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चक्रवात निसर्ग के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें
1)भारत मे चक्रवातों का नामकरण संयुक्त राष्ट्र की प्रशांत एशियाई क्षेत्र की आर्थिक और सामाजिक आयोग द्वारा होता है
2)निसर्ग का उदगम क्षेत्र अरब सागर है।
3)चक्रवात निसर्ग का शाब्दिक अर्थ त्यागना है
4)इसका नामकरण बांग्लादेश द्वारा किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में कौन सा कथन सही है।
1)1,2
2)1,4
3)1,2,4
4)1,2,3,4
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Desh Deshantar: Restructuring G7 & Impact on India | G7 के पुनर्गठन की बात और भारत
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2 जून, 2020 को केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए तीन नई योजनाओं की शुरुआत की। यह योजनायें हैं : उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन योजना, क्लस्टर स्कीम (EMC 2.0) और कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (SPECS)। मार्च 2020 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा इन योजनाओं को मंजूरी दी गई थी।
मुख्य बिंदु
इस योजनाओं से निवेश आकर्षित करने की उम्मीद है। इससे 2025 तक मोबाइल फोन और उनके पुर्जों के विनिर्माण को लगभग 10 लाख करोड़ रुपए तक बढ़ाने की उम्मीद है। साथ ही, यह योजनायें 5 लाख प्रत्यक्ष और 15 लाख अप्रत्यक्ष नौकरियों का सृजन करने में मदद करेगी।
उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन योजना
यह योजना भारत में निर्मित माल को 4% से 6% की प्रोत्साहन राशि प्रदान करेगी।
SPECS
Scheme for Promotion of Manufacturing of Electronic Components and Semiconductors (SPECS) पूंजीगत व्यय पर 25% की प्रोत्साहन राशि प्रदान करेगी। यह कुछ विशिष्ट सूचियों जैसे कि सेमीकंडक्टर उपकरणों, इलेक्ट्रॉनिक सामानों, प्रदर्शन निर्माण इकाइयों आदि तक विस्तारित की गयी है।
ईएमसी 2.0
संशोधित इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर (EMC 2.0) विश्व स्तर के बुनियादी ढांचे को बनाने में सहायता करेगा। यह योजना वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं और उनकी आपूर्ति श्रृंखलाओं को आकर्षित करने में मदद करेगी।
वर्तमान परिदृश्य
भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता देश है। आज देश में 200 से अधिक मोबाइल विनिर्माण इकाइयाँ हैं। 2014 में, देश का विनिर्माण मूल्य 1,90,366 करोड़ रुपये था। आज यह बढ़कर 4,58,000 करोड़ रुपये हो गया है। इलेक्ट्रॉनिक्स की वैश्विक हिस्सेदारी 2012 में 1.3% से बढ़कर 2018 में 3% हो गई है।2 जून, 2020 को केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए तीन नई योजनाओं की शुरुआत की। यह योजनायें हैं : उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन योजना, क्लस्टर स्कीम (EMC 2.0) और कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (SPECS)। मार्च 2020 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा इन योजनाओं को मंजूरी दी गई थी।
मुख्य बिंदु
इस योजनाओं से निवेश आकर्षित करने की उम्मीद है। इससे 2025 तक मोबाइल फोन और उनके पुर्जों के विनिर्माण को लगभग 10 लाख करोड़ रुपए तक बढ़ाने की उम्मीद है। साथ ही, यह योजनायें 5 लाख प्रत्यक्ष और 15 लाख अप्रत्यक्ष नौकरियों का सृजन करने में मदद करेगी।
उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन योजना
यह योजना भारत में निर्मित माल को 4% से 6% की प्रोत्साहन राशि प्रदान करेगी।
SPECS
Scheme for Promotion of Manufacturing of Electronic Components and Semiconductors (SPECS) पूंजीगत व्यय पर 25% की प्रोत्साहन राशि प्रदान करेगी। यह कुछ विशिष्ट सूचियों जैसे कि सेमीकंडक्टर उपकरणों, इलेक्ट्रॉनिक सामानों, प्रदर्शन निर्माण इकाइयों आदि तक विस्तारित की गयी है।
ईएमसी 2.0
