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Forex Pro Guru

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रामो विग्रहवान्धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः।🙏

जिस रुपये को पिछले कई महीनों से बाज़ार में हर कोई कमज़ोर बता रहा था, अब उसी रुपये को बचाने के लिए RBI मैदान में उतर गया है और उसने अपना सबसे बड़ा हथियार निकाल लिया है। इसका सीधा असर आपकी और मेरी जेब पर भी पड़ सकता है भैया। तो चलिए, मैं आपको एकदम आसान भाषा में समझातa हूँ कि RBI ने ऐसा क्या किया है और इसका हम पर क्या असर पड़ सकता है। देखिए, इसे ऐसे समझिए कि इंटरनेशनल मार्केट में डॉलर खरीदने वाले ज़्यादा हैं। यानी डॉलर की माँग ज़्यादा है, इसलिए डॉलर महँगा हो रहा है और हमारा रुपया कमज़ोर पड़ रहा है। अब इस रुपये को संभालने के लिए RBI ने चार बड़े कदम उठाए हैं। पहला कदम समझिए। हमारे देश में सबसे ज़्यादा डॉलर कौन खरीदता है? हमारी तेल कंपनियाँ, क्योंकि उन्हें विदेशों से तेल खरीदना पड़ता है। जैसे IOC, HPCL और BPCL। इन कंपनियों को विदेश से तेल मँगवाने के लिए डॉलर चाहिए होते हैं। अब RBI कह रहा है कि तुम बाज़ार में जाकर डॉलर मत खरीदो, डॉलर मैं तुम्हें दे दूँगा भैया। यानी जो सबसे बड़ा खरीदार है, वह अब सीधे बाज़ार से डॉलर नहीं खरीदेगा। इससे बाज़ार में डॉलर की माँग कम करने में मदद मिल सकती है। दूसरा कदम समझने से पहले एक उदाहरण देखिए। मान लीजिए, रमेश जी चीन से सामान मँगवाते हैं और उन्हें तीन महीने बाद डॉलर में पेमेंट करनी है। अब उन्हें डर है कि अगर तीन महीने बाद डॉलर महँगा हो गया, तो उन्हें ज़्यादा रुपये खर्च करने पड़ेंगे और नुकसान हो जाएगा। इसलिए रमेश जी आज ही बैंक से डॉलर का रेट तय करवा लेते हैं, ताकि तीन महीने बाद उन्हें उसी तय रेट पर डॉलर मिल सके। इसे डॉलर का फ्यूचर वाला सौदा या फ्यूचर ट्रेडिंग कहते हैं। रमेश जी ऐसा इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें सच में डॉलर की ज़रूरत है। उनका कारोबार है, उन्हें सामान मँगवाना है और पेमेंट करनी है। इसलिए यह एक असली ज़रूरत है। लेकिन बाज़ार में बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें न सामान इम्पोर्ट करना है और न ही एक्सपोर्ट करना है। फिर भी वे डॉलर के भाव ऊपर-नीचे होने पर पैसा कमाने के लिए ऐसे सौदे करते हैं। यानी वे सिर्फ दाँव लगाते हैं कि डॉलर महँगा होगा या सस्ता। SEBI के मुताबिक, इस तरह की सट्टेबाज़ी से डॉलर पर दबाव बढ़ सकता है और डॉलर महँगा हो सकता है। तो अब RBI ने क्या किया है? ऐसे कुछ फ्यूचर वाले सौदों के लिए बैंकों को अब RBI के पास 20% पैसा जमा रखना होगा। यानी इन सौदों को करना बैंकों के लिए महँगा हो जाएगा और इसका असर उन लोगों पर भी पड़ेगा, जो सिर्फ सट्टा लगाने के लिए ऐसे सौदे करते हैं। तीसरा कदम समझिए। पहले जिन लोगों को डॉलर की कोई असली ज़रूरत नहीं थी, वे करीब ₹800 करोड़ तक के ऐसे सौदे कर सकते थे। लेकिन अब यह लिमिट घटाकर सीधे करीब ₹40 करोड़ कर दी गई है। यानी पहले जहाँ करीब ₹800 करोड़ तक का दाँव लगाने की गुंजाइश थी, अब वह घटकर करीब ₹40 करोड़ रह गई है। RBI इस तरह डॉलर पर सट्टा लगाने वालों के लिए खेल को काफी मुश्किल बना रहा है। चौथा कदम भी बहुत ज़रूरी है। मान लीजिए, रमेश जी को विदेश से सामान मँगवाने के लिए 10 लाख डॉलर का पेमेंट करना है। लेकिन वे उसी एक बिल को तीन अलग-अलग बैंकों में दिखाकर 30 लाख डॉलर के सौदे कर लेते हैं। अब उनकी असली ज़रूरत तो सिर्फ 10 लाख डॉलर की थी, लेकिन उन्होंने 30 लाख डॉलर का सौदा कर लिया। यानी बाकी 20 लाख डॉलर का सौदा असली ज़रूरत के लिए नहीं, बल्कि दाँव लगाने के लिए किया गया। अब RBI ने इस तरह की गड़बड़ी रोकने के लिए नियम सख्त कर दिए हैं। बैंकों को चेक करना होगा कि एक ही बिल के आधार पर कई जगह अलग-अलग सौदे न किए जाएँ। यानी एक ही बिल दिखाकर बार-बार सौदे करने वाली जुगाड़बाज़ी पर रोक लगाने की कोशिश की जा रही है। अब आप सोच रही होंगी कि भैया, हमें इन सब चीज़ों से क्या मतलब? डॉलर महँगा हो या सस्ता, हमें क्या फर्क पड़ता है? तो इसका असर आपकी और मेरी जेब पर भी पड़ सकता है। अगर रुपया मज़बूत होता है, तो विदेशों से आने वाली चीज़ों को खरीदने की लागत कम हो सकती है। ऐसे में सोना, चाँदी, मोबाइल और लैपटॉप जैसी चीज़ें कुछ सस्ती हो सकती हैं। यानी RBI के ये कदम सिर्फ डॉलर और रुपये के बाज़ार तक सीमित नहीं हैं, इनका असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है।

