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Индия187 457Категория не указана
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भारतीय कंपनियाँ नेपाल में विभिन्न आर्थिक गतिविधियों में संलग्न हैं। इन कंपनियों की नेपाल में विनिर्माण, बिजली, पर्यटन और सेवा क्षेत्र में उपस्थिति है। अवसंरचना विकास क्षेत्र भारत सरकार नेपाल में ज़मीनी स्तर पर बुनियादी ढाँचे के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करते हुए समय-समय पर विकास सहायता प्रदान करती है। इसमें बुनियादी ढाँचे में स्वास्थ्य, जल संसाधन, शिक्षा, ग्रामीण और सामुदायिक विकास जैसे मुद्दे शामिल हैं। रक्षा सहयोग क्षेत्र द्विपक्षीय रक्षा सहयोग के तहत उपकरण और प्रशिक्षण के माध्यम से नेपाल की सेना का आधुनिकीकरण शामिल है। भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट्स में नेपाल के पहाड़ी इलाकों से भी युवाओं की भर्ती की जाती है। भारत वर्ष 2011 से नेपाल के साथ प्रति वर्ष ‘सूर्य किरण’ नाम से संयुक्त सैन्य अभ्यास करता आ रहा है। आपदा प्रबंधन नेपाल में अक्सर भूकंप, भू-स्खलन और हिमस्खलन, बादल फटने और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा रहता है। ऐसा मुख्य रूप से भौगोलिक कारकों के कारण होता है क्योंकि नेपाल एक प्राकृतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। भारत आपदा से संबंधित ऐसे किसी भी मामलें में कर्मियों की सहायता के साथ-साथ तकनीकी और मानवीय सहायता भी प्रदान करता रहा है। संचार क्षेत्र नेपाल एक भू-आबद्ध देश है जो तीन तरफ से भारत से और एक तरफ तिब्बत से घिरा हुआ है। भारत-नेपाल ने अपने नागरिकों के मध्य संपर्क बढ़ाने और आर्थिक वृद्धि एवं विकास को बढ़ावा देने के लिये विभिन्न कनेक्टिविटी कार्यक्रम शुरू किये हैं। हाल ही में भारत के रक्सौल को काठमांडू से जोड़ने के लिये इलेक्ट्रिक रेल ट्रैक बिछाने हेतु दोनों सरकारों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर किये गए थे। विवाद के बिंदु भारत व नेपाल के मध्य हालिया विवाद का कारण उत्तराखंड के धारचूला (Dharchula) को लिपुलेख दर्रे (Lipulekh Pass) से जोड़ती एक सड़क है। नेपाल का दावा है कि कालापानी के पास पड़ने वाला यह क्षेत्र नेपाल का हिस्सा है और भारत ने नेपाल से वार्ता किये बिना इस क्षेत्र में सड़क निर्माण का कार्य किया है। नेपाल द्वारा आधिकारिक रूप से नेपाल का नवीन मानचित्र जारी किया गया, जो उत्तराखंड के कालापानी (Kalapani) लिंपियाधुरा (Limpiyadhura) और लिपुलेख (Lipulekh) को अपने संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा मानता है। नेपाल ने इस संबंध में वर्ष 1816 में हुई सुगौली संधि (Sugauli treaty) का ज़िक्र किया है। नेपाल के विदेश मंत्रालय के अनुसार, सुगौली संधि (वर्ष 1816) के तहत काली (महाकाली) नदी के पूर्व के सभी क्षेत्र, जिनमें लिंपियाधुरा (Limpiyadhura), कालापानी (Kalapani) और लिपुलेख (Lipulekh) शामिल हैं, नेपाल का अभिन्न अंग हैं। एंग्लो-नेपाली युद्ध (Anglo-Nepalese War) के पश्चात् वर्ष 1816 में नेपाल और ब्रिटिश भारत द्वारा सुगौली की संधि हस्ताक्षरित की गई थी। उल्लेखनीय है कि सुगौली संधि में महाकाली नदी को नेपाल की पश्चिमी सीमा के रूप में परिभाषित किया गया है। नेपाल सरकार के अनुसार, बीते वर्ष जम्मू-कश्मीर के विभाजन के पश्चात् भारत सरकार द्वारा प्रकाशित नए मानचित्रों में भिन्नता से स्पष्ट था कि भारत द्वारा इस मानचित्रों में छेड़खानी की गई है। क्या बिगड़ते रिश्ते में भारत की भी भूमिका है? नवंबर, 2019 को भारत ने एक नवीन मानचित्र प्रकाशित किया था जो जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश के रूप में दर्शाता है। इसी मानचित्र में कालापानी को भी भारतीय क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया है। इस मानचित्र ने भारत-नेपाल के बीच पुराने विवादों में नई जान डाल दी। भारतीय फिल्मों में नेपाली महिलाओं को लेकर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी से भी नेपाल ने नाराज़गी व्यक्त की। नेपाल वर्ष 2017 में चीन की वन बेल्ट, वन रोड परियोजना में शामिल हुआ, परंतु भारत नेपाल पर इस परियोजना में शामिल न होने का दबाव डाल रहा था। भारत द्वारा इस प्रकार दबाव डालना नेपाल को रास नहीं आया और इस घटना ने भारत की ‘बिग ब्रदर’ वाली छवि को स्थापित किया। दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट तब आई जब सितंबर, 2015 में नेपाली संविधान अस्तित्व में आया। लेकिन, भारत द्वारा नेपाली संविधान का उस रूप में स्वागत नहीं किया गया जिस रूप में नेपाल को आशा थी। इसी तरह नवंबर, 2015 जेनेवा में भारतीय प्रतिनिधित्व द्वारा नेपाल में राजनीतिक फेर-बदल को प्रभावित करने के लिये मानवाधिकार परिषद् के मंच का कठोरतापूर्वक उपयोग किया गया, जबकि इससे पहले तक नेपाल के आंतरिक मुद्दों को लेकर भारत द्वारा कभी भी खुलकर कोई टिप्पणी नहीं गई थी। भारत का रुख मधेसियों को नेपाल में नागरिकता का अधिकार दिलाना था। इनमें लाखों मधेसियों ने वर्ष 2015 में नागरिकता को लेकर व्यापक आंदोलन चलाया था। नेपाल सरकार का ऐसा आरोप है कि मधेसियों के समर्थन में भारत सरकार ने उस समय नेपाल की आर्थिक घेराबंदी की थी। नेपाल पर चीन का प्रभाव

गौरतलब है कि चीन का प्रभाव दक्षिण एशिया में लगातार बढ़ रहा है। नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान या बांग्लादेश हर जगह चीन की मौजूदगी बढ़ी है। नेपाल में चीन के बढ़ते दखल के बाद पिछले कुछ समय से भारत-नेपाल के बीच संबंधों में पहले जैसी गर्मजोशी देखने को नहीं मिल रही। चीन ने इसका पूरा-पूरा लाभ उठाते हुए नेपाल में अपनी स्थिति को और मज़बूत किया है। नेपाल के कई स्कूलों में चीनी भाषा मंदारिन को पढ़ना भी अनिवार्य कर दिया गया है। नेपाल में इस भाषा को पढ़ाने वाले शिक्षकों के वेतन का खर्चा भी चीन की सरकार उठाने के लिये तैयार है। चीन, नेपाल में ऐसा बुनियादी ढाँचा तैयार करने की परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जिन पर भारी खर्च आता है। भारत के लिये नेपाल का महत्त्व नेपाल की अहमियत इस वजह से भी ज्यादा है कि पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद नेपाल उनके शुरुआती विदेशी दौरों में से एक था। जबकि इससे पहले आखिरी बार वर्ष 1997 में नेपाल के साथ भारत की कोई द्विपक्षीय वार्ता हुई थी। मौजूदा सरकार ने नेपाल सरकार के साथ कई महत्त्वपूर्ण समझौते भी किये हैं। कृषि, रेलवे संबंध और अंतर्देशीय जलमार्ग विकास सहित कई द्विपक्षीय समझौतों पर सहमति बनी है। इनमें बिहार के रक्सौल और काठमांडू के बीच सामरिक रेलवे लिंक का निर्माण किया जाएगा, ताकि लोगों के बीच संपर्क तथा बड़े पैमाने पर माल के आवागमन को सुविधाजनक बनाया जा सके। इसके अलावा मोतिहारी से नेपाल के अमेलखगंज तक दोनों देशों के बीच ऑयल पाइपलाइन बिछाने पर भी हाल ही में सहमति बनी है। नेपाल का दक्षिण क्षेत्र भारत की उत्तरी सीमा से सटा है। भारत और नेपाल के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता माना जाता है। बिहार और पूर्वी-उत्तर प्रदेश के साथ नेपाल के मधेसी समुदाय का सांस्कृतिक एवं नृजातीय संबंध रहा है। दोनों देशों की सीमाओं से यातायात पर कभी कोई विशेष प्रतिबंध नहीं रहा। सामाजिक और आर्थिक विनिमय बिना किसी गतिरोध के चलता रहता है। भारत-नेपाल की सीमा खुली हुई है और आवागमन के लिये किसी पासपोर्ट या वीजा की जरूरत नहीं पड़ती है। यह उदाहरण कई मायनों में भारत-नेपाल की नज़दीकी को दर्शाता है। आगे की राह नेपाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह दो देशों के मध्य घनिष्ठ और मैत्रीपूर्ण संबंधों की भावना को ध्यान में रखते हुए ऐतिहासिक संधि, दस्तावेज़ों, तथ्यों और नक्शों के आधार पर सीमा के मुद्दों का कूटनीतिक हल प्राप्त करने के लिये प्रतिबद्ध है। भारत को भी अपनी विदेश नीति की समीक्षा करने की भी जरूरत है। भारत को नेपाल के प्रति अपनी नीति दूरदर्शी बनानी होगी। जिस तरह से नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है, उससे भारत को अपने पड़ोस में आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन करने से पहले रणनीतिक लाभ–हानि पर विचार करना होगा। भारत और चीन के साथ नेपाल एक आज़ाद सौदागर की तरह व्यवहार कर रहा है और चीनी निवेश के सामने भारत की चमक फीकी पड़ रही है। लिहाज़ा, भारत को कूटनीतिक सुझबूझ का परिचय देना होगा।

