धर्मसम्राट श्री करपात्री जी महाराज🚩
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Repost from श्रीमद आद्य शंकराचार्य परम्परा के दिव्य संदेश 🚩
ब्रह्मानंद_सरस्वती_जी_महाभाग_के_१०८_उपदेश.pdf3.20 MB
आए,कदाचित धर्म के शोधन, राजशोधन, व्यासपीठ शोधन, मठ शोधन, और मुलसिद्धान्त शोधन की प्रक्रिया आप से ही शुरू होगी। सत्य स्वयं ईश्वर स्वरूप है सत्य ही ईश्वर है, सत्य और धर्म के पक्ष में रहे न कि व्यक्तिगत या संस्थागत पक्ष में।
*भगवान सनातन धर्म के समष्टि शोधन का मार्ग प्रशस्त करें ऐसी प्रार्थना के साथ त्रिवेदी जी का सर्व को अभिवादन।*
सर्वेशां स्वस्तिर्भवतु ।
सर्वेशां शान्तिर्भवतु ।
सर्वेशां पुर्णंभवतु ।
सर्वेशां मङ्गलंभवतु ।
(यह मूल आर्टिकल है,इनकी विकृति या दुरुपयोग की मैं जिम्मेदारी नहीं लेता मूल आर्टिकल मेरे स्वयं के पृष्ठ पर है जो लिंक मैंने दी हुई है।)
https://www.facebook.com/HrtSpeaks
अभी और भी शोध जारी है, आगे और भी चीज प्रकाशित होगी तो निर्भयता से सत्य का पक्ष जरूर पड़ने पर इसी विषय पर एक और आर्टिकल बनाकर सत्य और धर्म का पक्ष रखा जाएगा।
श्रीमन्नारायण 💐
पं.हिरेनभाई त्रिवेदी, क्षेत्रज्ञ
श्रीवैदिकब्राह्मणः 🚩 गुजरात
परमधर्मसंसद१००८
#नकली_धर्मप्रचारकों_का_भंडाफोड़
आपको जिन शांकर मठो के प्रचारकों पर विश्वास है या अन्य जो संप्रदाय है उनके प्रचारकों पर विश्वास है ! वो प्रचारक स्वयं शांकर सिद्धांत भी या जो सो मत के सिद्धांत को जानते है?
अभी हम जैसे "उदाहरण के तौर" पर शंकराचार्य मठों के प्रचारको का ही करें तो,आपने कभी उनके साथ सैद्धांतिक बात की है?क्या वे लोग सामान्य शांकर सिद्धांत या सामान्य शास्त्रीय सिद्धांत को भी जानते है?
आप जनसामान्य उन लोगों का बड़ा ग्रुप दबदबा देखकर चकाचौंध देखकर जुड़ तो जाते बाद में आप भी उन लोगों जैसे *सिद्धांतविहीन* बन जाते है। आप किसी भी ५ प्रचारकों को यादृच्छिक रूप से पकड़िए और उन्हें सामान्य वैदिक धर्मसिद्धांत,शंकर परम्परा के सिद्धांत और शंकराचार्य मठों का संविधान पूछिए यह लोग वास्तव में कुछ नहीं जानते, इनको केवल जो सो सम्प्रदाय में जो अमुक लाभ पाने हेतु पहले सीनियर जुड़े होते है उनकी आज्ञा का पालन करना होता है,आप भावुक होकर हिन्दू धर्म को बचाने के लिए शीर्ष आचार्य का मुख देखकर जुड़ते है वो आपको मूर्ख समझते है एक और मुफ़्त का प्रचारक जुड़ गया। फ़िर आप जैसे सामान्य लोगों की भावनाओं का लाभ उठाकर यह मठ के गुट में भी रहते है और अपना विशेष गुट भी बनाते है ताकि स्वयं को मठ प्रशासन के सामने प्रतिभाशाली साबित किया जाए।
बड़े बड़े प्रकल्प चलाकर अन्य के प्रति अपनी मर्यादा का उल्लंघन एवं सम्प्रदाय के संविधान का अतिक्रमण ही इन लोगों का आशय है। पुनः इन लोगों को न कोई गुरु से लेना देना है न कोई सम्प्रदाय से न धर्म से न शास्त्र से न किसी भी प्रकार हिन्दुधर्म के सिद्धांत से, केवल आर्थिक उपार्जन के लिए मठ से लिंक बनाई हुई होती है, ताकि *मठ या संस्था के नेटवर्क* के दम पर उनके धंधे का भी प्रचार हो।यह लोग अपना धंधा चलाने के लिए मठ के नेटवर्क में सेंध करते है, और अपने निजीस्वार्थवश मठ के नेटवर्क का अपने लाभ के लिए उपयोग करते है, वास्तव में इन लोगों को शंकर सिद्धांत के साथ कोई लेनादेना नहीं होता केवल अपने स्वार्थवश अपने आप को मठ से जुड़ा या मठ का प्रचारक बताकर आपको उनके बिज़नेस की भी स्किम दे देतें है। यहीं आजकल न केवल शंकर सम्प्रदाय तमाम सम्प्रदाय तथा धार्मिक संस्थाओं में चलता है।
आगे सुनिए, इनके गुरुओं के आपके घर पदार्पण के भाव यह सुनिश्चित करते है(गुरु नहीं) जहां कम से कम एक लाख से लेकर पांच लाख तक कथित दक्षिणा के तौर पर मांगे जाते है।
मठ में रह रहे, शीर्ष आचार्य निःसंदेह ही विद्वान होते है किन्तु उनके अलावा कोई भी पांच - सात यादृच्छिक रूप से ब्रह्मचारी या भगवावस्त्र पहने व्यक्ति को पकड़िए उनको सामान्य हिन्दू शास्त्रीय सिद्धांत पूछिए,उनके मूल सम्प्रदाय के संविधान के सिद्धांत पूछिए उनकी ही गुरु परम्परा के १० पूर्व आचार्यो का नाम पूछिए। आपको स्वयं को पता चल जाएगा कि यह कितने योग्य है।
