UPSC with Arvind Kumar
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भारतीय मूल की कारोबारी इंदिरा नूयी ने भारत और चीन की तुलना करते हुए कई ऐसे बयान दिए हैं, जिन पर बहस छिड़ सकती है. अमेरिका की मेरिट आधारित व्यवस्था की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि अगर वह भारत में ही रहतीं तो शायद किसी बड़ी कंपनी की CEO नहीं बन पातीं. वहीं, चीन को उन्होंने भारत के मुकाबले ज्यादा व्यवस्थित और सुविधाजनक देश बताया. पेप्सिको की पूर्व CEO इंदिरा नूयी ने कहा कि अमेरिका की योग्यता आधारित व्यवस्था ने उन्हें वह मुकाम दिलाया, जो भारत में शायद संभव नहीं था. उन्होंने कहा, 'एक अप्रवासी खाली हाथ अमेरिका आता है और एक प्रतिष्ठित अमेरिकी कंपनी का CEO बन जाता है. ऐसा दुनिया के किसी और देश में नहीं हो सकता. मैं भारत में रहती तो कभी CEO नहीं बन पाती.'
#Pepsico #INDIA #CHINA #IndiraNooyi #LatestUpdates
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1930 के दशक में इतिहासकार बृजेन्द्रनाथ बनर्जी ने राष्ट्रीय पुस्तकालय में शोध के दौरान ‘उदन्त मार्तण्ड’ की प्रतियां खोजीं। उनके शोध से यह सिद्ध हुआ कि हिंदी पत्रकारिता का वास्तविक प्रारंभ 1826 में ही हो गया था। इससे पहले उपलब्ध अधिकांश इतिहास में इस अखबार का उल्लेख तक नहीं था।
बनर्जी ने अपनी पुस्तक The Making of Modern India तथा अन्य लेखों में इस समाचार पत्र का विस्तृत वर्णन किया और इसे हिंदी पत्रकारिता का वास्तविक प्रारंभ बताया।
क्यों बंद हो गया?
‘उदन्त मार्तण्ड’ साप्ताहिक समाचार पत्र था। इसकी सबसे बड़ी समस्या आर्थिक थी। उस समय हिंदी पढ़ने वाले लोग उत्तर भारत में थे, जबकि अखबार कलकत्ता से निकलता था। डाक खर्च बहुत अधिक था और सरकार ने कोई रियायत नहीं दी।
अखबार की कीमत मात्र दो रुपये मासिक रखी गई थी, जबकि वास्तविक लागत उससे कहीं अधिक थी। पर्याप्त ग्राहक नहीं मिले और सरकारी सहायता भी नहीं मिली। परिणामस्वरूप लगभग डेढ़ वर्ष बाद 4 दिसंबर 1827 को इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा।
अपने अंतिम संपादकीय में जुगल किशोर शुक्ल ने अत्यंत भावुक शब्दों में लिखा कि अब यह सूर्य अस्त हो रहा है क्योंकि उसे जीवित रखने के लिए पर्याप्त सहयोग नहीं मिला।
‘उदन्त मार्तण्ड’ का अर्थ
‘
उदन्त’ का अर्थ है समाचार और ‘मार्तण्ड’ का अर्थ है सूर्य। अर्थात “समाचारों का सूर्य” या “समाचारों का उदयमान सूर्य”।समाचार पत्र का उद्देश्य लोगों तक उनकी अपनी भाषा में समाचार पहुँचाना था। पहले अधिकांश समाचार अंग्रेज़ी, फ़ारसी या बंगला में उपलब्ध होते थे। जुगल किशोर शुक्ल चाहते थे कि हिंदी भाषी समाज भी अपनी भाषा में दुनिया की जानकारी प्राप्त कर सके। अखबार का आदर्श वाक्य इसके पहले अंक में संस्कृत का एक श्लोक प्रकाशित हुआ था, जिसका भावार्थ था— “जिस प्रकार सूर्य अंधकार को दूर कर संसार को प्रकाश देता है, उसी प्रकार यह समाचार पत्र अज्ञान को दूर कर लोगों तक ज्ञान और समाचार पहुँचाएगा।” महत्वपूर्ण तथ्य * पहला अंक: 30 मई 1826 * स्थान: कलकत्ता * संस्थापक एवं संपादक: पंडित जुगल किशोर शुक्ल * मुद्रक: मुन्नू ठाकुर * भाषा: हिंदी * आवृत्ति: साप्ताहिक * मासिक मूल्य: 2 रुपये * अंतिम अंक: 4 दिसंबर 1827 अवध और प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध लेख में यह भी उल्लेख है कि ‘उदन्त मार्तण्ड’ केवल सामान्य समाचार ही नहीं देता था, बल्कि प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं की रिपोर्ट भी प्रकाशित करता था। अवध के नवाब, अंग्रेज़ी शासन और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का विवरण भी इसमें मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय भी हिंदी पत्रकारिता राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर नज़र रख रही थी। हिंदी पत्रकारिता की अमूल्य विरासत ‘उदन्त मार्तण्ड’ का जीवन भले ही केवल लगभग 18 महीने का रहा हो, लेकिन उसने हिंदी पत्रकारिता की नींव रख दी। आज जब हिंदी मीडिया करोड़ों पाठकों तक पहुँच रहा है, तब यह याद रखना आवश्यक है कि इसकी शुरुआत एक ऐसे व्यक्ति के सपने से हुई थी जिसने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद अपनी भाषा में पत्रकारिता करने का साहस दिखाया। दो सौ वर्ष बाद भी ‘उदन्त मार्तण्ड’ केवल एक समाचार पत्र नहीं, बल्कि हिंदी पत्रकारिता की जन्मगाथा और उसकी सबसे मूल्यवान विरासत है
हिंदी के प्रथम अख़बार पर अंग्रेज़ी में यह बेहतरीन लेख
हिंदी पत्रकारिता का उदयमान सूर्य: ‘उदन्त मार्तण्ड’
एक वकील के सपने से लेकर 1930 के दशक में एक इतिहासकार की खोज तक, ‘उदन्त मार्तण्ड’ की कहानी भारतीय पत्रकारिता के दो सौ वर्षों के इतिहास को समेटे हुए है।
साल 2026 हिंदी के पहले समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ के 200 वर्ष पूरे होने का वर्ष है। इसका प्रकाशन 30 मई 1826 को कलकत्ता (अब कोलकाता) से हुआ था। इसके संस्थापक और संपादक कानपुर निवासी पंडित जुगल किशोर शुक्ल थे, जो पेशे से वकील थे।
लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि हिंदी का पहला समाचार पत्र ‘बनारस अखबार’ (1845) था। लेकिन बाद में शोध से स्पष्ट हुआ कि उससे लगभग उन्नीस वर्ष पहले ही ‘उदन्त मार्तण्ड’ प्रकाशित हो चुका था। यह खोज हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को नया आयाम देने वाली साबित हुई।
इतिहास की धूल में दबा पहला अखबार