संशोधित इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर (EMC 2.0) विश्व स्तर के बुनियादी ढांचे को बनाने में सहायता करेगा। यह योजना वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं और उनकी आपूर्ति श्रृंखलाओं को आकर्षित करने में मदद करेगी।
वर्तमान परिदृश्य
भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता देश है। आज देश में 200 से अधिक मोबाइल विनिर्माण इकाइयाँ हैं। 2014 में, देश का विनिर्माण मूल्य 1,90,366 करोड़ रुपये था। आज यह बढ़कर 4,58,000 करोड़ रुपये हो गया है। इलेक्ट्रॉनिक्स की वैश्विक हिस्सेदारी 2012 में 1.3% से बढ़कर 2018 में 3% हो गई है।
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यदि तापमान में यह बढ़ोतरी 0.5 डिग्री से 2.5 डिग्री के बीच हो तो यह मानसून को प्रभावित कर सकती है। इससे मध्य एवं पूर्वी प्रशांत महासागर में हवा के दबाव में कमी आने लगती है। इसका असर यह होता कि विषुवत रेखा के इर्द-गिर्द चलने वाली व्यापारिक हवाएँ कमजोर पड़ने लगती हैं। यही हवाएँ मानसूनी हवाएँ होती हैं जो भारत में वर्षा करती हैं।
ला-नीना
प्रशांत महासागर में उपरोक्त स्थान पर कभी-कभी समुद्र की सतह ठंडी होने लगती है। ऐसी स्थिति में अल-नीनो के ठीक विपरीत घटना होती है जिसे ला-नीना कहा जाता है।
ला-नीना बनने से हवा के दबाव में तेजी आती है और व्यापारिक पवनों को रफ्तार मिलती है, जो भारतीय मानसून पर अच्छा प्रभाव डालती है। उदाहरण के लिये, वर्ष 2009 में मानसून पर अल-नीनो के प्रभाव के कारण कम वर्षा हुई थी, जबकि वर्ष 2010 एवं 2011 में ला-नीना के प्रभाव के कारण अच्छी वर्षा हुई थी।
हिंद महासागर द्विध्रुव
हिंद महासागर द्विध्रुव के दौरान हिंद महासागर का पश्चिमी भाग पूर्वी भाग की अपेक्षा ज़्यादा गर्म या ठंडा होता रहता है। पश्चिमी हिंद महासागर के गर्म होने पर भारत के मानसून पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जबकि ठंडा होने पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
मेडेन जुलियन ऑस्किलेशन
इसकी वजह से मानसून की प्रबलता और अवधि दोनों प्रभावित होती है। इसके प्रभावस्वरुप महासागरीय बेसिनों में उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की संख्या और तीव्रता भी प्रभावित होती है, जिसके परिणामस्वरूप जेट स्ट्रीम में भी परिवर्तन आता है। यह भारतीय मानसून के संदर्भ में एल-नीनो और ला-नीना की तीव्रता और गति के विकास में भी योगदान देता है।
चक्रवात निर्माण
चक्रवातों के केंद्र में अति निम्न दाब की स्थिति पाई जाती है जिसकी वजह से इसके आसपास की पवनें तीव्र गति से इसके केंद्र की ओर प्रवाहित होती हैं। जब इस तरह की परिस्थितियाँ सतह के नज़दीक विकसित होती हैं तो मानसून को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं। अरब सागर में बनने वाले चक्रवात, बंगाल की खाड़ी के चक्रवातों से अधिक प्रभावी होते हैं क्योंकि भारतीय मानसून का प्रवेश प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में अरब सागर की ओर होता है।
जेट स्ट्रीम
जेट स्ट्रीम पृथ्वी के ऊपर तीव्र गति से चलने वाली हवाएँ हैं, ये भारतीय मानसून को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना वर्ष 1875 में की गई थी। स्वतंत्रता के बाद 27 अप्रैल, 1949 को यह विश्व मौसम विज्ञान संगठन का सदस्य बना।
यह पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत एक प्रमुख एजेंसी है।
इसका प्रमुख कार्य मौसम संबंधी भविष्यवाणी व प्रेक्षण करना तथा भूकंपीय विज्ञान के क्षेत्र में शोध करना है।
इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
IMD के छह प्रमुख क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र हैं, जो क्रमशः चेन्नई, गुवाहाटी, कोलकाता, मुंबई, नागपुर, नई दिल्ली में स्थित है।
सामान्य मानसून के संभावित लाभ
खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धिवर्षा अच्छी होने का सबसे अच्छा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ता है। जहाँ सिंचाई की सुविधा मौजूद नहीं है, वहाँ बारिश होने से अच्छी फसल होने की संभावना बढ़ जाती है।
