने केंद्रीय मंत्रालयों/एजेंसियों को इन दोनों राज्यों में सभी आवश्यक सहायता जल्द-से-जल्द प्रदान करने का निर्देश दिया
कैबिनेट सचिव श्री राजीव गाबा ने आज राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति (एनसीएमसी) की बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में चक्रवाती तूफान ‘अम्फान’ द्वारा तबाही मचाने के बाद संबंधित राज्यों और केंद्रीय मंत्रालयों/एजेंसियों के साथ ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल के तूफान प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति की समीक्षा की गई।
ओडिशा और पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिवों ने बताया कि आईएमडी का पूर्वानुमान सही समय पर एवं सटीक साबित होने और एनडीआरएफ की अग्रिम तैनाती से पश्चिम बंगाल में लगभग 5 लाख लोगों और ओडिशा में लगभग 2 लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने में काफी सहूलियत हुई। इसी की बदौलत लोगों की मौत के आंकड़े को अत्यंत सीमित रखना संभव हो पाया है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1999 में ओडिशा में भारी तबाही मचाने वाले सुपर चक्रवाती तूफान के बाद तूफान ‘अम्फान’ ही सर्वाधिक भीषण एवं उग्र था।
एनडीआरएफ की ओर से पश्चिम बंगाल में अतिरिक्त टीमों की तैनाती की जा रही है, ताकि खासकर कोलकाता में आवश्यक सेवाओं की बहाली के काम में तेजी लाई जा सके। इसके साथ ही भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) भी पश्चिम बंगाल में खाद्यान्न, विशेषकर चावल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करेगा, जिससे कि तूफान के कारण असहाय महसूस कर रहे लोगों को तत्काल आवश्यक भरण-पोषण प्रदान किया जा सके।
विद्युत मंत्रालय और दूरसंचार विभाग भी दोनों राज्यों में सेवाओं की शीघ्र बहाली में मदद करेंगे। इसी तरह रेलवे, जिसे अपनी बुनियादी ढांचागत सुविधाओं में भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है, भी जल्द से जल्द अपना परिचालन फिर से शुरू करने की प्रक्रिया में है।
पश्चिम बंगाल ने यह जानकारी दी कि चक्रवाती तूफान प्रभावित क्षेत्रों में कृषि, बिजली और दूरसंचार सुविधाओं को व्यापक नुकसान हुआ है। उधर, ओडिशा ने बताया कि उसके यहां नुकसान मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र तक ही सीमित रहा है।
कैबिनेट सचिव ने बचाव एवं आवश्यक सेवाओं की बहाली के लिए किए जा रहे प्रयासों की समीक्षा करते हुए यह निर्देश दिया कि केंद्रीय मंत्रालयों/एजेंसियों के अधिकारियों को ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल की राज्य सरकारों के साथ निकट संपर्क में रहना चाहिए और सभी आवश्यक सहायता जल्द-से-जल्द प्रदान करनी चाहिए। गृह मंत्रालय तूफान से हुए नुकसान का जल्द आकलन करने और इस बारे में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए टीमों को वहां भेजेगा।
पश्चिम बंगाल और ओडिशा के मुख्य सचिवों ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से एनसीएमसी की बैठक में भाग लिया। गृह, रक्षा, शिपिंग, नागरिक उड्डयन, रेलवे, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, बिजली, दूरसंचार, इस्पात, पेयजल व स्वच्छता तथा स्वास्थ्य मंत्रालयों और आईएमडी, एनडीएमए एवं एनडीआरएफ के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस बैठक में भाग लिया।
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कॉयर जियो टेक्सटाइल्स को ग्रामीण सड़क निर्माण के लिए मंजूरी
चर्चा में क्यों?
कॉयर जियो टेक्सटाइल्स को अंततः ग्रामीण सड़क निर्माण के लिए एक अच्छी सामग्री के रूप में स्वीकार किया गया है।
सड़क निर्माण के लिए पीएमजीएसवाई की नई प्रौद्योगिकी दिशानिर्देशों के अनुसार, प्रस्तावों के प्रत्येक बैच के सडकों की कुल लम्बाई के 15 प्रतिशतमें नई प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके निर्माण किया जाना है। इनमें से 5प्रतिशत सड़कों का निर्माण आईआरसी मान्यता प्राप्त प्रौद्योगिकी का उपयोग करके किया जाना है। आईआरसी ने अब ग्रामीण सड़क निर्माण के लिए कॉयर जियो टेक्सटाइल्स को मान्यता दी है।
इन निर्देशों के अनुसार, पीएमजीएसवाई -III के तहत 5 प्रतिशत ग्रामीण सड़कों का निर्माण कॉयर जियो टेक्सटाइल्स का उपयोग करके किया जाएगा। तदनुसार कॉयर जियो टेक्सटाइल्सका उपयोग करके आंध्र प्रदेश में 164 किलोमीटर, गुजरात में 151 किलोमीटर, केरल में 71 किलोमीटर, महाराष्ट्र में 328 किलोमीटर, ओडिशा में 470 किलोमीटर, तमिलनाडु में 369 किलोमीटर और तेलंगाना में 121 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया जाएगा। इस प्रकार 7 राज्यों में कॉयर जियो टेक्सटाइल्स का उपयोग करके 1674 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया जाएगा, जिसके लिए एक करोड़ वर्ग मीटर कॉयर जियो-टेक्सटाइल्स की आवश्यकता होगी। इसकी अनुमानित लागत70 करोड़ रु है।
क्या है कॉयर जियो टेक्सटाइल्स की विशेषता?