मठ या संस्थाओं के अंदर क्या चल रहा है, वहां शास्त्रीय नियमो का पालन हो रहा है कि नहीं? शीर्ष आचार्य के साथ घूमते तमाम लोग उनके साथ रहकर भी ज्ञान युक्त है कि नहीं? *वह लोग जातिय एवं आचार के परीक्षण से ब्रह्मचारीत्व या सन्यासी बनने के लायक भी है या नहीं।*
कुछ तो अपनी तमाम मर्यादाओं का उल्लंघन कर चुके है। जो पटल पर ला भी नहीं सकते।
इनसे सामान्य जुड़े लोगों या अनुयायियों के साथ कदाचित कोई जिम्मेदार व्यक्ति के द्वारा गलत भी होता है तो भी वो बेचारे बंध मुह सह लेते है। मठ के आंतरिक लोग में भावना हो न हो बाहर से जो जुड़े है वो लोकलज्जा और मठ की मर्यादा, मान बने रहे ऐसी भावना से मौन का सेवन करते है।
अन्य सम्प्रदाय मैं जैसे बोला यही एक जैसा ही पैटर्न है। विदेशों में धनलालसा से मंदिर बनाए जाते है, अपनी अमर्यादित भक्तो की संख्या के कारण राजनीति दलों के भी यह लोग अनुगमन करते है की आपके जो सो संस्था या सम्प्रदाय के इतने अनुयायी है आपको हमारी सरकार से यह वो लाभ मिलेंगे ऐसा कर वोट बटोरे जाते है।
ऐसे भी बहुत यानी बहुत सारे पहलू है जो सार्वजनिक तौर पर नहीं बोले जाते जिनके अनुभव में आया वे स्वयं ही जानते है। किंतु लोकलज्जा से भी वो मौन रहते है।
*हिन्दू धर्म को बचाना है तो आवाज़ उठाइए और जहां शास्त्र विरुद्ध का कृत्य या आप के साथ निजी तौर पर ऐसी घटना हुई तो सार्वजनिक करिए ताकि और भी जनसामान्य लोग यह जाल से बचे।*
अब आपको क्या करना है। आचार्य चाणक्य का वचन है,वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः।
यह मत भूलिए परम्परा,सम्प्रदाय,धार्मिक संस्थाओं आदि के समकक्ष कुलीन ब्राह्मण की गृहस्थ परम्परा है, और सन्यासी आपके दूसरे क्रम के गुरु है,पहले क्रम के गुरु हम सब कुलीन गृहस्थ ब्राह्मण है यही शास्त्र सिद्धांत है। यही #निर्णय है। केवल योग्य गृहस्थ ब्राह्मण गुरु के अभाव में ही अन्य परम्परा का आलंबन ले सकते है तब तक आपके प्रथम गुरु गृहस्थ ब्राह्मण है। चुप न रहें बोले आपके साथ अगर कोई छल हुआ है तो सामने
*अनंत श्री विभूषित शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी का संक्षिप्त परिचय और अतुलनीय योगदान*
*महाराज श्री के ९९ वर्धापन दिवस की बधाई हो समस्त सनातनी धर्मानुरागी हिन्दू जनता जनार्दन को*
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हर हर महादेव
आपकी सनातन संस्कृति के साथ किस प्रकार का घृणित षडयंत्र रचा जा रहा है आप सब स्वयं विचार करें...
जानिए...आखिर क्यों नकली शंकराचार्य खड़े करने का प्रपंच रचा जाता है
🚩🚩🚩 धर्म vs. अधर्म 🚩🚩🚩
शंकरचार्य vs. आरएसएस - संघ - विहिप
1987-88 में एक बार चारों शंकराचार्यों को विश्व हिन्दू परिषद द्वारा निमन्त्रण दिया गया अपनी एक धर्म सभा हेतु जो कि विहिप द्वारा आयोजित एक धर्म मंच था ... वाराणसी या प्रयाग में ।
चारों शंकराचार्यों को दूरभाष द्वारा सूचित किया गया सबने सहमति दे दी ... परन्तु जब प्रिंटेड निमन्त्रण पत्र पहुंचा तो सभी शंकराचार्यों को अपमानित महसूस हुआ।
कारण था उस धर्म मंच का मुख्य वक्ता बनाया गया दलाई लामा को जिसके बारे में शंकरचार्यो को अवगत नही करवाया गया, कि वामपंथी बौद्ध मत के दलाई लामा के मंच की अध्यक्षता करने के बारे में ।
वह दलाई लामा जो बौद्धों के वामपंथी पन्थ का प्रमुख है दक्षिणपंथ का भी नही ।
और वह बौद्ध मत जिसको समाप्त करने में आदिगुरु शंकराचार्य जी ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया, जिन्होंने सनातम धर्म को बड़ी बड़ी हानियाँ पहुंचाई थीं।
ततपश्चात सभी शंकराचार्यों ने आपस में वार्तालाप कर आपसी सहमति से विहिप के धर्म-मंच में न जाने का निर्णय लिया ।
कोई भी शंकराचार्य नही गए और सबने boycott कर दिया ।
RSS-VHP ने इज्जत बचाने हेतु चार नकली शंकराचार्यों को मंच पर बिठा लिया ।
और फिर आरएसएस ने आरम्भ किया नकली शंकरचार्यो की फौज बनाने का काम जिसके तहत अब तक कोई 450 से अधिक नकली शंकराचार्य खड़े किये जा चुके हैं।
आप स्वयं विचार करें...