इसके अतिरिक्त ऐसे क्षेत्र जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं भी, तो ऐसे क्षेत्रों में समय पर अच्छी वर्षा होने से किसानों को नलकूप चलाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। साथ ही उनकी उत्पादन लागत में कमी आयेगी। फलत: अच्छे उत्पादन से किसानों को फायदा होगा और खाद्यान्नों की मूल्यवृद्धि भी नियंत्रित रहेगी।
जल की कमी दूर होगीअच्छे मानसून से पीने के पानी की उपलब्धता संबंधी समस्या का भी काफी हद तक समाधान होता है। एक तो नदियों, तालाबों में पर्याप्त मात्रा में पानी जमा हो जाता है। दूसरे, भूजल का भी पुनर्भरण होता है।
बिजली संकट कम होगामानूसन के चार महीनों में अच्छी वर्षा होने से नदियों, जलाशयों का जलस्तर बढ़ जाता है। इससे बिजली उत्पादन भी अच्छा होता है।
यदि वर्षा कम हो और जलस्तर कम हो जाए तो बिजली उत्पादन भी प्रभावित होता है।
गर्मी से राहतमानसून की वर्षा जहाँ एक ओर खेती-बाड़ी, जलाशयों, नदियों को पानी से लबालब कर देती हैं, वहीं दूसरी ओर भीषण गर्मी से तप रहे देश को भी गर्मी से राहत प्रदान करती है।
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भारतीय मानसून
वैश्विक महामारी COVID-19 के प्रसार के बीच भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department-IMD) ने मानसूनी वर्षा का पूर्वानुमान व्यक्त किया है। मानसून अपने निर्धारित समय 1 जून को केरल के तट पर दस्तक दे चुका है। केरल में अच्छी वर्षा हो रही है और देश के अन्य हिस्सों में भी अच्छी वर्षा का अनुमान है। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, 'दक्षिण-पश्चिम मानसून केरल में पूरी तरह सक्रिय हो गया है।
इससे पूर्व भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने Western Disturbances की सक्रियता के कारण मानसून के आगमन में देरी का अनुमान व्यक्त किया था, परंतु एक निज़ी मौसम विज्ञान कंपनी ने अम्फान चक्रवात के प्रभाव का अध्ययन कर मानसून के समय से पूर्व आने का पूर्वानुमान व्यक्त किया था। तत्पश्चात भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने अपने पूर्वानुमान को संशोधित करते हुए 1 जून को मानसून के आगमन का समय निर्धारित किया। इस प्रकार की घटनाएँ भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वानुमान पर संदेह व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती हैं।
इस आलेख में भारतीय मानसून, उसकी कार्यप्रणाली, भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारक, सामान्य मानसून के लाभ तथा भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की कार्यप्रणाली पर विमर्श करने का प्रयास किया जाएगा।
मानसून से तात्पर्य
ध्यातव्य है कि यह अरबी शब्द मौसिम से निकला हुआ शब्द है, जिसका अर्थ होता है हवाओं का मिज़ाज।
शीत ऋतु में हवाएँ उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर बहती हैं जिसे शीत ऋतु का मानसून कहा जाता है। उधर, ग्रीष्म ऋतु में हवाएँ इसके विपरीत दिशा में बहती हैं, जिसे दक्षिण-पश्चिम मानसून या गर्मी का मानसून कहा जाता है।
चूँकि पूर्व के समय में इन हवाओं से व्यापारियों को नौकायन में सहायता मिलती थी, इसीलिये इन्हें व्यापारिक हवाएँ या ‘ट्रेड विंड’ भी कहा जाता है।
मानसून की उत्पत्ति
ग्रीष्म ऋतु में जब हिंद महासागर में सूर्य विषुवत रेखा के ठीक ऊपर होता है, तो मानसून का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में समुद्र की सतह गरम होने लगती है और उसका तापमान 30 डिग्री तक पहुँच जाता है। जबकि इस दौरान धरती का तापमान 45-46 डिग्री तक पहुँच चुका होता है।
ऐसी स्थिति में हिंद महासागर के दक्षिणी हिस्से में मानसूनी हवाएँ सक्रिय हो जाती हैं। ये हवाएँ एक दूसरे को आपस में काटते हुए विषुवत रेखा पार कर एशिया की तरफ बढ़ने लगती है। इसी दौरान समुद्र के ऊपर बादलों के बनने की प्रक्रिया शुरू होती है।
विषुवत रेखा पार करके ये हवाएँ और बादल वर्षा करते हुए बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का रुख करते हैं। इस दौरान देश के तमाम हिस्सों का तापमान समुद्र तल के तापमान से अधिक हो जाता है।