हाल ही में भारत के लिये स्थिति उस समय असहज हो गई जब कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिये भारत द्वारा लिपुलेख-धाराचूला मार्ग के उद्घाटन करने के बाद नेपाल ने इसे एकतरफा गतिविधि बताते हुए आपत्ति जताई। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने यह दावा किया कि महाकाली नदी के पूर्व का क्षेत्र नेपाल की सीमा में आता है। विदित है कि नेपाल ने आधिकारिक रूप से नवीन मानचित्र जारी किया गया, जो उत्तराखंड के कालापानी (Kalapani) लिंपियाधुरा (Limpiyadhura) और लिपुलेख (Lipulekh) को अपने संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा मानता है। निश्चित रूप से नेपाल की इस प्रकार की प्रतिक्रिया ने भारत को अचंभित कर दिया है। इतना ही नहीं नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी शर्मा ओली (K.P. Sharma Oli) ने नेपाल में कोरोना वायरस के प्रसार में भारत को दोष देकर दोनों देशों के बीच संबंधों को तनावपूर्ण कर दिया है। वस्तुतः इसे ‘चीनी जादू’ कहा जाए या नेपाल की कूटनीतिक चाल कि पिछले कुछ वर्षों से लगातार भारत को परेशान करने की कोशिश हो रही है। भारत इन सभी कोशिशों को नेपाल की चीन से बढ़ती नजदीकी के रूप में देख रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने रिश्ते पर ‘चीनी चाल’ भारी पड़ रही है? या फिर यह मान लिया जाए कि हालिया दिनों में नेपाल ज़रूरत से ज्यादा महत्त्वाकांक्षी बन गया है और भारत उसकी आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा। इस आलेख में भारत-नेपाल के ऐतिहासिक संबंधों की पृष्ठभूमि, दोनों देशों के मध्य सहयोग के क्षेत्र, दोनों देशों के मध्य विवाद के बिंदु तथा इसमें चीन की भूमिका और भारत के लिये नेपाल के महत्त्व पर विमर्श किया जाएगा। भारत-नेपाल संबंधों की पृष्ठभूमि नेपाल, भारत का एक महत्त्वपूर्ण पड़ोसी है और सदियों से चले आ रहे भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक संबंधों के कारण वह हमारी विदेश नीति में भी विशेष महत्त्व रखता है। भारत और नेपाल हिंदू धर्म एवं बौद्ध धर्म के संदर्भ में समान संबंध साझा करते हैं, उल्लेखनीय है कि बुद्ध का जन्मस्थान लुम्बिनी नेपाल में है और उनका निर्वाण स्थान कुशीनगर भारत में स्थित है। वर्ष 1950 की ‘भारत-नेपाल शांति और मित्रता संधि’ दोनों देशों के बीच मौजूद विशेष संबंधों का आधार है। भारत-नेपाल शांति और मित्रता संधि यह भारत और नेपाल के मध्य द्विपक्षीय संधि है जिसका उद्देश्य दोनों दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों के बीच घनिष्ठ रणनीतिक संबंध स्थापित करना है। यह संधि दोनों देशों के बीच लोगों और वस्तुओं की मुक्त आवाजाही और रक्षा एवं विदेशी मामलों के बीच घनिष्ठ संबंध तथा सहयोग की अनुमति देती है। साथ ही यह संधि नेपाल को भारत से हथियार खरीदने की सुविधा भी देती है। इस संधि के द्वारा नेपाल को एक भू-आबद्ध (Land-lock) देश होने के कारण कई विशेषाधिकारों को प्राप्त करने में सक्षम बनाया है। भारत-नेपाल की खुली सीमा दोनों देशों के संबंधों की विशिष्टता है, जिससे दोनों देशों के लोगों को आवागमन में सुगमता रहती है। दोनों देशों के बीच 1850 किलोमीटर से अधिक लंबी साझा सीमा है, जिससे भारत के पाँच राज्य--सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड जुड़े हैं। भारत और नेपाल के बीच सीमा को लेकर कोई बड़ा विवाद नहीं है। लगभग 98% प्रतिशत सीमा की पहचान व उसके नक्शे पर सहमति बन चुकी है, कुछ क्षेत्रों को लेकर विवाद है जिसे बातचीत के माध्यम से सुलझाने की प्रक्रिया चल रही है। सहयोग के विभिन्न क्षेत्र सांस्कृतिक व धार्मिक क्षेत्र नेपाल और भारत दुनिया के दो प्रमुख धर्मों-हिंदू और बौद्ध धर्म के विकास के आसपास एक सांस्कृतिक इतिहास साझा करते हैं। बुद्ध का जन्म वर्तमान नेपाल में स्थित लुम्बिनी में हुआ था। बाद में बुद्ध ज्ञान की खोज में वर्तमान भारतीय क्षेत्र बोधगया आए, जहाँ उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। बोधगया से महात्मा बुद्ध और उनके अनुयायियों ने विश्व के कोने-कोने तक बौद्ध धर्म का प्रसार किया। भारत व नेपाल दोनों ही देशों में हिंदू व बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग हैं। रामायण सर्किट की योजना दोनों देशों के मज़बूत सांस्कृतिक व धार्मिक संबंधों का प्रतीक है। सामाजिक क्षेत्र भारत-नेपाल की खुली सीमा दोनों देशों के संबंधों की विशिष्टता है, जिससे दोनों देशों के लोगों को आवागमन में सुगमता रहती है। दोनों देशों के नागरिकों के बीच आजीविका के साथ-साथ विवाह और पारिवारिक संबंधों की मज़बूत नींव है। इस नींव को ही ‘रोटी-बेटी का रिश्ता’ नाम दिया गया है। आर्थिक क्षेत्र भारत, नेपाल का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार होने के साथ-साथ विदेशी निवेश का सबसे बड़ा स्रोत है। भारत, नेपाल को अन्य देशों के साथ व्यापार करने के लिये पारगमन सुविधा भी प्रदान करता है। नेपाल अपने समुद्री व्यापार के लिये कोलकाता बंदरगाह का उपयोग करता है।