इस्लामी आक्रांताओं ने कभी प्रत्यक्ष रूप से शंकराचार्य परम्परा के साथ टकराव नही किया जबकि नागा अखाड़े हिन्दू राजाओं की और से युद्धों में भाग लेते थे तब भी ।
अंग्रेजों ने स्वयम् कभी शंकराचार्य परम्परा से छेड़छाड़ नहीं की ।
परन्तु अपनी दूकान का एकछत्र राज स्थापित करने हेतु ...आज संघ द्वारा स्थापित देश में लगभग 450 से अधिक नकली स्वयंभू शंकराचार्य हैं ।
आश्चर्य तो तब होता है जब संघ का एक सठियाया बुजुर्ग साईं बाबा प्रकरण में शंकराचार्य को धर्म के विषयों में हस्तक्षेप न करने का बयान दे डालता है, अरे भाई धर्म प्रदत्त विषयों के सन्दर्भ में शंकरचार्यो द्वारा नही बोला जाएगा तो क्या पोप आकर बोलेगा?
स्वयं वाजपेयी जी एक नकली शंकराचार्य को अमेरिका लेकर जाते हैं और उसका पुरी पीठ के शंकराचार्य के रूप में परिचय करवाते हैं सबसे ...जबकि उसी यात्रा की एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में एक पत्रकार ने पूछ लिया था कि पुरी पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद तो इस समय भारत में ही हैं ।
वहीं एक दण्डी स्वामी को विदेश यात्रा सदैव निषेध रहती हैं।
ऐसे कई नकली शंकरचार्य हैं जो विदेश यात्रा करते हैं, व्यापारिक प्रतिष्ठान आदि चला रहे हैं।
जुलाई 2014 में पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती जी दिल्ली पधारे, मोहन भागवत उनसे मिलने पहुंचे, स्थान था धर्मसंघ कार्यालय, शंकरचार्य मार्ग, सिविल लाइन्स, दिल्ली।
स्वामिश्री: निश्चलानंद सरस्वती जी ने स्पष्ट कहा कि आपने हमारे सामने 50 नकली शङ्कराचार्य खड़े किये हैं... यदि हमने 4 मोहन भागवत खड़े कर दिए तो संघ नही चला पाओगे ।
यह है हिंदुत्व ??
शासन तंत्र द्वारा जब कुंभ मेलों का आयोजन होता है तो सबसे अधिक दुर्व्यवहार और अपमानित करने वाले प्रपन्च शंकरचार्यो के विरुद्ध ही प्रायोजित होते हैं।
उज्जैन सिंहस्थ कुंभ में पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती जी को व्हीचेयर हेतु दो घन्टे रेलवे स्टेशन पर प्रतीक्षा करवाई गई, जबकि यह तब हुआ जब इस मांग के हेतु पूर्व सूचना लिखित में दे दी गई थी।
शंकरचार्य श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी के विरुद्ध वासुदेवानन्द सरस्वती जो संघ द्वारा ही समर्थन किया जाता है।
संघ, और विहिप ने अपनी विविध योजनाओं हेतु शंकराचार्य परम्परा के अधीन अखाड़ा परम्परा के पीठाधीश्वरों, अखाड़ा प्रमुखों, महामंडलेश्वरों को भी धीरे धीरे पद, धन और अन्य प्रपंचो से ब्लैकमेल करके अपने पाले में कर लिया है...
किसलिए... केवल शंकरचार्यो को शक्तिहीन करने हेतु ।
उनकी और से कोई बोलेगा ही नही।
अब चाहे काशी के मंदिर टूट रहे हों या कोई भी धर्म विरुद्ध कार्य हो रहा हो, राजनैतिक दलों ने जिन सन्तो, महामण्डलेश्वरों को अपने पाले में किया है उनके मुंह मे तो दही जमा दी गई है।
वह कुछ नही बोलेंगे।
इसके विपरीत राजनैतिक दलों के सन्त और महामण्डलेश्वरों द्वारा काशी के मंदिरों के विध्वंस को भी जायज ठहराया जाता है।
रावण दहन को प्रतिबन्ध करने की मांग अधोक्षजानन्द द्वारा होती है।
साईं बाबा का समर्थन वासुदेवानन्द, ओंकारानंद आदि द्वारा किया जाता है।
श्रीमदभगवद्गीता के श्लोकों को मनमाने ढंग से अड़गड़ानंद द्वारा प्रकाशित किया जाता है।
नकली शंकरचार्यो को अपने कार्यो में बुलाकर उन्हें शंकराचार्य कहलवाकर पुजवाया जाता है।