ऐसी स्थिति में हवाएँ समुद्र से सतह की ओर बहना शुरू कर देती हैं। ये हवाएँ समुद्री जल के वाष्पन से उत्पन्न जल वाष्प को सोख लेती हैं और पृथ्वी पर आते ही ऊपर की ओर उठने लगती है और वर्षा करती हुई आगे बढ़ती हैं।
बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में पहुँचने के बाद ये मानसूनी हवाएँ दो शाखाओं में विभाजित हो जाती हैं।
एक शाखा अरब सागर की तरफ से मुंबई, गुजरात एवं राजस्थान होते हुए आगे बढ़ती है तो दूसरी शाखा बंगाल की खाड़ी से पश्चिम बंगाल, बिहार, पूर्वोत्तर होते हुए हिमालय से टकराकर गंगीय क्षेत्रों की ओर मुड़ जाती हैं और इस प्रकार जुलाई के पहले सप्ताह तक पूरे देश में अत्यधिक वर्षा होने लगती है।
मानसून का पूर्वानुमान कैसे?
वस्तुतः मानसून एक ऐसी अबूझ पहेली है जिसका अनुमान लगाना बेहद जटिल है। कारण यह है कि भारत में विभिन्न किस्म के जलवायु जोन और उप-जोन हैं। हमारे देश में 127 कृषि जलवायु उप-संभाग हैं और 36 संभाग हैं।
मानसून विभाग द्वारा अप्रैल के मध्य में मानसून को लेकर दीर्घावधि पूर्वानुमान जारी किया जाता है। इसके बाद फिर मध्यम अवधि और लघु अवधि के पूर्वानुमान जारी किये जाते हैं। हालाँकि पिछले कुछ समय से ‘नाऊ कास्ट’ के माध्यम से मौसम विभाग ने अब कुछ घंटे पहले के मौसम की भविष्यवाणी करना आरंभ कर दिया है।
ध्यातव्य है कि मौसम विभाग की भविष्यवाणियों में हाल के वर्षों में सुधार देखा गया है। अभी मध्यम अवधि की भविष्यवाणियाँ जो 15 दिन से एक महीने की होती हैं, 70-80 फीसदी तक सटीक निकलती है।
हालाँकि, लघु अवधि की भविष्यवाणियाँ जो आगामी 24 घंटों के लिये होती हैं करीब 90 फीसदी तक सही होती हैं। अलबत्ता, नाऊ कास्ट की भविष्यवाणियाँ करीब-करीब 99 फीसदी सही निकलती हैं।
मानसून को प्रभावित करने वाले कारक
अल-नीनोवैज्ञानिकों के अनुसार, प्रशांत महासागर में दक्षिण अमेरिका के निकट खासकर पेरु तट में यदि विषुवत रेखा के इर्द-गिर्द समुद्र की सतह अचानक गरम होनी शुरू हो जाए तो अल-नीनो की स्थिति बनती है।
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‘जैव प्रौद्योगिकी विभाग’ (Department of Biotechnology) द्वारा COVID -19 महामारी को ध्यान में रखते हुए जैव सुरक्षा नियामक को सरल एंव और अधिक कारगर बनाने के लिये तथा इस महामारी में संलग्न शोधकर्त्ताओं और उद्योगों को सुविधा प्रदान करने के लिये कई सक्रिय कदम उठाए गए हैं।
प्रमुख बिंदु:
जैव सुरक्षा नियामक, जीवों से संबंधित पुनरावर्ती डीएनए प्रौद्योगिकी (Recombinant DNA Technology) तथा खतरनाक सूक्ष्मजीवों पर अनुसंधान और विकास में सक्रिय रूप से संलग्न हैं।
जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा इस दिशा में निम्नलिखित कदम उठाए हैं-
भारतीय जैव सुरक्षा ज्ञान पोर्टल का संचालन:
जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा इसे मई, 2019 में लॉन्च कर पूर्ण रूप से संचालित किया गया है। वर्तमान समय में यह केवल सभी नवीन आवदेनों को ऑनलाइन माध्यम से प्राप्त कर रहा है।
इससे पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता आई है।
अनुसंधान और विकास उद्देश्य के लिये आनुवांशिक रूप से रूपांतरित जीवों और उत्पाद के आयात, निर्यात और विनिमय पर संशोधित सरलीकृत दिशा निर्देशों की अधिसूचना:
जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा जनवरी, 2020 में संशोधित दिशा-निर्देश जारी किये गए।
जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, संस्थागत जैव सुरक्षा समिति को आयात निर्यात के आवेदनों पर निर्णय लेने और जोखिम समूह-1 (Risk Group-1) और जोखिम समूह-2 (Risk Group-2) में शामिल मदों के लिये अनुसंधान और विकास उद्देश्य के लिये आनुवंशिक रूप से रूपांतरित जीवों और उत्पाद के आदान-प्रदान करने से संबंधित निर्णय करने का अधिकार दिया गया है।
COVID-19 पर अनुसंधान और विकास की सुविधा:
तेज़ी से फैलती COVID-19 महामारी के लिये अनुसंधान और विकास की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा COVID-19 पर शोध कर रहे शोधकर्त्ताओं और उद्योगों को शामिल करने के लिये अनेक कदम उठाए गए हैं।