सत्येंद्र नाथ बोस नेशनल सेंटर फॉर बेसिक साइंस’ (Satyendra Nath Bose National Centre for Basic Sciences) के शोधकर्त्ताओं ने ‘क्या इलेक्ट्रॉनों का एक युग्म एंटैंगलमेंट अवस्था में है’ का पता लगाने हेतु एक प्रोटोकॉल विकसित किया है। एंटैंगलमेंट अवस्था क्वांटम सूचना प्रसंस्करण के कार्यों में मददगार साबित हो सकती है। प्रमुख बिंदु: क्वांटम एंटैंगलमेंट (Quantum Entanglement) क्वांटम यांत्रिकी की कई विशेषताओं में से एक क्वांटम एंटैंगलमेंट है जो ‘क्वांटम टेलीपोर्टेशन को संभव बनाता है। क्वांटम एंटैंगलमेंट एक भौतिक घटना है। यह घटना तब होती है जब कणों का युग्म या कणों का समूह इस तरह से उत्पन्न या मिलते हैं कि प्रत्येक कणों की क्वांटम अवस्था को स्वतंत्र रूप से दूसरों कण की अवस्था के रूप में वर्णित नहीं किया जा सकता है। इनटैंगल अवस्था कई क्वांटम सूचना प्रसंस्करण कार्यों और क्वांटम क्रिप्टोग्राफिक प्रोटोकॉल हेतु महत्त्वपूर्ण संसाधन हैं। आवश्यकता क्यों? एंटैंगलमेंट की अवस्था बहुत ही नाज़ुक होती है साथ ही वातावरण के माध्यम से फोटॉनों के आवागमन के दौरान एंटैंगलमेंट आसानी से खो जाते हैं। एंटैंगलमेंट को संसाधन के रूप में उपयोग करने हेतु यह जानना बेहद आवश्यक है कि क्या फोटॉन का युग्म इनटैंगल होता है। एंटैंगलमेंट की अवस्था को जाँच करने हेतु उपकरणों के उपयोग की आवश्यकता होती है लेकिन ऐसे उपकरणों को हैकरों द्वारा हैक किया जा सकता है। डिवाइस इंडिपेंडेंट सेल्फ टेस्टिंग (Device Independent Self Testing DIST) एक ऐसी विधि है, जिसके उपयोग से ऐसी संभावना को दूर किया जा सकता है। DIST विधि के माध्यम से एंटैंगलमेंट में दो फोटॉनों की अज्ञात क्वांटम अवस्था को सत्यापित किया जा सकता है। शोधकार्य: उल्लेखनीय है कि यह प्रोटोकॉल ‘फिज़िकल रिव्यू’ (Physical Review) में प्रकाशित किया गया है। बीजिंग कम्प्यूटेशनल साइंस रिसर्च सेंटर (Computational Science Research Centre) के एक समूह और क्वांटम सूचना की प्रमुख प्रयोगशाला- हेफ़ेई के सहयोग द्वारा प्रयोगात्मक रूप से कार्यान्वित किया गया है। प्रयोग में एक ऑल-ऑप्टिकल संरचना का उपयोग किया गया है, जिसमें ‘बीटा बेरियम बोरेट’ (Beta Barium Borate- BBO) क्रिस्टल पर लेज़र प्रकाश की मदद से एंटैंगलमेंट प्रोटाॅन का युग्म बनाया गया है। शोधकर्त्ताओं ने फोटॉन के युग्म की एंटैंगलमेंट अवस्था को सत्यापित करने हेतु बॉब (Bob) को पक्ष तथा ऐलिस (Alice) को विपक्ष के रूप में उपयोग किया है। शोधकर्त्ताओं के द्वारा प्रयोग के दौरान एक फोटॉन ऐलिस (नीचे बाएँ) की तरफ गया जबकि दूसरा फोटॉन बॉब (ऊपर से दाएँ) की तरफ गया। शोधकर्त्ताओं ने फोटॉन का पता लगाने से पहले बीम-स्प्लिटर्स (Beam Splitters), फेज-शिफ्टर्स (Phase Shifters) और क्वांटम गेट ऑपरेशंस (Quantum Gate Operations) का उपयोग करते हुए कई ऑप्टिकल प्रयोग किये। शोधकर्त्ताओं ने न केवल एंटैंगलमेंट की अवस्था को सत्यापित किया बल्कि न्यूनतम त्रुटि के साथ फोटॉन युग्म के एंटैंगलमेंट की परिमाण को भी निर्धारित किया है।

हॉन्गकॉन्ग के ‘बेसिक लॉ’ की धारा 23 के अनुसार, हॉन्गकॉन्ग को ‘किसी भी प्रकार के देशद्रोह, अलगाव, सरकार के विरुद्ध साज़िश और राज्य के रहस्यों की चोरी जैसे कृत्यों को रोकने तथा विदेशी राजनीतिक संगठनों या निकायों को इस क्षेत्र विशिष्ट में राजनीतिक गतिविधियों का संचालन करने से रोकने एवं इस क्षेत्र विशिष्ट के राजनीतिक संगठनों या निकायों को विदेशी राजनीतिक संगठनों या निकायों के साथ संबंध स्थापित करने से रोकने के लिये जल्द-से-जल्द ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कानून’ लागू करना होगा। पहली बार जब वर्ष 2003 में हॉन्गकॉन्ग की सरकार ने यह कानून बनाने की कोशिश की थी, तो उस वर्ष यह शहर में व्यापक विरोध प्रदर्शन का मुद्दा बन गया था। वर्ष 2003 के बाद एक बार पुनः इस कानून के निर्माण का प्रयास किया जा रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, चीन की सरकार ‘बेसिक लॉ’ के एनेक्स III (Annex III) का प्रयोग करके एक बार पुनः कानून के निर्माण का प्रयास कर सकती है। ‘बेसिक लॉ’ के अनुसार, चीन की सरकार हॉन्गकॉन्ग में तब तक कोई कानून लागू नहीं कर सकती है, जब तक कि वह कानून एनेक्स III नामक खंड में सूचीबद्ध नहीं किया गया हो। ध्यातव्य है कि इस खंड में पहले से ही कुछ कानून सूचीबद्ध हैं, जिनमें अधिकांश अविवादास्पद और विदेश नीति से संबंधित हैं। इन कानूनों को आसानी से राजाज्ञा (Decree) के माध्यम से लागू किया जा सकता है। जिसका अर्थ है कि उन्हें लागू करने के लिये हॉन्गकॉन्ग के प्रतिनिधियों से विमर्श की आवश्यकता नहीं होती है। नए कानून का प्रभाव चीन का यह नया कानून चीन की सरकार को लक्षित करने वाली देशद्रोही गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाएगा और साथ ही हॉन्गकॉन्ग के मामलों में बाहरी हस्तक्षेप को प्रतिबंधित अथवा दंडित करेगा। आलोचकों का कहना है कि यह कदम हॉन्गकॉन्ग के 'एक देश, दो व्यवस्था' के सिद्धांत का उल्लंघन करता है, जो कि हॉन्गकॉन्ग की स्वायत्तता के लिये काफी महत्त्वपूर्ण है। विश्लेषकों ने उम्मीद ज़ाहिर की है कि यदि यह कानून अस्तित्त्व में आता है तो हॉन्गकॉन्ग में बीते वर्ष हुए व्यापक विरोध प्रदर्शन एक बार फिर से शुरू हो सकते हैं, ऐसे में चीन की सरकार को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। यह कदम पूर्वी एशियाई व्यापारिक केंद्र के रूप में हॉन्गकॉन्ग की पहचान को प्रभावित कर सकता है, और साथ ही इस कानून से चीन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उपेक्षा का सामना करना पड़ सकता है, जो कि पहले से ही कोरोना वायरस (COVID-19) से संबंधित महत्त्वपूर्ण जानकारी को छुपाने के आरोप का सामना कर रहा है।