नकली शंकरचार्यों के कार्यक्रमो में संघ के प्रचारक, संघ प्रमुख आदि जाकर अपना समर्थन देते हैं।
नारायण,
आज के इस trend महोत्सव में सक्रियतापूर्वक सहभागिता हेतु आप सभी महानुभावों का कोटि कोटि धन्यवाद।
शिवस्वरूप पूज्य धर्मसम्राट् जी जहाँ भी दिव्य लोक में है पूर्ण अह्लादित हो हमे आशीर्वाद दे रहे होंगे ऐसी हृदय-स्फुरणा है ।
अंततः *हर हर महादेव* के जयघोष के साथ इस महोत्सव का विसर्जन करेंगे, पुनः सभी को धन्यवाद व आभार 💐
हर हर महादेव 🚩
#माता_शबरी_ब्राह्मणी_थी सप्रमाण सम्पूर्ण विवेचन
सोर्स : रामायण मीमांसा - धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज
*. 🌞 राष्ट्रोत्कर्ष दिवस* 🌞
धर्मप्रेमी सज्जनों जैसा कि आप सभी को विदित है, आशाढ़ कृष्ण त्रयोदशी को *सर्वोच्च धर्मगुरु श्रीमज्जगद्गुरु पुरी शंकराचार्य जी महाभाग के प्राकट्योत्सव दिवस को "राष्ट्रोत्कर्ष दिवस" के रूप में मनाया जाता है।* कल इसी उपलक्ष्य में ट्विटर पर सभी सनातनियों द्वारा निम्न ट्विटर ट्रेन्ड का आयोजन किया जा रहा है, अतः आप सभी का सहयोग अपेक्षित है।
🌐 *Trend* सम्बन्धित जानकारी :-
हैशटैग :- *#rashtrotkarshdivas*
*#राष्ट्रोत्कर्ष_दिवस*
दिनाँक :- कल *26 जून, 2022*
समय :- प्रातः *10:00 (AM)*
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श्रीमन्नारायण 💐
जय श्री गणेश🚩
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#हम_स्वामी_जी_के_साथ_हैं
#ज्ञानवापी
हिंदू ओर उसका आधार ३३
पूज्य स्वामिश्री करपात्री जी।
प्रामाण्य-विचार।
पोस्ट ३३
उसीका उल्लेख:-
सर्वभुतेषुचात्मानं सर्वभूतानिचात्मनि।
सम्पश्यंन्नात्मयाजी स्वाराजमधिगच्छति।। (म०१२/९१)
समं सर्वभूतेषु तिष्ठन्तं परनेश्वरम्।
विनश्यत्स्व विनश्यन्तँ यः पश्यति स पश्यति ।।
एको देवः सर्वभूतेषूगूढ: सर्वव्यापि सर्वभूतान्तरात्मा।
सर्व भूतों में अधिष्ठान रूप से कारण रूप से आत्मा को और आत्मा में कल्पित या कार्यरुप से सर्वभूतों को देखनेवाला स्वाराज्य स्वप्रकाश ब्रह्मात्म भाव को प्राप्त होता है। विनश्वर विषय समस्त भूतों में जो अविनश्वर सम ब्रह्म को देखता है वही देखता है। एक ही स्वप्रकाश देव सर्व भूतों में निगुढ़ है। वही सर्वव्यापी एवं सर्व भूतों का वास्तविक अंतरात्मा है। यही विविधता के बीच एकता की पहचान है। जीन दर्शनग्रंथों का सार है उन दर्शन-ग्रंथोंका यह सार है उन दर्शन-ग्रन्थों में भी उक्त निष्ठा के साधन रूप में वर्णाश्रम धर्म का परम उपयोग माना गया है। आप कहते हैं कि, अंतरात्मा का यह ज्ञान मनुष्य मात्र के सुख के लिए परिश्रम करने की प्रेरणा से मानव मस्तिष्क को प्रेरित करते हुए भूतल कि प्रत्येक छोटी से छोटी जीवन विशिष्टता को अपनी पूर्ण क्षमता पर्यंत विकास के लिए पूर्ण स्वतंत्र अवसर प्रदान करेगा। (प्रु०९)। पर क्या आप अपने संगठन में भूतल नहीं हिंदुओं के मुख्य प्रदेश भारत में स्रोतस्मार्त धर्मानुष्ठायी वर्णाश्रमियों कि भी कोई विशिष्टता मानते हैं या नहीं, मानते हैं तो उसके पूर्ण क्षमता पर्यंत विकास के लिए क्या प्रेरणा देते हैं? क्या संघ में होने वाला सर्वजातीय सहभोज उसे नष्ट करने के लिए नहीं अपनाया गया है ? क्या वर्णभेद, जातिभेद तथा वेदशास्त्रानुसार जन्मना ब्राह्मण, जन्मना क्षत्रिय, जन्मना वैश्य, के लिए विहित वैदिक विधानों एवं उनकी विशेषताओं पर भी कभी विचार किया है ?
