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People say Typhoid makes you weak. I say it gives you the perfect 48-hour window to speed-run all 5 seasons of Stranger Things. My immune system is fighting Salmonella, but my brain is fighting Demogorgons. We are not the same
तुलसी पूजन पर मेरे विचार, परंपरा, सत्य और समझ का संतुलन
क्रिसमस पर शुभकामनाएं देने वालों को ज्ञान देने वाले लोग यह कहते हैं कि अपना कल्चर मत भूलो, लेकिन सच यह है कि शायद उन्हें अपना ही कल्चर पूरी तरह पता नहीं है। जिस तुलसी पूजन दिवस को आज कट्टरता के साथ प्रचारित किया जाता है, उसका प्रारंभ 2014 में आसाराम बापू के द्वारा किया गया था, जो रेप के मामले में दोषी ठहरा और आज भी जेल में है।
तुलसी हमारे लिए आस्था और सम्मान का प्रतीक है। तुलसी माता हमारे लिए पूजनीय हैं, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन तुलसी की पूजा के लिए किसी खास दिन का इंतजार करना हमारी परंपरा का हिस्सा कभी नहीं रहा। हमारे घरों में रोज स्नान के बाद तुलसी पूजा, तुलसी की सेवा और सम्मान हमेशा से होता आया है, यही हमारी असली परंपरा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारा सनातन धर्म सूर्य और चंद्र पर आधारित पंचांग के अनुसार त्योहार तय करता है। छठ, दिवाली, होली, नवरात्र, महाशिवरात्रि, सभी पर्व पंचांग के अनुसार मनाए जाते हैं, न कि क्रिश्चियन कैलेंडर के तय दिनों पर। तो फिर तुलसी पूजा का एक निश्चित दिन 25 दिसंबर कैसे मान लिया जाए। यह हमारी परंपरा की मूल भावना से मेल नहीं खाता।
समस्या पूजा से नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब अपने धर्म को इतनी कट्टरता में बदल दिया जाता है कि दूसरे धर्म के बड़े त्योहार को नीचा दिखाने के लिए अचानक नए त्योहार गढ़ दिए जाते हैं और उन्हें परंपरा का नाम दे दिया जाता है। यह किसी भी अच्छे धर्म की पहचान नहीं है।
अपने धर्म से प्रेम करो, उस पर गर्व करो, लेकिन उसे कट्टरता में मत बदलो। ऐसा न हो कि नफरत और टकराव बढ़ते बढ़ते हम खुद ही वैसा रूप ले लें जिस धर्म को दुनिया में उसके शांतिप्रिय टैग से ज्यादा दूसरी वजहों से ज्यादा प्रसिद्धि मिली हुई है। धर्म का उद्देश्य सद्भाव, प्रेम और शांति है। उसे नफरत और राजनीति का साधन मत बनने दो।
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