चीन की संसद के समक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा पर एक मसौदा प्रस्तुत किया गया है, जो पहली बार चीन की सरकार को हॉन्गकॉन्ग के लिये राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों का मसौदा तैयार करने तथा इस विशेष प्रशासनिक क्षेत्र (Special Administrative Region-SAR) में अपने राष्ट्रीय सुरक्षा अंगों (Organs) को संचालित करने की अनुमति देगा। प्रमुख बिंदु चीन की सरकार ने इस मसौदे के माध्यम से हॉन्गकॉन्ग में लागू बेसिक लॉ (Basic Law) में ‘सुधार’ करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, ध्यातव्य है कि यही बेसिक लॉ (Basic Law) अथवा लघु संविधान हॉन्गकॉन्ग और बीजिंग के मध्य संबंधों को परिभाषित करता है। चीन के इस नए मसौदे को हॉन्गकॉन्ग में असंतोष रोकने के लिये अब तक के सबसे व्यापक कदम के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। विश्लेषकों का मत है कि चीन की सरकार हॉन्गकॉन्ग विधायिका से परामर्श किये बिना ही इस मसौदे को लागू कर सकती है। हॉन्गकॉन्ग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वर्ष 1842 में चीन राजवंश के प्रथम अफीम युद्ध में पराजित होने के बाद चीन ने ब्रिटिश साम्राज्य को हॉन्गकॉन्ग द्वीप सौंप दिया था, उसके बाद हॉन्गकॉन्ग का (एक अलग भू-भाग) अस्तित्त्व सामने आया। लगभग 6 दशक के दौरान चीन के लगभग 235 अन्य द्वीप भी ब्रिटेन के कब्ज़े में आ गए और हॉन्गकॉन्ग अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र बन गया। 20वीं सदी के प्रारंभ में यहाँ भारी संख्या में शरणार्थियों का आगमन हुआ जिनमें चीनी लोगों की संख्या सबसे ज़्यादा थी। बड़ी संख्या में प्रवासियों के आगमन ने हॉन्गकॉन्ग के लिये एक प्रमुख विनिर्माण केंद्र के रूप में एक नई भूमिका निभाने में मदद की। चीन की अर्थव्यवस्था एवं भौगोलिक स्थिति के प्रभाव के कारण वर्तमान में हॉन्गकॉन्ग सेवा-आधारित अर्थव्यवस्था के साथ-साथ दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों के लिये एक महत्त्वपूर्ण प्रवेश द्वार बन गया है। वर्ष 1997 तक हॉन्गकॉन्ग ब्रिटिश साम्राज्य के नियंत्रण में रहा। हॉन्गकॉन्ग का ‘बेसिक लॉ’ 1 जुलाई, 1997 को 'एक देश, दो व्यवस्था' (One Country, Two Systems) के सिद्धांत के तहत हॉन्गकॉन्ग को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का एक विशेष प्रशासनिक क्षेत्र (Special Administrative Region-SAR) घोषित कर दिया गया और हॉन्गकॉन्ग ब्रिटिश उपनिवेश से मुक्त हो गया। हॉन्गकॉन्ग को ‘बेसिक लॉ’ नामक एक लघु-संविधान द्वारा शासित किया जाता है, जो कि ‘एक देश, दो प्रणाली’ के सिद्धांत की पुष्टि करता है। ध्यातव्य है कि ‘बेसिक लॉ’ वर्ष 1984 के चीन-ब्रिटिश संयुक्त घोषणा पत्र (Sino-British Joint Declaration) का ही परिणाम है, जिसके तहत चीन की सरकार द्वारा वर्ष 1997 से 50 वर्षों की अवधि के लिये हॉन्गकॉन्ग की उदार नीतियों, शासन प्रणाली, स्वतंत्र न्यायपालिका और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करने की बात की गई थी। हॉन्गकॉन्ग का ‘बेसिक लॉ’ अभिव्यक्ति और विचारों की स्वतंत्रता जैसे अधिकारों की रक्षा करता है, जो कि चीन में मौजूद नहीं हैं। साथ ही हॉन्गकॉन्ग का ‘बेसिक लॉ’ इस क्षेत्र विशिष्ट की शासन की संरचना भी निर्धारित करता है। हालाँकि हॉन्गकॉन्ग के आंतरिक मामलों में चीन के कम्युनिस्ट शासन के हस्तक्षेप और उसकी दमनकारी नीतियों के चलते हॉन्गकॉन्ग में समय-समय पर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। विरोध प्रदर्शन का लंबा इतिहास विरोध प्रदर्शन हॉन्गकॉन्ग की राजनीति का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गए हैं। चीन को सौंपे जाने के बाद हॉन्गकॉन्ग में ‘बेसिक लॉ’ में दी गई स्वतंत्रता को बचाने के लिये पहला विरोध प्रदर्शन वर्ष 2003 में हुआ था, जो कि वर्ष 1997 के बाद सबसे बड़ा लोकतंत्र समर्थित आंदोलन था। वर्ष 2009 में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन हुआ जिसके परिणामस्वरूप यह कानून वापस ले लिया गया। वर्ष 2014 में भी हॉन्गकॉन्ग में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया गया। इस विरोध को ‘अंब्रेला मूवमेंट’ की संज्ञा दी जाती है। दरअसल चीन की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा हॉन्गकॉन्ग की जनता को यह भरोसा दिलाया गया था कि वर्ष 2017 से हॉन्गकॉन्ग के नागरिक अपने मुख्य कार्यकारी का निर्वाचन स्वयं कर सकेंगे किंतु चीन ने सिर्फ उन्हीं लोगों को इस पद के लिये चुनाव लड़ने की अनुमति दी जिन्हें चीन की साम्यवादी पार्टी का समर्थन हासिल हो। इससे हॉन्गकॉन्ग के लोगों को अत्यधिक निराशा हुई। परिणामस्वरूप लाखों लोगों ने 2 महीने से भी अधिक समय तक विरोध प्रदर्शन किया। वर्ष 1997 में सत्ता हस्तांतरण के बाद सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन वर्ष 2019 में हुआ, जब महीनों तक हॉन्गकॉन्ग के हज़ारों लोगों ने प्रस्तावित प्रत्यर्पण कानून के विरुद्ध आंदोलन किया और कानून वापस लेने के बाद भी लोकतंत्र के समर्थन में प्रदर्शन जारी रखा। प्रस्तावित राष्ट्रीय सुरक्षा कानून

गेहूं के जीन आरएचटी14 एवं आरएचटी18 चर्चा में क्यों? भारत में किसानों द्वारा सालाना बचे हुए चावल के लगभग 23 मिलियन टन अवशेषों को जला दिया जाता है जिससे कि उन्हें पुआल से छुटकारा मिले और अगली फसल जोकि गेहूं होती है, उसे बोने के लिए वे अपने खेतों को तैयार कर सकें। इसके परिणामस्वरूप वायु प्रदूषण पैदा होता है। इसके अतिरिक्त, शुष्क वातावरण लघु कोलियोपटाइल के साथ गेहूं की किस्मों के अंकुरण के लिए एक चुनौती भी पैदा करता है। इन समस्याओं को दूर करने के लिए विभाग एवं प्रौद्योगिकी विभाग को एक स्वायत्तशासी संस्थान पुणे स्थित अघरकर अनुसंधान संस्थान (एआरआई) के वैज्ञानिकों ने गेहूं में दो वैकल्पिक बौना करने वाला जीनों-आरएचटी14 एवं आरएचटी18 का मानचित्रण किया है। ये जीन बेहतर नवांकुर ताकत और लंबे कोलियोपटाइल के साथ जुडे होते हैं। कैसे मददगार होंगें ये जीन? प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. रविन्द्र पाटिल ने एआरआई के जेनेटिक्स एवं प्लांट ब्रीडिंग ग्रुप की टीम के साथ दुरुम गेहूं में क्रोमोजोम 6ए पर बौना करने वाले जीनों का मानचित्रण किया है और गेहूं प्रजनन लाइनों में इन जीनों के बेहतर चयन के लिए डीएनए आधारित मार्करों का विकास किया गया। डीएनए आधारित मार्कर गेहूं के प्रजनकों को गेहूं के प्रजनन के बड़े पूल से इन विकल्पी बौना करने वाला जीनों के वाहक गेहूं लाइनों को उपयुक्त रूप से चयन करने में सहायता करेगे। इन डीएनए आधारित मार्करों का उपयोग एआरआई में भारतीय गेहूं की किस्मों में इन जीनों के मार्कर समर्थित अंतरण के लिए किया जा रहा है जिससे कि उन्हें चावल की ठंठ युक्त स्थितियों एवं शुष्क वातावरणों के तहत बुवाई के लिए उपयुक्त बनाया जा सके। इन विकल्पी बौना करने वाले जीनों के साथ गेहूं प्रजनन लाइन वर्तमान में उन्नत चरण में हैं। फसल अवशेष जलाने में कमी के अतिरिक्त इन विकल्पी बौना करने वाले जीनों के साथ गेहूं की किस्में शुष्क वातावरणों के तहत मृदा में अवशेष आर्द्रता का लाभ उठाने के लिए गेहूं के बीजों की गहरी बुवाई में भी सहायक हो सकती हैं। वर्तमान में उपलब्ध अर्ध बौनी गेहूं किस्मों, जिनकी खोज हरित क्रांति के दौरान की गई थी, में पांरपरिक आरएचटी1 एलेल होते हैं और वे उच्च उर्वरता सिंचित स्थितियों के तहत ईष्टतम फसल की ऊपज करते हैं। बहरहाल, छोटे सेलियोप्टाइल के कारण शुष्क वातावरणों में गहरी बुवाई स्थितियों के अधिक अनुकूल नहीं हैं। बचे हुए चावल फसल के अवशेषों को जलाया जाना पर्यावरण, मृदा तथा मानव स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदायक है। इसलिए, गेहूं सुधार कार्यक्रमों में विकल्पी बौना करने वाले जीनों को शामिल किए जाने का आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, आरएचटी1 के केवल दो ड्वार्फिंग ऐलेल की ही भारतीय गेहूं किस्मों में प्रधानता हैं इसलिए भारत में गेहूं उगाए जाने वाले विविध क्षेत्रों को देखते हुए ड्वार्फिंग जीनों के जेनेटिक आधार को विविधीकृत करने की आवश्यकता है। उन्नत गेहूं किस्में जो एआरआई में विकसित की जा रही हैं, चावल-गेहूं फसल प्रणाली के तहत डंठलों को जलाये जाने के मामलों में कमी लाएंगी। ये किस्में शुष्क वातावरणों के तहत मृदा में अवशेष आर्द्रता का लाभ उठाने के लिए गेहूं के बीजों की गहरी बुवाई में भी सहायक होंगी जिससे बहुमूल्य जल संसाधनों की बचत होगी और किसानों के लिए खेती की लागत कम हो जाएगी