इसके अलावा डीबीटी द्वारा COVID -19 पर निम्नलिखित दिशा-निर्देश, आदेश और जाँच सूची जारी की है, जो इस प्रकार है-
20 मार्च, 2020 को COVID-19 के लिये टीका, निदान, रोग निरोधी उपाय और रोग चिकित्सा विकसित करने के आवेदन के लिये त्वरित प्रतिक्रिया नियामक ढाँचा (रैपिड रिस्पांस रेगुलेटरी फ्रेमवर्क) अधिसूचित किया गया।
जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा 08 अप्रैल, 2020 को ‘इंटरेक्टिव गाइडेंस डॉक्यूमेंट ऑन लेबोरेटरी बायोसेफ्टी टू हैंडल COVID-19 स्पेसिमन्स’(Interim Guidance Document on Laboratory Biosafety to Handle COVID-19 Specimens) को अधिसूचित किया।
30 जून, 2020 तक भारतीय बायोमेडिकल कौशल प्रमाणन (Indian Biomedical Skill Certification- IBSC) को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अपनी बैठक आयोजित करने की अनुमति दी गई है।
पुनरावर्ती डीएनए प्रौद्योगिकी (Recombinant DNA Technology):
इस तकनीकी में दो या दो से अधिक स्रोतों से DNA को संयोजित करके पुनरावर्ती DNA बनाया जाता है।
इस प्रक्रिया में, अक्सर विभिन्न जीवों के DNA को जोड़ना पड़ता है।
यह प्रक्रिया DNA को काटने तथा पुन: जोड़ने की क्षमता पर निर्भर करती है।
जिस जीन को प्रवेश कराया जाता है उसको रेकॉम्बीनैंट जीन (Recombinant Gene)कहते है तथा इस पूरी तकनीक को रेकॉम्बीनैंट DNA टेक्नोलॉजी (Recombinant DNA Technology) कहा जाता है।
जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology):
वर्ष 1986 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी विभाग की स्थापना की गई।
यह राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों और विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान, जो जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित हैं, के लिये सहायता अनुदान की सहायता प्रदान करने के लिये एक नोडल एजेंसी के रूप में कार्यरत है।
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इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का संवर्द्धन ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम का एक प्रमुख घटक रहा है। सरकार द्वारा इस संदर्भ में किये गए विभिन्न प्रयासों का ही परिणाम है कि भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन 2014 के 29 बिलियन डॉलर से बढ़कर वर्ष 2019 में 70 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया है।
इस अवधि के दौरान मोबाइल फोन विनिर्माण की बढ़ोतरी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है।
जहाँ एक ओर वर्ष 2014 में भारत में केवल दो मोबाइल फैक्ट्रियों की तुलना में अब भारत विश्व में दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन उत्पादक देश बन गया है। वित्तीय वर्ष 2018-19 में मोबाइल हैंडसेटों का उत्पादन 29 करोड़ इकाइयों तक पहुँच गया जो 1.70 लाख करोड़ रुपए के बराबर है।
जहाँ वित्तीय वर्ष 2014-15 में देश में इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्यात 38,263 करोड़ रुपए का था, वहीं वित्तीय वर्ष 2018-19 में यह बढ़कर 61,908 करोड़ रुपए तक पहुँच गया। वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में वर्ष 2012 में भारत का हिस्सा केवल 1.3 प्रतिशत था जो कि वर्ष 2018 में बढ़कर 3 प्रतिशत तक पहुँच गया है।
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इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने हाल ही में देश में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों के व्यापक पैमाने पर विनिर्माण को बढ़ावा देने हेतु तीन प्रोत्साहन योजनाएँ शुरू की हैं।
प्रमुख बिंदु