इस बार अमेरिकी बाज़ार (US Market) का माहौल अलग क्यों है? अमेरिकी बॉन्ड यील्ड (US Bond Yield) अब 5.2% तक पहुँच चुकी है। आखिरी बार अमेरिकी सरकार ने 10 साल के कर्ज पर 5.0% से ज़्यादा ब्याज 2001 में दिया था। यह एक बेहद अहम आंकड़ा है, क्योंकि इसे 'रिस्क-फ्री रेट' (बिना जोखिम वाली ब्याज दर) माना जाता है। मान लीजिए कि आप 2020 में एक रिटायर्ड इंसान हैं। आपको शेयर बाज़ार में पैसे लगाने से डर लगता है, लेकिन उस समय 10 साल वाले ट्रेजरी बॉन्ड पर सिर्फ 0.6% का रिटर्न मिल रहा था। यानी सरकार आपको 10,000 डॉलर के बॉन्ड निवेश पर साल में सिर्फ 60 डॉलर दे रही थी। यह रिटर्न इतना कम था कि आपको मजबूरन शेयर बाज़ार (Stocks) में पैसा लगाना पड़ा। लेकिन वह बात छह साल पुरानी थी। आज आपको 10 साल के लिए अपने निवेश पर 5.2% का रिटर्न मिल सकता है। अब वही 10,000 डॉलर का बॉन्ड आपको हर साल 520 डॉलर देगा — जो पहले से कहीं ज़्यादा है। यह कमाई इतनी अच्छी है कि आप अपना पैसा शेयर बाज़ार से निकालकर बॉन्ड मार्केट में सुरक्षित रख सकते हैं। मूल रूप से, यही वजह है कि बढ़ती ब्याज दरें शेयर बाज़ार के लिए बुरी मानी जाती हैं: ये रिस्क लेने के पैमाने (Bar) को बढ़ा देती हैं, जिससे शेयर्स में पैसा लगाना तभी फायदेमंद लगता है जब रिटर्न बहुत ज़्यादा मिले। ### तो फिर बाज़ार गिर क्यों नहीं रहा? लेकिन असल बात तो यह है — ईरान संकट/संघर्ष शुरू होने के बाद से ये ब्याज दरें तेज़ी से बढ़ी हैं, फिर भी S&P 500 लगातार ऊपर चढ़ रहा है। यह कैसे मुमकिन है? जैसा कि हम अक्सर कहते हैं, निवेश करना आख़िरकार एक सीधे-से समीकरण (Equation) पर टिका है: निवेश = हकीकत (Reality) × कहानी (Story) इस पर गौर कीजिए: पिछले 50 सालों में, S&P 500 की कंपनियों की कमाई (Earnings) हर साल औसतन 6.5% से 7.0% की दर से बढ़ी है। लेकिन इस साल की पहली छमाही में यह आंकड़ा काफी ज़्यादा रहा: सिलसिलेवार ढंग से 29% और 52%। सीधा सा सच यह है: S&P 500 की कंपनियां आज से पहले कभी इतनी मुनाफे में नहीं रहीं, और उम्मीद है कि यह सिलसिला अभी कुछ समय तक जारी रहेगा। तो क्या इसका मतलब यह है कि आपको आंख बंद करके इस बाज़ार में पैसा लगा देना चाहिए? बिल्कुल नहीं। उदाहरण के लिए, कंपनियों का यह बड़ा मुनाफा एक चीज़ को छुपा सकता है — डेटा सेंटर्स के निर्माण में हो रहे भारी खर्च की वजह से कंपनियों का कैश फ्लो (Cash Flow) कम हो रहा है। अगर ये निवेश सफल नहीं रहे, तो नुकसान भारी पड़ सकता है। --- > **डिस्क्लेमर:* यह पोस्ट किसी भी तरह की निवेश सलाह (Investment Advice) नहीं है। #forexproguru