अल्‍जाइमर के कारण स्मृति हास को रोकने की नयी तकनीक चर्चा में क्यों? भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने ऐसी सृजनात्‍मक सोच पर काम किया है जो अल्जाइमर रोग से जुड़ी भूलने की आदत को रोकने या कम करने में मदद कर सकते हैं।टीम ने अल्जाइमर के न्यूरोकेमिकल सिद्धांतों का अध्ययन किया और मस्तिष्क में न्यूरोटॉक्सिक अणुओं का संचय रोकने के नए तरीकों की खोज की जो भूलने की आदत से जुड़े हैं। आईआईटी गुवाहाटी टीम ने कम वोल्टेज वाले विद्युत क्षेत्र के अनुप्रयोग और मस्तिष्क में न्यूरोटॉक्सिक अणुओं को एकत्र होने से रोकने के लिए ‘ट्रोजन पेप्टाइड्स’के उपयोग जैसे दिलचस्प तरीकों की जानकारी की। अल्जाइमर रोग की स्थिति अल्जाइमर रोग में लोगों में स्मृति हास की समस्या होती है एवं रोगियों में भूलने की आदत विदमान होती हैं। अल्जाइमर रोग का इलाज भारत में विकसित करने का महत्व है क्योंकि चीन और अमेरिका के बाद, दुनिया में अल्जाइमर के रोगियों की तीसरी सबसे बड़ी संख्या भारत में है, भारत में 40 लाख से अधिक लोग अल्‍जाइमर से जुड़ी भूलने की आदत के शिकार हैं। वर्तमान उपचारों में केवल रोग के कुछ लक्षण कम हो जाते हैं, फिर भी चिकित्‍सा संबंधी कोई ऐसी विध्‍वंसक पद्धति नहीं है जो अल्जाइमर के अंतर्निहित कारणों का इलाज कर सकती हो। क्या है उपचार का नया तरीका? अल्जाइमर का एक निर्धारक हॉलमार्क मस्तिष्क में एमीलॉइड बीटा पेप्टाइड्स का संचय है। डॉ. रामाकृष्णन और डॉ.नेमाड़े ने अल्जाइमर की प्रगति को रोकने के लिए इन पेप्टाइड्स के संचय को कम करने के तरीकों की तलाश की। 2019 में, आईआईटीगुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने पाया कि कम-वोल्टेज, सुरक्षित विद्युत क्षेत्र के अनुप्रयोग से विषाक्त न्यूरोडीजेनेरेटिव अणुओं का निर्माण और संचय कम हो सकता है जो अल्जाइमर रोग में भूलने का कारण बनते हैं। उन्होंने पाया कि बाहरी विद्युत / चुंबकीय क्षेत्र इन पेप्टाइड अणुओं की संरचना को व्‍यवस्थित करता है, जिससे एकत्रीकरण को रोका जा सकता है। “विद्युत क्षेत्र के संपर्क में आने पर, तंत्रिका कोशिकाओं के पतन को 17–35 प्रतिशत तक सीमित कर सकते हैं। इस क्षेत्र में आगे काम करते हुए, वैज्ञानिकों ने इन न्यूरोटॉक्सिन अणुओं के एकत्रीकरण को रोकने के लिए ‘ट्रोजन पेप्टाइड्स ’का उपयोग करने की संभावना का पता लगाया। ‘ट्रोजन पेप्टाइड ’का उपयोग करने का विचार पौराणिक" ट्रोजन हॉर्स "से आता है, जिसका ट्रॉय की लड़ाई में यूनानियों नेदांव-पेच के रूप में इस्तेमाल किया था। शोधकर्ताओं ने ट्रोजन पेप्टाइड्स को अमाइलॉइड पेप्टाइड के एकत्रीकरण को रोकने के लिए ‘छल-कपट’के समान दृष्टिकोण को अपनाते हुए, विषाक्त फाइब्रिलर संयोजन का गठन रोकने और भूलने की आदत की ओर ले जाने वाली तंत्रिका की विषाक्तता को कम करने के लिए डिज़ाइन किया है।

CPEC समेत पाक को दिए गए ऋणों पर अमेरिका की आपत्ति चर्चा में क्यों? संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका ने बीजिंग से कहा वह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा CPEC एवं अन्‍य सहायता राशि के रूप में दिए गए अनुचित ऋणों को सीमित करने का कदम उठाए, ताकि पाकिस्‍तान कोरोना महामारी के संकट के दौरान लिए गए उधार को चुकता कर सके। हालांकि, अमेरिका पूर्व में चीन द्वारा पाकिस्‍तान को प्रदान किए गए ऋणों पर सवाला उठा चुका है। इसके साथ ही अमेरिका, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा पर भी अपनी कठोर आपत्ति दर्ज करा चुका है। क्या है अमेरिका की आपत्ति और दृष्टिकोण? CPEC पर संयुक्त राज्य अमेरिका की चिंताओं, परियोजनाओं में शामिल पारदर्शिता की कमी और दोनों देशों के बीच लाभ की अनुचित दरों की गणना की है। चीन द्वारा पाकिस्‍तान के अंदर किसी भी निवेश को उसी शर्त पर समर्थन करता है, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करता है और वह पर्यावरण को बढ़ाता है। कोरोना महामारी संकट के चलते पूरी दुनिया आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही है। ऐसे में चीन, पाकिस्‍तान को दिए गए ऋणों के प्रति उदार रवैया अपनाना चाहिए। चीन को बोझिल और अनुचित ऋणों के बोझ को कम करने के लिए कदम उठाना चाहिए। संयुक्त राज्य अमेरिका को उम्मीद है कि चीन या तो कर्ज माफ करेगा या पाकिस्तानी लोगों के लिए एक निष्पक्ष और पारदर्शी सौदा बनाने के लिए ऋणों को फिर से वितरित करेगा। इतना ही नहीं उन्‍होंने उन देशों को भी आमंत्रित किया जो चीन के आर्थिक बोझ से दबे हुए हैं अमेरिका पुननिर्माण और विकास के लिए विश्व बैंक और आईएमएफ जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के साथ अपनी साझेदारी का उपयोग करेगा। इम इस साझेदारियों का उपयोग यह सुनिश्चित करने में करेंगे कि देश इस संकट से उबरें और हम दूसरों से इस वैश्विक प्रयास में शामिल होने का आग्रह करेंगे। क्या है CPEC परियोजना? चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना OBOR(ONE BELT ONE ROAD) का हिस्सा है। इसके तहत पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को बलूचिस्तान, POK, होते हुए चीन के शिनजिआंग प्रांत से जोड़ा जाएगा। इस परियोजना में पाकिस्तान में बंदरगाह, सड़कों, पाइपलाइन्स, दर्जनों फैक्ट्रियों और एयरपोर्ट जैसे कई अवसंरचनात्मक निर्माण शामिल है। इसके जरिए चीन अरब सागर के ग्वादर बंदरगाह तक अपनी कनेक्टिविटी मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

15 मई, 2020 को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 1.73 बिलियन डॉलर की वृद्धि के साथ 487.04 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। विश्व में सर्वाधिक विदेशी मुद्रा भंडार वाले देशों की सूची में भारत 8वें स्थान पर है, इस सूची में चीन पहले स्थान पर है। विदेशी मुद्रा भंडार इसे फोरेक्स रिज़र्व या आरक्षित निधियों का भंडार भी कहा जाता है भुगतान संतुलन में विदेशी मुद्रा भंडारों को आरक्षित परिसंपत्तियाँ’ कहा जाता है तथा ये पूंजी खाते में होते हैं। ये किसी देश की अंतर्राष्ट्रीय निवेश स्थिति का एक महत्त्वपूर्ण भाग हैं। इसमें केवल विदेशी रुपये, विदेशी बैंकों की जमाओं, विदेशी ट्रेज़री बिल और अल्पकालिक अथवा दीर्घकालिक सरकारी परिसंपत्तियों को शामिल किया जाना चाहिये परन्तु इसमें विशेष आहरण अधिकारों , सोने के भंडारों और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की भंडार अवस्थितियों को शामिल किया जाता है। इसे आधिकारिक अंतर्राष्ट्रीय भंडार अथवा अंतर्राष्ट्रीय भंडार की संज्ञा देना अधिक उचित है। 15 मई, 2020 को विदेशी मुद्रा भंडार विदेशी मुद्रा संपत्ति (एफसीए): $448.67 बिलियन गोल्ड रिजर्व: $ 32.91 बिलियन आईएमएफ के साथ एसडीआर: $ 1.42 बिलियन आईएमएफ के साथ रिजर्व की स्थिति: $ 4.04 बिलियन