जो एक पारगम्य फैब्रिक है तथा प्राकृतिक, मजबूत, अत्यधिक टिकाऊ, टूट-फूट, मोड़ एवं नमी प्रतिरोधी है व किसी भी सूक्ष्मजीव (माइक्रोबियल) के हमले से मुक्त है, को अंततः ग्रामीण सड़क निर्माण के लिए एक अच्छी सामग्री के रूप में स्वीकार किया गया है।
इस निर्णय देश में कॉयर जियो -टेक्सटाइल के लिए एक बड़ी बाजार संभावना बनेगी और कोविड-19 से प्रभावित कॉयर उद्योग के लिए यह एक वरदान सिद्ध होगा।
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अगप्पे चित्रा मैग्ना (Agappe Chitra Magna)
श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी (एससीटीआईएमएसटी) – त्रिवेंद्रम और अगप्पे डायग्नोस्टिक्स लिमिटेड, कोचीन द्वारा विकसित अगप्पे चित्रा मैग्ना का वाणिज्यिक लॉन्च 21 मई, 2020 को शाम 4.30 बजे आयोजित किया जायेगा। अगप्पे चित्रा मैग्ना मैग्नेटिक नैनोपार्टिकल-आधारित आरएनए एक्सट्रैक्शन किट है जिसका उपयोग कोविड – 19 की जांच में किया जाता है। एससीटीआईएमएसटी राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत कार्य करता है। अगप्पे डायग्नोस्टिक्स लिमिटेड, इन विट्रो डायग्नोस्टिक्स का निर्माण करती है।
क्या है चित्रा मैग्ना?
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ अनूपकुमार थेक्वेवेटिल के नेतृत्व में एससीटीआईएमएसटी द्वारा विकसित चित्रा मैग्ना एक अभिनव आरएनए एक्सट्रैक्शन किट है जिसे अप्रैल 2020 में अगप्पे डायग्नोस्टिक्स को हस्तांतरित कर दिया गया था और अब यह अगप्पे चित्रा मैग्ना आरएनए एक्सट्रैक्शन किट के रूप में बाजार में उपलब्ध होगा।
इस उत्पाद को कोविड -19 आरएनए को अलग (आइसोलेशन) करने के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी द्वारा स्वतंत्र रूप से मान्यता दी गयी है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने इस किट के व्यावसायीकरण के लिए मंजूरी दे दी है।
क्या है विशेषता?
सार्स - कोव – 2 का पता लगाने के लिए किट का उपयोग आरटी-लैंप, आरटी-क्यूपीसीआर, आरटी-पीसीआर और अन्य पीसीआर आधारित प्रोटोकॉल के आरएनए एक्सट्रैक्शन के लिए किया जा सकता है।
यह आरएनए को अलग करने के लिए एक अभिनव तकनीक का उपयोग करता है जिसके तहत रोगी के नमूने से आरएनए को अलग करने के लिए चुंबकीय नैनोकणों का उपयोग किया जाता है। चुंबकीय नैनोकण वायरल आरएनए के साथ जुड़ जाते हैं और चुंबकीय क्षेत्र के संपर्क में आने पर अत्यधिक शुद्ध और सान्द्र आरएनए देते हैं। पता लगाने की विधि की संवेदनशीलता वायरल आरएनए की पर्याप्त मात्रा पर निर्भर करती है। यह नवाचार पॉजिटिव मामलों की पहचान करने की संभावना को बढ़ाता है।
लाभ
अनुमान है कि भारत को अगले छह महीनों के दौरान प्रति माह लगभग 8 लाख आरएनए एक्सट्रैक्शन किट की आवश्यकता होगी। अगप्पे चित्रा मैग्ना आरएनए एक्सट्रैक्शन किट की कीमत लगभग 150 रुपये प्रति किट है। इससे परीक्षण की लागत और आयातित किट पर देश की निर्भरता कम होने की उम्मीद है, जिसकी लागत लगभग 300 रुपये है। अगप्पे डायग्नोस्टिक्स की विनिर्माण क्षमता 3 लाख किट प्रति माह है।