क्रमशः
#हिंदू #धर्म #सनातन #वेद #भारतीय #भारत #शास्त्र
हिंदू ओर उसका आधार
पूज्य स्वामिश्री करपात्री जी ।
प्रामाण्य-विचार |
पोस्ट ३२
वेदांत के परमाचार्य आदि शंकराचार्य वेदांत ज्ञान प्राप्ति के लिए साधन रूप में निर्देश करते हैं:-
'वेदोनित्यमधीयतां तदुदीतँ कर्मस्वनुष्ठियताम्,
तेनेशस्यविधियतांपचिति:।
पापौध: परिधुयतां भवसुखेदोषोनुसन्धियतां,
स्वात्मेच्छा व्यवसियतां.....।'
अर्थात वेदका नित्य अध्ययन करो। वेदोक्त कर्म का वर्णाश्रम अनुसार अनुष्ठान करो। अनुष्ठित कर्मों को भगवान में अर्पण करके भगवान की पूजा करो। काम्यकर्मों का परित्याग करो पापौधोका नाश करके सांसारिक सुखों में दोष का अनुसंधान करो। परमात्म तत्वज्ञान की इच्छा उत्पन्न करो। दार्शनिकों के तत्व ज्ञान के आधार पर संघटन की योजना बनाने पर भी उन्हें अपेक्षित इतर साधनों की उपेक्षा करनेसे वैसे ही विफलता मिलती है, जैसे बहुमूल्य औषधियों का सेवन करने पर भी कुपथ्य परिवर्जन एवं पथ्य परिपालन बिना विफलता मिलती है। हां, यह ठीक है कि, राष्ट्र के भीतर एसी भी जातियां और समूह है, जिनका साक्षात वेदाध्ययन वेदोक्त कर्म में अधिकार नहीं है। अतः सबको साथ रखने के लिए गीत, खेलकूद, ध्वजवंदन आदि का प्रोग्राम होना ठीक है तथापि शास्त्रों एवं मुख्य कर्मों की उपेक्षा एवं तद्विपरित आचरण का प्रोत्साहन तो नहीं ही करना चाहिए। परंतु आपके लेखो, भाषणों, व्यवहारों से होता ऐसा ही है। रामचरितमानस आदि ऐसे भी सद्ग्रंथ है जिनमें सब की प्रवृत्ति करायी जा सकती है ओर सभी को अपनी-अपनी विशेषताओं की रक्षा का प्रोत्साहन भी होना चाहिए। जैसे विविध रंग-बिरंगी पुष्पों की माला में सभी पुष्पों के निजी रंग रूप सौंदर्य सौगंध की विशेषता सुरक्षित रहने में ही माला की शोभा होती है।
उसी तरह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अत्यंज तथा तदितर सभी तत्तद् धर्म ग्रंथ एवं परंपराओं के अनुसार विशेषताओं की रक्षा से ही राष्ट्रीय संस्कृति की रक्षा हो सकती है। 'विविधता के पहचान' (८प्रु०)। यह आपका उद्घृत वचन है। क्या यह वर्ण, जाति एवं राष्ट्र के संबंध में नहीं लागू होना चाहिए ? यह गलती कांग्रेस ने की है। वे मुसलमानों ईसाइयों के धर्म-कर्म संस्कृति में हस्तक्षेप से बहुत डरते हैं। परंतु हिंदुओं के धर्म-कर्मने बेखट हस्तक्षेप करते हैं। यही गलती आप करते हैं। वैधर्म्य विविधता है, साधर्म्य एकता है। पार्थिव विविध पदार्थों में पार्थिवता के सर्वत्र समान होने से वही साधर्म्य है, वही एकता है। घट उदनंज्जन आदि विशेषता विलक्षणता ही उनके वैधर्म्य है। इस तरह विभिन्न वर्गों में उनके धर्म कर्म आदि की विषमता होते हुए भी हिंदुत्व की दृष्टि या भारतीयता की दृष्टि से उनने सामर्थ्य समानता एकता की उपलब्धि की जा सकती है। इसी तरह मानव रूप से सभी राष्ट्रों, जातियों में एकता का अनुभव किया जा सकता है। इतना ही क्यों जीवत्व प्राणित्व रूप से देवता, दानव,मानव, पशुपक्षियों में भी एकता का अनुभव किया जा सकता है, फिर भी उनकी विषमता विशेषता उपेक्षणीय नहीं। अंत में तो चराचर विश्व प्रपंच में एक ही अधिष्ठानभूत अनंत स्वप्रकाश सच्चिदानंद परमेश्वर अनुस्यूत है। उसी एक में विविध विश्व है। विविधविश्व में उसी को अधिष्ठान रूप से पहचाना जा सकता है।
#क्रमशः #हिंदू #सनातन #धर्म #भारतीय #भारत
*संस्कृत एनिमेटेड मूवी देखें और समर्थन करें। अब समय आ गया है अधर्मी हिन्दू विरोधी बॉलीवुड से आगे सोचने का*
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કોઈ તેમની મુલાકાત લે, તેમની સાથે પ્રશ્નોત્તરી કરે, જીવનની વિગતો પૂછે, કોઈ નોંધ કરતું હોય તો તેઓ સાવધાન થઈ જતા. વાત બંધ કરી દેતા. તે વાત અખબારમાં ન આપવા કહેતા. કોઈ પણ વ્યક્તિ કોઈ પણ વિષય પર તેમનો અભિપ્રાય પૂછે તો તેઓ તેનાથી દૂર થઈ જતા. પોતાનાં વખાણ થવા દે નહીં અને અન્યનાં વખાણ પોતે કરતા નહીં. કોઈનો સેવાભાવ કે ભક્તિભાવ કે કર્મઠતા જુએ તો તેના વિશેે સારા શબ્દો વાપરે પણ કોઇની પ્રશંસા કરવાથી પોતાના પર અને બીજા પર માઠી અસર થાય છે તેમ તેઓ માનતા. કોઈનોય વિશેષ પરિચય કરાવતા નહીં અને કોઈનેય વિશેષ સગવડ આપવાની ભલામણ કરતા નહીં.