इन तीन परियोजनाओं में शामिल हैं- (1) उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन योजना (Production Linked Incentive Scheme-PLI) (2) इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट एवं सेमीकंडक्टरों के विनिर्माण के संवर्द्धन के लिये योजना (Scheme for Promotion of Manufacturing of Electronic Components and Semiconductors-SPECS) (3) संशोधित इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर (ईएमसी 2.0) योजना (Modified Electronics Manufacturing Clusters (EMC 2.0) Scheme)
इन तीनों योजनाओं के लिये लगभग 50,000 करोड़ रुपए की आवश्यकता है। ये योजनाएँ घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण उद्योग के समक्ष मौजूदा चुनौतियों को समाप्त करेंगी और देश में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण तंत्र को मज़बूत बनाएंगी।
उक्त वर्ष 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर GDP के लक्ष्य में उल्लेखनीय योगदन देंगी।
अनुमान के अनुसार, इन योजनाओं से लगभग 5 लाख प्रत्यक्ष और 15 लाख अप्रत्यक्ष रोज़गार सृजित होंगे।
उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन योजना
(Production Linked Incentive Scheme-PLI)
भारत का घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर विनिर्माण क्षेत्र पर्याप्त बुनियादी ढाँचे और घरेलू आपूर्ति की कमी तथा वित्त की उच्च लागत, सीमित डिज़ाइन क्षमताओं और कौशल विकास में अपर्याप्तता के कारण तनाव का सामना कर रहा है।
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति-2019 में सभी महत्त्वपूर्ण घटकों को देश में विकसित करने की क्षमता को प्रोत्साहित कर और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा करने हेतु उद्योग के लिये अनुकूल माहौल बना कर भारत को ‘इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम डिज़ाइन एंड मैन्युफैक्चरिंग (Electronics System Design and Manufacturing-ESDM)' के एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की परिकल्पना की गई है।
उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन योजना (PLI) के तहत घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और मोबाइल फोन निर्माण तथा निर्दिष्ट इलेक्ट्रॉनिक घटकों में व्यापक निवेश को आकर्षित करने के लिये उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन प्रदान करती है।
इस योजना से भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को काफी बढ़ावा मिलेगा और वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में भारत को एक नई पहचान मिल सकेगी।
इस योजना के तहत भारत में निर्मित और लक्षित क्षेत्रों में शामिल वस्तुओं की वृद्धिशील बिक्री (आधार वर्ष) पर पात्र कंपनियों को 5 वर्ष की अवधि के लिये 4-6 प्रतिशत तक की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी।
इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट एवं सेमीकंडक्टरों के विनिर्माण के संवर्द्धन हेतु योजना
(Scheme for Promotion of Manufacturing of Electronic Components and Semiconductors-SPECS)
उच्च घरेलू मूल्य संवर्द्धन के साथ इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के विनिर्माण के लिये आपूर्ति श्रृंखला का विकास आवश्यक है।
इलेक्ट्रानिक घटक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग की बुनियादी इकाई होते हैं और इसमें अधिकतम मूल्यवर्द्धन होता है।
इसलिये भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के समग्र दीर्घकालिक और सतत् विकास हेतु एक जीवंत इलेक्ट्रॉनिक घटक विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र काफी महत्त्वपूर्ण है।
इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट एवं सेमीकंडक्टरों के विनिर्माण के संवर्द्धन हेतु यह योजना (SPECS) देश में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मज़बूत करने के लिये इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट एवं सेमीकंडक्टरों के घरेलू विनिर्माण से संबंधित बाधाओं को कम करने में मदद करेगी।
इस योजना के तहत कुछ निश्चित इलेक्ट्रॉनिक सामानों के लिये पूंजीगत व्यय पर 25 प्रतिशत वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा।