अस्यां पावन-नवरात्रि-पर्वण्यां भवतः जीवनं सुखमयं समृद्धिमयं च भवतु। 🙏

We are halfway now,need more support,vote now guys fast and I will give you clarity about this.

Voting numbers is not up to the mark, and needs a minimum of 200 votes for the session. Let's cross this nu,vote now...

I'm planning to take a session on this poll, so guys plz vote.

What type of problem do you face with your Broker??
Anonymous voting

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं।नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥ 🙏

Middle East की सारी लड़ाई इस्लामिक दुनिया का खैरख्वाह बनने की है..... एक तरफ सऊदी अरब है... जहाँ इस्लाम के Holiest स्थान हैं.. मक्का और मदीना... और सऊदी अपने आपको सुन्नियों का नेता मानता है... वहीं इरान अपने आपको शियाओं का सबसे बड़ा नेता या कहिये एकमात्र आवाज समझता है. Middle East में आज जो भी हो रहा है... या कहिये कि इतने दशको से जो भी चल रहा है.. उसके पीछे मूल कारण इन दोनों देशों का टकराव ही है..... लट्ठ तो इन्ही में बजते हैं... वो तो अमेरिका, यूरोप और रूस वाले तो बिल्लियों की लड़ाई में मलाई हड़पने के लिए आ जाते हैं. अब यूं तो सऊदी अरब हर मामले में इरान से कोसों आगे है..... पैसा, power, हथियार, जीडीपी, Per Capita Income..... जो parameter उठाइये... सऊदी अरब हर मामले में इरान से कहीं आगे है. लेकिन एक parameter है... जहाँ इरान सऊदी अरब से Light Years आगे है.... और वो है.. हिम्मत. अब आप कहेंगे कि ये क्या बात हुई... इसमें हिम्मत कहाँ से आ गई... और उससे होता भी क्या है? एक कहावत है.... कि हथियारों से कहीं ज्यादा जरूरी होता है उन्हें चलाने वाला.... वही Decider होता है.... वही जीत और हार का अंतर तय करता है. एक तरफ सऊदी अरब है....जिसकी सबसे बड़ी ताकत “एक हथियार” नहीं बल्कि पूरा integrated system है: सऊदी अरब की सेनायें हथियारों के मामले में दुनिया की सबसे Advanced सेनाओं में से एक है.... पिछले साल ही सऊदी ने 83 बिलियन डॉलर खर्च किये हैं हथियार खरीदने में. F-15 और Eurofighter जैसे आधुनिक Fighter जेट्स+ AWACS + Tankers + Patriot + THAAD + Radar/ISR....यह सब मिल कर सऊदी अरब की सेनाओं की क्षमता को अलग ही लेवल पर ले जाते हैं. सऊदी अरब के पास मध्य-पूर्व की सबसे आधुनिक air-power और air/missile-defence capabilities में से एक है.. या कह सकते हैं कि पूरे middle east, अरब, अफ्रीका, और कुछ मामलों में यूरोप के कई देशों से सऊदी अरब की सेनायें कहीं ज्यादा advanced हैं. लेकिन वही बात है.... हथियार तो हैं... लेकिन उन्हें चलाने का गूदा नहीं है. इस साल इरान ने सऊदी अरब पर 38 मिसाइल्स और 435 Drones फायर किये..... जिनमे से काफी हवा में मार दिए गए... और अच्छी खासी संख्या में Target पर भी गिरे. बदले में सऊदी अरब ने जानते हैं इरान पर कितने मिसाइल और ड्रोन फायर किये? अंदाजा लगाइये. शून्य. सऊदी अरब की हिम्मत नहीं हुई इरान के Airspace को breach तक करने की... और यह हालात तब हैं... जब इरान की एयरफोर्स और सेना तो अमेरिका ने तबाह कर दी है. सऊदी अरब ने कुछ अटैक इराक में किये.. कुछ यमन में किये.... इरान समर्थित आतंकियों पर.... लेकिन इरान से सीधा लड़ने की हिम्मत सऊदी में आज भी नहीं. सऊदी अरब ने हथियार ले लिए अमेरिका और यूरोप से.... और लड़ने के लिए सैनिक ले रखे हैं पाकिस्तान से...... लेकिन खुद में दम नहीं..... सऊदी अरब की सेना कितनी ही आधुनिक हों.. उनके पास Battle Experience बिलकुल नहीं... इसलिए वह इरान से सीधी लड़ाई से डरते हैं. ऐसे ही हालात हमारे एक पडोसी के भी हैं.... Advanced हथियार भर भर के हैं.... लेकिन Battle एक्सपीरियंस शून्य है. नाम तो पता होगा ही आपको उस देश का 😁😁 #geopolitics #forexproguru