દિવસે આરામ નહીં. પ્રાતઃકાળથી સાયંકાળ સુધીનો નિત્યક્રમ-ત્રિકાલ સંધ્યા પડે નહીં. તેનો ખ્યાલ રાખતા. ઘરનાં દ્વાર સદા ખુલ્લાં રાખતા. કઠોર દિનચર્યાવાળું જીવન જીવ્યા. પ્રભુની સન્મુખ રહેવામાં દિવસ પસાર કરતા. ખુલ્લી કિતાબ જેવું જીવન જીવ્યા. ખૂબ પુજાયા અને અત્યંત લોકપ્રિય થયા, પરંતુ તેમની વિનમ્રતા અદ્વિતીય રહી. કંચન અને કામિનીથી જીવનભર દૂર રહ્યાં. વિદેશપ્રવાસ પણ તેમને શાસ્ત્ર-ધર્મ વિરુદ્ધ લાગતો. એક વાર બનારસના સંપૂર્ણાનંદ વિશ્વવિદ્યાલય, ગુજરાત યુનિર્વિસટી, સરદાર પટેલ યુનિર્વિસટીના કુલપતિઓ અને સંતો-વિદ્વાનોની વચ્ચે તેમને મહામહોપાધ્યાયની ઉપાધિ આપવામાં આવી ત્યારે તે વખતે તેઓ સંસ્કૃતમાં પ્રતિભાવ આપવાના હતા અને પોતાની અલ્પતા-વિનમ્રતા વ્યક્ત કરવાના હતા, પરંતુ સન્માનથી સંકોચ અનુભવતા લાખો શ્રોતાઓ વચ્ચે માત્ર ગદ્ગદિત જ બન્યા, બોલ્યા જ નહીં. એ જ એમની સાચી વિનમ્રતા હતી. એ જ એમનો સાચુકલો સંકોચ હતો. પૂજ્ય ડોંગરેજી મહારાજની વાણી પણ અમૃતમય હતી. તેઓ કહેતાં: "શ્રીકૃષ્ણનાં દર્શન કરવાથી માનવજન્મ સફળ થાય છે. પરમાત્માએ માનવીને જ એવી શક્તિ આપી છે, એવી બુદ્ધિ આપી છે કે માનવી તેનો સદુપયોગ કરે, ભગવાન માટે કરે તો મૃત્યુ પહેલાં એને પરમાત્માનાં દર્શન થાય છે. ઘણાં લોકો બુદ્ધિનો ઉપયોગ પૈસા માટે અને શક્તિનો ઉપયોગ ભોગ માટે કરે છે. તેથી અંતકાળમાં તે બહુ જ પસ્તાય છે. શક્તિ અને બુદ્ધિ પરમાત્મા માટે છે. આ દુર્લભ માનવશરીર પામીને પરમાત્માનાં દર્શન માટે જે પ્રયત્ન કરતો નથી તે જીવ પોતાની જ હિંસા કરે છે. આવા માણસને ઋષિઓએ આત્મહત્યારો કહ્યો છે."
તેઓ કહે છેઃ "માનવી સિવાય કોઈનેય ભગવાનનાં દર્શન થતાં નથી. સ્વર્ગમાં રહેલા દેવોને પણ ભગવાનનાં દર્શન થતાં નથી. સ્વર્ગમાં રહેલા દેવો અતિ સુખી છે, પણ તેમના સુખનો પણ અંત આવે છે. સંસારનો નિયમ છે કે જ્યાં સુખ છે ત્યાં દુઃખ ભોગવવું જ પડે છે. સ્વર્ગના દેવો આપણા કરતાં વધુ સુખ ભોગવતા હોવા છતાં તેમને શાંતિ નથી. શાંતિ તો પરમાત્માનાં દર્શનથી જ પ્રાપ્ત થાય છે. તેથી દેવો પણ એવી ઇચ્છા રાખે છે કે એમને ભારતવર્ષમાં જન્મ મળે. ભારત એ ભક્તિની ભૂમિ છે. સ્વર્ગમાં નર્મદાજી નથી. સ્વર્ગમાં ગંગાજી નથી. સ્વર્ગમાં સાધુ-સંન્યાસી નથી. સ્વર્ગમાં બધા ભોગી જીવો જ છે. સ્વર્ગ એ ભોગભૂમિ છે. જેણે બહુ પુણ્ય કર્યું હોય તે સુખ ભોગવવા સ્વર્ગમાં જાય છે, પરંતુ સ્વર્ગ કરતાં ભારતની ભૂમિ વધુ શ્રેષ્ઠ છે, કારણ કે દેવો ભક્તિ કરી શકતા નથી. ભક્તિ કરવા માટે માનવદેહ જોઇએ. પાપ છોડીને માનવી ભક્તિ કરે તો મૃત્યુ પહેલાં ભગવાનનાં દર્શન થાય છે. આજે ઘણાં લોકો કહે છે કે, "હું મંદિરમાં જઈ ત્રણ વાર દર્શન કરું છું." પણ ભગવાન કહે છેઃ "વત્સ! તું મંદિરમાં જઈ ત્રણ વાર મારાં દર્શન કરે છે, પરંતુ તને ખબર નથી કે હું ચોવીસે કલાક તારાં દર્શન કરું છું." ભગવાન આખો દિવસ સર્વેને જુએ છે."
તેઓ કહે છેઃ "તમે કોઈનું અપમાન કરશો તો જગતમાં તમારું અપમાન થશે. તમે કોઈની સાથે કપટ કરશો તો તમને છેતરનાર જગતમાં પેદા થશે. આ સંસાર કર્મભૂમિ છે. જેવાં કર્મ કરશો તેવાં ફળ મળશે. આજથી એવો નિશ્ચય કરોઃ આ જગતમાં મારું કોઈએ બગાડયું નથી. કોઈએ પણ મને દુઃખ આપ્યું નથી. મારા દુઃખનું કારણ મારું પાપ છે. તમારો શત્રુ જગતમાં નથી. તમારો શત્રુ તમારા મનમાં છુપાયેલો છે. મનમાં રહેલો કામ એ જ તમારો શત્રુ છે. બહારના એક શત્રુને મારશો તો બીજા દસ ઊભા થશે. તમારી અંદર રહેલા શત્રુને મારશો જગતમાં તમારો કોઈ શત્રુ રહેશે નહીં."
આવું અદ્વિતીય જ્ઞાાન બક્ષનારા પૂજ્ય ડોંગરેજી મહારાજ કારતક વદ છઠ તા. ૮-૧૦-૧૯૯૦ના રોજ બ્રહ્મલીન થયા. એ જ દિવસે માલસર ખાતે નર્મદાજીના પ્રવાહમાં સાંજે તેમને જળસમાધિ આપવામાં આવી. આજે માનવદેહ રૂપે આપણી સમક્ષ પૂજ્ય ડોંગરેજી મહારાજ હયાત નથી, પરંતુ જેમણે તેમને સદેહ જોયા છે અને સાંભળ્યા છે એ તમામને તેમનો કૃષ્ણપ્રેમ, જનશક્તિનું બ્રહ્મતેજ અને તેમના તેજસ્વી લલાટનું સ્મરણ છે, જાણે કે પૃથ્વી પર સાક્ષાત્ સૂર્યનારાયણ ઊતરી આવ્યા ન હોય!