भारत दुनिया में व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया। चीन दुनिया में PPE का सबसे बड़ा निर्माता है। मुख्य बिंदु कपड़ा मंत्रालय विनिर्माण के साथ-साथ पीपीई की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए कई उपाय कर रहा है। पृष्ठभूमि शुरुआत में भारत को गुणवत्ता पीपीई उत्पादों को बढ़ाने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसमें चीन से मशीनें आयात करना और बढ़ती कीमतें भी शामिल है। इनके अलावा, घरेलू निर्माताओं के आयात में देरी हुई। उपरोक्त कारणों के बाद भारत ने पीपीई उत्पादन में स्वदेशी को अपनाया। इससे पीपीई का उत्पादन बढ़ा। यह ध्यान दिया जाना है कि कपड़ा समिति ने हाल ही में सिंथेटिक रक्त प्रवेश परीक्षण उपकरण लॉन्च किया है। यह देश की पीपीई परीक्षण क्षमता बढ़ाने में मदद करेगा। भारत की क्षमता भारत अब हर दिन 2.06 लाख पीपीई किट का उत्पादन कर रहा है। यह देश की अधिकतम क्षमता है। औसतन, भारत में 1 लाख किट का उत्पादन होता है। एक पीपीई किट में जूता कवर, दस्ताने, आंखों की शील्ड, मास्क और गाउन शामिल हैं। यह डेटा स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा प्रदान किया गया था। जनवरी 2020 में, भारत में 2.75 लाख पीपीई किट थे और फिर उन्हें आयात किया जा रहा था। आज भारत में स्टॉक बफर के रूप में 15.96 लाख से अधिक पीपीई किट हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में घोषणा की कि अमेरिका अब ओपन स्काइज संधि से अलग होगा। संधि के बारे में ओपन स्काईज की संधि पर 2002 में हस्ताक्षर किए गए थे। इस संधि ने प्रतिभागियों के लिए एक हवाई निगरानी प्रणाली की स्थापना की। संधि पर हस्ताक्षर करने वाले 34 सदस्य हैं। अमेरिका और रूस दोनों संधि के हस्ताक्षरकर्ता हैं। संधि की मुख्य विशेषताएं यह संधि निहत्थे हवाई अवलोकन का एक क्षेत्र स्थापित करती है। इसके तहत हस्ताक्षरकर्ताओं के क्षेत्रों पर अवलोकन की अनुमति है। यह आपसी समझ को बढ़ाता है और सभी प्रतिभागियों में विश्वास उत्पन्न करता है। समस्या क्या है? अमेरिकी राष्ट्रपति ने संधि से पीछे हटने की घोषणा करते हुए आरोप लगाया कि रूस इस संधि की अवहेलना की है। डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद से यह ऐसा तीसरा समझौता है जिससे अमेरिका अलग हुआ है। हस्ताक्षरकर्ता देश इस संधि के हस्ताक्षरकर्ता देशों में यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली, फिनलैंड, पुर्तगाल, स्वीडन, तुर्की, बेल्जियम, बेलारूस, क्रोएशिया, बुल्गारिया, बोस्निया, हर्जेगोविना, चेक गणराज्य, एस्टोनिया, डेनमार्क, जॉर्जिया, फिनलैंड, रूस, आइसलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया, रूस, यूक्रेन और स्लोवेनिया शामिल है। किर्गिस्तान एकमात्र ऐसा देश है जिसने इस संधि की पुष्टि नहीं की है भारत भारत की जापान के साथ भी ऐसी ही संधि है। भारत और जापान ने 2017 में ‘ओपन स्काई’ समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। भारत ने राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति, 2016 के अनुसार इस समझौते पर हस्ताक्षर किए।

संयुक्त राष्ट्र ने मणिपुर की KHUDOL पहल को COVID-19 के खिलाफ लड़ने के लिए शीर्ष 10 वैश्विक पहलों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया। मुख्य बिंदु KHUDOL एक NGO की पहल है जिसे Ya_All कहा जाता है। एनजीओ ने इस पहल के तहत LGBTQ समुदाय के लोगों, दैनिक वेतन भोगी और एड्स से प्रभावित लोगों को भोजन, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधा प्रदान की। इस संगठन ने 100 स्वयंसेवकों का नेटवर्क कार्यशील किया। इन स्वयंसेवकों के माध्यम से संगठन ने 1000 स्वास्थ्य किट, 1500 कंडोम और 6500 सेनेटरी पैड वितरित किए। मणिपुर के ट्रांसजेंडर उपाय मणिपुर ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए समावेशी सुरक्षित स्थान बना रहा है। अन्य राज्यों की तुलना में यह राज्य ट्रांसजेंडरों के लिए अतिरिक्त देखभाल कर रहा है। ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए अलग कमरे और शौचालय स्थापित किए गए थे। उत्तर-पूर्व क्षेत्र जब अन्य राज्यों की तुलना में, उत्तर पूर्व क्षेत्र में COVID-19 के प्रसार को कम करने में भारी सुधार दिखाई दे रहा है। इसमें मेघालय, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और नागालैंड शामिल थे। इसके अलावा, भारत सरकार ने इस क्षेत्र में बीमारी को रोकने के लिए नॉर्थ ईस्ट मॉडल को सफलतापूर्वक लागू किया था ।

22 मई, 2020 को वित्त मंत्रालय ने सरकारी ऋण 2018-19 पर स्थिति पत्र (Status Paper) जारी किया। इस रिपोर्ट के अनुसार केंद्र और राज्यों के कुल कर्ज में मार्च 2018 में 68.7% की गिरावट आई और यह 2019 में 68.6% हो गया। मुख्य बिंदु सरकार के ऋण पर स्थिति पत्र का निर्माण वित्त मंत्रालय द्वारा 2010 से किया जा रहा है। भारत का वर्तमान ऋण 1.3 करोड़ करोड़ रुपये है। रिपोर्ट के महत्वपूर्ण बिंदु केंद्र सरकार का ऋण 2017-18 में 45.8% से घटकर 2019 में 45.7% हो गया, बाहरी ऋण जीडीपी का 2.7% था। केंद्र की औसत ब्याज लागत वर्ष 2018 से 2019 तक अपरिवर्तित रही। केंद्र की 94% देनदारियां घरेलू ऋण से सम्बंधित थीं। सरकारी ऋण सरकारी ऋण को आंतरिक ऋण और बाहरी ऋण के रूप में वर्गीकृत किया गया है। आंतरिक ऋण में गैर-विपणन और विपणन योग्य ऋण शामिल हैं। बाहरी ऋण का तात्पर्य देश के बाहर के सभी स्रोतों से लिए गए ऋण से है। सरकारी देनदारियों को सार्वजनिक खाते में देनदारियों और भारत के समेकित फंड के समक्ष अनुबंधित ऋण में वर्गीकृत किया गया है।