यह योजना नई इकाइयों में निवेश और मौजूदा इकाइयों की क्षमता विस्तार तथा आधुनिकीकरण/विविधीकरण पर लागू होगी।
संशोधित इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर (ईएमसी 2.0) योजना
(Modified Electronics Manufacturing Clusters (EMC 2.0) Scheme)
गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढाँचे को लेकर उद्योग के समक्ष मौजूदा चुनौतियों का सामना करने और भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण हब बनाने हेतु देश में एक मज़बूत इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने हेतु संशोधित इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर (ईएमसी 2.0) योजना शुरू की गई है। इसका उद्देश्य उद्योग की कमियों को संबोधित करना और विश्व स्तर के बुनियादी ढाँचे के निर्माण को समर्थन प्रदान करना है।
यह योजना आपूर्ति श्रृंखला में जवाबदेही को बढ़ाकर आपूर्तिकर्त्ताओं के समेकन और लॉजिस्टिक्स की लागत कम करके घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के मध्य संबंध को मज़बूत करेगी।
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण
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जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने एक ‘मीडिया नीति-2020’ (Media Policy-2020) को मंज़ूरी दी है, जिसका उद्देश्य स्वास्थ्य और प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में लोगों तक पहुँचने के लिये एक मानक संचालन प्रक्रिया को लागू करना है।
प्रमुख बिंदु
इस संबंध में जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, यह नीति न केवल प्रदेश में फेक न्यूज़ के प्रसार को रोकने का कार्य करेगी, बल्कि यह देश की सार्वजनिक शांति, संप्रभुता और अखंडता को समाप्त करने के लिये मीडिया के दुरुपयोग को भी कम करेगी।
उल्लेखनीय है कि हाल के दिनों में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने कई पत्रकारों पर उनके द्वारा की गई रिपोर्टिंग को लेकर FIR दर्ज की है।
हाल ही में राज्य प्रशासन ने राज्य के दो पत्रकारों पर Unlawful Activities (Prevention) Act-(UAPA) के तहत मामला दर्ज किया था।
मीडिया नीति के अनुमोदन के साथ ही सरकार और अधिक प्रभावी तरीके से आम लोगों तक कल्याण, विकास और प्रगति के संदेश को आसानी से पहुँचा सकेगी।
यह नीति जम्मू-कश्मीर के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को एक पेशेवर संगठन के रूप में स्थापित करने और प्रदेश की मीडिया की मांगों के साथ तालमेल रखने में मदद करेगा।
‘मीडिया नीति-2020’ संबंधी प्रमुख बिंदु
मीडिया नीति-2020 में प्रदेश में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) और भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) जैसे संस्थानों में मीडिया अकादमी, संस्थान व पीठ की स्थापना का प्रावधान किया गया है, जो कि प्रदेश में पत्रकारिता के उच्चतम स्तर को बढ़ावा देगा और इस क्षेत्र में अध्ययन तथा अनुसंधान का समन्वय करेगा।
नई मीडिया नीति में प्रत्येक वर्ष दो मीडिया कर्मियों को इस क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिये सम्मानित करने का प्रावधान भी है।
नीति के अनुसार, प्रदेश के सभी विभाग जम्मू-कश्मीर के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के साथ संपर्क करने के लिये एक नोडल अधिकारी को नामित करेंगे।
आम जनता के साथ ऑनलाइन तथा सोशल मीडिया पर संपर्क सुनिश्चित करने के लिये यह नीति सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में एक सोशल मीडिया सेल की स्थापना का प्रावधान करती है।
नई मीडिया नीति के निहितार्थ
इस नीति की सबसे मुख्य बात यह है कि इसमें आम जनता तक सरकार की पहुँच को बढ़ाने के लिये मीडिया के सभी प्रकारों के प्रयोग की बात की गई है।
साथ ही यह विभिन्न हितधारकों के मध्य संबंध को मज़बूत करने का प्रयास करती है।