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🇷🇺 Russia approves Bitcoin, Ethereum and USDT for public trading on exchanges.

🤝 Happy Friendship Day

कल रात जापान और South Korea की सरकारों ने ऐसा कदम उठाया, जो बहुत कम देखने को मिलता है। हुआ ये कि Japan की currency yen 40 साल के सबसे कमज़ोर स्तर पर पहुँच गई। 1 डॉलर के बदले 163 yen मिल रहे थे। वहीं South Korea की currency won भी 17 साल के सबसे कमज़ोर स्तर पर पहुँच गई। 1 डॉलर के बदले 1,561 won मिल रहे थे। जब दोनों देशों की currencies लगातार गिरने लगीं, तो Japan और South Korea ने लगभग एक ही समय पर बाज़ार में डॉलर बेचना शुरू कर दिया, ताकि अपनी currencies को सहारा मिल सके। Reuters के मुताबिक, अमेरिका ने भी शायद इसमें मदद की। यानी तीनों देशों ने मिलकर बाज़ार को संभालने की कोशिश की। अब इसमें खास बात क्या है? Japan और South Korea के रिश्ते हमेशा से अच्छे नहीं रहे हैं। दोनों देशों के बीच पुराने राजनीतिक और ऐतिहासिक विवाद हैं। इसलिए इनका एक साथ मिलकर currency बचाने के लिए कदम उठाना बहुत बड़ी बात मानी जा रही है। इसका असर भी तुरंत दिखा। कुछ ही देर में yen 163 से मज़बूत होकर करीब 157 तक आ गया और won भी लगभग 2% मज़बूत हो गया। लेकिन अगले ही दिन बाज़ार ने फिर दबाव बनाया और yen दोबारा 160 के पार चला गया। अब सवाल है कि Japan की currency इतनी कमज़ोर क्यों हो रही है? Japan अपनी ज़रूरत की लगभग 87% energy बाहर से खरीदता है। उसमें भी सबसे बड़ा हिस्सा तेल का है। Iran-US युद्ध के दौरान जब कच्चे तेल की कीमत 103 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई, तो Japan को तेल खरीदने के लिए पहले से कहीं ज़्यादा डॉलर खर्च करने पड़े। जितने ज़्यादा डॉलर बाहर गए, yen उतना ही कमज़ोर होता गया। और yen जितना कमज़ोर हुआ, बाहर से सामान खरीदना उतना ही महँगा हो गया। यानी Japan एक ऐसे चक्र में फँस गया, जिससे निकलना आसान नहीं है। South Korea की परेशानी भी कुछ ऐसी ही है। उसकी सबसे बड़ी ताकत semiconductor export है। लेकिन China ने rare earth minerals और Indium की सप्लाई पर सख़्ती कर दी। इससे Samsung और SK Hynix जैसी कंपनियों की supply chain पर दबाव बढ़ गया। Investors घबरा गए, won गिरने लगा और South Korea का शेयर बाज़ार भी दबाव में आ गया। कुछ दिन पहले SK Hynix ने America में 26.5 billion डॉलर का ADR issue किया था। उस पैसे का कुछ हिस्सा won में बदला गया, जिससे currency को थोड़ी राहत मिली। लेकिन जैसे ही उसका असर खत्म हुआ, won फिर दबाव में आ गया। इसलिए South Korea के केंद्रीय बैंक को बाज़ार में उतरना पड़ा। उधर Japan भी लगातार अपनी currency बचाने में अरबों डॉलर खर्च कर रहा है। इस साल April-May में उसने करीब 73 अरब डॉलर बाज़ार में झोंक दिए। फिर 11 July को 20.7 अरब डॉलर बेचे और अब 31 July को फिर बड़ा intervention करना पड़ा। Bank of Japan ने ब्याज दर नहीं बढ़ाई, क्योंकि अगर वह ऐसा करता है तो पूरी दुनिया के bond market पर असर पड़ सकता है। इसलिए उसने डॉलर बेचकर yen को संभालने की कोशिश की। लेकिन अब सवाल यही है कि बिना ब्याज दर बढ़ाए वह अपनी currency को कितने दिन तक बचा पाएगा। सबसे बड़ी बात यह है कि जब Japan और South Korea की currencies कमज़ोर होती हैं, तो China को फायदा मिलता है। क्योंकि दोनों देशों को rare earth जैसे ज़रूरी minerals के लिए China पर निर्भर रहना पड़ता है। ऊपर से उनकी अपनी currencies भी कमज़ोर हैं, इसलिए China की पकड़ और मज़बूत हो जाती है। @forexproguru