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આપણી ઘરોહર આપણી સંસ્કૃતિ
*ડોંગરેજી મહારાજ ની જન્મજયંતિ આજે ફાગણ સુદ ત્રીજ નિમિત્તે શત શત નમન*
ડોંગરેજી મહારાજ નું જીવન
૧૯૪૮ની સાલ.
વડોદરામાં લક્ષ્મણ મહારાજના જંબુબેટ મઠમાં એક કથાકારે જીવનની પહેલી કથા કરી.
શ્રીકૃષ્ણ કથા પરનું તેમનું વક્તવ્ય શ્રોતાઓને ઝંકૃત કરી ગયું.
કથાકારનું નામ રામચંદ્ર કેશવ ડોંગરે.
માતાનું નામ કમલાતાઈ. પિતાનું નામ કેશવ ગણેશ ડોંગરે.
અહલ્યાબાઈ હોલકરની પુણ્યનગરી ઈન્દૌરમાં ફાગણ સુદ ત્રીજ ને તા. ૧૫-૨-૧૯૨૬ના રોજ મોસાળમાં જન્મેલા રામચંદ્ર કેશવ ડોંગરેના પિતા સ્વયં વેદશાસ્ત્રના પંડિત હતા.
પિતા જ પ્રથમ ગુરુ. વેદ-પુરાણ, ન્યાય, તર્ક, દર્શન ઈત્યાદિનો અભ્યાસ તેમણે વારાણસીમાં કર્યો. અમદાવાદના સંન્યાસ આશ્રમમાં અને પૂનામાં સંસ્કૃતનો અભ્યાસ કર્યો.
વારાણસીમાં પવિત્ર ગંગાતટે શાસ્ત્રાભ્યાસ દરમિયાન જ મનમાં વૈરાગ્ય પેદા થયો.
આમ છતાં માતાના આગ્રહથી શાલિનીબાઈ સાથે વિવાહ કર્યા.
૨૪ વર્ષના પ્રસન્ન દાંપત્ય બાદ પત્નીએ અલગ નિવાસ કર્યો.
વારાણસીમાં જ શ્રી નરસિંહ મહારાજે તેમને શ્રીમદ્ ભાગવતનું અમૃતપાન કરાવવાની દીક્ષા-પ્રેરણા આપી. એ કથાકાર ડોંગરેજી મહારાજના નામે આખા દેશમાં પ્રચલિત થયા. ભારતભરમાં તેમણે ૧૧૦૦થી વધુ ભાગવત કથાઓ કરી, પરંતુ કથામાંથી પ્રાપ્ત થતું ધન એમણે કદી સ્વીકાર્યું નહીં. જે ભંડોળ આવ્યું તે ગૌશાળા, મહાવિદ્યાલય, હોસ્પિટલ, અન્નક્ષેત્ર, મંદિરોનો જીર્ણોદ્ધાર, અનાથાશ્રમ અને કુદરતી સંકટો વખતે આફતમાં સપડાયેલા લોકો માટે વપરાયું.
પૂજ્ય ડોંગરેજી મહારાજ અંતર્મુખી સંત હતા. કથા કરતી વખતે હંમેશાં આંખો નીચી જ રાખતા. સ્વયં સાદગીપૂર્ણ જીવન જીવ્યા. કથાઓ આનંદ કે મનોરંજન માટે નથી એમ કહી સૌને સાવધાન કરતા. તેમની કથામાં આત્મબળ, શાસ્ત્રજ્ઞાાન અને અનુભવનો રણકો રહેતો. તેઓ જે કહે તેનું પહેલાં આચરણ કરતા, પછી જ ઉપદેશ આપતા. જિંદગીભર પોતે કોઇનાય ગુરુ થયા નહીં. સદા ઈશ્વરને જ ગુરુ કહેતા. તેમની કથાથી એકત્ર થયેલા ભંડોળમાંથી મંદિરનું નિર્માણ થાય તોપણ પોતાના હાથે મૂર્તિપ્રતિષ્ઠા થવા દેતા નહી. મૂર્તિપ્રતિષ્ઠા પછી નિત્ય દેવપૂજા ન થાય, ભગવાનને થાળ ન ધરાવાય, મંદિરમાં પૂજારીની વ્યવસ્થા ન થાય તો મૂર્તિપ્રતિષ્ઠા કરનારને પાપ લાગે તેમ તેઓ કહેતાં.
પૂજ્ય ડોંગરેજી મહારાજની જીવનશૈલી સરળ હતી. સદા જપ કરે, મૌન રહે, ખપપૂરતું જ બોલે. એમનાં કે એમની કથાનાં કોઈ વખાણ કરે તો તેમને ગમતું નહીં. તેઓ કહેતાં, સિદ્ધિ-પ્રસિદ્ધિ પતન છે.
તેઓ કહેતાં: ભગવાને જ વિના કારણે મારી યોગ્યતા કરતાં વધુ માન મને આપ્યું હોઈ હવે માન-સન્માનમાં ફસાવું નથી. એમ કહી તેઓ પોતાનું બહુમાન થવા જ દેતા નહીં. તીર્થયાત્રા વખતે નિયમ પ્રમાણે વ્રત-ઉપવાસ અને દેવપૂજા કરતા. કથાના આગલા દિવસે સ્થળ પર પહોંચી જતા. કથા એક જ પક્ષમાં પૂરી થાય તે રીતે કરતા. કથા માટે એક યજમાન જ તેમને લઈ આવે અને મૂકી આવે તેવી વ્યવસ્થા ગોઠવતા. પોતાની સાથે એક જ અનુકૂળ બ્રાહ્મણ રાખતા.