कोविड-19 से लड़ने में एचआईवी दवाओं से अधिक कारगर कांगड़ा चाय कोविड-19 से लड़ने के लिए संशोधित प्रोटोकॉल में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) द्वारा प्रतिरोधक क्षमता में सुधार और उपचार के लिए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (एचसीक्यू) के स्थान पर एचआईवी-रोधी दवा के उपयोग की संभावना व्यक्त की जा रही है। दूसरी ओर, अब कहा जा रहा है कि एचआईवी-रोधी दवाओं की तुलना में चाय रसायन भी प्रतिरक्षा बढ़ाने और कोरोना वायरस गतिविधि को अवरुद्ध करने में अधिक प्रभावी हो सकते हैं। हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में स्थित हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएचबीटी) के निदेशक डॉ संजय कुमार ने इस तथ्य का खुलासा किया है। कांगड़ा चाय के बारे में बोलते हुए यह बात उन्होंने अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस के मौके पर आईएचबीटी में आयोजित एक वेबिनार के दौरान कही है। डॉ संजय कुमार ने कहा– “चाय में ऐसे रसायन होते हैं जो कोरोनावायरस की रोकथाम में एचआईवी-रोधी दवाओं की तुलना मेंअधिक प्रभावी हो सकते हैं। हमारे वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर-आधारित मॉडल का उपयोग करते हुए जैविक रूप से सक्रिय 65 रसायनों या पॉलीफेनोल्स का परीक्षण किया है, जो विशिष्ट वायरल प्रोटीन को एचआईवी-रोधी दवाओं की तुलना में अधिक कुशलता से बाँध सकते हैं। ये रसायन उन वायरल प्रोटीन्स की गतिविधि को अवरुद्ध कर सकते हैं, जो मानव कोशिकाओं में वायरस को पनपने में मदद करता है।” वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद से संबद्ध आईएचबीटी अपने प्रौद्योगिकी साझेदारों के साथ मिलकर चाय आधारित प्राकृतिक सुगंधित तेलों से युक्त अल्कोहल हैंड सैनिटाइजर का भी उत्पादन व आपूर्ति कर रहा है। आईएचबीटी में चाय के अर्क के उपयोग से हर्बल साबुन भी बनाया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह साबुन प्रभावी रूप से फफूंद-रोधी, जीवाणु-रोधी व वायरस-रोधी गुणों से लैस है। हिमाचल की दो कंपनियों द्वारा इस साबुन का उत्पादन व विपणन किया जा रहा है। इस अवसर पर टी-विनेगर (चाय के सिरके) की तकनीक धर्मशाला की कंपनी मैसर्स काश आई विशको हस्तांतरित की गई है। चाय के सिरके में मोटापा-रोधी गुण होते हैं। इसके अतिरिक्त आयुष द्वारा सिफारिश की गई जड़ी-बूटियों से युक्त हर्बल ग्रीन और ब्लैक टी उत्पादों को भी लॉन्च किया गया है। इन उत्पादों को सीएम स्टार्ट-अप योजना के तहत मंडी के उद्यमी परितोष भारद्वाज द्वारा विकसित किया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि कोविड-19 के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने हेतु ये उत्पाद बहुत उपयोगी हो सकते हैं।

सीईएनएस द्वारा डिजाइन किया गया आरामदायक फेसमास्क लंबे समय तक इसका उपयोग करने के लिए आम लोगों को प्रोत्साहित कर सकता है कोविड-19 प्रोटेक्शन मास्क के लिए एक श्रम दक्ष डिजाइन लंबे समय तक इसके सुगम उपयोग के लिए अनिवार्य है: डीएसटी के सचिव प्रो. आशुतोष शर्मा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के एक स्वायत्तशासी संस्थान, सेंटर फार नैनो एंड साफ्ट मैटर साईंसेज (सीईएनएस) के शोधकर्ताओं की एक टीम ने मास्क के एक कप आकार की डिजाइन (पैटेंट दायर) विकसित की है जो बोलते समय मुंह के सामने के हिस्से में पर्याप्त स्थान का सृजन करने में सहायता करती है। बड़े स्तर पर इसका उत्पादन के लिए इसे बंगलुरु स्थित एक कंपनी को अंतरित कर दिया गया है। इस स्नग फिट मास्क से बोलने में कोई असुविधा नहीं होती है, चश्मे पर कोई फाॅगिंग नहीं होती, इसे चारों तरफ से अच्छी तरह से पैक किया जाता है जिससे सांस लेते समय व्यावहारिक रूप से रिसाव की कोई गुंजाइशनहीं रह जाती। इसकी उच्च श्वसन क्षमता इसका एक और महत्वपूर्ण लाभ है जो इसे बिना किसी असुविधा के पहनने में सक्षम बनाता है। इसके अतिरिक्त, शोधकर्ताओं ने इस प्रकार के फैब्रिक लेयर्स को चुना है कि जिससे केवल इलेक्ट्रिक चार्ज द्वारा ही जो फैब्रिक की ट्रिबोइलेक्ट्रिक प्रकृति के कारण हल्के घर्षण के तहत व्याप्त हो सकते हैं, रोगजनकों के निष्क्रिय हो जाने की संभावना पैदा हो जाती है। इससे संबंधित अग्रिम स्तर के परीक्षण किए जा रहे हैं। डीएसटी के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने कहा कि, ‘ हालांकि कोविड-19 प्रोटेक्शन मास्क के लिए एक श्रम दक्ष डिजाइन लंबे समय तक इसके सुगम उपयोग के लिए अनिवार्य है, पर अक्सर कुछ मानक डिजाइनों से आगे इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। एक अच्छी डिजाइन को किनारों के आसपास अंतर्वेधन तथा रिसाव की अनुभूति को न्यूनतम करना चाहिए लेकिन अपने स्थान को बरकरार रखते हुए इसे सांस लेने और बातचीत करने की सुगमता को अधिकतम बनाना चाहिए। ‘ भारत एवं अन्य देशों में सक्रिय कोविड 19 के मामलों में बढोतरी के साथ आम लोगों के लिए फेस मास्कों के उपयोग की सलाह दी गई है। जहां स्वास्थ्य पेशेवर विशेष और उच्च तकनीकी गुणवत्ता के मेडिकल मास्क का उपयोग कर सकते हैं, आम जनता के लिए मध्यम फिल्टरिंग दक्षता वाले मास्क पर्याप्त होंगे। इसे पहनने में आरामदायक होना चाहिए जिससे कि लोग लंबे समय तक इसे पहनने के लिए प्रोत्साहित हो। सीईएनएस ने इस प्रौद्योगिकी को दो दशक पूर्व स्थापित बंगलुरु स्थित एक गारमेंट कंपनी, कामेलिया क्लोदिंग लिमिटेड को अंतरित कर दिया है। कंपनी की योजना प्रति दिन लगभग एक लाख मास्क का उत्पादन करने और भारत भर में विभिन्न वितरण चैनलों के माध्यम से इसे बेचने की है।

भारतीय रेलवे अगले 10 दिनों में 2600 और श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का परिचालन करेगा इस फैसले से लगभग 36 लाख फंसे हुए प्रवासियों को लाभ होगा भारतीय रेलवे ने पिछले 23 दिनों में 2600 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का परिचालन किया अब तक लगभग 36 लाख फंसे प्रवासियों को उनके गृह राज्यों तक पहुंचाया गया जहां एक ओर देश कोविड-19 महामारी से जूझ रहा है, वहीं भारतीय रेलवे इस महत्वपूर्ण समय में गंभीर रूप से प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। इन प्रवासियों को उनके गृह राज्य तक पहुंचाकर राहत प्रदान करने के निरंतर प्रयासों के तहत एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए रेल मंत्रालय ने अगले दस दिनों में देश भर में राज्य सरकारों की जरूरतों के अनुसार 2600 और श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का परिचालन करने का फैसला किया है। इस पहल से देश भर में फंसे 36 लाख यात्रियों को लाभ मिलने की संभावना है। उल्लेखनीय है कि भारतीय रेलवे ने लॉकडाउन के कारण विभिन्न स्थानों पर फंसे प्रवासी कामगारों, तीर्थयात्रियों, पर्यटकों, छात्रों और अन्य व्यक्तियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने के लिए 01 मई 2020 से "श्रमिक स्पेशल" ट्रेनों का परिचालन शुरू किया था। इन विशेष ट्रेनों को ऐसे फंसे हुए व्यक्तियों को भेजने और प्राप्त करने के लिए मानक प्रोटोकॉल के अनुसार दोनों संबंधित राज्य सरकारों के अनुरोध पर एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच चलाया जा रहा है। इन "श्रमिक स्पेशल" के लिए समन्वय और सुचारु परिचालन के लिए रेलवे और राज्य सरकारों ने वरिष्ठ अधिकारियों को नोडल अधिकारी नियुक्त किया है। भारतीय रेलवे ने पिछले 23 दिनों में 2600 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का परिचालन किया है। अब तक लगभग 36 लाख फंसे प्रवासियों को उनके गृह राज्यों तक पहुंचाया गया। उल्लेखनीय है कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के अलावा, रेल मंत्रालय ने 12 मई 2020 से 15 जोड़ी स्पेशल ट्रेनों का परिचालन शुरू किया है और 01 जून, 2020 से 200 ट्रेन सेवाओं को शुरू करने की घोषणा की है।