🇰🇷🇺🇸 South Korea sells US dollars in rare market intervention to strengthen the won.

🇯🇵 Japan sells US dollars and buys yen in massive currency intervention after yen falls to 40-year low.

"सस्नेहं गुरुपूर्णिमा-शुभाशयाः"🙏

16 वर्षों तक आमरण अनशन रखने वाली मणिपुर की इरोम शर्मिला के साथ क्या हुआ? इरोम शर्मीला ने मणिपुर में 16 साल लगातार यानी 2000 स
16 वर्षों तक आमरण अनशन रखने वाली मणिपुर की इरोम शर्मिला के साथ क्या हुआ? इरोम शर्मीला ने मणिपुर में 16 साल लगातार यानी 2000 से 2016 तक आमरण अनशन किया. अन्न का एक दाना नहीं खाया. सरकार नाक में नली डालकर दूध और पोषक तत्व देकर उनको जिंदा रखती रही. फिर इरोम ने अपने मुद्दे पर विधानसभा चुनाव लड़ा. लेकिन उनको सिर्फ नब्बे (90) वोट मिले, वह सीट कांग्रेस ने जीत ली. इरोम ने फिर राजनीति छोड़ दी. शादी कर ली. अब उनका एक सुंदर सा परिवार है, जिसमें दो बच्चे भी हैं. अब वे खुश हैं. इरोम के अनशन के दौरान ज्यादातर समय कांग्रेस सत्ता में रही. बीजेपी भी आई. पर राष्ट्र ने इस बात को नहीं माना कि अनशन करने के कारण देश का कानून बदल दिया जाए. इसके लिए तो सरकार बनानी पड़ती है. यही तो लोकतंत्र है इसी लिए इराम ने चुनाव लड़ा. फिर उनको पता चला कि इस मुद्दे पर जनता उनके साथ नहीं है. वे एक चुनावी रैली भी नहीं कर पाईं, जिसमें 100 लोग भी आए हों पिछले 25 साल में 4 अलग अलग सरकारों के साथ काम करने के अनुभव के आधार पर मेरा आकलन है कि 100 में 99 आंदोलन इसलिए सफल नहीं हो पाते क्योंकि सरकार उसका दमन नहीं करती दमन करना भी नहीं चाहिए.