नई नीति में प्रदेश में मौजूद पूर्ववर्ती विज्ञापन संबंधी नीति की अस्पष्टताओं को भी संबोधित किया गया है और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि वर्तमान समय की बदलती मांगों के साथ अधिक-से-अधिक तालमेल स्थापित किया जाए।
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘स्पिक मैके अनुभव’ (SPIC MACAY Anubhav) नामक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से संबोधित किया। यह पहली बार है जब इस सम्मेलन का आयोजन ऑनलाइन किया गया है।
प्रमुख बिंदु:
सम्मेलन का आयोजन 1-7 जून 2020 तक किया जा रहा है।
इस वर्ष सम्मेलन की विषय वस्तु इस बात पर केंद्रित है कि COVID-19 के चलते लगाए गए लॉकडाउन के दौरान युवाओं में उत्पन्न तनाव को किस प्रकार कम किया जाए।
‘स्पिक मैके’ के बारे में:
स्पिक मैके (Society for the Promotion of Indian Classical Music And Culture Amongst Youth- SPIC MACAY) एक गैर-राजनीतिक, राष्ट्रव्यापी, स्वैच्छिक आंदोलन है जिसकी स्थापना IIT-दिल्ली में प्रोफेसर रह चुके डॉ. किरण सेठ ने वर्ष 1977 में की थी। उल्लेखनीय है कि कला के क्षेत्र में योगदान के लिये डॉ. किरण सेठ को वर्ष 2009 में 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया था।
स्पिक मैके, सोसायटी पंजीकरण अधिनियम (Societies Registration Act) 1860 के तहत पंजीकृत है और आयकर अधिनियम 1961 की धारा 80 (जी) के तहत इसे कर से छूट प्राप्त है।
वर्ष 2011 में, ‘स्पिक मैके’ को युवा विकास में योगदान के लिये ‘राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा चुका है।
‘राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार’ शांति, सांप्रदायिक सद्भाव के संवर्द्धन और हिंसा के खिलाफ लड़ाई में योगदान के लिये पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती के अवसर पर दिया जाता है।
इसके माध्यम से देश के कुशल कलाकारों द्वारा भारतीय शास्त्रीय संगीत और लोकनृत्य, कविता, रंगमंच, पारंपरिक चित्रों, शिल्प एवं योग से जुड़े कार्यक्रमों को मुख्य रूप से स्कूलों और कॉलेजों में प्रस्तुत किया जाता हैं।
SPIC MACAY को राष्ट्रीय स्तर पर संस्कृति मंत्रालय (Ministry of Culture), युवा मामले और खेल मंत्रालय (Ministry of Youth Affairs and Sports) तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय (Ministry of Human Resource Development) द्वारा समर्थन प्राप्त है।
इसका मुख्यालय दिल्ली में है।
स्पिक मैके के स्तम्भ
कलाकार (Artistes), संस्थान (Institutions), समर्थक (Supporters) और स्वयंसेवक (Volunteers) स्पिक मैके के चार स्तम्भ (Pillars) हैं।
उद्देश्य:
SPIC MACAY का उद्देश्य भारतीय विरासत के विभिन्न पहलुओं के बारे में जागरूकता बढ़ाकर और इसमें निहित मूल्यों को आत्मसात करने के लिये युवाओं को प्रेरित कर औपचारिक शिक्षा की गुणवत्ता को समृद्ध करना है।
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एंटीवायरल ड्रग एविफवीर (Avifavir)
रूस ने कहा है कि देश के सभी अस्प्तालों में 11 जून से कोरोना मरीजों को जापान की एविफवीर नाम से पंजीकृति एंटीवायरल ड्रग दिया जाएगा। हालांकि, रूस अगले सप्ता ह कोरोना रोगियों के इलाज हेतु अनुमोदित दवा देना शुरू कर देगा। यह उम्मीपद की जा रही है कि इससे देश की स्वाेस्य्स प्रणाली पर दबाव कम होगा। इसके साथ देश में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्याम में कमी आएगी। रूस ने जापानी दवा के संशोधित संस्करण को अनुमति दी है। हालांकि, जापान ने अभी तक इस दवा के उपयोग की स्वीरकृत नहीं दी है।
मौजूदा समय में दुनिया में कोरोना वायरस के लिए कोई टीका नहीं है। हालांकि, पूरी दुनिया कोरोना वायरस की वैक्सींन की खोज में जुटी है, लेकिन इन दवाओं का मानव परीक्षणों में अभी तक कोई असर नहीं दिखा है। वैक्सीिन का मानव परीक्षण के परिणाम उत्साहहजनक नहीं रहे। ऐसे में गिलीड की एक नई एंटीवायरल दवा जिसे रेमेड्सविर कहा जाता है, काफी उम्मीीदें हैं। यह दावा किया जा रहा है कि दवा के परीक्षण के दौरान कोरोना संक्रमण को रोकने के सीमित प्रभाव दिखे हैं। दुनिया के कई मुल्कोंी में कोरोना मरीजों को यह दवा दी जा रही है।