श्री नकवी ने बताया कि इस बार के "हुनर हाट" का डिजिटल और ऑनलाइन प्रदर्शन भी होगा। साथ ही लोगों को "हुनर हाट" में प्रदर्शित सामान को ऑनलाइन खरीदने की भी सुविधा दी जा रही है। "हुनर हाट" के दस्तकारों और उनके स्वदेशी हस्तनिर्मित उत्पादों को "जेम" (गवर्नमेंट ई मार्केटप्लेस) में रजिस्टर करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसके अलावा विभिन्न निर्यात कौंसिल्स दस्तकारों, शिल्पकारों के स्वदेशी उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय मार्किट मुहैया कराने हेतु रूचि दिखा रही हैं, जिससे इन दस्तकारों, शिल्पकारों के स्वदेशी उत्पादों को बड़े पैमाने पर अंतर्राष्ट्रीय मार्किट मिल सकेगा। श्री नकवी ने कहा कि पुनः शुरू होने जा रहे "हुनर हाट" से देश के लाखों स्वदेशी विरासत के उस्ताद दस्तकारों, शिल्पकारों में उत्साह और ख़ुशी का माहौल बन गया है।

लगभग 5 महीनों के बाद दस्तकारों-शिल्पकारों का "सशक्तिकरण एक्सचेंज", "हुनर हाट" सितम्बर 2020 से पुनः शुरू पहले से ज्यादा दस्तकारों की भागीदारी के साथ पुनः शुरू "हुनर हाट" का थीम "लोकल से ग्लोबल" “देश के दूर-दराज के क्षेत्रों के दस्तकारों, शिल्पकारों, कारीगरों, हुनर के उस्तादों को मौका-मार्किट देने वाला "हुनर हाट" स्वदेशी हस्तनिर्मित उत्पादनों का "प्रामाणिक ब्रांड" बन गया है” : मुख्तार अब्बास नकवी "जान भी जहान भी" पवेलियन होगा जहाँ लोगो को "पैनिक नहीं प्रीकॉशन" की थीम पर जागरूकता पैदा करने वाली जानकारी भी दी जायेगी” : मुख्तार अब्बास नकवी "हुनर हाट" में सोशल डिस्टेंसिंग, साफ-सफाई, सैनिटाईज़ेशन, मास्क आदि की विशेष व्यवस्था की जाएगी” कोरोना की चुनौतियों के चलते लगभग 5 महीनों के बाद दस्तकारों-शिल्पकारों का "सशक्तिकरण एक्सचेंज", "हुनर हाट" सितम्बर 2020 से "लोकल से ग्लोबल" थीम एवं पहले से ज्यादा दस्तकारों की भागीदारी के साथ पुनः शुरू होने जा रहा है। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री श्री मुख्तार अब्बास नकवी ने आज यहाँ बताया कि पिछले पांच वर्षों में 5 लाख से ज्यादा भारतीय दस्तकारों, शिल्पकारों को रोजगार-रोजगार के अवसर प्रदान करने वाले "हुनर हाट" के दुर्लभ हस्तनिर्मित स्वदेशी सामान लोगों में काफी लोकप्रिय हुए हैं। देश के दूर-दराज के क्षेत्रों के दस्तकारों, शिल्पकारों, कारीगरों, हुनर के उस्तादों को मौका-मार्किट देने वाला "हुनर हाट" स्वदेशी हस्तनिर्मित उत्पादनों का "प्रामाणिक ब्रांड" बन गया है। ज्ञात हो कि फरवरी 2020 में इंडिया गेट पर आयोजित "हुनर हाट" में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अचानक पहुँच कर दस्तकारों-शिल्पकारों की हौसलाअफजाई की थी, प्रधानमंत्री श्री मोदी ने "मन की बात" में भी "हुनर हाट" के स्वदेशी उत्पादनों और दस्तकारों के काम की सराहना करते हुए कहा था कि "कुछ दिनों पहले, मैंने, दिल्ली के हुनर हाट में एक छोटी सी जगह में, हमारे देश की विशालता, संस्कृति, परम्पराओं, खानपान और जज्बातों की विविधताओं के दर्शन किये। समूचे भारत की कला और संस्कृति की झलक, वाकई अनोखी ही थी और इनके पीछे, शिल्पकारों की साधना, लगन और अपने हुनर के प्रति प्रेम की कहानियाँ भी, बहुत ही, प्रेरणादायक होती हैं।" प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि, "हुनर हाट, कला के प्रदर्शन के लिए एक मंच तो है ही, साथ-ही-साथ, यह, लोगों के सपनों को भी पंख दे रहा है। एक जगह है जहां इस देश की विविधता को अनदेखा करना असंभव ही है। शिल्पकला तो है ही है, साथ-साथ, हमारे खान-पान की विविधता भी है। वहां एक ही लाइन में इडली-डोसा, छोले-भटूरे, दाल-बाटी, खमन-खांडवी, ना जाने क्या-क्या था। मैंने, खुद भी वहां बिहार के स्वादिष्ट लिट्टी-चोखे का आनन्द लिया, भरपूर आनंद लिया। भारत के हर हिस्से में ऐसे मेले, प्रदर्शिनियों का आयोजन होता रहता है। भारत को जानने के लिए, भारत को अनुभव के लिए, जब भी मौका मिले, जरुर जाना चाहिए। ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ को, जी-भर जीने का, ये अवसर बन जाता है। आप ना सिर्फ देश की कला और संस्कृति से जुड़ेंगे, बल्कि आप देश के मेहनती कारीगरों की, विशेषकर, महिलाओं की समृद्धि में भी अपना योगदान दे सकेंगे।" श्री नकवी ने बताया कि कोरोना के चलते देशव्यापी लॉकडाउन में मिले समय का सदुपयोग कर दस्तकारों, कारीगरों ने अगले "हुनर हाट" की उम्मीद में बड़ी तादाद में अपने हस्तनिर्मित दुर्लभ स्वदेशी सामग्री को तैयार किया है जिसे ये दस्तकार, कारीगर अगले "हुनर हाट" में प्रदर्शनी एवं बिक्री के लिए लाएंगे। श्री नकवी ने बताया कि "हुनर हाट" में सोशल डिस्टेंसिंग, साफ-सफाई, सैनिटाईज़ेशन, मास्क आदि की विशेष व्यवस्था की जाएगी, साथ ही "जान भी जहान भी" पवेलियन होगा जहाँ लोगो को "पैनिक नहीं प्रीकॉशन" की थीम पर जागरूकता पैदा करने वाली जानकारी भी दी जायेगी। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा अभी तक देश के विभिन्न भागों में दो दर्जन से अधिक "हुनर हाट" का आयोजन किया जा चुका है, जिसमें लाखों दस्तकारों, शिल्पकारों, कारीगरों को रोजगार-रोजगार के अवसर मिले हैं। आने वाले दिनों में चंडीगढ़, दिल्ली, प्रयागराज, भोपाल, जयपुर, हैदराबाद, मुंबई, गुरुग्राम, बेंगलुरु, चेन्नई, कोलकाता, देहरादून, पटना, नागपुर, रायपुर, पुडुचेर्री, अमृतसर, जम्मू, शिमला, गोवा, कोच्चि, गुवाहाटी, भुबनेश्वर, अजमेर, अहमदाबाद, इंदौर, रांची, लखनऊ आदि स्थानों पर "हुनर हाट" का आयोजन किया जायेगा।

चक्रवाती तूफान ‘अम्फान’ के बाद स्थिति प्रबंधन के लिए पश्चिम बंगाल में एनडीआरएफ की 10 अतिरिक्त टीमें तैनात की गई हैं एनडीआरएफ की 26 टीमें पहले से ही पश्चिम बंगाल के चक्रवाती तूफान प्रभावित क्षेत्रों में बहाली कार्य के लिए तैनात हैं पश्चिम बंगाल सरकार के आपदा प्रबंधन एवं नागरिक सुरक्षा विभाग में प्रधान सचिव से अतिरिक्त टीमों की तैनाती के लिए लिखित अनुरोध प्राप्त होने पर एनडीआरएफ की दस अतिरिक्त टीमों की व्‍यवस्‍था करने के बाद उन्‍हें जल्द से जल्द पश्चिम बंगाल के बाहर स्थित एनडीआरएफ स्थानों या केंद्रों से रवाना किया जा रहा है। इन टीमों के आज देर रात तक कोलकाता पहुंच जाने की संभावना है। वर्तमान में एनडीआरएफ की 26 टीमें पश्चिम बंगाल के चक्रवाती तूफान प्रभावित क्षेत्रों में विभिन्‍न सेवाओं की बहाली से जुड़े कार्यों के लिए तैनात हैं। 10 अतिरिक्त टीमों की तैनाती से चक्रवाती तूफान अम्फान से प्रभावित पश्चिम बंगाल के 6 जिलों में एनडीआरएफ की कुल 36 टीमों की तैनाती सुनिश्चित हो जाएगी।