પોતાના નામની કે ફોટાની પ્રસિદ્ધિ થવા દેતા નહીં. પોતાની કથાઓથી એકઠી થયેલી ધનરાશિમાંથી દાન કરવા છતાં પોતાનું નામ ક્યાંય આવવા દેતા નહીં. દાન-સખાવત, ટ્રસ્ટ એવું કોઈ માળખું તેમણે ઊભું કર્યું નહીં, યાદી પણ કરી નહીં. બધું જ પરમાત્માએ કર્યું અને પરમાત્મા જ કરાવે છે એવી ભાવનાથી કર્યું. સાદું સંતજીવન જીવ્યા. ઇચ્છાઓ ઊઠવા જ દીધી નહીં. સંકલ્પો કર્યા જ નહીં, કોઈ સ્પૃહા રાખી જ નહીં. દેહ, ત્રેહ, પત્ની, પરિવારની આસક્તિ પણ ન રાખી. કોઈ વિશેષ સ્થળ પસંદ કરી ત્યાં જ રહેવું એવું તેમને પસંદ નહોતું. પોતે પુજાય અને તેમનો પ્રચાર થાય તેવું તેમણે કદીયે ઇચ્છયું નહીં.
બહોળો શિષ્યસમુદાય હોવા છતાં તેઓ સ્વયંપાકી રહ્યાં. પોતાની રસોઈ પોતે જ બનાવી લેતા અને તે પણ ખીચડી કે બીજું સાદું ભોજન. ભોજનમાં પણ બે જ વસ્તુ લેતા. પોતાનું કાર્ય જાતે જ કરી લેતા. તબિયત સારી ન હોય તોપણ કોઈ તેમનું માથું દબાવે કે પગ દબાવે તેવું થવા દેતા નહીં. સીવ્યાં વગરનાં બે વસ્ત્રો-ધોતી, ઉપવસ્ત્ર, ટૂંકાં વસ્ત્રો-લંગોટી આથી વધુ વસ્ત્રો રાખતા નહીં. સંગ્રહથી દૂર હતા. વસ્ત્ર જીર્ણ થઈ જાય ત્યાં સુધી તેનો ઉપયોગ કરતા. જીવનભર કથા કરવા કે તીર્થયાત્રા કરતાં ભ્રમણ કરતા રહ્યાં, પરંતુ પોતાનું કોઈ કાયમી સરનામું રાખ્યું નહી. કોઈનીયે સાથે પત્રવ્યવહાર કર્યો નહીં. પત્રવાંચનથી પણ દૂર રહ્યા. તેઓ જ્યાં પણ કથા કરે ત્યાં તેમની કથાના વિસ્તૃત અહેવાલો સ્થાનિક અખબારોમાં પ્રગટ થતા, પરંતુ સ્વયં અખબારવાંચનથી દૂર રહ્યા. એકમાત્ર 'કલ્યાણ'ના અંકો તેઓ વાંચતા. વ્યક્તિગત વખાણથી દૂર રહ્યા. વખાણવા યોગ્ય તો ભગવાન જ છે તેમ તેઓ કહેતાં. કોઈનેય સહી કે હસ્તાક્ષર ભાગ્યે જ આપતા.
કથા કરતી વખતે કોઈ તસવીરકાર તેમને વ્યવસ્થિત થવા કે સામે જોવાનું કહે તો તેમ થવા દેતા નહી. વ્યાસપીઠ પર બેઠા પછી કોઈ તસવીરકારને જોતાં જ તેઓ નીચું જોઈ જતા. ચાલુ કથાએ કોઈ તસવીરકારને ફરકવા દેતા નહીં, ટેપ કે વીડિયોગ્રાફી પણ થવા દેતા નહીં.
*#धर्मसम्राटस्वामीश्रीकरपात्रीजी के नाम अभी ट्वीट करें*
*श्री हरिः*
*"वन्दे हरिहरानन्दं करपात्रं जगद्गुरूम्"*
नारायण,
जैसा कि आप सभी धर्मप्रेमी सज्जनों को ज्ञात ही होगा कि आज(माघ शुक्ल चतुर्दशी) पर हम सभी सनातन धर्मावलंबी धर्मसम्राट श्री स्वामी करपात्री महाराज जी के निर्वाण दिवस को "आराधना दिवस" के रूप में मना रहे है।
जिसमें श्रद्धांजलि स्वरूप महाराजश्री के विचारों को विश्व स्तर पर प्रचारित करने हेतु *"#धर्मसम्राटस्वामीश्रीकरपात्रीजी"* संज्ञक "टैग" का उपयोग कर सर्वसामान्य तक उनकी सर्वसुलभ छवि जो उनके जीवनकाल में थी उसे आज के जनमस्तिष्क तक पहुँचाने का पुनः प्रयास किया जा रहा है।
अतः उन सभी महानुभावों का आवाहन है जिनका जन्म ही स्वस्थ क्रांति के लिये हुआ है, वे आयें तथा आज ठीक साँय ६ बजे ट्विटर के माध्यम से
*#धर्मसम्राटस्वामीश्रीकरपात्रीजी*
संज्ञक "टैग" का उपयोग कर ट्वीट करें तथा इस धार्मिक लहर को जन-जन तक पहुँचाने के निमित्त बनने का अमुल्य श्रेय भी प्राप्त करें।
श्रीधर्मसम्राटविजयतेतराम्।
इति शम्।।
